बुधवार, 30 जून 2010

सरकार सामूहिक विवाह सम्मेलनों को सहयोग करें


सामूहिक विवाह सम्मेलनों को सरकार ,
कर्तव्य और उत्सव के रूप में  आयोजित  करे .

- अरविन्द सिसोदिया
 यूँ तो आवश्यकता अविष्कार कि जननी होती हे ,
सामूहिक विवाह सम्मलेन भी इसी  कि उपज हे .
सरकार के स्तर पर सामूहिक विवाह सम्मेलनों को सहयोग कि बात मुझे जहाँ तक ध्यान आती हे वह नाम भैंरो सिंह शेखावत  का आता  हे वे राजस्थान  के मुख्यमंत्री थे . जनता को सरकारी खजाने से पैसा मिलने का काम भी १९७७ में आई जनता सरकार से ही प्रारंभ हुआ हे , उससे पहले तो सरकार जनता से पैसा लेना ही जानती थी . देना नही जानती थी .
बड़ती महंगाई  के कारण जातीय पंचायतों और संगठनों ने कुछ धन वर-वधु के आभिभाव्कों से और कुछ धन समाज के सम्पन्न लोगों से लेकर  यह कार्य प्रारंभ किया था जो बहुत ही तेजी से सम्पूर्ण समाज में फैल गया . पिछड़ी जातियों और गरिवों के नाम पर बाद में सरकारें भी जुडी  .  
  - सामूहिक   विवाह सम्मलेन को प्रोत्सहान   देने कि आवश्यकता हे , सरकारी सहयोग राशी भी बडानी चाहिए , इन्हें लोकप्रिय और व्यवहारिक बनने के लिए जिला पंचायतों को ही आगे करना चाहिए . केंद्र  सरकार को भी योगदान देना चाहिए , इसमें कमियां खोजने के बजाये पहुच रही मदद के नजरिये से देखना चाहिए , गरीव कि परिभाषा   का मतलब भी मात्र बी पी एल नही हो बल्कि ६०  हजार रूपये से कम वार्षिक आमदनी वालों को भी इसमें सम्मिलित किया जाये .
प्रेरक प्रशंग  
-- २८ मई २०१० , मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राजगढ़ जिले के नरसिंहगढ विकासखण्ड के ग्राम कुंवर कोटरी में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत आयोजित सामूहिक विवाह सम्मेलन में कहा कि व्यक्ति जब कर्ज लेकर बिटिया की शादी करता है तो वह हमेशा सोचता है कि उसके परिवार में कभी दूसरी बिटिया नहीं हो। लेकिन मैंने संकल्प लिया है कि बेटी को वरदान बना कर ही चैन लूंगा। सम्मेलन में 451 कन्याओं का विवाह हुआ,जिसमें 9 मुस्लिम कन्याओं का निकाह भी हुआ।

     मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि बेटी के जन्म होने पर लाड़ली लक्ष्मी योजना का लाभ, स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई का खर्च, विवाह के लिये मुख्यमंत्री कन्यादान योजना और फिर प्रसव होने पर जननी सुरक्षा योजना का लाभ दिया जाता है। इस प्रकार बेटी के जन्म से लेकर उसके मां बनने तक शासन की ओर से अनेक योजनाओं के माध्यम से लाभान्वित किया जाता है। प्रसव के दौरान श्रमिक माताओं को 45 दिन की मजदूरी का पैसा बिना काम के ही दिया जाता है।
एक अन्य कार्यक्रम  में छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष श्री धरमलाल कौशिक ने कहा है कि मुख्यमंत्री कन्यादान सामूहिक विवाह योजना इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में अंकित होगी। जिसमें सभी धर्म जाति के लोग बिना भेदभाव के हजारों की संख्या में उपस्थित होकर सामूहिक विवाह कार्यक्रम को सम्पन्न कराते हैं। विधानसभा अध्यक्ष श्री कौशिक ने कहा कि प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने गरीब परिवारों की कन्याओं के विवाह की चिन्ता कर मुख्यमंत्री कन्यादान सामूहिक विवाह योजना बनायी है। इसका क्रियान्वयन पूरे छत्तीसगढ़ में हो रहा है। श्री कौशिक ने कहा कि इस योजना ने गरीबों को अपनी बेटी के विवाह के चिंता से मुक्ति दिलायी है।

     -- एक अन्य सम्मलेन मध्य प्रदेश के गढाकोटा में भी हुआ. जो सुर्ख़ियों में हे. भाजपा के नेता और वर्तमान में ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री गोपाल भार्गव ने लगातार आठवी बार सामूहिक विवाह सम्मलेन आयोजित किया हे जिसमें १०५१ जोड़ों का विवाह संपन्न करवाया गया . प्रत्येक जोड़े को १० हजार रूपये सरकार से और मंत्री महोदय ने अपने प्रभाव से एकत्र राशी से ४० हजार रूपये का अन्य सामान भी इन जोड़ों को दिया हे. जेसे ग्रहस्थी के सामान के रूप में गैस चूल्हा , गैस सिलेंडर , टी वी , पलंग , सूटकेस , बिस्तर , सोफा, सोने का मंगल सूत्र , चाँदी  कि पायलें  , घड़ी , सीडी प्लेयर , मेकअप बाक्स आदि आदि . अम्म्स्लन में २५१ पुरोहित और ५१ काजी सहित अन्य व्यवस्थों का भी इतजाम था . उनकी कुछ आलोचना भी हुई .
   मेरा मानना हे कि राजनीती में रह कर यह व्यक्ति बहुत ही अच्छा काम कर रहा हे. यह उनका आठवां आयोजन था , में भगवान से आशा कर सकता हु कि वे जियें तब तक निरंतर इस आयोजन को करते रहें . गरीव के लिए यह बहुत बड़ी समस्या हे , इसमें सहयोग  करना  . महान पुन्य का काम हे.
- मुख्यमंत्री कन्यादान योजना में भिण्ड जिले में जारी मई माह में 196 कन्याओं के विवाह सम्पन्न होगें। जिसके तहत जनपद पंचायत लहार में 103, गोहद में 22 और नगर पालिका भिण्ड में 70 विवाह विभिन्न तिथियों में आयोजित किये गये है। इस तरह के समाचार तो सभी जगह हें मगर उनमें सरकार अपनेपन से साथ हो यही बड़ी बात हे .
मेरा विशेस कर आनी राज सरकारों से अनुरोध रहेगा कि वे आम व्यक्ति कि इस समस्या में राहत देकर राजधर्म निभाएं . 
- राधाकृष्ण मन्दिर रोड , डडवाडा , कोटा २ , राजस्थान .

मंगलवार, 29 जून 2010

जम्मू और कश्मीर - सेना को बहार करने की कोशिशें

उमर अब्दुल्लाह-पाकिस्तानी मंसूबों कि बकालत .....!!!!



- अरविन्द सिसोदिया
मत भूलिए जम्मू और कश्मीर प्रान्त आज तक भारत का हिस्सा इसलिए  हे की वहां सेना अपनी जान पर खेल कर , अनगिनित बलिदानों से उसकी रक्षा कर रही हे . जम्मू - कश्मीर पार से जब धोके से पाकिसतानी सेना ने कवाईली  वेश में आक्रमण किया था , तब उसे भारत कि सेनाओं ने ही बचाया था , भारतकी और से पहुची सेना को उतरने के लिए हवाई पट्टी ठीक करने ने के काम को  संघ के स्वंय सेवक ने ही किया था . ईसकी रक्षा के लिए कई युद्ध हो चुके हें , हजारों सैनिकों के बलिदान से , इसकी रक्षा हो रही हे . मत भूलिए कि कश्मीर में एक भी मुसलमान नही था , हर बच्चा भोले शंकर का पुजारी था , हर बेटी कि माता पार्वती जी थीं . गलत हाथों में राज चले जाने से , सबको जबरिया मुसलमान बनाया गया . आज वे चाहते हें कि कश्मीरी बन कर ही रहें तो उन्हें जबरिया पाकिस्तानी बनाने पर तुलें हें . यदि जरा सी ईमानदारी हे और जरा भी पुरुषार्थ हे तो उनकी सच्ची रक्षा कि जाये   . यह रक्षा आम व्यक्ति नही सेना ही कर सकती हे वही करेगी . कश्मीर में सेना से दिक्कत सिर्फ पाकिस्तान  को हे , उसका बकील चाहे जो भी बने !!
 . इस प्रान्त से सेना को बहार करने की कोशिशें बहुत दिन से जारी हें , अलगाव वादी और आतंकवादी इसे भारत से अलग करना चाहते हें . यह तभी सफल हो सकते  हें जब वहां सेना न हो ! यह तमाशा उसी का हिस्सा हे .
 सीआरपीएफ के महानिदेशक विक्रम श्रीवास्तव ने कहा कि सीआरपीएफ,  उनके बल के जवानों ने एक भी गोली या आंसू गैस का गोला नहीं चलाया। स्थानीय पुलिस अधीक्षक (सोपोर) वहां है। हमारे लोग उन्हें मदद कर रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने रविवार रात केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम से बातचीत की थी और अर्धसैनिक बलों की कार्रवाई में नागरिकों के चपेट में आने पर अपनी चिंता जताई थी।स्थानीय नेताओं और राज्य पुलिस दोनों ने आरोप लगाया है कि सीआरपीएफ ने गोलीबारी की थी।
हुआ यह था कि सेबों के लिए विख्यात शहर सोपोर में रविवार (२० जून २०१०) को गोलीबारी में एक युवक की मत्यु के बाद प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कथित तौर पर सुरक्षा बलों द्वारा सोमवार को गोलीबारी में कश्मीर घाटी में अलग-अलग घटनाओं में दो लोग मारे गए।
जम्मू-कश्मीर में नागरिकों की हत्या के मामले में सीआरपीएफ को चारों ओर से निशाना बनाए जाने के बाद केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई ने कहा है जो लोग कर्फ्यू तोड़ कर पुलिस चौकियों को निशाना बना रहे हैं, उन्हें मासूम नागरिकों की संज्ञा नहीं दी जा सकती।पिल्लई ने कहा एक ऐसी जगह, जहां कर्फ्यू लगा हुआ है, वहां लोग कर्फ्यू तोड़ रहे हैं, पुलिस और सीआरपीएफ की चौकियों पर हमले कर रहे हैं, मैं नहीं मानता कि आप उन लोगों को किसी भी तरह मासूम और निर्दोष नागरिक कह सकते हैं। गृह सचिव ने एक निजी चैनल से कहा अब ऐसी भीड़ जुटाने वाले आयोजक एक तरह से किशोरों को आगे करने की प्रवृत्ति अपना रहे हैं। मेरा मानना है कि दोष उन्हें दिया जाना चाहिए और किशोरों को ये अहसास होना चाहिए कि उनका शोषण किया जा रहा है। यह पूछे जाने पर कि क्या अलगाववादी  लोगों की भावनाओं को भुना रहे हैं, तो उन्होंने इसका सकारात्मक जवाब दिया।
उमर  का अलगाववाद....,
शेख अब्दुल्ला और फारुख अब्दुल्ला के साथ कांग्रेस के रिश्ते दोस्ती और दुश्मनी के रहे। अब बारी अब्दुल्ला परिवार के तीसरी पीढ़ी के वारिस उमर अब्दुल्ला के साथ राजनीतिक रिश्तों की। उमर कांग्रेस की मदद से ही मुख्यमंत्री बने हैं। मगर वे स्वंय के बूते पर अगली सरकार कि तैयारी कर रहे हें . इस बार कि तिकडम यह हे कि अलगाव वादी ताकतें इनका समर्थन करे ,  
भारत यह कभी नहीं भूल सकता और भूलना भी नहीं चाहिए कि जम्मू कश्मीर की मौजूदा समस्या की जड़ में अमेरिका का हाथ है। पंडित जवाहर लाल नेहरू जब कश्मीर का मसला संयुक्त राष्ट्र में लेकर गए थे तो जनमत संग्रह का प्रस्ताव अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर रखा था। छह नवंबर 1952 को पेश किए गए इस प्रस्ताव का मकसद पाकिस्तान को फायदा पहुंचाना था। शेख़ अब्दुल्ला ने अपनी राह भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से अलग करते हुए राज्य के भविष्य का फैसला करने के लिए जनमत संग्रह कराए जाने की माँग शुरु कर दी. इसके लिए शेख़ अब्दुल्ला ने प्लेबिसाइट फ्रंट यानी रायशुमारी मोर्चा भी गठित किया. आप आज भी देख सकते हें कि जब भी पाकिस्तान का मामला आएगा तो अमेरिका और ब्रिटेन   का रुख परोक्ष - अपरोक्ष पाकिस्तान के ही फेवर में मिलेगा . यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान के परमाणु संबंध पाकिस्तान से हें . इसका क्या आर्थ हे ? 


