शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

परमेश्वरी माँ जगदंम्वा : परब्रम्ह का ही स्वरूप

- अरविन्द सीसोदिया 




   हमारे इस सम्पूर्ण जगत ,सृष्टि मण्डल की मूल अधिष्ठाता शक्ति , जिसने इसे जन्म दिया या निर्माण किया बनाया है वह एक ही ...! यह शब्द परमशक्ति माता भुवनेश्वरी के हैं , जो उन्होंने ; ब्रम्हा, विष्णु और महेश को सुनाये थे...! 
      कथानक इस प्रकार से है कि मधु - कैटभ युद्ध को लम्बे संघर्ष के उपरांत माँ जगदम्वे  की कृपा से जीता जाता है, उसी स्थान पर एकत्र ब्रम्हा , विष्णु, महेश को देवी का आदेश होता है कि सृजन , पालन और संहार के कार्यों को प्रमाद रहित हो कर वे करें...! तदुपरांत एक विमान उनके पास आता है जिसमें वे सवार होजाते हैं., वह विमान इन तीनों को लेकर स्वर्ग जैसे लोक में ले जाता हैं उनका स्वागत इंद्र जैसा कोई अधिष्ठाता  करता है..! इस के बाद वह विमान , ब्रम्ह लोक, विष्णु लोक और शिव लोक में जाता हर लोक में .., जिनमें यह तीनों अधिवाशी हैं , यह देख कर आश्चर्य होता है कि वहां उन लोकों के अधिष्ठाता यथा ब्रम्हा , विष्णु और महेश अपने अपने सहयोगियों  के साथ कार्य रत हैं...! इसके बाद में वह विमान इन्हें माता भुवनेश्वरी के मणिदीप लोक में पहुचता है , विमान से उतार कर ये तीनों देवी के भुवन में जाते हैं , यब आश्चर्य जनक घटना यह होती है कि प्रवेश द्वार से यह तीनों स्त्री स्वरूप होजाते हैं ..., जब वे माता के दर्शन करते हैं तो दर्पण की तरह चमक रहे नखों में वे समस्त स्थावर जंगमात्मक ब्रम्हांड के साथ साथ स्वंय  को भी देखते हैं ! सूर्य , चन्द्र , इंद्र , वरुण , कुबेर , वायु , अग्नि , पर्वत , समुद्र इत्यादी भी उन्हें उस नखरुपी दर्पण में दीखते हैं !
     वे भुवनेश्वरी  की स्तुति करते हैं , "... हे भावानी ! आपके द्वारा रचित इस ब्रम्हाण प्रपंच में , न जानें कितने ब्रम्हांड भरे पड़े हैं , हे देवी ! हम आपके चरणों में बार बार नमन करते हैं..! "
      भगवती प्रशन्न हो कर इन का संशय दूर करती है "...मैं और परब्रम्ह एक ही हैं , हममें कोई भेद नही है.., क्योंकि जो वे हैं , वही मैं हूँ और जो मैं हूँ ; वही वे हैं ! बुद्धी भ्रम से ही  हम में भेद दिखाई देता है ! "     
         भुवनेश्वरी देवी इन तीनों को ,ब्रम्हा जी को  महासरस्वती, विष्णु जी को महालक्ष्मी ,  शिव को महाकाली स्वरूप वाली विलक्षण शक्तियाँ प्रदान करतीं हैं ...! और अपने अपने लोकों में जा कर निर्धारित कार्यों को करने का आदेश देती हैं ! जब ये लौट  कर आते हैं तो विमान पर आते ही पुनः पुरुष स्वरूप में परवर्तित ही गए ..! 
    यह  छोटी सी कथा अनेक बड़े संकेत देती है...! कई लोक ..., लोकों कि यात्रा करने वाला यान , परम सट्टा एक होने के वावजूद भी कार्य के कारण अन्य बहुतसी देवीय व्यवस्थाएं  भी हैं .., इस लिए परम सत्ता  एक होते हुए भी अन्य अनेकों अस्तीत्व रखती है..! पुरुष से स्त्री स्वरूप और स्त्री स्वरूप से पुरुष स्वरूप....! अनंत की अनंतता को दिखाने वाली यह यह कथानक ..., विज्ञान को सुदूर तक के लिए काम देता है...! विज्ञान भी मान चुका है की , यह सब कुछ बहुत गहरा है , इतना  नहीं है कि कोई भी चलते फिरते  कोई कल्पना करले..., कभी कुछ महसूस अवश्य ही किया गया होगा !
इस  कथानक का आधार देवी भागवत का स्कन्ध तीन है ...! 
परब्रम्ह परमेश्वर , जिस शक्ति के बल पर अनंत कोटि - कोटि ब्रम्हांड को नियमबद्ध करते हैं | वह उसी शक्ति के बल पर अनंत कोटि जीवों को प्रगट करता है | उसी शक्ति को योगमाया या माया या शक्ति के नाम से जाना जाता है.., इशह पं शक्ति को हम माता , अन्म्बा , जगदम्बा , दुर्गा और अन्यान्य नामों से जानते हैं ..! उनके अनंत स्वरूपों की स्तुति करते हैं.., 




सृष्टिस्थितिप्रलयसाधनशक्तिरेका |
छायेव यस्य भुवनानि विभर्ति दुर्गा ||
 अर्थात  ; परम ब्रम्ह के साथ छ्या के सामान मानी जाने वाली यही शक्ति सृष्टि , स्थिति और संहार का साधन करने वाली एक मात्र शक्ति दुर्गा , चौदह भुवनों का पालन करवाती है |  इसे अपर शक्ति कहा जाता है | इसका अर्थ वैज्ञानिक नियमों कि अदृश्य स्वरूप से सुनिश्चत करता शक्ति है..! यह केवल अपर ही नहीं पराशक्ति भी है | कुल मिला कर यह शक्ती है..! जिसे विज्ञान कि भाषा  में एनर्जी कहा गया है..! 
परापराण परमा स्वमेव परमेश्वरी !  - दुर्गा स्तुति    
  अर्थात पर और ऊपर-सबसे  परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्ही हो ...!  
          

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