बुधवार, 28 जुलाई 2010

वोट की राजनीति के लिए राष्ट्रघाती पाखंड ठीक नही .


वोट बैंक की राजनीति के लिए , 
हिन्दुओं पर कीचड़ उछालो,
सेना  पर कीचड़ उछालो,
पुलिस पर कीचड़ उछालो

    - अरविन्द सीसोदिया
अब सी बी आई के हाथ गुजरात  के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ बड रहे हैं,बिहार चुनाव  आते आते गुजरात सरकार के गृह राज्यमंत्री अमित शाह को गिरिफ्तर कर लिया और उत्तर प्रदेश के चुनाव आते आते यह हाथ गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी को भी फंसा कर त्याग पत्र  दे ने के लिए  विवश  करने के षड्यंत्र क़ी और बड़ रहे हैं . यह खेल कांग्रेस के उन्ही खेलों में से है, जो पहले से वोट बैंक की राजनीति और सरकार को बचाए रखने के लिए विपक्ष में फुट डालो राज करो अभियान के तहत हो रही है . राजनीति में सब जायज है में इस बात का पक्ष धर  नहीं हूँ , राजनीति में वह चीज  जो देश हित के विरुद्ध हो , जो समाज हित क़ी विरुद्ध हो और जो सामान्य सामाजिक गतिविधियों के विरूद्ध हो उनका प्रोत्साहन नही करना चाहिए . कांग्रेस और कई अन्य राजनैतिक दल , दल गत फायदे के लिए इस तरह के अनेकों काम लगातार हो रहे हैं .
   कांग्रेस मुस्लिम वोटों को अपनें दल के पक्ष में रखने के लिए वे सभी काम कर रही है जो सभी द्रष्टि से गलत है . कांग्रेस नें उन हिन्दुओं को जिन्दा जलाये जाने क़ी भर्त्सना तक नही क़ी जो सवारमती एक्सप्रेस में जलाये गए . यदि इन जलाये गए हिन्दुओं के पक्ष में ठीक प्रकार से चलती संसद में निंदा हुई होती तो सायद कोई मरहम लग होता . कांग्रेस को इस घटना की प्रतिक्रिया में हुए गुजरात दंगे तो नजर  आ रहे हैं , मगर आग किसने लगी यह नजर नहीं आरहा , ५० से अधिक जिदा लोग जले तब आप सांत्वना देने तक नही पहुचे..! क्यों क़ी हिन्दुओं को जलने वाले मुस्लिम गुंडे थे , वे हिदू इस लिए जलाये गए क़ी अयोध्या से आ रहे थे , इस लिए जलाये गए क़ी आगे कोई अयोध्या नही जाये ..!!
  अयोध्या में भी आप हिन्दुओं की निंदा करते हैं , मगर यह तो सभी को मालूम था की अयोध्या में लाखों लागों को केंद्र सरकार की सहमती से ही बुलया गया है , न्यायालय में तारीख के बाद कारसेवा होनीं है , न्यायालय को भी और उनके न्यायाधिसों को भी पाता था , एक तरफ लाखों लोग अयोध्या में और दूसरी तरफ न्यायाधिओं ने छुट्टी मनाते हुए तारीख आगे बड़ा दी . ये आग किसने लगाई ..!! वहां मोजूद  जनमत को गुस्सा आप दिला रहे हैं और उस गुस्से के फल स्वरूप उपस्थित लोगों नें ढांचा ढहा दिया तो आंसू भी आप बहा रहे हें ,  निंदा भी आप कर रहें हैं .
 जम्मू और कश्मीर में भारतीय सेना को शोक  नही आया क़ी वह वहां जाये और लोगों को मारे , भारतीय फोजियों का मनोरंजन स्थल नही है दुर्गम  जम्मू और कश्मीर ...., वहां एक एक फोजी देश की हिफाजत के लिए लगा है . आप वाट बैंक की राजनीति में उस पर मुकदमा चलाते हो , उसे जलील करते  हो ..!! कभी फोज वापस बुलाते हो कभी वस भेजते हो ..!! यह क्या तमाशा  है , वोट बैंक के लिए कुछ भी करलो  यह नही हो सकता . हिन्दुओं पर कीचड़ उछालो, फोज पर कीचड़ उछालो, पुलिस  पर कीचड़ उछालो यह कब तक चलेगा.वोट की राजनीति के लिए राष्ट्रघाती पाखंड ठीक  नही .
  एन्कांउटर का सच क्या है , जो पुलिस  में हैं वे सभी जानते हैं . कारण यह है क़ी एक तो हमारी कानून व्यवस्था ही इतनी लचीली है क़ी ज्यादातर  लोग बच जाते हैं . जमानत व्यवस्था  भी इस तरह की है क़ी अभी अपराध करो शाम को घर पर ..! मुछ पर तब दे कर निकलो क़ी तुने क्या कर लिया . पुलिस ने क्या कर लिया और अदालत ने क्या कर लिया . साक्ष्य का संरक्षण क़ी व्यवस्था है नही . इन्ही कारणों से पुलिस को एन्कांउटर करने पड़ते हैं . मुम्बई में भारत सरकार का राज है या महाराष्ट्र सरकार का राज है यह आप नही कह सकते वहां , वहां राज आज भी दाउद  करता है . जबरिया वसूली मुम्बई का एक बड़ा उद्योग है . एन्कांउटर विशेषज्ञ   वहां रखे जाते हैं . गुजरात से ज्यादा एन्कांउटर महाराष्ट्र में हुए हैं . कांग्रेस की सरकारों ने ही किये हैं , मुस्लिमों के ही हुए हैं . उत्तर प्रदेश में भी एन्कांउटर के द्वारा ही गुंडों पर काबू पाया गया था . कुल मिला कर समाज हित में पुलिस को यह कदम उठाना पडता है . जिस तरह अदालत एक निर्दोष  को सजा नही देना चाहती चाहे सैंकड़ों अपराधी छुट जाएँ , अर्थात अदालत ने कैंसा निहाल कर दिया . अपराधी को बचा कर आप भी तो अपराधी ही हुए . उसी तरह समाज हित में जब कोई अपराधी ज्यादा ही समाज को पीड़ित करने लगे तब , सबूत डरते हों , कोई रपट तक नही लिखता हो तब , तब एन्कांउटर का  कार्य होता है , कम से कम भारत में कोई भी व्यक्ती इस तरह का नही हुआ की वह सामान्य तोर पर किसी को खड़ा करके मार डाले . एन्कांउटर आदतन अपराधियों से निवाट्नें  क़ी एक विधा का नाम है. यह दूसरा मामला है की दुरूपयोग रोकने के लिए सरकार को इस पर निगाह रखनी  चाहिए .
सोहराबुद्दीन कोन था ...? 
                 सोहराबुद्दीन ने तुलसीराम प्रजापति, आजम और सिल्वेस्टर की मदद से 31 दिसंबर 04 को उदयपुर में हाथीपोल में मॉर्बल लॉबी के पास से प्रॉटेक्शन मनी (रंगदारी) वलूसने वाले बदमाश हमीद लाला की हत्या कर इलाके में अपनी धाक जमाई थी। हमीद लाला की हत्या के बाद राजस्थान की मॉर्बल लॉबी से सोहराबुद्दीन ने जोर-शोर से रंगदारी वसूल करना शुरू किया था। कहा जा रहा है क़ी इससे तंग आकर मॉर्बल व्यापारियों ने सोहराबुद्दीन की सुपारी देने का फैसला किया। पेंच यह है की यह सुपारी गुजरात पुलिस को दी गई बताया जा रहा है .
सीबीआई का दुरूपयोग का आरोप  क्यों  ..?
सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी  को आंध्र प्रदेश से गिरिफ्तर होना सर्वोच्च न्यायालय  और सी बी आई मान रही है और  सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्यतः आंध्र प्रदेश के  उन सात  पुलिस कर्मियों क़ी भूमिका की जाँच करने को कहा था जो गुजरात पुलिस क़ी जाँच में स्पष्ट नही हो पा रही थी . मगर सीबीआई  ने वह बात तो पूरी तरह से छोड़ दी और गुजरात के तथा राजस्थान के भा जा पा नेताओं की और घुमा कर एक राजनैतिक  रंग दे दिया .    आंध्र प्रदेश के उन सात पुलिस कर्मियों क़ी भूमिका की जाँच इस लिए छोडी की वहां पर तब कांग्रेस क़ी सरकार थी.
वोट बैंक की राजनीती निगेटिव तरीके से क्यों ...? 
   सवाल यह है क़ी आप को वोट बैंक की राजनीती करनी है ..? इसके लिए देश हित समाज हित और व्यवस्था हित को दाव क्यों लगाया जाये , आप ख़ुशी ख़ुशी मुस्लिम वोट लीजिये मना किसने किया है , मगर वह पोजेटिव तरीके से लो निगेटिव तरीके से क्यों लेते हो ...? आतंकवादियों को , अपराधियों को , नक्सलवादियों को ही संरक्षण   देने  के द्वारा वोट लिए जाएँ यह थोड़े ही जरुरुरी  है , उनके   आम व्यक्तियों का  सामान्य विकास को करके भी यह हो सकता है और तभी उन का सच्चा विकास होगा . मगर आप एक आम मुसलमान को , आम आदिवासी को , एक आम व्यक्ति को तो गरीव रखना चाहते  हो और उसे इन ओझे हथकंडों से भड़का कर वोट लेना परंपरा बना रखी है .निगेटिव के सहारे भड़काना और वोट का साधन बनाना ठीक नही है . प्रधान मंत्री ने यह नही बताया क़ी आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने  सोहराबुद्दीन और कौसर बी को ग्रिफ्तार करने की भूमिका निभाई थी और उसे गुजरात सरकार को सोंपथा ?
- राधा कृष्ण मन्दिर रोड , डडवाडा , कोटा २ , राजस्थान . 

       

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा के पवन पर्व पर हार्दिक बधाई एवं शुभ कामनाएं  !
-अरविन्द सीसोदिया
हरिहर आदिक जगत में पूज्य देव जो कोय ।

सदगुरु की पूजा किये सबकी पूजा होय ॥
सच्चे सदगुरु शिष्य की सुषुप्त शक्तियों को जाग्रत करते हैं, योग की शिक्षा देते हैं, ज्ञान की मस्ती देते हैं, भक्ति की सरिता में अवगाहन कराते हैं और कर्म में निष्कामता सिखाते हैं। इस नश्वर शरीर में अशरीरी आत्मा का ज्ञान कराकर जीते-जी मुक्ति दिलाते हैं।



हमारे श्रध्ये श्री श्री १००८ पूज्य श्री गोमतीदास जी महाराज के चरणों में श्रद्धा वंदन !!

गुरुपूनम जैसे पर्व हमें सूचित करते हैं कि हमारी बुद्धि और तर्क जहाँ तक जाते हैं उन्हें जाने दो। यदि तर्क और बुद्धि के द्वारा तुम्हें भीतर का रस महसूस न हो तो प्रेम के पुष्प के द्वारा किसी ऐसे अलख के औलिया से पास पहुँच जाओ जो तुम्हारे हृदय में छिपे हुए प्रभुरस के द्वार को पलभर में खोल दें।

मैं कई बार कहता हुँ कि पैसा कमाने के लिए पैसा चाहिए, शांति चाहिए, प्रेम पाने के लिए प्रेम चाहिए। जब ऐसे महापुरुषों के पास हम निःस्वार्थ, निःसंदेह, तर्करहित होकर केवल प्रेम के पुष्प लेकर पहुँचते हैं, श्रद्धा के दो आँसू लेकर पहुँचते हैं तो बदले में हृदय के द्वार खुलने का अनुभव हो जाता है। जिसे केवल गुरुभक्त जान सकता है औरों को क्या पता इस बात का ?