उमर अब्दुल्लाह भी अपने दादा शेख अबोदुल्लाह के रास्ते कि और हें , 
- शेख अब्दुल्लाह , जवाहर लाल नेहरु के साथी और करीवी  होने से , जम्मू और कश्मीर के सर्वे सर्वा बन गये थे , नेहरु जी शेख अब्दुल्लाह के  आजादी के आन्दोलन को समर्थन करते थे . एक बार उन्हें महाराजा  हरी सिंह ने बदी बना कर भारत वापस भेजा था . वह खुन्नस नेहरु जी ने आजादी के बाद भी जारी रखी थी  और शेख अब्दुल्लाह को वहां का प्रधान मंत्री बनाया . प्रधान मंत्री बनने  के बाद उन्होंने , नेहरु जी को ठठ्ठा दिखाते हुए , आलगाव वादी कदम उठाने शिरू कर दिए , आखिर नेहरु जी को उन्हें जेल में डालने पड़ा . अलगाव वाद के कारनामें फारुक अबदुल्लाह ने भी बहुत किये , फिर जब यह समझ में आ गया  कि सबकुछ इतना आसन नही हे , तो जा कर ठंडे पड़े !

उमर सहाब  को बिना मेहनत सब कुछ मिला हे जब तक वे नष्ट नही कर लेंगे  तब तक चैन नही मिलेगा .कुछ दिन पहले वे संसद पर हमलावर अफजल गुरू कि बकालत कर रहे थे , उसे फाँसी नही देने कि बात कह रहे थे . गद्दारों के साथ खड़े होने वाले कि बात को क्या ताबुज्जो देना.
कश्मीर के भोले भले लोगों कि रक्षा  सेना कर रही हे , पाकिस्तानी गुंडों  से उन्हें बचा रही हे . सीमा पार से आये देशद्रोहियों से उनकी रक्षा कर रही हे . उसे वही बनाये रखना देश हित में हे .
-- राधा कृष्ण मन्दिर रोड , डडवाडा , कोटा २ , राजस्थान . .           

सोमवार, 28 जून 2010

महंगाई का महाघोटाला

प्रश्न  यह हे की प्रधानमंत्री किसका ..?
महंगाई के महाघोटाले बाजों का ! 

- अरविन्द सिसोदिया
जनता का या मतदाताओं  का या य़ू पी ए गठ बंधन का या कांग्रेस पार्टी का या सोनिया  गाँधी का , या अमरीकी हितों का , या बहूराष्ट्रिय कंपनियों का , या जमाखोरों का , तेजड़ियों का , स्वंय प्रधानमंत्री ही बता सकते हें की वे किन किन के प्रधानमंत्री हें ! इस समय जो  हालात हें उनमें तो प्रधानमंत्री जी जनता और मतदाताओं से तो कह नही सकते की वे उनके हें !! 
सरकार  मंहगाई  के सच को कब मानेगी यह तो वह ही जाने . मगर अब आम आदमी का जीना मुहाल  हो रहा हे महंगाई के कई कारण गिनाये जा सकते हें , मगर सच यह हे की किसी को चिंता ही नही हे की महंगाई क्यों हे.
  एक प्रधान मंत्री था अटल विहारी वाजपेयी , जिसके शासन में एक बार आलू प्याज का दाम क्या बड़ा , उन्होंने एसी महंगाई की नकेल कसी की उनके ६ साल के शासन में कभी  भी महंगाई ने दाम बडाने  का नाम नही लिया , ज्यादा वक्त नही सिर्फ ६ साल पहले की ही बात हे , इन ६ सालों में कही कोई तुफान नही आया हे जो महंगाई इतनी सुरसा हो गई की उसमें देश का प्रधान मंत्रिम तक समां जाये ...

विसलेष्क बैठ कर गुटरगू करते रहते हें , जैसे बड़ती जनसंख्या, वायदा बाजार की पूर्व खरीददारी , अधिक  नगद राशी बाजार में होने से जमा खोरी , पर्याप्त खेती सुधार नही होना , ज्यादातर असिचित भूमि होना , भारतीय खेती  का वर्ष पर आधारित होना , मांग के अनुरूप मॉल नही होना , वर्ष का निरंतर कम  होते जाना .और राजनेतिक द्रष्टि से गलत  नीतियाँ !! 
सच यह हे की भारत में महंगाई एक नासूर बन चुकी हे , पिछले पाँच साल से एक भी  महिना येसा नही गया जब महंगाई का रोना जनता के बीच   नही आया हो . और एक भी अवसर येसा नही हे जब य़ू पी ए सरकार की प्राथमिकता सूचि में महंगाई का मुद्दा नही हो , मगर चाहे अनचाहे अनेदों मोकों पार सरकार ने आगे हो कर महंगाई को प्रोत्साहन दिया . उनके अनेकों मंत्रियों  ने  आगे और मूल्य बदने की बात सार्वजनिक रूप से कही , पूरे एपीसोड़ों  को देखने से लगता हे की सरकार के खाने के दाँत  और हें दिखाने के और , सरकार स्वंय चाहती हे की महंगाई बड़े , यह किन को  लाभ पहुचने बड़े यह सहज समझ में आता हे , सरकार पूजीवाद को , लाभ कमाने वालों को , जमाखोरों को फायदा पहुचा कर अपना हित साध रही हे . यह हित मोटी चंदा वसूली के अतिरिक्त और क्या हो सकता हे . ये महंगाई  नही हे यह महा घोटाला हे . अर्थार्त महंगाई का महाघोटाला ...!!
-- राधा कृष्ण मन्दिर रोड, ड़डवाडा , कोटा २ , राजस्थान .    .  .

रविवार, 27 जून 2010

महान वीरांगना दुर्गावती







महान वीरांगना महारानी दुर्गावती  ने ,देश की अस्मिता और स्वतंत्रता के लिए लड़ा था महा संग्राम

- अरविन्द सिसोदिया
चंदेलों कि बेटी थी ,
गोंडवाने  कि रानी ,
चंडी थी-रणचंडी थी ,
वह दुर्गावती भवानी  थी .
भारत की नारियों ने देश की अस्मिता और स्वतंत्रता के लिए हमेशा ही यशस्वी  योगदान दिया है । महारानी दुर्गावती , मध्यप्रदेश की विलुप्त ऎतिहासिक धरोहर की महान यशोगाथा हे , वे  साहस और पराक्रम रहीं . .
उनकी वीर गाथा महारानी लक्ष्मी बाई जितनी  प्रसिद्ध नही हुई , मगर  उनका वीरोचित व्यवहार लक्ष्मी बाई से कम नही था .य़ू तो दो महान बिभुतियों में तुलना नही की जाती ,  यह विवाद का प्रश्न भी नही हे कि किसको प्रशिधि अधिक मिली और किसको नही मिला . लक्ष्मी बाई को प्रसिधी का एक कारण जबलपुर कि ही बहू सुभद्रा कुमारी चोहान कि झाँसी की रानी कविता को भी जाता हे  ,
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।जिसने उनकी यशोगाथा  को शिखर तक पहुचाया हे . उनकी सडक दुर्घटना में निधन होने से , बहुतसी रचनाएँ आने से रह गईं .., हो सकता वे दुर्गावती पर भी कविता लिखती . एक दूसरा कारण यह हे कि दुर्गावती के जीते जी कोई मुस्लिम शासक गोंडवाना  को जीत नही सका , उसके बलिदान के बाद उनके पुत्र ने भी बलिदानी  संघर्स किया . इस युध का अंत चोरागढ़ के जोहर से हुआ . यह सच हे कि राजपूत पुत्री और आदिवासी बहू दुर्गावती को और उनके सघर्ष  के बिखरे तमाम धरोहरों को उतनी प्राथमिकता से नही सजोया गया जितने कि आवश्यकता थी . 
इन वीरों का सच्चा सम्मान यही हे की इन से प्रेरण लें और भूलें नही ...!
कालिंजर के चंदेल राजा कीर्तिसिंह की इकलौती संतान थी। महोबा के राठ गाँव में सन् १५२४ की नवरात्रि दुर्गा अष्टमी के दिन जन्म होने के कारण इनका नाम दुर्गावती से अच्छा और क्या हो सकता था।देवी दुर्गा से दुर्गावती .  इनका तेज भी भगवती  दुर्गा की ही तरह था . वे  तीरंदाजी और तलवार चलाने में निपुण, रूपवती, चंचल, निर्भय वीरांगना थीं , उनकी वीरता के चर्चे दूर  दूर  तक चर्चित थे .  गोंडवाना शासक संग्राम सिंह के पुत्र दलपत शाह की सुन्दरता, वीरता और साहस की चर्चा धीरे धीरे दुर्गावती तक पहुँची परन्तु जाति भेद आड़े आ गया .फ़िर भी दुर्गावती और दलपत शाह दोनों के परस्पर प्रेम और भगबत इच्छा   ने अंततः उन्हें परिणय सूत्र में बाँध ही दिया .
विवाहोपरांत दलपतशाह को जब अपनी पैतृक राजधानी गढ़ा रुचिकर नहीं लगी तो उन्होंने सिंगौरगढ़ को राजधानी बनाया और वहाँ प्रासाद, जलाशय आदि विकसित कराये. रानी दुर्गावती से विवाह होने के ४ वर्ष उपरांत ही दलपतशाह की मृत्यु हो गई और उनके ३ वर्षीय पुत्र वीरनारायण को उत्तराधिकारी घोषित किया गया. रानी ने साहस और पराक्रम के साथ, पुत्र वीरनारायण का संरक्षण  करते हुए,  १५४९ से १५६५ अर्थात १६ वर्षों तक गोंडवाना साम्राज्य का कुशल संचालन किया.गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ा-मंडला सहित ५२ गढ़ों  के ३५००० गावों की शासक वीरांगना महारानी दुर्गावती थी  !
शानदार शाषन ------- 
वह तीर थी , तलवार थी ,
भालों और तोपों का वार थी ,
फुफकार थी , हुंकार थी ,
शत्रु का संहार थी , शत्रु का संहार  थी,
वह दुर्गावती भवानी थी .
उन्होंने अपने शासन काल में जबलपुर में दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल, मंत्री के नाम पर अधारताल आदि जलाशय बनवाये. १५५५-१५६० तक मालवा पर मुस्लीम शाषक बाज बहादुर का शाषन था , उसने कई बार युद्ध लड़ कर गोंडवाने को जीतने की कोशिशें की , मगर हर बार उसे हार ही हाथ लगी  रानी ने किश भी दुश्मन को पनपने नही दिया . मगर उनका देवर रजा बनाने का बहुत ही आकाक्षाएँ रखता था .
थर -थर दुश्मन कांपे ,
पग-पग भागे अत्याचार ,
लाशें  बिछी कई हजार ,  
नरमुंडों की झड़ी लगाई थी,
वह दुर्गावती भवानी थी .

