मंगलवार, 15 जून 2010

महाराणा प्रताप कठे?

१५ जून २०१०  ,
अदम्य साहस एवं वीरता के प्रतीक महाराणा प्रताप की आज जयंती है।
महाराणा प्रताप के 470वें जन्मदिन पर उनका पुण्य स्मरण में कई कार्यक्रम पूरे राष्ट्र में अपने अपने तरीके से आयोजित किए गए।  ताजा दोर के कुछ ज्ञात मान सपूतों में गुरु गोविन्द सिंह , महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी प्रमुख  हें , हलाकी भारत माता ने देश धर्म की रक्षा के लिए , समय समय पर अपनी वीर सपूत कोख से अनगिनित सपूत पैदा किये , रानी दुर्गावती और महारानी लक्ष्मी बाई का पावन स्मरण भी अनिवार्य हे , बुन्देल खंड   के महान योधा छ्त्रशाल के संघर्स को भी नमन हे , अनाम शहीदों   की यह माला ही हे जिसने भारत  देश को हजारों सालों की गुलामी के बाबजूद जीवित रखा हे, में तो तुलसीदास  जी को भी एक महान योधा ही मानता हु जीनोहने समाज को मूर्छित अवस्था में , हनुमान चालीसा और रामचरित मानस के द्वारा  नई चेतना का संचार किया , पूरा  देश रामलीला मंचन और अखाड़ों  के द्वारा  नव स्फूर्त होगया ,. यह तब हुआ जब मुग़ल सर्व शक्ति मान   थे . हे मात्र भूमि भारत माता तुझे सब मालूम हे कब क्या करना हे , तुने ही बाबू सुभाष , तुने ही महात्मा गाँधी , तुम्हारे   ही दिए हें डा हेडगेवार और गुरूजी  , धन्य वीर सपूत भारत माता , जय जय भारतमाता  .
  .
याद आती हे यह पन्तियां जो लिखी हें .
कवि माधव दरक, कुम्भलगढ़, राजस्थान
             मायड़ थारो वो पुत कठे?
हळदीघाटी में समर में लड़यो, वो चेतक रो असवार कठे?
मायड़ थारो वो पुत कठे?, वो एकलिंग दीवान कठे?
वो मेवाड़ी सिरमौर कठे?, वो महाराणा प्रताप कठे?
मैं बाचों है इतिहासां में, मायड़ थे एड़ा पुत जण्या,
अन-बान लजायो नी थारो, रणधीरा वी सरदार बण्या,
बेरीया रा वरसु बादिळा सारा पड ग्या ऊण रे आगे,
वो झुक्यो नही नर नाहरियो, हिन्दवा सुरज मेवाड़ रतन
वो महाराणा प्रताप कठे? मायड़ थारो वो पुत कठे?
एकलिंग दीवान कठे? वो मेवाड़ी सिरमौर कठे? वो महाराणा प्रताप कठे?

संसद परिसर में राणा प्रताप की प्रतिमा मंगलवार, 21 अगस्त २००७ लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने अनावरण किया।यह प्रतिमा राज्यसभा में विपक्ष के नेता जसवंतसिंह ने भेंट की थी,जिसका निर्माण शिल्पकार फकीर चरण परीदा ने किया है। इस अवसर पर समारोह में विशेष तौर पर पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत, पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह,  विदेशमंत्री और लोकसभा के नेता प्रणब मुखर्जी,विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी, लोकसभा के उपसभापति चरणजीतसिंह अटवाल, गृहमंत्री शिवराज पाटिल,सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी सहित कई केंद्रीय मंत्री,राज्यसभा के उपाध्यक्ष के. रहमान खान, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे  के अलावा कई सांसद उपस्थित थे।
महाराणा प्रताप ने 1572 से 1597 तक राजस्थान के मेवाड़ में शासन किया मुगल सम्राट अकबर की सेना से प्रताप ने 18 जून, 1576 को अरावली की पहाड़ियों में स्थित हल्दीघाटी में प्रसिद्ध लड़ाई लड़ी। चार घंटे चली इस लड़ाई का कोई परिणाम नहीं निकला।
हल्दीघाटी- राजसमंद के खमनोर गांव के समीप ही है,हल्दीघाटी जो कि हमारे राजस्थान के ईतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। हल्दीघाटी में एक छोटा संकीर्ण दर्रा था,और ये ही आने जाने का रास्ता था ।एक बार में सिर्फ एक घुडसवार ही इस रास्ते से निकल सकता था और पहाडी रास्तों व जंगलों से राणा प्रताप की सेना खासी वाकिफ थी । 18 जुन 1576 ई. को महाराणा प्रताप एवं अकबर की शाही मुगल सेना के बीच हल्दीघाटी में एक एतिहासिक युद्ध हुआ। उनकी इस जंग में राणा पूंजा, झाला मान सिंह, हकीम खां सुरी एवं हजारों भील उनके साथ थे। ईसी दौरान मानसिंह और महाराणा प्रताप का सामना हुआ ।महाराणा प्रताप नें भाले से भरपुर वार किया, मानसिंह हाथी के ओहदे में छुप गया, हाथी की सुंड में लगी तलवार से महाराणा प्रताप के स्वामीभक्त घोडे चेतक का एक पेर जख्मी हो गया ।एक पांव से घायल होने के बावजुद भी चेतक ने एक बडे से नाले को पार किया और राणा प्रताप को महफुज जगह पहुंचा दिया ।वहीं उस स्वामिभक्त घोडे चेतक का प्राणोत्सर्ग हो गया,उस स्थान पर आज एक स्मारक बना हुआ है जो कि चेतक स्मारक के नाम से जाना जाता है ।
विशाल मुगल सेना का सामना महाराणा प्रताप की छोटी सी सेना ने किया कहते है कि यहां ईतना खुन बहा की एक स्थान पर तलाई भर गई, यह स्थान रक्त तलाई के नाम से जाना जाता है। दोनो ओर के 20/25  हजार सेनिक मारे गये  . और अंत में यह युद्ध एक अनि्र्णायक युद्ध ही रहा । और अंत में यह युद्ध एक अनि्र्णायक युद्ध ही रहा । हजारों सेनिको के खुन से रंगी हल्दीघाटी की मिट्टी
अभी भी हल्दी के रंग सी है!

