गुरुवार, 26 अगस्त 2010

श्रीराम जन्मभूमि : एकमेव हल भव्य मन्दिर निर्माण

अयोध्या की विवादित भूमि राम मंदिर ही है

- अरविन्द सीसोदिया
नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार २४-०८-२०१० को अयोध्या में  राम जन्मभूमि-बाबरी  के मूल मालिकाना हक से जुड़े मुकदमे में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के संभावित फैसले पर अपने वरिष्ठ मंत्रियों से चर्चा की। फैसला सितंबर २०१० के मध्य में आने वाला है। इसमें पिछले 60 साल से इस भूमि के मालिकाना हक पर बने विवाद को लेकर अदालत फैसला देगी। अदालत मूलत: तीन बिंदुओं पर अपना निर्णय देगी। इसमें सबसे पहला और मुख्य बिंदु यह है कि क्या अयोध्या की विवादित भूमि राम मंदिर ही है। दूसरे, क्या मस्जिद मंदिर के अवशेषों से बनी थी। तीसरे, क्या मस्जिद इस्लाम के नियमों अनुरूप बनी थी। माना जा रहा है कि अदालती फैसले के बाद इस मसले पर संवेदनशील स्थिति बन सकती है।
बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और रक्षा मंत्री एके एंटनी उपस्थित थे। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री ने गृह मंत्री से संभावित परिस्थितियों को देखते हुए राज्य सरकार की ओर से किए गए उपायों व केंद्रीय स्तर पर की गई सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी हासिल की। उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने फैसले के बाद संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति का हवाला देते हुए पहले ही केंद्र सरकार से अर्धसैनिक बल की 485 कंपनियां मांगी है। एक कंपनी में 112 से लेकर 125 अर्धसैनिक बल कर्मी होते हैं। इसके लिहाज से केंद्र सरकार से राज्य सरकार ने 50 हजार से अधिक अर्धसैनिक बलकर्मी मांगा है।
 विश्व हिन्दू परिषद का कथन ... 
 विश्व हिंदू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने कहा कि राम जन्मभूमि मसले का स्थायी हल सिर्फ संसद में अयोध्या में भगवान राम के मंदिर के निर्माण के संबंध में कानून बनाकर ही हो सकता है, क्योंकि किसी अन्य तरीके से इस मामले को सुलझाने का प्रयास किया जाना देश में संघर्ष का माहौल पैदा करने  जैसा है।
  विश्व हिन्दू परिषद ने कहा कि अयोध्या के रामजन्मभूमि मंदिर मामले में अगर अदालत का फैसला हिन्दुओं के प्रतिकूल होगा तो वह उसे नहीं मानेगी।परिषद के प्रवक्ता आचार्य धर्मेन्द्र ने  कहा कि यह धर्म और आस्था से जुड़ा मामला है। हर हिन्दू मानता है कि भगवान श्रीराम का जन्म अयोध्या में हुआ था। इसे साबित करने की क्या जरूरत है। उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि शाहबानों मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले को क्या मुसलमानों ने माना ? यह निर्णय मुसलमानों ने नहीं   माना था और संसद ने कानून बना कर इसे पलट दिया था !
  विश्व हिन्दू परिषद् ने  मांग की कि सोमनाथ की तर्ज पर संसद में रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाया जाए। विश्व हिन्दू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय महामंत्री डा़ प्रवीण भाई तोगड़िया ने कहा कि संतों के आदेशानुसार भगवान श्रीराम का मंदिर जन्मभूमि पर ही बनेगा। उन्होंने कहा कि अयोध्या की शास्त्रीय सीमा में कोई मस्जिद नहीं बनेगी।
  ज्ञातव्य रहे कि ,  अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए विहिप की प्रेरणा से श्रीहनुमत शक्ति जागरण समिति जो कि पूरे देश में गठित कि गई हैं  के द्वारा , देश भर   में कई कार्यक्रम व संकल्प सभाएं आयोजित कर रही है ।   हनुमान चालीसा का पाठ पूरे देश में हनुमत शक्ति जागरण अभियान के तहत लाखों से भी अधिक मंदिरों में नियमित रूप से संतों के सानिध्य में चल रहा है जो 17 नवम्बर 2010 से देवोत्थान एकादशी तक चलेगा। इसमें देश  के करोड़ों लोग भाग लेकर संकल्प लेंगे। इन कार्यक्रमों में हिन्दू समाज के हर मत पंथ, सम्प्रदाय व विचारधारा के लोग भाग लेंगे।

मालिकाना हक पर साठ साल बाद आएगा फैसला

सितंबर २०१० के  मध्य में आने वाला फैसला , इस मसले पर साठ साल पहले दायर की गई याचिका पर लिया जाना वाला निर्णय होगा। इस मसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक विशेष पीठ जिसमें जस्टिस एसयू खान-जस्टिम सुधीर अग्रवाल- जस्टिस डीवी शर्मा शामिल हैं, रामजन्मभूमि के मालिकाना हक को लेकर अपना निर्णय देंगे। वर्ष 1950 में सबसे पहले गोपाल सिंह विशारद ने विवादित भूमि पर भगवान राम की पूजा-अर्चना की इजाजत देने को लेकर याचिका दायर की थी। इसी साल परमहंस रामचरण दास ने भी इसी तरह की इजाजत संबंधी दूसरी याचिका दायर की थी। हालांकि बाद में यह याचिका वापस ले ली गई थी। वर्ष 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी याचिका दायर करते हुए भूमि हस्तांतरित करने की मांग की थी। चौथी याचिका 1961 में यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने दायर करते हुए भूमि हस्तांतरित करने की मांग की और इसे मस्जिद भूमि घोषित करने की मांग की। 1989 में पांचवीं याचिका भगवान श्रीरामलला विराजमान ने दायर करते हुए भूमि हस्तांतरण की मांग की और इसे मंदिर घोषित करने की मांग की।
  'श्रीराम जन्मभूमि - समस्या और समाधान ' 
    उपरोक्त  विषय  पर २४ एवं २५ जुलाई २०१०  को एक राष्ट्रिय परिसंवाद आयोजित हुआ था , पूरे परिसंवाद का नतीजा यही था क़ी अदालती निर्णय के बाद अपील और दलील का खेल नये सिरे फिर प्रारंभ हो जाएगा , फिर वही होगा जो सरकार चाहती है की मामला टाल दिया जाये , सबसे उत्तम मार्ग यही होगा क़ी सोमनाथ मंदिर की तरह वर्तमान केंद्र  सरकार संसद से कानून बना कर अयोध्या में श्री रामजी का मंदिर निर्माण हेतु हिन्दुओं को भूमि सोंप्दे....!
  इस परिसंवाद में यह तो स्पष्टता से आया की सभी साक्ष्य श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के पक्ष में ही आये हैं, निर्णय भी पक्ष में ही आने की संभावना है , मगर यह मामला अदालत के स्तर का नहीं है ..! यह पूर्णतः राजनैतिक इच्छा शक्ती का विषय इसलिए है " क्यों कि यह प्रश्न आस्था और विश्वास का है , राष्ट्रिय स्वाभिमान का है ..!!" 
 वहां एक वक्ता ने अपनी बात प्रश्न के माध्यम से इस प्रकार रखी कि :-
१- भारत जब १९४७ में स्वतंत्र हुआ तो हमने ,ब्रिटिश ध्वज उतार कर अपना तिरंगा क्यों फहराया ...?
२- अपना राष्ट्र गीत , राष्ट्र गाना , अपना संविधान क्यों अपनाया ..?
३- अपने लोगों कि संसद , अपने लोगों  कि सरकार क्यों बनाई ...?
४- फिरंगियों के स्मारक, स्टेच्यू  और विभिन्न नामों को क्यों हटाया ..?
५- सोमनाथ में इस्लामिक कब्जे हटाकर पुनः भव्य मंदिर निर्माण क्यों किया ...?
६- अयोध्या में ही , जो वर्तमान में तुलसी उद्यान है , अंग्रेज शासन काल में वह विक्टोरिया पार्क था , वहाँ ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया की स्टेच्यू लगी हुई थी , स्वतंत्रता  के बाद उस स्टेच्यू को हटा कर , वहां गोस्वामी तुलसीदास की मूर्ती स्थापित की गई और उसका नामकरण तुलसी उधान हुआ ...! 