अकबर की कामुकता
जो लोग अकबर को महान पढ़ते हें उन्हें नही मालूम की अकबर  एक कामुक और व्यभिचारी राजा  था , जो राजा  की भूमिका पर कलंक था . अकबर की ३४ रानियाँ थी जिसमें २१ रानियाँ ,रजवाड़ों के  राजाओं  राजकुमारियां  थीं . दुर्गावती जैसी विधवा  पर भी उसने कु द्रष्टि ही डाली थी , जिसकी जितनी भी निदा की जाये वह कम होगी .
संभत कांग्रेस और कई तथाकथित धर्म  निरपेछ दलों के नेत्कों को यही सब पसंद  हे , इश लिए अकबर को कामुक और व्यभिचारी के बजाये महान पढ़ाया जाता हे .
अकबर ने रानी दुर्गावती को पत्र भेजकर जैसे चेतावनी दी...वीरांगना रानी ने अकबर का पत्र तो फाड़कर फेंक दिया और जवाब भिजवा दिया।अकबर दुर्गावती के जवाब से तिलमिला उठा।
गोंडवाना के उत्तर में गंगा के तट पर कड़ा मानिकपुर सूबा था. वहाँ का सूबेदार आसफखां मुग़ल शासक अकबर का रिश्तेदार था.अकबर के कहने पर उसने रानी दुर्गावती के गढ़ पर हमला बोला परन्तु हार कर वह वापस चला गया, लेकिन उसने दुबारा पूरी तैयारी से हमला किया जिससे रानी की सेना के असंख्य सैनिक शहीद हो गए.
कर्म-मान थी , धर्म-प्राण थी ,
आजादी की शान थी ,
शोर्य का अनुसन्धान थी , 
वह दुर्गावती महान थी .
जबलपुर के निकट नर्रई नाला के पास भीषण युद्ध के दौरान जब झाड़ी के पीछे से एक सनसनाता तीर रानी की दाँयी कनपटी पर लगा तो रानी विचलित हो गयीं. रानी ने अर्धचेतना अवस्था में मंत्री अधारसिंह से अपने ही भाले के द्बारा उन्हें समाप्त करने का आग्रह किया. इस असंभव कार्य के लिए आधार सिंह द्बारा असमर्थता जताने पर उन्होंने स्वयं अपनी तलवार या कटार से अपना से  वीरगति पाई.
जब विपदा घिर आई थी ,
चाहुओर घटा घनघोर  थी ,
ना आगे राह थी, ना पीछे पार थी , 
घायल  रानी को लाज बचानी  थी ,
अपने ही सीने में अपना  ही खंजर; 
 वह दुर्गावती अमर बलिदानी थी .

बदला लिया शान से ....
दुर्गावती के वंसजों  ने हर नही मानी, उन्होंने घोषणा कि जो भी आसफ खान का सर काट कर लायेगा , उसे नगद इनाम और जागीर दी जायेगी , खलोटी के महाबली ने आसफ खान  का सर काट कर हाजिर किया , उसे कवर्धा कि जागीर दी गई .आसफ खा का सिर गढ़ा मंडला में दफन किया  हुआ हे और बांकी  का धड मडई-भाटा  में दफन किया  गया हे . दुनिया भर में यह एक मात्र मकबरा हे जो दो जगह बना हुआ हे .


वीरांगना रानी दुर्गावती ‘समाधि स्थल‘ नर्रई नाला में रानी के ४४६वें बलिदान दिवस ( २३ जून २०१० )पर आयोजित एक गरिमामय समारोह को संबोधित करते हुए कहा  आदिवासियों ने भी देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्य न्यौछावर किया है । उनके इस बलिदान की गाथा से युवा पीढी को अवगत कराने प्रदेश सरकार ने स्केचबुक श्रंखला का प्रकाशन प्रारंभ किया है । इस आशय की बात  प्रदेश के आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति कल्याण मंत्री कुंवर विजय शाह ने khii . ।
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने आज वीरांगना दुर्गावती के बलिदान दिवस पर महिला सशक्तिकरण के लिये मध्य प्रदेश पुलिस में रानी दुर्गावती के नाम पर नई बटालियन गठित करने की घोषणा की। उन्होंने बताया कि इस बटालियन में केवल महिलाओं की भर्ती की जायेगी।श्री चौहान जबलपुर से कोई 20 किलो मीटर दूर बारहा गांव में नर्रई नाले के समीप स्थित वीरांगना रानी दुर्गावती की समाधि पर श्रध्दा सुमन अर्पित करने के बाद आयोजित सभा को संबोधित कर रहे थे । उन्होंने रानी दुर्गावती तथा वीर शंकर शाह-रघुनाथ शाह के नाम पर प्रतिवर्ष दो-दो लाख रूपये के पुरस्कारों की भी घोषणा की।
--गौंड़ वंश की वीरांगना रानी दुर्गावती की स्मृति में स्थापित इस संग्रहालय का शिलान्यास 1964ई. को हुआ जबलपुर में हे ।
-- जबलपुर. रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर में हे .
- राधा कृष्ण मन्दिर रोड , डडवाडा, कोटा २ . राजस्थान .

------------------




इस रानी से हारा था बादशाह अकबर, मारे गए थे 3000 मुगल सैनिक
bhaskar newsOct 05, 2015

जबलपुर। मुगल बादशाह अकबर की 10,000 सैनिकों की सेना को रानी दुर्गावती ने तीन बार हरा दिया था। हार से अकबर बौखला गया, उसने रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधार सिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा। रानी ने यह मांग ठुकरा दी। इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसिफ खां के नेतृत्व में सेना भेज दीं। जबलपुर के पास नरई नाले के पास हुए युद्ध में 3000 हजार मुगल सैनिक मारे गए थे। 5 अक्टूबर को रानी दुर्गावती की जयंती है। dainikbhaskar.com इस मौके पर एक विशेष सीरीज के तहत बताने जा रहा है इस वीरांगना की पूरी कहानी।
अकबर की सल्तनत के अधीन मालवा के शासक बाज बहादुर और कड़ा मानिकपुर का सूबेदार आसिफ खां ने अकबर के कहने पर 10 हजार घुड़सवार, सशस्त्र सेना और तोपखाने के साथ आक्रमण किया। रानी दुर्गावती ने 2000 सैनिकों के साथ उसका सामना किया। इस युद्ध में 3000 हजार मुगल सैनिक मारे गए थे। आसिफ खां ने पहले भी रानी के राज्य पर हमला कर चुका था। हर बार वह बुरी तरह हारा। इसके बाद उसने दोगुनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। रानी उसी दिन अंतिम निर्णय कर लेना चाहती थीं। अतः भागती हुई मुगल सेना का पीछा करते हुए वे उस दुर्गम क्षेत्र से बाहर निकल गयीं। अगले दिन 24 जून, 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। ज्यादा घायल होने पर रानी ने अंत समय निकट देख अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंक कर आत्म बलिदान दे दिया था।
(रानी दुर्गावती की स्मृति में 1983 में मध्यप्रदेश सरकार ने जबलपुर विश्व विद्यालय का नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय कर दिया। भारत सरकार ने 24 जून 1988 को डाक टिकट जारी किया था।)

अकबर के सैनिकों ने लूटा खजाना
रानी के वीरगति को प्राप्त हो जाने के बाद अकबर की सेना ने राज्य पर जमकर अत्याचार कर खजाना लूट लिया। गढ़मंडला की इस जीत से अकबर को बहुत धन मिला। उसका ढहता हुआ साम्राज्य फिर से जम गया। इस धन से उसने सेना एकत्र कर अगले तीन वर्ष में चित्तौड़ को भी जीता।

चौरागढ़ का जौहर
आसिफ खां रानी की मृत्यु से बौखला गया था। वह उन्हें अकबर के दरबार में पेश करना चाहता था, उसने राजधानी चौरागढ़ (हाल में जिला नरसिंहपुर में) पर आक्रमण किया। रानी के पुत्र राजा वीरनारायण ने वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की। इसके साथ ही चौरागढ़ में जौहर हुआ। जिसमें हिन्दुओं के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं ने भी अपने आप को जौहर के अग्नि कुंड में छलांग लगा दी थी।

अकबर से झूठ बोला आसिफ खां
कहा जाता है कि आसिफ खां ने अकबर को खुश करने के लिए दो महिलाओं को यह कहते हुए भेंट किया कि एक राजा वीरनारायण की पत्नी है तथा दूसरी दुर्गावती की बहिन कलावती है। राजा वीरनारायण की पत्नी ने जौहर का नेतृत्व करते हुए बलिदान किया था और रानी दुर्गावती की कोई बहिन थी ही नहीं। बाद में आसिफ खां से अकबर नाराज भी रहा। मेवाड़ के युद्ध में वह मुस्लिम एकता नहीं तोडना चाहता था इसलिए उसने उससे कुछ नहीं कहा।

रानी की शौर्य की चर्चा होती थी हर जगह
पहले हुए युद्ध में में रानी द्वारा बाज बहादुर को हराने की चर्चा दूसरे राज्यों में होने लगी। यह जब अकबर के कानों तक पहुंची तो वह चकित रह गया। पहले उसने अपने दूत के माध्यम से रानी से मित्रता करनी चाही, रानी ने उसका संदेश स्वीकार कर लिया। लेकिन कुछ ही दिन बाद उसने छल से रानी के राज्य पर आधिपत्य जमाने का संदेश भेज दिया ये रानी को मंजूर नहीं था। रानी तलवार की अपेक्षा बंदूक का प्रयोग अधिक करती थीं।

आसिफ खां ने उकसाया था अकबर को
1555 से 1560 तक मालवा के मुस्लिम शासक बाज बहादुर और मियानी अफगानी के आक्रमण गौंडवाना पर कई वार हुए, हर बार रानी की सेना की ही विजय हुई। रानी स्वंय युद्धभूमि में रह कर युद्ध करती थी। अकबर के कडा मानिकपूर के सूबेदार आसिफ खां ने रानी दुर्गावती के विरूद्ध अकबर को उकसाया था। रानी की मृत्यु के बाद उनका देवर चन्द्र शाह शासक बना व उसने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। उसकी हत्या उसी के पुत्र मधुकर शाह ने कर दी। अकबर को कर नहीं चुका पाने के कारण मधुकर शाह के दो पुत्र प्रेमनारायण और हृदयेश शाह बंधक थे। मधुकरशाह की मृत्यु के पश्चात 1617 में प्रेमनारायण शाह को राजा बनाया गया।

चंदेल वंश की थीं रानी
रानी दुर्गावती चन्देल वंशीय राजपूत राजा कीर्तीराय की पुत्री थीं, उनका जन्म कालंजर किले (वर्तमान में बांदा जिला, उत्तरप्रदेश में ) में 5 अक्टूबर 1524 को हुआ था। उनके पिता तत्कालीन महोबा राज्य के राजा थे। उनका विवाह राज्य गौंडवाना के राज गौड़ राजा दलपत शाह से 1542 में हुआ था। उनका एक पुत्र वीरनारायण का जन्म 1545 में हुआ। 1550 में उनके पति राजा दलपत शाह की मृत्यु हो गई। पुत्र वीरनारायण को सिंहासन पर बिठा कर उन्होंने शासन संभाला। मालवा और दिल्ली के मुस्लिम शासकों से निरंतर संघर्ष करते हुए उन्होंने 24 जून 1564 को युद्ध भूमि में वीरगति प्राप्त की।



                                                        rani ka mahal 



वीरांगना महारानी दुर्गावती


१. बाल्यावस्थासे ही शूर, बुद्धिमान और साहसी रानी दुर्गावती
२. रानी दुर्गावतीने गोंड राजवंशवकी बागडोर (लगाम) थाम ली
३. आक्रमणकारी बाजबहादुर जैसे शक्तिशाली राजाको युद्ध में हराना
४. अकबरका सेनानी तीन बार रानिसे पराजित
५. गोंडवानाकी स्वतंत्रताके लिए आत्मबलिदान देनेवाली रानी
गोंडवानाको स्वतंत्र करने हेतु जिसने प्राणांतिक युद्ध किया और जिसके रुधिरकी प्रत्येक बूंदमें गोंडवानाके स्वतंत्रताकी लालसा थी, वह रणरागिनी थी महारानी दुर्गावती । उनका इतिहास हमें नित्य प्रेरणादायी है ।

 

१. बाल्यावस्थासे ही शूर, बुद्धिमान और साहसी रानी दुर्गावती

रानी दुर्गावतीका जन्म १० जून, १५२५ को तथा हिंदु कालगणनानुसार आषाढ शुक्ल द्वितीयाको चंदेल राजा कीर्ति सिंह तथा रानी कमलावतीके गर्भसे हुआ । वे बाल्यावस्थासे ही शूर, बुद्धिमान और साहसी थीं । उन्होंने युद्धकलाका प्रशिक्षण भी उसी समय लिया । प्रचाप (बंदूक) भाला, तलवार और धनुष-बाण चलानेमें वह प्रवीण थी । गोंड राज्यके शिल्पकार राजा संग्रामसिंह बहुत शूर तथा पराक्रमी थे । उनके सुपुत्र वीरदलपति सिंहका विवाह रानी दुर्गावतीके साथ वर्ष १५४२ में हुआ । वर्ष १५४१ में राजा संग्राम सिंहका निधन होनेसे राज्यका कार्यकाज वीरदलपति सिंह ही देखते थे । उन दोनोंका वैवाहिक जीवन ७-८ वर्ष अच्छेसे चल रहा था । इसी कालावधिमें उन्हें वीरनारायण सिंह नामक एक सुपुत्र भी हुआ ।

 

२. रानी दुर्गावतीने गोंड राजवंशवकी बागडोर (लगाम) थाम ली

दलपतशाहकी मृत्यु लगभग १५५० ईसवी सदीमें हुई । उस समय वीर नारायणकी आयु बहुत अल्प होनेके कारण, रानी दुर्गावतीने गोंड राज्यकी बागडोर (लगाम) अपने हाथोंमें थाम ली । अधर कायस्थ एवं मन ठाकुर, इन दो मंत्रियोंने सफलतापूर्वक तथा प्रभावी रूपसे राज्यका प्रशासन चलानेमें रानीकी मदद की । रानीने सिंगौरगढसे अपनी राजधानी चौरागढ स्थानांतरित की । सातपुडा पर्वतसे घिरे इस दुर्गका (किलेका) रणनीतिकी दृष्टिसे बडा महत्त्व था ।

कहा जाता है कि इस कालावधिमें व्यापार बडा फूला-फला । प्रजा संपन्न एवं समृद्ध थी । अपने पतिके पूर्वजोंकी तरह रानीने भी राज्यकी सीमा बढाई तथा बडी कुशलता, उदारता एवं साहसके साथ गोंडवनका राजनैतिक एकीकरण ( गर्‍हा-काटंगा) प्रस्थापित किया । राज्यके २३००० गांवोंमेंसे १२००० गांवोंका व्यवस्थापन उसकी सरकार करती थी । अच्छी तरहसे सुसज्जित सेनामें २०,००० घुडसवार तथा १००० हाथीदलके साध बडी संख्यामें पैदलसेना भी अंतर्भूत थी । रानी दुर्गावतीमें सौंदर्य एवं उदारताका धैर्य एवं

बुद्धिमत्ताका सुंदर संगम था । अपनी प्रजाके सुखके लिए उन्होंने राज्यमें कई काम करवाए तथा अपनी प्रजाका ह्रदय (दिल) जीत लिया । जबलपुरके निकट ‘रानीताल’ नामका भव्य जलाशय बनवाया । उनकी पहलसे प्रेरित होकर उनके अनुयायियोंने चेरीतल का निर्माण किया तथा अधर कायस्थने जबलपुरसे तीन मीलकी दूरीपर अधरतलका निर्माण किया । उन्होंने अपने राज्यमें अध्ययनको भी बढावा दिया ।

 

३. आक्रमणकारी बाजबहादुर जैसे शक्तिशाली राजाको युद्ध में हराना

राजा दलपतिसिंहके निधनके उपरांत कुछ शत्रुओंकी कुदृष्टि इस समृद्धशाली राज्यपर पडी । मालवाका मांडलिक राजा बाजबहादुरने विचार किया, हम एक दिनमें गोंडवाना अपने अधिकारमें लेंगे । उसने बडी आशासे गोंडवानापर आक्रमण किया; परंतु रानीने उसे पराजित किया । उसका कारण था रानीका संगठन चातुर्य । रानी दुर्गावतीद्वारा बाजबहादुर जैसे शक्तिशाली राजाको युद्धमें हरानेसे उसकी कीर्ति सर्वदूर फैल गई । सम्राट अकबरके कानोंतक जब पहुंची तो वह चकित हो गया । रानीका साहस और पराक्रम देखकर उसके प्रति आदर व्यक्त करनेके लिए अपनी राजसभाके (दरबार) विद्वान `गोमहापात्र’ तथा `नरहरिमहापात्र’को रानीकी राजसभामें भेज दिया । रानीने भी उन्हें आदर तथा पुरस्कार देकर सम्मानित किया । इससे अकबरने सन् १५४० में वीरनारायणसिंहको  राज्यका शासक मानकर स्वीकार किया । इस प्रकारसे शक्तिशाली राज्यसे मित्रता बढने लगी । रानी तलवारकी अपेक्षा बंदूकका प्रयोग अधिक करती थी । बंदूकसे लक्ष साधनेमें वह अधिक दक्ष थी । ‘एक गोली एक बली’, ऐसी उनकी आखेटकी पद्धति थी । रानी दुर्गावती राज्यकार्य संभालनेमें बहुत चतुर, पराक्रमी और दूरदर्शी थी ।

 

४. अकबरका सेनानी तीन बार रानिसे पराजित

अकबरने वर्ष १५६३ में आसफ खान नामक बलाढ्य सेनानीको (सरदार) गोंडवानापर आक्रमण करने भेज दिया । यह समाचार मिलते ही रानीने अपनी व्यूहरचना आरंभ कर दी । सर्वप्रथम अपने विश्वसनीय दूतोंद्वारा अपने मांडलिक राजाओं तथा सेनानायकोंको सावधान हो जानेकी सूचनाएं भेज दीं । अपनी सेनाकी कुछ टुकडियोंको घने जंगलमें छिपा रखा और शेषको अपने साथ लेकर रानी निकल पडी । रानीने सैनिकोंको मार्गदर्शन किया । एक पर्वतकी तलहटीपर आसफ खान और रानी दुर्गावतीका सामना हुआ । बडे आवेशसे युद्ध हुआ । मुगल सेना विशाल थी । उसमें बंदूकधारी सैनिक अधिक थे । इस कारण रानीके सैनिक मरने लगे; परंतु इतनेमें जंगलमें छिपी सेनाने अचानक धनुष-बाणसे आक्रमण कर, बाणोंकी वर्षा की । इससे मुगल सेनाको भारी क्षति पहुंची और रानी दुर्गावतीने आसफ खानको पराजित किया । आसफ खानने एक वर्षकी अवधिमें ३ बार आक्रमण किया और तीनों ही बार वह पराजित हुआ ।

 

५. गोंडवानाकी स्वतंत्रताके लिए आत्मबलिदान देनेवाली रानी

अंतमें वर्ष १५६४ में आसफखानने सिंगारगढपर घेरा डाला; परंतु रानी वहांसे भागनेमें सफल हुई । यह समाचार पाते ही आसफखानने रानीका पीछा किया । पुनः युद्ध आरंभ हो गया । दोनो ओरसे सैनिकोंको भारी क्षति पहुंची । रानी प्राणोंपर खेलकर युद्ध कर रही थीं । इतनेमें रानीके पुत्र वीरनारायण सिंहके अत्यंत घायल होनेका समाचार सुनकर सेनामें भगदड मच गई । सैनिक भागने लगे । रानीके पास केवल ३०० सैनिक थे । उन्हीं सैनिकोंके साथ रानी स्वयं घायल होनेपर भी आसफखानसे शौर्यसे लड रही थी । उसकी अवस्था और परिस्थिति देखकर सैनिकोंने उसे सुरक्षित स्थानपर चलनेकी विनती की; परंतु रानीने कहा, ‘‘मैं युद्ध भूमि छोडकर नहीं जाऊंगी, इस युद्धमें मुझे विजय अथवा मृत्युमें से एक चाहिए ।” अंतमें घायल तथा थकी हुई अवस्थामें उसने एक सैनिकको पास बुलाकर कहा, “अब हमसे तलवार घुमाना असंभव है; परंतु हमारे शरीरका नख भी शत्रुके हाथ न लगे, यही हमारी अंतिम इच्छा है । इसलिए आप भालेसे हमें मार दीजिए । हमें वीरमृत्यु चाहिए और वह आप हमें दीजिए”; परंतु सैनिक वह साहस न कर सका, तो रानीने स्वयं ही अपनी तलवार गलेपर चला ली ।

वह दिन था २४ जून १५६४ का, इस प्रकार युद्ध भूमिपर गोंडवानाके लिए अर्थात् अपने देशकी स्वतंत्रताके लिए अंतिम क्षणतक वह झूझती रही । गोंडवानापर वर्ष १९४९ से १५६४ अर्थात् १५ वर्ष तक रानी दुर्गावतीका अधिराज्य था, जो मुगलोंने नष्ट किया । इस प्रकार महान पराक्रमी रानी दुर्गावतीका अंत हुआ । इस महान वीरांगनाको हमारा शतशः प्रणाम !

जिस स्थानपर उन्होंने अपने प्राण त्याग किए, वह स्थान स्वतंत्रता सेनानियोंके लिए निरंतर प्रेरणाका स्रोत रहा है ।
उनकी स्मृतिमें १९८३ में मध्यप्रदेश सरकारने जबलपुर विश्वविद्यालयका नाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय रखा ।
इस बहादुर रानीके नामपर भारत सरकारने २४ जून १९८८ को डाकका टिकट प्रचलित कर (जारी कर) उनके बलिदानको श्रद्धांजली अर्पित की ।

शनिवार, 26 जून 2010

वंदे मातरम - बंकिमचन्द्र - स्वतंत्रता का महामन्त्र

-



शत शत नमन ,बंकिम
- अरविन्द सिसोदिया
कुछ  तो कहानी छोड़ जा ,
अपनी निसानी छोड़ जा ,
मोशम  बीता  जाये ,
जीवन बीता  जाये .
यह गीत संभव  दो बीघा जमीन का हे .
मगर सच यही हे की ,
काल चक्र की गती नही रूकती,

 एक थे बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय,
उनका निधन हुए भी काफी समय हो गया मगर वे हमारे बीच आज भी जिदा हें .
क्यों की उन्होंने एक अमर गीत की रचना की जिसने भारत को नई उर्जा दी और देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .जो रग रग  में जोश भर देता हे . जब भी कोई सैनिक जीत दर्ज कर्ता हे तो वो जन गण मन नही कहता , वह वन्दे मातरम का जय घोष करता हे .   
यही  वह गीत था वन्दे मातरम .जो स्वतंत्रता  का महामन्त्र बना .इसे उन्होंने आनद मठ नामक उपन्यास में लिखा था .., यह उपन्यास बंगदर्शन में किस्तों में छपा था . लेकिन जब १८८२ में यह पुस्तक रूप में छपा तो तुरंत ही बिक गया , लगतार इसके कई  संस्करण  छपे , उनके जीवन काल में ५ बार यह छप चुका था . उनका जन्म २६ जून १८३८ में हुआ था ,उन्होंने कई उपन्यास लिखे मगर उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्यति इसी आनद मठ  के वन्दे मातरम  से मिली .., 
यह उपन्यास भारत के साधू संतों के द्वारा, प्रारंभिक दोर में गुलामी  के विरुद्ध किये गये सघर्ष की कथा हे , कहा यह जाता हे की यह सच्ची कहानी पर आधारित था यह कहानी स्वंय बकिम के खोजी थी , आनन्द मठ उपन्यास पर कुछ विवाद हैं,कुछ लोग इसे मुस्लिम विरोधी मानते हैं। उनका कहना है कि इसमें मुसलमानो को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है। मगर सही बात तो यही हे की जो था वह लिखा गया हे .
स्वतन्त्रता संग्राम में यह गीत बच्चे -२  के जवान पर था , यह भारत माता की आराधना थी . लोग इसे बहुत ही प्यार से गाते थे .  कांग्रेस से लेकर  किसी भी देश हित की सभा में इस गीत से ही सभा प्रारंभ होती थी , अंगेजों ने बंग भंग कर हिदू मुस्लिम लड़ो अभियान प्रारंभ किया था , जिसके विरुद्ध यह गीत एक क्रांति बन गया था , बंग  एकीकरण हुआ और यह गीत हर देश भक्त ने गया , चाहे क्रन्तिकारी हों या सत्याग्रही .  
कांग्रेस से जुड़े कुछ लोगो नें वन्दे मातरम का विरोध किया था , तब कांग्रेस ने एल कमेटी बनी थी जिसके अध्यक्ष नेहरु जी थे , उन्होंने ,वन्दे मातरम के पहले दो अंतरों को .., स्वीकार किया था क्यों कि उसमें सिर्फ भारत माता कि स्तुति हे . .
अरविंद घोष ने बंकिम को राष्ट्रवाद का ‘ऋषि’ कहकर पुकारा.और बीबीसी के अनुसार, दुनिया भर से लगभग ७,००० गीतों को चुना गया था,१५५ देशों/द्वीप के लोगों ने इसमे मतदान किया था, वंदे मातरम् शीर्ष के १० गानो में दूसरे स्थान पर था।सन् 1920 तक, सुब्रह्मण्यम् भारती तथा दूसरों के हाथों विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर यह गीत ‘राष्ट्रगान’ की हैसियत पा चुका था,1930 के दशक में ‘वंदे मातरम्’ की इस हैसियत पर विवाद उठा और लोग इस गीत की मूर्तिपूजकता को लेकर आपत्ति उठाने लगे। एम. ए. जिन्ना इस गीत के सबसे उग्र आलोचकों में एक थे। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में गठित एक समिति की सलाह पर भारतीय राष्टीय कांग्रेस ने सन् 1937 में इस गीत के उन अंशों को छाँट दिया जिनमें बुतपरस्ती के भाव ज्यादा प्रबल थे और गीत के संपादित अंश शुरूआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गए हैं,को राष्ट्रगान के रूप में अपना लिया। सच यह हे की जवाहरलाल नेहरु मुश्लिम जोर जबरदस्ती से बहुत ही घबराते थे पूरे देश के विरोध के बाबजूद उन्होंने जन गन मन अधिनायक गीत को राष्ट्र गान बनबाया , जबकि इस गीत पर आरोप था की यह यह अंगेजों की स्तुति में गया गया  था . वह तो भला हो बाबू राजेन्द्र प्रशाद का जो उन्होंने अपनी व्यवस्था देते हुए ,वन्दे मातरम को बराबरी का दर्जा दिया . भारत की संबिधान सभा जिस वन्दे मातरम गीत से प्रारंभ हुई हो उसके साथ भी एसा मजाक ?   

