शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

अपवित्र कर दिया नोबेल पुरूस्कार ...

लोकतंत्र समर्थक  ; 
चीन में बंदी को नोबेल पुरूस्कार  ....!
- अरविन्द सीसोदिया 
     यूं तो नोबेल पुरुस्कारों  का चयन , विशेष कर  शांती नोबेल अनेकों बार विवादास्पद रहा है, इसके अतिरिक्त और भी अंतर्राष्ट्रीय पुरूस्कार विवाद पूर्ण रहे हैं.., इकने पीछे का सच छलक तो जाता है मगर ज्यादातर उन्हें कहता कोई नहीं है ! पुरुस्कार देना और उसके मुह से अपनी बात कहलवाना..! यह अजीव सी बेईमानी बहुत सालों से चल रही है..!!  
     इस बार इसलिए विवादास्पद है कि चीन में लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले ल्यू जियाओबो (शियाओबो) को नोबेल पुरुष्कार देने की घोषणा की गई है..! यह वह व्यक्ती है जिसने  १९८९ में  चीन में  लोकतंत्र के समर्थन  में विशाल प्रदर्शन किया था , जिस में हजारों  छात्र मारे गए थे ! चीन में इसका दर्जा अपराधी का है ! 
- क्रानिकल इयर बुक के अनुसार पेइचिंग में सैनिक कार्यवाही में लगभग १०,००० लोकतंत्र समर्थक आन्दोलनकारी  जून १९८९  को मारे गए थे | इसी तरह से मनोरमा इयर बुक के अनुसार १९८९ में पेइचिंग में १५ मई को थ्यामन  चौराहे पर हजारों लोकतंत्र समर्थक छात्रों  ने प्रदर्शन किया था, वहां माशर्ल ला लगा दिया गया था..! तब राष्ट्रपति बुस ने चीन के खिलाफ सैनिक प्रतिबन्ध लगा दिया था .., और तब चीन की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने चाओ चिआंग के स्थान पर चाओ चेमिन  को पार्टी का महासचिव बना दिया था ..! चीन में लोकतंत्र नहीं है वहां एक मात्र पार्टी चीन  कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता है, वहां मीडिया सहित  बोलने , करने और मानवता की बात तक करने की कोई स्वतंत्रता नहीं है .., भयानक  शोषण के दौर से चीन कि जनता गुजर रही है |       
अपवित्र कर दिया नोबेल को 
 प्रश्न यह है कि जब लिऊ को वास्तव में पुरूस्कार देना चाहिए था ..., में उसे इसके हक़दार के तौर पर स्वीकार करता हूँ..! मगर जब उसे ताकत देने का वक्त था , तब तो उसे दिया नहीं गया.., आज जब उस दौर को २१-२२  साल हो गए तब आप उसे पुरूस्कार इसलिए दे रहे हो कि चीन में फिर बगावत हो....!! पुरुस्कार कितना ही पवित्र क्यों न हो मगर उसका उपयोग आपने अपनी गर्ज के लिए; अपने स्वार्थ के लिए, अपने गंदे काम के लिए  करके,  उसे अपवित्र कर दिया...! क्यों कि आज वही चीन  जिसे आपने आगे आगे रखा था वह आपके वश में नहीं है..., अमरीकी गलत नीतियों के कारण आज वह भस्मासुर हो गया ..!! भारत को नीचा  दिखाने के लिए आपने लम्बे समय तक पाकिस्तान और चीन की मदद की...!! आज वह आपकी वैज्ञानिकता, आर्थिकता और विश्व वर्चस्व को खतरा बन गया है तो आपने उसे इस तरह से संकट में डालने की ठानी  जो ठीक नहीं है ! दूसरे के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाना अनुचित  है.., सीधा मुकावला करो.., हो जाये तीसरा विश्व युद्ध .., वह होना तो है ही.., और यह भी तय  है की चीन के कारण ही होगा तीसरा विश्व युद्ध...!!    
पत्नी की  नजरबंदी 
नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाले लिऊ चियाओबो की पत्नी ने अपनी नजरबंदी को अवैध बताया है. जेल में बंद चियाओबो की पत्नी लिऊ चिया  सरकार पर बरस पड़ीं. उन्होंने कहा कि उन्हें अवैध तरीके से नजरबंद करके रखा जा रहा है | लिऊ चिया ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा, "मुझे अवैध तरीके से घर में कैद रखने के लिए मैं सरकार के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराती हूं." उन्होंने लिखा कि उनके हालात बहुत मुश्किल हैं.

 चीन की नाराजगी     

       चीन की नाराजगी नॉर्वे पर उतर रही है. उसने नॉर्वे के साथ होने वाली मंत्री स्तर की कई बैठकों को रद्द कर दिया है. अगले महीने देश में होने वाले नॉर्वे के एक संगीत समारोह को भी रद्द कर दिया है. नॉर्वे ने इन फैसलों की आलोचना की है और कहा है कि वह चीन के साथ सकारात्मक रिश्ते बनाए रखना चाहता है.





      लिऊ चिया ने भी कहा था कि नॉर्वे के दो राजनयिक मंगलवार को उनसे मिलना चाहते थे लेकिन उन्हें उनके अपार्टमेंट के गेट से ही लौटा दिया गया. नॉर्वे के दूतावास ने भी इस खबर की पुष्टि की है. दूतावास की प्रवक्ता टोने हेलेने आरविक ने बताया कि दो अधिकारी लिऊ से मिलने गए थे लेकिन उन्हें दरवाजे से ही वापस भेज दिया गया.लिऊ चिया ने उम्मीद जताई है कि वह अपने पति की तरफ से नोबेल पुरस्कार लेने नॉर्वे जा पाएंगी. हालांकि उन्होंने ऐसी किसी संभावना से साफ इनकार कर दिया कि अपनी सजा कम कराने के लिए उनके पति खुद को कसूरवार मान कर सरकार से समझौता कर लेंगे. उन्होंने एपल डेली नाम के अखबार से यह बात कही.लिऊ चिया का फोन काट दिया गया है. अब वह ट्विटर के जरिए दुनिया के संपर्क में हैं. हालांकि चीन में ट्विटर पर प्रतिबंध है लेकिन प्रॉक्सी सर्वर के जरिए इसे खोला जा सकता है.
रिहाई की मांग 
     इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता लियू शियाओबो की पत्नी ने सरकार से अपनी पति की बिना शर्त रिहाई की मांग की है. लियू सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में 11 साल के कारावास की सजा काट रहे हैं |  लियू की पत्नी लियू शिया अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने की भी योजना बना रही हैं. हॉगकांग के अखबार साऊथ चायना मॉर्निंग पोस्ट के साथ बातचीत में लियू ने कहा कि वह पति की रिहाई के बारे में कोई शर्त स्वीकार न हीं करेंग | लियू शियाओबो जेल में बंद हैं और नोबेल दिए जाने की घोषणा के बाद से उनकी पत्नी को भी पुलिस ने घर में नजरबंद कर दिया है. लियू को अदालत ने राज्य सत्ता को चुनौती देने के आरोप का दोषी ठहराते हुए सजा दी है. वह देश में लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली को लेकर लंबे समय से आंदेलन कर रहे हैं |  इस बीच लियू ने दिसंबर में पुरस्कार ग्रहण करने के लिए पत्नी से ओस्लो जाने को कहा है. हालांकि लियू की रिहाई के बारे में चीन सरकार का कोई फैसला सामने न आने के कारण अभी यह तय नहीं हो पाया है कि ओस्लो कौन जाएगा |
दलाई लामा  --  वर्ष 1989 के नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित दलाई लामा ने जारी एक बयान में श्री शियाओबो को पुरस्कार के लिए बधाई देते हुए कहा..इस नज़रबंद नेता को नोबल पुरस्कार मिलने से यह साबित हो गया है कि चीन प्रशासन पर राजनीतिक .कानूनी .संवैधानिक सुधारों को अपनाने का दबाव बनाने के लिए उसके विरूद्ध उभर रही चीनी लोगों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी मान्यता दे दी है। 
      उन्होंने चीन सरकार से जेलों में बंद उन सभी लोगों की भी तत्काल रिहाई की मांग की जिन्होंने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अभिव्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता के अधिकार का इस्तेमाल किया है। दलाईलामा ने कहा..मैं व्यक्तिगत तौर पर सैंकड़ों चीनी बुद्धिजीवियों तथा शियाओबो सहित वहां के तमाम निवासियों द्वारा चार्टर 08 पर हस्ताक्षर करने का प्रबल सर्मथक हूं
जिसमें चीन में लोकतंत्र और आजादी की मांग की गई है। मैं यह भी मानता हूँ कि चीन के लोग आज जिस सुशासन और एक जिम्मेदार सरकार के लिए प्रयास और संघर्ष कर रहे हैं वह आने वाली पीड़ियों के लिए काफी सुखद साबित होगा..।
 

  * चीन की उप विदेश मंत्री फू यिंग ने इस साल के नोबेल पुरस्कार विजेता लिउ शियाओबो को 'अजीब' कहा. फू ने सवाल उठाया है कि चीन के असली नायकों को किसी पुरस्कार के लिए नामांकित क्यों नहीं किया |
माराकेश में विश्व नीति पर बैठक के लिए पहुंची फू ने कहा, "नोबेल समिति चीन से हमेशा अजीब लोगों को नामांकित करती है". हो सकता है कि इस वाक्य से वे दलाई लामा की ओर भी संकेत कर रही थीं जिन्हें 1989 में शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया. फू ने कहा, "अगर आप चीन के हैं, तो आप बस चीन के खिलाफ कुछ अजीब सा कर दें और आप पुरस्कार के लिए नामांकित किए जाएंगे." फू की दलील है कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को क्यों पुरस्कार देना चाहिए जिसने चीन को सात भागों में बांट देने का सुझाव दिया हो |
          साथ ही फू ने कहा कि चीन के नायकों को शायद कभी भी इस तरह की इज्जत न मिले. उनका मतलब उन वैज्ञानिकों से था जिन्होंने चीन के 1.3 अरब से ज्यादा नागरिकों के पेट भरने के लिए नए खोज किए और गरीबी घटाने में मदद की. मिसाल के तौर पर वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग जिन्हें कई लोग 'हाइब्रिड चावल के पिता' मानते हैं. फू के मुताबिक उन्हें विश्वास था कि युआन जरूर नामांकित किए जाएंगे.उन्होंने कहा कि चीन की भाषा में शांति के लिए चिह्न या अक्षर के दो भाग होते हैं, एक भाग मुंह दर्शाता है और एक चावल. फू के मुताबिक, चीन के इतिहास में माना जाता है कि विश्व में शांति तभी आ सकती है जब सबके पेट भरे हों.








अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा
* * वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चीन के लोकतंत्र समर्थक नेता ली ओ शाओ बो को शांति का नोबेल पुरस्कार देने के निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने चीन से ली को रिहा करने की अपील की है। कनाडा के प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने भी ओबामा का समर्थन करते हुए ली को छोड़ने की वकालत की है। ली इन दिनों चीन की जेल में कैद हैं। 54 वर्षीय ली को पिछले साल 25 दिसंबर को चीनी अदालत ने सरकार का तख्तापलट करने के लिए लोगों को उकसाने के आरोप में 11 साल कारावास की सजा सुनाई थी। उन्हें यह पुरस्कार चीन में मानवाधिकारों के लिए उनके लंबे अहिंसक संघर्ष के लिए दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, 'यह सम्मान हमें याद दिलाता है कि किसी देश की राजनीति को दायरे में नहीं बांधा जा सकता है। हम चीन से ली को जल्द से जल्द रिहा करने की अपील करते हैं।'
*** पेइचिंग। चीन में नागरिकों की आजादी और बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू करने के मुखर समर्थक नेता लिउ जियाबाओ को सरकार का तख्तापलट करने के लिए लोगों को भड़काने के आरोप में आज 11 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गयी।
राजधानी पेइचिंग की अदालत ने कल ही उन्होंने इस मामले में दोषी करार दिया था। आज फैसले के दौरान लिउ अपने वकील के साथ अदालत में मौजूद थे। सरकारी संवाद समिति शिनहुआ ने अदालत के आदेश के हवाले से कहा कि अदालत ने इस मामले में कानूनी प्रक्रिया का कड़ाई से पालन किया है और इस दौरान लिउ के कानूनी अधिकारों का पूरी तरह संरक्षण करने पर भी ध्यान दिया गया है। गत सोमवार को 54 वर्ष के हुए लिउ तियानमेन में वर्ष 1989 में लोकतंत्र के समर्थन में हुए विरोध प्रदर्शन के अगुवा रहे थे। वह देश में राजनीतिक सुधारों के लिए चार्टर 8 घोषणापत्र के मुख्य लेखक रहे।

Freedom of Speech in China

PEACEAmong the many people campaigning for human rights in China, Liu Xiaobo, the 2010 Nobel Peace Prize Laureate, has become the most visible symbol of the struggle. A long-term exponent of non-violent protest, he is currently serving an 11-year prison term

Liu Xiaobo and his wife, Liu Xia. Photo taken in Beijing, China, 2008.
Photo: http://liuxiaobo.eu/








From left: Zhou Duo, Liu Xiaobo, Hou Derchien and Gao Xin during a hunger strike at Tian'anmen Square, Beijing, 2 June 1989.
Photo: http://liuxiaobo.eu/

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

ब्रिटिश शासन पद्धति भारत के अनुकूल नहीं..!



- अरविन्द सीसोदिया 
संविधान कहता है, मुझे फिर लिखवाओ।
नेताओं के चोर रास्ते बंद करवाओ,
राष्ट्रधर्म पर परख फिर सिंहासन पर बिठाओ,वास्तविक लोकतंत्र बनाओ।
वंशवाद खा गया देश को,चोर उच्चके हो गये नेता।
बहूमत बैठा भीख मांगता, अल्पमत सिंहासन हथियाता।।
फिरसे विचार करो,कैसे हो रामराज्य का पूरा सपना!
संविधान कहता है, मुझे फिर लिखवाओ।


निर्वाचन पद्धति ; जवावदेह  प्रतिनिधि चुनने  में सक्षम बने 
 राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कु. सी. सुदर्शन जी ने कोटा में २२ अक्टूबर को दिए कश्मीर मुद्दे पर संबोधन में सर्व प्रथम भारतीय जन प्रतिनिधियों की निर्वाचन प्रक्रिया की व्यवस्था पर ही प्रश्न खड़ा करते हुए, उसे देश के लिए अहितकर बताया...! उनकी बात सही थी.., दिमाग पर जोर डालने से लगता है कि सब कुछ गड़बड़ झाला है!
श्री सुदर्शन ही ने कहा 

ब्रिटिश शासन पद्धति 
भारत के अनुकूल नहीं..!

        देश ने स्वाधीनता के पश्चात जिस जनतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया  , वह इग्लैंड में चलने वाली व्यवस्था का प्रतिरूप है  | इग्लैंड भारत से ३० गुणा छोटा देश है, जनसँख्या में भी यही स्थिति है..! तीन - चार प्रान्त हैं.! दो प्रमुख राजनैतिक दल हैं , एक अन्य दल भी जो बहुत कम प्रभाव में है | इग्लैंड में यह शासन पद्धति ३००-४०० वर्षों पुरानी है, कुल मिला कर वह हमारे देश के लिए अनुकूल नही है...! वहां भारत के तुल्य विविधता नहीं है |
         भारत एक विशाल देश है; एक सांस्क्रतिक परिवेश के होते हुए भी, विविधता की दृष्टी से  बहुत अधिक विविधता हैं.., यथा भोगोलिक , भाषाई, जलवायु और जातियां समाज इत्यादी...;
        सबसे अधिक  मत प्राप्त करने वाला जन प्रतिनिधि होगा , चाहे उसे २० प्रतिशत मत ही क्यों न मिलें..! चाहे उसके विरुद्ध ८० प्रतिशत  मत ही कोंन न हों...! यह पद्धती समाज के बड़े व्यापक समूह के प्रति उत्तरदायी नहीं हो पती , क्यों कि इतनी कम मात्रा के वोट किसी एक मुद्दे या  बात के आधार पर प्राप्त किये जा सकते हैं.., जब तक ५० प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त नहीं हों तब तक , समाज का पूर्ण निर्वाचन कैसे माना जा सकता है ? इस कारण उस गुणवत्ता के प्रतिनिधि नहीं पहुच रहे जिसकी  कि  जरूत है...! इस कारण महत्वपूर्ण मुद्दे और समस्याएं यथावत बनीं हुई हैं..! उनमें से एक जम्मू और कश्मीर की भी है !
       इसलिए हमें चुनाव की पद्धती में बदलाव लाना चाहिए, समाज का अधितम समर्थन  वाला प्रतिनिधि चुना जाये इस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए...! वह यह है कि पहले दौर के चुनाव में , प्रथम आने वाले प्रत्याशी को ५० प्रतिशत से अधिक मत नहीं मिले हैं तो , प्रथम और द्वितीय रहे प्रत्याशियों में दूसरे दौर का निर्वाचन एक हफ्ते में ही पुनः करवाना जाये  और जो ५० प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करे उसे चुना घोषित किया जाना चाहिए | इस तरह से समाज का , देश का वास्तविक बहुमत होगा और उससे चुना गया प्रतिनिधि अधिकतम नागरिकों के प्रती जवावदेह होगा ! देश की बड़ी समस्याओं के हल के प्रति भी सजग रहेगा !
अभी दोष क्या...? 
     अभी जैसे की कुल मतदाता हैं १०० और उनमें से ६० ने वोट डाला तो कहा जाता है , ६० प्रतिशत मतदान हुआ ! यानी कि उन ६० मतदाताओं के वोटमें जिसे सबसे ज्यादा मिले वह जीता माना जाएगा, यदी आमने सामने का ही चुनाव है तो ३१ मत वाला जीता और २९ मत वाला हारा ..., मगर सच यह है कि कुल उसे २९ ( दूसरे क्रम पर रहे प्रत्याशी के मत ) और ४० ( ये वे वोट हैं जो डाले नहीं ) ने नहीं चुना ! अर्थात जीते व्यक्ती के समर्थक मतों के विरुद्ध समर्थन नहीं करने वाले मत अधिक रहे ! इस तरह से हुआ निर्वाचन सांसद, विधायक या अन्य का हुआ ! अब इसी पद्धती से लोकसभा या विधान सभा में प्रधानमंत्री या मुख्यामंत्री का हुआ !! अर्थात देश में किसी लोकसभा का मतदान प्रतिशत १००  रहा तो लोकसभा में उससे जीते सांसद ५१ प्रतिशत पर चुने हुए हैं  जो सरकार बनायेंगे | उन्हें भी सरकार गठन हेतु भी मात्र ५१ प्रतिशत ही चाहिए.., इसे आंकड़ों की भाषा में ५१ प्रतिशत का ५१ प्रतिशत कहा जाता है  | इस तरह से जो सरकार प्रतिनिधित्व  करेगी वह मात्र २६ .०१ नागरिकों की होगी | मगर असल में तो मतदान ४० से ६० प्रतिशत के मध्य ही रहता है |  अर्थात बहुत कम नागरिकों के मत से सरकारें बनती है सो गैर जिम्मेवार जन प्रतिनिधि पहुचते हैं |
दो काम होने चाहिए
१- निर्वाचन में नागरिकों पर मतदान अनिवार्य हो.., 
२- ५० प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करने वाला ही चुना जाये  !!    

