मंगलवार, 31 अगस्त 2010

मुस्लिम दवाब के आगे घुटने टेके,शत्रु सम्पत्ति अधिनियम स्थगित

भारत के राष्ट्रपती का अपमान
सच हुई आशंका...,
देशभक्ती   पर गद्दारी   भारी..

- अरविन्द सीसोदिया
भारत की केंद्र सरकार ने मुस्लिम साम्प्रदायिक दवाब के आगे घुटने टेकते हुए शत्रु सम्पत्ति (संशोधन और विधिमान्यकरण) अध्यादेश, 2010 (2010 का सं. 4) को पारित नहीं करवाया है, यह एक प्रकार से भारत के राष्ट्रपती का अपमान है ...!
इसपर लोकसभा  में नेता प्रतिपक्ष ने सुषमा स्वराज ने सरकार की नियत पर सवालिया निशाने दागे , मगर सरकार विधेयक वापस लेने के संदर्भ सच बोलने तैयार नहीं थी मगर यह सभी जानते हैं कि सरकार ने यू टर्न मुस्लिम सांसदों और उनके कुछ सिपहसालारों के दवाब में लिया है..! ८ अगस्त २०१० को  मेनें इसी ब्लॉग में यह आशंका  लिखी  थी ..,

भारत विभाजन से जुड़े गद्दारों की संपत्तियां मुक्त ना हों
उसी में लिखा था ....भारत विभाजन से जुड़े गद्दारों की बहुत सी संपत्तियां सरकार के पास जप्त हैं बहुत सों को बटवारे के समय उसके बदले रकम दे दी गई थी. उनमें पाकिस्तान बनाने की जिद्द करने बाले देश के शत्रु जिन्ना भी हैं . उनका मुम्बई में बहुत बड़ा और सबसे मंहगे इलाके में जिन्ना हॉउस है उसकी वर्तमान कीमत हजारों करोड़ में है , उनकी बेटी भारत में ही रहती है उसका बेटा प्रसिद्ध उद्योगपती नुस्लीवाडिया हैं और उसे प्राप्त करना चाहते है . इन्होनें जिन्ना को राष्ट्र भक्त साबित करने के लिए कथित तोर पर किताब भी लिखवाई थी . इसी तरह की कई हजारों करोड़ की इन जायदातों को तथाकथित उतराधिकारी  पुनः हांसिल करने के लिए सक्रिय हैं , उन  अमीर जमींदार - नबाव मुसलमानों के अबंछित लाभा पहुचाने के  लिए कांग्रेस के कुछ मुस्लिम नेता यथा सलमान खुर्शीद , अहमद पटेल , गुलाम नवी आजाद आदी नेता सक्रीय हैं व ये इस विधेयक को वापस करवाना कहते हैं , इसके लिए सीधा सा तरीका है की सरकार पास ही नही करवाए तो सत्रावसान के साथ ही यह समाप्त हो जाएगा . मुस्लिम वोट के नाम पर देश के ह्रदय - स्थल पर यह चोट देश से शुद्ध गद्दरी होगी...!

मेंने तब यह आव्हान भी किया था ....
शत्रु सम्पत्ति (संशोधन और विधिमान्यकरण) विधेयक, २०१० पारित कर,
भारत सरकार सावित करे की वह पाकिस्तानियों की नहीं है......!

   यह आशंका सही सावित हुई है , केंद्र सरकार ने यह अधिनियम पारित नहीं करवाया , भारत के संसदीय इतिहास में एक भी इस तरह का उदाहरन नहीं मिलता कि राष्ट्रपती का आध्यादेश  संसद चलते पारित नहीं करवाया गया हो..! यह राष्ट्रपती का अपमान है , अब इस आध्यादेश की क्या स्थिति  बनेगी यह अभी स्पष्ट नही हो पा रहा हे..! कहा जा रहा है कि यह ६ महीने तक प्रभावी रहेगा..! पर जब आध्यादेश के बाद सदन आहूत हुआ है तो फिर आध्यादेश क्यों रहे यह बात समझ से परे है..! प्रश्न वाचक भी है ?   यह कानूनी पेंचेदगी का भी  मामला है..? मगर सरकार ने इस आध्यादेश को विधेयक के रूप में जो कानून लोकसभा में रखता वह लैप्स हो गया..! इस का सीधा सीधा मतलब है कि राष्ट्रपती के आध्यादेश के साथ सरकार नहीं है...! हालाँकि  आध्यादेश गृह मंत्री चिदंमरम  ने जारी करवाया था ..!
 02.07.2010 को प्रख्यापित शत्रु सम्पत्ति (संशोधन और विधिमान्यकरण) अध्यादेश, 2010 (2010 का सं. 4) को प्रतिस्थापित करना। शत्रु सम्पत्ति अधिनियम, 1968 और सरकारी स्थान (अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 में संशोधन करना। सत्र के दौरान उपस्थित किए जाने वाले प्रस्ताव - पुर:स्थापन, विचार तथा पारण के लिए रखा गया था | जिसे पारित नहीं करवाया गया जबकी उसका समर्थन भा ज पा कर रही थी , पास होनें में कोई दिक्कत नहीं थी | यदी लालजी टंडन की माने तो यह शत्रु सम्पत्ति २५ हजार करोड़ से भी अधिक की हैं ...!

रविवार, 29 अगस्त 2010

भगवा आतंकवाद कांग्रेस का सियासी खेल,बिहार चुनाव हेतु

  भगवा आतंकवाद शब्द
 एक सोची समझी साजिस
- अरविन्द सीसोदिया

     भगवा आतंकवाद शब्द ही देश को गाली है, इस तरह के शब्द प्रयोग को साम्रदायिकता है,  इस पर गंभीर आपराधिक प्रकरण दर्ज होना चाहिए, भगवा रंग सूर्योदय का रंग है, भगवा रंग आरती का रंग है, भगवा रंग जीवन की आधार भूता अग्नि का रंग है, हिन्दू देवी देवताओं का रंग है, हिन्दू धर्माचार्यों की वेष भूषा का रंग है, भगवा रंग त्याग और बलिदान का रंग है, साधू संतों का रंग है!
   केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम की ‘भगवा आतंकवाद’ की परिभाषा  को माना जाये तो, व्यक्ती उसके धर्म से अपराधी माना जाएगा या पहचान विशेष से अपराधी माना जाएगा जैसे कि   इस्लामिक व्यक्ती के आतंकवाद को 'हरा आतंकवाद' कहा जाएगा , इसाई  व्यक्ती के आतंकवाद को 'सफेद आतंकवाद' कहा जाएगा , साम्यवादी व्यक्ती के आतंकवाद को 'लाल आतंकवाद' कहा जाएगा ,   बौध्य  व्यक्ती से  जुड़े आतंकवाद  को 'कत्थई आतंकवाद' कहा जाएगा ! आतंकवाद को चिन्हित  करने या उसके बारे में कहने से पहले पूरा तोल कर बोला जाना चाहिए ,  जो सही है वह बोला जाना चाहिए , भगवा आतंकवाद शब्द आपने सिर्फ मुस्लिम वोटों की जुगाड़ के वास्ते गडा  है .., यह  योजना पूर्वक ही आपने ( केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम  ) बोला है और योजना पूर्वक ही आपने ( कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने ) खंडन  किया   है..., मूलतः यह कांग्रेस का सियासी खेल है.. ताजा  बिहार चुनाव सामने हैं , वहां १५/१६ प्रतिशत वोट मुश्लिम हैं ..., उन चुनावों को सांम्प्रदायिक रंग देने कि साजिस के तोर पर यह बयान  केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने दिया है, इसी की प्रतिक्रिया में  वोट साधने के लिए बिहार के रामविलास  पासवान ने भी समर्थन करने वाला बयान दिया है | 

    यह इस देश का अपमान है , इस देश के धर्मों - पंथों - मान्यताओं  का अपमान है , संत समाज का अपमान है , एसी कोई टिप्पणी इस्लाम के खिलाफ कर दी होती तो अभी तक केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम को हटा दिया गया होता ...., उन्हें हिन्दू समाज से माफ़ी मांगने में  भी शर्म आ रही है! मगर  पूरे देश का  ,देश की पूरी सभ्यता का  ,देश की पूरी संस्कृती का अपमान माफ़ी योग्य नही है !

  कुछ प्रतिक्रियाएं
 केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम की ‘भगवा आतंकवाद’ की परिभाषा खुद कांग्रेस की ओर से खारिज होने के बाद पार्टी के ज्यादातर मुस्लिम सांसदों ने भी भगवा आतंकवाद के टर्म को नकार दिया है। कांग्रेस नेता व राज्यसभा सांसद राशिद अल्वी ने कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म, मजहब या रंग नहीं हो सकता कहा है। भाजपा के मुख्य प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद का कहना है कि चिंदबरम ने आतंक को भगवा शब्द से जोड़कर देश की संस्कृति, सभ्यता और इतिहास का अपमान किया है। प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट में रामसेतु विवाद की याद दिलाई। उनका कहना था कि पहले कांग्रेस ने राम को काल्पनिक बताते हुए हलफनामा दायर किया और फिर सरकार के मंत्री ही इसके खिलाफ बयान देने लगे और हलफनामे को बदल दिया गया। इसी तरह ‘भगवा’ शब्द के इस्तेमाल पर भी कांग्रेस पार्टी के अंदर विरोध मुखर हो गया है।

    मगर  इस सारे खेल में कांग्रेस की हिन्दू विरोधी  मानसिकता एक दम साफ़ नजर आरही है |
        इस देश में 'भगवा आतंकवाद' के रूप में एक नई चीज उभरी है और कई आतंकी वारदात में इसका हाथ रहा है। गृह मंत्री पी. चिदंबरम के दो दिन पुराने इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया आने का सिलसिला  जारी रहा। विपक्ष ने इस बयान के लिए चिंदबरम को आड़े हाथों लिया, लेकिन कांग्रेस इससे पल्‍ला झाड़ती दिखी। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता, वह बस 'काला' होता है। आतंकवाद को किसी रंग से नहीं जोड़ा जा सकता। यह विवाद एक शब्‍द की वजह से हुआ है। राजनीति में शब्‍दों का चयन सावधानी से करना चाहिए। हर रंग की अपनी अलग परंपरा है। केसरिया या भगवा रंग का भी एक इतिहास है।
     बीजेपी के गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ ने भी चिदंबरम को भगवा आतंक बयान पर आड़े हाथों लिया। योगी ने कहा कि चिदंबरम ने ऐसा कहकर देश की संस्कृति और साधू संतों का अपमान किया है। सबसे पहले तो चिदंबरम के ही जांच होनी चाहिए। मुझे लगता है कि चिदंबरम का दिमाग खराब हो गया है उनके दिमाग की जांच होनी चाहिए।
 इसाई पोप कि वह घोषणा...... 
 हिन्दुत्व के विरुध  गहरी साजिस पहचानें...
   विश्व की तमाम शक्तियाँ, आपस में कितनी ही  प्रतिद्वन्दी क्यों न हों पर वे सभी एक मामले में एक हैं... वह है हिंदुत्व..! हिन्दुत्व का भय उन्हें क्यों है यह समझसे परे है, लगता है कि हिंदुत्व उन सभी से श्रेष्ट  है यही एक वजह है....!!! यह सत्य पर आधारित है इसलिए या यों कहें कि यह पूर्ण वैज्ञानिक है इसलिए ...! जो भी है हिंदुत्व  या भारतीयता के, जो भी पोषक तत्व हैं , सस्थाएं हैं , राजनैतिक दल हैं और व्यक्तीं हैं ...! वे सभी इनके निशानें  पर हैं , चाहे इसाई विस्तार वादी हों , चाहे इस्लामिक विस्तार वाद हो या साम्यवादी विस्तार वाद हो , सबके  निशाने पर हिंदुत्व है ...! भारत या हिन्दू निशाने पर आने का कारण है , इसाई पोप कि वह घोषणा जिसमे उन्होंने २००१ से प्रारंभ हुई सहस्त्रावदी में एसिया महाद्वीप  को इसाई बनाने का आव्हान किया और उअका प्रवेश द्वार भारत  को बताया ...!! हमें याद रहना चाहिए कि पहली सहस्त्रावदी में यूरोप को , दूसरी सहस्त्रावदी में दोनों अमेरिका , आस्ट्रेलिया और अफ्रीका को इसी बनाया गया था .. अब एसिया पर कुद्रष्टि है..! जिसकी खुली घोषणा कि गई है ..!! इस कारण  विश्व कि तीनों महाशक्तियों का रण क्षैत्र भारत बन गया है और उसमें भी हिन्दू ...! दुर्भाग्यवश हमारे देश में जो राजनैतिक दल हैं वे भी इन ताकतों के ही ओजार बन गए हैं ..! इन्ही ताकतों के वित् पोषण में फंसा मीडिया भी वही करता है जो ये ताकतें कहतीं हैं ...!! कई सारे संगठन भी इन्होनें इसी लक्ष्य   को प्राप्त करने के लिए खड़े किये हैं जिनके औजार  , तथा कथित सामाजिक कार्यकर्ता हैं ...!! भगवा आतंकवाद  शब्द भी इन्ही ताकतों की उपज है , इसी शब्द को भारत के गृहमंत्री के द्वारा बोला जाना भी एक सोची समझी साजिस है ..!!  