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद डा. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में २४ जनवरी १९५० में वन्दे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा जिसे स्वीकार कर लिया गया।
डा. राजेन्द्र प्रसाद का संविधान सभा को दिया गया वक्तव्य है।
शब्दों व संगीत कि वह रचना जिसे जन गण मन से संबोधित करा जाता है भारत का राष्ट्रगान है,बदलाव के ऐसे विषय अवसर आने पर सरकार आधिकृत करे, और वन्दे मातरम् गान, जिसने कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे ऐतिहासिक भूमिका निभाई है,को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले (हर्षध्वनि) मै आशा करता हूँ कि यह सदस्यों को सन्तुष्ट करेगा। (भारतीय संविधान परिषद, खंड द्वादश:, २४-१-१९५०)
 
मेडम कामा ने भारत का जो झंडा बनाया था उसमें बीच की पट्टी में वन्दे मातरम लिखा था . 
श्री अरविन्द ने इस गीत का अंग्रेजी में और आरिफ मौहम्मद खान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया है सर्वप्रथम १८८२ में प्रकाशित इस गीत पहले पहल ७ सितम्बर १९०५ में कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। इसीलिए २००५ में इसके सौ साल पूरे होने के उपलक्ष में १ साल के समारोह का आयोजन किया गया। ७ सितम्बर २००६ में इस समारोह के समापन के अवसर पर मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को स्कूलों में गाए जाने पर बल दिया। हालांकि इसका विरोध होने पर उस समय के मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने संसद में कहा कि गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है, यह स्वेच्छा पर निर्भर करता है.
यह भी उल्लेखनीय है कि कुछ साल पहले संगीतकार ए आर रहमान ने, जो ख़ुद एक मुसलमान हैं, 'वंदे मातरम्' को लेकर एक संगीत एलबम तैयार किया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ है। ज्यादतर लोगों का मानना है कि यह विवाद राजनीतिक विवाद है। गौरतलब है कि ईसाई लोग भी मूर्ति पूजन नहीं करते हैं पर इस समुदाय से इस बारे में कोई विवाद नहीं है।
-Arvind Sisodia
 radha krishn mndir road ,
ddwada , kota 2 , rajsthan .








  
   .  .
  .

कांग्रेस का शासन,महंगाई का दुशासन ! कांग्रेस को वोट देने की सजा !!



कांग्रेस का असली चेहरा बेनकाब  ,
गरीव की गर्दन पर कांग्रेस कहत ,
जनता से जुल्म और कंपनियों को फायदा
- अरविन्द सिसोदिया
विश्व बाजार में पिछली साल कच्चे तेल के भाव १४० डालर प्रति बैरल थे तब पेटोलियम पदार्थ के मूल्य बाजार आधारित नही किये , अब  जब की मात्र ७७/८० डालर हे तब भाव बडाना सिर्फ आम भारतीय के प्रति द्वेषता ही कहा  जायेगा, कांग्रेस को वोट देने की सजा यह देश भुगत रहा हे . यह मूल्यवृद्धि सिर्फ एक आम भारतीय को प्रभावित कर रही हे . जो समपन्न वर्ग हे उसे इस से कोई फर्क नही पड़ता .  .  
कांग्रेस का शासन ,महंगाई का दुशासन !
कांग्रेस का महंगाई ज्वालामुखी रोज रोज ही फटने लगा ...!
अघोषित  आर्थिक आपातकाल
मार ही डाला इस महंगाई   ने ,
ईस्ट इण्डिया कंपनी की तरह लूट .
भारत को सोमालिया बनाने की साजिस .
देश की जनता को गरीव करने का षड्यंत्र ,
अब दाल रोटी खाओ  प्रभु के गुण गाओ का जमाना गया . 
अब तो वह जमाना आया हे की .....,
जो कुछ बचा तो महंगाई मार गई महंगाई मार गई .. !
क्या आप जानते हें की भारत में करोडपति या इससे उपर कितने हें ? सिर्फ १ लाख २५ हजार ??
बांकी कुछ मध्यम वर्ग और लगभग ७५ प्रतिशत वे जो २ डालर  से कम प्रतिदिन पर गुजरा करते हें ...??  अब सोचिये की कांग्रेस के महंगाई तूफान में इनका क्या हाल होगा !
जब अटल बिहारी वाजपेई ने प्रधानमंत्री पद छोड़ा (२२मई  २००४ तक )तब के बाद प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी के कार्यकाल में पेट्रोलियम मूल्यवृद्धि --
- २००४ में पेट्रोल  ३३.७१  प्रति लीटर , अब २०१० में ५१.४३ प्रति लीटर ,मूल्यवृद्धि १७.७२ 
  २००४ में डीजल २१.७४ प्रति लीटर , अब २०१० में ४०.१० प्रति लीटर , मूल्यवृद्धि१८.३६ 
  २००४ में गैस २४१.६० प्रति सिलेंडर , अब २०१० में ३४५ .२५ प्रति सिलेंडर , मूल्यवृद्धि १०३.६५ 
 २००४ में कैरोसिन ९.०१ प्रति लीटर , अब २०१० में १२.०१ प्रति लीटर मूल्यवृद्धि ३.००  
- विशेषज्ञों का कहना हे क़ी जिन परिवारों का प्रतिमाह खर्च १२००० रु प्रति माह हे , उन पर यह बोझा १५०० रु प्रति माह पड़ेगा . एक दो पहिया वाहन, प्रति दिन १ लिटर पेट्रोल खर्च करता हे  तो १२५ रु अतिरिक्त खर्च प्रतिमाह होगा . दो बाईक हें तो दुगना . एक कार  पर प्रति दिन ५  लिटर पेट्रोल खर्च करता हे  तो  ५२५ रु अतिरिक्त खर्च प्रति माह आयेगा . एक माह में एक सिलेंडर खर्च हे तो ४० रु अतिरिक्त खर्च प्रति माह आयेगा .यदि दो सिलेंडर प्रति माह का खर्च हे तो 80 रु अतिरिक्त खर्च प्रति माह आयेगा .
पेट्रोल क़ी आस पास दर --
पाकिस्तान ३८.७४
बंगला देश ४८.०२
श्री लंका ४५.२३
नेपाल ४९.९८

कांग्रेस सरकार का यह फेसला उसके द्वारा मांगे गये वोटों के वक्त क़ी गई घोषणा के विरुद्ध हे, वे कहते हें क़ी उनका हाथ गरीव के साथ हे, मागार सच यह हे क़ी उनका हाथ गरीव क़ी गर्दन पर हे , उसकी साँस ही रोक दी  ,
सच यह हे क़ी यह सरकार ने धन्ना  सेठ कंपनियों को लाभ पहुचाने के लिए किया हे , सरकार पर पहले से भी अति विकसित देश दवाव ड़ाल रहे थे  कि  भारत अपनी सब्सिडी   कम करे , यह फैसला उसी दवाव कि एक कड़ी में हे .
आम जनता को इस निर्णय के कारण बहुत कठनाई उठानी पड़ेगी  , क्यों कि सारा आवागमन  वाहनों से होता हे , ट्रांसपोर्टरों ने मॉल भाडा १० प्रतिशत बड़ा दिया हे . खाद्यन्न  से लेकर सामान्य वस्तुओं तक का लाना और वितरण करना  इस मूल्य  से प्रभावित हुए हें . खाद्य पदार्थों की महंगाई से जूझ रही जनता को पुनहसे एक न्यू महंगाई  से जूझना मुस्किल होगा . यह एक किस्म कि लूट पाट   हे जिससे देशवाशी लूटे जा रहे हें .
- राधा कृष्ण मन्दिर रोड , डडवाडा  , कोटा ,राजस्थान .

शुक्रवार, 25 जून 2010

काला आपातकाल - सतत सतर्कता ही स्वतन्त्रता का मूल्य हे

हम वीरों की संतानें हें , यही हमारी थाती हे !




- अरविन्द सिसोदिया
सतत सतर्कता ही स्वतन्त्रता का मूल्य हे , ये शब्द सिर्फ स्मरणीय वाक्य ही नही हें .  मानव जीवन के लिए ध्येय पथ भी हे . इसके बिना आप अपना स्वभिमान और सम्मान भी खो  देते हें .
आज विश्व में हमारा जो सम्मान हे उसका कारण यह भी हे की हम वह जाग्रत लोग हें जो अपनी गुलामी  के खिलाफ हजारों साल से लगातार संघर्स करते हुए आजादी प्राप्त करने का सामर्थ्य रखते हें , नव स्वतंत्र देशों में से ज्यादातर देश अपनी लोकतंत्र व्यवस्था को खो चुके हें , मगर हमारा लोकतन्त्र मात्र १८ महीने की कैद  के साथ ही फिरसे स्वतंत्र हो गया ! 
  हलांकि हम एक सनातन राष्ट्र हें हमारी राष्ट्रिय आयु अनंत हे , कुल मिला कर विश्व की प्रथम सभ्यता से हमारा अस्तित्व हे , किन्तु हमारी  गुलामी से मुक्ति और नई स्वतन्त्रता के साथ जीवन का शुभारंभ १५ अगस्त १९४७ से माना जाता हे , हमारी नागरिक आजादी के  अपहरण का एक दोर   गुजर चुका , जिसे  संघर्ष और सोभाग्य  से  बाद में हटा दिया गया .  . उस काल खंड ( २५/२६  जून १९७५  की रात्रि से २१ मार्च १९७७ ) को हम काला आपातकाल के नाम से जानते हे  ओर यह भी जानते हें की राष्ट्रिय स्वंयसेवक   संघ ने लोकतंत्र रक्षा का महाअभियान  नही चलाया होता तो शायद वह कालीरात  न जाने कब तक रहती .सघ के उस समय के १३५६ पुर्ण  कालिक प्रचारकों में से १८९ प्रचारक ही जेल में थे और बांकी भूमि गत रहते हुए बहार थे , सो उन सभी ने अदितीय जन जागरण और संघर्स का परोक्ष  नेत्रत्व करते हुए , सम्पूर्ण देश और विश्व में अभियान छेड़ा जिसके फल स्वरूप लाखों युवक और किशोर लोकतंत्र बहाली के लिए सडकों पर उतरे , अपने जीवन की चिता किये बिना राष्ट्र जीवन के लिए रक्षक बन कर जेलों को भर दिया . जनमत के दबाव के चलते  इमरजेंसी का आतंकवाद हटा . 
- मतपेटी के द्वारा भी तानाशाह और एकाधिकारवादी सत्ता   में आ सकते हें इस का उदाहरण  हिटलर से अच्छा और कोनहो सकता हे .