इंदिरा जैसा दम चाहिए..! प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कायरता त्यागें

*मनमोहन सिंह .., नेहरु की तरह पराजित मानसिकता ग्रस्त
*विशेष कर विदेश नीति और शत्रु संहार के मामलों में इंदिरा जी  से सीखें  
*स्वाभिमान खो देने वाला कभी नहीं जीतता !! 
*मनमोहन सिंह जी रिमोट स्टाईल ठीक नहीं हैं..,   
- अरविन्द सीसोदिया
पहले पाकिस्तान के तमाशे ब्रिटेन - अमरीकी गुट की सह पर और अब चीन की सह पर, एकवार फिर से बड़ी उलझन बन गई है..! देश फिरसे युद्ध और नए विभाजन के सामने खड़ा है...!!
    जो कुछ प्रधानमंत्री नेहरु जी की कायरता के कारण हुआ , वही सब अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की कायरता से हो रहा है..! उस समय ब्रिटेन- अमरीकी गुट के पैरोकार भारत के गवर्नर जनरल लार्ड माउन्टबेटन थे अब यू पी ए की सर्वेसर्वा  सोनिया गांधी ...! वे भी ईसाई थे ये भी ईसाई हैं..!!
    नेहरुजी पाकिस्तान के द्वारा कश्मीर के दवाये हिस्से को उसी  के कब्जे में छोड़  दिया.., तिब्बत पर से भारतीय हक़ चीन  के पक्ष में छोड़ दिए.., फिर चीन से युद्ध हार गए..! जम्मू और कश्मीर में शेख अब्दुल्ला  के राष्ट्र विरोधी कृत्यों  को अवसर दिया...!! यही मनमोहन सिंह की स्थिती है.., पाकिस्तान  के सामने दब्बू की तरह दुम हिला रहे हैं..! चीन  ने पाकिस्तान में स्थित भारतीय क्षैत्र में अड्डे बना लिए, सैन्य ठिकाने बना लिए.., जम्मू कश्मीर में अलग वीजा का तमाशा खड़ा कर दिया..! अरुणाचल में उसकी घुसपैठ जारी है..! जम्मू और कश्मीर में उमर अब्दुल्ला  के राष्ट्र विरोधी कृत्यों  को अवसर दिया जा रहा है, वह भी कांग्रेस के समर्थन  से..?

     कुल मिला कर आज जिस तरह से देश के साथ खलनायिकी नेहरु के इर्द गिर्द घूमतीं है और उन्हें समस्याओं का जनक माना जाता है..; वही बात सरदार मनमोहन सिंह के ईर्द गिर्द  घूम रही है.., मनमोहन सिंह जी को सोनियाजी के बजाये इंदिराजी की तरफ देखना  चाहिए.., विशेष कर विदेश नीति और शत्रु संहार के मामलों में ..!
  पाकिस्तान को बड़ी पराजय १९६५  में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी ने दी थी.., मगर इंदिरा  जी के समय उसने फिर से सिर उठाया, १९७१ में युद्ध हुआ और वह शर्मनाक हार दी कि उसके दो टुकड़े हो गए..! अमरीकी और ब्रिटेन गुट तब भी पाकिस्तान की मदद के लिए उसके  साथ  थे .., हिम्मत ये मर्द ; मदद ये खुदा की कहावत के अनुसार इंदिरा जी सफल हुईं...!
  सवाल यही है कि आप में अपना स्वाभिमान होना चाहिए., स्वाभिमान खो देने वाला कभी नहीं जीतता !! मनमोहन सिंह जी के सारे काम रिमोट स्टाईल के हैं जो ठीक नहीं हैं..,
  इंदिरा जी और सोनिया जी में बहुत फर्क है, इंदिरा जी जमीनी नेता थीं.., उनमें सहास था , उन्होंने कभी पलायन नहीं किया था , उन्होंने कभी हार नहीं मानीं थी, इनमें से बहुत सी बातें इंदिरा जी की सोनिया जी में नहीं है! इसी कारण इंदिरा जी कई मामलों में फेल होने के बाबजूद भारतीय जानता में आदरणीय रहीं ..! हलांकि  उनके समय  जम्मू और कश्मीर मामला सबसे आसान तरीके से हल हो सकता था, पाकिस्तान के ९० हजार से ज्यादा हमारे बंदी थे तब हमें जीते हुए पाकिस्तानी भू भाग तभी लौटना चाहिए था , जब हमारा दवाया कश्मीरी हिस्सा पाकिस्तान वापस कर देता.!
  यह सच है कि उनके समय यह चूक हुई.., मगर उन्होंने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके यह यह स्थिति उत्पन्न करदी कि वह तब से युद्ध करना भूल गया...! इंदिरा जी की बहुत सी बों से असमती होते हुए भी उनकी पाकिस्तान के दो टुकड़े करने की नीति भारत के इतिहास की अविस्मर्णीय  घटना थी.., हालांकी पाकिस्तान का विभाजन क्षेत्रीयता के कारण तो होना ही था.., वह अप्राकृतिक बना ही  था.., मगर उसे सही समय पर करवा कर, भारत के लिए बड़ी मुसीबत कम की है..!
  सरदार मनमोहन सिंह को अपने पुरखों का इतिहास पड़ना चाहिए और वीरता कि शान बनाना चाहिए.., लड़ाकू देश भले ही जीत नहीं पाए मगर उससे सब घबराते हैं..,  थोड़ी हिम्मत की जरुरत ही तो है..., कम से कम देश को देश जैसा तो दिखाओ...!!         
        

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, मास्को जेल में..?














खे लेने दो नाव आज माँ, कल पतवार रहे न रहे ..
जीवन सरिता की नदियों में, फिर ये धार बहे न बहे ..
जीवन पुष्प चढ़ा चरणों पर, मांगे मातृभूमि से यह वर ..
तेरा वैभव सदा रहे माँ, हम दिन चार रहे न रहे ....

 
सही तथ्य सामने आने चाहिए...!
मास्को  जेल में क्या हुआ .....!!
- अरविन्द सीसोदिया 
     राजस्थान के कोटा जिले में आयोजित प्रबुद्ध जन सम्मलेन को संबोधित करते हुए ; राष्ट्रिय स्वयसेवक सघ के पूर्व सरसंघ चालक कु. सी. सुदर्शन जी ने अपने संबोधन में एक रहस्य उजागर किया क़ी , नेताजी सुभाषचन्द्र बोस  का निधन हवाई दुर्घटना में नहीं हुआ था.., बल्कि वे १९४९ तक जीवित थे और उनसे मास्को जेल में विजयलक्ष्मी पंडित और सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भेंट की थी.....!  वे ( विजयलक्ष्मी पंडित ) एक जगह यह रहस्य उजागर भी करने वाली थी.., मगर जवाहरलाल नेहरु ने उन्हें रोक दिया...!! सुदर्शन जी का कहना था की नेताजी ने कूटनीतिक तोर  पर यह खबर फेलाई थी कि उनकी मृत्यु हो गई...! सच यह है कि वे पनडुब्बी और पैदल मार्ग से सोवियत संघ पहुचे थे, वहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.., क्यों कि तब तक सोवियत संघ भी जर्मन हमले के कारण, ब्रिटेन-अमरीकी गुट अर्थात मित्र राष्ट्रों के समूह से मित्रता कर चुका था..!  

   सवाल यह है कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की मृत्यु की संदिग्धता हमेशा ही रही है..!  उन्हें लगातार जीवित बताया जाता रहा है..! अनेकों वार उनकी मृत्यु  की जांच के लिए आयोग गठित हुए...! आयोगों को कभी भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से, ये वे नतीजा ही रही जांचे..!! क्योंकि यह बहुत ही अधिक गंभीर बात है कि नेताजी सुभाष १९४९ में मास्को जेल में थे और कांग्रेस के नेताओं को मालूम भी था और देश के इस महान सपूत को बचानें के लिए कोई प्रयास नहीं हुए...!! उनका  क्या हुआ...; यह देश जानना चाहता है...? 
 राष्ट्रिय स्वयसेवक सघ के पूर्व सरसंघ चालक कु. सी. सुदर्शन जी ने जो बोला है वह तथ्यात्मक है...., उनका बोला हुआ सामान्य नहीं हो सकती.., बात में कोई दम तो है ...!! 