आज यहीं इस सिद्ध पीठ पर
फूल चढ़ाने आया हूँ।

आज यहीं पावन समाधि पर
दीप जलाने आया हूँ।।

इसी समय मेवाड़–देश की,
 कटारियाँ खनखना उठीं।
नागिन सी डस देने वाली
तलवारें झनझना उठीं.
धारण कर केशरिया बाना
हाथों में ले ले भाले।
वीर महाराणा से ले खिल
 उठे बोल भोले भाले।
-श्यामनारायण पाण्डेय ( हल्दीघाटी)
                यह एक येशे महा नायक थे जिनका नाम सुन कर अकबर , इस तरह कांप उठता था , जैसे  की सांप का नाम सुन कर , जब अकबर को महाराणा के निधन  का समाचार पता लगा तो उनकी आँख  भी छलक गई थी , उन्होंने कभी हार नही मानि , हर हार को फिरसे युध्य लड़ कर जीत में बदला . 
   उस समय भारत के सम्राट् ‘दिल्लीश्वरो वा जगदीश्वरो वा’ मुगल बादशाह अकबर थे। इनके पहले दिल्ली के सिंहासन पर जितने मुसलमान सम्राट् बैठे थे, उनकी नीति हिन्दुओं के प्रति खासकर वीर राजपूतों के प्रति मुसलमान-स्वभाव के अनुकूल, प्रत्यक्ष विरोध करने वाली थी, परन्तु सूक्ष्मदर्शिता अकबर ने उस नीति को ग्रहण नहीं किया। साम्राज्य-विस्तार की लालसा अकबर में उन लोगों की अपेक्षा बहुत बढ़ी-चढ़ी थी, परन्तु ये उन लोगों की तरह दुश्मन को दबाकर न मारते थे, इनकी नीति थी मिलाकर शत्रु को अपने वशीभूत करना। इस नीति के बल पर इनको सफलता भी खूब मिली। प्राय: सम्पूर्ण राजपूताना इनके अधीन हो गया। उस समय जिस महावीर पुरुष ने अकबर का सामना किया, हिन्दुओं की कीर्ति-पताका मुगलों के हाथ नहीं जाने दी, आज हम उसी लोकोज्ज्वल-चरित्र महावीर महाराणा प्रतापसिंह की कीर्ति-गाथा को  नमन युक्त श्रद्धा सुमन  भेट करते हैं ।
उस समय भारत वर्ष में जितने मानवीय क्षत्रियवंश थे, उनमें ‘सिसोदिया वंश’ विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था, आज भी इस वंश की इज्जत वैसी ही की जाती है। इस वंश में किसी प्रकार के कलंक की कालिमा नहीं लग पायी। मुसलमानों ने छाया-स्पर्श से भी इस वंशवालों को घृणा थी और वे अन्त तक दूध के धोये ही बने रहे।

1 महाराणा प्रताप: सूरवीर राष्ट्रभक्त
  http://arvindsisodiakota.blogspot.in/2011/05/blog-post_3843.html
2 वीर सपूत महाराणा प्रताप
http://arvindsisodiakota.blogspot.in/2011/05/blog-post_30.html
3 महाराणा प्रताप की जयंती
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महाराणा प्रताप कठे
http://arvindsisodiakota.blogspot.in/2010/06/blog-post_15.html


अरविन्द सिसोदिया
राधा क्रिशन मन्दिर रोड ,
ददवारा , वार्ड ५९ , कोटा २
राजस्थान . ,  

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