भगवा ध्वज ऐतिहासिक
  भगवा ध्वज भारत का ऐतिहासिक एवं सांस्कृति ध्वज है। यह हिन्दुओं के महान प्रतीकों में से एक है। इसका रंग भगवा (saffron) होता है। यह त्याग, बलिदान, ज्ञान, शुद्धता एवं सेवा का प्रतीक है। यह हिंदुस्थानी संस्कृति का शास्वत सर्वमान्य प्रतीक है। हजारों हजारों सालों से भारत के शूरवीरों ने इसी भगवा ध्वज की छाया में लड़कर देश की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर किये।भगवा ध्वज, हिन्दू संस्कृति एवं धर्म का शाश्वत प्रतीक है। यही ध्वज सभी मन्दिरों, आश्रमों में लगता है। शिवाजी की सेना का यही ध्वज था; राम, कृष्ण और अर्जुन के रथों का यही ध्वज है।
भगवा ध्वज दो त्रिकोणों से मिलकर बना है जिसमें से उपर वाला त्रिकोण नीचे वाले त्रिकोण से छोटा होता है। ध्वज का भगवा रंग उगते हुए सूर्य का रंग है; आग का रंग है। उगते सूर्य का रंग और उसे ज्ञान, वीरता का प्रतीक माना गया और इसीलिए हमारे पूर्वजों ने इसे इसे प्रेरणा स्वरूप माना। ज्ञात हो तो मौलाना अबुल कलाम आजाद ने इसी भगवा ध्वज को स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार करने का आग्रह किया था।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भगवा ध्वज को ही अपना गुरू माना है। संघ की शाखाओं में इसी ध्वज को लगाया जाता है, इसका ही वन्दन होता है और इसी ध्वज को साक्षी मानकर सारे कार्य किये जाते हैं।

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

श्रीराम जन्मभूमि : एकमेव हल भव्य मन्दिर निर्माण

अयोध्या की विवादित भूमि राम मंदिर ही है

- अरविन्द सीसोदिया
नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार २४-०८-२०१० को अयोध्या में  राम जन्मभूमि-बाबरी  के मूल मालिकाना हक से जुड़े मुकदमे में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के संभावित फैसले पर अपने वरिष्ठ मंत्रियों से चर्चा की। फैसला सितंबर २०१० के मध्य में आने वाला है। इसमें पिछले 60 साल से इस भूमि के मालिकाना हक पर बने विवाद को लेकर अदालत फैसला देगी। अदालत मूलत: तीन बिंदुओं पर अपना निर्णय देगी। इसमें सबसे पहला और मुख्य बिंदु यह है कि क्या अयोध्या की विवादित भूमि राम मंदिर ही है। दूसरे, क्या मस्जिद मंदिर के अवशेषों से बनी थी। तीसरे, क्या मस्जिद इस्लाम के नियमों अनुरूप बनी थी। माना जा रहा है कि अदालती फैसले के बाद इस मसले पर संवेदनशील स्थिति बन सकती है।
बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और रक्षा मंत्री एके एंटनी उपस्थित थे। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री ने गृह मंत्री से संभावित परिस्थितियों को देखते हुए राज्य सरकार की ओर से किए गए उपायों व केंद्रीय स्तर पर की गई सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी हासिल की। उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने फैसले के बाद संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति का हवाला देते हुए पहले ही केंद्र सरकार से अर्धसैनिक बल की 485 कंपनियां मांगी है। एक कंपनी में 112 से लेकर 125 अर्धसैनिक बल कर्मी होते हैं। इसके लिहाज से केंद्र सरकार से राज्य सरकार ने 50 हजार से अधिक अर्धसैनिक बलकर्मी मांगा है।
 विश्व हिन्दू परिषद का कथन ... 
 विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने कहा कि राम जन्मभूमि मसले का स्थायी हल सिर्फ संसद में अयोध्या में भगवान राम के मंदिर के निर्माण के संबंध में कानून बनाकर ही हो सकता है, क्योंकि किसी अन्य तरीके से इस मामले को सुलझाने का प्रयास किया जाना देश में संघर्ष का माहौल पैदा करने  जैसा है।
  विश्व हिन्दू परिषद ने कहा कि अयोध्या के रामजन्मभूमि मंदिर मामले में अगर अदालत का फैसला हिन्दुओं के प्रतिकूल होगा तो वह उसे नहीं मानेगी।परिषद के प्रवक्ता आचार्य धर्मेन्द्र ने  कहा कि यह धर्म और आस्था से जुड़ा मामला है। हर हिन्दू मानता है कि भगवान श्रीराम का जन्म अयोध्या में हुआ था। इसे साबित करने की क्या जरूरत है। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि शाहबानों मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले को क्या मुसलमानों ने माना ? यह निर्णय मुसलमानों ने नहीं   माना था और संसद ने कानून बना कर इसे पलट दिया था !
  विश्व हिन्दू परिषद् ने  मांग की कि सोमनाथ की तर्ज पर संसद में रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाया जाए। विश्व हिन्दू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय महामंत्री डा़ प्रवीण भाई तोगड़िया ने कहा कि संतों के आदेशानुसार भगवान श्रीराम का मंदिर जन्मभूमि पर ही बनेगा। उन्होंने कहा कि अयोध्या की शास्त्रीय सीमा में कोई मस्जिद नहीं बनेगी।
  ज्ञातव्य रहे कि ,  अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए विहिप की प्रेरणा से श्रीहनुमत शक्ति जागरण समिति जो कि पूरे देश में गठित कि गई हैं  के द्वारा , देश भर   में कई कार्यक्रम व संकल्प सभाएं आयोजित कर रही है ।   हनुमान चालीसा का पाठ पूरे देश में हनुमत शक्ति जागरण अभियान के तहत लाखों से भी अधिक मंदिरों में नियमित रूप से संतों के सानिध्य में चल रहा है जो 17 नवम्बर 2010 से देवोत्थान एकादशी तक चलेगा। इसमें देश  के करोड़ों लोग भाग लेकर संकल्प लेंगे। इन कार्यक्रमों में हिन्दू समाज के हर मत पंथ, सम्प्रदाय व विचारधारा के लोग भाग लेंगे।

मालिकाना हक पर साठ साल बाद आएगा फैसला

सितंबर २०१० के  मध्य में आने वाला फैसला , इस मसले पर साठ साल पहले दायर की गई याचिका पर लिया जाना वाला निर्णय होगा। इस मसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक विशेष पीठ जिसमें जस्टिस एसयू खान-जस्टिम सुधीर अग्रवाल- जस्टिस डीवी शर्मा शामिल हैं, रामजन्मभूमि के मालिकाना हक को लेकर अपना निर्णय देंगे। वर्ष 1950 में सबसे पहले गोपाल सिंह विशारद ने विवादित भूमि पर भगवान राम की पूजा-अर्चना की इजाजत देने को लेकर याचिका दायर की थी। इसी साल परमहंस रामचरण दास ने भी इसी तरह की इजाजत संबंधी दूसरी याचिका दायर की थी। हालांकि बाद में यह याचिका वापस ले ली गई थी। वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी याचिका दायर करते हुए भूमि हस्तांतरित करने की मांग की थी। चौथी याचिका 1961 में यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने दायर करते हुए भूमि हस्तांतरित करने की मांग की और इसे मस्जिद भूमि घोषित करने की मांग की। 1989 में पांचवीं याचिका भगवान श्रीरामलला विराजमान ने दायर करते हुए भूमि हस्तांतरण की मांग की और इसे मंदिर घोषित करने की मांग की।
  'श्रीराम जन्मभूमि - समस्या और समाधान ' 
    उपरोक्त  विषय  पर २४ एवं २५ जुलाई २०१०  को एक राष्ट्रिय परिसंवाद आयोजित हुआ था , पूरे परिसंवाद का नतीजा यही था क़ी अदालती निर्णय के बाद अपील और दलील का खेल नये सिरे फिर प्रारंभ हो जाएगा , फिर वही होगा जो सरकार चाहती है की मामला टाल दिया जाये , सबसे उत्तम मार्ग यही होगा क़ी सोमनाथ मंदिर की तरह वर्तमान केंद्र  सरकार संसद से कानून बना कर अयोध्या में श्री रामजी का मंदिर निर्माण हेतु हिन्दुओं को भूमि सोंप्दे....!
  इस परिसंवाद में यह तो स्पष्टता से आया की सभी साक्ष्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के पक्ष में ही आये हैं, निर्णय भी पक्ष में ही आने की संभावना है , मगर यह मामला अदालत के स्तर का नहीं है ..! यह पूर्णतः राजनैतिक इच्छा शक्ती का विषय इसलिए है " क्यों कि यह प्रश्न आस्था और विश्वास का है , राष्ट्रिय स्वाभिमान का है ..!!" 
 वहां एक वक्ता ने अपनी बात प्रश्न के माध्यम से इस प्रकार रखी कि :-
१- भारत जब १९४७ में स्वतंत्र हुआ तो हमने ,ब्रिटिश ध्वज उतार कर अपना तिरंगा क्यों फहराया ...?
२- अपना राष्ट्र गीत , राष्ट्र गाना , अपना संविधान क्यों अपनाया ..?
३- अपने लोगों कि संसद , अपने लोगों  कि सरकार क्यों बनाई ...?
४- फिरंगियों के स्मारक, स्टेच्यू  और विभिन्न नामों को क्यों हटाया ..?
५- सोमनाथ में इस्लामिक कब्जे हटाकर पुनः भव्य मंदिर निर्माण क्यों किया ...?
६- अयोध्या में ही , जो वर्तमान में तुलसी उद्यान है , अंग्रेज शासन काल में वह विक्टोरिया पार्क था , वहाँ ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की स्टेच्यू लगी हुई थी , स्वतंत्रता  के बाद उस स्टेच्यू को हटा कर , वहां गोस्वामी तुलसीदास की मूर्ती स्थापित की गई और उसका नामकरण तुलसी उधान हुआ ...! 