विजय लक्ष्मी पंडित (स्वतंत्रता  सेनानी एवं नेहरूजी की सगी बहन )

लापता होना और मृत्यु की खबर
द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था। उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था। 18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मांचुरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के दौरान वे लापता हो गए। इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिये।
23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को खबर दी, कि 18 अगस्त के दिन, नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उस दुर्घटना में बुरी तरह से घायल होकर नेताजी ने अस्पताल में अंतिम साँस ले ली थी।
दुर्घटनाग्रस्त हवाई जहाज में नेताजी के साथ उनके सहकारी कर्नल हबिबूर रहमान थे। उन्होने नेताजी को बचाने का निश्च्हय किया, लेकिन वे कामयाब नहीं रहे। फिर नेताजी की अस्थियाँ जापान की राजधानी तोकियो में रेनकोजी नामक बौद्ध मंदिर में रखी गयी।
स्वतंत्रता के पश्चात, भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिए, 1956 और 1977 में दो बार एक आयोग को नियुक्त किया। दोनो बार यह नतिजा निकला की नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गये थे। लेकिन जिस ताइवान की भूमि पर यह दुर्घटना होने की खबर थी, उस ताइवान देश की सरकार से तो, इन दोनो आयोगो ने बात ही नहीं की।
1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया। 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बता दिया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था। 2005 में मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की, जिस में उन्होने कहा, कि नेताजी की मृत्यु उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं हैं। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। 18 अगस्त, 1945 के दिन नेताजी कहाँ लापता हो गए और उनका आगे क्या हुआ, यह भारत के इतिहास का सबसे बडा अनुत्तरित रहस्य बन गया हैं।
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लापता होना और मृत्यु की खबर

द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद, नेताजी को नया रास्ता ढूँढना जरूरी था। उन्होने रूस से सहायता माँगने का निश्चय किया था। 18 अगस्त 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे। इस सफर के दौरान वे लापता हो गये। इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखायी नहीं दिये।

23 अगस्त 1945 को टोकियो रेडियो ने बताया कि सैगोन में नेताजी एक बड़े बमवर्षक विमान से आ रहे थे कि 18 अगस्त को ताइहोकू (Taihoku Teikoku Daigaku) हवाई अड्डे के पास उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में उनके साथ सवार जापानी जनरल शोदेई, पाइलेट तथा कुछ अन्य लोग मारे गये। नेताजी गम्भीर रूप से जल गये थे। उन्हें ताइहोकू सैनिक अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्होंने दम तोड़ दिया। कर्नल हबीबुर्रहमान के अनुसार उनका अन्तिम संस्कार ताइहोकू में ही कर दिया गया। सितम्बर के मध्य में उनकी अस्थियाँ संचित करके जापान की राजधानी टोकियो के रैंकोजी मन्दिर में रख दी गयीं। भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार से प्राप्त दस्तावेज़ के अनुसार नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू के सैनिक अस्पताल में रात्रि 21.00 बजे हुई थी।

स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सरकार ने इस घटना की जाँच करने के लिये 1956 और 1977 में दो बार आयोग नियुक्त किया। दोनों बार यह नतीजा निकला कि नेताजी उस विमान दुर्घटना में ही मारे गये। लेकिन जिस ताइवान की भूमि पर यह दुर्घटना होने की खबर थी उस ताइवान देश की सरकार से इन दोनों आयोगों ने कोई बात ही नहीं की।

1999 में मनोज कुमार मुखर्जी के नेतृत्व में तीसरा आयोग बनाया गया। 2005 में ताइवान सरकार ने मुखर्जी आयोग को बता दिया कि 1945 में ताइवान की भूमि पर कोई हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ ही नहीं था। 2005 में मुखर्जी आयोग ने भारत सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें उन्होंने कहा कि नेताजी की मृत्यु उस विमान दुर्घटना में होने का कोई सबूत नहीं हैं। लेकिन भारत सरकार ने मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया।


18 अगस्त 1945 के दिन नेताजी कहाँ लापता हो गये और उनका आगे क्या हुआ यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा अनुत्तरित रहस्य बन गया हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी नेताजी को देखने और मिलने का दावा करने वाले लोगों की कमी नहीं है। फैजाबाद के गुमनामी बाबा से लेकर छत्तीसगढ़ राज्य में जिला रायगढ़ तक में नेताजी के होने को लेकर कई दावे पेश किये गये लेकिन इन सभी की प्रामाणिकता संदिग्ध है। छत्तीसगढ़ में तो सुभाष चन्द्र बोस के होने का मामला राज्य सरकार तक गया। परन्तु राज्य सरकार ने इसे हस्तक्षेप के योग्य न मानते हुए मामले की फाइल ही बन्द कर दी। 
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भारत की स्वतन्त्रता पर नेताजी का प्रभाव

कटक में सुभाष चन्द्र बोस का जन्मस्थान अब संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है।
हिरोशिमा और नागासाकी के विध्वंस के बाद सारे संदर्भ ही बदल गये। आत्मसमर्पण के उपरान्त जापान चार-पाँच वर्षों तक अमेरिका के पाँवों तले कराहता रहा। यही कारण था कि नेताजी और आजाद हिन्द सेना का रोमहर्षक इतिहास टोकियो के अभिलेखागार में वर्षों तक पड़ा धूल खाता रहा।

नवम्बर 1945 में दिल्ली के लाल किले में आजाद हिन्द फौज पर चलाये गये मुकदमे ने नेताजी के यश में वर्णनातीत वृद्धि की और वे लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुँचे। अंग्रेजों के द्वारा किए गये विधिवत दुष्प्रचार तथा तत्कालीन प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा सुभाष के विरोध के बावजूद सारे देश को झकझोर देनेवाले उस मुकदमे के बाद माताएँ अपने बेटों को ‘सुभाष’ का नाम देने में गर्व का अनुभव करने लगीं। घर–घर में राणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज के जोड़ पर नेताजी का चित्र भी दिखाई देने लगा।

आजाद हिन्द फौज के माध्यम से भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद करने का नेताजी का प्रयास प्रत्यक्ष रूप में सफल नहीं हो सका किन्तु उसका दूरगामी परिणाम हुआ। सन् १९४६ के नौसेना विद्रोह इसका उदाहरण है। नौसेना विद्रोह के बाद ही ब्रिटेन को विश्वास हो गया कि अब भारतीय सेना के बल पर भारत में शासन नहीं किया जा सकता और भारत को स्वतन्त्र करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा।

आजाद हिन्द फौज को छोड़कर विश्व-इतिहास में ऐसा कोई भी दृष्टांत नहीं मिलता जहाँ तीस-पैंतीस हजार युद्धबन्दियों ने संगठित होकर अपने देश की आजादी के लिए ऐसा प्रबल संघर्ष छेड़ा हो।


जहाँ स्वतन्त्रता से पूर्व विदेशी शासक नेताजी की सामर्थ्य से घबराते रहे, तो स्वतन्त्रता के उपरान्त देशी सत्ताधीश जनमानस पर उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व के अमिट प्रभाव से घबराते रहे। स्वातन्त्र्यवीर सावरकर ने स्वतन्त्रता के उपरान्त देश के क्रांतिकारियों के एक सम्मेलन का आयोजन किया था और उसमें अध्यक्ष के आसन पर नेताजी के तैलचित्र को आसीन किया था। यह एक क्रान्तिवीर द्वारा दूसरे क्रान्ति वीर को दी गयी अभूतपूर्व सलामी थी।
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http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/173912/1/19

नेताजी की रहस्यमय मौत पर एक और सनसनीखेज खुलासा

29, Jan, 2013, Tuesday
कोलकाता !   नेताजी सुभाषचंद्र बोस की रहस्यम मृत्यु पर एक और सनसनीखेज खुलासा करते हुए रूस मे रामकृष्ण मिशन के प्रमुख मंहत ने कहा है कि नेताजी की मौत विमान दुर्घटना में नही बल्कि  रूस की एक जेल मे हुयी थी।
     रूस मे पिछले दो दशक  से रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष रहे ज्योतिरानंद ने अपनी हाल की असम यात्रा के दौरान एक टेलीविजन साक्षात्कार मे यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारत सरकार का यह दावा गलत है कि  नेताजी 18 अगस्त 1945 को ताईवान में ताईहोकू हवाई अड्डे पर विमान दुर्घटना मे मारे गए थे।
     उन्होने कहा कि सच्चाई यह है कि उन्हे रूसियों ने पकड लिया था और ओमस्क की जेल मे कैद कर दिया था जहां काफी समय बाद उन्होंने अंतिम सांस ली थी। ओमस्क रूस के हिम आच्छादित साइबेरिया क्षेत्र का एक छोटा शहर है। उन्होंने कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि नेताजी ने इसी जेल मे अपनी अंतिम सांस ली होगी।
     मास्को मे रामकृष्ण मिशन की सचिव सुश्री लिलियाना मालकोवा ने श्री ज्योतिरानंद के इस सनसनीखेज खुलासे को सही बताया है। मंहत ने कुछ दस्तावेजों और रूस में भारत की तत्कालीन राजदूत विजय लक्ष्मी पंडित के बयान का हवाला देते हुए बताया कि जब सुश्री पंडित को नेताजी के ओमस्क जेल मे होने की खबर लगी तो वह उनसे मिलने वहां गयी थीं लेकिन रूसी अधिकारियो नें उन्हें नेताजी से नहीं मिलने दिया।
श्री ज्योतिरानंद ने कहा कि सुश्री पंडित जब जेल से बाहर निकल ही रहीं थीं कि उन्होंने हूबहू नेताजी से मिलते जुलते शक्ल वाले एक कैदी को वहां देखा। वह कैदी काफी थकाहारा दिखाई पड रहा था। ऐसा लगता था कि उसे जेल में काफंी यातना दी गयी है जिससे उसका मानसिक संतुलन बिगड गया है।
     मंहत ज्योतिरानंद के मुताबिक  सुश्री पंडित यह सब देख कर बहुत व्यथित हुयी थीं और फैांरन नयी दिल्ली पहुंच कर उन्होंने इस बात की जानकारी कांग्रेस के तत्कालीन बडे नेताओं को दी थी। लेकिन इस पर कोई कार्रवायी नहीं की गयी।
    इस बीच नेताजी पर शोध कर रहे एक शोधर्कता अनुज धर ने आज कोलकाता में विदेश मंत्रालय के 12 जनवरी 1996 के एक ऐसे गोपनीय दस्तावेज का हवाला दिया जिसमे मंत्रालय की ओर से रूस की मीडिया में लगातार आ रही उन खबरो पर गहरी चिंता जतायी गयी थी जिनमे कहा गया था कि नेताजी की मौत 1945 के बाद रूस की एक जेल मे हुयी थी। इस दस्तावेज पर मंत्रालय के तत्कालीन संयुक्त सचिव आर एल नारायणन के हस्ताक्षर है और साथ ही उसमें एक पूर्व विदेश सचिव की टिप्पणी भी संलग्न है।
 


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मेरे दो और लेख जिनकी लिंक इस तरह से है ....

सोमवार, १७ जनवरी २०११

सुभाष जिनकी मृत्यु भी रहस्यमय है ..

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शनिवार, २२ जनवरी २०११

सुभाष जी का सच, सामने आना चाहिए ....!!

http://arvindsisodiakota.blogspot.com/2011/01/blog-post_22.html

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यह  लेख  भी पढ़ना चाहिए ...नेताजी की मृत्यु भारत में ही हुई बताया गया है .... 
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आडवानी जी ने भी कहा था....
हम अभी भी निर्णायक रूप से यह नहीं जानते और इसमें भी अभी यह संशय बना हुआ है कि नेताजी की मृत्यु कहां हुई और कैसे हुई? आधिकारिक तौर पर-और यहां मैं अंग्रेजी सरकार के उस आधिकारिक बयान का उल्लेख कर रहा हूं - उनकी मृत्यु ताइवान के ऊपर एक हवाई जहाज दुर्घटना में हुई थी जब वे 18 अगस्त 1945 को टोक्यो जा रहे थे। इसका यह अर्थ है कि जब उनकी मृत्यु हुई तो वे मात्र 48 वर्ष के थे। तथापि, उनका पार्थिव शरीर कभी भी नहीं मिला।
  इस मामले की जांच करने के लिए भारत सरकार द्वारा कई समितियों का गठन किया गया था। वास्तव में, जब मैं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन सरकार (1998-2004) में केन्द्रीय गृहमंत्री था तो हमने वर्ष 1999 में न्यायमूर्ति मुखर्जी की अध्यक्षता में एक जांच आयोग बैठाया था। इसकी रिपोर्ट मई 2006 में संसद में प्रस्तुत की गई थी जिसमें यह कहा गया कि नेताजी की मृत्यु वायुयान दुर्घटना में नहीं हुई थी और टोक्यो में रेंकोजी मंदिर में रखी गई राख और अस्थियां उनकी नहीं हैं। तथापि यूपीए सरकार ने आयोग के निष्कर्षों को अस्वीकार कर दिया।


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नेहरूजी को माउण्टबेटन की चेतावनी
माउण्टबेटन के बुलावे पर नेहरूजी जब 1946 में (भावी प्रधानमंत्री के रूप में) सिंगापुर जाते हैं, तब गुजराती दैनिक ‘जन्मभूमि’ के सम्पादक श्री अमृतलाल सेठ भी उनके साथ होते हैं।
लौटकर श्री सेठ नेताजी के भाई शरत चन्द्र बोस को बताते हैं कि एडमिरल लुई माउण्टबेटन ने नेहरूजी को कुछ इन शब्दों में चेतावनी दी है-
‘हमें खबर मिली है कि बोस विमान दुर्घटना में नहीं मरे हैं, और अगर आप जोर-शोर से उनका यशोगान करते हैं और आजाद हिन्द सैनिकों को भारतीय सेना में फिर से शामिल करने की माँग करते हैं, तो आप नेताजी के प्रकट होने पर भारत को उनके हाथों में सौंपने का खतरा मोल ले रहे हैं।’
इस चेतावनी के बाद नेहरूजी सिंगापुर के ‘शहीद स्मारक’ (नेताजी द्वारा स्थापित) पर माल्यार्पण का अपना पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम रद्द कर देते हैं। बाद में वे कभी नेताजी की तारीफ नहीं करते; प्रधानमंत्री बनने पर आजाद हिन्द सैनिकों को भारतीय सेना में शामिल नहीं करते, नेताजी को ‘स्वतंत्रता-सेनानी’ का दर्जा नहीं दिलवाते, और... जैसाकि हम और आप जानते ही हैं... हमारी पाठ्य-पुस्तकों में स्वतंत्रता-संग्राम का इतिहास लिखते वक्त इसमें नेताजी और उनकी आजाद हिन्द सेना के योगदान का जिक्र न के बराबर किया जाता है।
(उल्लेखनीय है कि 15 से 18 जुलाई 1947 को कानपुर में आई.एन.ए. के सम्मेलन में नेहरूजी से इस आशय का अनुरोध किया गया था कि आजादी के बाद आई.एन.ए. (आजाद हिन्द) सैनिकों को नियमित भारतीय सेना में वापस ले लिया जाय, मगर नेहरूजी इसे नहीं निभाते; जबकि मो. अली जिन्ना पाकिस्तान गये आजाद हिन्द सैनिकों को नियमित सेना में जगह देकर इस अनुरोध का सम्मान रखते हैं।)
By: राम प्रसाद बिस्मिल
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नेहरू सरकार ने 20 साल तक करवाई थी 

नेताजी के परिवार की जासूसी?


नवभारतटाइम्स.कॉम| Apr 10, 2015,

http://navbharattimes.indiatimes.com/india/nehru-got-netaji-executed-swamy/articleshow/45999281.cms
नई दिल्ली
इंटेलिजेंस ब्यूरो की दो फाइल्स से साफ हुआ है कि जवाहरलाल नेहरू सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिजनों की 20 साल तक जासूसी करवाई थी । इंग्लिश न्यूज पेपर मेल टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक ये फाइल्स नैशनल आर्काइव्स में हैं। इनसे पता चलता है कि 1948 से लेकर 1968 तक लगातार बोस के परिवार पर नजर रखी गई थी। इन 20 सालों में से 16 सालों तक नेहरू प्रधानमंत्री थे और आईबी सीधे उन्हें ही रिपोर्ट करती थी।

ब्रिटिश दौर से चली आ रही जासूसी को इंटेलिजेंस ब्यूरो ने बोस परिवार के दो घरों पर नजर रखते हुए जारी रखा था। कोलकाता के 1 वुडबर्न पार्क और 38/2 एल्गिन रोड पर निगरानी रखी गई थी। आईबी के एजेंट्स बोस परिवार के सदस्यों के लिखे या उनके लिए आए लेटर्स को कॉपी तक किया करते थे। यहां तक कि उनकी विदेश यात्राओं के दौरान भी साये की तरह पीछा किया जाता था।

एजेंसी यह पता लगाने की इच्छुक रहती थी कि बोस के परिजन किससे मिलते हैं और क्या चर्चा करते हैं। यह सब किस वजह से किया जाता, यह तो साफ नहीं है, मगर आईबी नेताजी के भतीजों शिशिर कुमार बोस और अमिय नाथ बोस पर ज्यादा फोकस रख रही थी। वे शरत चंद्र बोस के बेटे थे, जो कि नेताजी के करीबी रहे थे। उन्होंने ऑस्ट्रिया में रह रहीं नेताजी की पत्नी एमिली को भी कई लेटर लिखे थे।

अखबार से बातचीत में नेता जी के पड़पौत्र चंद्र कुमार बोस ने कहा, 'जासूसी तो उनकी की जाती, जिन्होंने कोई क्राइम किया हो। सुभाष बाबू और उनके परिजनों ने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी है। कोई उनपर किसलिए नजर रखेगा?' पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज अशोक कुमार गांगुली ने मेल टुडे से बात करते हुए कहा, 'हैरानी की बात यह है कि जिस शख्स ने देश के लिए सब कुछ अर्पित कर दिया, आजाद भारत की सरकार उसके परिजनों की जासूसी कर रही थी।'

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एम.जे. अकबर ने अखबार से बातचीत में कहा कि इस जासूसी की एक ही वजह हो सकती है। उन्होंने कहा, 'सरकार को पक्के तौर पर नहीं पता था कि बोस जिंदा हैं या नहीं। उसे लगता था कि वह जिंदा हैं और अपने परिजनों के संपर्क में है। मगर कांग्रेस परेशान क्यों थी? नेताजी लौटते तो देश उनका स्वागत ही तो करता। यही तो वजह थी डर की। बोस करिश्माई नेता थे और 1957 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी होती। यह कहा जा सकता है कि अगर बोस जिंदा होते, तो जो काम 1977 में हुआ, वह 15 साल पहले ही हो जाता।'

आईबी की फाइल्स को बहुत कम ही गोपनीय दस्तावेजों की श्रेणी से हटाया जाता है। ऑरिजनल फाइल्स अभी भी पश्चिम बंगाल सरकार के पास हैं। अखबार का कहना है कि 'इंडियाज़ बिगेस्ट कवर-अप' के लेखक अनुज धर ने इस साल जनवरी में इन फाइल्स को नैशनल आर्काइव्ज़ में पाया था। उनका मानना है कि इन फाइल्स को गलती से गोपनीय की श्रेणी से हटा दिया गया होगा।


नेताजी की हत्या में नेहरू का हाथ था: स्वामी



एजेंसियां| Jan 24, 2015
http://navbharattimes.indiatimes.com
मेरठ अपने दावों और खुलासों के लिए चर्चित बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी का कहना है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या रूस में स्टालिन ने कराई थी और इसमें जवाहर लाल नेहरू का हाथ था । उन्होंने वादा किया कि अगली बार नेताजी की जयंती पर वह मेरठ आएंगे तो अपने साथ इससे जुड़े दस्तावेज और फाइलें लेकर आएंगे। स्वामी ने यह भी कहा है कि सुनंदा पुष्कर की हत्या की गई है और इस मामले में कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी से भी पूछताछ होनी चाहिए। 

सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर एक कार्यक्रम में भाग लेने शुक्रवार को मेरठ आए स्वामी ने कहा, 'द्वितीय विश्व युद्ध के बाद नेताजी को वॉर क्रिमिनल घोषित कर दिया गया तो उन्होंने एक फर्जी सूचना फ्लैश कराई गई कि प्लेन क्रैश में नेताजी की मौत हो गई। बाद में वह शरण लेने के लिए रूस पहुंचे, लेकिन वहां तानाशाह स्टालिन ने उन्हें कैद कर लिया। स्टालिन ने नेहरू को बताया कि नेताजी उनकी कैद में हैं क्या करें? इस पर उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को इसकी सूचना भेज दी और कहा कि आपका वॉर क्रिमिनल रूस में है। साथ ही उन्होंने स्टालिन को इस पर सहमति दे दी कि नेताजी की हत्या कर दी जाए।' 

बीजेपी नेता ने कहा, 'उस वर्ष 1945 में ताइवान में कहीं भी कोई हवाई दुर्घटना न तो दर्ज है और न ही बोस का नाम मृतकों की सूची में शामिल है। जवाहरलाल नेहरू के तत्कालीन स्टनॉग्रफर श्यामलाल जैन मेरठ के ही थे। उन्होंने खोसला कमिशन के सामने अपने बयान में बताया था कि रूस के प्रधानमंत्री स्टालिन ने संदेश भेजा था कि 'सुभाष चंद्र बोस हमारे पास हैं, उनके साथ क्या करना है?' उन्होंने बताया था कि इस पत्र का जवाब प्रधानमंत्री नेहरू ने 26 अगस्त 1945 को आसिफ अली के घर बुलाकर उनसे ही लिखवाया था। हालांकि कमिशन ने इस पर विश्वास न कर उनसे सबूत मांगा था।' 

स्वामी ने कहा कि इसी अहसान में नेहरू हमेशा रूस से दबे रहे और कभी कोई विरोध नहीं किया। उनहोंने कहा कि नेताजी की मौत के रहस्य से पर्दा उठेगा और सच सामने आएगा कि देश के गद्दार कौन थे। बीजेपी नेता ने कहा कि इस बारे में उनकी केंद्र सरकार से बात हो रही है। वादा किया कि अगले साल जब वह नेताजी के जयंती समारोह में शामिल होने मेरठ आएंगे तो सारे दस्तावेज और संबंधित फाइलें उनके पास होंगी। 

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CIA को था यकीन, 1964 में लौट आएंगे बोस
Feb 7, 2014

http://navbharattimes.indiatimes.com
कोलकाता अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने 1945 में विमान दुर्घटना में सुभाष चंद्र बोस की मौत पर संदेह जताया था और उसे सूचना थी कि नेताजी 1964 में निर्वासन से लौट आएंगे। यह खुलासा गोपनीय दस्तावेजों से हुआ है। 

सीआईए की तरफ से जारी दस्तावेजों में कहा गया है कि दस्तावेजों की खोज से संकेत मिलते हैं कि नेताजी की मौत के बारे में कोई सूचना नहीं है, जो रिपोर्टों की विश्वसनीयता पर प्रकाश डालते हों। सीआईए की तरफ से फरवरी 1964 में जारी दस्तावेज के मुताबिक, इस तरह के विचार थे कि बोस वर्तमान नेहरू सरकार को कमजोर करने के लिए बागी समूह का नेतृत्व कर रहे थे। 

सीआईए के चार दस्तावेज शोधकर्ता अभिषेक बोस और अनुज धर के अलावा नेताजी के पड़पोते चन्द्र बोस को दिए गए थे, जिन्होंने सूचना की स्वतंत्रता के अधिकार के तहत विस्तृत जानकारी मांगी थी। जनवरी 1949 की रिपोर्ट के मुताबिक एजेंसी ने इन अफवाहों पर गौर किया कि बोस अब भी जिंदा हैं। 

नवम्बर 1950 में भारतीय राजनीतिक परिदृश्य की विस्तृत व्याख्या में एक उच्चपदस्थ सूत्र ने सीआईए को सूचना दी थी कि नई दिल्ली में कहा जा रहा है कि बोस साइबेरिया में हैं, जहां वह वापसी की बड़ी संभावना का इंतजार कर रहे हैं। 

जारी दस्तावेजों में सबसे पुराना मई 1946 का है जिसमें नेताजी की मौत की पुष्टि के बारे में वाशिंगटन डीसी में विदेश मंत्री से जानकारी मांगी गई थी।


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नेताजी के बारे में सच बताएं

Friday, 03 April, 2015

मेजर जनरल (डॉ) जी डी बक्शी एसएम, वीएसएम (सेवानिवृत्त)
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम ने देश को ऎसे अनेक महान नेता दिए जिनके पास व्यापक दृष्टि थी। आज अगर पीछे मुडकर देखें तो उनमें सबसे बड़ा कद नेताजी सुभाषचंद्र बोस का नजर आता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महात्मा गांधी ने ही भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को जन आंदोलनकारी चरित्र दिया था और भारत की व्यापक किसान आबादी को स्वतंत्रता संग्राम से जोडने में सफलता प्राप्त की थी। वे गांधी ही थे जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को भारतीय बनाया और उसे भारत के मुख्य शहरों में वकील समाज की अशक्त बहसबाजी के स्तर से उपर उठाया।

पहले ये वकील ब्रिटिश सरकार के सामने केवल याचिकाएं ही दिया करता था। लेकिन 1919 के जालियांवाला हत्याकांड के बाद तो स्थितियो का कोई स्पष्टीकरण ही नहीं बचा। तब गांधी जी ने अंग्रेजों के साथ असहयोग का लक्ष्य सामने रखकर पूर्ण स्वराज्य और जन आंदोलन की जरूरत को रेखांकित किया। 

गांधी और बोस में स्वतंत्रता संग्राम की मूल रणनीतिक दिशा तथा उसे प्राप्त करने के साधन और पद्धितियों पर भारी मतभिन्नता थी। यह बहस उस समय की सबसे निर्णायक बहसों में थी जिसने हमारी उस राजनीतिक व्यवस्था के स्वरूप को भी प्रभावित किया जो कि स्वतंत्रता के बाद उभरी। आगामी दिनों में भारतीय राज्य के नरम बनाम कठोर रूझान के मूल में यही बहस है। इस बहस को आज फिर से खोलने की जरूरत है।

निष्ठा पर सवाल
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए शांतिपूर्ण व अहिंसक मार्ग को अपनाया था जिसके केंद्र में मूल विचार अहिंसा थी। जबकि बोस का मानना था कि सिर्फ व्यापक हिंसा ही अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए मजबूर कर सकती है। भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के जारी रहने के पीछे सबसे बड़ा कारण था भारतीय सैनिकों की ब्रिटिश राज के प्रति वफादारी। एक बार यह समाप्त हो जाए तो फिर ब्रिटिश राज भारत में एक दिन भी कायम नही रह सकता था। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बोस वैश्विक शक्तियों की सहायता लेना चाहते थे जिससे औपनिवेशिक साम्राज्य पर सैनिक दबाव बनाया जा सके और ब्रिटिश राज को उखाड फेंका जा सके।

आज उपलब्ध ऎतिहासिक अंत:दृष्टि ने यह साबित कर दिया है कि यह बोस की वृहत रणनीतिक सोच व बोस और उनकी आईएनए का ही साया था जिसने रॉयल भारतीय सेना तथा भारतीय सेना की इकाइयों में बगावत को प्रेरित किया था, जिससे अंग्रेज देश छोड़ने को विवश हुए। आज उस ऎतिहासिक बहस को पुन: समझना मार्गदर्शक हो सकता है, क्योंकि जिस व्यक्ति के प्रयास वास्तविक रूप से भारत को स्वतंत्रता दिलाने के केंद्र में रहे, उस व्यक्ति की समझ और निष्ठा पर सवाल उठाए जा रहे हैं। 

सावधानीपूर्वक निर्मित की गई लोकप्रिय समझ के विपरीत हकीकत यह है कि अहिंसा स्वतंत्रता दिलाने में असफल हो चुकी थी। इसको काफी कुछ बांध कर रखा गया था और दूसरे विश्व युद्ध के बाद तो यह समाप्त सा हो चुका था। कांग्रेस ने 1942 में भारत छोडो आंदोलन छेड़ा था। अंग्रेजों ने इसका जवाब पूरे कांग्रेस नेतृत्व को जेल में डालकर दिया था। युद्ध के समय लागू डेकोनियन सेसरशिप ने आंदोलन को प्रेस कवरेज की ऑक्सीजन से वंचित कर दिया था और आंदोलन को जरूरी सफलता नहीं मिली थी। 1944-45 तक तो यह पूरी तरह खत्म हो चुका था।

अहिंसा की भूमिका "न्यूनतम" 
फिर वह क्या था जिस कारण अंग्रेज दो साल बाद ही देश को जल्दबाजी में छोड़कर चले गए। जस्टिस पीवी चक्रवर्ती जो प. बंगाल के प्रथम राज्यपाल थे, ने यह सवाल पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेट एटली के सामने (1956) रखा था। एटली जो भारतीय स्वतंत्रता के विषय में सर्वाधिक विवादास्पद निर्णयकर्ता समझे जाते हैं व अपने जवाब में अत्यंत स्पष्टवादी थे, उन्होंने कहा यह सुभाष चंद्र बोस और उनकी आजाद हिंद सेना थी। राज्यपाल ने यह भी पूछा कि इस निर्णय को प्रभावित करने में महात्मा गंाधी के अहिंसक संघर्ष की क्या भूमिका थी। यह सुनते ही एटली के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कराहट आई और उन्होंने चबा-चबा कर एक ही शब्द कहा "न्यूनतम"।


बोस पहले अफगानिस्तान और फिर वहां से इटली निकल गए थे। वहां से वे जर्मनी चले गए जहां उन्होंने युद्ध कैदियों को मिलाकर सैन्य दल की स्थापना की। उन्होंने हिटलर को भारत पर आक्रमण करने के लिए मनाने की कोशिश की। जब यह कारगर नहीं हुआ तो निडर बोस एक जर्मन पनडुब्बी यू-180 में बैठकर अटलंाटिक पार कर कैप ऑफ गुड होप होते हुए मेडागास्कर पहंुचे। वहां से वे एक जापानी पनडुब्बी आई- 28 में बैठकर जापान पहुंचे। उन्होंने सिंगापुर में एक स्वतंत्र भारत सरकार की घोषणा की तथा ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

उन्होंने 60,000 सैनिकों के साथ तीन बलों की इकाइयों में बंटी एक भारतीय आजाद हिंद सेना खडी की तथा जापान को कोहिमा तथा इंफाल होते हुए भारत पर आक्रमण करने के लिए मना लिया। आईएनए की लगभग दो टुकडियों ने इस आक्रमण में भाग लिया। लगभग 26,000 आईएनए जवानों ने इस आक्रमण में अपनी जान गंवा दी। आईएनए ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिलाकर रख दिया।

ब्रिटिश सरकार भारतीय सेना में किसी व्यापक विद्रोह की आशंका से भयभीत हो गई। दुर्भाग्य से आईएनए काफी देर से पहुंची थी। अब तक युद्ध पलटी खा चुका था। हिरोशिमा और नागासकी पर परमाणु बम विस्फोट के बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया। हताश हुए बिना बोस रूस से संपर्क साधने के लिए एक जापानी बम वाहक विमान में मंचूरिया चले गए और उनकी सहायता से भारत का स्वतंत्रता संग्राम जारी रखा। एक विमान के नष्ट होने की खबरें आईं पर बोस की दंतकथाएं अब तक सुनी जाती हैं।

अंग्रेजों ने डर से छोड़ा देश
बौखलाए अंग्रेजों ने अपनी जीत का भौंडा प्रदर्शन करने के लिए आईएनए के तीन अफसरों पर जिनमें एक हिंदू, एक सिख और एक मुस्लिम था, लाल किले में अभियोग चलाया। इसने राष्ट्रवादी भावनाओं की सुनामी पैदा कर दी। रॉयल इंडियन नेवी तथा ब्रिटिश भारतीय सेना की कुछ इकाइयों में बगावत हो गई। नेवी में बगावत विशेष रूप से चिंताजनक थी। इसमें 72 जहाजों के 20 हजार सैनिकों ने भाग लिया था। युद्ध के बाद लगभग 25 लाख ऎसे भारतीय सैनिकों को, जो कि लड़ाई से मजबूत हो चुके थे, को फौज की सेवा से हटा दिया गया था। वे गुस्से में थे। इंटेलीजेंस की रिपोर्ट बहुत चिंताजनक थीं। इससे हिल चुके अंग्रेजों ने दीवार पर लिखी इबारत पढ़ने में देर नहीं लगाई और सम्मान के साथ देश छोड़ने में ही भलाई समझी। 

सैन्य शक्ति को नहीं दिया महत्व
नेहरू ने जानबूझकर इस झूठे कथानक को गढ़ा कि भारत ने मात्र अहिंसा की सौम्य ताकत के बल पर ही आजादी हासिल कर ली थी। इसके परिणामस्वरूप भारत ने सैनिक शक्ति को संसाधनों से वंचित रखा तथा उसे जरूरी महत्व नहीं दिया। इसी कारण चीन ने भारत के सौम्य शक्ति के गुब्बारे को 1962 में फोड़ दिया और भारत को एक अत्यंत अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा। इस हार ने भारतीय विदेश और सुरक्षा नीति में यथार्थवाद का एक दौर का आरंभ किया जिसका चरमोत्कर्ष बांग्लादेश युद्ध में हमारी शानदार जीत में हुआ।

1857 के विद्रोह के बाद, अंग्रेजों ने भारत के विचार को नकारने की कोशिश की थी। 1872 से ही उन्होंने भारत में जाति आधारित जनगणना शुरू कर दी थी। इसके बाद उन्होंने मुस्लिम, ईसाई, सिख तथा दलित के लिए पृथक निर्वाचक-समूह बनाए। इस सबका उद्देश्य एक ही था कि भारत के विचार को इस कदर तोड़ देना, बिखेर देना कि उसमें कोई सुधार ही संभव न हो। आज उपराष्ट्रीय, नृजातीय, सांस्कृतिक तथा पंथ आधारित पहचानों के कई समर्थक भारत की समग्र पहचान को नष्ट करने के उत्सव में व्यस्त हैं। हमें इस समय बोस, उनकी आजाद हिंद सेना तथा अखिल भारतीय पहचान को रेखांकित करने वाले राष्ट्रीय अभियान को याद करना चाहिए। 

जो भी खबरें छन-छन कर आ रही हैं वो यही कहती हैं कि बोस उस मंचूरिया से भाग निकलने में सफल हो गए थे, जहां उन्होंने भारत की आजादी के लिए रूसी सेनाओं से सोवियत संघ की सहायता मांगने के लिए संपर्क साधा था। स्टालिन तो यही मानते थे कि नेताजी जापानी सेना में शामिल हो गए थे और उसने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया। 

वहां से नेताजी साइबेरिया की याकुत्सक जेल-कोठरी क्रमांक 45 में भेज दिए गऎ, जहां उन्हें प्रताडनाएं दी गई थीं। ब्रिटिश इंटेलीजेंस को बोस के बारे में पता चल गया था उन्होंने रूस को बोस को खत्म करने के लिए राजी कर लिया था, क्योंकि अगर वे भारत आ जाते तो फिर नेहरू का शासन चलाना संभव नहीं रह जाता। इसलिए स्टालिन ने वैसा ही किया और नेताजी को एक प्लास्टिक बैग की सहायता से गला घोंट कर मार दिया गया।

नए सिरे से समझना होगा इतिहास
स्तब्ध करने वाला सवाल जो अभी भी अुनत्तरित रहता है, वह यह कि क्या नेहरू और भारत सरकार को इस सबकी जानकारी थी, और क्या बोस के साथ जो हुआ उसमें सरकार का गुपचुप सहयोग था? भारत की वर्तमान सरकार के सामने, नेहरू सरकार के समय हुई गलतियों को छिपाने की क्या मजबूरी है? अब न तो स्टालिन हैं और न ही पुराना सोवियत संघ। इसलिए बोस संबंधी विवाद के कारण रूस से भारत के संबंध खराब होगे ऎसा मानने का कोई कारण नहीं है। फिर सरकार क्यों अब भी बोस संबंधी फाइलों को "डिक्लासीफाई" कर सार्वजनिक करने से कतरा रही है। 


इस सच का हम सबके भविष्य से गहरा संबंध है। स्वतंत्रता के बाद देश में जो "वकील राज" शुरू हुआ उसने गांधी को हाशिए पर ढकेल दिया और बोस की यादों को भी दफना दिया। पाकिस्तान के विपरीत भारत में आजाद हिंद सेना के जवानों को भारत में शामिल नहीं किया गया और 1970 के उत्तरार्घ तक उन्हें कोई युद्ध संबंधी पेंशन भी नहीं दी गई। अर्थात नेहरू के शासनतंत्र में आजाद हिंद सेनानियों से गद्दार की तरह व्यवहार किया गया। यह विचार हमें हमारे मूल प्रश्न की तरफ ले जाता है। 
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Netaji Subhash Chandra Bose : 

क्या हवाई दुर्घटना से बच गए थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस?

23 Jan, 2013 
http://days.jagranjunction.com/2013/01/23/netaji-subhash-chandra-bose-death-mystery-in-hindi/
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए सबसे अहम योगदान इतिहासकार क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों का मानते हैं. यह सत्य है कि भारत को आजादी गांधी जी के शांति आंदोलनों की वजह से मिली लेकिन सभी बड़े इतिहासकार इस तथ्य को भी नहीं नकारते कि बिना क्रांतिकारियों के यह संभव थी. क्रांतिकारियों के उस फौज में एक ऐसे शख्स भी थे जिन्हें लोग नेताजी कहते थे और वह थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस.

नेताजी सुभाष चन्द्र: एक असली शेर
कई इतिहासकार और तथ्य यह साबित करते हैं कि सुभाष चन्द्र असल मायनों में हीरो थे. उनकी गतिविधियों ने ना सिर्फ अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए बल्कि उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपनी एक अलग फौज भी ख़डी की थी जिसे नाम दिया आजाद हिन्द फौज. अंग्रेजों ने उन्हें देश से तो निकालने पर विवश कर दिया लेकिन अपने देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने विदेश में जाकर भी ऐसी सेना तैयार की जिसने आगे जाकर अंग्रेजों को दिन में ही तारे दिखाने का हौसला दिखाया.

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का मानना था कि भारत से अंग्रेजी हुकूमत को ख़त्म करने के लिए सशस्त्र विद्रोह ही एक मात्र रास्ता हो सकता है. अपनी विचारधारा पर वह जीवन-पर्यंत चलते रहे और उन्होंने एक ऐसी फौज खड़ी की जो दुनिया में किसी भी सेना को टक्कर देने की हिम्मत रखती थी.

Netaji Subhash Chandra Bose Quotes in Hindi: 
सुभाष चन्द्र बोस के कथन
सुभाष चन्द बोस ने हमेशा पूर्ण स्वतंत्रता और इसके लिए क्रांतिकारी रास्ते ही सुझाए. उन्होंने ही “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा” और “दिल्ली चलो” जैसे नारों से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नई जान फूंकी थी.

आजाद हिन्द फौज (Azad Hind Fauj )
सुभाष चन्द्र ने सशस्त्र क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को ‘आजाद हिन्द सरकार’ की स्थापना की तथा ‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन किया. इस संगठन के प्रतीक चिह्न एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था.

कदम-कदम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा – इस संगठन का वह गीत था, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे.

आजाद हिंद फौज के कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई. इस फौज में न केवल अलग-अलग सम्प्रदाय के सेनानी शामिल थे, बल्कि इसमें महिलाओं का रेजिमेंट भी था.

यहां यह जानना आवश्यक है कि आजाद हिन्द फौज (इण्डियन नेशनल आर्मी) का गठन कैप्टन मोहन सिंह, रासबिहारी बोस एवं निरंजन सिंह गिल ने मिलकर 1942 में किया था जिसे बाद में नेताजी ने पुनर्गठित किया और इसमें नई शक्ति का संचार किया.
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मौत भी थी रहस्यमयी
कभी नकाब और चेहरा बदलकर अंग्रेजों को धूल चटाने वाले नेताजी की मौत भी बड़ी रहस्यमयी तरीके से हुई. द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद नेताजी को नया रास्ता ढूंढ़ना जरूरी था. उन्होंने रूस से सहायता मांगने का निश्चय किया था. 18 अगस्त, 1945 में नेताजी हवाई जहाज से मंचूरिया की तरफ जा रहे थे. इस सफर के दौरान वे लापता हो गए. इस दिन के बाद वे कभी किसी को दिखाई नहीं दिए. 23 अगस्त, 1945 को जापान की दोमेई खबर संस्था ने दुनिया को खबर दी कि 18 अगस्त के दिन नेताजी का हवाई जहाज ताइवान की भूमि पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और उस दुर्घटना में बुरी तरह से घायल होकर नेताजी ने अस्पताल में अंतिम सांस ली. लेकिन आज भी उनकी मौत को लेकर कई शंकाए जताई जाती हैं.

लेकिन नेताजी की मौत पर बनी विभिन्न कमेटियों के नतीजे बेहद रोचक और आपस में मेल नहीं खाते. नेताजी की मौत के बाद कई लोगों ने तो खुद के नेताजी सुभाषचन्द्र होने का भी दावा किया लेकिन सब बेबुनियाद. खुद ताइवान सरकार ने भी अपना रेकॉर्ड देखकर खुलासा किया था कि 18 अगस्त, 1945 को ताइवान में कोई विमान हादसा हुआ ही नहीं था.
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कई लोग तो यह भी मानते हैं कि भारत सरकार ये जानती थी कि नेताजी विमान दुर्घटना में नहीं मरे लेकिन उन्होंने जनता से यह सच्चाई छुपाई और इस सच्चाई को छुपाने का एक बहुत बड़ा कारण भी था कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस महात्मा गांधी के विरोधी थे और कोई भी कांग्रेसी गांधी के विरोधी को पसंद नहीं करता.

1956 में बनी शाहनवाज कमेटी और 1970 में बने खोसला आयोग ने तो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मौत को विमान दुर्घटना ही बताया लेकिन 1978 में मोरारजी देसाई ने इन दोनों आयोगों की रिपोर्ट को खारिज कर दिया था. इसके बाद गठन हुआ मुखर्जी आयोग का जिसने सच्चाई जानने की कोशिश की लेकिन इस आयोग की रिपोर्ट को कांग्रेस ने मानने से इंकार कर दिया. आज हालात यह हैं कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे महानायक की मौत एक रहस्य बनी हुई है.


नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का यूं तो पूरा जीवन ही रहस्यों से भरा था जैसे रहस्यमयी तरीके से अंग्रेजों की जेल से निकलना और  रहस्यमयी तरीके से लड़ाई लड़ना लेकिन उनकी मौत भी रहस्यमयी होगी यह किसी ने नहीं जाना था. खैर आज उनकी जयंती पर हम देश के इस महानायक को भावभीनी श्रद्धांजलि देते हैं और आशा करते हैं आने वाले समय में नेताजी की मौत के रहस्य से अवश्य पर्दा उठेगा और देश के इस असली हीरो को उसका असली स्थान मिलेगा.
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खुलासा : 

गांधी नहीं सुभाष चंद्र बोस की 

आर्मी ने दिलाई थी आजादी


नई दिल्ली। सुभाष चंद्र बोस की जिंदगी से जुड़े नए खुलासे होने के साथ ही अब भारत का इतिहास भी बदलता दिख रहा है। हाल में लिखी गई एक किताब में दावा किया गया है कि सुभाष चंद्र बोस की आर्मी यानी इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) ने भारत की आजादी में अहम भूमिका निभाई थी। किताब का दावा मानें तो गांधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के ज्‍यादा बोस की आर्मी की वजह से भारत काे आजादी मिली।
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इंडियन नेशनल आर्मी पर नई किताब

नेताजी पर रिसर्च कर चुके मिलिट्री हिस्टोरियन जनरल जीडी बख्शी की किताब ‘बोस: इंडियन समुराई’ में यह बातें लिखी गई हैं। बख्शी के मुताबिक, तब के ब्रिटिश पीएम रहे क्लीमेंट एटली ने कहा था कि नेताजी की इंडियन नेशनल आर्मी ने आजादी दिलाने में बड़ा रोल निभाया। वहीं, गांधीजी के नेतृत्व में चलाए जा रहे अहिंसा आंदोलन का असर काफी कम था। बख्शी ने तर्क के तौर पर एटली और पश्चिम बंगाल के गवर्नर रहे जस्टिस पीबी चक्रबर्ती के बीच की बातचीत का जिक्र भी किया है।

ब्रिटिश पीएम की बातचीत का खुलासा

साल 1956 में एटली भारत आए थे और कोलकाता में पीबी चक्रबर्ती के गेस्ट थे। भारत की आजादी के डॉक्यूमेंट्स पर एटली ने ही साइन किए थे। इसीलिए एटली और पीबी चक्रबर्ती का बातों को तवज्‍जो दी जा रही है। चक्रबर्ती कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और वेस्ट बंगाल के एक्टिंग गवर्नर भी थे।चक्रबर्ती ने इतिहासकार आरसी मजूमदार को उनकी किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ बंगाल’ के लिए खत लिखा था।
इंडियन नेशनल आर्मी

बोस की आर्मी का असर

चक्रबर्ती ने लिखा, ‘मेरे गवर्नर रहने के दौरान एटली दो दिन के लिए गवर्नर हाउस में रुके थे। इस दौरान ब्रिटिशर्स के भारत छोड़ने के कारणों पर लम्बा डिस्कशन हुआ। मैंने उनसे पूछा था कि गांधीजी का भारत छोड़ो आंदोलन (1942) आजादी के कुछ साल पहले ही शुरू हुआ था। क्या उसका इतना असर हुआ कि अंग्रेजों को इंग्‍लैण्‍ड लौटना पड़ा।’ बक्‍शी की किताब के मुताबिक ‘जवाब में एटली ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आर्मी की कोशिशों को अहम बताया था।’ किताब के मुताबिक चक्रबर्ती ने जब एटली से पूछा कि गांधीजी के अहिंसा आंदोलन का कितना असर हुआ तो एटली ने हंसते हुए जवाब दिया-काफी कम। चक्रबर्ती और एटली की इस बातचीत को 1982 में इंस्टीट्यूट ऑफ हिस्टोरिकल रिव्यू में राजन बोरा ने ‘सुभाष चंद्र बोस-द इंडियन नेशनल आर्मी एंड द वॉर ऑफ इंडियाज लिबरेशन’ आर्टिकल में छापा था।

सैनिकों का विद्रोह आया काम

1946 में रॉयल इंडियन नेवी के 20 हजार सैनिकाें ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी थी। सैनिक 78 जहाज लेकर मुंबई पहुंच गए थे। इन जहाजों पर तिरंगा भी फहरा दिया गया था। हालांकि तब इस बगावत को दबा लिया गया। लेकिन अंग्रेजों के लिए यह घतरे की घंटी थी।