गुरुवार, 30 सितंबर 2010

चीनी सैनिकों की गिलगित व बल्तिस्तान में मौजूदगी


गिलगिट और बल्तिस्तान में चीन., 
भारत ने क्या किया..?  
- अरविन्द सीसोदिया  
मनमोहन सिंह सरकार यह न भूले कि इतिहास याद नहीं रखता और समय के साथ सब कुछ लोग भूल जाते हैं, वे जिस पद पर हैं और चीन जैसा विषय है, वह हजारों साल के इतिहास में जाएगा , पंडित जवाहर लाल नेहरु के नाम दो पराजय दर्ज हैं .., पाकिस्तान से १९४७-४९ युद्ध में  अपनी भूमि वापस नहीं लेने की और १९६२ में  चीन से हार की...! तब भी यही; देखते हुए भी खामोश रहने की नीति; पर भारत चला था..! चीन की १९४९ से ही बाद नियत सामने आगई थी मगर हम अपने तिब्बत पर जारी अधिकार उसे देते  हुए सन्तुष्ट करने में लगे रहे, नतीजा यह हुआ कि वह उसी दिन से हम पर सवार हो गया , हमारा कैलाश - मानसरोवर सहित तमाम चंडी पहाड़ियों आदि  अनेकों स्थानों पर उसने  कब्जा कर लिया..! अंततः १९६२ में युद्ध भी हुआ और शर्मनाक पराजय हुई..! अगर हमारी रक्षा तैयारियों में यही ढील रही तो आगे आने वाले परिणाम भी भिन्न नहीं होंगे ...!! यह समयोचित चेतावनीं है..! संभाल जाओ ..!!   
   पाकिस्तान चुपके-चुपके अपने कब्जे वाले कश्मीर में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण गिलगिट बल्टिस्तान का वास्तविक नियंत्रण चीन के हाथों में सौंप रहा है जहां पाकिस्तानी शासन के खिलाफ विद्रोह सुलग रहा है।
    ‘न्यूयार्क टाइम्स’ में प्रकाशित उस रिपोर्ट के बारे में, जिसमें इस बात का जिक्र किया गया  कि चीन की ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी’ के करीब 7,000 से 11,000 सैनिक पाक अधिकृत कश्मीर के सामरिक महत्व के  गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में मौजूद हैं।  इस क्षेत्र को विश्व जगत की आवाजाही के लिए बंद करके रखा गया है। गौरतलब है कि न्यूयॉर्क टाइम्स की में कहा गया था कि चीन ने वास्तविक सीमा-रेखा के पास अपनी विमानन गतिविधियां शुरू की हैं और इस क्षेत्र में सेना की मौजूदगी तथा उसकी क्षमता बढ़ाई है।
    भारत ने कहा है कि वह पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर के गिलगिट और बल्तिस्तान में चीनी सेना की मौजूदगी की खबरों की जांच कर रहा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विष्णु प्रकाश ने कहा कि भारत अपने सुरक्षा के लिए हर संभव उपाए करेगा। हमने इस संदर्भ में मीडिया की रिपोट देखी हैं और स्वतंत्र रूप से इन रिपोर्टों की जांच कर रहे हैं और अगर इनमें सच्चाई है तो यह चिंता का विषय है। यदि यह सच निकला, तो यह गंभीर चिंता का विषय होगा और राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जो जरूरी होगा हम सब करेंगे।’
   चीन सैनिकों की गिलगित व बल्तिस्तान क्षेत्र में घुसपैठ पर चीन सरकार ने शुरू में इनकार कर दिया था, लेकिन जब भारत के राजदूत एसजे शंकर ने चीन के उप- विदेश मंत्री से भेंट करके भारत की गम्भीर आपत्ति और चिंता जताते हुए उपग्रह से लिए गए फोटो दिखाए और इस क्षेत्र में चीनी सैनिकों की मौजूदगी के तौर पर पेश किया, तो तुरन्त पासा पलटते हुए उन्होंने माना कि चीन के सैनिक इस क्षेत्र में मौजूद हैं, मगर वे बाढ़ प्रभावित लोगों को मानवीय सहायता पहुँचाने के लिए काम कर रहे हैं। सच तो यह है कि इस क्षेत्र में चीनी सैनिक तैनात हैं और वे वहां कई तरह के सामरिक रूप से महत्वपूर्ण निर्माण व ढाँचागत कार्यों में जुटे हुए हैं।
     चीन सुरंगें, सड़कें, रेलमार्ग व डैम बनाने के नाम पर भारत के उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र को घेरने की खतरनाक रणनीति पर काम कर रहा है।  अरुणाचल के मुद्दे पर बुरी तरह असफल रहने के बाद वह पाक अधिकृत कश्मीर में अपनी सेना को तैनात करके इस महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्र के जरिये भारत पर दबाव बनाये रखना चाहता है। यही कारण है कि वह कश्मीर को विवादित क्षेत्र कहते थकता नहीं।
     दूसरा रेल व सड़क मार्ग बन जाने से पाक में चीन द्वारा निर्मित ग्वादर बन्दरगाह, पासनी, ओरमारा जैसे नौसैनिक अड्डे तक जल्दी से जल्दी पहुँचा जा चुका है। चीन को तेल लेने के लिए खाड़ी के देशों तक पहुँचने में फिलहाल 16 से 25 दिन का समय लगता है, लेकिन परिवहन का पूरा होने पर यह समय केवल 48 घंटे का रह जाएगा। इससे पाक जलसेना भारत के खिलाफ मजबूती भी हासिल कर लेगी।
   गिलगित और बल्तिस्तान क्षेत्र की जनता में पाक शासन के खिलाफ एक लम्बे समय से रोष है। अब इसने एक विद्रोह की शक्ल ले ली है। ये इलाका 31 अक्टूबर 1947 से पाक के गैर कानूनी कब्जे में है, जबकि जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने इसे भारत के साथ जोड़ दिया था। पाक इस क्षेत्र का इस्तेमाल एक राजनीतिक हथियार के तौर पर कर रहा है।
   1947 में जब पाक ने इस क्षेत्र पर कब्जा जमाया था, उस दिन से व 1970 तक दुनिया में बदनाम फ्रंटियर क्राइम रेगुलेश्न एक्ट के तहत इस क्षेत्र पर शासन करता रहा। बाद में शासन का कार्यभार पाक सरकार के कश्मीर मामलों के मंत्रालय के सचिव ने संभाल लिया। इस क्षेत्र के लिए 28 निर्वाचित सदस्यों की उत्तरी क्षेत्र विधान परिषद अधिकारविहीन रही। इसलिए सभी राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इसका सीधा शासन इस्लामाबाद से चलता रहा। पाक की संसद में इसका कोई प्रतिनिधि नहीं था।
    इस क्षेत्र की आबादी लगभग 25 लाख है। इसमें शिया, सुन्नी और नूरबख्शी मुस्लमान रहते हैं। शिया की आबादी सबसे ज्यादा है। जब भी शिया पाकिस्तान के शिकंजे से निकलने के लिए आन्दोलन करते हैं, पाक की खुफिया एजेंसी शिया व सुन्नियों में फसाद कराकर आन्दोलन को दबा देती है। इस क्षेत्र में दूसरे प्रान्तों के लोगों को, विशेष तौर पर पंजाबियों और पठानों को लाकर बसा दिया गया है ताकि यहां के लोग अल्पसंख्यक हो जाएं। जबकि कानून के अनुसार इस क्षेत्र में कोई भी बाहरी आदमी आकर बस नहीं सकता और न ही मकान-जायदाद खरीद सकता है।
घुसपैठ  दर घुसपैठ 
-भारत- चीन सीमा की वास्तविक नियंत्रण रेखा में 2008 में 270 बार चीनी घुसपैठ की घटनाएं हुई थीं। 2009 में घुसपैठ की घटनाएं बढ़ीं। 2008 के पहले छह महीने में चीन ने सिक्किम में कुल 71 बार भारतीय इलाके में चीन ने घुसपैठ की।
-जून, 2008 में चीन के सैनिक वाहनों के काफिले भारतीय सीमा से एक किलोमीटर भीतर तक आ गए। इसके एक महीने पहले चीनी सैनिकों ने इसी इलाके में स्थित कुछ पत्थर के ढांचे तोड़ने की धमकी भी दी, जिस धमकी को बाद में चीनी अधिकारियों ने दोहराया भी था।
-सितंबर 2008 में लद्दाख में सीमा पर स्थित पांगोंग त्सो झील  पर चीनी सैनिकों का मोटर बोट से भारतीय सीमा में अतिक्रमण तो नियमित रूप से चलता आ रहा है और आज तक जारी भी है। 135 किमी लंबी इस झील का दो तिहाई हिस्सा चीन के पास है और शेष एक तिहाई भारत के पास है।
-कारगिल युद्घ के दौरान चीन ने इस झील  के साथ-साथ पांच किमी का एक पक्का रास्ता बना लिया है, जो झील  के दक्षिणी छोर तक है। यह इलाका जो भारतीय सीमा के भीतर आता है।
-जून 2009 में जम्मू- कश्मीर में मौजूद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित देमचोक (लद्दाख क्षेत्र) में दो चीनी सैनिक हेलीकप्टर भारतीय सीमा में नीचे उड़ते हुए घुसे। इन हेलीकप्टरों से डिब्बाबंद भोजन गिराए गए। जुलाई, 2009 में हिमाचल प्रदेश के स्पीति, जम्मू -कश्मीर के लद्दाख और तिब्बत के त्रिसंगम में स्थित ‘माउंट ग्या’ के पास चीनी फौज  भारतीय सीमा से करीब 1.5 किलो मीटर भीतर तक आ गई। इन चीनी सैनिकों ने पत्थरों पर लाल रंग से ‘चीन’ भी लिखा।
-31 जुलाई 2009 को भारत के सीमा गश्ती दल ने ‘जुलुंग ला दर्रे’  के पास लाल रंग में चीन-चीन के निशान भी लिखे देखे।  सितंबर, 2009 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ने केंद्र सरकार को चमोली जिले के रिमखिम इलाके के स्थानीय लोगों से मिली चीनी घुसपैठ की जानकारी दी। इस जानकारी के अनुसार पांच सितंबर, 2009 को चीनी सैनिक भारतीय सीमा के भीतर दाखिल हुए।
अरुणाचल प्रदेश का मसला
अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन लगातार बयानबाजी करता रहा है। चीन ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग इलाके को ‘दक्षिण तिब्बत’ का नाम दिया है। इसके अलावा वह अरुणाचल प्रदेश को चीन के नक्शे पर दिखाता है। चीन का दावा है कि अरुणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा है। यही वजह है कि चीन अरुणाचल प्रदेश के लोगों को वीजा नहीं देता है क्योंकि चीन का तर्क है कि अरुणाचल प्रदेश के निवासी चीन के नागरिक हैं। भारत चीन के इन कदमों का विरोध करता रहा है। कुछ साल पहले चीनी सैनिकों ने बुद्घ की एक प्रतिमा को तबाह कर दिया था। इस प्रतिमा को भारत-चीन सीमा पर मौजूद बुमला नाम की जगह पर बनाया गया था। भारत के प्रधानमंत्री डा मनमोहन सिंह के अरुणाचल प्रदेश दौरे का भी चीन ने विरोध किया था। इसके अलावा तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा की भी अरुणाचल यात्रा का चीन ने विरोध किया था। गौरतलब है कि दलाई लामा ने अरुणाचल प्रदेश की यात्रा के दौरान इसे भारत का हिस्सा बताया था।
कश्मीर का मुद्दा 
कश्मीर को लेकर चीन का रवैया पाकिस्तान को खुश करने वाला है। चीन ने कई मौकों पर जम्मू-कश्मीर को विवादित इलाका बताकर भारत से खटास बढ़ाई है। जम्मू-कश्मीर के लोगों को वीजा जारी करते समय चीन वीजा को पासपोर्ट के साथ चिपकाने की बजाय नत्थी कर देता है। भारत नत्थी किए गए वीजा को मान्यता नहीं देता है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर के निवासी चीन की यात्रा नहीं कर पा रहे हैं। अपने इस कदम के पीटे चीन का तर्क है कि जम्मू-कश्मीर एक विवादित इलाका है।
कर्ज में अड़ंगा 
चीन ने अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत और चीन के बीच चल रहे विवाद को तीसरे मंच पर उठाने की कोशिश के तहत एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) के सामने यह मुद्दा उठाया था। भारत ने 88 अरब रुपये के लोन के लिए आवेदन किया था, जिसका इस्तेमाल अरुणाचल प्रदेश में पीने के पानी के इंतजाम के लिए किया जाना था। चीन का तर्क था कि चूंकि अरुणाचल प्रदेश एक विवादास्पद क्षेत्र है इसलिए यहां किसी योजना के लिए लोन नहीं दिया जाना चाहिए।
लेफ्टि. जनरल को वीजा नहीं ....
चीन ने भारत के लेफ्टि. जनरल बीएस जायसवाल को विज़ा देने से इंकार कर दिया है. चीन का कहना है कि बीएस जायसवाल को विज़ा इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि वह कश्मीर के विवादित क्षेत्र को नियंत्रित करते है. चीन की इस हरकत के जवाब में भारत ने भी अपना रुख कड़ा अपनाते हुए चीन के दो सेना अधिकारियों को वीजा देने से इंकार कर दिया है.गौरतलब है कि नॉर्दन एरिया कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बीएस जायसवाल को रक्षा संबंधों के तहत अगस्त के महीने में चीन की यात्रा पर जाना था. भारतीय सेना ने इस यात्रा के लिए जून के महीने में ही तैयारी शुरू कर दी गई थी लेकिन चीन ने ये कहकर मना कर दिया कि वह जम्मू कश्मीर के विवादित क्षेत्र में तैनात हैं. चीन के इस कदम पर भारत ने कड़ा ऐजराज जताया है और विदेश मंत्रालय इस मुद्दे पर चीन से बात कर रहा है.

