गुरुवार, 19 अगस्त 2010

किसानों की भूमि अधिग्रहण

कानून में व्यवहारीक बदलाव की जरूरत है
- अरविन्द सीसोदिया
  जो करोड़पति और खरबपति  घराने वोट भी नही डालते  वे देश की संसद और सरकारों को अपनी जेब में रखने की ताकत रखते हैं , बहुराष्ट्रीय संस्थान   तो देश के बजट से कई गुणा अपना बजट रखते हैं , वे राजनीती में चल रही धन बनाओ मैराथन का फायदा उठा रहे हैं | राजनेता जो पहलीवार  भी जीता है वह अपनी सातसो (७००)   पीढ़ियों का इंतजाम कर जाना चाहता  हैं . इसी कमजोरी के कारण पूरी दुनिया  की कंपनियां भारत पर हावी हैं | हर बड़े प्रोजेक्ट के पीछे कोई ना कोई पार्टी , नेता होता है , वह नीति और कानून  भी बदल वाने में तक अपनी ताकत छोंक  देता है |  जब हमारा राजतन्त्र जो समस्त अन्य तंत्रों का  नियंत्रक है , वही भ्रष्ट है तो ईमानदारी कहाँ तलाशेंगे| जब ईमानदार राजनीती नही होगी तो आम और गरीव , जिस पर देनें कुछ भी नही है , उसके पक्ष में नीतियाँ कैसे बनेंगी ? मुछे नहीं लगता की किसानों के हित में वास्तविक लाभकारी कोई कानून बन पायेगा !!  

 किसानों की भूमि अधिग्रहण को लेकर होने वाले विवादों की असली वजह, राजनैतिक दलों का  पूंजीवाद के प्रती अनन्य भक्तीभाव  है इसमें कांग्रेस सहित सभी दल हैं, साम्यवादी भी  है। वर्तमान में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार इस लिए जिम्मेवार है कि उसके समय में ही कई बड़े प्रकरण सामने आने पर भी वह  अंग्रेजों के जमाने के कानून- भूमि अध्याप्ति अधिनियम 1894 के आधार पर ही जमीनों का अधिग्रहण कर रही है या करवा रही है । जबकी जनसंख्यावृधी  और ओसत   भूमि  का प्रति व्यक्ती कमी के बदलते हुए परिवेश में, केंद्र सरकार को चाहिए था कि वह भूमि अध्याप्ति अधिनियम में ऐसे संशोधन करती है, जिसमें किसानों का हित सुरक्षित होता और सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए भूमि अधिग्रहण की आवश्यकताओं की पूर्ति भी होती।
      अब कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार की सामान्यतः नीतियों का निर्धारण अमरीकी पूंजीवादी शैली की तरह होता है या यों कहे की उनके विचार से, उनके हित के लिए होता है | इसी कारण मूल समस्या कि अनदेखी का खमियाजा पूरे देश के किसानों को भुगतना पड़ रहा है। किसानों के हितों की अनदेखी करते हुए विशेष आर्थिक परिक्षेत्र के लिए 2005 में एक नया कानून लागू कर दिया गया, जिसके तहत देश भर में किसानों की हजारों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि ले ली गई, जिसका उचित मुआवजा भी किसानों को नहीं मिला। ज्यादातर विशेष आर्थिक क्षेत्र जिन  राज्यों में बने हैं, विवादग्रस्त रहे हैं | इससे सन्देश जाता  है कि  पार्टियां औद्योगिक घरानों के हित में कार्य करती हैं। बाबा रामदेव कहते हैं कि राज्यों से केंद्रीय कार्यालय चोथ वसूली करते हैं |

     सर्वोच्च प्राथमिकता यह है कि किसानों की जमीन को आपसी सहमति से करार नियमावली के तहत उचित मुआवजा देने के बाद ही ली जाये। सरकारों के लिए भी यह शर्म की बात होगी कि , किसानों की जमीन को सस्ती दरों पर लेकर कोई उद्योगपति मुनाफा कमाये। लेकीन उद्योगपति तो सरकार के विभाग चला रहे हैं | एकवार जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी  संभालने जा रहे थे तब उनके कारवें में , अति संपन्न फिल्मी हथियान और अति संपन्न  औद्योगिक घरानों की बारात निकली थी | जिस देश की संसद में प्रचंड बहुमत  करोडपतियों का हो वहां कोई गरीव और आम की सुनाने वाला होगा यह एक स्वपन ही है |

- यह सच है कि  कई दशकों से भूमि अधिग्रहण और विस्थापन का जो सिलसिला चल रहा था, उसमें ‘सेज’ एक नवीनतम कड़ी है। सेज के नाम पर पूरे देश में लाखों एकड़ जमीन किसानों से हड़पने की योजना चल है। ये जमीनें किसी सार्वजनिक हित के लिए नहीं बल्कि अमीरों की जागीर बनाने के लिए ली जा रही हैं।
 - प्रणव मुखर्जी ने कहा कि सरकार ने कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता में मंत्री समूह का गठन किया है और इस पर एक व्यापक विधेयक जल्द लाया जाएगा। अलीगढ़-मथुरा क्षेत्र में आंदोलन कर रहे किसानों पर पुलिस फायरिंग पर लोकसभा सदन में सभी दलों ने गहरी चिंता व्यक्त की और प्रश्नकाल स्थगित कर उस पर चर्चा हुई।
कानून में व्यवहारीक बदलाव की जरूरत है :-
१. वन कानून के कारण विकास को कई समस्याएं हैं,उसमें व्यावहारिक संसोधन होनें चाहिए | जिस वन भूमि में कभी भी वन नही लग सकते , उसे वनभूमी  मान  कर हम देश को धोका क्यों ने रहे हैं ? उसका उपयोग हम नई बस्तियों और उद्योगीकरण में कर सकते हैं | व्यवहारिका सोच में क्या दिक्कत है | 
२.उधोग  और अन्य गैर कृषी कार्यों के लिए जितनी भूमि  वास्तव में चाहिए , उससे कई गुणा भूमि हम क्यों देते हैं ? अब समय  आगया है कि हम पहले यह तय करें कि वास्तव में कितनी भूमि चाहिए , उतनी ही दें ..., कारण यह भी है की जब भूमि कि उपलब्धता सीमित है तो , सात पीड़ियों तक के लिए क्यों भूमि दे !!
३. हम उधोगीकरण  की नक़ल क्यों कर रहे हैं , हम तय करें कि हमें वास्तव में कितना और किस तरह का उधोगीकरण करना  है | बिना जरूरी उधोगीकरण को किसानों क़ी जमीन देनें की क्या तुक | 
४. अधिग्रहण नीति में भी भारी बदलाव की जरूरत है , सिर्फ वह व्यक्ति क्यों प्रभावित हो जो भूमि मालिक है , वे भी प्रभावित होने चाहिए जिन्हें उस विकास से लाभ मिल रहा है ! में कोई अधिग्रहण करता तो १०० हेक्टर  की जरूरत पर १०००  हेक्टर का अधिग्रहण करता और उस में से १०० हेक्टर काम में ले कर, शेष  ९०० हेक्टर उन १००० हेक्टर के धारकों  में बाट देता और मुआबजा भी देता , ताकी कुछ  ही पीड़ित ना हों ज़यादा में दर्द बाट कर, दर्द को हल्का किया जाये | 
 अर्थात यह स्पष्टतः सोचा जाना चाहिए क़ी भूमि कम है , उपलध नही है , खाने को अनाज भी चाहिए , इन परी स्थितियों  के बीच क्या ठीक है और क्या ठीक नही है |         

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें