रविवार, 19 सितंबर 2010

कॉमनवेल्थ, ब्रिटिश ग़ुलामी कांग्रेस

ग़ुलामी की प्रतिछाया , कॉमनवेल्थ  
 - अरविन्द सीसोदिया
 कॉमनवेल्थ खेलों के  इस लोगो (प्रतिनिधि  छवि ) को देख कर लगता है कि यह भारत की ग़ुलामी का प्रतीक है, क्या लगता है कि यह भारत  के स्वाभिमान का प्रतीक है,  भारत की स्वतंत्रता का प्रतीक है, भारत के सम्मान का प्रतीक है, सवाल यह है कि भारत के मायने क्या ...? अंग्रेजी के जानकर २-३ प्रतिशत लोग जो अभिजात्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए राजनीति और प्रशासन  में जमें हुए हैं .., वे ही हैं या सामान्य वह भारतीय जिसे अंगेजी से कोई लेना देना नहीं है वह वर्ग,   जो न केवल बहुमत में है बल्की प्रचंड  बहुमत है मगर .., चुन कर गए प्रतिनिधि यह तय करलें कि भारत से विदेशी भाषा को विदा करना है तो भारत भारत बनें..! ये लोग देश के साथ संसद में बैठ कर बेईमानी करते हैं...!! हमारी फूट का लाभ   एक विदेशी भाषा उठा रही है यह हमें शर्म की बात ही है.., इससे भी अधिक शर्म की बात यह है कि हमें जबरिया  और मार मार कर.., अग्रेज बनाया जा रहा है ..? इसी तरह की पूर्ण घोषित ग़ुलामी का नाम कॉमनवेल्थ हे ..!!! संविधान सभा में कांग्रेस के ही वरिष्ठ सदस्यों ने जवाहरलाल नेहरु को अच्छी फटकार लगाई थी ..!   नेहरु जी ब्रिटिश गुलाम देशों के एक सम्मलेन में ही भारत को कॉमनवेल्थ देशों का सदस्य बना आये थे, उन्होंने यह विषय संविधान सभा में संभवतः १६ मई १९४९ को रखा  था, वे इसे १० मिनिट में पास करवाने के हिसाब से सदन में  उपस्थित हुए थे , मगर यह विषय बुरी तरह से उलझ गया था , नेहरु जी को खूब खरी खोटी सुनाई गई , मगर वे कार्यवाहक सरकार के प्रधान थे , संख्या बल के आधार पर इसे स्वीकार कर लेने की मजबूरी थी सो इसे स्वीकार कर लिया  गया था..!   