चीन के कारनामों की अनेकों दस्ताने हैं....
खबर दर ख़बरें हजारों ख़बरों का पुलंदा देश के सामने है...!! 
* चीन की घुसपैठ मामूली, मीडिया दे रहा बेवजह तूल
* चीन पर नजर: नयोमा में उतरा हवा का प्रहरी
* पड़ोसियों से परेशानीः चीन कर रहा रेल लाइन की तैयारी
* सिक्किम में चीन की ओर से फायरिंग
* चीन से सटी सीमा पर बढ़ाई जा रही सैन्य क्षमता
* काराकोरम में धीरे-धीरे जमीन हथिया रहा है चीन
* पाकिस्तान ने सीमा पार से फिर शुरू की घुसपैठ
* पाकिस्तान  ने भारतीय इलाकों में रॉकेट दागे
  • पीओके के इलाके चीन को सौंप रहा है पाक
  • ड्रैगन के पैंतरे का सख्त जवाब दिया भारत ने
  • भारतीय आर्मी ऑफिसर को चीन ने रोका
  • चीन के साथ रिश्तों में बढ़ सकती है दरार
  • 'वीसा मसले पर चीन का रवैया गैर दोस्ताना'
  • ज्यादातर चीनी भारत को दुश्मन मानते हैं
  • चीन को अपना दोस्त नहीं मानते 52 पर्सेंट भारतीय
  • ड्रैगन पचाता गया हमारी जमीन
  • पूर्वोत्तर में मिसाइल की तैनात पर विचार

बुधवार, 29 सितंबर 2010

कामनवेल्थ, भ्रष्टाचार और बदनामी : सोनिया & राहुल चुप..,

अपमान के कडवे घूँट 
- अरविन्द सीसोदिया
  याद रहे कि दृढ प्रतिज्ञ  ही हमेशा जीतता है और सझौतावादी  हमेशा  ही हारता  है ! 
         ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल खेलों की महमान नवाजी  भारत कि बहुत मंहगी पड रही है , एक ईसाई महिला के नीचे दबी कांग्रेस की राजनैतिक इच्छा शक्ती का पतन इस तरह का हो चुका है कि हर अन्तर्रष्ट्रीय मामले में ईसाई देश हावी हो गए हैं , इस नेतृत्व कर्त्ता को कभी भारत का अपमान; अपमान नहीं लगता है..!
             भारत के आम लोगों की पीड़ा चाहे  महंगाई  की हो , आतंकवाद  की हो , उग्रवाद की  हो , नक्सलवाद की हो , बेरोजगारी की हो , भुखमरी की  हो , विदेशी आक्रमण की बात हो ,  इन सभी  में भारत के लोगों की चिंता कभी नहीं की जाती है ...!  हर नीति में ईसाई फायदा पहले सोचा जाता है , इस तरह की घोर पतन की स्थिती की कल्पना कभी गांधी - नेहरु या स्वतन्त्रता सैनानिंयों ने भी नहीं की होगी ! मुद्रा  पर ईसाई क्रास बार बार सिक्कों पर बनाये जा रहे हैं , मदर टेरसा का स्तुती गान हो रहा है ! हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को लगातार अपमानित किया जा रहा है , अंग्रेजी इस तरह व्यवहार कर रही है मानों वह भारत कि असली शासक हो, देश को उसकी भाषा में न्याय नहीं है , चिकित्सा नहीं है , न अन्य व्यवहार हैं ...! किस तरह  अधिक से अधिक विदेशी कंपनीयां फायदा उठायें इसकी चिंता तो है मगर भारतीय कंपनियों का हित कोई नही सोचता..! वाह नव गुलामों ...!! वाह नई गुलामी !!
  यह आयोजन धन की लूट और   एतिहासिक भ्रष्टाचार  की इबारत  लिखने में लगा हुआ है ...! १५-२० हजार करोड़ के व्यय के अनुमान से यह आयोजन प्रारंभ हुआ था , अब अन्य खर्चो को छोड़ दिया जाये जो हजारों करोड़ के हैं , तब भी ७० हजार करोड़ से अधिक के व्यय को पार कर रहा है , तब भी काम अभी तक पूरे नहीं हुए , विदेशी कंम्पनियों को ठेके दिए गए देशी कंपनियों की अवेहलना की गई ..!
ज़रा तमीज रखें ; भारत नौकर नहीं ...
ज्यादातर संम्पन्न देशों की ओर से बड़े हल्के किस्म की आलोचनाएँ आ रहीं हैं ...! एक साहब कह रहे हैं कि उन्हें भारत गौरव से क्या लेना देना..? इसका मतलब तो यह हुआ कि वे साहब इस संगठन में होने ही नहीं चाहिए...! भारत संगठन का सदस्य होने के नाते ही यह आयोजन कर रहा है , कोई वह तुम्हारा नौकर थोड़े ही है...!! जिसको संगठन की समझ नहीं है उसे उसमें रहने का कोई अधिकार नहीं है , तुरंत उस व्यक्ति को भारत से बहार किया जाना चाहिए...!  भ्रष्टाचार और बदनामी का  खूब शोर मचने के बाद भी सोनिया & राहुल चुप.., विदेशी अपमान दर अपमान कर रहे हैं तो भी आप चुप हो , देह की सल्तनत आप के पास है , आपमें से एक अध्यक्ष है और दूसरा महासचिव  फिर भी बोलती बंद क्यों ..! क्या रहस्य है..!!
   -- ब्रिटेन का  प्रतिनिधि जीता , भारत की राष्ट्रपती हारा...!
    दिल्ली में 3 से 14 अक्टूबर तक होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों का उदघाटन वेल्स के राजकुमार प्रिंस चार्ल्स ही करेंगे। ब्रिटेन के शाही परिवार ने साफ किया है कि महारानी एलिजाबेथ की नामौजूदगी में प्रिंस चार्ल्स ही 19वें कॉमनवेल्थ खेलों का उदघाटन करेंगे। जबकी राजकुमार कि संवैधानिक स्थिती उपराष्ट्रपति स्तर की है |
     भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल सिर्फ उदघाटन संदेश पढ़ेंगी और प्रिंस चार्ल्स से पूछेंगी कि क्या खेल शुरू हों? हालांकि, इससे पहले ये खबर आई थी प्रतिभा पाटिल खेल का आधिकारिक उदघाटन करेंगी और प्रिंस चार्ल्स सिर्फ महारानी की ओर से भेजा गया संदेश पढ़ेंगे। चूंकि महारानी गेम्स में नहीं आ रही हैं और प्रोटोकॉल के मुताबिक राष्ट्रपति का पद ऊंचा है, ऐसे में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को गेम्स का शुभारंभ करना चाहिए था। लेकिन ब्रिटेन इसके लिए नहीं माना। दोनों देशों के बीच बातचीत का लंबा दौर चला लेकिन बात नहीं बनी। गौरतलब है कि 1998 में जब मलेशिया में कॉमनवेल्थ खेल आयोजित हुए थे तो वहां के राजा ने औपचारिक उदघाटन किया था। तब महारानी का प्रतिनिधित्व उनके बेटे एडवर्ड ने किया था |  ब्रिटिश राजपरिवार ने कहा कि प्रिंस चाल्र्स ही खेलों का उद्घाटन करेंगे। ब्रिटिश महारानी राष्ट्रमंडल देशों की औपचारिक प्रमुख मानी जाती है। पिछले 44 वर्षो में यह पहला अवसर होगा, जब वह इस खेल महाकुंभ के दौरान मौजूद नहीं रहेंगी।
आयोजन की दावेदारी हासिल करने में घूस 
--- भारत ने कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन की दावेदारी को हासिल करने के लिए सभी 72 कॉमनवेल्थ देशों को एक-एक लाख डॉलर की घूस दी थी! ‘डेली टेलीग्राफ’ की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। अखबार के मुताबिक खेलों के आयोजन की दावेदारी में जमैका के फाइनल प्रेजेंटेशन में भारत अंतिम समय में पिछड़ गया था। पैसे की पेशकश किए जाने के बाद ही उसे यह दावेदारी हासिल हो सकी।  रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रोलिया को भारत से लगभग एक लाख 25 हजार डॉलर की राशि घूस के रूप में मिली थी। जमैका में हुए फाइनल प्रेजेंटेशन में दिल्ली को खेलों की मेजबानी पर मुहर लगी। इसमें सभी 72 देशों को एथलीट ट्रेनिंग स्कीम के नाम पर एक-एक लाख डॉलर (उस समय के लगभग एक लाख 40 हजार डॉलर) दिए गए। जो धन सभी देशों को भारत की ओर से दिया गया वह ऑस्ट्रेलिया के लिए महत्वपूर्ण नहीं रह गया था क्योंकि उसने पहले ही भारत की दावेदारी का समर्थन कर दिया था। लेकिन कई छोटे देश जिनके छोटे-छोटे कई फायदे थे उन्होंने धन लेकर भारत का समर्थन किया जिसकी बदौलत दिल्ली कनेडियन शहर को 46-22 से पछाड़ सकी। हेमिल्टन के आयोजकों ने दावेदारी के लिए सभी देशों को 70-70 हजार अमेरिकी डॉलर की पेशकश की थी।
ग़ुलामी का चापलूसी 
-- ३ से १४ अक्टूबर २०१० तक दिल्ली में होने वाले जिन ब्रिटिश राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भारत सरकार और दिल्ली सरकार दिन-रात एक कर रही है, पूरी ताकत व अथाह धन झोंक रही है, वे भी इसी गुलामी की विरासत है। इन खेलों में वे ही देश भाग लेते हैं जो पहले ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन रहे हैं। दुनिया के करीब १९० देशों में से महज ७१ देश इसमें शामिल होंगे। इन खेलों की शुरुआत १९१८ में ‘साम्राज्य के उत्सव’ के रुप में हुई थी। राष्ट्रमंडल खेलों की संरक्षक ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय है और उपसंरक्षक वहां के राजकुमार एडवर्ड हैं। हर आयोजन के करीब १ वर्ष पहले महारानी ही इसका प्रतीक डंडा आयोजक देश को सौंपती हैं और इसे ‘महारानी डंडा रिले’ कहा जाता है। इस डंडे को उन्हीं देशों में घुमाया जाता है, जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य में रहे हैं। यह रैली हर साल बकिंघम पैलेस से ही शुरु होती है।
धन बर्वादी और व्यर्थ का संकट 
-- साम्राज्य और गुलामी की याद दिलाने वाले इन खेलों के दिल्ली में आयोजन की तैयारी कई सालों से चल रही है। ऐसा लगता है कि पूरी दिल्ली का नक्शा बदल जाएगा। कई स्टेडियम, खेलगांव, चौड़ी सडकें , फ्लाईओवर, रेल्वे पुल, भूमिगत पथ, पार्किंग स्थल और कई तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं। पर्यावरण नियमों को ताक में रखकर यमुना की तलछटी में १५८ एकड  में विशाल खेलगांव बनाया गया  है, जिससे इस नदी और जनजीवन पर नए संकट पैदा होंगे।
-- इस खेलगांव से स्टेडियमों तक पहुंचने के लिए विशेष ४ व ६ लेन के भूमिगत मार्ग और विशाल खंभों पर ऊपर ही चलने वाले मार्ग बनाए जा रहे हैं। दिल्ली की अंदरी और बाहरी, दोनों रिंगरोड को सिग्नल मुक्त बनाया जा रहा है, यानी हर क्रॉसिंग पर फ्लाईओवर होगा। दिल्ली में फ्लाईओवरों व पुलों की सख्या शायद सैकड़ा पार हो जाएगी। एक-एक फ्लाईओवर की निर्माण की लागत ६० से ११० करोड  रु. के बीच होती है। उच्च क्षमता बस व्यवस्था के नौ कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं। हजारों की संख्या में आधुनिक वातानुकूलित बसों के ऑर्डर दे दिए गए हैं, जिनकी एक-एक की लागत सवा करोड  रु. से ज्यादा है।

 दिल्ली 2010 - खेलों की नई शुरुआत

दिल्ली में 19वें कॉमनवेल्थ गेम्स में लगभग 71 टीमों के भाग लेने की संभावना है। इन राष्ट्रों के मण्डल  के 53 सदस्यों के साथ ब्रिटेन, ब्रिटिश क्राउन डिपेंडेंसीज और ब्रिटेन विदेशी क्षेत्रों के घटक देशों के लिए अलग अलग टीमें शामिल हैं। 1966 में जमैका और 1998 में मलेशिया के बाद भारत तीसरा विकासशील देश है जो इस आयोजन की मेजबानी कर रहा है।