सोमनाथ मंदिर
        मूलतः इन सभी के पीछे गुलामी थी, इसलिए यह परिवर्तन हुए  ...!! बहुतसे कालेज , बहुतसे अस्पताल या कार्यालय भवन  जो अंग्रेजों के नाम पर थे , उनमें परिवर्तन इसी भावना से हुआ कि वे हमारी गुलामी के प्रतीक थे , जहाँ हमारे नाम होने चाहिए थे , उन पर उनका कब्ज़ा था जिसे हमने हटा कर अपनी प्रति स्थापना की है ! स्वदेशीकरण किया है !!   यही प्रति स्थापना , यही स्वदेशीकरण अयोध्या में होना शेष है ...! जब सोमनाथ मंदिर का निर्माण केन्द्रीय मंत्री गण और राज्य सरकार की देख - रेख में हो सकता  हैं, तत्कालीन राष्ट्रपति महामहिम राजेन्द्र प्रशाद जी मूर्ति कि प्राण प्रत्तिष्ठा  कर सकते हैं तो फिर अयोध्या , काशी , मथुरा से बेईमानी क्यों ..? उनके साथ भी वही सोमनाथ व्यवहार क्यों नहीं ?
   स्थापित अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत  है की जब कोई देश अपनी गुलामी से मुक्त होता है तो वह पुराने जबरिया लादे गए उन सभी आदेशों से मुक्त होता है जो गुलामी के दोरान थोपे गये थे ...!! हमारे देश के आलावा भी इस तरह के अनेकों उदाहरन हैं जिनमें स्वतन्त्रता  प्राप्ति के बाद , उन देशों के अपने मान बिन्दुओं की पुनर्स्थापना की है ...!!  
१- स्पेन भी ४०० साल गुलाम रहा , जब वह मुस्लिम मूवर्स से मुक्त हुआ तो उसने ध्वस्त चर्चों की नींव पर बनीं मस्जिदे हटा कर पुनः चर्च बना कर राष्ट्रिय स्वाभिमान की स्थापना की ...!
२- पोलेंड भी १०० साल गुलाम रहा, जब वह रूस से मुक्त हुआ तो उसने रूसियों द्वारा निर्मित ओरियंटल आर्थाडाक्स कैथीड्रल को तोड़ दिया, क्यों की वह गुलामी का प्रतीक था | 
३- दूसरे विश्व युद्ध में, जर्मनी के शासक हिटलर की सेना ने, रूस के जार ( शासक) के विंटर पेसेल में स्थित ग्रीक देवी देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ डालीं थी | यह इसलिए किया गया ताकि  रूस को नीचा दिखाया जाये, उसे अपमानित किया जाये, उसका मान मर्दन किया जाये | महायुद्ध की समाप्ति पर, रूस  में साम्यवादी सरकार जो आस्तिकता और धर्म में विश्वास नहीं रखती थी ने, राष्ट्रिय स्वाभिमान , भंग की गई प्रतिष्ठा की पुर्न  स्थापना हेतु , उन ग्रीक देवी देवताओं की मूर्तियाँ नई बनबा कर ससम्मान  स्थापित कीं ...!   
  श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का विध्वंस  ,  राजनैतिक था , साम्प्रदायिक था , निरंकुश धर्मान्धता था , हमलावरों के द्वारा था , जिसके क्रम में हमलावरों ने सैंकड़ों वर्षों तक हजारों मंदिर , लाखों मूर्तियाँ तोड़ डाली थीं ..! लाखों लोगों का तलवारों के बल पर धर्म बदलवाये गये ,जो नहीं माने उनका कत्ले आम हुआ !! चाहे सनातनी  हों या सिख , जैन , बोद्ध रहें हों , भारत में इस्लामिक आक्रमण और विध्वंस  के दोरान सभी क्षतिग्रस्त   हुए और धर्म स्थल तोड़े गये | इसाईयों  के साथ भी उनका  यही बर्ताव यूरोप  में रहा ...! 
सबूत और साक्ष्य 