सोमनाथ मंदिर
        मूलतः इन सभी के पीछे गुलामी थी, इसलिए यह परिवर्तन हुए  ...!! बहुतसे कालेज , बहुतसे अस्पताल या कार्यालय भवन  जो अंग्रेजों के नाम पर थे , उनमें परिवर्तन इसी भावना से हुआ कि वे हमारी गुलामी के प्रतीक थे , जहाँ हमारे नाम होने चाहिए थे , उन पर उनका कब्ज़ा था जिसे हमने हटा कर अपनी प्रति स्थापना की है ! स्वदेशीकरण किया है !!   यही प्रति स्थापना , यही स्वदेशीकरण अयोध्या में होना शेष है ...! जब सोमनाथ मंदिर का निर्माण केन्द्रीय मंत्री गण और राज्य सरकार की देख - रेख में हो सकता  हैं, तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम राजेन्द्र प्रशाद जी मूर्ति कि प्राण प्रत्तिष्ठा  कर सकते हैं तो फिर अयोध्या , काशी , मथुरा से बेईमानी क्यों ..? उनके साथ भी वही सोमनाथ व्यवहार क्यों नहीं ?
   स्थापित अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत  है की जब कोई देश अपनी गुलामी से मुक्त होता है तो वह पुराने जबरिया लादे गए उन सभी आदेशों से मुक्त होता है जो गुलामी के दोरान थोपे गये थे ...!! हमारे देश के आलावा भी इस तरह के अनेकों उदाहरन हैं जिनमें स्वतन्त्रता  प्राप्ति के बाद , उन देशों के अपने मान बिन्दुओं की पुनर्स्थापना की है ...!!  
१- स्पेन भी ४०० साल गुलाम रहा , जब वह मुस्लिम मूवर्स से मुक्त हुआ तो उसने ध्वस्त चर्चों की नींव पर बनीं मस्जिदे हटा कर पुनः चर्च बना कर राष्ट्रिय स्वाभिमान की स्थापना की ...!
२- पोलेंड भी १०० साल गुलाम रहा, जब वह रूस से मुक्त हुआ तो उसने रूसियों द्वारा निर्मित ओरियंटल आर्थाडाक्स कैथीड्रल को तोड़ दिया, क्यों की वह गुलामी का प्रतीक था | 
३- दूसरे विश्व युद्ध में, जर्मनी के शासक हिटलर की सेना ने, रूस के जार ( शासक) के विंटर पेसेल में स्थित ग्रीक देवी देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ डालीं थी | यह इसलिए किया गया ताकि  रूस को नीचा दिखाया जाये, उसे अपमानित किया जाये, उसका मान मर्दन किया जाये | महायुद्ध की समाप्ति पर, रूस  में साम्यवादी सरकार जो आस्तिकता और धर्म में विश्वास नहीं रखती थी ने, राष्ट्रिय स्वाभिमान , भंग की गई प्रतिष्ठा की पुर्न  स्थापना हेतु , उन ग्रीक देवी देवताओं की मूर्तियाँ नई बनबा कर ससम्मान  स्थापित कीं ...!   
  श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का विध्वंस  ,  राजनैतिक था , साम्प्रदायिक था , निरंकुश धर्मान्धता था , हमलावरों के द्वारा था , जिसके क्रम में हमलावरों ने सैंकड़ों वर्षों तक हजारों मंदिर , लाखों मूर्तियाँ तोड़ डाली थीं ..! लाखों लोगों का तलवारों के बल पर धर्म बदलवाये गये ,जो नहीं माने उनका कत्ले आम हुआ !! चाहे सनातनी  हों या सिख , जैन , बोद्ध रहें हों , भारत में इस्लामिक आक्रमण और विध्वंस  के दोरान सभी क्षतिग्रस्त   हुए और धर्म स्थल तोड़े गये | इसाईयों  के साथ भी उनका  यही बर्ताव यूरोप  में रहा ...! 
सबूत और साक्ष्य 
जहाँ तक सबूत और साक्ष्यों का सबाल है , सभी कुछ श्रीराम जी के पक्ष में है , विश्व के सातों महाद्वीप  अखिल  विश्व यह जनता है कि अयोध्या एक परम पावन पवित्र धार्मिक और महान राजनैतिक नगरी है , इसमें ईश्वर के अवतार भगवान श्रीराम का जन्म माँ कोशल्या  के गर्भसे हुआ था , उनके जन्म स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण होना , समय समय पर उसका   जीर्णोधार और नवीकरण होना एक स्वाभाविक क्रिया ही है ..! जहाँ ईश्वर का अवतार हो ईश्वर का अंश हो वहां भव्य मंदिर ही होता है ..!! अदालत के द्वारा जो वैज्ञानिक आधार के पुरातात्विक और राडार सर्वेक्षण करवाए गए वे इसकी पुष्ठी करते हैं ..! आस्था  और भावना से जुड़े प्रश्न में इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी मगर जितना सच सामने आये उतना ही अच्छा ...!!
  हमलावर बाबर ने इस भव्य  मंदिर को तोडा था और उसी सामग्री से अपवित्र ढांचा (मस्जिद) बनबाया  इसके सबूत में अनेक तत्कालीन दस्ताबेज प्रमाणित करते हैं | इस्लाम में मस्जिद वही मानी जाती है जो पवित्र भूमि पर बनी हो व वजू स्थल हो , यह जबरिया मंदिर तोड़ कर बनाई गई और उस पर कोई वजू स्थल नही है , मंदिर तोड़ने की जिद में यह बनी थी , इसलिए मुस्लिम पवित्रता से इसे कभी भी मस्जिद घोषित ही नही किया गया ..! लेकिन इस स्थान को मुस्लिम विजय के प्रतीक के रूप में हमेशा  माना और इसी कारण  निरंतर इस स्थान को लेकर युद्ध हुए और  लाखों लोग बलिदान  हुए ..! यह ढांचा बाबरी ढांचा  अवश्य बना मगर पवित्र मस्जिद कभी नही बनीं|
   यह भी सर्वविदित है कि इस स्थान पर मन्दिर या मूर्ति रही हो या नही रही हो ,मगर हिन्दुओं का आना जाना निरंतर जारी  रहा, संघर्ष जारी रहा  और श्रधा   पूर्वक नमन जारी रहा |
  स्वतः   मूर्ति प्रगट हुई , पूजा - अर्चना निरंतर चल रही है , इसे रोका नही जा सकता ..! ताले लगे ताले टूटे , शिलान्यास  हुआ ..!!  ढांचा ध्वंस हुआ ..!! यह श्रंखला ठीक वैसी ही है जैसी १८५७ से १९४७ तक चली स्वतन्त्रता संग्राम की श्रंखला थी ...! श्रीराम जन्मभूमि की स्वतन्त्रता का संग्राम चल रहा है यह अविचल है , अविराम है,  रामलला का  प्रगट होना भी एक पायदान थी  , बाबरी ढांचे का ध्वंस भी एक पायदान है , भव्य मन्दिर निर्माण  भी एक पायदान है ..! देश गुलाम हुआ और लंम्बी संघर्ष गाथा के साथ स्वतंत्र हुआ , कमजोर मानसिकता वाली सरकारों के कारण सांस्क्रतिक स्वतन्त्रता शेष चल रही है , जिसे संघर्ष के द्बारा प्राप्त करनी है ..! बाबरी ढांचा ४०० साल  से अधिक समय के बाद ढह गया , श्रीरामलला पूर्व में भी थे और अब भी हैं ...! आगे भी रहने वाले  हैं .. उन्हें कोन हटा सकता है..?
  सवाल यह है कि कांग्रेस सहित तमाम  दल १०० करोड़ हिन्दुओं के वोट से राज करते हैं,  हिन्दुओं को न्याय दिलाना इनका फर्ज है, स्वतन्त्रता का नैतिक सिद्धांत  है , श्रीराम का भव्य मंदिर अयोध्या में ही   बनेगा, कोंन कितने दिन रोक पायेगा ...? निर्णय आने के बाद मुठ्ठी बंद नही रह पायेगी ! वर्तमान सरकार के पास अवसर है कि वह मामले को सोमनाथ प्रक्रिया कि तरह हिन्दुओं को सोंप दे...!, अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की  भूमि को हिन्दुओं को सोंप देना ही प्रथम और अंतिम निदान है, अन्यथा नये सिरे से भीषण संग्राम सामने  दिख रहा है   ....! 
विनय न मानत जलधि जड़ , गये तीन दिन बीत |
बोले राम स्कोप तब , भय बिनु होई न प्रीति  ||     


एकमेव हल भव्य मन्दिर का निर्माण....      
     

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

सभी प्रकार की देश - धर्म रक्षाओं के प्रति तत्पर रहना होगा

परिवारीक एकत्व का
महान सामजिक हिन्दू पर्व : रक्षा बंधन
- अरविन्द सीसोदिया   
  अखिल विश्व के आँगन में , सुख - शान्ति और समृधि को आनंद  के साथ  सिद्ध किया है तो वह भारत भूमि है , यहाँ हर  मनुष्य को संतोष के साथ सुख सिखाया गया है , पवित्रता के साथ जीवन जीना सिखाया गया है , रिश्तों का बंधन अनंत आत्मीयता के साथ गूंथा  गया है | यही कारण  क़ी इस संस्कृति  क़ी गहरी जड़ों को कोई भी हमलावर उखाड  नहीं सका...! या तो वे इसमें ही मिल गए या हाथ मल कर रह गए ...!! इस सिद्धी   के प्रमुख अंगों में वृत , त्यौहार और परंपराओं  क़ी  महती भूमिका हमेशा से ही रही है | रक्षा बंधन मूलतः बहिन  की मान मर्यादा क़ी रक्षा के लिए भाई की वचनवधता  है ..! इसके अतिरिक्त रक्षा सन्दर्भ  के  , अन्य विषय जैसे राष्ट्र रक्षा , सामाजिक एकता की रक्षा , वृक्षों क़ी रक्षा , मानव मूल्यों क़ी रक्षा , सासंकृतिक मूल्यों क़ी रक्षा ...!! इसका कारण यह है क़ी ये पूर्णिमा , रक्षा पूर्णिमा के नाम से भी विख्यात है ...!!    

रक्षाबंधन एक हिदू  त्यौहार है जो श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। सावन में मनाए जाने के कारण इसे सावनी या सलूनो भी कहते हैं। रक्षाबंधन में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्व है। राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चांदी जैसी मंहगी वस्तु तक की होती है। राखी सामान्यतः बहनें भाई को बांधती हैं परंतु ब्राहमणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित संबंधियों (जैसे पुत्री द्वारा पिता को) भी बांधी जाती है।
     इस दिन बहन अपने भाइयों की कलाई में राखी बांधती है और उनकी दीर्घायु व प्रसन्‍नता के लिए प्रार्थना करती हैं ताकि विपत्ति के दौरान वे अपनी बहन की रक्षा कर सकें। बदले में भाई, अपनी बहनों की हर प्रकार के अहित से रक्षा करने का वचन उपहार के रूप में देते हैं। इन राखियों के बीच शुभ भावनाओं की पवित्र भावना होती है।
  श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग-भंग का विरोध करते समय रक्षाबंधन त्यौहार को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस त्यौहार का राजनीतिक उपयोग आरंभ किया। कभी कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठत व्यक्ति को भी राखी बांधी जाती है। प्रकृति संरक्षण के लिए वृक्षों को राखी बांधने की परंपरा का भी प्रारंभ हो गया है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  स्वयंसेवक राष्ट्र रक्षा का वृत्त ले कर परस्पर वचनवध्य    होते हैं व समाज में जनजागरण हेतु कार्यक्रम करते हैं ,  भाईचारे के लिए एक दूसरे को  राखी बांधते हैं। इस दिन फोजियों को और कैदियों को भी राखी बाँधी  जाती है .  






येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल:।

तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
रक्षासूत्र बांधते समय सभी आचार्य एक श्लोक का उच्चारण करते हैं,जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यह श्लोक रक्षाबंधन का अभीष्ट मंत्र है। श्लोक में कहा गया है कि जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबन्धन से मैं तुम्हें बांधता हूं जो तुम्हारी रक्षा करेगा।

रक्षिष्ये सर्वतोहं त्वां सानुगं सपरिच्छिदम्।

सदा सन्निहितं वीरं तत्र मां दृक्ष्यते भवान्॥
-श्रीमद्भागवत 8 स्कन्ध 23 अध्याय 33 श्लोक


   स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है। कथा कुछ इस प्रकार है- दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थ्रना की। तब भगवान ने वामन अवतार लेकर ब्राम्हण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा अकाश पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकानाचूर कर देने के कारण यह त्योहार 'बलेव' नाम से भी प्रसिद्ध है। कहते हैं कि जब बाली रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया।    
 
     भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और अपने पति भगवान बलि को अपने साथ ले आयीं।उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। विष्णु पुराण के एक प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भागवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिए फिर से प्राप्त किया था। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

महाभारत में,  पांडवों की पत्‍नी द्रौपदी ने भगवान कृष्‍ण की कलाई से बहते खून (श्री कृष्‍ण ने भूल से खुद को जख्‍मी कर दिया था) को रोकने के लिए अपनी साड़ी का किनारा फाड़ कर बांधा था। इस प्रकार उन दोनो के बीच भाई और बहन का बंधन विकसित हुआ था तथा श्री कृष्‍ण ने उसकी रक्षा करने का वचन दिया था।
महाभारत में द्युत क्रीड़ा के समय युद्धिष्ठिर ने द्रोपदी को दांव पर लगा दिया और दुर्योधन की ओर से मामा शकुनि ने द्रोपदी को जीत लिया। उस समय दुशासन द्रोपदी को बालों से पकड़कर घसीटते हुए सभा में ले आया।वहां मौजूद सभी बड़े दिग्गज मुंह झुकाएं बैठे रह गए। देखते ही देखते दुर्योधन के आदेश पर दुशासन ने पूरी सभा के सामने ही द्रोपदी की साड़ी उतारना शुरू कर दी। सभी मौन थे, पांडव भी द्रोपदी की लाज बचाने में असमर्थ हो गए। तब द्रोपदी द्वारा श्रीकृष्ण का आव्हान किया गया और श्रीकृष्ण ने द्रोपदी की लाज उसकी साड़ी को बहुत लंबी करके बचाई।