       खेलों की सूची में १७ खेल शामिल हैं। इनमें तीरंदाजी, एक्वेटिक्स, एथलेटिक्स, बैडमिंटन, बॉक्सिंग, साइकिलिंग, जिमनास्टिक, हॉकी, लॉन बाउल, नेटबॉल, रग्बी सेवेन, शूटिंग, स्क्वॉश, टेबल टेनिस, टेनिस, भारोत्तोलन और कुश्ती शामिल है। विशिष्ट विकलांग एथलिटों के लिए 4 खेलों में 15 स्पर्धाएं आयोजित होंगी। इनमें एथलेटिक्स, तैराकी, पॉवरलिफ्टिंग और टेबल टेनिस है।
राष्ट्रभाषा का घोर अपमान 
      राजभाषा समर्थन समिति मेरठ ; अक्षरम एवं वाणी प्रकाशन दिल्ली की संगोष्ठी कर एक प्रस्ताव पारित किया जो निम्न प्रकार से है , उनके इस कार्य से कितना कुछ हुआ यह विषय नहीं है बल्की विषय यह है कि उनके सहासिक अकरी की तारीफ़ की जानी चाहिए...! 
संगोष्ठी में पारित प्रस्ताव
1. राजभाषा समर्थन समिति मेरठ एवं अक्षरम के संयोजन में एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिंमंडल जिसमें सांसद, पत्रकार, साहित्यकार शामिल होंगे गृहमंत्री, गृहराज्यमंत्री, दिल्ली की मुख्य मंत्री, राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अध्य़क्ष, खेल मंत्री से मुलाकात कर राजभाषा हिंदी के प्रयोग का प्रश्न उनके संज्ञान में लाएगा।
2. संसद व मीडिया में इस प्रश्न को उठाने के लिए सांसदों तथा मीडियाकर्मियों से संपर्क किया जाए।
3. खेलों की वेबसाइट हिंदी में तुरंत बनाई जाए।
4. दिल्ली पृलिस और नई दिल्ली नगरपालिका द्वारा सभी नामपट्टों व संकेतकों में हिंदी का भी प्रयोग हो ।
5. खेलों के दौरान वितरित की जाने वाली सारी प्रचार सामगी हिंदी में भी तैयार की जाए।
6. खेलों के आंखो देखे हाल के प्रसारण की व्यवस्था हिंदी में भी हो।
7. पर्यटकों व खिलाडियों के लिए होटलों व अन्य स्थानों पर हिंदी की किट भी हो।
8. उदघाटन समारोह व समापन समारोह भारत की संस्कृति व भाषा का प्रतिबिम्ब हो । सांस्कृतिक कार्यक्रम देश की गरिमा के अनुरूप हों। राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री व अन्य प्रमुख लोग अपनी भाषा में विचार व्यक्त करें।
9. राष्ट्रमंडल खेलों में हिंदी के प्रयोग के लिए एक जनअभियान चलाया जाए और सरकार द्वारा सुनवाई ना किये जाने पर जंतरमंतर व अन्य स्थानों पर धरने व प्रदर्शन की योजना बनाए जाए।
10. इस अवसर का उपयोग करते हुए राष्ट्रमंडल के देशों में हिंदी के प्रचार – प्रसार के लिए कार्ययोजना तैयार की जाए।
.......
विशेषकर हम हिन्दी ब्लॉग वालों को इस सन्दर्भ में खुल कर बोलना चाहिए...!!

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

श्रीरामजन्म भूमि , बड़े राजनीतिक षड्यंत्र का पटाक्षेप



श्रीरामजन्म भूमि फैसला आना ही हितकर,
३० सितम्बर को ३.३० पर आयेगा फैसला  
- अरविन्द सीसोदिया 
              नई दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्‍या की श्रीरामजन्म भूमि विवादित जमीन से जुड़े मुकदमे पर फैसला सुनाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट को अनुमती  दे दी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ३० सितम्बर को अपहरण ३.३० बजे फैसला सुनाएगा ! इस फैसले से जो भी पक्ष असंतुष्ट होगा वह सर्वोच्चा न्यायालय में अपील कर सकेगा !! इसी के साथ एक बड़ी राजनैतिक साजिस के तहत फैसला रोकने की दायर याचिका को निरस्त कर दिया गया है !! इस सुनवाई का इंतजार पूरा देश कर रहा था। याचिका की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। तीन सदस्यीय इस पीठ ने सर्वसम्मति से यह याचिका खारिज की।
   ये याचिका पूर्व नौकरशाह रमेशचंद्र त्रिपाठी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए दाखिल की थी। इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रमेशचंद्र की इस याचिका को खारिज करने के साथ ही उन पर 50000 रुपये का जुर्माना भी लगा दिया था। सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद रमेश चंद्र को अब इस जुर्माने की भरपाई भी करनी होगी।
                ज्ञातव्य रहे कि , इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच को अयोध्या विवाद पर अपना फैसला 24 सितंबर को सुनाना था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला टालने संबंधी याचिका पर 23 सितंबर को सुनवाई करते हुए 28 सितंबर को फैसला सुनाने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद लखनऊ बेंच अपना फैसला 24 सिंतबर को नहीं सुना सकी थी। बेंच ने 26 जुलाई 2010 को मामले की सुनवाई पूरी कर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था।
        -स्‍वामी चक्रपाणि, अध्‍यक्ष, अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने सबसे तीखी टिपण्णी  करते हुए कहा है  ‘सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक बड़े राजनीतिक षड्यंत्र का पटाक्षेप हो गया है। आखिर 60 वर्षों से इस मामले पर आपसी सुलह की पहल क्‍यों नहीं की गई। अब इलाहाबाद हाईकोर्ट का जो भी निर्णय आता है, उसे हिंदू और मुसलमान को मानना चाहिए। यदि इस फैसले से कोई पक्ष असंतुष्‍ट हो तो उन्‍हें सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए।
      अब , इलाहबाद हाईकोर्ट की जस्टिस सैय्यद रफत आलम, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा की पीठ इस मामले में  अपना फैसला सुनाएगी। हालांकि न्‍यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा इस महीने के आखिर में सेवानिवृत  हो रहे हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट में विवाद के जो बिंदु तय हैं वे हैं- पहला, क्या उक्त ढांचा मंदिर ढहाने के बाद बना, अगर हां तो इसका क्या प्रभाव पड़ा? दूसरा, क्या इसे बाबरी मस्जिद घोषित किया जा सकता है? तीसरा, क्या अनंतकाल से मुस्लिम समुदाय इसमें नमाज पढ़ता आ रहा है? चौथा, क्या रामलला की मूर्ति बाद में वहां रखी गई या वह सदा से अस्तित्व में थी? पांचवां, क्या हिंदू समुदाय इसे अनंतकाल से राम जन्मस्थली मानकर तीर्थाटन करता आ रहा है?
       10 जुलाई 1989 को गठित इलाहबाद हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने इस मामले में अपनी पहली सुनवाई 7 अगस्त 1989 को की थी। पीठ के गठन के बाद से इसमें 14 बार बदलाव हो चुका है। पहली विशेष पीठ में न्यायमूर्ति केसी अग्रवाल, न्यायमूर्ति यूसी श्रीवास्तव व न्यायमूर्ति एसएचए रिजवी थे। यह पीठ साल भर बाद बदल गई थी। 1993 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था लेकिन 1995 को इसे वापस इलाहबाद हाईकोर्ट लौटा दिया गया था ।

      कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी कहते हैं कि यह विवाद देश के सामने खड़े अन्य मसलों के आगे बौना है। मंदिर-मस्जिद के एक कम या ज्यादा होने से लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। हम पंथ-निरपेक्ष हैं और संविधान इसकी तस्दीक करता है।
 19 मार्च 2007:  राहुल गाँधी ने चुनावी दौरे में कहा कि अगर नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो बाबरी मस्जिद न गिरी होती।

ईसा मसीह ; क्या भारतीय ज्ञान का प्रकाश

ईसा मसीह की भारत यात्रा पर खोज हो.... 
- अरविन्द सीसोदिया 
हमारे देश में अनेकों महान आत्मदर्शी हुए हैं , इनमें से एक रजनीश अर्थात ओशो हैं , उनके धरा प्रवाह भाषणों के आधार पर ६५० से भी अधिक पुस्तकें २० भाषाओं में छप चुकी हैं , उनकी एक पुस्तक "भारत : एक अनूठी संपदा "  है , उसमें उन्होंने ईसा मसीह के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि ईसा ज्ञान कि प्रकाश भारत से लेकर गए थे और उनकी मृत्यु भी भारत में ही हुई है !  
-- यह संयोग मात्र ही नहीं है कि जब भी कोई सत्य के लिए प्यासा होता है , अनायास ही वह भारत में उत्सुक हो उठाता है , अचानक वह पूरब की यात्रा पर निकाल पड़ता है | और यह केवल आज की ही बात नहीं है | यह उतनी प्राचीन बात है जितने पुराने पुराण और उल्लेख मौजूद हैं | आज से पच्चीस सौ वर्ष पूर्व , सत्य की खोज में पाइथागोरस भारत आया था | ईसा मसीह भी भारत आए थे | 
-- ईसा मसीह को तेरह से तीस वर्ष की उम्र के बीच का बाइबल में कोई उल्लेख नहीं है | - और यही उनकी लगभग पूरी जिन्दगी थी , क्योंकि तैंतीस की उम्र में तो उन्हें सूली पर ही चढ़ा दिया गया था | तेरह से तीस तक के सत्रह सालों का हिसाब गायब है | इतने समय वे कहाँ रहे , और बाईबिल में उन सालों को  क्यों नहीं रिकार्ड किया गया है ?  उन्हें जान बूझ कर छोड़ा गया है , कि वह एक मौलिक धर्म नहीं है, कि ईसा मसीह जो भी कह रहे हैं वे उसे भारत से लाए हैं |
-- यह बहुत विचारणीय बात हर | वे एक यहूदी की तरह जन्में , यहूदी की तरह जिए और यहूदी तरह मरे | स्मरण रहे कि वे ईसाई नहीं थे , उन्होंने तो - ' ईसा ' और ' ईसाई ' ये शब्द भी नहीं सुने थे | फिर क्यों यहूदी उनके इतने खिलाफ थे ? यह सोचने जैसी बात है , आशिर क्यों ? न तो ईसाइयों के पास इस सवाल का ठीक ठीक जबाब है , और न ही यहूदियों के पास | क्योंकि इस व्यक्ती ने किसी को कोई नुक्सान नहीं पहुंचाया | वे इतने निर्दोष थे , जितनी कि कल्पना की जा सकती | 
       पर उनका अपराध बहुत सूक्ष्म था | पढ़े-लिखे यहूदीयों और चतुर रबाईयों ने स्पष्ट देख लिया कि वे पूरब से विचार ला रहे हैं, जो हेर यहूदी हैं | वे कुछ अजीवो गरीब और विजातीय बातें  ला रहे हैं | और यदि इस दृष्टिकोंण से देखो तो तुम्हे समझ आयगा कि क्यों वे बार बार कहते हैं - " अतीत के पैगम्बरों ने तुमसे कहा था  कि कोई तुमसे क्रोध करे , हिंसा करे , तो आँख के बदले आँख लेने और ईंट का जबाब पत्थर से देने  को तैयार रहना | मैं तुमसे कहता हूँ कि अगर कोई तुम्हे चोट पहुचाता है , एक गाल पर चांटा मरता है , तो उसे अपना दूसरा गाल भी दिखा देना | " यह पूर्णतः गैर यहूदी बात है | ये बातें गौतम बुद्ध और महावीर की देशनाओं से सीखीं थीं  |

