रविवार, 13 जून 2010

नीतीश, सस्ती लोकपियता के लिए सोचा समझा षड्यंत्र ....!

          

मुझे मुसलमानों का मसीहा बनना हे.....!
बिना हिदू वोट के कोई दल जीत ही नही सकता......!
सस्ती लोकपियता के लिए सोचा समझा  षड्यंत्र ....!
भोज रद्द करके तो आपने अपने ही राज्य का अपमान किया हे....! 
         मुझे मुसलमानों का मसीहा बनना हे , उनके वोट ठगने हें , इसलिए नरेंद्र मोदी जी तुम शहीद हो जाओ, एल   के  आडवानी जी की राम रथ यात्रा को रोक कर लालुप्रशाद यादव ने भी १५ साल तक मुसलमानों के वोटों को ठगा था , मगर  सब जानते हें की यह तो कांग्रसी वोटर हे , मुस्लमान जब तक अपनी हिदू विरोधी छवि से बहार नही आएगा, तब तक शोषित ही  होता रहेगा , क्यों की आम हिदू इसे आच्छा थोड़े ही मनाता हे , बिना हिदू वोट के कोई दल जीत ही नही सकता , कांग्रेस जो की बिहार में हान्सिये   पर हे ने एक मुसलिम को प्रदेश आध्यक्ष बनाया हे , सिर्फ इतने से भयभीत हें नितीश ,          ,
          नरेन्द्र मोदी बीजेपी के सबसे सफल और कुशल राजनेता हैं वे तीन बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने हैं और अब प्रधानमंत्री के दावेदारों मे शामिल हो चुके हैं. वरुण गांधी 2009 के लोकसभा चुनाव मे बीजेपी के सबसे बड़े स्टार बनकर उभरे, अपने  बयान की वजह से सुर्खियों मे आए और गिरफ्तार भी हुए जिसके बाद और मशहुर हुए
             अखबार मे छपी तस्वीर तो एक बहाना हैं जो नीतीश कुमार शायद ढ़ंढ़ रहे थे अपने सहयोगी से किनारा करने का, हालांकी उन्होने ये बात जरुर कही हैं की राज्य मे बीजेपी के साथ गठबंधन से उन्हे कोई दिक्कत नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से इस साल अपने करिबी रहे नेताओं से नीतीश कुमार अलग हुए और उन्होने मनाने तक का प्रयास नहीं कीया और नाहीं उनके बयानों का कोई जवाब दिया ये बातें नीतीश कुमार के उस विश्वाश ( ओवर कंफिडेंस ) का गवाह हैं जो उन्होने अपने कार्यकाल मे जनता से हासिल किया हैं,  एक बात तो तय हैं की नीतीश कुमार यह मान कर चल रहे हैं की वे अकेले भी इस जंग को जीत सकते हैं तभी तो अपने करिबी रहे जेडीयू के दिग्गजों प्रभुनाथ सिंह और ललन सिंह के रुठ जाने का गम भी नहीं हैं , लुधियाना मे नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी के साथ एक मंच पर जा सकते हैं लेकिन बिहार मे राजनीतीक मंच शेयर नहीं करना चाहते .
       2009 के लोकसभा चुनाव परिणाम आने से पहले भी नीतीश कुमार बीजेपी से अलग होने का ईशारा कर चुके हैं जब उन्होने कांग्रेस के सामने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने पर समर्थन देने की शर्त रखी थी, लेकिन नतीजे कुछ और हुए वरना ये गठबंधन कब का टुट गया होता.
       सवालों के फेहरीस्त बहुत लंबे हैं और समय कम हैं लेकिन यह सोचियें की बिहार विधानसभा के खेल का आगाज इतना रोमांचक हैं तो अजाम क्या होगा ? अगर बात बिगड़ती हैं तो क्या बीजेपी और जेडीयू के गठबंधन का टुटने का ठिकड़ा नरेन्द्र मोदी के सर फोड़ा जाएगा ? क्या नीतीश कुमार इस मौके की तलाश मे थे ?
      बिहार मे कांग्रेस की कमान महबूब अली कैसर को थमा दी, यह कहना गलत नहीं होगा की पार्टी ने चुनाव के मद्देनजर अल्पसंख्यक वोटों को अपने ओर करने के लिए कैसर को बिहार कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया । बिहार मे 15 फिसदी वोट अल्पसंख्यक समुदाय का हैं जो लगभग विधानसभा के 60 सिटों को प्रभावित करते हैं । ये भी एक संयोग हैं की चनाव आते हीं जिनके वोटों के लिए सभी पार्टीयां राजनीतीक रोटीयां सेंकती हैं चुनाव खत्म होते ही अपनी दुकानदारी बंद कर देते हैं ।
        नितीश ने जिस स्तर की बदतमीजी की हे वह इशारा तो यह भी करती हे की , सस्ती लोकपियता के लिए यह सब उनका ही षड्यंत्र हो ...! एक दल जो गठबंधन का वरिष्ठ  सदस्य हो वह तो कभी भी इस तरह की बदतमीजी नही कर सकता, जाँच करवाते की यह हरकत किसने की हे , असहमति दर्ज करवा  देते.  भोज रद्द करके तो आपने अपने ही राज्य का अपमान किया हे , रोटी तो सभी खा  ही लेते हें . लगता हे की नितीश की कांग्रेस सी बात हो गई हे . यह खेल पर्दे के पीछे २००९ के चुनावों के समय से ही चल रहा हे , लालू से दुखी कांग्रेस ने नितीश के सामने पंशा   फेका हुआ हे , नितीश उसमें फंस गये .

अरविन्द सिसोदिया
राधा क्रिशन मन्दिर रोड ,
ददवारा ,वार्ड ५९ ,  कोटा २     ,  .


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