आत्मज्ञानी, आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष को जिसने गुरु के रुप में स्वीकार कर लिया हो उसके सौभाग्य का क्या वर्णन किया जाय ? गुरु के बिना तो ज्ञान पाना असंभव ही है।

     आज गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर हे गुरुदेव ! आपके श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम.... आप जिस पद में विश्रांति पा रहे हैं, हम भी उसी पद में विशांति पाने के काबिल हो जायें.... अब आत्मा-परमात्मा से जुदाई की घड़ियाँ ज्यादा न रहें.... ईश्वर करे कि ईश्वर में हमारी प्रीति हो जाय.... प्रभु करे कि प्रभु के नाते गुरु-शिष्य का सम्बंध बना रहे...'
ईश कृपा बिन गुरु नहीं, गुरु बिना नहीं ज्ञान ।
ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेद पुरान  ।

कृपा का यह पात्र कभी फूटने न देना ॥

लगाया जो रंग भक्ति का उसे छूटने न देना ।
प्रभुप्रीति की यह डोर कभी छूटने न देना ॥

बुधवार, 21 जुलाई 2010

अपने राजनैतिक स्वार्थ की रोटियां

  हिन्दू कभी आतंकवादी नहीं  हो सकता
- अरविन्द सीसोदिया
पूरी दुनिया में एक चर्चा  है, यह सही है क़ी धर्म कोई आतंकवाद नहीं होता, मगर लगभग हर दूसरी  घटना के पीछे कोई ना कोई मुस्लिम व्यक्ती खड़ा नजर आता है, यह बात भारत में लगभग कई वर्षों से गूंज रही है . क्यों क़ी यह एक ज्वलंत प्रश्न  है . अफगानिस्तान , पाकिस्तान और भारत में तो स्पष्टता से सामने आया है क़ी पाकिस्तानीं व्यक्तियों के द्वारा  संगठित रूप में आतंकवाद चलाया जा रहा है . उनके प्रशिकक्षण  के अड्डों की जानकारी है , हर महीने  दो महीने  में आप पाकिस्तान को धमकी देते हो , चेतावनी देते हो, बातें करते हो .. वह बड़ी बेहयाई से  तुम्हरी  बातों को हवा में उडा देता है .  भारत क़ी सरकार और उसके सुरक्षा बल ना तो उसको रोक पा रहे हैं ना ही उन्हें माकूल जबाब दे पा रहे हैं. अमेरिका में हेडली क़ी पूछताछ के बाद जो खुलासे हुए उनसे भी साफ होगया क़ी गलती पर भारत सरकार और भारतीय मीडिया में बैठे कुछ आतंकवाद के पोषक हैं .
          आप उनका तो कुछ  बिगाड़ नही पा रहे जो वास्तव में आतंकवादी हैं , जो कभी आतंकवादी नही हो सकते  उनके माथे आतंकवाद मढ़  रहे हो..? शर्म  क़ी बात है क़ी आप साध्वी प्रज्ञा के बारे में आज तक जो जांच हुई है उसमें एक भी सबूत नही बता पाए , उस एक निरीह महिला के विरुद्ध आपने क्या कुछ नही किया ...! उससे स्पष्ट  लगता है कि जांच कम शांत चित्त  हिन्दू को बदनाम करने की कोशिश ज्यादा है।  जांच के खिलाफ कतई कोई नही हो सकता मगर वह जांच  सिर्फ राजनैतिक लाभ का एक षड्यंत्र मात्र हो यह ठीक नहीं है।
        अफजल जैसे आतंकवादी को आज भी जेल में बिठाकर खाना खिला रहे हैं। सिमी व इंडियन मुजाहिदीन को कुछ केंद्रीय मंत्री अच्छे आचरण का प्रमाणपत्र देने लगे हैं। आप अपना तो आचरण देखें ...! आप क़ी बात का वजन नहीं है . बात सिर्फ इतनी सी  है क़ी आप राजनैतिक बचपने में जिस आग से खेलने जा रहे हैं वह आप बुझा  नही पाएंगे ...? आप के रणनीतिकार कहीं काम नही आयेंगे , क्योनी जब पेड बबूल  का बोया जाता है तो कांटे भी आपके ही लगते हैं .
मेरा बड़ा स्पष्ट मानना है क़ी आप वोट के स्वार्थ के लिए हिन्दू को आतंकवाद के नाम से बदनाम करना बंद   करो .  ये आज  भी ८५ प्रतिशत हैं आप सोते को जगा रहे हो . देश में आग लग जायेगी . इसका खामियाजा दोनों कोमों को भुगतना पड़ेगा , आप तो सुरक्षित हैं , आम आदमी क़ी मोंत होती है.
    आप को  नक्सलवाद और पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद को नियंत्रित करने पर ध्यान देना चाहिए . जो वास्तविक आतंकवाद हैं . भारत ही एक मात्र ऐसा देश है. जहाँ  क्षेत्रवाद, जातिवाद, नक्सलवाद और आतंकवाद अपने पैर पसार रहा है. और आज स्थिति यह है कि इसका नियंत्रण एक चुनौती बन गया है. सब से बड़ी बात यह है क़ी यह सभी कांग्रेस क़ी छत्र छायाँ में ही जन्में, फले फूले और आगे बड़े  हैं . मगर वह अपनी  राजनैतिक स्वार्थ की रोटियां सेंकने में लगी हुई है.  देश की जनता भी सब जानती है. अब वह जागरूक हो रही है. यही वजह है कि मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद जिस तरह से जनता इन राजनेताओं के खिलाफ सड़क पर उतरकर आई वह एक सीख थी .असली आतंकवाद से मुह चुराना ठीक नही , हिन्दू को आतंकवादी  कहना, अपमान और गाली है .


- राधाकृष्ण  मन्दिर रोड , डडवाडा ,कोटा २ , राजस्थान .

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

राहुल गांधी की ताजपोशी - हिंदू आतंकवाद का भूत


मुस्लिम वोट ठगी के लिए,
अब हिन्दू आतंकवाद का सगूफा ....

आग मत लगाओ यह तुमसे नही बुझेगी
- अरविन्द सीसोदिया
    राजनीती में वोट बैंक की राजनीती ना हो तो कैसे काम चलेगा.प्रेम और जंग में सब जायज है. मगर सब कुछ जायज नही है . जो चीज देश के लिए उसकी एकता और सोहार्द के लिए मुसीबत बन जाये वह ठीक नही कही जा सकती . गृहकलह और आंतरिक द्वंद  क़ी शिरू आत नही करें .पहले ही देश साम्पदायिक आधार पर बंट चुका है . सीमा पर का साम्पदायिक तमाशा आप रोक नही पा रहे हैं . आपकी गैर जिमेवाराना हरकत देश के अन्दर से भयावह परिणाम और नासूरी समस्या उत्पन्न कर सकती हैं.
    मुस्लमान ने कांग्रेस को वोट देना छोड़ दिया और भी वोट बैंक थे उनने भी कांग्रेस को वोट देना छोड़ा है.वह वोट बैंक जो भाजपा पर नही है और आसानी से तोडा जा सकता है वह मुस्लमान माना जा रहा है.इसके लिए ही सारे काम हो रहे हैं,छेः वर्षों के अथक प्रयास के बाद भी उतने वोट नही आये जितने आने चाहिए थे.कई राज्यों के मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट ही नही दिया . उसी का नतीजा है कि अब नई नीति के तहत उसे डराने के लिए हिदू आतंकवाद का सगूफा खड़ा किया  गया है .कांग्रेस  मुस्लिम वोटों के लिए भय कि राजनीती पर उतर आई है. जब तक उस पर भय नही लटकाया तब तक वह पूरी तरह वोट नही देगा.संघ को भी इसी लिए जोड़ा जा रहा है ,कि बड़ा भय खड़ा किया जा सके .लगता है कि हिन्दू आतंकवाद सिद्ध करने के लिए कोई बड़ी साजिस न घट जाये .देश की आजादी के बाद से ही यह राजनीति कांग्रेस खेलती आई है .
  सामने यूपी और बिहार है.दोनों राज्यों में कांग्रेस कमजोर है और मुस्लिम वोट काफी अधिक हैं .बिहार में तो चुनाव सामने ही है, यू पी में २०१२ में है.अगला लोकसभा चुनाव भी २०१४ में आ रहा है ,वह भी कांग्रेस को तभी लाभ दिला सकता है जब यूपी और बिहार उनके पास वापिस आजाये .अभी बिहार में कांग्रेस के पास सिर्फ २ सीटें हैं ,यूपी में ८० में से २१ थी .राहुल गांधी को पूर्ण बहुमत का प्रधान मंत्री बनाने के लिए इन दोनों प्रान्तों में सीटें बढ़ाने का सवाल है . वह बगेर साम्पदायिक तनाव पैदा किये यह संभव नही है . इसका एक ही रास्ता हिन्दुओं और मुसलमानों को मुर्गों कि तरह आपस में लड़ाओ.अंग्रेजों ने भी यही किया था . कांग्रेस ने पिछले छेः वर्षों में एक ही जाप जपा है ,मुस्लमान - मुस्लमान ...! तुम्हरा वोट हमारा है,तुम्हरा वोट हमारा है . वोट हमको दो खजाने से जो चाहो लो ..!! भारत के प्रधानमंत्री ने तो गिरने की हद तोड़ते हुए यह तक कह दिया की भारत के खजाने पर पहला अधिकार मुसलमान का है .सिर्फ बात ही नही क़ी गई,खजाना भी लुटाया जा रहा है . इसके कई उदाहरण भी हैं.जिन्हें फिर कभी बताएगें .            
    कांग्रेस को १९८४ में इंदिरा गांधी के निधन से उपजी साहनुभूति में ४०० से ज्यादा सीटें मिली थीं तब से अब तक वह स्पष्ट  बहुमत के लिए तरस रही है ,एक बार तो उसकी सीटें १२५ से ही कम हो गई थी,राजीव गाँधी के निधन के बाद भी वह पूर्ण बहुमत नहीं जुटा पाई थी .इसके पीछे कारण था कि कांग्रेस जनता के बीच अपना विश्वास खो चुकी है.दूसरे दलों ने भी लगातार अपना विश्वास बढ़ाया तो मगर उसे कायम रखने कि चिंता नहीं रखी इस कारण से कांग्रेस को पुर्न वापसी का मोका मिला .
  महंगाई, आतंकवाद और नक्सलवाद जैसे मुद्दे पर असफल कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए हिंदू आतंकवाद का भूत खड़ा कर रही है। देश के ज्यादातर मुद्दों पर उसकी नाकामी राहुल गांधी की ताजपोशी में बाधा न बन जाए इसलिए वो हिंदू आतंकवाद जैसे मुद्दों को बेवजह खड़ा कर रही है।
- राधाकृष्ण मन्दिर रोड, डडवाडा,कोटा २.राजस्थान .

शनिवार, 17 जुलाई 2010

संघ - देश की सबसे बड़ी देशभक्त संस्था


कांग्रेस की ,विकृत मानसिकता ही
संघ पर मिथ्यारोप करती रहती है .

भारत को निंगल जाने वाली
ताकतें भीं संघ विरोधी हैं .

षड्यंत्र के आगे झुकें नहीं..!
- अरविन्द सीसोदिया
संघ राष्ट्रभक्ति की पाठशाला और देश की सबसे बड़ी देशभक्त संस्था है। संघ के घोर विरोधी भी इसकी राष्ट्रभक्ति पर शक नहीं करते,सीबीआई के निदेशक अश्विनी कुमार ने आन रिकार्ड कहा है कि संघ या उसके किसी पदाधिकारी से हिन्दु आतंकवादी मामले में कोई पूछताछ नहीं की गई है। कांग्रेसी नेताओं के इस तरह के गलत आरोप ध्यान बांटने की रणनीति है जिसका उद्देश्य महंगाई जैसी जनता से जुड़ी समस्याओं को पीछे करना है। संघ पर आतंकवादी होनें का आरोप,आतंकवादियों के पक्ष में खड़ी कांग्रेस और उनके नेता दिग्विजय सिंह नें लगाये हैं.आतंकवादियों से साहनुभूति रखने के आरोप से घिरी कांगेस और सिंह पहले भी अनेकों बार संघ के विरुद्ध बे-बुनियाद जहर उगलते रहे हैं .