1-    भोपाल. मध्य प्रदेश सरकार के  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने भोपाल में क्वींस बैटन रिले का बहिष्कार कर सबको चौंका दिया है।चौहान ने कहा कि कॉमनवेल्थ गेम्स उपनिवेशी इतिहास की याद दिलाता है। मुख्यमंत्री के इस बयान से राजनैतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
2-      गुना। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर से भोपाल में "क्वींस बैटन" के स्वागत कार्यक्रम का बहिष्कार किए जाने के बाद गुना शहर में  क्वींस बैटन के प्रवेश के मौके पर स्वागत के बीच विरोध प्रदर्शन भी हुआ। सामान्य प्रशासन राज्य मंत्री कन्हैयालाल अग्रवाल शहर में होने के बावजूद क्वींस बैटन रिले के कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। उन्होंने भी इसे "गुलामी का प्रतीक" बताते हुए बहिष्कार कर दिया। क्षेत्रीय विधायक राजेंद्र सिंह सलूजा ने भी स्वागत कार्यक्रम का बहिष्कार किया। वहीं एआईएसएफ के छात्रों ने हनुमान चौराहे पर क्वींस बैटन रिले को लेकर विरोध प्रदर्शन किया तथा काले रूमाल दिखाकर नारेबाजी की। भारतीय जनता पार्टी और कुछ अन्य सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी भी क्वींस बैटन के स्वागत कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए।
एक मत
वेदप्रताप वैदिक, नैशनल कन्वेनर, सबल भारत
वास्तव में जब भारत आजाद हुआ था तो देश के बहुत से नेताओं और विचारकों की राय थी कि भारत को तथाकथित राष्ट्रकुल से बाहर निकल आना चाहिए। लेकिन उस समय यह माना गया कि ब्रिटेन के साथ भारत के आर्थिक और सैनिक हित जुड़े हैं, इसलिए वैसा कदम उठाना अतिवाद ही होगा। लेकिन आजादी के बाद लगभग 17-18 साल तक जब भारत ने देखा कि हर बड़े मुद्दे पर ब्रिटेन भारत की बजाय पाकिस्तान का साथ देता है और भारत की गुटनिरपेक्षता का भी उचित सम्मान नहीं करता है, तब 1966 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रारंभिक काल में यह प्रश्न उठा कि भारत राष्ट्रकुल से बाहर क्यों न निकल आए। 1965 के भारत-पाक युद्ध में ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेरल्ड विल्सन की पक्षपातपूर्ण भूमिका ने इस भाव को और अधिक सुदृढ़ बनाया। लेकिन भारत है कि वह अब भी राष्ट्रकुल में टिका हुआ है। विश्व राजनीति में अब भारत का महत्व ब्रिटेन से भी अधिक होता जा रहा है लेकिन मानसिक दासता ऐसी बीमारी है, जिसका कोई इलाज नहीं।
ब्रितानी राष्ट्रमण्डलकॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस, राष्ट्रकुल, या राष्ट्रमण्डल देश 
 (अंग्रेज़ी:कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस) (पूर्व नाम ब्रितानी राष्ट्रमण्डल), ५३ स्वतंत्र राज्यों का एक संघ है जिसमे सारे राज्य अंग्रेजी राज्य का हिस्सा थे ( मोज़ाम्बीक और स्वयं संयुक्त राजशाही को छोड़ कर)। इसका मुख्यालय लंदन में स्थित है। इसका मुख्य उद्देश्य लोकतंत्र, साक्षरता, मानवाधिकार, बेहतर प्रशासन, मुक्त व्यापार और विश्व शांति को बढ़ावा देना है। इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय प्रत्येक चार वर्ष में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों और बैठक में भाग लेती हैं। इसकी स्थापना १९३१ में हुई थी, लेकिन इसका आधुनिक स्वरूप १९४७ में भारत और पाकिस्तान के स्वतंत्र होने के बाद निश्चित हुआ।
     राष्ट्रमंडल या राष्ट्रकुल देशों का कोई संविधान या चार्टर नहीं है। इसके प्रमुखों की प्रत्येक दो वर्ष में एक बार बैठक होती है। भारत सहित एंटीगुआ, ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, ब्रुनेई, कनाडा, साइप्रस, घाना आदि इसके सदस्य हैं। जिम्बाब्वे को २००२ में राष्ट्रकुल की सदस्यता से हटाया गया था और २००३ में यह प्रतिबंध अनिश्चित काल तक बढ़ाया गया था। राष्ट्रकुल समूह के देशों की कुल जनसंख्या १.९ अरब है, जो विश्व की जनसंख्या की एक-तिहाई भाग है। फिजी को कॉमनवेल्थ समूह से २०००-०१ में प्रतिबंधित किया गया था, उसके बाद पुन: उस पर २००६ में प्रतिबंध लगा। नाइजीरिया को १९९५ से १९९९ तक प्रतिबंधित किया गया। पाकिस्तान पर १९९९ में प्रतिबंध लगा था।
       लंदन घोषणा के तहत ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय राष्ट्रमंडल देशों के समूह की प्रमुख होती हैं। राष्ट्रमंडल सचिवालय की स्थापना १९६५ में हुई थी। इसके महासचिव मुख्य कार्यकारी के तौर पर काम करते हैं। वर्तमान में कमलेश शर्मा इसके महासचिव हैं। उनका चयन नवंबर, २००७ को हुआ। इसके पहले महासचिव कनाडा के आर्नल्ड स्मिथ थे
       पं॰ नेहरू ने 1950 में एक बार कहा था कि राष्ट्रमंडल में भारत की सदस्यता का विरोध ठण्डे तर्क के आधार पर नहीं बल्कि सस्ती भावनाओं को उभारने के निमित्त किया जाता है। पं॰ नेहरू ने  लार्ड औलेडी माउन्टबेटन की इसमें अपनी भूमिका थी और इंग्लैण्ड में पढ़े-लिखे भारतीयों की अपनी मानसिक ग़ुलामी भी थी ! 
  कॉमनवेल्थ अपने आपको अधिकाधिक अप्रासंगिक बनाता गया है। पापुआ न्यूगिनी और लेसोथों में एक सकारात्मक भूमिका निर्वाह करने के अतिरिक्त बहुत महत्वपूर्ण या गर्वपूर्ण रिकार्ड राष्ट्रमण्डल का नहीं रहा। 54 राष्ट्रों का यह संघ जनतंत्रा के लिए भी कोई उपयोगी कार्य नहीं कर पाया। नाइजीरिया में डिक्टेटर सानी अबाचा का शिकंजा ढीला होता नजर नहीं आता।
  कुल मिला कर कोमल्वेल्थ की कोई सार्थक भूमिका कभी भी सामने नहीं आई है अब तो हालत यह हैं यह देश सिर्फ अमरीका का एक पिछलग्गू देश मात्र बन कर रहा गया है ..! 

2 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक और उम्दा प्रस्तुती ...श्री शिवराज सिंह चौहान ने क्वींस बेटन का विरोध कर महानता का परिचय दिया है ...हर सच्चे भारतीय को इस गुलामी के शर्मनाक गेम का विरोध करना चाहिए ...शर्मनाक है की इस गुलामी के खेल पे देश के गद्दारों ने अपने गद्दार भाइयों को भ्रष्टाचार का खेल खेलकर लूटने के लिए देश का खजाना बेशर्मी से खुला छोड़ दिया है ..

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