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की पुत्री इंदिरा प्रियदर्शनी इकलोती होने के कारण स्वभाव से ही जिद्दी थीं . उन्होंने अपना  विवाह जिद्द में किया था . लालबहादुर शास्त्री जी के निधन  के बाद कांग्रेस पार्टी में भी उन्होंने यही व्यवहार दोहराया , पार्टी के अधिक्रत राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार  को अपना  निर्दलीय उम्मीदवार खड़ा कर हरवाया . जो जो भी उन्हें ना पशन्द थे , उन सभी को पार्टी से बाहर हो जाने पर मजबूर कर दिया . सबसे बड़ी बात यह हो गई की भारतीय फोजों नें पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए , बंगलादेश एक स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में लाया गया . यह उपलब्धी कम से कम भारत में इंदिरा गाँधी को दुर्गा बनाने के लिए पर्याप्त थी , पूरा भारत उनके पीछे खड़ा था . यही वह अभिमान था जिसने उन्हें एकाधिकार और तानाशाही के रास्ते पर डाल दिया . उनके लोकसभा  चुनाव को पराजित उम्मीदवार  राजनारायण ने चुनोती दी , की यह चुनाव अवेध्य   आचरण के द्वारा जीता गया हे , ईलाहबाद   उच्च न्यायलय के न्यायाधीस जगमोहन लाल सिन्हा  ने यह सही पाया और चुनाव रद्द कर दिया और कानून के मुताबिक ही अगले ६ वर्ष चुनाव लड़ने पर प्रतिवंध लगा दिया . , हलांकि अपील की गुंजायस  दी गई थी . इसी दिन गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणामों में भी कांग्रेस चुनाव हार गई . देश में इन दोनों घटनाओं के कारण इंदिराजी के इस्तीफे की मांग ने जोर पकड़ लिया .  मगर इंदिरा जी ने इसे प्रतिष्ट से जोड़ लिया और इमरजेंसी लगा दी .  ,
ना दलील , ना वकील , ना अपील
 देश के सात दलों के ३३ संसद  सदस्य जेलों में बंद  थे , सिर्फ एक दल भारतीय कोमुनिस्ट पार्टी , सोवियत सघ के इशारे पर इंदिराजी के साथ थी . जय प्रकाश नारायण , मोरारजी देशाई , अटल बिहारी वाजपेई,चोधरी चरण सिंह ,विजयाराजे सिंधिया  , ज्योतिर्मय  बसु , भेरों सिंह  शेखावत  , मधु  दंडवते , समर गुहा , रवि रे , राजनारायण , लाल क्रष्ण अडवाणी ,श्य्म्नंदन मिश्र ,  पिलु मादी , चन्द्रशेखर , मोहन धरिया , क्रष्ण कान्त , रामधन और  पी एन सिंह आदि सहित बहुत से लोग जेलों में थे .  
ज्यादतर गैर कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता , कांग्रेस के प्रति कुल विभिन्न सामाजिक संगठन  आदि के लोगों को रातों रात घर से उठा कर जेलों में डाल दिया गया . मिडिया पर सेंसर सिप लागु कर दी गई , प्रति कुल प्रेस बद करवा  दिए गये . पत्रकारों की आबाज बंद करदी गई . 
- २७ जून १९७५ को प्रधान मंत्री इंदिरा जी ने अधिकारीयों की एक बैठक में कहा इन सब मामलों की जड़ संघ हे . क्यों की संघ के पास ही कांग्रेस की तरह विविध क्षेत्रों में विविध संगठन थे . तब कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बुआ ने कहा था , हम संघ को पूर्णत नष्ट करदेना चाहते हें ताकि वह फिर कभी ना उठ पाए . हुआ भी यही की संघ के सरसंघ चालक  बाला साहब  देवरस को  गिरिफ्तर कर लिया गया था .यूँ तो छब्बीस सगठनों पर प्रतिबन्ध लगा था मगर राष्ट्रिय स्तर का मात्र संघ ही था . 
जय प्रकाश नारायण जी ने  उनकी गिरिफ्तर से पूर्व ही लोक संघर्ष समिति बना दी थी , उसके अध्यक्ष मोरारजी देसाई और महा सचिव नानाजी देशमुख थे . 

मेरी खबरें , मेरे चमचे  ,
मेरी फोटू, भाषण चर्चे, 
बीस सूत्रीय के गुण गाओ,
नही तो सीधे जेल  जाओ. 
तब यह नारा मजाक में बहुत चलता था .      
पूरे देश में प्रशासनिक  तरीका  बदल गया , जनता पर जुल्म ढाए  जाने लगे , जबरिया नस बंदी ने कोहराम  मचा दिया , लोग घरों पर सोना छोड़ चुके थे , रास्ते चोदे करने के नाम पर भी खूब तोड़ फोड़ की गई . प्रधान मंत्री का २० सूत्रीय कार्यक्रम चलाया गया .
जनता ने फर्ज निभाया 

इमरजेंसी के चलते ही लोक सभा चुनाव हुए , जनता ने अपना फर्ज निभाते  हुए , कांग्रेस को बुरी तरह से हरा   दिया ,   मोरारजी देसाई प्रधान मंत्री और नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति बने . अटल जी व अडवानी जी  सहित संघर्ष रत नेता गण मंत्री बने , मगर आपस की लड़ी ने यह सरकार भी डुवा दी . मगर यह इतिहास बना की लगातार ३० वर्षें के शासन के वाद पहली बार  कांग्रेस केन्द्रीय मंत्री मंडल से हटी  .
- राधा कृष्ण मन्दिर रोड ,
डडवाडा , कोटा २ . राजस्थान .

  
    
  
   

गुरुवार, 24 जून 2010

डाउ केमिकल्स ने,भारत और प्रणव दा का अपमान किया

भारत और प्रणव दा  का अपमान किया डाउ केमिकल्स ने ....!
समुद्री जीवों से भी गये गुजरे भारतीय  ....!!
भारत सरकार सरकार हे या अमरीकी गुलाम ...!!!
-- अरविन्द सिसोदिया
समुद्री जीवों से सस्ते भारतीय हें , अमरीकी नजर में --
- मेक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम के तेल कुएं में विस्‍फोट से 11 कर्मचारियों की मौत हो गई और समुद्र में तेल का रिसाव शुरू हो गया। करीब दो महीने से रिसाव जारी है। इससे अब तक 597 पक्षियों, 243 कछुओं और 31 दूसरे समुद्री जीवों की मौत हो गई है। 30 डॉल्फिन की मौत की बात भी कही जा रही है । रिसाव के चलते अमेरिका ने तुरंत 2 अरब डॉलर के नुकसान का अनुमान लगा लिया और ब्रिटिश पेट्रोलियम पर दबाव बना कर एक अरब डॉलर हर्जाना भरने के लिए उसे राजी भी कर लिया लिया। कंपनी समुद्र तटों की सफाई पर एक अरब डॉलर खर्च भी कर चुकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ब्रिटिश पेट्रोलियम को यह कहते हुए आड़े हाथों भी लिया कि यहां पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है और कंपनी अपनी छवि सुधारने के लिए विज्ञापन पर पैसे उड़ा रही है। 25 साल पहले भोपाल में अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड की भारतीय ईकाई यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) के प्‍लांट से जहरीली गैस रिसने से अब तक 35 हजार लोगों की मौत हो चुकी है और करीब छह लाख लोग प्रभावित हुए हैं इसके एवज में यूनियन कार्बाइड ने करीब डेढ़ देशक पहले 47 करोड़ डॉलर हर्जाना देकर छुट्टी पा ली थी। इस तरह एक आदमी के हिस्‍से में 12 हजार रुपये आ रहे हैं। ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर मुआवजा मिलने और दोषियों को मात्र दो साल की सजा मिलने को अमेरिका पर्याप्‍त बता रहा है। अमेरिकी कंपनी के अधिकारी उम्‍मीद जता रहे हैं कि अब इस संबंध में पीड़ित कोई नया बखेड़ा खड़ा नहीं करेंगे।भारत सरकार भी भारतीय पैसे से भोपाल गैस पीड़ितों का मुह बद करने की कोशिश में लगी हुई हे .
अमेरिका के 27 सांसदों ने भारतियों का पक्ष   लिया ..., मगर भारत सरकार ने कोई पहल नही की ..,
     वॉशिंगटन,अमेरिका के 27 सांसदों ने डाउ केमिकल कंपनी से कहा है कि वह भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के इलाज और उनके आर्थिक पुनर्वास के लिए तत्काल कदम उठाए। उल्लेखनीय है कि यूनियन कार्बाइड कंपनी अब डाउ केमिकल के पास ही है।
सांसदों ने कंपनी के अध्यक्ष और सीईओ ऐंड्रू लिवरीस को भेजे एक पत्र में कहा है, 'हम डाउ से अनुरोध करते हैं कि भारत में चल रहे भोपाल से संबंधित मुकदमों में उसका कोई प्रतिनिधि उपस्थित हो, त्रासदी के पीड़ितों की चिकित्सा एवं आर्थिक जरूरतों की ओर कंपनी ध्यान दे और फैक्ट्री स्थल के आसपास की मिट्टी और भूमिगत जल की सफाई करे।' इंटरनैशनल कैम्पेन फॉर जस्टिस इन भोपाल (आईसीजेबी) ने कहा है कि फैक्ट्री की सफाई की जाए और कंपनी प्रदूषित भूमिजल की सफाई करे।पलोन ने कहा कि घटना के 25 साल बाद भी भोपाल की त्रासदी हमारे जेहन में कायम है। उन्होंने कहा कि हजारों लोग अब भी परेशानी झेल रहे हैं, जबकि यूनियन कार्बाइड और डाउ केमिकल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं हुई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के सदस्य कंपनियों के खिलाफ संघर्ष जारी रखेंगे।
भारत सरकार का अपमान किया यूनियन कार्बाइड के नए अवतार, डाउ केमिकल्स ने
-22 जून को हुई इंडो-यूएस की प्रमुख कं‍पनियों के प्रतिनिधिमंडल की बैठक में नहीं पहुंचे इस बैठक में भारत की ओर से वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने भाग लिया था। यह बैठक करीब सात महीने पहले से निर्धारित थी।कंपनी के प्रवक्ता लुईस अधिकारी ने बताया कि कुछ पूर्व निर्धारित बैठकों के कारण चेयरमेन मीटिंग में नहीं आ सके।
इसके साथ ही यूनियन कार्बाइड के नए अवतार, डाउ केमिकल्स ने फिर एक बार दोहराया है, कंपनी की जहरीली गैस कांड के पीड़ितों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। कंपनी के दूसरे प्रवक्ता स्काट व्हीलर के, यूएस के अखबार वाल स्ट्रीट जर्नल को भेजे मेल से विवाद फिर उभर आया है। अपने मेल में व्हीलर ने साफ शब्दों में कहा है कि डाव केमिकल्स का भोपाल गैस पीड़ितों के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं है और प्लांट की सफाई की जवाबदेही केंद्र और राज्य सरकारों की है।
कुल मिला कर  यह बात हे की , वे अमेरिकन  हें  और हमारे पास पूछ हिलाने वाली सरकार ..! 
- राधा कृष्ण मन्दिर रोड ,
   डडवाडा , वार्ड ५९ , कोटा २ ,
   राजस्थान .

बुधवार, 23 जून 2010

डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी - राष्ट्रहित पर पहला बलिदान




राष्ट्रहित पर पहला बलिदान
- अरविन्द सिसोदिया
लाखों भारतवासियों  के प्रेरणा पुंज और पथ प्रदर्शक ,  डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी महान शिक्षाविद, चिन्तक और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे, जो की भारतीय जनता पार्टी का प्रारंभिक नाम था  । भारतवर्ष की जनता उन्हें एक प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में स्मरण करती है  । राष्ट्र सेवा की प्रतिव्धता में  उनकी मिसाल दी जाती है . एक प्रखर  राष्ट्र भक्त के रूप में, भारतीय इतिहास उन्हें सम्मान से स्वीकार करता है , उनका बलिदान स्वतंत्र भारत में राष्ट्रहित पर पहला बलिदान था , आज जो जम्मू और कश्मीर भारत का अंग हे वह उनके ही संघर्ष के कारण हे , उनके बलिदान के कारण हे .  भारतीय राजनीती में उन्होंने , एक जुझारू, कर्मठ, विचारक और चिंतक के रूप में, भारतवर्ष के करोड़ों  लोगों के मन में उनकी गहरी छबि अंकित है, वे एक निरभिमानी देशभक्त थे । बुद्धजीवियों और मनीषियों के वे आज भी आदर्श हैं  जब तक यह देश रहेगा तब तक उन्हें सम्मान के साथ २३ जून को हमेशा याद किया जायेगा !
- डा मुखर्जी देश के विभाजन के खिलाफ थे , उनकी धरना थी की जब हमारी सांस्क्रतिक प्रष्ठभूमि एक हे थो दो टुकड़े क्यों ?
- देश के सबसे कम उम्र के कुलपति रहे , मात्र ३३ वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्व विद्यालय में .  
- वे अनेक बार  विधायक रहे , बंगाल  में मंत्री रहे , संविधान सभा में थे ,देश की प्रथम केंदीय सरकार में भी वे केविनेट मंत्री रहे . बादमें त्याग पत्र दे कर जनसंघ की स्थापना की , जनसंघ की और से लोक सभा में संसद सदस्य रहे . वे पीडत नेहरु के समक्ष वक्ता थे . उन्हें ससाद का शेर कहा जाता था . नेहरूजी उनसे कन्नी काटते थे  .