 सच यह है कि दया के पात्र तो दिग्विजय सिंह हैं,वे बहुत ही गंभीर किस्म कि उपेक्षा भुगत रहे हैं , केन्द्रीय मंत्री मंडल में आना चाहते थे,वहां आगये वीरभद्र सिंह. मंत्री मंडल विस्तार या बदलाव कि भी जब बात चलती है तो उनका नाम कहीं भी चलता ही नही है .उन्हों ने गृह मंत्री चिदम्वरम को भी निशाना बनाया,लोगों ने समझाया यह आग से क्या खेल रहे हो, तो फिर विचार किया सोनिया मेडम किस चीज से खुश होंगी, तो सामने आया रटा -  रटाया फार्मूला ...! संघ को गाली दो और कांग्रेस में आगे बढो ...!! संघ पर हिन्दू आतंकवाद का आरोप उस जैसे श्रेष्ट संगठन को गाली से कम नही है. संघ का एक - एक व्यक्ती तिल - तिल करके अपनी आहूति देते हुए राष्ट्र के लिए जीवन देता है,सुबह ४ बजे से जागते हुए रात को १० बजे तक, राष्ट्र की चिंता में क्या कोई जीता है ? वह राष्ट्र ऋषि हैं , इस संगठन का रोम - रोम राष्ट्रचेतना का परमहंस है. इनकी जितनी पूजा हो उतना ही समाज को लाभ मिलता है. आज भारत को निंगल जाने बाले ड्रैगन, डायनासोर से लेकर ड्रेकुला  तक कि नथ किसी ने थाम रखी है थो वह संघ है.        
  एक और बात जो में कांग्रेस तथा उनके हमनवां बन्धुओं से कहना चाहूँगा कि मुलायम,मायावती,लालू आदि अनेक लोगों को आपने फांस क़र अपना बंधुआ बना रखा होगा, मगर ऐसा संघ के साथ संभव नही है,झूठ का कारवां आगे बड़ा तो इस चुनोती का मुकावला पूरी - पूरी ताकत से होगा.संघ कभी गलत काम करता नहीं है और गलत आरोप के आगे सर झुकाता नहीं है .    

   इसाई मिसनिरियों के भारत को इसाई राष्ट्र बनाने के रास्ते में संघ ही से बड़ा अडंगा है.कांगेस तो अब पूरी तरह से इसाई एजंडे पर चल रही पार्टी मात्र बन कर रह गई है,उनका नेतृत्व भी तो अब इसाई है. वे यह सफलता,भारत के मुसलमान को,संघ के विरूद्ध खडा करके ही हांसिल होना जानते हैं.अंग्रेज राज  में भी हिन्दू-मुस्लिम लड़ाओ और राज करो का फार्मूला,फूट डालो राज करो के रूप में काम में लिया था . वही फार्मूला कांग्रेस ने फिट कार रखा है, हिदू कस होव्वा खड़ा करो और मुसलमान वोट कांगेस पार्टी में डलवाओ.यही एक मात्र उद्देश्य बन कर रह गया है.इस हेतु किसी भी सीमा तक जाना पड़े,वहाँ तक ये जायेंगे.कितनी भी फूट समाज में डालनी पड़े डाली जाये, कितनी भी साम्प्रदायिकता करनी पड़े की जाये .  
         वैसे कांग्रेस  पार्टी का कोई धर्म - ईमान नहीं है , एक वह दिन था जब डी एम् के पर राजीव गांधी कि हत्या में संदिग्ध मान कर राज्य सरकार भंग कर दी गई थी और बाद में केंद्र में उसके सहयोग से बनी गुजराल सरकार गिरा दी गई थी और अब उसके साथ ही सरकार बनाई हुई  है ..!  
   संघ की शक्ति से कांग्रेस हमेशा ही परेशान रही है,क्यों कि उनके एक छत्र राज्य में यह हिंदुत्व का जागरूक संगठन उन्हें रोड़ा लगता है. कांग्रेस ने तीन वार इस पर प्रतिबंध लगाये और तीनों वार यह संगठन और मजबूत बन कर उभरा, जनता ने इसको इतनी शक्ति दी कि इस संगठन के कारण कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई और गत २५ साल से स्पष्ट बहुमत को तरस रही है .१९८४  में इंदिरा गाँधी कि हत्या में उभरी साहनुभूति से उसे प्रचंड बहुमत मिला था तब से आज तक उसे लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नही मिला है.
१- पहला प्रतिबन्ध ( ४ फरवरी १९४८ से जुलाई १९४९ तक )१९४७ में जब देश आजाद हुआ तो देसी रियासतों को भारत में सम्मिलित करने की जिम्मेवारी सरदार पटेल को सोंपी गई,संघ ने सरदार पटेल को पूरा - पूरा साथ दिया,जम्मू - कश्मीर के विलय हेतु महाराजा हरीसिंहजी को तैयार ही संघ के सरसंघचालक गुरु जी ने किया था. सरदार पटेल चाहते थे कि राष्ट्र निर्माण में संघ कांग्रेस में अपना विलय करले या साथ प्रभावी भूमिका निभाए,उस समय पटेल जन-नेता थे और नेहरु थोपे हुए नेता माने जाते थे. सच भी यही था कांग्रेस की एक भी स्टेटवर्किंग कमेटी नें नेहरु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव नहीं  किया था.ज्यादातर पटेल के पक्ष में थे .प्रधान मंत्री बनाने के बाद, संघ - पटेल गठबधन से घबराकर नेहरूजी नें पहले तो कांग्रेस से संघ के संबंधों से इंकार किया व लगे हाथ गाँधी वध में भी संघ को घसीट लिया. हर तरह से संघ निर्दोष  सावित हुआ, न्यायालय ने उसे दोषी नही माना. स्वंय नेहरु जी ने संघ पर से प्रतिबंध हटाया .इंदिरा गांधी जी के शासन काल में भी एक जाँच हुई उसमें भी गांधी वध से संघ का कोई संबंध होना साबित नही हुआ.जाँच कमेटी ने स्पष्ट कहा सघ का कोई रोल नहीं था .    
२ - दूसरा प्रतिबन्ध (४ जुलाई १९७५ से २२ मार्च १९७७ तक )भारतीय आजादी पर कलंक रुपी इमरजेंसी नामक काला अध्याय ,नेहरू वंश के अधिनायक वाद का ही प्रतिफल था,इंदिरा गांधी ने प्रजातंत्र को सामन्तवाद में बदलने के लिए आपात काल लगाया था , हजारों निर्दोष लोगों को जेलों में ड़ाल दिया गया,चुने हुए जन प्रतिनिधि से लेकर संघ के पदाधिकारियों तक को जेलों में ड़ाल दिया गया था . प्रतिपक्ष की समस्त गतिविधियाँ बंद कर दी गई .ऐसे में संघ कैसे बच सकता था , उस पर भी प्रतिबंध  लगाया गया . संघ से जुड़े युवक आगे आये और विरोध करते हुए जेलों में गये , अन्तः इमरजेंसी हटी , स्वंय इंदिरा गाँधी व उनकी पार्टी बुरी तरह से हारी, यह प्रतिबंध वापस लिया .
३ - तीसरा प्रतिबन्ध (१० दिसंबर १९९२ से ४ जून १९९३ तक )६ दिसंबर १९९२ के दिन श्रीराम जन्मभूमी पर बनी हुई बाबरी मस्जिद अयोध्या में ढह गई ,एक न्यायालय की तारीख बढ़ा दिए जाने से आक्रोशित कार सेवकों नें उसे ढहा दिया. तब की कांग्रेस भी चाहती थी ना रहे बांस ना बजे बांसुरी,बाबरी मस्जिद ढह गई. इसी ओट से भा ज पा कि काई प्रदेश सरकारें भंग कर दी गई और संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया . न्यायालय ने इस प्रतिबन्ध को गैर क़ानूनी मानते हुए हटा दिया .
    अर्थात जब - जब संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया , तब -तब कांग्रेस को मुह की कहानी पड़ी है. क्यों की भारत कि जनता ने उसे भरपूर सर्थन दिया .              
      आज संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत 1925 से होती है। उदाहरण के तौर पर 1962 के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को गणतंत्र दिवस के 1963 के परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये।
संघ ने हमेशा कई मोर्चो पर अपने आपको स्‍थापित किया है। राष्ट्रीय आपदा के समय संघ का स्वंयसेवक ही सबसे पहले सहायता के लिए खड़ा मिलता है। आपदा के समय संघ केवल और केवल राष्ट्रधर्म का पालन करता है कि आपदा मे फसा हुआ अमुख भारत माता का बेटा है। गुजरात में आये भूकम्प और सुनामी जैसी घटनाओ के समय सबसे आगे अगर किसी ने राहत कार्य किया तो वह संघ का स्‍वयंसेवक था। चाहे युद्ध हो या अन्य कोई विभीषिका , दुर्घटना या अन्य कोई आपदा , यदि कोई समाज से सबसे पहले खड़ा मिलेगा तो वह अवश्य ही संघ का स्वंयसेवक होगा . 
  बात यहीं ख़त्म नहीं होती है,देश के उपर मंडराने वाले सभी खतरों के लिए संघ ने समय पूर्व चेताया है,चीन के हमले की सबसे पूर्व सूचना संघ ने दी थी,चीन के मंसूबों के प्रति देश में एक मात्र संगठन सरकार को सावचेत कर रहा है वह संघ ही है उसकी आशंका पूरी तरह से सही साबित हो रहीं है . यह तो उदाहरण है , लंम्बी श्रंखला है .   
      जिस संगठन का ध्येय ही परमा पवन हो तो उस पर मिथ्या आरोप ठीक नही हैं , समाज कांग्रेस के इन मिथ्या आरोपों को सिरे से ख़ारिज करता है .
इस संघठन कि नित्य कि जाने वाली प्रार्थना का पहला पद स्वंय सब कुछ कह देता है . 
 नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे

त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे

पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।
हे मातृभूमि, तुम्हे प्रणाम ! इस मातृभूमि ने हमें बच्चों की तरह स्नेह और ममता दी है. इस हिन्दू भूमि पर सुख पूर्वक में बड़ा हुवा हूँ.यह भूमि महा मंगलमय और पुण्य भूमि है. इस भूमि की रक्षा के लिए मेरा यह नश्वर शरीर में मातृभूमि को अर्पण करते हुवे इस भूमि को बार बार प्रणाम करता हूँ.

 राधा कृष्ण मन्दिर रोड डडवाडा , कोटा २ , राजस्थान .

बुधवार, 14 जुलाई 2010

गुरू पूर्णिमा - गुरु से बड़ा संसार में कोई तत्व नहीं है


- अरविन्द सीसोदिया  
    आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते हैं। यह  पूर्णिमा गुरु पूजन का पर्व है। वर्ष की अन्य सभी पूर्णिमाओं में इस पूर्णिमा का महत्व सबसे अधिक है। भारतीय संस्कृति में ‘आचार्य देवो भव’ कहकर गुरु को शिष्य द्वारा असीम आदर एवं श्रद्धा का पात्र माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि मनुष्य के तीन प्रत्यक्ष देव हैं - 1. माता 2. पिता 3. गुरु। इन्हें ब्रह्मण, विष्णु, महेश की उपाधि दी गई है। मां जन्म देती है, जीवन की रचयिता है इसीलिए ब्रह्म हैं। पिता जीवन के पालनकर्ता हैं, इसीलिए विष्णु का रूप माने जाते हैं। गुरु माया, मोह और अंधकार का  नाश करता है.इसलिए वे महेश के रूप में माने जाते हैं .   
   गुरु पूर्णिमा का दिवस केवल गुरु पूजा का दिवस नहीं है, बल्कि यह दिवस प्रत्येक शिष्य के अपने-अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति का दिवस है। प्राचीन ऋषियों ने हमारे जीवन को चार भागों में बांटा था - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। प्राचीन समय में विद्यार्थी गुरुकुलों में जाकर विद्याध्ययन किया करते थे। उन्हें तपोमय जीवन व्यतीत करने और संयम तथा चारित्रिक दृढ़ता का उपदेश अपने गुरुजनों से प्राप्त होता था. वे अपनी पूरी श्रद्धा गुरुजनों के प्रति रखते थे,  आज समय बदल गया है। आज न तो तपोवन हैं, न गुरुकुल। जीवन दिन प्रतिदिन जटिल होता जा रहा है। शिक्षा के हर क्षेत्र में व्यापारीकरण हावी हो चुका है. ज्ञान का वितरण अब धन के आधार पर होने लगा . 
          आज पाश्चात्य प्रभाव ज्ञान का वितरण सामान्य से लेकर आध्यात्म  तक में सम्पन्नता का आधार हो चुका है . ऐसे में हमें यह जानना एक बार फिर आवश्यक हो गया है कि हर कार्य को सिखाने वाले गुरु ही हैं।यही साधना शरीर के अंदर निहित शक्तियों का परिचय कराने, शरीर में चेतन्यता प्रदान करने तथा उचित भोग और मोक्ष का रास्ता दिखलाने की विशिष्ट एवं उच्चतम क्रिया है।
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।

हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
      इसे  में  वह जीवन के अंधकार को अपनी दीक्षा रूपी रोशनी से रोशन करते हैं, अज्ञान से निवृति दिलाने में सक्षम होते हैं, दो अक्षर का यह सामान्य सा प्रतीत होने वाला शब्द अपने आप में संपूर्णता को समेटे हुए है। आजकल के व्यस्त जीवन में व्यक्ति मानसिक तनाव का शिकार हो जाता है।
      मूलतः  यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन है। व संस्कृत के प्रकांड  विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गुरु पूजा का विधान है।
           गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं।ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं।
     शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है।  अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। बल्कि सदगुरू  की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

शास्त्र कहता हैं -
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु र्गुरूदेवो
गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥


कबीर ने गुरू कृपा पर सटीक लिखा है -
गुरु की सेवा चाकरि करिये मन चित लाय ।

कहै कबीर निज तरन को नाहीं और उपाय ॥
सुमिरन मारग सहज का सतगुरु दिया बताय ।

स्वाँस स्वाँस सुमिरन करो एक दिन मिलिहैं आय ॥
बलिहारी गुर आपणैं, द्यौंहाड़ी कै बार ।
जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार ॥4॥
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े,काके लागूं पायं ।
बलिहारी गुरु आपणे, जिन गोविन्द दिया दिखाय ॥5॥
यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।
सीस दिये जो गुर मिलै, तो भी सस्ता जान
       महेश्वरः।शिव जी का कथन है कि त्रिलोक में जो बड़े-बड़े देव, नाग, राक्षस, किन्नर, ऋषी, मनुष्य, विद्याधर हैं, उनको गुरु प्रसाद ही प्राप्त हुआ है। गु अक्षर सत, रज, तम माया का आकार है। रू अक्षर ब्रह्मा का आकार है, जो समस्त मायाओं का नाशक है। गुरू गीता में भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा है कि हे पार्वती तुम निश्चित जानो की गुरु से बड़ा संसार में कोई तत्व नहीं है .
       भारत भर में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। आज भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में, संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है। मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं।
    आध्यात्म के क्षैत्र में विशाल आयोजन होते हैं , लगभग प्रत्येक आश्रम किसी न किसी प्रकार का  आयोजन जरुर रखता है.
गुरु निंदा  कभी न करें -
 स्कन्ध पुराण में गुरु के अपमान से होने वाली हानी  का रोचक दृष्टान्त  है, जगदगुरु बृहस्पति, इंद्र के राज दरवार में पहुचें उस समय कोई नृत्य  चल रहा था , दरवार में मोजूद अन्य दरवारियों ने उठ कर यथा योग्य प्रणाम जगदगुरु बृहस्पति से किया, इंद्र के द्वारा उन्हें नजर अंदाज  कर दिए  जाने से वे कुपित हो अंतर-ध्यान  हो गये, नारद जी ने इंद्र का ध्यान आकर्षित किया कि आपने गुरुदेव को अपमानित कर दिया, तब इंद्र ने उन्हें काफी तलाशा और मनाने कि कोशिश कि मगर तब तक वे उसे श्रीहीन कर चुके थे . इसका फायदा उठा  कर  दैत्यराज महाराजा बली ने इंद्र पर आक्रमण कर उनसे इंद्र - लोक जीत लिया ,  इस पराजय के परिणाम स्वरूप  समुद्र मंथन हुआ . कुल मिला कर गुरु के अपमान के कारण इंद्र को राज्य  और सम्मान   खोना पड़ा . भगवान  शंकर यह व्यवस्था देते हैं कि गुरु की निंदा कभी न करें , अपमान तिरिस्कार भी कभी नहीं करें . गुरु के श्राप को ईश्वर भी माफ़ी में नही बदल सकता .
गुरु का सबसे अधिक महत्व आध्यात्म में है-
एक साधक को गुरु का विश्वास  जीतने में दसियों वर्ष लग जाते हैं .
संत चरणदास जी महाराज की शिष्या सहजो बाई ने लिखा है -
राम तजुं पर गुरु न विसारूं,
चरण दास पर तन मन वारूँ
हरी ने जन्म दियो जग माहीं
गुरु ने आवागमन छुड़ाई.
हरी नें पाँच चोर दिए साथा  , 
गुरु ने छुडाय लई अनाथा
हरी ने माया जाल में गेरी
गुरु ने काटी ममता बेडी .

गुरु-शिष्य परम्परा आध्यात्मिक प्रज्ञा का नई पीढियों तक पहुंचाने का सोपान।
जप के लिए मंत्र

ॐ गुरूभ्यो नमः।
ॐ श्री सदगुरू परमात्मने नमः।
ॐ श्री गुरवे नमः।
ॐ श्री सच्चिदानन्द गुरवे नमः।
ॐ श्री गुरु शरणं मम।

सदगुरू की महिमा अनंत,
अनंत कियो उपकार

अनंत लोचन उघडिया,
अनंत दिखावनहार

 राम कृष्ण से कौन बडा,
तिन्ह ने भि गुरु किन्ह ।

तीन लोक के है धनी,
 गुरु आगे आधीन

.......




          

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सोमवार, 12 जुलाई 2010

आतंकवाद का प्लेटफोर्म - कांग्रेस


आतंकवादियों के 'प्रवक्ता' -
मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला
- अरविन्द सीसोदिया
भारत सरकार किस बात के इंतजार में है ..., भारत के प्रधान मंत्री की अपील को ठोकर मारने वाली पीडीपी की मान्यता समाप्त हो जानी चाहिए थी , उमर की सरकार भंग हो जानी चाहिए थी . 

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कहा कि उनकी पार्टी द्वारा जम्मू एवं कश्मीर में प्रस्तावित स्वशासन ( भारत से अलग होना ) ही राज्य की विभिन्न समस्याओं का एकमात्र समाधान है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री मुफ्ती ने पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक में कहा कि उनके क्षेत्र की सभी समस्याओं का समाधान करने का एकमात्र उपाय स्वशासन ( भारत से अलग होना ) है। सईद ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि क्षेत्र के सभी वर्गों के लोगों की इच्छाओं एवं आकांक्षाओं को शामिल कर पार्टी द्वारा प्रस्तावित स्वशासन ( भारत से अलग  होना ) के बारे में लोगों को शिक्षित करें। इस संदेश का स्पष्ट मतलव है कि वे भारत से कश्मीर को अलग करने का षड्यंत्र चला रहे हैं , हम उन्हें उनके नापाक मंसूवे पूरा करने का अवसर दे रहें हैं.
१ - विवादित अपहरण  कांड -
   विदित रहे कि जेकेएलएफ सुप्रीमो यासीन मलिक व अन्य पर तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी डाक्टर रुबिया सईद का अपहरण करने का आरोप है।सीबीआई केस के मुताबिक दिसंबर 1999 में डा. रुबिया सईद जब अस्पताल से लौट रही थी तो मेटाडोर स्टाप पर एक कार आकर रुकी और उसमें सवार लोगों ने उन्हें जबरन गाड़ी में बिठा लिया। अपहरणकर्ताओं ने डा. रुबिया की रिहाई के बदले में जेकेएलएफ के पांच खूंखार आतंकवादियों को रिहा करने की मांग की, जिसे केंद्र सरकार ने स्वीकार कर लिया। तब जाकर रुबिया सईद को आजाद किया गया था। माना यह जाता है कि यह मामला संदिग्ध है , तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद स्वंय आतंकवादियों को रिहा करना चाहते थे . इसके लिए रची गई यह साजिस थी.
२- जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और पीडीपी
    की गठबंधन वाली सरकार के दैरान-
- इससे पूर्व  जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस और पीडीपी की गठबंधन सरकार के वित्तमंत्री तारीक हमीद कर्रा (पीडीपी नेता) ने प्रदेश के लिए अलग मुद्रा बनाने की बात उठाई थी। पीडीपी के सर्वेसर्वा सईद का तर्क था  कि जिस तरह यूरोपीय संघ के देशों में व्यापार आदि के लिए एक ही मुद्रा का चलन है उसी तरह घाटी में भी पाकिस्तानी मुद्रा का चलन हो ताकि दोनों देशों के बीच व्यापार के साथ आपसी रिश्ते भी बढ़ें। इसी तरह से दो मुद्राओं के चलन की बात उसी फार्मूले का आर्थिक पहलू जो  कश्मीर में पाकिस्तानी मुद्रा का चलना करवा कर, जम्मू-कश्मीर पर भारत के दावे को कमजोर करता ।
  इस दोरान मुफ्ती का पाकिस्तान प्रेम छिपा नहीं है। उनकी पुत्री और पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं को भारत आने की छूट देने की मांग की थी।
  स्वयं मुफ्ती मोहम्मद सईद समय-समय पर घाटी से भारतीय फौज हटाने की मांग भी करते रहे हैं-अर्थात घाटी में आतंकवादियों का स्वागत और सेना का विरोध।कभी सेना हटाने तो कभी सीमाओं को खोल देने की वकालत करने वाले सईद पिछले साठ सालों से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को भारत में मिलाने की मांग क्यों नहीं करते?
   पाक अधिकृत कश्मीर में चल रहे आतंकवादी शिविरों को बंद करने की बात क्यों नहीं उठाते? क्या पीडीपी कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानती?
हालाँकि कांग्रेस और  पीडीपी का मेलजोल अभी बना हुआ है, लेकीन पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने जम्मू एवं कश्मीर की मौजूदा परिस्थिति पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा सोमवार को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में शामिल होने के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आग्रह को ठुकरा दिया । महबूबा मुफ्ती की इस तरह  की हिम्मत के पीछे पाकिस्तान से सांठ -गांठ होना ही मुख्य करण है. 
३- अब कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस
    की गठबंधन सरकार / राग वही पुराना
28 जून 2010 ... इस बीच मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने प्रदेश में बढ़ते जनाक्रोश के लिए सुरक्षा बलों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा है कि सुरक्षा बल बेकाबू होते जा रहे हैं। जब कि यह तथ्य सही नही था ..? यहाँ पर उमर अब्दुल्ला भी वही  भाषा बोल रहे थे जो कभी मुफ्ती बोला करते थे.
10 जुलाई 2010 ... जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने शनिवार को कहा कि श्रीनगर के हिंसाग्रस्त इलाकों में सेना की तैनाती नहीं की गई है
सच यह है कि , उमर अब्दुल्ला को  देश द्रोही घोषित कर देना चाहिए. उमर ने अपनी सरकारी मशीनरी को भी आतंकवादियों के पक्ष में खड़ा कर सेना को हटाने के लिए बहुत ही तेजी से वकालत की थी.अलगाववादियों का साथ देना भी अपराध है,  इसकी सजा भी अच्छी मिलना चाहिए.
- हुर्रियत के और दर के बिच चल रहे वार्ता को भी सेना के अधिकारियो द्वारा सुना गया. जैसा की अख़बार लिखता है उसके अनुसार आतंकी और अलगाववादी अब घाटी के युवाओं को बेवजह बलि का बकरा बनाने पर तुले हैं।   युवाओं को पैसे देकर पत्थर फेंकने के लिए उकसाने के बाद ये लोग उन्हें मारने की साजिश भी रच रहे हैं ताकि उन्हें सुरक्षाबलों के हाथों शहीद दिखाकर भारत विरोधी भावनाओं को भड़काया जा सके।