सभी प्रकार की देश - धर्म रक्षाओं के प्रति तत्पर रहना होगा ...
कुल मिला कर रक्षा बंधन का त्यौहार सिर्फ बहिन क़ी मान मर्यादा क़ी रक्षा तक ही सीमित नही है , बल्कि व्यापक रक्षा कार्यों के प्रती प्रेरित करता है , जैसे क़ी :- देश की सीमाओं की रक्षा , देश के गोरव की रक्षा , देश के मान-बिन्दुओं की रक्षा , देश के इतिहास की रक्षा , देश की सभ्यता और संस्कृति की रक्षा , देश के समाज की रक्षा आदि के लिए हमेशा ही जागरूक और तत्पर रहना होगा ..!
भारत पर हो रहे वर्त्तमान आक्रमण 
१- आंतरिक सुरक्षा पर आक्रमण 
२- सीमाओं पर निरंतर कुदृष्टि 
३- हिदुओं के आस्था केन्द्रों पर आक्रमण 
४- भारत पर आर्थिक आक्रमण 
५- भारतीयत , उसकी शिक्षा और संस्कृति पर आक्रमण ...आदि !
हमारा दायित्व : हमारा संकल्प  ....
१- हम जाती भेद और छुआ-छूत नहीं मानेंगे ,
२- हम समरसता के भाव को पुष्ठ  करेंगे 
३- स्वधर्म ,स्वसंस्कृति , स्वभाषा एवं स्व-वेशभूषा  का संरक्षण करेंगे 
४- स्वदेशी  वस्तुओं का उपयोग करने में गोरव का अनुभव करेंगे 
५- देश की  अखंडता  की रक्षा करेंगे ,
६- संगठित होकर सभी प्रकार के आक्रमणों से देश की रक्षा करेंगे |
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सोमवार, 23 अगस्त 2010

भारत क़ी बार बार नाक कटवा रहे धोनी


एक क्रिकेट श्रृंखला में दो बार न्यूनतम स्कोर  ....!
- अरविन्द सीसोदिया
  टीम के वरिष्ट खिलाडियों को बाहर बिठा कर , भारत क़ी बार बार नाक कटवा रहे धोनी पर नियन्त्रण किया जाना चाहीये , जहाँ देश का नाम आता हो वहां पर , उच्चतम प्रदशर्न क्षमता की टीम होनी ही चाहिए , त्रिकोणीय  क्रिकेट श्रृंखला का नतीजा कुछ भी हो , मगर एक क्रिकेट श्रृंखला में दो बार न्यूनतम  स्कोर पर आउट होना शर्मनाक है , सबसे बड़ी बात यह है की गेंदों क़ी द्रष्टि से यह सबसे बड़े अंतर की हार है ! 
 रानगिरी दाम्बुला इंटरनेशनल स्टेडियम,दाम्बुला , श्रीलंका विरुद्ध भारत , एकदिवसीय , श्रीलंका 8 विकेट से जीता ,
युवा तेज गेंदबाज तिषारा परेरा ने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 28 रन पर पांच विकेट लेकर नो-बाल के विवाद में उलझे भारतीय शेरों  को 103 रन पर ढेर कर दिया।
   श्रीलंकाई बल्लेबाजों ने फिर ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करते हुए करो या मरो का मुकाबला एकतरफा अंदाज में आठ विकेट से जीतकर त्रिकोणीय एकदिवसीय क्रिकेट श्रृंखला के फाइनल में प्रवेश कर लिया। इस जीत से बोनस सहित पांच अंक मिले और वह कुल 11 अंकों के साथ फाइनल में पहुंच गया।

    इससे पहले भी पहले मैच में भारत न्यूजीलैंड के खिलाफ 88 रन पर आउट होकर 200 रन से हारा था। निश्चित रूप से भारतीय बल्लेबाजों का यह बेहद शर्मनाक प्रदर्शन था ।
सहवाग का शतक पूरा नहीं होने के लिए धोनी भी  जिम्मेवार....
  इससे पहले भी जो मैच भारत जीता था वह बोलरों के कारण ही जीत पाया था , सहवाग उसमें नही जमा होता तो उसमें भी हार के नजदीक पहुच गये होते , सहवाग का शतक पूरा नही हो पाया इसके लिए हम  जोर शोर से श्री लंका के विरुद्ध आबाज उठा रहे हैं , क्या इसके लिए सामने खेल  रहा भारत का खिलाड़ी जिम्मेवार नही है ...! धोनी को अपने कुछ कम रन बना कर यह शतक पूरा करवाना चाहिए था , सचिन  जब  दोहरे शतक के एतिहासिक क्षण के नजदीक था, जो अपने आप में इतिहास था  तब भी धोनी साहब  का रोल गलत था पूरा देश उनकी क्रिकेट नहीं देख रही थी वह सचिन का दोहरा शतक देखना चाहती थी , जो क़ी सचिन क़ी सावधानी से बड़ी मुश्किल से पूरा हुआ था , तब भी धोनी क़ी खलनायिकी सामने आई थी ...! सहवाग का शतक पूरा नहीं होने के लिए धोनी भी उतना ही जिम्मेवार है जितना नो बोल ...!
चार गलत फैसलों के कारण भारत हारा
टीम प्रदर्शन पर भी प्रश्न हैं ...!!
    कहा जा रहा हे क़ी चार गलत फैसलों के कारण भारत हारा , इन चार फैसलों में से तीन स्थानीय अंपायर कुमार धर्मसेना जबकि एक पाकिस्तानी अंपायर असद राउफ ने दिया। सुरेश रैना को जब विकेट के पीछे कैच आउट दिया गया तब कमेंट्री कर रहे भारत के पूर्व टेस्ट खिलाड़ी अरूण लाल ने कहा कि हमें कोई आवाज नहीं सुनाई दी जबकि स्निकोमीटर में भी कुछ नहीं आया।अंपायर के फैसले के बारे में जब संगकारा से मैच के बाद प्रेस कांफ्रेंस में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि अगर टीम सही फैसले चाहती है तो हर मैच में रैफरल प्रणाली का इस्तेमाल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि टेस्ट श्रृंखला और इस श्रृंखला के दौरान रैफरल प्रणाली नहीं है तो मुझे सिर्फ एक ही कारण लगता है, वह यह है कि भारत रैफरल नहीं चाहता था। अगर सब कुछ ठीक रखना है तो तकनीक का इस्तेमाल करो। आईसीसी को डीआरएस को सभी मैचों के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए।
  हालाँकि गलत एक निर्णय ही पूरे मैच क़ी दिशा बदल देता है मगर यह होता ही रहता है , मैच का हिस्सा हे ,
मगर जब टीम खतरे में थी तब बाकीं को संभालना चाहिए था ...! संधिग्धता तो पास ही होती हे | 

हिंदुत्व : चकित कर देतें हैं उपनिषद विश्व को


हिंदुत्व : चकित कर देतें हैं उपनिषद विश्व को
- अरविन्द सीसोदिया

उपनिषद ज्ञान का  संझिप्त परिचय
उपनिषदों का परम लक्ष्य मोक्ष है. जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति को हम काल की अधीनता से मुक्ति भी कह सकते हैं. यह कर्म की अधीनता से मुक्ति भी है. मुक्त आत्मा के कर्म चाहे वे अच्छे हों या बुरे, उस पर कोई प्रभाव नहीं डालते हैं.छान्दोग्योपनिषद् के अनुसार जिस प्रकार जल कमल की पत्ती पर नहीं ठहरता उसी प्रकार कर्म उससे चिपकते नहीं हैं. जिस प्रकार सरकंडे की डंडी आग में भस्म हो जाती है, उसी प्रकार उसके कर्म नष्ट हो जाते हैं. चन्द्रमा जिस प्रकार ग्रहण के बाद पूरा-पूरा बाहर आ जाता है, उसी प्रकार मुक्त आत्मा अपने को मृत्यु के बन्धन से स्वतन्त्र कर लेता है. मुक्ति बन्धन का नाश है और बन्धन अज्ञान की उपज है. अज्ञान ज्ञान से नष्ट होता है कर्मों से नहीं. ज्ञान हमें उस स्थिति पर ले जाता है जहाँ कामना शान्त हो जाती है, जहाँ सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, जहाँ आत्मा ही अकेली कामना होती है. मुक्त आत्मा की वही स्थिति होती है जो कि एक अन्धे की दृष्टि प्राप्त कर लेने पर होती है. जब हम शाश्वत सत्य, ब्रह्म या आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, तो कर्मों का हमारे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. आचार में स्थित होते हुए भी वह धर्म और अधर्म से परे होता है, अन्यत्र धर्मात् अन्यत्राधर्मात् (कठोपनिषद् 1-2-14). जब हम जगत् से अधिक विराट, अधिक गहरी और अधिक मौलिक किसी सत्ता से भिज्ञ हो जाते हैं,तो हम क्षेत्रीयता से ऊपर उठ जाते हैं और पूरे दृश्य को देखने लगते हैं. हमारी आत्मा समस्त जगत् को व्याप्त कर लेती है. अनन्त को जान लेने से हम ईश्वर, जगत् और जीव के सच्चे स्वरूप को समझ लेते हैं वस्तुत: आध्यात्मिक ज्ञान जगत् को नहीं मिटाता है बल्कि उसके सम्बन्ध में हमारे अज्ञान को मिटा देता है.
 ( उपरोक्त संझिप्त परिचय  श्री सुशील कुमार रचित गौरवशाली भारत  पुस्‍तक से उद्धृत  है.....  )



गैर हिन्दू और विदेसी विचारकों  के विचार .......

सन १७५७ में बंगाल  के नबाब शुजाउद्दोला  के दरबार में मिस्टर जटियल नामक एक फ्रांसीसी, राजदूत बन कर आया था | उसने किसी से फारसी भाषा में उपनिषदों को सुना , वे उसे इतने प्रभावित कर गये क़ी उसने फारसी भाषा में अनुवादित  खरीदे और फ़्रांस ले गया | वहां उन्हें बर्नियर नामक विद्वान  ने पढ़े , उन पर जादू सा असर गूढ़ विद्या का हुआ| उसने इन उपनिषदों का कुछ भाग पैरिस के बड़े पादरी  डूपारना   को सुनाया , वह सुन कर इतना अभिभूत हुआ क़ी उसने निश्चय किया क़ी मूल संस्कृत  भाषा में लिखे उपनिषदों को पढूंगा |
वह भारत आया, १४ वर्ष तक संस्कृत  सीखी , इसके पश्चात उपनिषदों को पढ़ा | १८०१ में फ्रेंच  भाषा में अनुवाद किया | बहुत से लोगों ने इसे फ़्रांस में पढ़ा |  
   १८१२ में जब जर्मनी के महान  दार्शनिक शोपनाहर ने इन्हें पढ़े ,  तो वे चकित होकर लिखते हैं " यधपि संस्कृत को समझाना कठिन है और हमारे पास वे साधन नहीं जिनसे ठीक रूप में हम संस्कृत के रहस्यों को समझ सकें | तो भी जहाँ तक हमने खोज की है उपनिषदों के प्रत्येक भाग में गंभीर विचार और उच्च भावनाएं विधमान हैं |
   उपनिषदों का प्रत्येक उपदेश बहुत महत्वपूर्ण विचारों और बहुत उंची तथा सच्ची भावनाओं  से भरपूर है, इस समय भारत का वायुमंडल हमारे आसपास घूम रहा है | "
  " कितने महा पुरुषों के पवित्र और ऊँचे विचार हमारे अन्दर प्रविष्ट हो रहे हैं , संसार में किसी भी पुस्तक का स्वाध्याय इतना लाभ देने  वाला और आत्मा को ऊपर उठानेवाला नहीं है , जितना उपनिषदों का है | मेरी आत्मा को उपनिषदों से ही शांति मिली है और मरने  के पश्चात् भी इन्ही से शांती मिलेगी | "
 शोपन हावर ने कई जगह यह भी कहा क़ी ' भारत में हमारे धर्म कई जड़ें कभी नही जमेंगी ,मानव जाती क़ी "पुरानी प्रज्ञा" गैलीलियो की घटनाओं से कभी निराकृत  नहीं होगी |   वरन भारतीय प्रज्ञा की धारा यूरोप में प्रवाहित होगी एवं हमारे ज्ञान और विचारों में आमूल परिवर्तन ला देगी | ' 
  मैक्समूलर जर्मनी से फ़्रांस के पेरिस  मैं उपनिषद पढने जा पहुचा, फ्रांसीसी भाषा में उपनिषदों को पढ़ा , फारसी भाषा में भी पढ़ा , तब उसने वे झिझक कहा " ये उपनिषद उन लोगों की बुद्धी का फल है जो महानबुद्धी   वाले थे , हमारा ईसाई मत उनके आगे कभी जड़ नही पकड़ सकता | भारत की यह विद्या यूरोप भर में बह निकलेगी और हमारे ज्ञान तथा विचारों में परिवर्तन लायेगी |    " 
  मैक्समूलर ने अपनी पुस्तक " India what can it teach us " यदि वास्तविकता को जानने का उदेश्य यह है क़ी मनुष्य मृत्यु  के भय से बच जाय और मृत्यु के लिए तैयार हो जाये तो मेरी सम्मति में  उपनिषदों के वेदांत का अध्यन करने के अतिरिक्त दूसरा कोई भी श्रेष्ठमार्ग नही है | में उपनिषदों का बहुत कर्जदार  हूँ क़ी उसने मुझे अपने जीवन सुधार में बहुत  सहायता मिली | ये उपनिषद-ग्रन्थ सारे संसार के धार्मिक साहित्य में आत्मिक उन्नति  के लिए, सदा एक बहुत  उच्च  और समादरणीय   स्थान घेरे रहें और सदा घेरे रहेगें  | "
   स्वीडन के विद्वान पाल ड्युसन ने उपनिषदों के बारे  में लिखा  है "  उपनिषद मनुष्यों की मेधा बुद्धी  का अनमोल फल है , जीवन और मृत्यु के समय , केवल दुःख और कष्ट के  समय हि नहीं अपितु हर समय, प्रतिक्षण उनसे ऐसी शांति मिलती है | जैसी और कहीं भी नहीं मिलती | भारत के लोगों के पास आत्मज्ञान और आत्म शान्ति का ऐसा रास्ता / कोष है जो संसार में और किसी के पास भी नही है | "
  मिस्टर ह्युम लिखते हैं , " dogmas or budhism " में "  मैंने अरस्तु , सुकरात, अफलातून और कितने ही अन्य विद्वानों के ग्रन्थ बहुत ध्यान से पढ़े हैं , परन्तु जैसी विद्या इन उपनिषदों में मेने देखी और जितनी शांती उनसे पाई, वैसी तो और किसी भी स्थान पर मुझे नहीं मिली|" 
  जी  आर्क  एम् ए ने एक पुस्तक " is god knowoble" में लिखा है  "  उपनिषदों के ज्ञान ने सिद्ध कर दिया है की मनुष्य  आत्मिक और सामाजिक आवश्यकताएं  किस प्रकार पूर्ण  हो सकती हैं | वेदांत अर्थार्त उपनिषदों की शिक्षा अत्यंत ऊँची सुन्दर और ऐसे सत्य से भरपूर  है , जो मनुष्य के ह्रदय पर चित्रित हो जाता है , क्यों क़ी जब मनुष्य संसार के दुःखों और चिंताओं  से घिर जाता है , तब इनके अतिरिक्त उसके मन   और आत्मा को शांती देने के लिए दूसरा कोई साधन उसे नहीं मिलता, जो उसे सहारा दे सके |"
- १६४० ई . में दारा शिकोह कश्मीर में था , तब उसका ध्यान उपनिषदों के बारे में आकृष्ट  किया गया , तब उसने काशी से पंडितों को बुलवाया और करीब ५० उपनिषदों का अनुवाद फारषी  भाषा में करवाया , यह कार्य १६५७ ई . में पूरा हुआ , किन्तु १६५९ में दारा शिकोह को ओरंगजेब ने मार डाला, मगर उन अनुवादित प्रतियों की कई नकलें हुई , वे हि कालान्तर में फ़्रांस पहुची और वहां से सम्पूर्ण पाश्चात्य जगत में फैल गई .         
 दारा शिकोह— 'मैने क़ुरान, तौरेत, इञ्जील, जुबर आदि ग्रन्थ पढ़े। उनमें ईश्वर सम्बन्धी जो वर्णन है, उनसे मन की प्यास नहीं बुझी। तब हिन्दुओं की ईश्वरीय पुस्तकें पढ़ीं। इनमें से उपनिषदों का ज्ञान ऐसा है, जिससे आत्मा को शाश्वत शान्ति तथा आनन्द की प्राप्ति होती है। हज़रत नबी ने भी एक आयत में इन्हीं प्राचीन रहस्यमय पुस्तकों के सम्बन्ध में संकेत किया है।

       

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

भारत का अपमान


शत्रु राष्ट्र को मदद की क्या तुक ...!
- अरविन्द सीसोदिया
      बाढ आपदा से जूझ रहा पाकिस्तान अब भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। गुरूवार ( १९-०८-१० ) को उसके विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि कश्मीरी आत्मनिर्णय के अघिकार को हासिल करने के लिए कृतसंकल्प हैं और नई दिल्ली को चाहिए कि वह भविष्य की स्थिति को समझे। उन्होंने कहा कि कश्मीरी लक्ष्य के लिए अंतिम बलिदान की इच्छा रखते हैं तो उन्हें उनके मकसद को हासिल करने से नहीं रोका जा सकता।
     उकसाने वाली टिप्पणी करते हुए प्रवक्ता ने कहा कि कश्मीर के लोग आत्मनिर्णय का अधिकार पाने के लिए संकल्पित हैं, फिर भले ही भारतीय सुरक्षा बल उनके संघर्ष को क्रूरता से दबाने का प्रयास कर रहे हैं। प्रवक्ता ने कहा कि भारत को अब दीवार पर लिखी इबारत को समझ लेना चाहिए। बासित के मुताबिक, पाकिस्तान की सरकार और अवाम कश्मीर के लोगों के ‘संघर्ष’ को कूटनीतिक और नैतिक समर्थन देते रहेंगे। भारत के साथ संबंधों को लेकर पाकिस्तान ने एक बार फिर पुराना रवैया दिखाया है। दोनों देशों की वार्ता बहाली के लिए नई दिल्ली की सभी शर्तो को उसने नामंजूर कर दिया है। पाकिस्तान ने  कहा कि वार्ता की बहाली के लिए उसकी सरजमीं से होने वाली आतंकवादी गतिविधि पर कार्रवाई की भारत की मांग समेत कोई भी शर्त उसे मंजूर नहीं है। इसके साथ उसने वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए गेंद अब भारत के पाले में होने का दावा किया है।
     पाकिस्तान के इन शब्दों के बाद भी हम उसे सहायता देने  के लिए पीछे-पीछे फिर रहे है...... , कश्मीर में आत्मनिर्णय की बात पाकिस्तान करता है तो हमें सिंध में आत्म निर्णय  की बात क्यों नही करनी  चाहिए....? सारी दुनिया में वे भीख मांग रहे हैं और हमसे हेकड़ी दिखा रहे हैं तो हमारी कोंन सी मजबूरी है ..?? हम जानते  हैं की पाकिस्तान मदद की राशी का दुरुपयोग करेगा ! फिरभी देशवाशियों के कड़े पशीने  की मेहनत  क्यों दी जा रही है | हमारे यहाँ भी बहु बड़ी सख्या गरीवों की है, उन्हें दे दीजिये ...!! वह भारत का अपमान कर रहा है  और हम पीछे पीछे ..!!  पाकिस्तान के चार प्रान्त हैं , बलूचिस्तान,उत्तर पश्चिम सीमांत प्रान्त,पाकिस्तानी पंजाब, सिन्ध |      पाकिस्तान की गिरगिट की तरह रंग बदलने की फितरत पुरानी है। अभी पिछले कुछ सप्ताह पहले  ही विदेश मंत्री स्तरीय वार्ता के लिए इस्लामाबाद गये विदेश मंत्री एसएम कृष्णा की यात्रा की भारतीय नेकनीयति को पलीता लगाने के बाद, उन्हें अपमानित करने के बाद  अब फिर पाकिस्तानी हुक्मरान अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से कह रहे थे  कि पाकिस्तान तो भारत के साथ सभी विवादास्पद मुद्दों पर संवाद और संबंध सुधार के लिए प्रतिबद्ध है। और अब उनकी टोन फिरसे सामने है ..?
 चारों के अलग अलग अहम् हैं , इन्हें भारत भी उठा  सकता है , हवा दे सकता है ,यह आग सुल्गानी भी चाहिए थी  ? जैसे को तैसा का सिधांत सब जगह चलता है  |

    वाशिंगटन,भारत के मदद के प्रस्ताव को स्वीकार करने पर पाकिस्तानी नानुकुर के बीच अमरीकी ओबामा प्रशासन ने आपदा राहत में सियासत की कोई भूमिका नहीं होने पर जोर देते हुए कहा है कि पाकिस्तान को भारत द्वारा पेश की गई 50 लाख डॉलर की सहायता को मंजूर कर लेना चाहिए। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता पीजे क्राउले ने कहा, आपदा को लेकर राजनीति की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए, यह सही नहीं है।
   कुल मिला कर भारत की वर्तमान सरकार देश के अन्दर तो सभी मामलों में फैल हो गई है , मगर यह बाहर नाक कटाए यह ठीक नही है ! फिर उस कम में जिससे देश को नुकसान होना निश्चित हो ..!

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

किसानों की भूमि अधिग्रहण

कानून में व्यवहारीक बदलाव की जरूरत है
- अरविन्द सीसोदिया
  जो करोड़पति और खरबपति  घराने वोट भी नही डालते  वे देश की संसद और सरकारों को अपनी जेब में रखने की ताकत रखते हैं , बहुराष्ट्रीय संस्थान   तो देश के बजट से कई गुणा अपना बजट रखते हैं , वे राजनीती में चल रही धन बनाओ मैराथन का फायदा उठा रहे हैं | राजनेता जो पहलीवार  भी जीता है वह अपनी सातसो (७००)   पीढ़ियों का इंतजाम कर जाना चाहता  हैं . इसी कमजोरी के कारण पूरी दुनिया  की कंपनियां भारत पर हावी हैं | हर बड़े प्रोजेक्ट के पीछे कोई ना कोई पार्टी , नेता होता है , वह नीति और कानून  भी बदल वाने में तक अपनी ताकत छोंक  देता है |  जब हमारा राजतन्त्र जो समस्त अन्य तंत्रों का  नियंत्रक है , वही भ्रष्ट है तो ईमानदारी कहाँ तलाशेंगे| जब ईमानदार राजनीती नही होगी तो आम और गरीव , जिस पर देनें कुछ भी नही है , उसके पक्ष में नीतियाँ कैसे बनेंगी ? मुछे नहीं लगता की किसानों के हित में वास्तविक लाभकारी कोई कानून बन पायेगा !!  

 किसानों की भूमि अधिग्रहण को लेकर होने वाले विवादों की असली वजह, राजनैतिक दलों का  पूंजीवाद के प्रती अनन्य भक्तीभाव  है इसमें कांग्रेस सहित सभी दल हैं, साम्यवादी भी  है। वर्तमान में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार इस लिए जिम्मेवार है कि उसके समय में ही कई बड़े प्रकरण सामने आने पर भी वह  अंग्रेजों के जमाने के कानून- भूमि अध्याप्ति अधिनियम 1894 के आधार पर ही जमीनों का अधिग्रहण कर रही है या करवा रही है । जबकी जनसंख्यावृधी  और ओसत   भूमि  का प्रति व्यक्ती कमी के बदलते हुए परिवेश में, केंद्र सरकार को चाहिए था कि वह भूमि अध्याप्ति अधिनियम में ऐसे संशोधन करती है, जिसमें किसानों का हित सुरक्षित होता और सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए भूमि अधिग्रहण की आवश्यकताओं की पूर्ति भी होती।
      अब कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार की सामान्यतः नीतियों का निर्धारण अमरीकी पूंजीवादी शैली की तरह होता है या यों कहे की उनके विचार से, उनके हित के लिए होता है | इसी कारण मूल समस्या कि अनदेखी का खमियाजा पूरे देश के किसानों को भुगतना पड़ रहा है। किसानों के हितों की अनदेखी करते हुए विशेष आर्थिक परिक्षेत्र के लिए 2005 में एक नया कानून लागू कर दिया गया, जिसके तहत देश भर में किसानों की हजारों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि ले ली गई, जिसका उचित मुआवजा भी किसानों को नहीं मिला। ज्यादातर विशेष आर्थिक क्षेत्र जिन  राज्यों में बने हैं, विवादग्रस्त रहे हैं | इससे सन्देश जाता  है कि  पार्टियां औद्योगिक घरानों के हित में कार्य करती हैं। बाबा रामदेव कहते हैं कि राज्यों से केंद्रीय कार्यालय चोथ वसूली करते हैं |

     सर्वोच्च प्राथमिकता यह है कि किसानों की जमीन को आपसी सहमति से करार नियमावली के तहत उचित मुआवजा देने के बाद ही ली जाये। सरकारों के लिए भी यह शर्म की बात होगी कि , किसानों की जमीन को सस्ती दरों पर लेकर कोई उद्योगपति मुनाफा कमाये। लेकीन उद्योगपति तो सरकार के विभाग चला रहे हैं | एकवार जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी  संभालने जा रहे थे तब उनके कारवें में , अति संपन्न फिल्मी हथियान और अति संपन्न  औद्योगिक घरानों की बारात निकली थी | जिस देश की संसद में प्रचंड बहुमत  करोडपतियों का हो वहां कोई गरीव और आम की सुनाने वाला होगा यह एक स्वपन ही है |

- यह सच है कि  कई दशकों से भूमि अधिग्रहण और विस्थापन का जो सिलसिला चल रहा था, उसमें ‘सेज’ एक नवीनतम कड़ी है। सेज के नाम पर पूरे देश में लाखों एकड़ जमीन किसानों से हड़पने की योजना चल है। ये जमीनें किसी सार्वजनिक हित के लिए नहीं बल्कि अमीरों की जागीर बनाने के लिए ली जा रही हैं।
 - प्रणव मुखर्जी ने कहा कि सरकार ने कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता में मंत्री समूह का गठन किया है और इस पर एक व्यापक विधेयक जल्द लाया जाएगा। अलीगढ़-मथुरा क्षेत्र में आंदोलन कर रहे किसानों पर पुलिस फायरिंग पर लोकसभा सदन में सभी दलों ने गहरी चिंता व्यक्त की और प्रश्नकाल स्थगित कर उस पर चर्चा हुई।
कानून में व्यवहारीक बदलाव की जरूरत है :-
१. वन कानून के कारण विकास को कई समस्याएं हैं,उसमें व्यावहारिक संसोधन होनें चाहिए | जिस वन भूमि में कभी भी वन नही लग सकते , उसे वनभूमी  मान  कर हम देश को धोका क्यों ने रहे हैं ? उसका उपयोग हम नई बस्तियों और उद्योगीकरण में कर सकते हैं | व्यवहारिका सोच में क्या दिक्कत है | 
२.उधोग  और अन्य गैर कृषी कार्यों के लिए जितनी भूमि  वास्तव में चाहिए , उससे कई गुणा भूमि हम क्यों देते हैं ? अब समय  आगया है कि हम पहले यह तय करें कि वास्तव में कितनी भूमि चाहिए , उतनी ही दें ..., कारण यह भी है की जब भूमि कि उपलब्धता सीमित है तो , सात पीड़ियों तक के लिए क्यों भूमि दे !!
३. हम उधोगीकरण  की नक़ल क्यों कर रहे हैं , हम तय करें कि हमें वास्तव में कितना और किस तरह का उधोगीकरण करना  है | बिना जरूरी उधोगीकरण को किसानों क़ी जमीन देनें की क्या तुक | 
४. अधिग्रहण नीति में भी भारी बदलाव की जरूरत है , सिर्फ वह व्यक्ति क्यों प्रभावित हो जो भूमि मालिक है , वे भी प्रभावित होने चाहिए जिन्हें उस विकास से लाभ मिल रहा है ! में कोई अधिग्रहण करता तो १०० हेक्टर  की जरूरत पर १०००  हेक्टर का अधिग्रहण करता और उस में से १०० हेक्टर काम में ले कर, शेष  ९०० हेक्टर उन १००० हेक्टर के धारकों  में बाट देता और मुआबजा भी देता , ताकी कुछ  ही पीड़ित ना हों ज़यादा में दर्द बाट कर, दर्द को हल्का किया जाये | 
 अर्थात यह स्पष्टतः सोचा जाना चाहिए क़ी भूमि कम है , उपलध नही है , खाने को अनाज भी चाहिए , इन परी स्थितियों  के बीच क्या ठीक है और क्या ठीक नही है |         

बुधवार, 18 अगस्त 2010

करूण कहानी विभाजन

बनाओ अखंड  भारती .....!
















- अरविन्द सीसोदिया
करुण  कहानी विभाजन की, हे वीरों तुम्हे  पुकारती ,
जाग उठो अब - जाग उठो अब, बनाओ अखंड भारती ,
चीख रही थी तब मानवता, पर चिंघाड़  रही  थी  दानवी ,
खून से लथपथ  वे मंजर,कंप-कप़ी आज भी छुडाते हैं ,
स्वतन्त्रता की वेदी  पर,  तब नरमूंडों से हुई थी  आरती!!
-----१-----




पंजाब बटा,बंगाल बटा  , सिंध गया, बलूच गया,
भारत माँ  को काट दिया, बेदर्दी से हत्यारों ने,
रावी की शपथ मौन  थी, अखंडता का वचन गोण   था,
सोच समझ का समय नहीं  , भागो-भागो मची देश  में,
-----२-----

 गैर रहे न बचें , इस शैतानीं  में , पाक में नपाक हेवानीं  थी ,
घरों पर हमले हुए, जिन्दा जलाये , क़त्ल हुए ,
भूखे - प्यासे राहों में भटके, खूब थके और खूब मरे ,
व्यवस्थित कोई बात न थी, अदला - बदली की सोगात न थी,
न राह दिखानेवाला, न कोई बचानेवाला,
गुंडों की गुंडागर्दी ही तब राज बनीं थी, ताज बनीं थी ,
-----३-----











माता बहिनों की मत पूछो, क्या - क्या उन पर जुल्म हुए,
लाज  गई, वेलाज  हुईं, तार तार शर्मसार हुईं ,
 कितनीं थीं वे जो आ पाईं , कितनीं थी वे जो नहीं आ पाईं ,
किसीने भी नहीं उनकी सूधली  , एक तरफ़ा व्यभिचार के मद में ,
हर साँस और सिसकी को ,उस समय चक्र ने घेरा था  ,
बेबस  चीखें, आज भी गूंजती हैं, नीरव श्मसानों  में ,
-----४-----








दर्द था पर राहत नहीं थी, घाव था पर पट्टी नही थी ,
राह थी पर अंत नही था, पथ पर चलते जाना था... ,
कब भारतमाँ का आँचल मिले, हर  सांस इसी में विकल थी ,
कुछ आये,कुछ राह में रह गए,कुछ को चलने दिया नहीं,
वे दृश्य  वे मंजर , वे चीत्कारें , फिरसे दुनिया में न आयें ,
बार बार मानवता यह पुकारती ,
-----५-----











यह भीषण कथानक है , जो सुनाने में नहीं आता है ,
गाँव - गावं ख़तम हुए थे, शहर - शहर वीरान हुए थे ,
सोना चांदी रुपया पैसा, जमीन और जायदादें....,
लूट  सकता था वह सब लूट लिया शैतानों नें  ,
खून से लिखी इबारतें वे , छलकी आखें पढ़ नही पाती हैं ,
-----६-----












कहीं दया का दरिया नही था, ममता कहीं  मिलती नहीं थी ,
सब को अपना माने  ..., वह आंचल वह गिरेवान नहीं थे ,
 एक भारत भूमि  जिसने,सब को सदियों से अपना माना ,
अपना दामन  दिया सभी को , अपनीं गोदी  दी सबको ,
सबको अपनापन दिया , सबको सुख शांती दी ,
पर उसके बेटों को दुत्कार क्यूँ फटकार क्यूँ ...?
हर  मुल्क बने भारत जैसा , यही विश्व  भारती पुकारती |
-----७-----








न फूल चढ़े और न दीप जले, न उनकी कोई कहानीं है,
हे अनाम शहीदों, तुमने खूब लड़ी लडाई  और दी कुर्बानी है ,
नत मस्तक है माँ भारती , गर्व करती माँ भारती ,
नाज तुम पर सदा रहेगा,  तुम हो नव युग कि आरती ,
माफ़ करो हे वीरों , खण्डित हे माँ भारती ..!!
देश आजाद हुआ है लेकिन, अखंडता  लानी है बाक़ी ....  |
-----८-----

फिर कोई राणा प्रताप बनों , या बनों वीर शिवाजी ,
सुभाष , भगत सिंह , चंदशेखर , माता तुमें बुलाती ,
षड्यंत्रों नें हमको मारा , कमजोरी से देश है  हारा ,
आपसी फूट मिटाना होगा, दिल में जनून जगाना होगा ,
बंद  मुट्ठी करके लें द्रढ़ संकल्प, राह बनायेंगे , चाह  बनायेंगे ,
विभाजन को  ख़त्म करेंगे, अखंड भारत फिर बनायेंगे ..!
   -----९-----  


रविवार, 15 अगस्त 2010

अखंड भारत कि पहली पायदान

देश का विभाजन तो जाना ही चाहिए
अखंड भारत कि पहली पायदान
- अरविन्द सीसोदिया

यह सच मानना ही होगा कि १४-१५ अगस्त १९४७ को, भारत का विभाजन हुआ और खण्डित भारत के  रूप में हम आजाद हुए | यह तिथि " श्री अरविन्द " की जन्म तिथी भी है, वे १५ अगस्त १८७२ में कलकत्ते  में जन्में थे तथा १५ अगस्त १९४७ में भी भारत स्वतंत्रता पर अपनी प्रतिक्रिया देने उपलब्ध  थे | उन्होंने कहा था " भारत स्वाधीन हो गया पर उसने एकता उपलब्ध नहीं की , केवल  एक विभाजित और भग्न स्वाधीनता ही प्राप्त की है | " उन्होंने तब यह भी कहा था " ऐसी आशा की जनीं चाहिए कि कांग्रेस और राष्ट्र इस तय किये गए तथ्य को हमेशा के लिए तय हुए जैसा नहीं मानेंगे अथवा एक अस्थायी कार्य - साधक से ज्यादा और कुछ भी नहीं मानेंगे | " आगे वे चेतावनी देते हुए कहते हैं " यदि यह ( विभाजन ) बना रहता है तो भारत गंभीर रूप से निर्बल , यहाँ तक कि पंगु भी हो सकता है, गृह संघर्ष की संभावना सदा बनी  रहे सकती है | यहाँ तक कि एक नया आक्रमण और विदेशी विजय भी संभव हो सकती है | देश का  विभाजन तो जाना ही चाहिए |  " श्री अरविन्द कि भविष्यवाणीं  सत्य सावित हुई , पाकिस्तानी फोजों नें कवाईलीवेष में अक्टूवर १९४७ में भारत पर हमला बोल दिया और बहुत बड़ा भू भाग उसके कब्जे में आज तक है , १९६२ में चीन का आक्रमण हुआ और हम हारे | नक्सलवादी और आतंकवादी हमले यह बता रहे हैं , आतंरिक गृह  युध आ रहा है | उनकी तीनों बातें सत्य हो रहीं हें , मगर भारत सरकार ध्यान देने को तैयार ही नही है | 
यहाँ पंडित प्रदीप की यह पंत्तियां प्रासंगिक हैं -      
पासे सभी उलट गए दुश्मन की चाल के |
अक्षर सभी पलट गए भारत के भाल के |
मंजिल पे आया मुल्क हर बला को टाल के |
सदियों के बाद फ़िर उड़े बादल गुलाल के |
हम लाये हैं तूफ़ान से किश्ती निकाल के |
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के |
 - यह  समय कोई आलोचना का नहीं है एक देश भक्त के बहुत थोड़े विचार बहुत अधिक कह देते हैं , पाकिस्तान से आये शरणार्थियों में से एक सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता  मनोज कुमार भी हैं , वे  उन चंद हज़ार लोगों में से थे  जिन्होंने जवाहर लाल नेहरू को स्वतंत्र भारत का पहली वार , लाल किले पर झंडा फ़हराते देखा था, तब वे १० साल की उम्र के थे तथा देहली में शरणार्थियों के लिए बने एक कैंप में रहते थे,उन पर इस समारोह कि इतना गहरा आसर हुआ की जैसे ही उन्हें अवसर मिला उन्होंने कई देश भक्ति फ़िल्में बनानी , उनका नाम ही  मनोजकुमार से ‘भारतकुमार’ हो गया था | उन्होना आजादी के संदर्भ में विचार व्यक्त करते हुए कहा है  "ये जोश शायद ही अब कहीं बचा हो. आज़ादी एक पवित्र चीज़ है जो बड़ी कुर्बानियों के बाद हमें मिली.लेकिन हमारी हुकूमत ने उसकी क़द्र नहीं की. उन्होंने कद्र नहीं की  तो आवाम़ ने भी नहीं की.मुझे जब भी मौका मिला फ़िल्मों के ज़रिए मैंने लोगों में ये जोश भरने की कोशिश की | " कुल मिला का देश को  भारत बनाने वाले शासक नही मिले...!! एनिया की भटकन ने देश का बेडा गर्क कर दल ...!!! प्रधानमंत्री को ग्रोथ देखनी है तो गरीवी की ग्रोथ देखें ...!!!

आराम की तुम भूल-भुलैया में न भूलो |
सपनों के हिंडोलों में मगन हो के न झूलो |
अब वक़्त आ गया मेरे हंसते हुए फूलों |
उठो छलांग मार के आकाश को छू लो |
तुम गाड़ दो गगन में तिरंगा उछाल के |
इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के |
 भारत कोई दिन - दो दिन  का देश नही है, यह देशों से भी ऊपर जो संस्कृति  होती है वह है   तथा संस्कृति को भी अनेकों वार जन्म  देने के  सामर्थ्य से पूर्ण मानव सभ्यता की उदघाटित करने वाली भारत माता  है, जनक है | सागर भी कितना ही टूटे , घुटे घुटे फिर भी रहता है , इसलिए भारत हमेशा था , हमेशा ही रहा और हमेशा ही रहेगा..! मगर हमारी  जागरूकता से | आदिकाल से हमने विश्व को नेतृत्व  दिया है आगे भी हम  ही नेतृत्व देने वाले हैं , विश्व में सुख , शांती से वैभव के  सूत्र हमारे ही यहाँ है, जो शांती के साथ जीवन देता है | समय कालीन अंधकार कोई पहली वार नहीं हैं , इस तरह के अनेकानेक  अवसर आये और परास्त भी हुए, जिस सांस्कृतिक धारा से हमनें भीषणतम दुर्दिनों को पराजित किया है , उसको   तेजस्वी बनाये रखना ही हमारा प्रथम उद्देश्य होना चाहिए |
अभी अपूण है .....
   

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

भूलें नही विभाजन को ...!!


जानवरों की तरह काट दिया देश को
- अरविन्द सीसोदिया
   भारत का विभाजन जिस  गैर जिम्मेवारी से किया गया है, वह दिखाता है की , अंग्रेज कितना खुद गर्ज होता है . उनकी करूणा , दया और सेवा के क्या मायनें हैं . जैसे जानवर को शिकार करते वक्त दया नही की जाती , उसी तरह   ब्रिटिश वाइसराय लुइस माउंटबैटन नें कोई भी दया का भाव नही दिखाया , जिम्मेवारी का परिचय नहीं  दिया और एक अहंकार पूर्ण निर्णय भारत पर थोप  दिया . जिस की बली वेदी  पर लाखों लोगों की जान चढ़ गई , करोड़ों लोगन के घर - बेघर हो गये ,सच यह है की यह विभाजन टाला जाना चाहिए था , मगर सही ढंग से प्रयास किसीने किया ही नहीं . विभाजन स्वीकार नहीं करने की हिम्मत यदी भारत के नेता कर लेते  तो देश का ना विभाजन होता और ना ही आज  जो परेशानिया हैं वे होती . हमारे देश को जिस तरह से बांटा  गया है ,उसका आत्म मंथन करके , देश फिरसे एक कैसे हो इस और ध्यान देना चाहिए . जब तक हम इस आपराधिक विभाजन  को समाप्त नही कर देते तब तक चैने  नही लेंगे , इस तरह का व्रत लेना चाहिए . आज की परिस्थितियाँ भविष्य नहीं हैं , भविष्य का राज आज पत्ता  नहीं है , आशा और विश्वास पर उम्मीदें हमेशा  ही पूरी होतीं हैं .    

आधी रात की संतान ...!
  1947 में जब ब्रिटिश भारत को स्वतंत्रता मिली तो साथ ही भारत का विभाजन करके 14 अगस्त को पाकिस्तानी डोमिनियन (बाद में इस्लामी जम्हूरिया ए पाकिस्तान) और 15 अगस्त को भारतीय यूनियन (बाद में भारत गणराज्य) की संस्थापना की गई। इस घटनाक्रम में मुख्यतः ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रांत को पूर्वी पाकिस्तान और भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में बाँट दिया गया और इसी तरह ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत को पश्चिमी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत और भारत के पंजाब राज्य में बाँट दिया गया। इसी दौरान ब्रिटिश भारत में से सीलोन (अब श्रीलंका) और बर्मा (अब म्यांमार) को भी अलग किया गया, लेकिन इसे भारत के विभाजन में नहीं शामिल किया जाता है। नेपाल और भूटान इस दौरान भी स्वतंत्र राज्य थे और इस बंटवारे से प्रभावित नहीं हुए।
  15 अगस्त 1947 की आधी रात को भारत और पाकिस्तान कानूनी तौर पर दो स्वतंत्र राष्ट्र बने। लेकिन पाकिस्तान की सत्ता परिवर्तन की रस्में 14 अगस्त को कराची में की गईं ताकि आखिरी ब्रिटिश वाइसराय लुइस माउंटबैटन कराची और नई दिल्ली दोनों जगह की रस्मों में हिस्सा ले सके। इसलिए पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त और भारत में 15 अगस्त को मनाया जाता है।
   भारत के विभाजन से करोड़ों लोग प्रभावित हुए। विभाजन के दौरान हुई हिंसा में करीब 5 लाख लोग मारे गए और करीब 1.45 करोड़ शरणार्थियों ने अपना घर-बार छोड़कर बहुमत संप्रदाय वाले देश में शरण ली।
- सीमा रेखाएं तय होने के बाद लगभग 1.45 करोड़ लोगों ने हिंसा के डर से सीमा पार करके बहुमत संप्रदाय के देश में शरण ली, 1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू / सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए। इसमें से 78 प्रतिशत स्थानांतरण पश्चिम में, मुख्यतया पंजाब में हुआ।
- मुस्लिम लीग ने अगस्त 1946 में डायरेक्ट ऐक्शन डे मनाया, जिस के दौरान कलकत्ता में दंगे हुए और करीब 5000 लोग मारे गये और बहुत से घायल हुए। ऐसे माहौल में सभी नेताओं पर दबाव पड़ने लगा कि वे विभाजन को स्वीकार करें ताकि देश पूरी तरह युद्ध की स्थिति में न आ जाए।

  हालांकी विभाजन के बाद इग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल ने  माउंटबेटन  से कहा था 'तुमने 20 लाख भारतीयों को मार डाला।' मुझे लगता है की सही संख्या बीस लाख से भी ज्यादा होनी चाहिए, लाखों येसे थे जो मर गए और उनकी बात कहने वाला  कोई नही रहा था.   मुस्लिम हिंसा को जिनने करीब से देखा है वही जनता है कि ये  निहत्थों पर कितने क्रूर होते हैं . यहां एक तथ्य और सामने है जो दर्शाता है की ब्रिटिश गवर्मेंट के लिए हिन्दुस्तानियों की कीमत  किसी  जानवर से ज्यादा  नही थी  कि ब्रिटिश शासन की गलती से 1942-44 के अकाल में ही बीस से तीस लाख लोग मारे गए थे। तब भी इनका दिल नहीं पसीजा था . अन्याय , अधर्म और अत्याचार का भिभत्स चेहरा ही अंग्रेजों की असलियत है .  
      माउंटबेटन कहते हैं, 'मुझे यकीन था कि अगर हम धीरे-धीरे चलते तो दिल्ली में सब कुछ ध्वस्त हो जाता। तब क्या होता? मैं चाहता तो धारा 93 के अंतर्गत पूरे भारत का शासन सीधे अपने हाथ में ले सकता था।मैंने जल्दबाजी इसलिए की क्योंकि स्थिति बहुत बिगड़ने लगी थी। यह बात भी गलत है पाकिस्तान की मांग तो बहुत पहले से चल रही थी , समय थोडा और गुजरता तो जिन्ना  ही मर जाता .

   प्रश्न यह भी है कि जो जिन्ना खिलाफत आंदोलन और एक प्रकार से मुस्लिम राजनीति के विरोधी थे, वे अचानक मुस्लिम राजनीति क्यों करने लगे? महात्मा गांधी ने एक प्रखर राष्ट्रवादी और सेकुलर राजनीति करने वाले जिन्ना की बजाय मुस्लिम साम्प्रदायिकता  करने वाले मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली को क्यों महत्व दिया? कहते हैं कि इतिहास क्रूर होता है। जिन्ना के पुनर्मूल्यांकन करने या जिन्ना पर बहस करने से इतिहास के कई क्रूर सत्य सामने आ सकते हैं, जिनसे भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अनेक उलझनें सुलझ सकती हैं तो अनेक सीधी-सरल लगने वाली चीजें उलझ भी सकती हैं। मगर यह सही तथ्य है की जिन्ना को परिणाम पाने की सही समझ थी , उसने अकेले दम पाकिस्तान बना लिया और हम बहुत सारे हो कर भी हाथ मलते रह गये ....!

स्वतन्त्रता दिवस भी उनकी खुशी का ....,
- लार्ड माऊंट बैटन ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हुई पेसिफिक लड़ाई में साऊथ ईस्ट एशिया कमांड के सुप्रीम कमांडर के नाते १५ अगस्त १९४५ के दिन जापान का औपचारिक समर्पण स्वीकार किया था। वे इस दिन को अपने लिए शुभ या विजय का दिन मानते थे। इसी जल्दी में उन्होंने सर रेडक्लिफ को भी जून के पहले हफ्ते में भारत बुला लिया। उन्होंने विभाजन की जो रूप रेखा तैयार की उस से कोई भी भारतीय नेता सहमत नहीं हो सकता था।सर  रेडक्लिफ ने इस काम को किया ज़रूर लेकिन उन के मन में भी एक अलग तरह का भय था। आने से पहले उन्हें इस काम की गंभीरता या विशालता का कोई अनुमान नहीं था। आने के बाद काम की जटिलता को देख कर वे इस भार से जल्दी से जल्दी मुक्ति चाहते थे।इस से पहले उन ने कभी भारत को देखा भी नहीं था। इस लिए जैसा उन की समझ में आया, वैसा नक्शों के आधार पर विभाजन उन्होंने कर के रख दिया।अपनी रिपोर्ट उन ने १४ अगस्त को शाम के समय लार्ड माऊंटबैटन को सौपी और १५ अगस्त की सुबह सुबह वे हवाई जहाज़ पकड़ कर लन्दन चले गए। उन ने स्वतंत्रता समारोह में भी भाग लेना ठीक नहीं समझा।वकील होने के नाते वे यह जानते थे और इस बात को उन ने कहा भी है की यदि मैं १५ अगस्त की सुबह दिल्ली में रुक गया तो मुझे चारों तरफ से जूते पड़ेंगे।जिन्ना को जब रेडक्लिफ की सिफारिशों का पता चला तो वे बहुत दुखी हुए।उनने कहा की – इस तरह के खंडित पाकिस्तान की मैंने कल्पना भी नहीं की थी. I never expected such a truncated Pakistan.मेरी धारणा है यदि लार्ड माऊंटबैटन जल्दी न करते और ब्रिटिश प्रधान मंत्री लार्ड एटली की बात मान कर भारत की आज़ादी की तारीख जून १९४८ ही रखते तो शायद न तो इतना खून खराबा होता और न दो देशों में इतनी रंजिश होती।लोगों को सोचने समझने का मोका मिलता , वे अपना अच्छा बुरा सोच पाते , मगर उन्हें एक झटके में अलग अलग कर दिया गया और उसी आतंक में जिससे  जो बना वह उसने किया. भयंकर मारकाट हुई ,

छै  हफ्ते में सीमा तय हो गई ....?
- नौकरशाह क्रिस्टोफ़र बोमांट 1947 में ब्रिटिश न्यायाधीश सर सिरिल रेडक्लिफ़ के निजी सचिव थे. रेडक्लिफ़ भारत-पाकिस्तान के बीच सीमा निर्धारण आयोग के अध्यक्ष थे और सचिव होने के नाते बोमांट इस विभाजन का अहम हिस्सा रहे.इन दस्तावेज़ों में ब्रिटिश भारत के आख़िरी दिनों की स्थिति का विश्लेषण किया गया है. इसमें कहा गया कि बँटवारे के काम को बेहद जल्दबाज़ी में अंज़ाम दिया गया था.बोमांट ने दस्तावेज़ों में लिखा है कि वायसराय माउंटबेटन को पंजाब में हुए भीषण नरसंहार का ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए जिसमें महिलाओँ, बच्चों समेत लगभग पाँच लाख लोग मारे गए थे. उनके अनुसार माउंटबेटन ने रेडक्लिफ़ को सीमा निर्धारण के लिए सिर्फ़ छह हफ़्तों का समय दिया था .
अर्थात  भूलें नही विभाजन को ...!! अखंड भारत ही सभी समस्याओं का निदान !!! हम लाखों साल पुराने देश हैं और हैं आपना देश खुद बनाने का आधिकार है .

बुधवार, 11 अगस्त 2010

टीम इंडिया में सचिन होना चाहिए था

फॉर्म में चल रहे खिलाडियों को
बाहर बिठा कर हारना ठीक नही ....!!
- अरविन्द सीसोदिया  
एक हार का मतलव सीरिज हारना नही होता , क्रिकेट में अनिश्चितता  ही तो लोकप्रियता का मुख्यकारण है. मगर हम प्रयोग का काम या परखने का काम दूसरे देश से मैच खेलते वक्त ही क्यों करते हैं यह समझ से बाहर की बात है . इस टीम में सबसे  कम समय अब  सचिन के पास है , उसे आखिर रिटायर होना ही होगा  , वह बहुत ही अच्छा खेल रहा है ,उपयोगी ही नही बहुत ही उपयोगी खेल रहे हैं ,  उसे टीम से बाहर रखना ठीक नही था . वह तीन चार मैच के बाद विश्व का सबसे ज्यादा वन डे खेलने वाला खिलाड़ी बन जाता , मगर आपने जान बुझ कर , उसे इस उपलब्धि से अभी दूर किया यह ठीक नही था ,
   सचिन ने आईपीएल-3 में सर्वाधिक 618 रन बनाए और किंग्स इलेवन पंजाब के मार्श का 2008 के पहले आईपीएल में 616 रन बनाने के पिछले रिकार्ड को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद वन डे में पहला दोहरा शतक बनाया . हाल में श्री लंका में दोहरे शतक सहित भारत की तरफ से सबसे ज्यादा रन बनाये और आपने उसे बाहर बिठा दिया ...? टीम इंडिया  में सचिन होना चाहिए था , फॉर्म में चल रहे खिलाडियों को बाहर बिठा कर हारना ठीक नही ....!!    
  दाम्बुला के मैदान पर एशिया कप जीतने और हाल में श्रीलंका से टेस्ट सीरीज ड्रा कराकर सातवें आसमान पर उड़ रहे महेंद्र सिंह धोनी के धुरंधरों को न्यूजीलैंड ने अपने आलराउंड खेल से त्रिकोणीय एकदिवसीय क्रिकेट टूर्नामेंट के पहले मैच में 200 रन के विशाल अंतर से पराजित कर जमीन सूंघा दी। भारत को 29.3 ओवर में 88 रन पर समेट कर शर्मनाक हार झेलने के लिए मजबूर कर दिया।

  न्यूजीलैंड के हाथों 200 रन की करारी हार का खामियाजा टीम इंडिया को आईसीसी वनडे टीम रैंकिंग में नुकसान के साथ भरना पड़ा। भारत ताजा जारी रैंकिंग में तीसरे स्थान पर फिसल गया। साथ ही न्यूजीलैंड भारत को पछाड़कर दूसरे स्थान पर आ गया।
   भारत की अपने वनडे इतिहास में रनों के लिहाज से यह चौथी सबसे बड़ी पराजय है। भारत इससे पहले अक्टूबर 2000 में श्रीलंका से 245 रन, फरवरी 2004 में ऑस्ट्रेलिया से 208 रन और जून 1975 में इंग्लैंड में 202 रन से पराजय झेल चुका है।


उसका वनडे पांचवां सबसे कम स्कोर है। भारत इससे पहले श्रीलंका के खिलाफ 54 रन पर, ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 63 रन पर, श्रीलंका के खिलाफ 78 रन पर और पाकिस्तान के खिलाफ 71रन पर लुढ़क चुका है।
  देश के नाम की दुर्गति करने का किसी को अधिकार नही है . बुरा  ना मानें प्रयोग बंद  करें ,फॉर्म में चल रहे खिलाडियों को ही मोका दें.

एनकाउन्टर की जांच में दोहरा मापदंड क्यों...??

ममता के प्रश्न का उत्तर आना  चाहिए..?
- अरविन्द सीसोदिया
नक्सली नेता चेरुकुरी राजकुमार उर्फ आजाद के एक मुठभेड़ में मारे जाने के संदर्भ में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और रेलमंत्री ममता बनर्जी के सोमवार को उठाये प्रश्न  पर भले ही मंगलवार को संसद के दोनों सदनों में हंगामा हुआ और  विपक्ष ने इस मामले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से स्पष्टीकरण की मांग की हो, मगर यह तो आरोप आ ही गया कि कांग्रेस की आंध्रप्रदेश की सरकार ने यह फर्जी एनकाउन्टर किया हैसामान्य व्यक्ति ने नही केंद्र सरकार के केबीनेट मंत्री ने यह आरोप  लगाया  है.केबिनेट मंत्री के आरोप कि जाँच भी सामान्य पुलिस नही कर सकती उसकी बात की जाँच सी बी आई  ही कर सकती है , जबाब तो इतना ही आना है कि क्या सरकार मुठभेड़ कि जाँच करेगी की यह सही थी या फर्जी थी ...? एक तरफ आप सोहराबुद्दीन शेख के मामले में गुजरात के मंत्री तक को गिरिफ्तर कर रहे हो , दूसरी तरफ आप मुंह  भी नही खोलना चाहते ..? दोहरा मापदंड क्यों...?? भाजपा और कांग्रेस कि राज्य सरकारों के मामलों में  अलग अलग द्रष्टी क्यों ..? हिन्दू और मुस्लिम में अलग अलग द्रष्टि क्यों..??  जब यह सा दिखेगा तो लिखा ही जायेगा, सोहराबुद्दीन शेख के मामले में आंध्र प्रदेश कि पुलिस के  भी जवान शामिल माने गए थे आप ने कांग्रेस को बचने के लिए, सी बी आई से उनसे पूछताछ नहीं की क्यों ...?  . यह अंधेर गर्दी नही चलने वाली , आपका गंभीर मामलों में नो सिखियपन स्पष्ट  छलक रहा है , गंभीर मामलों में आप फंसते ज रहें हैं ,आप के पास उत्तर नहीं हैं , आप चुप हैं , चुप भी स्वीकारोक्ती ही मानी जाती है .
    रेल मंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने ९-०८-१० सोमवार को पिछले महीने नक्सलियों के प्रवक्ता चेरुकुरी राजकुमार उर्फ आजाद को 'मारने' के लिए अपनाए गए 'तरीके' की निंदा की। गौरतलब है कि पुलिस का दावा रहा है कि नक्सलियों के तीसरे नंबर के नेता आजाद आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले के जंगलों में मुठभेड़ में मारा गया था।
    पश्चिमी मिदनापुर जिले में एक विशाल रैली में उन्होंने कहा, ''मैं महसूस करती हूं कि जिस तरह आजाद को मारा गया वह ठीक नहीं है।'' उन्होंने नक्सलियों के इस आरोप का लगभग समर्थन किया कि आजाद को फर्जी मुठभेड़ में मारा गया। बनर्जी ने कहा कि नक्सलियों और सरकार के बीच वार्ता के मध्यस्थ सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने आजाद को वार्ता के लिए तैयार किया था।नक्सल समर्थक  जनजातीय संस्था पुलिस संत्रास विरोधी जन समिति (पीसीएपीए) ने इस रैली को समर्थन दिया। इस रैली में अग्निवेश, मेधा पाटकर और नक्सल समर्थक लेखिका महाश्वेता देवी जैसे कई सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। अग्निवेश ने आजाद के मारे जाने की घटना की न्यायिक जांच की मांग करते हुए आरोप लगाया कि प्रशासन ने अपने संचार माध्यमों का इस्तेमाल करके नक्सली नेता का पता लगाया और उसे मार दिया। नक्सलियों का कहना है कि आजाद और एक अन्य कार्यकर्ता हेमचंद्र पांडे को पुलिस ने गत एक जुलाई को नागपुर से उठाया था और अगले दिन आदिलाबाद में मार डाला था।
- सवाल यह है की आजाद और हेमेन्द्र पण्डे का एनकाउन्टर सही था या फर्जी, इसकी जाँच होनी चाहिए..! गुजरात में कुछ और आन्ध्र में कुछ , यह नही हो सकता , सर्वोच्च न्यायालय स्वंय खबर और आरोप के आधार पर यह जाँच सी बी आई  से करवाए .पाकिस्तान का आक्रमण करी भी आप ने जिन्दा पकड़ लिया है तो , उस प्रकरण का डिस्पोजल एक नियम से ही होगा . आप चिन्हित आरोपियों को सार्वजानिक सूचना के द्वारा, आपके आरोपों को खुलाशा करते हुए , आत्म समर्पण को प्रेरित करें , अवेहेलना  पर परिणाम भुगतने की बात कहें . कानूनी फोर्मेट में ही होना चाहिए .      

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

" राजा डरता हिन्दुस्तानी , सारा खेल पाकिस्तानी "

" राजा डरता हिन्दुस्तानी ,
सारा खेल पाकिस्तानी "
" जलता सारा कश्मीर है,
मनमोहन पीता खीर है"
" प्रज्ञा अन्दर बंद  है ,
गिलानी बाहर दबंग हैं "
- अरविन्द सीसोदिया 
भारत में लोकतन्त्र, न्याय और समता  कि फजीहत देखो, बिना किसी सबूत के हिन्दू साध्वी प्रज्ञा तो वर्षों से अन्दर बंद  है , हजारों सबूत के बाद भी कश्मीरी अलगाववादी आजाद हैं. वे भारत के स्वतंत्रता दिवस को काला दिवस घोषित करने का दुस्साहस करते हैं , पाकिस्तान से एकता की बात करते हैं .  वे सब तो जेल के योग्य नहीं हैं , जो हिंदुस्तान को हिंदुस्तान कहती है , वह जेल में है.  कांग्रेस कि यह हिन्दू और मुस्लमान के आधार पर अलग अलग नीति , अधर्म और अन्याय है . अभी सत्ता मद में आप कुछ भी करलो इतिहास तुम्हे कभी ना तो माफ़ करेगा और ना ही भारत का हित चिन्तक  बताएगा .  
    हुर्रियत नेता अली शाह गिलानी ने कश्मीरियों से अपील की है कि वे , पाकिस्तानी स्वतंत्रता दिवस (14 अगस्त) को 'एकता दिवस' और भारत के स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) को 'काला दिवस' के रूप में मनाएं। यह अब  तो खुले में स्पष्ट कर रहा है कि या सारा खेल पाकिस्तानी है. हिंदुस्तान की निकम्मी सरकार अब भी वार्ता वार्ता का रट लगाये है. जबकी पहला काम वहां की सरकार भंग करके , कानुक व्यवस्था की जिम्मेवारी राज्यपाल  को सोंपना चाहिए . एक अनुभवहीन और कमसे कम अब स्पष्ट  रूप से निकम्मा कहा जाने योग्य मुख्यमंत्री क्यों बनाये रखा है . स्वंय कांग्रेस और कश्मीरी कांग्रेस यह मानती है की उमर को सत्ता संभलना गलती थी.उन्हें बनाये रखना और बड़ी गलती है. मगर उमर की एक ही योग्यता है की वह रहुक का मित्र है .    
    अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारुक ने कहा कि उन्होंने विसैन्यीकरण, दमनकारी कानूनों के निरसन, राजनीतिक कैदियों की रिहाई जैसे विशिष्ट उपायों का प्रस्ताव दिया था और विश्वास निर्माण के लिए वार्ता प्रक्रिया को आगे ले जाने की पेशकश की थी, जो लोगों को काफी राहत प्रदान करते लेकिन दुर्भाग्य से इन मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया.
   कुल मिला कर बात यह है कि जो भी पाकिस्तान चाहता है , वही बात कश्मीर में अलगाववादी करते हैं , वही बात वहां के भिन्न भिन्न दल करते हैं . जो दल भारत के संविधान को नही मानते वे भारत में राजनीती कर सकते और चुनाव भी नही लड़ सकते . फिर यह तमाशा कश्मीर में क्यों चल रहा है . भारत का मॉल खाएं भारत को गाली दें . यह लगातार एक दो दिन नही , बल्की लगातार ६० साल से चल रहा है . चीन ने तो सारा तिब्बत निगल लिया और अब वहाँ कोई चूँ  भी नही. हमारे जैसा आत्मघाती देश कहीं नहीं मिलेगा. जो अलगाववाद  को लगातार पोषण   करता हो .