- जब जवाहरलाल नेहरु की केंद्र सरकार जम्मू और कश्मीर को सहराष्ट्र का दर्जा दे रही थी , उससे जम्मू और कश्मीर  को अलग झाडा , अलग निशान और अलग संविधान र्ल्हने का स्धिकार मिल ज्ञा था और वहां कोई विना परमिट प्रवेश नही कर सकता था ......! तब डा मुखर्जी ने न केवल विरोध किया ब्य्की पूरे देश में में एक बड़ा आन्दोलन खड़ा किया , गर्जना की एक देश  में दो प्रधान, दो निशान और दो विधान नही चलेंगे...!! डॉ मुकर्जी जम्मू काश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। यह अधिकार देने वाली धरा ३७० का खुल कर विरोध किया . एक विशाल सभा में डा मुखर्जी ने घोषणा की में जम्मू और कश्मीर में बिना परमिट घुसूगा क्यों की वह भारत का अभिभाजित अंग हे .
संसद में अपने ऐतिहासिक भाषण में डॉ मुकर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की थी। वे 1953 में बिना परमिट लिए जम्मू काश्मीरकी यात्रा पर निकल पड़े। जहाँ उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबंद कर लिया गया। 23 जून, 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। वे भारत के लिए शहीद हो गए, सही मायने में उनकी हत्या हुई थी . मगर उनके रास्ते  पर भारतीय  जनसंघ चला लम्बे सघर्ष के बाद अब वहां भारत का झंडा हे , वहां पहले प्रधान मंत्री था अब मुख्य मंत्री हो गया हे , भारत का निशन हो गया हे , सर्वोच्च न्यायलय का अधिकार क्षेत्र हो गया हे , मगर अभी भी विशेष राज्य का दर्जा उसे  हांसिल हे .इतना एकीकरण के लिए डा मुखर्जी के बलिदान को ही श्रेय जाता हे .
 भारत ने एक ऐसा व्यक्तित्व खो दिया जो हिन्दुस्तान को नई दिशा दे सकता था। उन्हें सच्ची श्रधांजली  यही होगी की हम सभी सतत सतर्कता से  राष्ट्र सेवा करें , राष्ट्रहित को सर्वो परी रखें !!!.
- राधा क्रष्ण मन्दिर रोड ,
  ड़डवाडा , कोटा २ ,
 राजस्थान .


 

अफजल को फ़ांसी , विनय कटियार के दबाव में

अफजल को फ़ांसी , विनय कटियार के दबाव में
- अरविन्द सिसोदिया
अफजल गुरु जेसे आतंकवादी कांग्रेस के घरजमाई
शीर्षक से १८-५-२०१० को में ने इसी  ब्लॉग पर अपनी  पोस्ट  लिखी थी ,
- भाजपा ने अम्बेडकर नगर जिले में आगामी 25 जून को ‘जागो जनता रैली’ आयोजित की है। रैली के लिए छपे एक पोस्टर में पूछा गया है कि संसद पर हमला करनेवाला अफजल गुरु किसका दामाद है, कांग्रेस का ?
- कांग्रेस इस पर भड़की हुई हे , उसने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए , इसे दिमागी दिवालिया पन कहा हे . सच यही हे की भारत की जनता में दिमाग हे वह सहनशील हे उसमें धर्म  निरपेक्षता हे वह अपने से बड़ कर दूसरे को सम्मान देती हे ,  इसी  कारण से ही कांग्रेस हे ! इसी कारण से चाहे जो कहने वाले लोग हें , इस जनता ने जब भी  दिमागी दिवालिये पन से अपना हित  सोचना शिरू कर दिया उसी  दिन से पाखंड की राजनीती सुधर जायेगी.., लोग भारत में रहकर भारत का बुरा करना भूल जायेंगे, हिन्दुओं की सहनशीलता को उनकी कमजोरी मत मनो वह भी क्रोध में आ सकता हे ,
- में पूर्व संसद विनय कटियार को धन्यवाद दूंगा की उनने बजनदार  ढंग से देशा हित की बात उठाई , कांग्रेस अन्दर तक  कांप गई ! जनता के भय से २३ जून को ही अफजल गुरु की माफ़ी याचिका ख़ारिज करके महामहिम राष्ट्रपति जी को भेजने की खबर आई हे , २००६ से केन्द्रीय ग्रह मंत्रालय बेबकूफ   बनाने में लगा हुआ था ,  जब की पहले तर्क दिया जा रहा था की फ़ांसी के २८ मामलों में २२ वे नंबर पर अफजल का मामला हे . जबकि इंदिरा गाँधी के हत्यारों के मामले में यह तर्क था ही नही , उन्हें यथा जल्दी फ़ांसी पर लटकाया गया था , हो भी क्यों ,राष्ट्रिय मामले और जान सामान्य मामलों में फर्क होता ही हे ,
एक दूसरे होर्डिग में विनय कटियार के फोटो के साथ लिखा गया है कि कांग्रेस के पांच आतंकवादी बेटे है। पहला जम्मू कश्मीर का आतंकवाद पंडित नेहरू की देन है। पंजाब का आतंकवाद श्रीमती इंदिरा गांधी की, लिट्टे का आतंकवाद राजीव गांधी की देन, इसके साथ ही नक्सलवाद और उल्फा आंदोलन कांग्रेस की संतानें है।
कटियार ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने नक्सलियों के साथ मिल कर आंध्र प्रदेश का चुनाव लड़ा था जिससे नक्सली मजबूत हुए और देशभर में आतंकवादी कारनामे अंजाम दे रहें है। उल्फा में बंगला देश से आये अवैध नागरिक शामिल है जिनको कांग्रेस का संरक्षण है।
कटियार का कहना है कि उन्होने अफजल को फांसी देने के लिए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था जिस पर कुछ सक्रियता हुई फिर मामला ठंडा पड़ गया।
लगता हे की कांग्रेस पर जब विदेशियों को फायदा पहुचने के आरोप भोपाल गैस कांड के चलते लग रहे हें , तो वह दबाव में हे , न चाहते हुए भी यह निर्णय लाया गया होगा , देखना यह हे की महामहिम  राष्ट्रपति महोदया के यहाँ से कब हरी झंडी मिलती हे .लेकिन इतना तो सच हे की अफजल को फ़ांसी ,  विनय कटियार के दबाव में ही आया हे . 
- राधा क्रिशन मन्दिर रोड ,
डडवाडा , वार्ड ५९ , कोटा २ .
राजस्थान .



    . 

मंगलवार, 22 जून 2010

डाऊ केमिकल्स से हमदर्दी क्यों....?

सरकार की कोशिश , इतना पैसा मुंह पर मार दो की कोई चिल्लाये नही....!!!
सबाल  गाँधी परिवार की साख का हे ...!!! 
- अरविन्द सिसोदिया
भोपाल गैस नरसंहार के मामले में गठित भारत सरकार के मंत्री मंडलीय समूह ने सोमबार को एक सिफारिस सोंपी   हे , जिस में  कोशिश की गई हे की इतना पैसा  मुंह  पर मार दो की कोई चिल्लाये नही ! 1500 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा को प्रधानमंत्री मंत्री मंडल की केबिनेट  बैठक में रखेंगे और स्वीक्रति भी मिलाना तय हे . मगर कही भी यह नही बताया गया की यह पैसा वे दोषी कंपनी से वसूलेंगे  की नही !
गैस कांड पर पुनर्गठित मंत्री समूह (जीओएम) के द्वारा दी गई सिफारिशों से अधिकतर पीड़ित लोग और त्रासदी में न्याय की मांग कर रहे सातों एनजीओ भी संतुष्ट नहीं दिख रहे हैं। प्रभावितों का कहना है कि सरकार द्वारा दिये गये फैसले में केवल खानापूर्ति ही की गई है।
सरकार वास्तव में भोपाल गैस से पीड़ित लोगों के प्रति सहानुभूति का तो दिखावा कर रही हे, वह वास्तव में तो अमरीकी  एंडरसन और डाउ केमिकल्स के प्रति बचाव का रुख अपना रही है। क्यों की इस मंत्री समूह में कम से कम कमलनाथ तो इनके शुभ चितक के तोर पर बैठे हें .इस सारे मशले के दोरान चिंता मलवे की सफाई कर  डाउ को फायदा पहुचाने की रही हे .  


भोपाल गैस नरसंहार पर बात हो रही हे , निर्णय लिया जा रहा हे और उन्हें क्या कहना हे , यह पूछा  ही नही जा  रहा , शायद  बात एंडर्सन से हो रही होगी!
भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े सातों एनजीओ ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर मुलाकात की अपील की है। 25 जून को होने वाली कैबिनट की अंतिम बैठक से पहले केंद्रीय कैबिनेट के सामने अपने बातों को रखने की अनुमति मांगी है।भोपाल गैस त्रासदी के प्रभावितों द्वारा सही न्याय के लिए विशेष आयोग के गठन की मांग तेज हो गई है। प्रभावितों का मानना है कि बिना विशेष आयोग के गठन के गैस कांड में सही न्याय नहीं मिल सकता है।
 
गैस कांड के संबंध में जीओएम द्वारा दी गई सिफारिश से केवल 6 फीसदी लोगों को ही न्याय मिल सकेगा। बाकी के 94 फीसदी लोग पहले की तरह ही न्याय से वंचित हो जाएंगे। सही बात यह हे की वे बहुतसे क्षेत्र जिनके लोग प्रभावित हुए और  म. प्र. सरकार उन क्षेत्रों को पीड़ित मान रही हे , उसे केंद्र सरकार सामिल नही करके न इंसाफी की यथा बत  बनाये  हुए हे . वे शहर के 36 वार्ड ही गैस पीड़ित माने हें , जबकि भोपाल के सभी 56 वार्डे को गैस प्रभावित घोषित किया जाना चाहिए . क्यों की गैस को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता था और उसने जो तांडव किया सबको मालूम हे . समूचे भोपाल को गैस पीडि़त घोषित करने की मांग पर ढाई दशक से राजनीति जारी है।केंद्र सरकार वहां की स्थानीय सरकार की बात  को ठुकरा कर एंडरसन को ही फायदा पहुचा  रही हे . !! उपहार अग्निकांड के पीड़ितों को भी 20.20, 25.25 लाख का मुआवजा दिया गया है. मगर भोपाल के गैस पीड़ितों को जिनकी पुश्तें तक गैस के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाएंगी, पहले भी भीख की तरह मुआवजा  देकर चलता कर दिया गया था ।
1989 में हुए निपटारे के तहत मारे गए 3000 लोगों और 1,20000 पीडि़तों को 47 करोड़ डॉलर का मुआवजा दिया गया था। भोपाल गैस त्रासदी के कुल पीडि़तों की संख्या (मारे गए और घायल) 5 लाख से ज्यादा है। इसमें कम से कम 15,000 लोग मारे गए हैं। सामूहिक नरसंहार के बदले भारत सरकार ने यूनियन कारबाइड से जो 750 करोड़ रुपए लिए थे, उसका उचित रूप से बंटवारा नहीं हो सका। साढ़े सात लाख मुआवजा दावे थे, उनमें से सबका निपटारा तब तक तक नहीं हो सकता जब तक की बड़ी राशी हाथ में न हो . इस मोके पर भी यह स्पष्ट नही किया  गया की उन दावों का क्या होगा जिन्हें अभी तक स्वीकार नही किया गया .   
प्रभावितों ने सरकार द्वारा घोषित मुआवजे की भरपाई के लिए डाऊ केमिकल्स और अमेरिका द्वारा पैसा उपलब्ध कराये जाने की मांग की है। पीड़ितों का कहना है कि सरकार इस बात का जवाब दे कि जिस पैसे से गैस पीड़ितों को राहत देने का काम करेगी, वह किसका पैसा होगा? अगर वो भारतीयों का पैसा है तो सरकार डाउ केमिकल्स के साथ इतनी हमदर्दी क्यों कर रही है?
 
