सोमवार, 27 सितंबर 2010

धर्म और तत्वज्ञान में,कोई हमसे बढ़कर नहीं - नेहरु जी

नेहरु जी आध्यात्म  के आकाश में 
- अरविन्द सीसोदिया
  आजकी कांगेस जिस तरह की धर्म निरपेक्षता की बाट करती है .., वह सिर्फ हिंदुत्व का विरोध मात्र है .., जो कि एक सोचा समझा इसाई एजेंन्डा है.., सच यह है की कांग्रेस को यह समझना चाहिए की नेहरूजी भी भारतीय आध्यात्म और जीवन व्यवस्था का आदर करते थे ...! धर्म निरपेक्षता शब्द ही गलत है सही शब्द धर्म सापेक्षता होना चाहिए ..!
 जवाहरलाल नेहरु यूं तो समाजवादी विचारधारा से सम्बन्ध रखते थे मगर वे साम्यवाद के बहुत ही अधिक निकट थे, उनके द्वारा हिंदुत्व के गुणगान की  सामान्यतः वन्दना  कम ही थी , जिस तरहे से गांधी जी अपने हिंदुत्व वादी चिंतन  में प्रखर थे , उस तरह से नेहरूजी कभी भी नहीं रहे , मगर उनका मन कहीं न कहीं से हिन्दू चिंतन को व्याकुल तो रहता ही था , इसके कुछ अंश मुझे उनकी जीवनीं में मिले जिन्हें में आपके साथ बाँटना  चाहता हूँ ..! यह ठीक है कि उन्होंने सीधे सीधे हिंदुत्व का नाम नहीं लिया मगर , तथ्यात्म बोध तो वही कहता है, जो है ..!! उन्होंने हिन्दू संस्कृती  को सम्मान भी दिया और उसे गलत तत्वों के कारण गिरा हुआ भी ठहराया , उनके विश्लेषण से पूरी तरह सहमत नहीं होते हुए भी उनके  विचारों  को सामने लाना इस लिए आवश्यक है कि कांग्रेस और वर्तमान मीडिया को यह ज्ञान ही नहीं है कि नेहरूजी भी पूर्वजों का सम्मान करे थे, संस्कृति का सम्मान करते थे...!   ,
सबसे पहले हम जवाहरलाल नेहरु को २४ जनवरी १९४८ के उस भाषण के एक अंश को लेते हैं जो उन्होंने अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय  के दीक्षांत समारोह में दिया था.......
".....मुझे अपनी विरासत और अपने पूर्वजों पर गर्व है, जिन्होनें भारत को बौद्धिक एवं सांस्कृतिक प्रसिद्धि दिलाई |  आपको इस गौरवशाली अतीत के बारे में कैसा अनुभव  होता है ? क्या आप को लगता है कि आप भी इसके भागीदार और उत्तराधिकारी  हैं , और इसलिए क्या उस बात पर आपको गर्व नहीं होता , जो जितनी मेरी है उतनी  ही आपकी भी है ? क्या आप इसे अपनी न मानकर बिना समझे ही उसे दरकिनार कर देते हैं ? क्या आपको उस रोमांच की अनुभूति नहीं होती , जो उस विशाल निधि का न्यासी  और उत्तराधिकारी होने के बोध से उपजती  है ?......  "
उनके ही द्वारा लिखी गई.. मेरी कहानी  (आत्मकथा ) जिसका हिन्दी सम्पादन हरिभाऊ  उपाध्याय ने किया
१- अध्याय ३-थियोसाफी , जो कि बचपन से सम्बद्ध है में नेहरु जी कहते हैं कि-- '...पुस्तकें पढने के अलावा ब्रुक्स साहब  ने एक और बात का मुझ पर असर डाला, जो कुछ समय तक बड़े जोर के साथ रहा | वह थी थियोसाफी | हर हफ्ते उनके कमरे में थियोसाफिस्टों की सभा हुआ करती | मैं भी उसमें जाया करता और धीरे धीरे थियोसाफी भाषा और विचार शैली मेरे ह्रद्य्न्गम होने लगी | वहां आध्यात्मिक विषयों पर तथा 'अवतार' , 'कामशरीर' और दूसरे 'अलौकिक शरीरों 'और 'तेजोवलय' तथा 'कर्मतत्व' इन विषयों पर चर्चा होती और मैडम ब्लेवेट्स्की  तथा दुसरे थियोसाफिस्टों से लेकर हिन्दू धर्म ग्रंथो , बुद्ध के धम्मपद , पायथागौरस, तयाना के अपोलोनियस और कई दार्शनिकों और श्रिषियों के ग्रन्थों का जिक्र आया करता था | वह सब कुछ मेरी समझ  में तो नहीं आता था | परन्तु वह मुझे बहुत रहस्य पूर्ण और लिभावना मालूम होता था, और मैं ख्याल करता था कि सारे विश्व में रहस्यों की कुंजी यही है | यहाँ से जिन्दगी में सबसे पहले मैं अपनी तरफ से धर्म और परलोक के बारे में सोचने लगा था |   '
  ' हिन्दू धर्म ख़ास कर , मेरी नजर में ऊँचा उठ  गया था, क्रिया - कांड और व्रता उत्सव नहीं - बल्कि उसके महान ग्रन्थ , उपनिषद और भगवदगीता  |  मैं उन्हें समझता नहीं था , परन्तु वे मुझे बहुत विलक्षण जरुर मालूम होते  थे |  '
  ' काम शरीरों के सपने आते और मैं बड़ी - बड़ी दूर तक आकाश में उड़ता जाता | बिना किसी विमान के यों ही ऊँचे आकाश में उड़ते जाने के सपने , मुझे जीवन में अक्सर आया करते हैं | कभी - कभी तो वे बहुत सच्चे और साफ़ मालूम होतस हैं  और नीचे विशाल विश्व पटल में सारा जन प्रदेश मुझे दिखाई पड़ता है | मैं नहीं जानता हूँ कि फ्रूड और दूसरे आधुनिक स्वप्नशास्त्री इस सपने का क्या अर्थ लगाते होंगें |    ' यह बात वे लगभग १३ /१४ वर्ष की आयु की सुना रहे थे , इसके बाद उन्हें इंग्लैड पढने जाना पढ़ा सो उनका धर्म और आध्यात्म अभिरुची  भारत में ही छूट गई  !
२- अध्याय ५३/ हिन्दुस्तान - पुराना और नया
 ( नेहरूजी अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली के दोषों को खुल कर बता रहें हैं.., यह दूसरी बात है कि वे इसे बदल नहीं पाए..., और वे आज भी बनीं हुई हैं ....)
"... स्कूलों और कालेजों में इतिहास , अर्थशास्त्र या जो भी दूसरे विषय पढाये जाते थे | ब्रिटश साम्राज्य के द्रष्टिकोण  से लिखे होते थे और उनमें हमारी पिछली और मौजूदा  बहुतेरी बुराइयों और अंग्रेजों के सदगुणों  और उज्जवल भविष्य पर  जोर दिया रहता था | हमने उनके इस तोड़े - मरोड़े वर्णन को ही कुछ हद तक मान लिया और अगर कहीं हमने उसका सहज स्फूर्ति से प्रतीकार किया तो भी उसके असर से हम न बच सके | पहले पहल तो हमारी बुद्धि उसमें से निकाल ही नहीं सकती थी ; क्यों कि हमारे पास न तो दूसरे वाक्यात थे और न दलीलें | "
"....इसलिए हमने धार्मिक राष्ट्रवाद और इस विचार की शरण ली , कि कम से कम धर्म और तत्व ज्ञान के क्षैत्र में कोई जाती हमसे बढ़कर नहीं है | हमने अपनी इस बदबख्ती और गिरावट में भी इस बात से तसल्ली की कि यद्यपि हमारे पास पश्चिम की बाहरी चमक दमक नहीं है तो भी हमारे पास अन्दर की चीज है | जो कि उससे कहीं ज्यादा कीमती और रखने लायक निधि है | विवेकान्द और दूसरों  ने तथा पश्चिमी विद्वानों ने हमारे पुराने दर्शन शास्त्रों में जो दिलचस्पी ली उसने हमें कुछ स्वाभिमान प्रदान किया और अपने भूतकाल के प्रती जो अभिमान का जो भाव मुर्क्जा गया था उसे फिर लहलहा दिया |    "
"....भारत के प्राचीन इतिहास के सम्बन्ध  में आगे चल कर जो और खोजे हुई उसने तो बहुत प्राचीन काल की उच्चा सभ्यता के उज्जवल युगों का वर्णन हमारे सामने ला दिया और हम बड़े संतोष के साथ उन्हें पढ़ते हैं | हमें यह भी पता लगा कि अंग्रेजों के लिखे इतिहासों से हिन्दुस्तान में अंग्रेजों के बारे में हमारे मन में जो धरना बन गई थी उसके उलटे ही उनके कारनामें हैं | "
-- इसी  अध्याय में आगे लिखते हैं कि --
"....अपने इस अधः पतन और दरिद्रता के बावजूद , हिन्दुस्तान काफी शरीफ और महान है | और हालांकि वह पुरानी और मौजूदा मुसीबतों से काफी दबा हुआ है और उसकी पलकें थकान से कुछ भारी मालूम होती हैं , फिर भी 'अन्दर से निखरती हुई सौन्दर्य-कान्ति उसके शरीर पर चमकती है | उसके अणु - परमाणु में अदभुद विचारों , स्वच्छंद कल्पनाओं और उत्कृष्ट मनोभावों की झलक दिखाई देती है | ' उसके जीर्ण शीर्ण शरीर में अब भी आत्मा की भव्यता झलकती है | अपनी इस लम्बी यात्रा में वह कई युगों में से होकर गुजरा है , और रास्ते मैं उसने बहुत ज्ञान और अनुभव संचित किया है , और दूसरे देशोवाशियों से देन लेन किया है | उन्हें अपने बड़े कुनबे मैं शामिल कर लिया  है, उत्थान और पतन , समृद्धि और ह्रास के दिन देखे हैं , बड़ी - बड़ी जिल्लतें उठाई हैं , महान दुखः झेले हैं और कई अदभुत दृश्य देखे हैं , लेकिन अपनी इस सारी लम्बी यात्रा में उसने अपनी अति प्राचीन संस्कृती को नहीं छोड़ा , उससे उसने बल और जीवन - शक्ति प्राप्त की है , और दूसरे देशों के लोगों को उसका स्वाद चखाया है   | ... "
 "..... घड़ी पर लटकने की तरह वह कभी ऊपर गया और कभी नीचे आया है | अपने साहसिक विचारों से स्वर्ग और ईश्वर तक पहुचने  की हिम्मत  की है | उसने रहस्य खोल कर प्रकट किये हैं , और उसे नरक कुंद में गिरने का भी कटु अनुभव हुआ है | दुखः दी वहमों और पतनकारी रस्म- रिवाजों के बावजूद जो कि उसमें घुस  आये हैं और जिसने नीचे गिरा दिया है , उसने उस स्फूर्ति और जीवन को अपने ह्रदय से कभी नहीं भुलाया ; जो उसकी कुछ अनुभवी संतानों ने इतिहास के उस काल में उसे दी हैं और जो उपनिषदों में संचित है | उनकी कुशाग्र बुद्धि  सदा खोज में लीन रहती थी | नवीनता को पाने की कोशिश करती थी ओर सत्य की शोध में व्याकुल रहती थी | वह जड सूत्रों को पकड़ कर नहीं बैठी रही और न मुर्दा विधि - विधानों,ध्येय वंचना और निर्थक कर्म - कांडों  में डूबी रही | न तो उन्होंने इस लोक में खुद अपने लिए कष्टों से छुटकारा चाहा , नं उस लोक में स्वर्ग की इच्छ की | बल्कि ज्ञान और प्रकाश मांगा | ' मुझे असत से सत की ओर ले जा , अंधकार से प्रकाश की ओर ले जा, मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले जा | * ' अपनी सबसे प्रशिद्ध प्रार्थना - गायत्री मन्त्र - में जिसका लाखों लोग पथ करते , आज भी नित्य जप करते हैं , ज्ञान ओर प्रकाश के लिए ही प्रार्थना की गई है |  "
* " असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योर्तिगमय,मृत्योर्माsमृतं | " _ वृहदारणयक उपनिषद १-३-२७   
"... हालांकि राजनैतिक दृष्टि से अक्सर उसके टुकड़े टुकड़े होते रहे हैं , लेकिन उसकी आध्यात्मिकता ने सदा ही उसकी सर्व सामान्य विरासत की रक्षा की है | ओर उसकी विविधताओं में हमेशा एक विलक्षण एकता रही है | ** "
** "..हिन्दुस्तान में सबसे बड़ी परस्पर - विरोधी बात यह है की इस विविधता के अन्दर एक भारी एकता समाई है | यों सरसरी तौर पर वह नहीं दिखाई देती , क्योंकि किसी राजनैतिक एकता के द्वारा सारे देश को एक सूत्र में बाँधने के रूप में इतिहास में उसने अपने को प्रकट  नहीं किया , लेकिन वास्तव में यह एक ऐसी  असलियत  है ओर इतनी शक्तीशाली है की हिन्दुस्तान की मुस्लिम दिनिया को भी यह कबूल करना पड़ता है की उसके प्रभाव में आने से उन पर भी गहरा असर हे बिना नहीं रहा है |   - दी फ्यूचर आफ ईस्ट एंड वेस्ट में सर फ्रेडारिक व्हाईट "
 कुल मिला कर पंडित नेहरु ने भारतीय मूल्यों की गहरी पड़ताल की है .., राजैतिक  स्वरूप में एक नहीं रहे यही हमारा प्रमुख दोष है , लगभग आज भी वही स्थिति है..! मगर नेहरु जी के हाथ में हिन्दुस्तान कि राजनैतिक बागडोर आ गई थी , वे ही तब सर्वेसर्वा थे , उनकी आवाज के विरुद्ध पत्ता भी नहीं खडकता था यह स्थित बन गई थी ,मगर वे भी इसे दिशा  नहीं दे पाए ,यह उनकी विफलता थी ...! संस्कृति में कितना दम है यह तो वे भी स्वीकार चुके हैं वह अपने सामर्थ्य से पुनः उत्थान को निश्चित ही प्राप्त होगी ...! 

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