-- वे जब भारत आए थे - तब बौद्ध धर्म बहुत जीवित था, यद्यपि बुद्ध की मृत्यु हो चुकी थी | गौतम बुद्ध के पांच सौ साल बाद जीसस यहाँ आय , पर बुद्ध ने इतना विराट आन्दोलन , इतना बड़ा तूफ़ान खडा किया था कि तब तक भी पूरा मुल्क उसमें डूबा हुआ था ; उनकी करुना , क्षमा और प्रेम के उपदेशों को पिए हस था | जीसस कहते हैं अतीत के पैगम्बरों के द्वारा यह कहा गया था " कोंन हैं ये पुराने पैगम्बर  ? " वे सभी प्राचीन यहूदी पैगम्बर  हैं : इजेकिएल , इलिजाह , मोसेस, - ईश्वर बहुत ही हिंसक है , और वह कभी क्षमा नहीं करता !?
           यहाँ तक कि उन्होंने ईश्वर के मुंह से भी यह शब्द कहलवा दिए हैं | पुराने टेस्टामेंट के ईश्वर के वचन हैं , " में कोई सज्जन पुरुष नहीं हूँ , तुम्हारा चाचा नहीं हूँ | मैं बहुत क्रोधी और ईष्यालु  हूँ , और याद रहे जो भी मेरे साथ नहीं हैं , वे सब मेरे शत्रु हैं |   " और ईशा मसीह कहते हैं कि " मैं तुमसे कहता हूँ : परमात्मा प्रेम है | " यह ख्याल उन्हें कहाँ से आया कि परमात्मा प्रेम है ? गौतम  बुद्ध की शिक्षाओं के सिवाय दुनिया में कहीं भी परमात्मा को प्रेम कहने का कोई उल्लेख नहीं है |
-- उन सत्रह वर्षों में जीसस इजिप्त , भारत, लद्दाख और तिब्बत की यात्रा करते रहे | और यही उनका अपराध था कि वे यहूदी परम्परा के बिलकुल अपरिचित और अजनबी विचारधाराएं ला रहे थे | न केवल अपरिचित बल्कि वे बातें यहूदी धारणाओं से एकदम विपरीत थीं | 
   तुम्हे जानकर आश्चर्य होगा कि अंततः उनकी मृत्यु भी भारत में हुई | और ईसाई रिकार्ड्स इस तथ्य को नजर अंदाज करते रहे हैं | यदी उनकी बात सच है कि जीसस पुनर्जीवित हुए थे , तो फिर पुनर्जीवित होने के बाद उनका क्या हुआ ? आजकल वे कहाँ हैं ? क्यों कि उनकी मृत्यु का तो उल्लेख है ही नहीं ..! 
-- सचाई यह है कि वे कभी पुनर्जीवित नहीं हुए | वास्तव में वे सूली पर कभी मरे ही नहीं थे | क्यों कि यहूदियों की सूली आदमी को मरने की सर्वाधिक बेहूदी तरकीब है (अत्यंत कष्टकारक और कई दिन कष्ट देने वाली ) | उससे आदमी को मरने में करीब करीब अडतालीस घंटे लग जाते हैं | चूंकि हाथों और पैरों में कीइलें ठोंक दी जाती हैं , तो बूँद बूँद करके उनसे खून टपकता रहता है | यदी आदमी स्वस्थ है तो साठ घंटे भी ज्यादा लोग जीवित रहे एसे उल्लेख हैं | औसत अडतालीस घंटे तो लग ही जाते हैं |  और जीसस को तो सिर्फ छः घंटे बाद ही सूली से उतार दिया गया था | यहूदी-सूली पर; कोई भी छः घंटे में कभी नहीं मरा है , कोई मर ही नहीं सकता है |
( इसके बाद ओशो बताते हैं कि , जीसस को सूली दिए जाने के समय , जूडिया प्रान्त , रोमन साम्राज्य के अंतर्गत था , वहां रोमन वायसराय पोंटियस  पायलट तैनात था , निर्दोष जीसस की ह्त्या में उसकी कोई  रूचि नहीं थी , मगर पूरा प्रान्त यहूदी था , यहूदी धर्माचार्यों के दबाब में उसे सूली पर लटकने के आदेश देने पड़े, वायसराय और उनकी नौकरशाही ने जीसस को बचाने की भूमिका कूटनीतिक पूर्ण तरीके से रची कि जीसस बच भी जाये और आम यहूदी उसे मरा हुआ  मान भी लें ..! इसी क्रम में जीसस को सुबह के बजाये दोपहर  में सूली पर लटकाया गया , शुक्रवार को सध्या होते ही यहूदी अपने सारे काम छोड़  देते हैं और शनीवार को पवित्र दिन मनाते हैं , यहूदियों के हटते ही जीसस को उतारा गया और गुफा में रखा गया , पवित्र दिन के बाद पुनः जीसस को सूली पर चड़ने की योजना यहूदी बना चुके थे , मगर उन्हें शिष्यों के साथ रातों रात जूडिया प्रान्त के बाहर निकाल गया , ताकी खतरा टले ..!  )
इससे आगे ओशो बताते हैं.....
जीसस भारत में..
-- जीसस ने भारत आना क्यों पशंद किया ? क्यों कि अपनी युवावस्था में भी वे वर्षों तक भारत में रह चुके थे | उन्होंने आध्यात्म का और बृह्म का परम स्वाद इतनी निकटता से चखा था , कि उन्होंने लौटना चाहा | तो जैसे ही स्वस्थ हुए , वे वापस भारत आए और फिर एक सौ बारह साल की उम्र तक जिए |
       कश्मीर में अभी भी उनकी कब्र है | उस पर जो लिखा है , वह हिब्रू भाषा में है..., स्मरण रहे भारत में कोई यहूदी नहीं रहते | उस शिलालेख पर खुदा है " जोशुआ " - वह हिब्रू भाषा में ईसा मसीह का नाम है | ' जीसस ' ' जोशुआ ' का ग्रीक रूपांतरण  है | जोसुआ यहाँ आये - समय , तारीख़ बगैरह सब दी हैं | एक महान सद्गुरु , जो स्वयं को भेड़ों का गडरिया पुकारते थे , अपने शिष्यों के साथ शांतिपूर्वक एक सौ बारह साल की दीर्घायु  तक यहाँ रहे |  इसी वजह से वह स्थान ' भेड़ों के चरवाहे का गाँव ' कहलाने लगा, तुम वहां जा सकते हो , वह शहर अभी भी है -' पहलगाम ' उसका कश्मीरी में वही अर्थ है - 'गडरिए का गाँव '
   वे यहाँ रहना चाहते  थे , ताकि और अधिक आत्मिक विकास कर सकें | एक छोटे से शिष्य समूह के साथ वे रहना चाहते थे ताकी वे सभी शांति में . मौन में डूब कर अध्यात्मिक प्रगति कर सकें  और उन्होंने मरना भी यहीं चाहा , क्यों कि यदि तुम जीने की कला जानते हो तो यहाँ जीवन एक सौन्दर्य है , और तुम मरने की कला जानते हो तो यहाँ मरना भी अत्यंत अर्थपूर्ण है | 
   केवल भारत में ही मृत्यु की कला खोजी गई है , ठीक वैसे ही जैसे जीने की कला खोजी गई है | वस्तुतः तो वे एक ही प्रक्रिया के दो अंग हैं |......
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निष्कर्ष ...
ईशा मसीह की कब्र कश्मीर में है , उनके ज्ञान का संदर्भ भी भर के ही ज्ञान से जुड़ा है , एक प्रभावी खोज होनी चाहिए कि ईसा का संम्बध , एक पुराण में भी सफ़ेद साधू का वर्णन मिलता है, इसलिए यह खोज का विद्या है की ईशा का भारत से क्या संबंध था....!  

आचार्य रजनीश 
रजनीश चन्द्र मोहन , ओशो के नाम से प्रख्यात हैं जो अपने विवादास्पद नये धार्मिक (आध्यात्मिक) आन्दोलन के लिये मशहूर हुए और भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका में रहे। रजनीश ने प्रचलित धर्मों की व्याख्या की तथा प्यार, ध्यान और खुशी को जीवन के प्रमुख मूल्य माना। ओशो रजनीश (११ दिसम्बर, १९३१ - १९ जनवरी १९९०) का जन्म भारत के मध्य प्रदेश राज्य के जबलपुर शहर में हुआ था। १९६० के दशक में वे आचार्य रजनीश के नाम से ओशो रजनीश नाम से जाने गये। वे एक आध्यात्मिक नेता थे तथा भारत व विदेशों में जाकर प्रवचन दिये।

सोमवार, 27 सितंबर 2010

धर्म और तत्वज्ञान में,कोई हमसे बढ़कर नहीं - नेहरु जी

नेहरु जी आध्यात्म  के आकाश में 
- अरविन्द सीसोदिया
  आजकी कांगेस जिस तरह की धर्म निरपेक्षता की बाट करती है .., वह सिर्फ हिंदुत्व का विरोध मात्र है .., जो कि एक सोचा समझा इसाई एजेंन्डा है.., सच यह है की कांग्रेस को यह समझना चाहिए की नेहरूजी भी भारतीय आध्यात्म और जीवन व्यवस्था का आदर करते थे ...! धर्म निरपेक्षता शब्द ही गलत है सही शब्द धर्म सापेक्षता होना चाहिए ..!
 जवाहरलाल नेहरु यूं तो समाजवादी विचारधारा से सम्बन्ध रखते थे मगर वे साम्यवाद के बहुत ही अधिक निकट थे, उनके द्वारा हिंदुत्व के गुणगान की  सामान्यतः वन्दना  कम ही थी , जिस तरहे से गांधी जी अपने हिंदुत्व वादी चिंतन  में प्रखर थे , उस तरह से नेहरूजी कभी भी नहीं रहे , मगर उनका मन कहीं न कहीं से हिन्दू चिंतन को व्याकुल तो रहता ही था , इसके कुछ अंश मुझे उनकी जीवनीं में मिले जिन्हें में आपके साथ बाँटना  चाहता हूँ ..! यह ठीक है कि उन्होंने सीधे सीधे हिंदुत्व का नाम नहीं लिया मगर , तथ्यात्म बोध तो वही कहता है, जो है ..!! उन्होंने हिन्दू संस्कृती  को सम्मान भी दिया और उसे गलत तत्वों के कारण गिरा हुआ भी ठहराया , उनके विश्लेषण से पूरी तरह सहमत नहीं होते हुए भी उनके  विचारों  को सामने लाना इस लिए आवश्यक है कि कांग्रेस और वर्तमान मीडिया को यह ज्ञान ही नहीं है कि नेहरूजी भी पूर्वजों का सम्मान करे थे, संस्कृति का सम्मान करते थे...!   ,
सबसे पहले हम जवाहरलाल नेहरु को २४ जनवरी १९४८ के उस भाषण के एक अंश को लेते हैं जो उन्होंने अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय  के दीक्षांत समारोह में दिया था.......
".....मुझे अपनी विरासत और अपने पूर्वजों पर गर्व है, जिन्होनें भारत को बौद्धिक एवं सांस्कृतिक प्रसिद्धि दिलाई |  आपको इस गौरवशाली अतीत के बारे में कैसा अनुभव  होता है ? क्या आप को लगता है कि आप भी इसके भागीदार और उत्तराधिकारी  हैं , और इसलिए क्या उस बात पर आपको गर्व नहीं होता , जो जितनी मेरी है उतनी  ही आपकी भी है ? क्या आप इसे अपनी न मानकर बिना समझे ही उसे दरकिनार कर देते हैं ? क्या आपको उस रोमांच की अनुभूति नहीं होती , जो उस विशाल निधि का न्यासी  और उत्तराधिकारी होने के बोध से उपजती  है ?......  "
उनके ही द्वारा लिखी गई.. मेरी कहानी  (आत्मकथा ) जिसका हिन्दी सम्पादन हरिभाऊ  उपाध्याय ने किया
१- अध्याय ३-थियोसाफी , जो कि बचपन से सम्बद्ध है में नेहरु जी कहते हैं कि-- '...पुस्तकें पढने के अलावा ब्रुक्स साहब  ने एक और बात का मुझ पर असर डाला, जो कुछ समय तक बड़े जोर के साथ रहा | वह थी थियोसाफी | हर हफ्ते उनके कमरे में थियोसाफिस्टों की सभा हुआ करती | मैं भी उसमें जाया करता और धीरे धीरे थियोसाफी भाषा और विचार शैली मेरे ह्रद्य्न्गम होने लगी | वहां आध्यात्मिक विषयों पर तथा 'अवतार' , 'कामशरीर' और दूसरे 'अलौकिक शरीरों 'और 'तेजोवलय' तथा 'कर्मतत्व' इन विषयों पर चर्चा होती और मैडम ब्लेवेट्स्की  तथा दुसरे थियोसाफिस्टों से लेकर हिन्दू धर्म ग्रंथो , बुद्ध के धम्मपद , पायथागौरस, तयाना के अपोलोनियस और कई दार्शनिकों और श्रिषियों के ग्रन्थों का जिक्र आया करता था | वह सब कुछ मेरी समझ  में तो नहीं आता था | परन्तु वह मुझे बहुत रहस्य पूर्ण और लिभावना मालूम होता था, और मैं ख्याल करता था कि सारे विश्व में रहस्यों की कुंजी यही है | यहाँ से जिन्दगी में सबसे पहले मैं अपनी तरफ से धर्म और परलोक के बारे में सोचने लगा था |   '
  ' हिन्दू धर्म ख़ास कर , मेरी नजर में ऊँचा उठ  गया था, क्रिया - कांड और व्रता उत्सव नहीं - बल्कि उसके महान ग्रन्थ , उपनिषद और भगवदगीता  |  मैं उन्हें समझता नहीं था , परन्तु वे मुझे बहुत विलक्षण जरुर मालूम होते  थे |  '
  ' काम शरीरों के सपने आते और मैं बड़ी - बड़ी दूर तक आकाश में उड़ता जाता | बिना किसी विमान के यों ही ऊँचे आकाश में उड़ते जाने के सपने , मुझे जीवन में अक्सर आया करते हैं | कभी - कभी तो वे बहुत सच्चे और साफ़ मालूम होतस हैं  और नीचे विशाल विश्व पटल में सारा जन प्रदेश मुझे दिखाई पड़ता है | मैं नहीं जानता हूँ कि फ्रूड और दूसरे आधुनिक स्वप्नशास्त्री इस सपने का क्या अर्थ लगाते होंगें |    ' यह बात वे लगभग १३ /१४ वर्ष की आयु की सुना रहे थे , इसके बाद उन्हें इंग्लैड पढने जाना पढ़ा सो उनका धर्म और आध्यात्म अभिरुची  भारत में ही छूट गई  !
२- अध्याय ५३/ हिन्दुस्तान - पुराना और नया
 ( नेहरूजी अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली के दोषों को खुल कर बता रहें हैं.., यह दूसरी बात है कि वे इसे बदल नहीं पाए..., और वे आज भी बनीं हुई हैं ....)
"... स्कूलों और कालेजों में इतिहास , अर्थशास्त्र या जो भी दूसरे विषय पढाये जाते थे | ब्रिटश साम्राज्य के द्रष्टिकोण  से लिखे होते थे और उनमें हमारी पिछली और मौजूदा  बहुतेरी बुराइयों और अंग्रेजों के सदगुणों  और उज्जवल भविष्य पर  जोर दिया रहता था | हमने उनके इस तोड़े - मरोड़े वर्णन को ही कुछ हद तक मान लिया और अगर कहीं हमने उसका सहज स्फूर्ति से प्रतीकार किया तो भी उसके असर से हम न बच सके | पहले पहल तो हमारी बुद्धि उसमें से निकाल ही नहीं सकती थी ; क्यों कि हमारे पास न तो दूसरे वाक्यात थे और न दलीलें | "
"....इसलिए हमने धार्मिक राष्ट्रवाद और इस विचार की शरण ली , कि कम से कम धर्म और तत्व ज्ञान के क्षैत्र में कोई जाती हमसे बढ़कर नहीं है | हमने अपनी इस बदबख्ती और गिरावट में भी इस बात से तसल्ली की कि यद्यपि हमारे पास पश्चिम की बाहरी चमक दमक नहीं है तो भी हमारे पास अन्दर की चीज है | जो कि उससे कहीं ज्यादा कीमती और रखने लायक निधि है | विवेकान्द और दूसरों  ने तथा पश्चिमी विद्वानों ने हमारे पुराने दर्शन शास्त्रों में जो दिलचस्पी ली उसने हमें कुछ स्वाभिमान प्रदान किया और अपने भूतकाल के प्रती जो अभिमान का जो भाव मुर्क्जा गया था उसे फिर लहलहा दिया |    "
"....भारत के प्राचीन इतिहास के सम्बन्ध  में आगे चल कर जो और खोजे हुई उसने तो बहुत प्राचीन काल की उच्चा सभ्यता के उज्जवल युगों का वर्णन हमारे सामने ला दिया और हम बड़े संतोष के साथ उन्हें पढ़ते हैं | हमें यह भी पता लगा कि अंग्रेजों के लिखे इतिहासों से हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के बारे में हमारे मन में जो धरना बन गई थी उसके उलटे ही उनके कारनामें हैं | "
-- इसी  अध्याय में आगे लिखते हैं कि --
"....अपने इस अधः पतन और दरिद्रता के बावजूद , हिन्दुस्तान काफी शरीफ और महान है | और हालांकि वह पुरानी और मौजूदा मुसीबतों से काफी दबा हुआ है और उसकी पलकें थकान से कुछ भारी मालूम होती हैं , फिर भी 'अन्दर से निखरती हुई सौन्दर्य-कान्ति उसके शरीर पर चमकती है | उसके अणु - परमाणु में अदभुद विचारों , स्वच्छंद कल्पनाओं और उत्कृष्ट मनोभावों की झलक दिखाई देती है | ' उसके जीर्ण शीर्ण शरीर में अब भी आत्मा की भव्यता झलकती है | अपनी इस लम्बी यात्रा में वह कई युगों में से होकर गुजरा है , और रास्ते मैं उसने बहुत ज्ञान और अनुभव संचित किया है , और दूसरे देशोवाशियों से देन लेन किया है | उन्हें अपने बड़े कुनबे मैं शामिल कर लिया  है, उत्थान और पतन , समृद्धि और ह्रास के दिन देखे हैं , बड़ी - बड़ी जिल्लतें उठाई हैं , महान दुखः झेले हैं और कई अदभुत दृश्य देखे हैं , लेकिन अपनी इस सारी लम्बी यात्रा में उसने अपनी अति प्राचीन संस्कृती को नहीं छोड़ा , उससे उसने बल और जीवन - शक्ति प्राप्त की है , और दूसरे देशों के लोगों को उसका स्वाद चखाया है   | ... "
 "..... घड़ी पर लटकने की तरह वह कभी ऊपर गया और कभी नीचे आया है | अपने साहसिक विचारों से स्वर्ग और ईश्वर तक पहुचने  की हिम्मत  की है | उसने रहस्य खोल कर प्रकट किये हैं , और उसे नरक कुंद में गिरने का भी कटु अनुभव हुआ है | दुखः दी वहमों और पतनकारी रस्म- रिवाजों के बावजूद जो कि उसमें घुस  आये हैं और जिसने नीचे गिरा दिया है , उसने उस स्फूर्ति और जीवन को अपने ह्रदय से कभी नहीं भुलाया ; जो उसकी कुछ अनुभवी संतानों ने इतिहास के उस काल में उसे दी हैं और जो उपनिषदों में संचित है | उनकी कुशाग्र बुद्धि  सदा खोज में लीन रहती थी | नवीनता को पाने की कोशिश करती थी ओर सत्य की शोध में व्याकुल रहती थी | वह जड सूत्रों को पकड़ कर नहीं बैठी रही और न मुर्दा विधि - विधानों,ध्येय वंचना और निर्थक कर्म - कांडों  में डूबी रही | न तो उन्होंने इस लोक में खुद अपने लिए कष्टों से छुटकारा चाहा , नं उस लोक में स्वर्ग की इच्छ की | बल्कि ज्ञान और प्रकाश मांगा | ' मुझे असत से सत की ओर ले जा , अंधकार से प्रकाश की ओर ले जा, मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले जा | * ' अपनी सबसे प्रशिद्ध प्रार्थना - गायत्री मन्त्र - में जिसका लाखों लोग पथ करते , आज भी नित्य जप करते हैं , ज्ञान ओर प्रकाश के लिए ही प्रार्थना की गई है |  "
* " असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योर्तिगमय,मृत्योर्माsमृतं | " _ वृहदारणयक उपनिषद १-३-२७   
"... हालांकि राजनैतिक दृष्टि से अक्सर उसके टुकड़े टुकड़े होते रहे हैं , लेकिन उसकी आध्यात्मिकता ने सदा ही उसकी सर्व सामान्य विरासत की रक्षा की है | ओर उसकी विविधताओं में हमेशा एक विलक्षण एकता रही है | ** "
** "..हिन्दुस्तान में सबसे बड़ी परस्पर - विरोधी बात यह है की इस विविधता के अन्दर एक भारी एकता समाई है | यों सरसरी तौर पर वह नहीं दिखाई देती , क्योंकि किसी राजनैतिक एकता के द्वारा सारे देश को एक सूत्र में बाँधने के रूप में इतिहास में उसने अपने को प्रकट  नहीं किया , लेकिन वास्तव में यह एक ऐसी  असलियत  है ओर इतनी शक्तीशाली है की हिन्दुस्तान की मुस्लिम दिनिया को भी यह कबूल करना पड़ता है की उसके प्रभाव में आने से उन पर भी गहरा असर हे बिना नहीं रहा है |   - दी फ्यूचर आफ ईस्ट एंड वेस्ट में सर फ्रेडारिक व्हाईट "
 कुल मिला कर पंडित नेहरु ने भारतीय मूल्यों की गहरी पड़ताल की है .., राजैतिक  स्वरूप में एक नहीं रहे यही हमारा प्रमुख दोष है , लगभग आज भी वही स्थिति है..! मगर नेहरु जी के हाथ में हिन्दुस्तान कि राजनैतिक बागडोर आ गई थी , वे ही तब सर्वेसर्वा थे , उनकी आवाज के विरुद्ध पत्ता भी नहीं खडकता था यह स्थित बन गई थी ,मगर वे भी इसे दिशा  नहीं दे पाए ,यह उनकी विफलता थी ...! संस्कृति में कितना दम है यह तो वे भी स्वीकार चुके हैं वह अपने सामर्थ्य से पुनः उत्थान को निश्चित ही प्राप्त होगी ...! 