- राधा क्रष्ण मन्दिर  रोड ,
  डडवाडा  , कोटा २ . राजस्थान .

सोमवार, 21 जून 2010

नीतीश धोखेबाज - लालूप्रसाद यादव

नीतीश धोखेबाज - लालूप्रसाद यादव
आपदा राहत मद में मिले करो़डों रूपए दबाकर रख गए - लालूप्रसाद यादव 
-- अरविन्द सिसोदिया

राष्ट्रीय जनता  दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार पर हमला बोल दिया और उन्हें धोखेबाज बताते हुए कहा,मुख्यमंत्री आपदा राहत कोष में गुजरात का भेजा हुआ पैसा बिना खर्च हुए दो साल तक कैसे प़डा रह गया। कहीं इसका यह तो मतलब नहीं कि आपदा राहत मद में मिले करो़डों रूपए दबाकर रख गए और बाढ़ पीडितों को कहा गया कि केंद्र सरकार से राहत मद में मांगी गई राशि नहीं मिली इसलिए पुनर्वास का काम नहीं हुआ।
भाजपा कोई चींटी नहीं है कि उसे कोई रग़ड सके, यह नौटंकी बंद होनी चाहिए। नरेंद मोदी और वरुण गाँधी दोनों को बिहार जा कर रोज  ८ से १० सभाएं करनी चाहिए .  भारत कोई नितीश का गुलाम थोड़े ही हो गया हे , वे बिहार के स्वामी  भी नही हें , लालू प्रशाद यादव ने भी एल के आडवानी को गिरिफ्तर किया था , पूरा देश उनके साथ खड़ा हुआ था . आज लालू जी कहाँ हें और आडवानीजी कहाँ हें ,जो भी हो, अब लगता यहीं है कि बिहार में भाजपा-जदयू गठबंधन सरकार के दोनों घटक दल यहां तीन-चार महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ही अलग-अलग रास्ता अपना लेने की रणनीति बनाने में जुट गए हैं। 
गलत परंपरा !
सोची समझी साजिस ?
बिहार की जनता की मदद,
दो साल तुमानें खजाने में क्यों थी ??
विज्ञापन का जबाब तो धन्यवाद था !
      बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने गुजरात के द्वारा भेट की  गयी सहायता राशी दो साल तक खजाने में रखकर लोटने की जो मिसाल कायम की हे , उस से बुरे वक्त में जनता की मदद करने में दूसरे राज्य संकोच करेंगे , इस परम्परा का  गलत संदेश गया हे .  जनता  पर जब कोई संकट आता हे तो पास पडोस से लेकर  दूर तक के लोग सहायता करते हें , और यह राजनेतिक परंपरा भी पड़ चुकी हे की जनता के हित चिन्तक  दिखने के लिए इन्हें गिनाया जाये , केंद्र सरकार इतने कर्ज में दबी हुई हे की तीन पीढ़ियों तक नही चुकेगा  मगर एक दिन नही जाता की कोई भारी विज्ञापन नही हो .  अभी चुनाव आयेंगे तब यही नितीश जी न जाने क्या क्या गिनाएंगे विज्ञापन से लेकर माइक तक , पर्चे से लेकर बात बात पर उपकारों की छड़ी लगी जाएगी , केंद्र की कांग्रेस सरकार और अन्य दलों के नेता भी यही करने वाले हें ,
नरेंद्र मोदी के समर्थकों ने यदि विज्ञापन छपवाया था तो इस का जबाब तो धन्यवाद था ! कुशल चतुराई यही थी की आप या तो चुप रहते जो लोग  भूल जाते या फिर धन्यवाद छपवाते जो लोग सराहना करते ! अब आप नंगे और हो गये की मदद की राशी ही खर्च नही की, इसे अपने खजाने में ही दवाये रहे .
  राजनीती में विज्ञापन बाजी  तो होती ही रहती हे, वास्तव में धन्यवाद देने या चमचा गिरी  करने भी , विज्ञापन छपते रहते हें , ज्यादातर फोटो बिना अनुमति ही छपते हें , नितीश और नरेंद्र मोदी का फोटो तो वास्तविक हे , दोनों ने हाथ मिलाये  थे ही , किसी ने कटिग करके / हेर फेर  करके हाथ थोड़े ही मिलाये , जो गलत हुआ , कोशी में बाढ़ आई ही थी , गुजरात की मदद बिहार  ने स्वीकार की ही थी . अब बतईये गलत क्या हुआ . इस तरह के हजारों विज्ञापन रोज छापते रहते हें , इन पर कोई ध्यान नही देता . लगता तो यह हे की नितीश अन्दर किसी से हाथ मिलाएं हें और यह सारा खेल पूरी सोची समझी योजना से हुआ हे . .  
- राधा क्रष्ण   मंदिर रोड , डडवाडा , कोटा २ 
राजस्थान .  , . . 

रविवार, 20 जून 2010

बिहार में बड़ी आग हे , नीतीशजी झुलस मत जाना !

बिहार में बड़ी आग हे , नीतीशजी झुलस मत जाना !
--अरविन्द सीसोदिया 
 राजनीती में न तो दया क़ी जरूरत हे नही अपनेपन  क़ी , गद्दी के लिए बाप को जेल में ड़ाल दिया जाता हे और भाई  को मार दिया जाता हे , भा जा पा ने भले ही ज्यादा विधायक  होते हुए भी नितीश को अपना नेता बना दिया था मगर  नितीश ने गद्दी पर बैठते ही भा जा पा को ख़तम करने क़ी जैसे कसम खाई हो , इस तरह के काम किये जिससे भा जा पा को नुकसान हो , उनकी छबी को ठेस पहुचे .
भा जा पा को , अपनी अलग पहचान बना कर आगे चलना   चाहिए था जो उसने नही किया . न जाने क्यों अलग पहचान बनाने  से डरते हें जबकि अलग पहचान, ही दल को सुरक्षित रखती हे .
  निताश कुमार के मन में लगातार खोट था , मगर बी जे पी को टालने क़ी अदातसी पड गई हे , लोकसभा चुनाव के बाद यह खुलाशा  सामने आ चुका  था क़ी  नितीश कांग्रेस के करीब जा रहे हें , मगर बीजेपी सहयोगी दलों के साथ नतमस्तक हो जाती हे मानों उनकी अटकी हो ,  इस का फायदा सहयोगी दल उठाते हें , दल को कठोर  और स्पष्ट रवैया सहयोगी दलों  के सामने रखना  चाहिए ,  एक नही आनेक  वार यह हो चूका हे क़ी जो, बी जे पी से मदद लेता हे वही ऑंखे दिखाने लगता हे . मायावती से लेकर नितीश तक एक ही कहानी हे . कर्नाटका  में भी यही बी जे पी के साथ पहले हो चूका  हे . मायावती ने य़ू  पी में न केवल कमजोर किया बल्कि बहुत नुकशान पहुचाया , यही उड़ीसा में हुआ . , यही बिहार में होने वाला हे . नितीश सोची समझी राजनीती कर रहे हें . वे लगातार मुस्लिमों को खुश करने के लिए हिन्दुओं के साथ अन्याय कर रहे हें . आज क़ी तारीख में जो निति कांग्रेस क़ी हे वही निति नितीश क़ी हे . , बी जे पी को यह अच्छी   तरह समझ लेना चाहिए  क़ी हिदुत्व ही उसकी साख हे , अपनी साख  से समझोता करके आप अपने आप से धोका करेंगे और कमजोर होंगे .
  बिहार में वह नही हो सकता जो उड़ीसा में हो गया , उड़ीसा में गरीवी ने आम आदमी को जीने क़ी अभिलाषा से ही अलग कर दिया हे . वहाँ राजनीती मर गई हे , मूर्छित हे , मगर बिहार ईस तरह का नही हे , बिहार में आग हे , नितीशजी बी जे पी को क्या जलाएंगे कही खुद झुलश  न जाएँ . 
   बिहार में 15 साल पुरानी बीजेपी-जेडी (यू)की दोस्ती टूटने के कगार पर पहुंच चुकी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कदमों से आहत बीजेपी ने भी अब आर या पार का फैसला करने का मन बना लिया है। सोमवार को दिल्ली में सीनियर नेताओं की बैठक बुलाई है। बीजेपी दब कर राजनीति नहीं करेगी और जरूरत पड़ी तो हम अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं। उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने भी कड़ा रुख अख्तियार करते हुए नीतीश कुमार के साथ पालीगंज विश्वास यात्रा में जाने से इंकार कर दिया। 
- बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा ने कोसी बाढ़ पीडि़तों की मदद लौटाए जाने को कांग्रेस के केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्री सुबोध कांत सहाय ने  चुनावी नौटंकी करार दिया है।
- पूर्व सांसद एवं कांग्रेस नेता लवली आनंद ने कहा है कि कोसी बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए गुजरात सरकार द्वारा भेजी गयी राशि न तो नरेन्द्र मोदी की है न नीतीश कुमार की। यह पैसा गुजरात की आम जनता का है। इसे वापस कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार और गुजरात के करोड़ों लोगों को शर्मिन्दा किया है।
- राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रभारी अनिल किशोर झा ने कहा है कि राशि लौटा कर मुख्यमंत्री ने बचकाना और बिहार की जनता को अपमानित करने का काम किया है। ऐसी हरकतों से राष्ट्रीय एकता की भावना पर चोट पहुंचती है।

- राष्ट्रीय जनता दल के प्रधान महासचिव रामकृपाल यादव व मुख्य प्रवक्ता शकील अहमद खां ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा कोसी पीड़ितों की सहायता के लिए गुजरात सरकार से प्राप्त राशि को लौटाना ओछापन है।
- लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस व महासचिव केशव सिंह ने एक संयुक्त वक्तव्य में कहा कि जदयू स्वार्थ की राजनीति कर रही है। मुख्यमंत्री द्वेष की भावना से पीड़ित हैं। देश के किसी भी हिस्से में जब आपदा आती है पूरा देश एकजुट होकर एक-दूसरे की मदद करता है। कोसी आपदा के समय भी ऐसा ही हुआ। कई राज्य सरकारें, सामाजिक व धार्मिक संगठन पीडि़तों की मदद में आगे आये थे। यदि उस वक्त बाहरी मदद नहीं मिलती तो आपदा से निपटना राज्य सरकार के बूते के बाहर की बात थी।
 बिहार में लालू प्रशाद हें , शरद यादव हें , रामविलास पासवान हे , शत्रुघन सिन्हा हें , बिहार कोई मर्त्प्रय राज्य थोड़े ही हे क़ी जो नितीश जी निगल जायेंगे .
   ज्ञात हो कि पिछले दिनों पटना में भाजपा कार्यसमिति की बैठक के दौरान स्थानीय अखबारों में एक विज्ञापन छपा था, जिसमें नीतीश कुमार और मोदी की तस्वीर एक साथ छपी थी। एक अन्य विज्ञापन में इस बात का जिक्र था कि वर्ष 2008 में कोसी बाढ़ आपदा के समय गुजरात ने बिहार को पांच करो़ड रूपये की मदद की थी। उसी दिन इन विज्ञापनों पर नीतीश ने सार्वजनिक तौर पर अपना गुस्सा प्रकट किया और विज्ञापन को बिहार की अस्मिता से जो़डते हुए गुजरात को पैसा लौटाने की धमकी दी थी। विज्ञापन से नाराज नीतीश ने भाजपा नेताओं को दिया जाने वाला रात्रिभोज तक रद्द कर दिया था। इसके बाद गत शनिवार को नीतीश ने गुजरात सरकार को पांच करो़ड की सहायता राशि लौटा दी।
--राधा क्रष्ण मन्दिर रोड ,
डडवाडा , कोटा २ . राजस्थान .