- जम्मू कश्मीर सरकार जल्दी ही एक शासकीय नीति के तहत भारतीय सुरक्षा बलों, नागरिकों और दंगों के समय “पत्थर” फ़ेंकने वाले “गुमराह लड़कों” के पुनर्वास के लिये नीति बना मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने बताया कि जल्दी ही इस सम्बन्ध में विधानसभा में प्रस्ताव पेश किया जायेगा, ताकि इन “भटके हुए नौजवानों” को नौकरी या रोज़गार दिया जा सके  रही है।
उमर के काम भी वही हैं जो आतंवादियों के माध्यम से पाकिस्तान चाहता है,  मुफ्ती के भी सारे काम वही थे, फर्क वस यह है कि पहले मुफ्ती थे अब उमर है, दुर्भाग्य पूर्ण बात यह है कि यह सब कांग्रेस कि गोदी में बैठ कर हो रहा है. भारत  की जनता  का पैसा आतंकवादियों के मजे ,  दोनों में प्रतिस्पर्धा  है कि आतंकवादियों का सगा कोंन हो . .
 ४- आतंकवादियों के 'प्रवक्ता' -पूर्व राज्यपाल एस. के. सिन्हा

जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल एस. के. सिन्हा ने आरोप लगाया है कि मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्य मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान आतंकवादियों के 'प्रवक्ता' के रूप में काम कर रहे थे। उनके मंत्रिमंडल के कई सदस्यों की अलगाववादियों से मिली-भगत थी।लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सिन्हा ने अपनी किताब 'गार्गिन्ग इंडियाज इंटिग्रिटी' के विमोचन समारोह में कहा कि जब मैं राज्यपाल था, तो उस समय राजभवन और राज्य सरकार के बीच शीतयुद्ध जैसी स्थिति थी। देश का एक बड़ा जनमानस वर्तमान आतंकवाद के लिए , मुफ्ती मोहम्मद सईद को आतंकवाद का जन्मदाता मानता है।
५- हरवार कांग्रेस का प्लेटफोर्म 
देखनें की बात यह है कि कश्मीर में आतंकवाद और अलगाववाद की नींव  कांग्रेस के प्लेटफोर्म पर ही रही है , जवाहरलाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को , इंदिरा गांधी ने फारूख अब्दुल्ला को , सोनिया गांधी ने 
 मुफ्ती मोहम्मद सईद और उमर  अब्दुल्ला  को सत्ता  पर काबिज करवाया . इन सब ने आतंकवाद को ही पनपाया .  
 - राधाकृष्ण मन्दिर रोड , डडवाडा , कोटा , राजस्थान.

रविवार, 11 जुलाई 2010

लौकी जूस पर यह आक्रमण

अब लौकी निशाने  पर ...!
बहु-राष्ट्रिय  कंम्पनियों का खेल  .....!!
- अरविन्द सीसोदिया
मेरा निश्चय यह है की वैज्ञानिक की मृत्यु की सही- सही जाँच होनी चाहिए , यह सिर्फ एक दुर्घटना है या कोई षड्यंत्र ..? यदि  किसी मौषम के  कारण  से बदलाव  हुआ तो उसका कारण भी सामने आना चाहिए ..!!
पहली खबर  -
राजधानी देहली  के नानकुपरा में रहने वाले सीएसआईआर के वैज्ञानिक सुशील सक्सेना की कथित तोर  पर लौकी और करेला का मिक्स विषैले जूस पीने से मौत हो गई। सुशील सक्सेना (59) को डायबीटीज थी इसलिए वे रोजाना करेला व लौकी का जूस पीते थे। टीवी पर योग गुरू द्वारा जूस पीने की सलाह पर उन्होंने लौकी का जूस पीना शुरू किया था। उस दिन लौकी का जूस पीते ही उन्हें उलटियां होने लगी थी तब  अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। यहाँ यह तथ्य  ध्यान में रखना चाहिए कि वे काफी समय से यह जूस ले रहे थे ,जो हुआ अचानक हुआ,चार साल से लौकी व करेला का जूस पी रहे थे।
फिर दूसरी  खबर -
लौकी का जूस पीने से दिल्ली में एक वैज्ञानिक की मृत्यु   से पहले जहां पहले लौकी 40 रुपए प्रतिकिलो बिक रही थी, अब शहर की अलग-अलग सब्जी मंडियों में यह 25 से 30 रुपए प्रति किलो बिक रही है। इसके पीछे लौकी के जूस को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। इसके जूस की मांग बढ़ने के कारण ही इसके भाव इस बार रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गए थे। सब्जी विक्रेताओं ने बताया कि सीजन में आमतौर पर लौकी के खुदरा भाव 8 से 10 रुपए प्रति किलो रहते हैं, लेकिन इस बार इसके भाव 40 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए थे। मौत क्या हुई, लौकी के भाव औंधे मुंह गिर गए। इसके खुदरा भावों में 10 से 15 रुपए प्रति किलो तक की कमी आ गई।
सोचने की बात -
यह खबर इस तरह से टी वी चैनलों और समाचार माध्यमों में फैलाई गई कि मानों पहाड़  टूट पड़ा हो. कारण है कि यह खबर बहू - राष्ट्रिय  दवा कंपनियों के हितों के  लिए बहुत उपयोगी थी , एलोपैथी से रोज हजारों  मृत्यु  होने के बाद भी कभी कभार ही कोई खबर छपती  है . एलोपैथी से रोज लाखों - करोड़ों लोगों को लूटा जा रहा है मगर वह खबर  नहीं है, क्योंकि वे बहु - राष्ट्रिय कंपनी उत्पाद हैं . लौकी विचारी से विज्ञापन नहीं मिल  सकते,  उस पर टूट पड़ने में कोई हर्ज नहीं है. इसलिए यह तथ्य सामने आने चाहिए कि यह मृत्यु वास्तव में किस कारण हुई , कहीं उक्त वैज्ञानिक को किसी ने निशाना  बना कर अपना उल्लू सीधा तो नही किया . 
यह है बाज़ार और उससे प्रायोजित प्रचार माध्यमों को खेल कि लौकी भी अब विषैले पदार्थों में शामिल हो सकती है।  इसी तरह योग साधना को लेकर भी तमाम तरह के दुष्प्रचार होते रहते हैं जिसके बारे में हमारा अनुभव है कि खुश रहने के लिये इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है। योग साधना से अमरत्व नहीं मिलता पर इंसानों की तरह जिंदा रहने की ताकत मिलती है। योग का मतलव कुछ जुड़ जाना होता है. जो वा - खूबी योग ने करके दिखाया है.
 पिछले दिनों मैंने बाबा रामदेव  का एक टी वी इंटरव्यू देखा था , उसमें भी यह बात आई थी कि एलोपेथिक दवा कंपनियों का एक बहुत ही बड़ा बाजार भारत है और वह  योग और आयुर्वेद  की लोकप्रियता से प्रभावित हुआ है. उनकी हजारों करोड़ डालर की आमदनीं पर भी फर्क पड़ा है . उनका शिकार कभी बाबा हो सकते हैं .
मा. के. सी. सुदर्शन   जी और लौकी 
मुझे जहाँ तक ज्ञात है कि राष्ट्रिय  स्वंयसेवक संघ  के पूर्व सरसंघ चालक माननीय के. सी. सुदर्शन जी लम्बे समय से ह्रदय रोग के मरीज हैं और निरंतर लौकी का जूस सेवन  करते हैं . उनके लिए  इस ओषध ने रामबाण  कि तरह  काम  किया है. उनके आलावा भी लाखों लोग रोज  लौकी का जूस पी रहे हैं, उन्हें कभी कोई नुकसान नही हुआ, फिर यह मृत्यु लौकी के माथे क्यों डाली गई.लौकी पर यह आक्रमण कई सावधानियों को जाग्रत करता है.याद रहे कि लौकी सिर्फ निरोगी  ह्रदय को रखनें में ही सहायक नहीं है साथ ही वह बहुत बड़ी रकम विदेश जाने से भी बचाती है.  
 मेरा निश्चय  यह है की वैज्ञानिक की मृत्यु की सही सही जाँच होनी चाहिए , यह सिर्फ एक दुर्घटना है या कोई षड्यंत्र ..?
- राधा कृष्ण मन्दिर रोड डडवाडा , कोटा , राजस्थान.

जनसंख्या विस्फोट से भी ज्यादा खतरनाक है , जनसंख्या असंतुलन....!

जनसंख्या विस्फोट से भी ज्यादा खतरनाक है , जनसंख्या असंतुलन....! 
- अरविन्द सिसोदिया
        भारत में 1950 के दशक में प्रति महिला बच्चों का औसत छह था.  भारत ने जनसंख्या विस्फोट की समस्या को समझा और जनसंख्या नियंत्रण के सुनियोजित प्रयास करने वाला पहला देश बना. तब से आधी सदी बाद आज भारत में जन्म दर घट के आधी रह गई है, लेकिन देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती, अब भी भारी जनसंख्या ही है. 20 वीं सदी के प्रारम्भ में जन्म दर और मृत्यु दर दोनो अधिक थीं, भारत में 1960 और 1970 के दौरान जनसंख्या विस्फोट हुआ जबकि मृत्यु दर में अचानक कमी आई क्यों कि महा संक्रामक बीमारियों पर काबू पा लिया गया , परन्तु जन्म दर अधिक (उच्च) ही बनी रही। इस अवधि के दौरान, भारत की जनसंख्या जो 1950 में थी उससे दुगुनी हो गई। तब लोगों को इस बात के लिए प्रेरित किया गया कि वे अपने परिवार का आकार घटाएं और प्रति महिला 6 बच्चों के स्थान पर दो बच्चों को ही जन्म दे। उस समय एक लोकप्रिय अभियान जैसे कि "हम दो हमारे दो " चलाया गया जिसका उद्देश्य छोटे परिवार की वांछनीयता पर ध्यान केन्द्रित करना था।
   मगर इस जनसंख्या नियन्त्रण का असर हुआ यह कि समझदार वर्ग विशेष कर हिन्दुओं ने इस का पालन किया और वे एक और दो बच्चों तक सीमित  हुए,वही मुसलमानों नें जनसंख्या वृद्धि  को एक आन्दोलनात्मक तरीके से विस्फोटित किया , एक की चार पत्नियाँ और उनके असंख्य बच्चों का अधिकार ...!  इस  षड्यंत्रपूर्ण कायर्वाही के विरुद्ध  कोई नहीं बोलता  क्यों की यह वोट बैंक का मामला है. यदि इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाये गये तो देश पर जनसंख्यात्मक   तरीके से कब्ज़ा कर लिया जाएगा . एक नये पाकिस्तान के उदय की मानसिकता से काम हो रहा है, हस के लिया है पाकिस्तान - लड़ के लेंगें हिंदुस्तान के नारे को कुछ इस तरह से बढ़ाया जा रहा है. इस चेतावनी को सही तरीके से समझना होगा.   
१- एक अच्छा तरीका -
              केरल में जनसंख्या सन्तुलन की दृष्टि से देखें तो लगभग 30% ईसाई, लगभग 30% मुस्लिम और 10% हिन्दू हैं, बाकी के 30% किसी धर्म के नहीं है यानी वामपंथी है  जहां पूरे देश में आबादी तेजी से बढ़ रही है वहीं केरल के कोट्टायम और अलपुझा जैसे जिलों में पूर्वी यूरोप के देशों की तर्ज पर जनसंख्या वृद्धि की दर घटने लगी है। 2001 में मिले आंकड़ों के अनुसार पिछले दशक के मुकाबले यहां सालाना जनसंख्या वृद्धि दर पांच प्रतिशत कम है। आबादी की दर कम होने का एक बड़ा कारण संख्या के बजाए गुणवत्ता पर जोर होना है। केरल विश्वविद्यालय के जनसंख्या विभाग में प्रवक्ता जीके मौली कहती हैं कि शिक्षा से स्वास्थ्य और छोटे परिवार के प्रति आई जागरूकता भी एक वजह है। इसके अलावा धार्मिक विश्वास, संयुक्त परिवार में आस्था, महिलाओं को परिवार का मुखिया बनाने की परंपरा से भी इस बदलाव में मदद मिली है। केरल के लगभग 65 प्रतिशत परिवारों में मातृसत्ता की परंपरा है।वहां समाजसेवियों ने महिलाओं के बीच शिक्षा के प्रति अभियान छेड़ा था। राज्य सरकारों ने भी इस मद में पैसा देने में कोई कंजूसी नहीं की।  किसी भी समाज के उत्थान में और आबादी पर नियंत्रण में सबसे अहम भूमिका महिलाओं की ही होगी।

२- हिन्दुओं में दहेज की कुरीती -
हिन्दुओं में दहेज प्रथा  के कारण लड़कियों को जन्म  लेने से पहले  ही मार दिया जाता है, भ्रूण हत्या के ९९ फीसदी मामले हिन्दुओं से जुड़े हैं . क्यों कि दहेज हत्यों के मामले भी ९५ फीसदी हिन्दुओं की लड़की के जलने या फांशी लगा लेने से जुड़े या पानी में डूबने से हैं . इसका मूल कारण  आज भी हिन्दुओं में दहेज के खिलाफ प्रभावी जन जागरण नहीं होना है. दहेज का सामाजिक बहिष्कार नही हुआ है.इस हेतु सामाजिक संगठनों का प्रभावी कार्यक्रम नहं होना माना जाता है. आज पंजाब हरियाणा और देहली में तो लड़कियों की  उत्पत्ति दर में काफी अधिक अंतर है.
३- अनिवार्य जनसंख्या नियंत्रण -
अनिवार्य जनसंख्या नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की एक ही बच्चे की नीति जिसमें एक से ज्यादा बच्चे होना बहुत बुरा माना जाता है. इस नीति के परिणाम स्वरुप जबरन गर्भपात, जबरन नसबंदी, और जबरन शिशु हत्या जैसे आरोपों को बढ़ावा मिला. देश के लिंग अनुपात में 114 लड़कों की तुलना में सिर्फ 100 लड़कियों का जन्म ये प्रदर्शित करता है कि शिशु हत्या प्रायः लिंग के चुनाव के अनुसार की जाती है.
    मुझे लगता है कि यह किसी लोकतान्त्रिक देश में संभव नही है, चीन में लोक तन्त्र होता तो वह भी नहीं कर पाता. यह  तरीका भी हल्के स्तर का है. मेरा मानना है कि दुष्प्रेरित जनसंख्या वृद्धि  को रोकने के लिए भारी जुर्माना  लगाना एक उचित कदम होगा, मगर वह भी अभी संभव नही है. इसके लिए राजनीतिक इच्छा-शक्ती की जरूरत है. क्यों की देश कि तरक्की पर अनावश्यक जनसंख्या का भारी दवाब रहता  है, जो राष्ट्र को अंदर ही अंदर से खोखला करता है . इन परिस्थितियों में केरल वाला रास्ता ही कामयाव हो सकता है ,  वह है  शिक्षा पर ज्यादा जोर देना , गर्भ ग्रहण रोकने वाले उपायों पर ध्यान देना , उन्हें अधिकतम सुलभ बनाना, कम बच्चों के होने पर क्या क्या फायदा है यह बताना. .  
- राधाकृष्ण मन्दिर  रोड , डडवाडा , कोटा २ , राजस्थान .  


   

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

इशरत जहां - वोट बैंक कि राजनीति है असली आतंकवाद...!!!

सुरक्षातन्त्र हतोत्साहित नहीं हों ...!
आतंकी सरकारी  रिश्तेदार नहीं,
देश के  दुश्मन है..!!
- अरविन्द सीसोदिया
  देश पर जब-जब भी हमले और षड्यंत्र पूर्ण आक्रमण हुए तब ही इस देश की रक्षा पंक्ति  ने ही दुश्मन का मुंह  तोडा है, चाहे सीमा पर सेना हो या राज्य में पुलिस हो या खुफिया  एजेंसी हों , इनके कार्यों को बिना सही जाँच पडताल के हतोत्साहित नही करना चाहिए ..! विशेषकर साम्प्रदायिकता के दवाव में , जब तक पाकिस्तान है, उसके दुश  -  परिणाम  भी हैं. कांग्रेस से यह विशेष शिकायत है कि वह वोट बैंक कि राजनीति में देश को ही समाप्त करने  की गलती कर रही है आपकी अभी तक की निति यह कह रही है की मुस्लिम है तो दोषी नही है और है तो दोषी है. यह चलने वाला नहीं है ना ही यह चलने दिया गायेगा .   
   अमेरिकी एजेंसी एफबीआई द्वारा पकड़े गए लश्‍कर-ए-तैयबा तथा मुंबई के 26/11 के आतंकवादी हमले के मुख्य आरोपी डेविड हेडली ने माना  है कि गुजरात में  मुठभेड़ में मारी गई   मुंबई की इशरत जहां खास मंसूबों को अंजाम देने वाली थी। उसकी नियुक्तिटॉप लश्कर कमांडर मुजम्मिल ने की थी।वह भारत में संगठन के अभियानों का प्रभारी था। 
    गौरतलब है कि 15 जून 2004 को यह आतंकवादी दल गुजरात के मुख्यमंत्री  नरेंद्र मोदी को मारने के लिए गुजरात पहुचा, जहाँ गुजरात पुलिस ने दल में सम्मिलित  मुंबई की छात्रा इशरत जहां, जावेद शेख और दो पाकिस्तानी जीशान जौहर अब्दुल गनी और अमजद अली को एक मुठभेड़ में मार गिराया था। अब हेडली की बात तो भारतीय जांच एजेंसियां को ही सच साबित कर रहीं हैं, ऐसी ही सूचना उन दिनों में गुजरात पुलिस को केंद्रीय खुफिया एजेंसी ने इशरत के एंकाउंटर के पहले दी थी।    गुजरात सरकार और नरेंद्र मोदी से कांग्रेस तथा कई  गैर-भाजपा दलों को और तथाकथित मानवाधिकार वादियों का विशेष शत्रुता है, उनके दवाव में  जब इसकी मजिस्‍ट्रेट जांच हुई तो वह कथित  फर्जी मुठभेड़ पायी गई। फिलहाल यह केस गुजरात हाई कोर्ट में चल रहा है।


              इशरत जहां की माँ शमीमा कौसर की  याचिका पर,  सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति बीएन अग्रवाल और न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी ने केंद्र सरकार और गुजरात सरकार को नोटिस जारी की है। कोर्ट ने केंद्र से पूछा है कि किस आधार पर इशरत को आतंकी घोषित किया गया, जबकि राज्‍य सरकार से पूछा गया है कि आखिर किस आधार पर उसने तमांग रिपोर्ट को सार्वजनिक करने पर रोक लगाने की मांग की। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से भी पूछा है कि किस आधार पर उसने इशरत को अतंकवादी करार दिया गया। इस   मामला से, उस दल में सम्मिलित, इशरत जहां और उसके तीन साथियों को जून 2004 में एंकाउंटर में मार गिराने वाली  अहमदाबाद पुलिस को जिम्मेदार ठहराया जारहा है. इस गैर जिम्मेवाराना  मामले से कल कोई भी पुलिस अफसर जन बचाव  में आगे नहीं आयेगा.  

   वोट की राजनीती करते हुए तब केंद्र सरकार ने अपना हलफनामा तक बादल दिया था और मीडिया में चर्च आने पर सफाई में ,  वाशिंगटन से  केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने इशरत जहां और तीन अन्य के कथित फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने के मामले में केंद्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे का बचाव करते हुए कहा कि यह 'प्रमाण या निर्णायक सबूत' नहीं है। महज खुफिया जानकारी के आधार पर एंकाउंटर गलत है। चिदंबरम ने कहा कि हलफनामे को 'संदर्भ' के साथ देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि खुफिया जानकारियां सबूत नहीं होतीं। ये महज जानकारियां होती हैं जिन्हें नियमित रूप से सरकारों के साथ बांटा जाता है। यह प्रमाण या निर्णायक सबूत नहीं होतीं। इनसे आगे की जांच में मदद मिलती है.
भाजपा महासचिव एवं मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया कि इशरत जहां संबंधी मुठ़भेड़ के मामले में केंद्र की संप्रग सरकार का आचरण दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक रहा है। उन्होंने कहा कि जब इशरत का मामला गुजरात हाईकोर्ट में आया तो केंद्र सरकार ने हलफनामे में स्वीकार किया कि इशरत के लश्करे तैयबा से संबंध थे लेकिन हाईकोर्ट में जब इस मामले की सुनवाई हुई थी तो वह यह दलील देकर पीछे हट गई कि गुप्तचर सूचनाओं को सबूत नहीमाना जा सकता।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने वोट बैंक की राजनीति के कारण गुजरात पुलिस को बदनाम करने में अब तक गुरेज नही किया है।
  अब तो यह बात निकल कर आ रही है कि इशरत अपने पति जावेद शेख के साथ फैजाबाद आई थी।मई 2004 में दिवली गांव में मेराज के घर रुके और हफ्तेभर अयोध्या-फैजाबाद की रेकी की। गौरतलब है कि जुलाई 2005 में यहां के अस्थायी राममंदिर पर आत्मघाती हमला हुआ जिसमें 5 हमलावर मौके पर ही मारे गए।   कुल मिला कर बात यह है की अब यह बहुत हो चुका कि अपराधी को बचाओ और  जो हो गया उसे भूल जाओ.
   

बुधवार, 7 जुलाई 2010

जीवन रहस्य-1




योग विवेचन - जीवन रहस्य-1
- मोहनलाल गालव 
( ग्राम -  कोयला , तहसील व जिला  बारां , राजस्थान.) 


योग का पहला सूत्र , जीवन ऊर्जा है.
(लाईफ़ इज  एनर्जी)
जीवनी   शक्ति है, जीवन का चिर लक्षण प्रजनन है. 
सोम व अग्नि  शक्ति पंचभूतों के रूप में परिवर्तित हो कर शरीर का संवर्धन करती है , 
गर्भ विज्ञान / एम्ब्र्योलोजी , शास्त्र में शरीर निर्माण प्रक्रिया का विस्तृत विवेचन मिलता   है.
जिसका आरंभ गर्भित भ्रूण  से होता है. 
इस प्रकार सृष्टि  की  प्रजनात्मक  प्रक्रिया ही काल  तत्व की  शक्ति द्वारा नवीनतम रूपों में भासित हो रही है. बीज काल,  काल गणनानुसार बीज का बीज तक पहुंचना  है . जितनी अवधि में बीज आरोपण  तक  पहुंच   पाता   है . वह ही उसका बीज काल है . 
प्रत्येक  गर्भित कोष फर्टीलाईज्ड - सेल  में जो स्पन्दन होता हे , वह बाहर से पंच तत्वों को केंद्र में खींच  कर उसका संवर्धन  करता हे . वैज्ञानिकों के अनुसार एसिमिलेशन और एलिमिनेशन प्रक्रिया द्वारा पोषण प्राप्त करने के बाद संवर्धन होता है ,जिसे वैज्ञानिक   सेल - फिशन , सेल - डिविजन या ग्रोथ कि संज्ञा  देते हें.
जीवन प्रजनन चिर लक्षण  में जिस बीज से प्राण कि उत्पत्ति होती हे , प्रजनन द्वारा पुनः  उसी बीज कि सृष्टि  प्रक्रिया प्रकृति  का लक्ष्य है . 
जो प्रक्रिया मानवी देह में है, वह ही सूक्ष्म कीट - पतंगो व सुक्ष्मातीत  सूक्ष्म त्रण . घास , काई   आदि    में पाई जाती  है. 
    गर्भस्थ कोष , बुद-बुद  या कलल , का संबंध माता के श्वास- प्रश्वास द्वारा बना रहता है . इस प्रकार भ्रूण अवस्था से ही जीवन का स्पन्दन प्रारंभ हो जाता है , तथा कोशीय आधार पर संबर्धन करते हुए शरीर  बन जाता है . प्राणात्मक स्पन्दन केंद्र के बाहर से सोम  रूप अन्न को खींच   कर पचाता है .जिससे शरीर की  वृद्धि  होती है . 
मानव शरीर में जठराग्नि ही अन्न को परिपाक करके शरीर के अंग - प्रत्यंग का  निर्माण करते हुए पुष्ट    करती है . क्यों कि आमाशय   के भीतर जो अनेक रसात्मक क्षार या अम्ल हैं . वह ही अग्नि  रूपेण रक्त , रस , मांस , मेद , अस्थि , मज्जा , शुक्र इन सप्त धातुओं का निर्माण करते  है . 
जीवन उर्जा ही जीवनीय - शक्ति है . इस शक्ति की  तीव्र गति के कारण ही पदार्थ का भास होता है . 
पदार्थ असत्य व भ्रम ( इल्यूजन  )  है  जैसा दिखाई पड़ता है  वैसा नही  है या जैसा है वैसा दिखाई नही पड़ता है . 
जगत पदार्थ में भी अस्तित्व और अन-अस्तित्व दोनों पहलू  ( आयाम ) हैं . अन - अस्तित्व में शक्ति द्वारा जगत शून्य हो जाता है और  जब वह अस्तित्व में होती है तो सृष्टि   का विकास ( विस्तार ) होता है ,
    इस जगत में प्रत्येक वस्तु दोहरे आयाम की  है , जैसे - जन्म-मृत्यु  , दृष्टिगत -अदृष्टिगत ,  होना-नही होना, जगत है - जगत नहीं  भी हो सकता  है . द्वंद में ही शक्ति का विस्तार  है , जैसे, अँधेरा और प्रकाश इनमें गुण का कोई अंतर नही है , परिणाम का अंतर है. योग सुख - दुःख का , अच्छे  - बुरे का , अस्तित्व - अन अस्तित्व का , अतिक्रमण है , अर्थात  इन दोनों से परे रहना  है. इसलिए योग का अभिप्राय  ही अधूरा   नही समग्र है . intigrated और The Total   है .

     आस्तित्व के भी दो रूप चेतन व अचेतन हैं , परन्तु यह दो (वस्तु )  नही हैं , जैसे आत्मा का जो हिस्सा इन्द्रियों को पकड़ में आ जाता है , उसका नाम शरीर है और शरीर का जो हिस्सा इन्द्रियों की  पकड़ में नहीं  आता उसका नाम आत्मा है. अर्थात   अस्तित्व  में चेतन और अचेतन दोनों समबद्ध 
 ( exit  ) है. यह दोनों रूपांतरित ( convertable ) है. जैसे हम अन्न खाते हैं ,  उससे रक्त,मांस, मज्जा , लोहा ,एलुमुनियम, फासफोरस  , तांबा, आदि बनते हैं, मगर जब मानव मरता है तो सब कुछ राख  हो जाता हे.
    अतः चेतन व अचेतन अस्तित्व के ही दो रूप है, परन्तु इस अस्तित्व में रूपांतरण  हो सकता हैं आक्सीजन और हाइड्रोजन को अलग-अलग रखने पर पानी नहीं  बनेगा , क्योंकि न हाइड्रोजन में पानी है और  न ही ओक्सिजन में पानी है ,लेकिन  दोनों  का समिश्रण  करने पर पानी बन जायेगा, अतः इनमें पानी के लक्षण  थे लेकिन दोनों के संघट/ मिलन से ही पानी प्रकट हो सकता था . अतः जो वस्तु प्रकट  होती है वह उसमें ही छिपी  ( गुप्त )रहती है , इस प्रकार चेतन व अचेतन एक ही अस्तित्व के दो छोर हैं, इसमें चेतन अचेतन हो सकता है  और अचेतन चेतन होता रहता है.
   मन   और शरीर  ये दो वस्तुएं नही हैं  , वरन अस्तित्व के ही  दो छोर हैं. इसी प्रकार चेतन व अचेतन भी दो वस्तुएं नहीं हैं यह भी अस्तित्व के ही दो छोर हैं . इसमें  किसी भी छोर से दूसरे छोर को प्रभावित किया जा सकता है. इस अंतहीन  ( अनंत ) विस्तार  में सब संयुक्त हैं , ऊर्जा  संयुक्त है, सागर की  लहर दूसरी लहर से जुडी है, जो लहर आकर टकराती है, वह अंतहीन किनारों से जुडी है. पृथ्वी  से करीवन   दस करोड़ मील का सूर्य  महासूर्यों से जुड़ा है. अर्थात  करीबन दस करोड़ महासूर्यों से भी अधिक सूर्यों से जुड़ा है और वे भी सब संयुक्त है. संयुक्तता में भी  संकल्प - असंकल्प तरंगता  के ही परिणाम है . 
  
  इस विस्तार में हम भी ऊर्जा  के एक पुंज हैं  और समग्र जगत की  नियति भी हम सबकी एकत्रित नियति है, अतः जो अणु में है वह  विराट में है और जो अति सूक्ष्म है वह अति  बृहत में  है. जो बूंद में है वही सागर में है. हीनता और श्रेष्ठता होना विकार है अर्थात  इन दोनों से जो मुक्त हो जाता है, वह ही समत्व प्राप्ति  करता है.क्षुद्रतम में विराट छिपा हुआ है अर्थात विद्यमान है .
      आत्मा में अदृश्य  अणु परमाणु हैं, जिनमें विराट ऊर्जा छिपी हुई  हे, जिसमें समयानुकूल परमात्मा का विस्फोट हो सकता है. अर्थात  क्षुद्रतम में विराटतम विद्यमान है, इससे सिद्ध होता है कि कण कण में परमात्मा विद्यमान है . जो सागर में है वह सूक्ष्म बूंद में भी है , और इससे ही आत्मशक्ति के अनंत होने का ज्ञान होता है. परन्तु हीनता से मानव मन को जकड़ने पर,  जीते जी जीवन को उदास और मृत  कर लेता है. जब कि मानव के अन्तस्थ  में विराट विद्यमान है. परमात्म  तत्व है, यदि इसका उसे ज्ञान या स्मरण हो जावे तो उसका हीनता कुछ  नहीं कर सकती . अतः हीनता रोग है तो श्रेष्ठता महारोग है. इसी की  उधेड़ बुन में मानव सतत लगा रहता है

   आत्मशक्ति तत्व अत्याधिक   सूक्ष्म और अदृश्य  एवं  पंच भूतादि  तत्व स्थूल तथा दृश्य  रूपा है. अतः स्पष्ट है बिना आत्मतत्व के  भूततत्व कि पृथक  सत्ता  संभव नही है. आत्मतत्व एक अखंडतत्व है , जो भूत रूपेण नाना भावों में परिवर्तित होता रहता है,इसी को वेदों में एको देवः सर्वभूतेशु गूढः  एवं एकमेवा द्वितीयम की  संज्ञा दी गई है. इस मूलशक्ति  के भी दो रूप में प्रथम अमूर्त, उर्ध्व   या परोक्ष है तथा दूसरा रूप मूर्त,अधः या अपरोक्ष है. समग्र सृष्टि  पंचभूतों की  रचना है. जो प्रकृति  रूपा बन कर तीन  गुणों यथा सत्व, रज, तम के तारतम्य से पंचभूतों के रूप में परिणत  होती है . अभिव्यक्त सृष्टि  के मूल में मनसतत्व, प्राणतत्व और पंचभूतादि   तत्व निहित हैं और इनकी त्रिक  ही क्रमशः सत्व,रज, तम है. जिसमें विश्व रचना का  आधार निहित है. इस से सिद्ध है कि जो परमात्म तत्व है वह ही मिटटी के कण या अणु  में भी है. अतः क्षुद्रतम या विराटतम में एक सी ही संपदा है.
     अतः योग भी क्षुद्र में विराट और विराट को क्षुद्र में द्रष्टिगत कराता  है.अर्थात  बूंद में सागर का  व सागर में बूंद का आभास करवाता है. वैसे भी अणु के विखंडन  से जो परमाणु बने उसमें भी महासूर्यों का सोर  जगत है. परमाणु में भी एक केंद्र होता है और उस केंद्र के  आसपास  इलेक्ट्रोन  चक्कर  लगाते  हैं. अतः इसमें सिर्फ फर्क मात्रा Quantity  का है . गुण Quality का कोई फर्क नही है . अर्थात   परमाणु  केंद्र में जो ऊर्जा   छिपी है , वह वैसी ही है, जो कि सूर्य की ऊर्जा  है. इससे सिद्ध  है कि  मेक्रोकाजम इज  दी  माइक्रोकाजम.  अतः जो अंण्ड  में है वह ही ब्रह्माण्ड  में है .
या जो विराट जगत  में है वह क्षुद्र अंण्ड / माइक्रोकाजम  में भी विद्धमान  है. दो और चार के बीच  में जो फर्क है वह दो खरब व चार खरब के बीच  भी वही फर्क है अर्थात  इन दोनों   का अनुपात एक है.इसमें संख्या विस्तृत   हो गई है. अनुपात सम है. अतः बूंद में भी क्षुद्रतम / अति सूक्ष्म सागर है. और सागर में भी अति  सूक्ष्मतम बूंद है. सिर्फ फैलाव ( विस्तार ) का फर्क है. प्रत्येक वस्तु परमाणु का योग / जोड़/ मिलन है. और परमाणु के केंद्र (बीच) में भी काफी स्पेस है. इस स्पेस को भी छोटा बड़ा किया जा सकता है. जैसे गुब्बारा  हवा भरने पर फैल / विस्तृत हो जाता है. व हवा निकलने पर सिकुड़  जाता है .   

, (क्रमशः ) शेष  जीवन रहस्य - २  पर  , ,    ,    .      , , ,
  
 .        .   .     

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

भारत बंद नही,प्रचंड महाबंद....!


कांग्रेस का हाथ गरीव कि गर्दन  पर ...!!
दलगत राजनीती से उपर उठें मंहगाई के मुद्दे पर !!!
सरकारी मानसिकता काली इमरजेंसी कि और ...!!!!
- अरविन्द सीसोदिया
५ जुलाई का भारत बंद सिर्फ ओपचारिकता नही थी बल्कि इसमें जनता कि भागेदारी  ने इसे महाबंद बना दिया .कम से कम २१वी सदी में इतना सफल बंद कभी नही रहा . मिडिया के  कुछ बन्धु दबे  स्वर और कुछ मुखर हो कर समाचार कि सत्यता के साथ खड़े हुये हैं. 
यह सही है कि १९७४/७५ में तत्कालीन प्रधान मंत्री  इंदिरा गाँधी के विरोध  जयप्रकाश नारायण के नेत्रत्व में समग्र क्रांति के उस आन्दोलन कि याद इस महाबंद ने ताजा करदी हैं.

   आज सवाल यह नही है कि बंद किसने आयोजित किया है,सवाल यह है कि बंद के प्लेटफोर्म पर आम व्यक्ति कि उपस्थिति हुई.घर से निकल कर आम आदमी सडक पर आया . क्यों को आम आदमी के मान में भी सवाल यह है कि क्या यह मन्हगाई बडाई जानी जरुरी थी? यदि आम आदमी को यह मन्हगाई वाजिव लगती तो इस  बंद का भी वही हाल होता जो पहले अन्य बन्दों के हुआ करते थे. मागार इस महंगी ने उसकी साँस रोकी है , जीना मुहाल किया है.
  बंद कि एक भी तस्वीर ऐसी नही थी जिससे कांग्रेस को खुशी हो जाये.., गुस्से में उतरा जन समूह आर पार के मूड में था , सडक पर उतरा व्यक्ति उबल रहा था . उबले भी क्यों नही हर दिन भाव बड़ाने के आलावा किया क्या सरकार ने ?? और उस पर इठला इठला कर कहना कि भाव और बड़ेंगे और बड़ेंगे .जैसे जनता ने इन्हें वोट देकर गलती कर दी हो और वह प्राश्चित के मूड में हो.
    ज्यादातर अख़बारों ने भी इस बंद को प्रचंड बंद माना है , सैंकड़ो हवाई उडाने कैंसिल हुऊ , अकेले मुम्बई में ९३ उड़ानें कैंसिल हुई ,२०० ट्रेन यातो चली ही नही या गन्तव्य तक नही पहुची. बस यातायात तो लगभग पूरी  तरह बंद था . व्यापारिक संस्थान खुले नही, सडकों पर पूरी तरह सन्नाटा था . जो घर में थे उनने पूरे दिन बंद को टी वि पर देखा . आदमी  से ज्यादा  गुस्सा महिलाओं को था.   ..,     
    जनता को आप पिछले ६ सालों से बाजार वालों के भरोशे छोड़े हुए हो .बाजार को सब जानते हैं कि वह दानियो का नही  मुनाफाखोरों का है जो ग्राहक  के कपडे तक उतारलें!
    दैनिक भास्कर के संपादक जी ने सही सवाल उठाया है , अगर बाजार के दाम से सब कुछ तय होता है तो फिर हमारे नेता दिल्ली के ऐसे मकानों में लगभग मुफ्त में क्यों रहते,जिनका बाजार के मुताबिक किराया हर महीने लाखों का बनता है। संसद की कैंटीन में दस रुपए से कम में भरपेट लजीज खाना मिलता है। उनके पेट का सवाल होता है तो फिर बाजार के दाम क्यों लागू नहीं होते? आम आदमी पर बाजार का बोझ जायज क्यों...? तेल के दाम सरकारी नियंत्रण से मुक्त हों, इस बात से सैद्धांतिक मतभेद नहीं है, पर दामों को खुला छोड़ने का मौका क्या अभी ही था, जब आम भारतीय की कमर टूटी हुई है? अभी जब पेट्रोल के दाम 50 रुपए प्रति लीटर से ऊपर चले गए हैं, सरकार ने उस पर लगने वाले पांच टैक्सों को कम करने का सोचा भी नहीं।
फिरसे आपातकाल के उठते मंसूबों का  इशारा

कांग्रेस ने विपक्षी दलों के भारत बंद को आडंबर करार दिया है। पार्टी प्रवक्‍ता अभिषेक मनु सिंघवी ने विपक्षी दलों से सवाल करते हुए कहा है‍ कि क्‍या बंद जनहित में है या जनविरोधी है? उन्‍होंने विपक्ष पर नकारात्‍मक राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि लोकतंत्र में ध्‍यानाकर्षण के और भी तरीके हैं। लेकिन विपक्ष असंवैधानिक तरीके से कामकाज करना चाहता है। 
भारत बंद से सोनिया एंड कंपनी कि  सरकार इतनी बोख्लाई  कि सारे दिन यही कोशिस होती रही कि बंद के नुकशान क्या क्या गिनाये जाएँ.सरकारी चैनल पर समाचारों के बीच में एक बंद विरोधी को बुलाया गया , चर्चा में भाग लेने का मोटा भुगतान भी किया गया होगा, नाम टी आर रामचन्द्रन था , उन्होंने कांग्रेस प्रवक्ता कि तर्ज पर ही बंद को राष्ट्र विरोधी ठहराया , सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उलंघन भी बताया ,राजनैतिक दलों पर फाईन लगाने कि बात भी उठाई गई ,एक मानव दिन के नुकसान होने कि बात कि गई , तोड़ फोड़ और आम आदमी के नुकसान कि बात भी जोर शोर से उठाई गई. विरोध प्रदर्शन के तरीके पर प्रश्न दागा गया . विरोधी दलों के बारे में भी कहा गया कि वे डिस्कस में भाग नही लेते , बात को आगे बढने ही नही देते , सरकार से संवाद नही बढ़ाते , कुल मिला कर आरोप यह लगा दिया कि इस तरह के प्रदर्शन से दलकी शक्ति को ही बढ़ाया जाता है .बाद में बात यहाँ तक अगई कि सत्ता रूढ़ दल को परेशन करने का भी तरीका यह प्रदर्शन आदि हैं .यहाँ तक कि काई अर्थ शास्त्री बुलाये गए कि इतने हजार करोड़ का नुकशान होगा ,कई कई एसोसियेसनों से नुकसान के आंकड़े दिलवाए गए , ताकि विपक्ष को खल नायक बनाया जा सके .  
   विपक्ष के हाथ से जन आंदोलनों का हथियार छिनने कि कोशिशें पहले भी हुईं थी,जवाहर लाल नेहरु का मत था कि विपक्ष होना ही नही चाहिए , इंदिरा गाँधी में तो विपक्ष पर देश विरोधी कार्यों का आरोप लगते हुए , देश हित में सिविल आपातकाल  लगा दिया था . विपक्षी दलों के क्या नेता क्या कार्यकर्ता सब को जेलों में डाल दिया था .इस वहस को चलाने के पीछे वही मानसिकता है, लोकतन्त्र कि नींव ही दबाव समूहों कि स्वतंत्रता  के आधार स्तंभ पर खड़ी कि हुई है .यह वहस फिरसे आपातकाल के उठते मंसूबों कि और इशारा है.   
- राधाकृष्ण मन्दिर रोड , डडवाडा , कोटा २ , राजस्थान.           ,,
ई मेल - sisodiaarvind0@gmail.com

शनिवार, 3 जुलाई 2010

मुख्यमंत्री अब्दुल्ला सरकार भंग कि जाये


   हो जाने दो एक और तांडव नृत्य    
हिन्दुओं को अमरनाथ यात्रा पर आने से
हतोत्साहित करने कि सोची समझी चाल 
--अरविन्द सीसोदिया
हिदुओं के पवित्र तीर्थ बाबा अमरनाथ कि यात्रा प्रारंभ होने के ठीक पूर्व , कश्मीर में पाकिस्तान प्रेरित  अलगाववादी संगठनों के द्वारा , पूर्व नियोजित तरीके से  अशांति   का वातावरण बनाया जाना , एक सोची समझी चाल है. इस के पीछे मूलरूप से हिन्दुओं को अमरनाथ यात्रा पर आने से हतोत्साहित करना हे . यह सब जानते हें कि जब तक कश्मीर में सेना हे तब तक ही कश्मीर हे ..! कश्मीर से सेना को खदेड़ने कि और हिन्दुओं को अमरनाथ जाने से रोकने कि साजिस के तहत ही यह सब कुछ हो रहा हे .  

कम उम्र बच्चों के द्वारा,  भारतीय सेना पर पत्थर   फेंकना , घायल करना और इसके लिए ५०० रूपये  का इनाम देना, ट्रकों के ट्रक पत्थर एकत्र कर के उसे सेना के विरुद्ध इस्तेमाल करना , मानव अधिकार उलंघन के आरोप लगाना यह सब सरकार कि सह  पर हो रहा हे . राज्य सरकार कि सह के बिना  यह हो ही नही सकता, जरूरत हे कि उमर अबुदूलाह सरकार भंग कि जाये  . . 

कश्मीर में फिर वही आग कि लपटने उठने लगीं हें , फिर से स्वायतत्ता का राग  अलापा जा रहा हे .   जब भी अब्दुल्लाह परिवार के हाथ में राज सत्ता  आती हे , तब ही गद्दारी  के  तमाशे और अधिक बड़ जाते हें, आदत  हे.! विश्वास देना  और विश्वास घात करना ! यह उनकी पुस्तैनी आदत हे केन्द्रीय सरकार कमजोर के साथ साथ पूरी तरह अपरिपक्व  साबित  हो रहो हे , देश कि चिंता ही नही हे .  सरकार को बहुमत में बनाये रखना ही एक मात्र उदेश्य हो गया हे . इसके लिए चाहे तो कीमत देनी  पड़े  .  कांग्रेस कि कायरता पूर्ण नीतियों के कारण ही कश्मीर  समस्या हे , चीन ने पूरा तिब्बत हडप लिया वहां    उफ़ नही हो पा रही , दूसरे हमारे विधिवत विलय हे , उस पर भी ६० साल से जबरिया अलगाववाद , जबरिया आतंकवाद . मेंने जबरिया शब्द का उपयोग इस लिए किया हे कि कश्मीर में वास्तव में अलगाववाद या  आतंकवाद नही हे . यह सिर्फ चंद पाकिस्तान से मिले गद्दार  लोगों के द्वारा उत्पन्न किया जाता हे और उसे बहुत ज्यादा बड़ा चडा कर फैलाया जाता हे .   
     अब्दुल्ला ने एक बयान में कहा, ""जम्मू एवं कश्मीर के लोगों की भावनाओं को केवल विकास, अच्छे प्रशासन और आर्थिक पैकेज के जरिए शांत नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए एक राजनीतिक समाधान की जरूरत है।"".मुख्यमंत्री ने कहा कि वह अपनी नेशनल कांफ्रेंस की राज्य की स्वायत्तता की मांग को छो़डने के खिलाफ नहीं हैं। इस व्यवस्था के तहत सिर्फ रक्षा, विदेश विभाग और मुद्रा भारत द्वारा नियंत्रित होगा। 
अब्दुल्ला ने कहा, ""यदि स्वायत्तता के अलावा कोई समाधान है जो कि भारत और पाकिस्तान दोनों को स्वीकार्य हो और जम्मू एवं कश्मीर के लोगों की भावनाओं को शांत करता हो, तो मैं इस मांग को छो़डने के खिलाफ नहीं हूं।""
""कश्मीर समस्या का समाधान राजनीति में छुपा हुआ है। यह रोजगार, स़डक और पुल और प्रशासन को लेकर नहीं है। केंद्र सरकार को अर्थपूर्ण बातचीत के जरिए कोई समाधान निकालना है।ताली दोनों हाथों से बजती है। अलगाववादियों को उचित जवाब देने की जरूरत है और भारत सरकार को बातचीत को अर्थपूर्ण बिंदु तक पहुंचाने की जरूरत है।""

बात यह हे कि उमर अब्दुल्लाह  के  दादा जी  शेख अब्दुल्लाह भी कश्मीर के स्वतंत्र राजा बनना चाहते थे , उनकी  यह आकांक्षा नेहरु के कारण बड़ गई थी . नेहरु ने ही उन्हें आजाद भारत में कश्मीर का प्रधान मंत्री बनाया था . नेहरु ने महाराजा हरी सिंह कि चेतावनी के वावजूद जम्मू ओए कश्मीर कि जिम्मेवारी शेख अब्दुल्लाह को मित्रता निभाने के लिए सोपी थी  बाद में बगावती तेवरों के चलते , शेख अब्दुल्लाह को, नेहरूजी को ही जेल में डालना पड़ा था . फारुक हो या उमर हो , हें तो उसी कि सन्तान. कांग्रेस कि कायरता पूर्ण नीतियों के कारण देश कितने कष्ट भुगतेगा       
अब्दुल्ला के इन शब्दों को पहचाना जाना  चाहिए , ये वही शब्द  हें जो कभी  शेख और बाद  में फारुख  बोला करते थे ...!
- राधाकृष्ण मन्दिर रोड , कोटा , राजस्थान .