रविवार, 26 सितंबर 2010

कश्मीर पाकिस्तान को देने कि तैयारी

सेना हटी तो गंभीर परिणाम...
मत भूलो कारगिल को... 
- अरविन्द सीसोदिया 
        लगता है कि कांग्रेस ने कश्मीर पाकिस्तान को देने कि तैयारी कर ली है और वह अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष  रूप से इस तह के कृत्य कर रही है कि पाकिस्तान कभी भी चीन कि सहायता से कश्मीर को हडप ले ..! चीन ने श्री लंका में भी लिट्टे का सफाया करवा कर भारत को एक बड़ी शिकस्त दी है !  नेपाल में उसने राजशाही को समाप्त करवा कर लगभग माओवादियों को स्थापित करवा दिया है , यह वही तरीका है  जिससे माओ ने चीन  पर कब्जा किया और तिब्बत को निंगला था ..! जनवादी सेना या लाल सेना या माओवादी या नक्सलवादी इसके विभीन्न पर्यायवाची हो सकते हैं ,मगर मकसद एक ही है .., सत्ता  पर कब्जा करना ! 
       कश्मीर में सारा तमाशा एक सोची समझी चाल के अंतर्गत हो रहा है , सेना को कम करने की कोशिश  में पाकिस्तान , चीन , आतंकवादी, उग्रवादी और कश्मीर के संतुष्ट और असंतुष्ट ..., सबके सब एक हैं ..! कश्मीर के सिर  पर और पाक कब्जे के कश्मीर में लगातार चीन की सैनिक मौजूदगी और परमाणु कार्यक्रमों पर पूरा विश्व चिंता ग्रस्त है , यह सब वही लक्ष्ण हैं जो १९४९ से प्रारंभ हो कर १९६२ में युद्ध में तब्दील हुए थे..!! भारत यह सारी जानकारी रखते हुए भी नादानी करता है तो वही परिणाम होगा जो १९६२ में चीन  से  हार के साथ हुआ था ...!!  अब होगा यह कि कश्मीर को भारत से छिना कर पाकिस्तान कि दे दिया  जाएगा  और फिर धीरे धीरे उसमें चीन जम जाएगा, उसे अरब सागर से अपनी सीमाएं मिलनी जो है..!!!! 
   केंद्र सरकार का फरमान
     प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में यहां हुई सुरक्षा संबंधी कैबिनेट समिति (सीसीएस) की बैठक के बाद केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने ये घोषणाएं की। बैठक में चिदम्बरम, रक्षा मंत्री ए.के.एंटनी और केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने हिस्सा लिया। हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये मुआवजा दिया जाएगा और राज्य सरकार से कहा गया है कि वह घाटी में सुरक्षा बलों की तैनाती और सशस्त्र सेना विशेष शक्तियां अधिनियम (एएफएसपीए) के भविष्य पर फैसला लेने के लिए एकीकृत कमान की बैठक बुलाए।
"केंद्र राज्य सरकार को सुझाव देगी कि पथराव के लिए या इस तरह के किसी अन्य मामलों में गिरफ्तार किए गए सभी विद्यार्थियों एवं युवकों को तत्काल रिहा कर दिया जाए और उनके खिलाफ आरोप वापस ले लिया जाए। सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत सभी मामलों की तत्काल समीक्षा की जाएगी, उचित मामलों में गिरफ्तारी आदेश वापस लिए जाएंगे।"
 जम्मू- कश्मीर राज्य सरकार से कहा गया है कि वह एकीकृत कमान की तत्काल बैठक बुलाए और कश्मीर घाटी में, खासतौर से श्रीनगर में सुरक्षा बलों की तैनाती की समीक्षा करे। एकीकृत कमान में सेना, सुरक्षा बल और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा मुख्यमंत्री व राज्य के गृह मंत्री शामिल हैं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार एकीकृत कमान को इस बात पर निर्णय लेना है कि क्या कुछ इलाकों से एएफएसपीए को हटा लिया जाए या नहीं।  मुख्यमंत्री ने कहा है कि  अब्दुल्ला ने कहा कि घाटी से सशस्त्र सेना और सुरक्षा कर्मियों की उपस्थिति घटानी है।
मन के हारे हार है.., मनके जीते जीत...!
      --- एक कहावत है गरीब  की जोरू , जमानें  की भोजाई .., ये  शब्द  इस तरह भी कहा जा सकता है..,  निर्बल की पत्नी, जगत की भाभी..., कुल मिला कर ये कहावत यह बता रही है कि " निर्वलता दूसरों को पाप के लिए ललचाती है ! " यही तथ्य वह बिंदु है जो भारत को बार बार परेशान  कर रहा है.....! पाकिस्तान बना तब से ही आँखे तरेरता रहता है , उसे याद दिलाया जाये कि हम तुम्हे पहले भी चार बार हारा चुके हैं , अबभी जोर अजमाईस करनी है तो चलो एक बार फिर से हो जाये.., चीन से भी कहा जाये कि अब १९६२ नहीं है.., मैकमोहन रेख बहुत पुरानी है तब ठीक थी तो अब भी ठीक ही है .., नियत साफ रखो या फिर जो होना है वह हो जाये..! हुकार और फुफकार के बिना शत्रु कभी भी पीछे नहीं हटाता है ! आप कोई मक्खी मच्छर नहीं हैं आप १०० करोड़ से ज्यादा  हिन्दुस्तानियों के नेता हैं , उसी सहस और शक्ती के साथ बात करनी चाहिए...!    
        आपके पास जनसंख्या की कोई कमी नहीं है , लोग देश धर्म की रक्षा  के लिए हर बलिदान को तैयार  हैं , कुछ लोगों के मरने में आप डरते रहे और पाकिस्तान बनवा  बैठे ...? वैसे तो लाख पचास हजार मरते, मगर फिर १० लाख मरे...!! मरने से जो डर गया वह पहले मर गया, राष्ट्र रक्षा के लिए मरना धर्म है...! मरना है क्या चीज आदमी लेता नया जन्म है.., देश पूरी तरह से तैयार है.., ये बहादुरों कि संतानों का देश है.., रोम, मिश्र और यूनान कि तरह मिटा नहीं ; बल्की हिन्दोस्तान की तरह जिदा है...,   आप को तो सिर्फ निर्णय लेना है वह भी नहीं हो पाता  तो राजपाट छोड़ कर बाहर आजाओ.., येशी स्थिती अंतीम बौद्ध राजा बृहदह्स्थ  के समय में पाटलीपुत्र में हुई थी , बार बार यूनानी विदेशी आक्रान्ताओं के आगे समझोते होते थे , तब सेनापति  पुष्यमित्र ने राजा बृहदह्स्थ कि हत्या की और अपने पोते वसुमित्र के नेतृत्व में एक सेना गठित कर विदेशी आक्रमणकारियों को बाहर निकलने  का आदेश जारी किया उस युवा सेनापति वसुमित्र ने विदेशी आक्रमणकारियों को सिन्धु पार तक खदेड़ा था ...!   कुछ सीखो अपने इतिहास से.........!    

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

भारत और राक्षस चीन

राक्षस जैसी स्थिति में पहुच चुके चीन को समझने के लिए यह लेख काफी सहायक होगा यही मानते हुए इसे प्रस्तुत किया गया ..,डॉ. राम तिवारी को इस तरह कि तथ्यात्मक जानकारी के लिए बहुत बहुत साधुवाद ..,  भारत में चीन के प्रती जो नर्म रवैया जवाहरलाल नेहरू जी ने वर्ता है , उस पर आगे चर्चा करेंगे..! चीन को इतना बड़ा भष्मासुर बनाने में हमारा भी योगदान कम नहीं है..!! नेहरू जी ने कई कांटे इस देश को दिए हैं उनमें जम्मू और कश्मीर से भी ज्यादा खतरनाक  मशला चीन का है..,, 
- अरविन्द सीसोदिया 
भारत कि सुरक्षा को चीन की चुनौती:डाँ. राम तिवारी
( हिमालिनी नेपाल की एकमात्र हिन्दी पत्रिका है यह लेख उसमें २ दिसंबर २००९ के अंक में प्रकाशित हुआ था , सम्पूर्ण विश्व और भारतवासियों  के लिए यह सारगर्भित जानकारी प्रस्तुत है..... )
चीन विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है। वर्तमान में इसकी कुल जनसंख्या 1 अरब 27 करोड़ 31 लाख से अधिक है। इस देश की राजधानी बीजिंग (पुराना नाम पीकिंग) है तथा प्रमुख भाषा चीनी (मेंडारिन) है। इस देश का प्रमुख धर्म सरकारी स्तर पर अनीश्वरवादी है फिर भी ज्यादातर आबादी बौद्ध व ताओ धर्म की अनुयायी है तथा जातीय समूह हान चाइनीज है। यहाँ की मुद्रा युआन है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार ईसा पूर्व 1500 में चीन में शांग राजवंश का शासन स्थापित था। सन् 1911 ई0 में एक जनक्रांति के द्वारा मांचू राजंवश का तख्ता पलट करने के बाद डॉ0 सन-यात सेन ने औपचारिक तौर पर 1 जनवरी 1912 ई0 को गणतंत्र की स्थापना की। कुओमितांग पार्टी के संस्थापक डॉ0 सन-यात सेन ने अपने संक्षिप्त कार्यकाल में चीन की प्रगति के लिए अनेक कदम उठाए, किन्तु पराजित हुई राजशाही के कृत्यों के चलते यह देश एक बार पुनः गृहयुद्ध की चपेट में आ गया। इस घटना के बाद चीनी राजनीतिक पटल पर सबसे शक्तिशाली व्यक्त्वि के रूप में माओत्सेतंुग का पदार्पण हुआ जिन्हें माओजिडांग के नाम से भी जाना जाता है। इन्होनें राजशाही समर्थकों व कुओमितांग पार्टी के विरूद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ दिया।
    1 अक्टूबर 1949 ई0 को माओत्सेतुंग के नेतृत्व में चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन की स्थापना हुई। माओत्सेतुंग के कार्यकाल में देश की प्रगति के लिए ‘महान अग्रगामी उछाल नीति (दि ग्रेट लीप फारवर्ड 1958-60) और सांस्कृतिक क्रांति (1965-68) का सूत्रपात हुआ। चीन में सांस्कृतिक क्रांति का दौर भारी उथल-पुथल का था। माओत्सेतुंग ने बुजुर्वा (जमीदारों व पूँजीपति मानसिकता) वर्ग के समापन के लिए नृशंस कदम उठाए और सरकारी आतंक के चलते अनेक बुद्धिजीवियों, शिक्षकों व व्यापारियों को उत्पीड़ित किया गया।
9 सितम्बर, 1976 ई0 को माओत्सेतुंग की मृत्यु के पश्चात् डेंग शियाओपिंग ने कम्युनिस्ट पार्टी की बागडोर संभाली। डेंग के आगमन से चीन में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। 1980 ई0 से डेंग ने चीन मे नव आर्थिक सुधार कार्यक्रम शुरू किये जो साम्यवाद (कम्युनिज्म) की मूलभूत मान्यताओं से मेल नहीं खाते थे। डेंग के इन आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को चीन के वर्तमान शासक जारी रखे हुए है।
चीन आर्थिक नीतियों के सन्दर्भ में तो पूँजीवाद की राह पर चल निकला है, पर इस देश में राजनीतिक व्यवस्था के रूप में साम्यवाद वर्तमान में भी कायम है। प्रशासनिक व्यवस्था के लिहाज से चीन को 22 प्रांतों में विभक्त किया गया है। इसके अतिरिक्त 5 स्वायत्तशासी क्षेत्र और विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (हांगकांग व मकाओ) है।
चीन की सेना को ‘जनमुक्ति सेना’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है।
मुक्ति आन्दोलन के दौरान अस्तित्व में आई जनमुक्ति सेना (लाल सेना) की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत् हैः-
1. जन सेना होने के कारण यह जनता के विभिन्न कार्यों व उत्पादन में उनकी सहायता करती है।
2. सेना का मुख्य कार्य साम्राज्यवादी आक्रमण से देश की रक्षा करना व देश के निर्माण को संरक्षित रखना है।
3. सेना में राजनीतिक कार्य तत्वतः सेना में दल का कार्य है और दल के कार्यकारी संगठन ही राजनैतिक अंग है। राजनीतिक अंगों के माध्यम से दल सारी सेना की वैचारिक शिक्षा को निर्देशित करता है।
भारत और चीन के मध्य विवाद के प्रमुख बिंदु :-
1. मैकमोहन लाइनः- ब्रिटेन और तिब्बत के बीच हुए सन् 1914 ई0 के शिमला समझौते के तहत जो लाइन ब्रिटिश भारत और तिब्बत की सीमा रेखा के तौर पर खींची गयी थी उसे ही मैकमोहन लाइन कहते है। इस लाइन को सर हेनरी मैकमोहन जो इस समझौते के मुख्य समन्वयक व उस वक्त भारत में ब्रिटेन के विदेश सचिव थे, के नाम पर मैकमोहन लाइन कहा जाता है। 550 मील की यह लाइन भूटान से हिमालय के सहारे ब्रह्मपुत्र नदी के महान मोड़ तक जाती है। यह लाइन लगभग उतनी ही लम्बी है जितनी भारत नियंत्रित क्षेत्र और चीन अधिकृत क्षेत्र के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा। इस लाइन को भारत अपनी स्थायी सीमा रेखा मानता है जबकि चीन इसे एक अस्थायी नियंत्रण रेखा मानता है। इसके अलावा चीन मैकमोहन लाइन के दक्षिण में स्थिति अरूणाचल प्रदेश पर भी अधिकार जताता है।
2. अरूणाचल प्रदेश :- भारत का यह सुदूर पूर्वी राज्य भारत और चीन के मध्य विवाद का एक मुख्य विषय बना हुआ है। मैकमोहन लाइन के दक्षिण में स्थित इस विवादित क्षेत्र को भारत ने सन् 1954 ई0 में पूर्वोत्तर सीमा एजेंसी  नाम दिया और 1972 ई0 में इसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया। सन् 1987 ई0 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया। सन् 1937 ई0 में सर्वे ऑफ इंडिया ने प्रथम बार अपने नक्शे में मैकमोहन लाइन को आधिकारिक सीमा रेखा के रूप में दर्शाया था और इस विवादित क्षेत्र को भारतीय हिस्सा माना था। इसके बाद सन् 1938 ई0 में ब्रिटेन द्वारा अधिकारिक तौर पर शिमला समझौते के प्रकाशन के बाद इस क्षेत्र पर भारतीय अधिकार सिद्ध हो गया था। लेकिन सन् 1949 ई0 में चीनी क्रांति के बाद स्थापित साम्यवादी सरकार ने इस क्षेत्र पर अपना अधिकार जताना आरम्भ कर दिया और तब से लेकर वर्तमान तक यह दोनों देशों के मध्य विवाद का बिंदु बना है।
3. अक्साई चिन – जम्मू-कश्मीर के पूर्वी क्षेत्र में स्थित अक्साई चिन का रणनीतिक दृष्टि से काफी महत्व है। इस पर फिलहाल चीन का कब्जा है, जबकि भारत सदैव से ही इस पर अपना दावा जताता रहा है। अक्साई चिन उइगुर भाषा का शब्द है और इसका अर्थ चिन का सफेद पत्थरों वाला रेगिस्तान होता है (यहाँ चिन का अर्थ क्विंग वंश से है) 5,000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित तिब्बती पठार के इस हिस्से को सोडा मैदान भी कहा जाता है। यहाँ बारिश बहुत ही कम होती है। इस हिस्से में आबादी न के बराबर है (चीनी सैनिकों को छोड़कर)।
     अक्साई चिन 19वीं शताब्दी तक लद्दाख साम्राज्य का अभिन्न हिस्सा था। इसके बाद जब लद्दाख पर ‘कश्मीर’ का नियंत्रण हो गया तो ‘अक्साई चिन’ भी कश्मीर साम्राज्य का हिस्सा बन गया। सन् 1950 ई0 के दशक में अक्साई चिन पर चीन ने कब्जा कर लिया और इस क्षेत्र में होते हुए उसने तिब्बत तक एक सड़क ‘चीन राष्ट्रीय राजमार्ग-219′ का निर्माण शुरू कर दिया। इसी सड़क के निर्माण को लेकर भारत-चीन के सम्बन्ध इस स्तर तक बिगड़े की इसकी परिणति 1962 ई0 के भारत-चीन युद्ध में हुई। अक्साई चिन का दायरा लगभग 38,000 वर्ग किमी0 है। चीन के लिए अक्साई चिन चीन राजमार्ग जिक्यिाँग एवं तिब्बत को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करता है और उसके लिए यह मार्ग सामरिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। स्त्रातजीय दृष्टि से भारत के लिए भी इस क्षेत्र का अधिक महत्व है क्योंकि यह एक ऐसा स्थल बिन्दु है जहाँ रूसी गणराज्य (तजाकिस्तान), अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत व चीन के भू-भाग मिलते है।
4. ब्रह्मपुत्र को मोड़ने की योजना :- चीन वर्तमान में एक ऐसी योजना को अंजाम देने की कोशिश कर रहा है। जिससे भारत की सुरक्षा प्रभावित हो रही है। चीन की मंशा है कि वह ब्रह्मपुत्र नदी से सलााना दो सौ अरब घन मी0, पानी येलो नदी में डाल दें। ब्रह्मपुत्र नदी से पानी लेने की योजना पर चीन पिछले कई वर्षों से कार्य कर रहा है। यह चीन की विशाल ‘साउथ नोर्थ वाटर लिंक’ योजना का हिस्सा है। चीन के इस कोशिश को नदी में ‘पानी की डकैती के रूप में देखा जा सकता है। भारत और बांग्लादेश के लिए ब्रह्मपुत्र पानी के बड़ी स्त्रोतों में से एक है। यदि चीन इस योजना में सफल हो जाता है तो इससे भारत के लिए जल-विज्ञान और भू-विज्ञान सम्बन्धी खतरे पैदा हो जाएंगे। चीन शूमाटन प्वाइंट पर प्रस्तावित बाँध के लिए ब्रह्मपुत्र नदी से पानी लेने की योजना बना रहा है। यह जगह चीन के हिमालय क्षेत्र मे है। यह वह जगह है जहाँ भारतीय और यूरेशियन प्लेटें मिलती है जिसकी वजह से भारतीय क्षेत्र में भूस्खलन या भूकम्प जैसी गतिविधियाँ होने की आशंका ज्यादा रहती है।
5. हिमालय पर चीन का खतरा :- चीन सतलुज और उसकी सहायक नदियों पर तिब्बत में कई बिजली परियोजनाओं का निर्माण कर रहा है। इसके कारण बरसात के मौसम मंे यह नदियाँ हिमाचल प्रदेश में तबाही ला सकती है। दूसरी ओर गर्मियों में इनके कारण पानी का अकाल पड़ सकता है। जानकारी बाँटने के लिए भारत के साथ किये गये समझौते का पालन भी चीन नहीं कर रहा है।
6. तिब्बत का बिन्दु :- चीन के कब्जे में आने से पहले तिब्बत की भूमिका ब्रिटिश भारत और उत्तर-पूर्वी एशियाई देशों के बीच एक ‘बफर स्टेट’ के रूप में थी। उस समय बाहरी विश्व से तिब्बत का जो भी व्यापारिक या सांस्कृतिक सम्पर्क होता था वो भारत के जरिए होता था। सन् 1949 ई0 की चीनी क्रांति से पहले तिब्बत की राजधानी ल्हासा में भारत और चीन के दूतावास स्थापित थे।
        सन् 1892 ई0 में तिब्बत को लेकर चीन ने दावे करने शुरू कर दिए और सन् 1913 ई0 तक उसने कई बार तिब्बत पर कब्जा करने के असफल प्रयास किये। सन् 1913 ई0 में तिब्बत ने स्वतन्त्रता की घोषण कर दी और सन् 1914 ई0 में इस मुद्दे को लेकर शिमला में बैठक हुई। ब्रिटेन, तिब्बत और चीन के बीच हुई इस बैठक में तिब्बत ने संप्रभुता की माँग रखी जिसे चीन ने मानने से इन्कार कर दिया। इसके बाद तिब्बत को आतंरिक व बाहरी तिब्बत में बाँटने का निश्चय किया गया। इसमें से बाहरी तिब्बत पर स्वायत्तता के साथ चीन की सर्वोच्चता स्थापित करने की बात कही गई। लेकिन चीन और आंतरिक तिब्बत के बीच सीमा निर्धारण को लेकर बात बिगड़ गई और चीन इस बैठक से बाहर हो गया। बाद में तिब्बत ने ‘लोचन शात्रा शात्रा’ के नेतृत्व में और ब्रिटेन ने सर हैनरी मैकमिलन के नेतृत्व में द्विपक्षीय ‘शिमला समझौता’ किया और मैकमोहन लाइन अस्तित्व में आई। इस समझौता मे तिब्बत को एक स्वतंत्र राष्ट्र माना गया था न कि चीन का प्रांत। तब से लेकर अब तक चीन मैकमोहन लाइन को नकारता आ रहा है।
        सन् 1949 ई0 में जब चीन में साम्यवादी सरकार बनी तब तिब्बत ने चीन से ल्हासा स्थित चीनी दूतावास छोड़ देने को कहा। इससे चीन और तिब्बत के रिश्ते तनावपूर्ण हो गए। सन् 1950 ई0 की शुरूआत में चीन ने तिब्बत से शांतिपूर्वक विलय की बात कही और तिब्बत के पूर्व में स्थिति ‘चामदो’ शहर में अपनी सेना इकट्ठी कर ली। 7 अक्टूबर, 1950 ई0 को जब तिब्बती प्रतिनिधि मंडल चीन से वार्ता करने वाला था उसी समय चीन के 80,000 सैनिकों ने तिब्बत पर आक्रमण कर कब्जा कर लिया और विश्व में प्रचारित किया कि हमने तिब्बतियों को साम्राज्यवादी शक्तियों (भारत) के शिकंजे से मुक्त कर दिया। इसके बाद 23 मई 1951 ई0 के दिन चीन ने दलाईलामा से 17 सूत्री समझौते पर जबरदस्ती हस्ताक्षर करवा लिए और तिब्बत पर चीन का अधिकारिक कब्जा हो गया। इस घटना के बाद से दलाईलामा ने भारत में बहुत से तिब्बती लोगों के साथ शरण ले रखी है।
    भारत के पड़ोसी देशों को चीन अपने प्रभाव में लेकर वहाँ भारत विरोध की जमीन तैयार कर रहा है यह स्थिति भारत के लिए खतरनाक होती जा रही है। पहले पाकिस्तान की बात करे तो चीन भारत के खिलाफ पाकिस्तान की नफरत का इस्तेमाल कर रहा है। नेपाल के माओवादी चीन से प्रशिक्षित है, वही से उनको हथियार और पैसा आ रहा है। भारत के खिलाफ साजिश रचने में चीन माओवादियों की भरपूर मदद कर रहा है। बांग्लादेश में चीन भारी मात्रा में पैसो का निवेश कर रहा है जिससे कि वह आगे चलकर भारत के विरूद्ध उसके बंदरगाह का प्रयोग कर सके। श्रीलंका में अनबटोटा में नौसेना का बंदरगाह चीन के सहयोग से बनाया जा रहा है।
     यह स्थिति भारत के लिए सामरिक दृष्टि से उचित नहीं है। सिक्किम के उत्तरी हिस्से में फिंगर टिप पर अगस्त 2009 के दूसरे पखवाड़े में चीन ने 1966 ई0 के द्विपक्षीय समझौते का उल्लंघन करते हुए गोलाबारी की जिससे दो जवान गम्भीर रूप से घायल हो गये। इस घटना से कुछ ही समय पहले ही 31 जुलाई, 2009 को लद्दाख में चीनी सैनिको ने घुसपैठ की और भारतीय सीमा के अंदर लाल झंडे लगाकर पत्थरों पर अपनी भाषा में चीन लिखने की हरकत की। चीन ढाई सौ से ज्यादा बार भारतीय सीमा का अतिक्रमण कर चुका है। ऐसी विषम परिस्थितियों में भारत को चीन के विरूद्ध ठोस कदम उठाने होंगे। क्योंकि चीन सिर्फ शक्ति की भाषा ही समझता है और अगर हम यह समझते है कि हमारी दोस्ती की भाषा से चीन प्रसन्न हो जाएगा तो ये हमारी सबसे बड़ी भूल होगी।
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गुरुवार, 23 सितंबर 2010

भारतीय क्रांति की माता : मैडम भीखाजी कामा

- अरविन्द सीसोदिया  
   मैडम भीखा जी कामा भारतीय वीरांगनाओं में से वह नाम है जिसे हम अकबर से लोहा लेने वाली गौंडवानें  की  रानी दुर्गावती और ब्रिटश सरकार को नाकों चववा देने वाली झांसी की रानीं  महारानी लक्ष्मीबाई  क़ी श्रेणीं में रखते हुए गौरवान्वित होते हैं ..!  ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इन्होने जो वीरतापूर्ण भूमिका निभाई उसके लिए जब तक भारत का इतिहास पढ़ा जाएगा तब तक उन्हें भी पढ़ा जाएगा ..!  उनकी एक विशिष्ठ पहचान भारत के लिए विश्व स्तर  पर संघर्ष और स्वतंत्रता के प्रतीक रूप में तिरंगा झंडा विश्वस्तर पर सर्व प्रथम लहराना भी है | जिसके लिए वे प्रति वर्ष स्वतंत्रता  दिवस , झंडा  दिवस और गणतन्त्र दिवस पर याद किया जाता रहेगा ....!!


उनका सम्मान एक अन्य कारण से भी है क़ी उन्होंने देवनागरी लिपी में वन्देमातरम लिख हुआ झंडा फहराकर हिन्दी और वन्देमातरम गीत को भी सम्मान दिया था ..! 
 सच यह है क़ी वे वन्देमातरम महा राष्ट्रगान के चौथे पेरा ग्राफ  के सामान हैं... , उन्हें कोटि कोटि नमन..,  
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥

    मैडम भीखा जी कामा  का जन्म , २४ सितंवर  १८६१ में  मुम्बई के प्रशिद्ध पारसी परिवार में हुआ था , पिटा का नाम सोराबजी फ्रामजी  पटेल था और माता का नाम जीजीबाई था ..!  ३ अगस्त १८८५ में उनका विवाह सुप्रसिद्ध वकील उस्तम कम के साथ हुआ था | कामा स्वाधीनता संग्राम से जुड़ी अत्यंत कर्मठ महिला थी। धनी परिवार में जन्म लेने के बावजूद इस साहसी महिला ने आदर्श और दृढ़ संकल्प के बल पर निरापद तथा सुखी जीवनवाले वातावरण को तिलांजलि दे दी और शक्ति के चरमोत्कर्ष पर पहुँचे साम्राज्य के विरुद्ध क्रांतिकारी कार्यों से उपजे खतरों तथा कठिनाइयों का सामना किया। श्रीमती कामा का बहुत बड़ा योगदान साम्राज्यवाद के विरुद्ध विश्व जनमत जाग्रत करना तथा विदेशी शासन से मुक्ति के लिए भारत की इच्छा को दावे के साथ प्रस्तुत करना था। भारत की स्वाधीनता के लिए लड़ते हुए उन्होंने लंबी अवधि तक निर्वासित जीवन बिताया था।
    वह अपने क्रांतिकारी विचार अपने समाचार-पत्र ‘वंदेमातरम्’ तथा ‘तलवार’ में प्रकट करती थीं। श्रीमती कामा की लड़ाई दुनिया-भर के साम्रज्यवाद के विरुद्ध थी। वह भारत के स्वाधीनता आंदोलन के महत्त्व को खूब समझती थीं, जिसका लक्ष्य संपूर्ण पृथ्वी से साम्राज्यवाद के प्रभुत्व को समाप्त करना था। उनके सहयोगी उन्हें ‘भारतीय क्रांति की माता’ मानते थे; जबकि अंग्रेज उन्हें कुख्यात् महिला, खतरनाक क्रांतिकारी, अराजकतावादी क्रांतिकारी, ब्रिटिश विरोधी तथा असंगत कहते थे।
     यूरोप के समाजवादी समुदाय में श्रीमती कामा का पर्याप्त प्रभाव था। यह उस समय स्पष्ट हुआ जब उन्होंने यूरोपीय पत्रकारों को अपने देश-भक्तों के बचाव के लिए आमंत्रित किया। वह ‘भारतीय राष्ट्रीयता की महान पुजारिन’ के नाम से विख्यात थीं। फ्रांसीसी अखबारों में उनका चित्र जोन ऑफ आर्क के साथ आया। यह इस तथ्य की भावपूर्ण अभिव्यक्ति थी कि श्रीमती कामा का यूरोप के राष्ट्रीय तथा लोकतांत्रिक समाज में विशिष्ट स्थान था।    
इस अवसर पर उनके कहे कुछ शब्दों का स्मरण और कुछ कार्यों का व्यौरा  उचित ही होगा...,  
"....जर्मनी के स्टूटगार्ट नगर में आयोजित द्वितीय इंटरनैशनल सोशलिस्ट  कांग्रेस में विभिन्न देशों से एकत्र हजारों प्रतिनिधियों के समक्ष २२ अगस्त १९०७ को , महीन कसीदाकारी की हुई साड़ी में सुसज्जित , काली आँखें वाली , गोरे रंग  की एक सुंदर महिला ने अपने जोशीले और भावपूर्ण भाषण से श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर दिया | 
भाषण  में उन्होंने कहा ....प्रतिदान  में भारत को बिना कुछ दिए हुए ३ करोड़ ५० लाख पौंड की राशी , भारत से इंग्लैंड भेजी जा रही है , जिसके परिणाम स्वरूप हर महीने ५ लाख भारतीय  गरीबी से मर रहे हैं | भाषण के अंत में उन्होंने नाटकीय ढंग से हरे , सुनहरे और लाल रंगों वाला एक तिरंगा झंडा फहरा दिया | झंडे को लहराते हुए , भावपूर्ण शब्दों में उन्होंने कहा ' यह भारत की आजादी का झंडा है | देखिये, इसने जन्म ले लिया है , शहीद भारतीय युवाओं के रक्त ने इसे पवित्र किया है , मैं आप सभी महानुभावों से भारत की आजादी के इस झंडे  का अभिवादन करने का अनुरोध करती हूँ, साथ ही मैं समस्त विश्व के स्वाधीनता - प्रेमियों से यह भी अनुरोध करती हूँ कि वे सम्पूर्ण मानवता के पांचवे हिस्से , भारत को आजाद करने में इस झंडे को अपना सहयोग प्रदान करें | ' " (ब्यूरो आफ सोशलिस्ट इंटरनेशनल (ब्रसेल्स ) के सचिवालय द्वारा प्रकाशित  )
ब्रिटिश सरकार के, केन्द्रीय गुप्तचर विभाग कार्यालय ने मैडम भीजी रुस्तम के. कामा के नाम से गुप्त फाइल बनाई थी , जिसकी मूल प्रती दिल्ली स्थित राष्ट्रिय अभिलेखागार में सुरक्षित है | उनके एक भाषण के अंश निम्न प्रकार से हैं ---
"....स्वतंत्रता - संघर्ष में असाधारण कदम उठाने पड़ते हैं , विदेशी शासन के प्रति विद्रोह यदी सफल हो जाये तो वह देश भक्ति है , स्वतंत्रता के बिना जीवन क्या कोई महत्व रखता है ? सिद्धान्तहीन जीवन भी कोई जीवन होता है ? दोस्तों ! आईये , सभी प्रकार की बाधाओं , संदेह और भय से मुक्त हो जाएँ , मेजिनी के शब्दों  में मैं आपसे अनुरोध करती हूँ , "आये , हम उन लोगों से तर्क करना छोड़  दें जो हमारी बात को अच्छी तरह समझते हैं , लेकिन उस पर ध्यान नहीं देते हैं , यदी हमारे देश्वाशी अपमानित होते हैं तो हमारे लिए और भी जरुरी हो जाता है कि हम सभी प्रकार के खतरे उठ कर उनकी स्थिती सुधारें | "भारतीयों , आत्मसम्मान का परिचय दो और काम करना शुरू कर दो |
     अब सभाएं आजोजित करने और प्रस्ताव पास करने के दिन बीत चुके | मौन रह कर ठोस काम करो| मुट्ठी भर विदेशियों  , थोड़े से अंग्रेजों ने हमारे विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया है | यदी हम उनकी चुनौती को स्वीकार करके उनके विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दें तो इसमें आश्चर्य की क्या बात होगी ? स्वाधीनता की कीमत चुकानी ही पड़ती  है | कौन सा देश जिसने बिना कीमत चुकाए स्वतन्त्रता प्राप्त की है ? ...."







       मैडम   कामा   की  मुखकृति, आज   भी   दिल्ली    में,  संसद भवन  के    संग्रहालय    में    है, जिसमें    उन्हें   यह   झंडा     हाथ   में    लिये   हुए   दिखाया   गया   है। इस    प्रकार, इस   झंडे    को    ब्रिटिश   काल    में    लाने   का    श्रेय, गुजरात    के    एक    बहादुर   समाजवादी    नेता   श्री   इंदुलाल   याग्निक    को   है।


अंतिम सांस तक.........1914 में प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान जब फ्रांस और ब्रिटेन के बीच संधि हुई तो पेरिस इंडियन सोसायटी के लगभग सभी सदस्यों ने पेरिस छोड दिया, लेकिन भीकाजी ने विपरीत स्थितियों में भी वहीं रह कर देश की आजादी के लिए संघर्ष करना मंजूर किया। जब पंजाब रेजिमेंट की टुकडी ब्रिटेन और उसके मित्र देशों की तरफ से लडाई करने के लिए फ्रांस की धरती पर पहुंची तो भीकाजी ने उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और उसी दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1935 तक वह यूरोप में नजरबंद रहीं। इसी बीच वहीं उन्हें पक्षाघात का दौरा पडा और उनके वकील सर कावासाजी जहांगीर के काफी प्रयासों के बाद उन्हें घर वापस जाने की अनुमति मिल गई और वह मुंबई लौट आई। अपने देश की आजादी के लिए अंतिम सांस तक लडने वाली इस महान शख्सीयत का 13 अगस्त 1936 को, 74 वर्ष की आयु में मुंबई के पारसी जनरल हॉस्पिटल में स्वर्गवास हो गया।

बुधवार, 22 सितंबर 2010

कामनवेल्थ,स्वतन्त्रता के प्रति धोकेबाजी

 गणराज्य भी हो और उपनिवेश भी ! 
  क्या आपको कामनवेल्थ खेलों के इस आयोजन में देश की राष्ट्र भाषा , राज्य भाषा और राष्ट्र गौरव का कही एहसास हो रहा है..., इसमें प्रान्तीय भाषाओँ और उनसे जुड़े गौरव कहीं दिख रहे हैं..., नहीं तो आप ही फैसला की जिए कि इस संगठन में रह कर हमने क्या खोया क्या पाया...!!!!!
कोमंवेल्थ का सामान्य परिचय यह है कि :- 
 राष्ट्रकुल, या राष्ट्रमण्डल देश (अंग्रेज़ी:कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस) (पूर्व नाम ब्रितानी राष्ट्रमण्डल), ५३ स्वतंत्र राज्यों का एक संघ है जिसमे सारे राज्य अंग्रेजी राज्य का हिस्सा थे ( मोज़ाम्बीक और स्वयं संयुक्त राजशाही को छोड़ कर )। इसका मुख्यालय लंदन में स्थित है। इसका मुख्य उद्देश्य लोकतंत्र, साक्षरता, मानवाधिकार, बेहतर प्रशासन, मुक्त व्यापार और विश्व शांति को बढ़ावा देना है। इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय प्रत्येक चार वर्ष में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों और बैठक में भाग लेती हैं। इसकी स्थापना १९३१ में हुई थी, लेकिन इसका आधुनिक स्वरूप १९४७ में भारत और पाकिस्तान के स्वतंत्र होने के बाद निश्चित हुआ। लंदन घोषणा के तहत ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय राष्ट्रमंडल देशों के समूह की प्रमुख होती हैं। राष्ट्रमंडल सचिवालय की स्थापना १९६५ में हुई थी। इसके महासचिव मुख्य कार्यकारी के तौर पर काम करते हैं। वर्तमान में कमलेश शर्मा इसके महासचिव हैं। उनका चयन नवंबर, २००७ को हुआ। इसके पहले महासचिव कनाडा के आर्नल्ड स्मिथ थे।
पुनः  गलामी का प्रतीक
संविधान सभा में इस मुद्दे पर बहस हुई थी कि हम ने कोमनवेल्थ की सदस्यता को क्यों बने रहने दिया उसे त्यागा क्यों नहीं .., वरिष्ठ कांग्रेसीयों ने इसे देश हित के विरुद्ध बताते हुए राष्ट्र कि पुनः  गलामी का प्रतीक माना था जो कई मायनों में सही साबित हुआ...! इस संगठन ने ज्यादातर मौकों पर पाकिस्तान का फेवर किया और भारत को बेवजह दबाया गया , यह भारत की राष्ट्र भाषा और अन्य प्रादेशिक भाषों के लिए हानीकारक रहा और अनुसन्धान के लिए ही नही वरन सामरिक हितों पर भी दगाबाज साबित हुआ ..! सच सिर्फ यह है कि यह आज भी ब्रटिश गुलाम देशों कि ब्रिटश ग़ुलामी को निरंतर बनाये रखने का उपकरण मात्र है...! ब्रिटेन की विश्व व्यापी अधिनायकत्व को वर्तमान में बनाये रखने का उद्धम है..!!   
संविधान सभा में .... 
 १६ मई १९४९ से संविधान सभा का नया सत्र प्रारंभ  हुआ और उसमें पहले ही दिन तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु ने " राष्ट्रमंडल की सदस्यता सम्बन्धी निर्णय के अनुमोदन के बारे में प्रस्ताव " सभा के समक्ष रखा, तथा वे उसे बिना बहस के कुछ ही मिनिट में पास करवा लेना चाहते थे..,, उनके प्रस्ताव के बहुत थोड़े अंश निम्न प्रकार से हैं..-
जवाहरलाल नेहरु :- "....यह निश्चित किया जाता है कि यह सभा भारत के राष्ट्र मंडल का सदस्य बने रहने के बारे में उस घोषणा का अनुसमर्थन करती है जिसके लिय भारत के प्रधान मंत्री (नेहरु  जी ) सहमत हुए थे और जिसका उल्लेख उस सरकारी बयान में किया गया था जो २७ अप्रैल १९४९ को राष्ट्र मंडल के प्रधानमंत्रीयों  के सम्मलेन  के समाप्त होने पर निकाला  गया था | "
स्वंय नेहरु जी ने स्वीकार करते हुए कहा है " ... इसमें ब्रिटिश राष्ट्रमंडल का और इस  बात का जिक्र है कि इस राष्ट्र मंडल के लोग साझेतौर पर '  क्राउन ' के प्रती निष्ठावान है | .... " उन्होंने आगे कहा "... भारत शीघ्र ही एक प्रभुसत्ता संपन्न स्वतंत्र गणराज्य बनने  जा रहा है और यह कि वह राष्ट्र मंडल का पूर्ण सदस्य बने रहने का इच्छुक है और ' सम्राट ' को स्वतंत्र  साहचर्य के  प्रतीक के रूप में मानता  है... "
"...हमने पहले प्रतिज्ञाएँ कीं थी उन सभी को ध्यान में रख कर और अंततः इस माननीय सदन के संकल्प  को ध्यान   में रख कर, 'उद्देश्य संकल्प' को और बाद में जो कुछ हुआ उसे ध्यान में रख कर तथा उस  संकल्प में  अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने जो आदेश मुझे दिया था उसे सामने रख कर मैं वहां गया और मैं पूरी नम्रता से आपसे कहना चाहता हूँ कि मैंने उसे आदेश का अक्षरशः पालन किया है | ...  "
 कुल मिला कर नेहरु जी ने अपने प्रस्ताव  भाषण को सदन के सदस्यों को समझाने की द्रष्टि से इतना  लंबा पढ़ा कि वे लिखित में १६ पेज का है | मगर कुछ जागरूक सदस्यों ने संशोधन पेश कर इस पर बहस का रास्ता खोला , हालांकी नेहरु जी ने ' अंतर्राष्ट्रीय संधियों पर बहस नहीं होने का तर्क यह कहते हुए रखा कि इस तरह की चर्चा से कोई संशोधन नहीं किया जा सकता ' मगर सभा के अध्यक्ष बाबू राजेन्द्र प्राशाद ने बहस कि अनुमती सभा के नियमों का हवाला देते हुए दे दी .., जिस अनुमोदन को नेहरु जी ने दस  मिनिट का काम समझा था उस पर पूरे दो दिन बहस चली.., संविधान सभा में हुई चर्चा दोनों तरफ की थी , पहले दिन विरोध करने वालों का बोलवाला रहा तो दूसरे दिन समर्थकों  की पौ बाहर रही..,
- प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना ( संयुक्त प्रांत के सामान्य वर्ग के सदस्य  ) 
"... में समझता हूँ कि यह घोषणा उन चुनावी प्रतिज्ञाओं  का उल्लंघन  है जो कांग्रेस पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में की गई थीं , और जिनके आधार पर इस सदन के अधिकाँश  सदस्य चुने गए थे और इस कारण यह सदन इस घोषणा का अनुसमर्थन करने के लिए सक्षम नहीं हैं | "
  सक्सेना  ने अपनी बात के समर्थन  के लिए नेहरु जी के ही १९ मार्च १९३७ के उस भाषण को पढ़ कर सुनाया जो तब चुने गए विधायकों को संबोधित नेहरु जी द्वारा दिया  गया था | इसी क्रम में नेहरु जी के १० अगस्त १९४० को लिखे गए लेख ' द पार्टिंग आफ द वेज ' का अंतिम भाग को भी  सुनाया |
( सक्सेना  ने ) आगे उन्होंने कहा "... जैसे ही प्रधानमंत्री जी ने (नेहरु जी ) इस घोषणा पर हस्ताक्षर किये उसी समय मलाया के मजदूर संघों के बहादुर  भारतीय नेता गणपती को फांसी दे दी गई और आज जब हम इस संकल्प  को पास करने जा रहे हैं तो मलाया में एक अन्य बहादुर भारतीय साम्ब शिवम् को या तो आज सुबह फांसी पर चढ़ा दिया होगा या फिर शायद आज किसी भी समय फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा | में समझता हूँ कि ब्रिटिश साम्राराज्यवाद अपने ही  रास्ते पर चल रहा है और वह अपने रास्ते से हटेगा नहीं भले ही हम उसे फुसलाने की या जीतने की कितनी ही कोशिशें क्यों न करें |..." उन्होंने अपने तर्क पूर्ण भाषण में विविध प्रकार से इस कोमनवेल्थ  संघ में बने रहने की अनावश्यकता को  चिन्हीत किया ...!
लक्ष्मी नारायण साहू  ( उडीसा प्रांत के सामान्य वर्ग के सदस्य  )
  "..हमें यह प्रतीत होता है कि हम अनजाने में उस जाल में के फंडों में फांस गए हैं जो कि अंग्रेजों ने इतनी चालाकी से तथा इतने गुप्त रूप से हमारे लिए बिछाया   है |... "
हरि विष्णु काम ( मध्य प्रांत और बरार के सामान्य वर्ग के सदस्य )
 "...कुछ समय पूर्व जब मैंने हाउस आफ कामन्स में २ मई ( सन 1949) को मि. एटली द्वारा दिए गए एक प्रश्न के उत्तर को पढ़ा तो क्षुब्ध रह गया | जिस कागज़ पर इस घोषणा का प्रारुप तैयार लिया गया था और हस्ताक्षर हुए थे, उसकी स्याही अभी मुश्किल से ही सूखी होगी कि इसके केवल पांच दिन बाद ही एक प्रश्न के उत्तर में श्री एटली ने कहा कि राष्ट्रों के इस समूह के नाम में कोई परीवर्तन नहीं हुआ है |... " 
एटली ने एक बार फिर इस तीनों अर्थात राष्ट्रमण्डल , ब्रिटिश राष्ट्रमण्डल तथा साम्राज्य का उल्लेख  किया है |....
 उन्होंने आगे कहा "... भारत को राष्ट्र मण्डल की आवश्यकता की अपेक्षा राष्ट्र मण्डल  को भारत की आवश्यकता कहीं अधिक है | यदी इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखा गया होता, तो बातचीत का शायद  हम अधिक अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकते थे | ....."
  "... उत्साह ही है जिससे कि अंततोगत्वा अंतर पड़ता है | आज पराजयवाद की जिस भावना ने हमें जकड लिया है | उसका परित्याग करना होगा | यह दुर्बलता है , यह हमारे मन , मस्तिष्क तथा ह्रदय में बैठी कायरता है | मेरे विचार में आज जिस बात की आवश्यकता है , वह है कुरुक्षेत्र का युद्ध होने से पूर्व की वह मंत्रणा जो कि श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध भूमि में दी _
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥२- ३॥
 ..... इस श्लोक का सारांश प्रस्तुत करता हूँ | यहाँ श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वह दुर्वलता तथा कायरता के आगे न झुके | वह कहते हैं ' अर्जुन , यह तुम्हे शोभा नहीं देता | ह्रदय की यह दुर्वलता लज्जाजनक है | इसका इसी क्षण परित्याग करो | उठो और युद्ध करो || ' ..."
दामोदर स्वरूप सेठ  (संयुक्त प्रान्त )
".... जिन परिस्थितियों में यह सभा निर्वाचित हुई थी उनसे मैं पूरी तरह परिचित हूँ | यह लगभग एक दलीय संस्था है तथा इससे आसानी से वह सब कुछ करवाया जा सकता है जो सत्ताधारी   सरकार करवाना चाहे   | परन्तु फिरभी मैं यह कहूंगा कि संविधान  सभा द्वारा इस प्रश्न पर अंतिम निर्णय लिए बिना प्रधानमंत्री को राष्ट्रमंडल में बने रहने पर सहमत नहीं होना चाहिए था |..."
सेठ गोविन्द दास (मध्य प्रांत और बरार )
"..... मैं मानता हूँ  कि जिस कामनवेल्थ में  हम शामिल हुए हैं वह कामनवेल्थ अभी सच्चा कामनवेल्थ नहीं है | मैं जानता हूँ कि अफ्रीका में हमारे निवासियों की जो स्थिती है , वह हमारे लिए तो दुःख  कि बात है ही पर अफ्रीका निवासियों के लिए वह लज्जा की बात होनी चाहिए | मैं यह मानता हूँ कि आस्ट्रेलिया  की जो व्हाईट पालिसी , जो श्वेतांगी नीति है , वह भी  कामनवेल्थ के लिए शोभाप्रद नहीं |..."
मौलाना हसरत मोहानी ( संयुक्त प्रान्त से मुस्लिम )
  ".....मैं किसी ऐसे पिशाच का स्वागत नहीं कर सकता जो गणराज्य भी हो और उपनिवेश भी ! यह प्रत्यक्षतः एक अनर्गल बात है |....."
"....मेरे मित्र तथा सहयोगी शरत  बोस ने इस घोषणा के बारे में कहा है कि यह एक बहुत बड़ी धोकेबाजी है और मैं उनके इस मत से पूर्णतया सहमत हूँ | में उनसे एक कदम आगे बढ़ कर यह कहना चाहता हूँ  कि यह न केवल भारतीय स्वतन्त्रता के प्रति धोकेबाजी  है किन्तु एशिया के उन सभी देशों के प्रयत्नों के प्रति भी धोकेबाजी है जो स्वतंत्रता प्राप्ती  के लिए सचेष्ट हैं |..... " 
निष्कर्स :- 
  सभा में कांग्रेस का प्रचंड बहुमत था .., जवाहरलाल नेहरु प्रधानमन्त्री थे , सभा द्वारा उनके रखे प्रस्ताव को स्वीकार करना ही था , सो स्वीकार कर लिया गया मगर इसमें उन्हें पशीना आ गया था.., बाद में बहस के समापन में भी उन्होंने १० पेज का भाषण पढ़ कर यह कोशिश कि यह सब कुछ देश हित में है, मगर इसके परिणाम बहुत घातक हुए... आज तक जो यूरोपवाद भारत पर सवार है.., उसके मूल में यही पराजित मानसिकता है..!