जहाँ तक सबूत और साक्ष्यों का सबाल है , सभी कुछ श्रीराम जी के पक्ष में है , विश्व के सातों महाद्वीप  अखिल  विश्व यह जनता है कि अयोध्या एक परम पावन पवित्र धार्मिक और महान राजनैतिक नगरी है , इसमें ईश्वर के अवतार भगवान श्रीराम का जन्म माँ कोशल्या  के गर्भसे हुआ था , उनके जन्म स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण होना , समय समय पर उसका   जीर्णोधार और नवीकरण होना एक स्वाभाविक क्रिया ही है ..! जहाँ ईश्वर का अवतार हो ईश्वर का अंश हो वहां भव्य मंदिर ही होता है ..!! अदालत के द्वारा जो वैज्ञानिक आधार के पुरातात्विक और राडार सर्वेक्षण करवाए गए वे इसकी पुष्ठी करते हैं ..! आस्था  और भावना से जुड़े प्रश्न में इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी मगर जितना सच सामने आये उतना ही अच्छा ...!!
  हमलावर बाबर ने इस भव्य  मंदिर को तोडा था और उसी सामग्री से अपवित्र ढांचा (मस्जिद) बनबाया  इसके सबूत में अनेक तत्कालीन दस्ताबेज प्रमाणित करते हैं | इस्लाम में मस्जिद वही मानी जाती है जो पवित्र भूमि पर बनी हो व वजू स्थल हो , यह जबरिया मंदिर तोड़ कर बनाई गई और उस पर कोई वजू स्थल नही है , मंदिर तोड़ने की जिद में यह बनी थी , इसलिए मुस्लिम पवित्रता से इसे कभी भी मस्जिद घोषित ही नही किया गया ..! लेकिन इस स्थान को मुस्लिम विजय के प्रतीक के रूप में हमेशा  माना और इसी कारण  निरंतर इस स्थान को लेकर युद्ध हुए और  लाखों लोग बलिदान  हुए ..! यह ढांचा बाबरी ढांचा  अवश्य बना मगर पवित्र मस्जिद कभी नही बनीं|
   यह भी सर्वविदित है कि इस स्थान पर मन्दिर या मूर्ति रही हो या नही रही हो ,मगर हिन्दुओं का आना जाना निरंतर जारी  रहा, संघर्ष जारी रहा  और श्रधा   पूर्वक नमन जारी रहा |
  स्वतः   मूर्ति प्रगट हुई , पूजा - अर्चना निरंतर चल रही है , इसे रोका नही जा सकता ..! ताले लगे ताले टूटे , शिलान्यास  हुआ ..!!  ढांचा ध्वंस हुआ ..!! यह श्रंखला ठीक वैसी ही है जैसी १८५७ से १९४७ तक चली स्वतन्त्रता संग्राम की श्रंखला थी ...! श्रीराम जन्मभूमि की स्वतन्त्रता का संग्राम चल रहा है यह अविचल है , अविराम है,  रामलला का  प्रगट होना भी एक पायदान थी  , बाबरी ढांचे का ध्वंस भी एक पायदान है , भव्य मन्दिर निर्माण  भी एक पायदान है ..! देश गुलाम हुआ और लंम्बी संघर्ष गाथा के साथ स्वतंत्र हुआ , कमजोर मानसिकता वाली सरकारों के कारण सांस्क्रतिक स्वतन्त्रता शेष चल रही है , जिसे संघर्ष के द्बारा प्राप्त करनी है ..! बाबरी ढांचा ४०० साल  से अधिक समय के बाद ढह गया , श्रीरामलला पूर्व में भी थे और अब भी हैं ...! आगे भी रहने वाले  हैं .. उन्हें कोन हटा सकता है..?
  सवाल यह है कि कांग्रेस सहित तमाम  दल १०० करोड़ हिन्दुओं के वोट से राज करते हैं,  हिन्दुओं को न्याय दिलाना इनका फर्ज है, स्वतन्त्रता का नैतिक सिद्धांत  है , श्रीराम का भव्य मंदिर अयोध्या में ही   बनेगा, कोंन कितने दिन रोक पायेगा ...? निर्णय आने के बाद मुठ्ठी बंद नही रह पायेगी ! वर्तमान सरकार के पास अवसर है कि वह मामले को सोमनाथ प्रक्रिया कि तरह हिन्दुओं को सोंप दे...!, अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की  भूमि को हिन्दुओं को सोंप देना ही प्रथम और अंतिम निदान है, अन्यथा नये सिरे से भीषण संग्राम सामने  दिख रहा है   ....! 
विनय न मानत जलधि जड़ , गये तीन दिन बीत |
बोले राम स्कोप तब , भय बिनु होई न प्रीति  ||     


एकमेव हल भव्य मन्दिर का निर्माण....      
     

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें