मंगलवार, 24 अगस्त 2010

सभी प्रकार की देश - धर्म रक्षाओं के प्रति तत्पर रहना होगा

परिवारीक एकत्व का
महान सामजिक हिन्दू पर्व : रक्षा बंधन
- अरविन्द सीसोदिया   
  अखिल विश्व के आँगन में , सुख - शान्ति और समृधि को आनंद  के साथ  सिद्ध किया है तो वह भारत भूमि है , यहाँ हर  मनुष्य को संतोष के साथ सुख सिखाया गया है , पवित्रता के साथ जीवन जीना सिखाया गया है , रिश्तों का बंधन अनंत आत्मीयता के साथ गूंथा  गया है | यही कारण  क़ी इस संस्कृति  क़ी गहरी जड़ों को कोई भी हमलावर उखाड  नहीं सका...! या तो वे इसमें ही मिल गए या हाथ मल कर रह गए ...!! इस सिद्धी   के प्रमुख अंगों में वृत , त्यौहार और परंपराओं  क़ी  महती भूमिका हमेशा से ही रही है | रक्षा बंधन मूलतः बहिन  की मान मर्यादा क़ी रक्षा के लिए भाई की वचनवधता  है ..! इसके अतिरिक्त रक्षा सन्दर्भ  के  , अन्य विषय जैसे राष्ट्र रक्षा , सामाजिक एकता की रक्षा , वृक्षों क़ी रक्षा , मानव मूल्यों क़ी रक्षा , सासंकृतिक मूल्यों क़ी रक्षा ...!! इसका कारण यह है क़ी ये पूर्णिमा , रक्षा पूर्णिमा के नाम से भी विख्यात है ...!!    

रक्षाबंधन एक हिदू  त्यौहार है जो श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। सावन में मनाए जाने के कारण इसे सावनी या सलूनो भी कहते हैं। रक्षाबंधन में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्व है। राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, तथा सोने या चांदी जैसी मंहगी वस्तु तक की होती है। राखी सामान्यतः बहनें भाई को बांधती हैं परंतु ब्राहमणों, गुरुओं और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित संबंधियों (जैसे पुत्री द्वारा पिता को) भी बांधी जाती है।
     इस दिन बहन अपने भाइयों की कलाई में राखी बांधती है और उनकी दीर्घायु व प्रसन्‍नता के लिए प्रार्थना करती हैं ताकि विपत्ति के दौरान वे अपनी बहन की रक्षा कर सकें। बदले में भाई, अपनी बहनों की हर प्रकार के अहित से रक्षा करने का वचन उपहार के रूप में देते हैं। इन राखियों के बीच शुभ भावनाओं की पवित्र भावना होती है।
  श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग-भंग का विरोध करते समय रक्षाबंधन त्यौहार को बंगाल निवासियों के पारस्परिक भाईचारे तथा एकता का प्रतीक बनाकर इस त्यौहार का राजनीतिक उपयोग आरंभ किया। कभी कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठत व्यक्ति को भी राखी बांधी जाती है। प्रकृति संरक्षण के लिए वृक्षों को राखी बांधने की परंपरा का भी प्रारंभ हो गया है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के  स्वयंसेवक राष्ट्र रक्षा का वृत्त ले कर परस्पर वचनवध्य    होते हैं व समाज में जनजागरण हेतु कार्यक्रम करते हैं ,  भाईचारे के लिए एक दूसरे को  राखी बांधते हैं। इस दिन फोजियों को और कैदियों को भी राखी बाँधी  जाती है .  






येन बद्धो बलि: राजा दानवेन्द्रो महाबल:।

तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
रक्षासूत्र बांधते समय सभी आचार्य एक श्लोक का उच्चारण करते हैं,जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यह श्लोक रक्षाबंधन का अभीष्ट मंत्र है। श्लोक में कहा गया है कि जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबन्धन से मैं तुम्हें बांधता हूं जो तुम्हारी रक्षा करेगा।

रक्षिष्ये सर्वतोहं त्वां सानुगं सपरिच्छिदम्।

सदा सन्निहितं वीरं तत्र मां दृक्ष्यते भवान्॥
-श्रीमद्भागवत 8 स्कन्ध 23 अध्याय 33 श्लोक


   स्कन्ध पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है। कथा कुछ इस प्रकार है- दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थ्रना की। तब भगवान ने वामन अवतार लेकर ब्राम्हण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा अकाश पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकानाचूर कर देने के कारण यह त्योहार 'बलेव' नाम से भी प्रसिद्ध है। कहते हैं कि जब बाली रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया।    
 
     भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया। उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और अपने पति भगवान बलि को अपने साथ ले आयीं।उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। विष्णु पुराण के एक प्रसंग में कहा गया है कि श्रावण की पूर्णिमा के दिन भागवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिए फिर से प्राप्त किया था। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

महाभारत में,  पांडवों की पत्‍नी द्रौपदी ने भगवान कृष्‍ण की कलाई से बहते खून (श्री कृष्‍ण ने भूल से खुद को जख्‍मी कर दिया था) को रोकने के लिए अपनी साड़ी का किनारा फाड़ कर बांधा था। इस प्रकार उन दोनो के बीच भाई और बहन का बंधन विकसित हुआ था तथा श्री कृष्‍ण ने उसकी रक्षा करने का वचन दिया था।
महाभारत में द्युत क्रीड़ा के समय युद्धिष्ठिर ने द्रोपदी को दांव पर लगा दिया और दुर्योधन की ओर से मामा शकुनि ने द्रोपदी को जीत लिया। उस समय दुशासन द्रोपदी को बालों से पकड़कर घसीटते हुए सभा में ले आया।वहां मौजूद सभी बड़े दिग्गज मुंह झुकाएं बैठे रह गए। देखते ही देखते दुर्योधन के आदेश पर दुशासन ने पूरी सभा के सामने ही द्रोपदी की साड़ी उतारना शुरू कर दी। सभी मौन थे, पांडव भी द्रोपदी की लाज बचाने में असमर्थ हो गए। तब द्रोपदी द्वारा श्रीकृष्ण का आव्हान किया गया और श्रीकृष्ण ने द्रोपदी की लाज उसकी साड़ी को बहुत लंबी करके बचाई।

सभी प्रकार की देश - धर्म रक्षाओं के प्रति तत्पर रहना होगा ...
कुल मिला कर रक्षा बंधन का त्यौहार सिर्फ बहिन क़ी मान मर्यादा क़ी रक्षा तक ही सीमित नही है , बल्कि व्यापक रक्षा कार्यों के प्रती प्रेरित करता है , जैसे क़ी :- देश की सीमाओं की रक्षा , देश के गोरव की रक्षा , देश के मान-बिन्दुओं की रक्षा , देश के इतिहास की रक्षा , देश की सभ्यता और संस्कृति की रक्षा , देश के समाज की रक्षा आदि के लिए हमेशा ही जागरूक और तत्पर रहना होगा ..!
भारत पर हो रहे वर्त्तमान आक्रमण 
१- आंतरिक सुरक्षा पर आक्रमण 
२- सीमाओं पर निरंतर कुदृष्टि 
३- हिदुओं के आस्था केन्द्रों पर आक्रमण 
४- भारत पर आर्थिक आक्रमण 
५- भारतीयत , उसकी शिक्षा और संस्कृति पर आक्रमण ...आदि !
हमारा दायित्व : हमारा संकल्प  ....
१- हम जाती भेद और छुआ-छूत नहीं मानेंगे ,
२- हम समरसता के भाव को पुष्ठ  करेंगे 
३- स्वधर्म ,स्वसंस्कृति , स्वभाषा एवं स्व-वेशभूषा  का संरक्षण करेंगे 
४- स्वदेशी  वस्तुओं का उपयोग करने में गोरव का अनुभव करेंगे 
५- देश की  अखंडता  की रक्षा करेंगे ,
६- संगठित होकर सभी प्रकार के आक्रमणों से देश की रक्षा करेंगे |
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