शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

अपवित्र कर दिया नोबेल पुरूस्कार ...

लोकतंत्र समर्थक  ; 
चीन में बंदी को नोबेल पुरूस्कार  ....!
- अरविन्द सीसोदिया 
     यूं तो नोबेल पुरुस्कारों  का चयन , विशेष कर  शांती नोबेल अनेकों बार विवादास्पद रहा है, इसके अतिरिक्त और भी अंतर्राष्ट्रीय पुरूस्कार विवाद पूर्ण रहे हैं.., इकने पीछे का सच छलक तो जाता है मगर ज्यादातर उन्हें कहता कोई नहीं है ! पुरुस्कार देना और उसके मुह से अपनी बात कहलवाना..! यह अजीव सी बेईमानी बहुत सालों से चल रही है..!!  
     इस बार इसलिए विवादास्पद है कि चीन में लोकतंत्र के लिए संघर्ष करने वाले ल्यू जियाओबो (शियाओबो) को नोबेल पुरुष्कार देने की घोषणा की गई है..! यह वह व्यक्ती है जिसने  १९८९ में  चीन में  लोकतंत्र के समर्थन  में विशाल प्रदर्शन किया था , जिस में हजारों  छात्र मारे गए थे ! चीन में इसका दर्जा अपराधी का है ! 
- क्रानिकल इयर बुक के अनुसार पेइचिंग में सैनिक कार्यवाही में लगभग १०,००० लोकतंत्र समर्थक आन्दोलनकारी  जून १९८९  को मारे गए थे | इसी तरह से मनोरमा इयर बुक के अनुसार १९८९ में पेइचिंग में १५ मई को थ्यामन  चौराहे पर हजारों लोकतंत्र समर्थक छात्रों  ने प्रदर्शन किया था, वहां माशर्ल ला लगा दिया गया था..! तब राष्ट्रपति बुस ने चीन के खिलाफ सैनिक प्रतिबन्ध लगा दिया था .., और तब चीन की चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने चाओ चिआंग के स्थान पर चाओ चेमिन  को पार्टी का महासचिव बना दिया था ..! चीन में लोकतंत्र नहीं है वहां एक मात्र पार्टी चीन  कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता है, वहां मीडिया सहित  बोलने , करने और मानवता की बात तक करने की कोई स्वतंत्रता नहीं है .., भयानक  शोषण के दौर से चीन कि जनता गुजर रही है |       
अपवित्र कर दिया नोबेल को 
 प्रश्न यह है कि जब लिऊ को वास्तव में पुरूस्कार देना चाहिए था ..., में उसे इसके हक़दार के तौर पर स्वीकार करता हूँ..! मगर जब उसे ताकत देने का वक्त था , तब तो उसे दिया नहीं गया.., आज जब उस दौर को २१-२२  साल हो गए तब आप उसे पुरूस्कार इसलिए दे रहे हो कि चीन में फिर बगावत हो....!! पुरुस्कार कितना ही पवित्र क्यों न हो मगर उसका उपयोग आपने अपनी गर्ज के लिए; अपने स्वार्थ के लिए, अपने गंदे काम के लिए  करके,  उसे अपवित्र कर दिया...! क्यों कि आज वही चीन  जिसे आपने आगे आगे रखा था वह आपके वश में नहीं है..., अमरीकी गलत नीतियों के कारण आज वह भस्मासुर हो गया ..!! भारत को नीचा  दिखाने के लिए आपने लम्बे समय तक पाकिस्तान और चीन की मदद की...!! आज वह आपकी वैज्ञानिकता, आर्थिकता और विश्व वर्चस्व को खतरा बन गया है तो आपने उसे इस तरह से संकट में डालने की ठानी  जो ठीक नहीं है ! दूसरे के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाना अनुचित  है.., सीधा मुकावला करो.., हो जाये तीसरा विश्व युद्ध .., वह होना तो है ही.., और यह भी तय  है की चीन के कारण ही होगा तीसरा विश्व युद्ध...!!    
पत्नी की  नजरबंदी 
नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाले लिऊ चियाओबो की पत्नी ने अपनी नजरबंदी को अवैध बताया है. जेल में बंद चियाओबो की पत्नी लिऊ चिया  सरकार पर बरस पड़ीं. उन्होंने कहा कि उन्हें अवैध तरीके से नजरबंद करके रखा जा रहा है | लिऊ चिया ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा, "मुझे अवैध तरीके से घर में कैद रखने के लिए मैं सरकार के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराती हूं." उन्होंने लिखा कि उनके हालात बहुत मुश्किल हैं.

 चीन की नाराजगी     

       चीन की नाराजगी नॉर्वे पर उतर रही है. उसने नॉर्वे के साथ होने वाली मंत्री स्तर की कई बैठकों को रद्द कर दिया है. अगले महीने देश में होने वाले नॉर्वे के एक संगीत समारोह को भी रद्द कर दिया है. नॉर्वे ने इन फैसलों की आलोचना की है और कहा है कि वह चीन के साथ सकारात्मक रिश्ते बनाए रखना चाहता है.





      लिऊ चिया ने भी कहा था कि नॉर्वे के दो राजनयिक मंगलवार को उनसे मिलना चाहते थे लेकिन उन्हें उनके अपार्टमेंट के गेट से ही लौटा दिया गया. नॉर्वे के दूतावास ने भी इस खबर की पुष्टि की है. दूतावास की प्रवक्ता टोने हेलेने आरविक ने बताया कि दो अधिकारी लिऊ से मिलने गए थे लेकिन उन्हें दरवाजे से ही वापस भेज दिया गया.लिऊ चिया ने उम्मीद जताई है कि वह अपने पति की तरफ से नोबेल पुरस्कार लेने नॉर्वे जा पाएंगी. हालांकि उन्होंने ऐसी किसी संभावना से साफ इनकार कर दिया कि अपनी सजा कम कराने के लिए उनके पति खुद को कसूरवार मान कर सरकार से समझौता कर लेंगे. उन्होंने एपल डेली नाम के अखबार से यह बात कही.लिऊ चिया का फोन काट दिया गया है. अब वह ट्विटर के जरिए दुनिया के संपर्क में हैं. हालांकि चीन में ट्विटर पर प्रतिबंध है लेकिन प्रॉक्सी सर्वर के जरिए इसे खोला जा सकता है.
रिहाई की मांग 
     इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता लियू शियाओबो की पत्नी ने सरकार से अपनी पति की बिना शर्त रिहाई की मांग की है. लियू सरकार विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में 11 साल के कारावास की सजा काट रहे हैं |  लियू की पत्नी लियू शिया अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने की भी योजना बना रही हैं. हॉगकांग के अखबार साऊथ चायना मॉर्निंग पोस्ट के साथ बातचीत में लियू ने कहा कि वह पति की रिहाई के बारे में कोई शर्त स्वीकार न हीं करेंग | लियू शियाओबो जेल में बंद हैं और नोबेल दिए जाने की घोषणा के बाद से उनकी पत्नी को भी पुलिस ने घर में नजरबंद कर दिया है. लियू को अदालत ने राज्य सत्ता को चुनौती देने के आरोप का दोषी ठहराते हुए सजा दी है. वह देश में लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली को लेकर लंबे समय से आंदेलन कर रहे हैं |  इस बीच लियू ने दिसंबर में पुरस्कार ग्रहण करने के लिए पत्नी से ओस्लो जाने को कहा है. हालांकि लियू की रिहाई के बारे में चीन सरकार का कोई फैसला सामने न आने के कारण अभी यह तय नहीं हो पाया है कि ओस्लो कौन जाएगा |
दलाई लामा  --  वर्ष 1989 के नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित दलाई लामा ने जारी एक बयान में श्री शियाओबो को पुरस्कार के लिए बधाई देते हुए कहा..इस नज़रबंद नेता को नोबल पुरस्कार मिलने से यह साबित हो गया है कि चीन प्रशासन पर राजनीतिक .कानूनी .संवैधानिक सुधारों को अपनाने का दबाव बनाने के लिए उसके विरूद्ध उभर रही चीनी लोगों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी मान्यता दे दी है। 
      उन्होंने चीन सरकार से जेलों में बंद उन सभी लोगों की भी तत्काल रिहाई की मांग की जिन्होंने देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अभिव्यक्ति की अपनी स्वतंत्रता के अधिकार का इस्तेमाल किया है। दलाईलामा ने कहा..मैं व्यक्तिगत तौर पर सैंकड़ों चीनी बुद्धिजीवियों तथा शियाओबो सहित वहां के तमाम निवासियों द्वारा चार्टर 08 पर हस्ताक्षर करने का प्रबल सर्मथक हूं
जिसमें चीन में लोकतंत्र और आजादी की मांग की गई है। मैं यह भी मानता हूँ कि चीन के लोग आज जिस सुशासन और एक जिम्मेदार सरकार के लिए प्रयास और संघर्ष कर रहे हैं वह आने वाली पीड़ियों के लिए काफी सुखद साबित होगा..।
 

  * चीन की उप विदेश मंत्री फू यिंग ने इस साल के नोबेल पुरस्कार विजेता लिउ शियाओबो को 'अजीब' कहा. फू ने सवाल उठाया है कि चीन के असली नायकों को किसी पुरस्कार के लिए नामांकित क्यों नहीं किया |
माराकेश में विश्व नीति पर बैठक के लिए पहुंची फू ने कहा, "नोबेल समिति चीन से हमेशा अजीब लोगों को नामांकित करती है". हो सकता है कि इस वाक्य से वे दलाई लामा की ओर भी संकेत कर रही थीं जिन्हें 1989 में शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया. फू ने कहा, "अगर आप चीन के हैं, तो आप बस चीन के खिलाफ कुछ अजीब सा कर दें और आप पुरस्कार के लिए नामांकित किए जाएंगे." फू की दलील है कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को क्यों पुरस्कार देना चाहिए जिसने चीन को सात भागों में बांट देने का सुझाव दिया हो |
          साथ ही फू ने कहा कि चीन के नायकों को शायद कभी भी इस तरह की इज्जत न मिले. उनका मतलब उन वैज्ञानिकों से था जिन्होंने चीन के 1.3 अरब से ज्यादा नागरिकों के पेट भरने के लिए नए खोज किए और गरीबी घटाने में मदद की. मिसाल के तौर पर वैज्ञानिक युआन लोंगपिंग जिन्हें कई लोग 'हाइब्रिड चावल के पिता' मानते हैं. फू के मुताबिक उन्हें विश्वास था कि युआन जरूर नामांकित किए जाएंगे.उन्होंने कहा कि चीन की भाषा में शांति के लिए चिह्न या अक्षर के दो भाग होते हैं, एक भाग मुंह दर्शाता है और एक चावल. फू के मुताबिक, चीन के इतिहास में माना जाता है कि विश्व में शांति तभी आ सकती है जब सबके पेट भरे हों.








अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा
* * वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चीन के लोकतंत्र समर्थक नेता ली ओ शाओ बो को शांति का नोबेल पुरस्कार देने के निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने चीन से ली को रिहा करने की अपील की है। कनाडा के प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर ने भी ओबामा का समर्थन करते हुए ली को छोड़ने की वकालत की है। ली इन दिनों चीन की जेल में कैद हैं। 54 वर्षीय ली को पिछले साल 25 दिसंबर को चीनी अदालत ने सरकार का तख्तापलट करने के लिए लोगों को उकसाने के आरोप में 11 साल कारावास की सजा सुनाई थी। उन्हें यह पुरस्कार चीन में मानवाधिकारों के लिए उनके लंबे अहिंसक संघर्ष के लिए दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, 'यह सम्मान हमें याद दिलाता है कि किसी देश की राजनीति को दायरे में नहीं बांधा जा सकता है। हम चीन से ली को जल्द से जल्द रिहा करने की अपील करते हैं।'
*** पेइचिंग। चीन में नागरिकों की आजादी और बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू करने के मुखर समर्थक नेता लिउ जियाबाओ को सरकार का तख्तापलट करने के लिए लोगों को भड़काने के आरोप में आज 11 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गयी।
राजधानी पेइचिंग की अदालत ने कल ही उन्होंने इस मामले में दोषी करार दिया था। आज फैसले के दौरान लिउ अपने वकील के साथ अदालत में मौजूद थे। सरकारी संवाद समिति शिनहुआ ने अदालत के आदेश के हवाले से कहा कि अदालत ने इस मामले में कानूनी प्रक्रिया का कड़ाई से पालन किया है और इस दौरान लिउ के कानूनी अधिकारों का पूरी तरह संरक्षण करने पर भी ध्यान दिया गया है। गत सोमवार को 54 वर्ष के हुए लिउ तियानमेन में वर्ष 1989 में लोकतंत्र के समर्थन में हुए विरोध प्रदर्शन के अगुवा रहे थे। वह देश में राजनीतिक सुधारों के लिए चार्टर 8 घोषणापत्र के मुख्य लेखक रहे।

Freedom of Speech in China

PEACEAmong the many people campaigning for human rights in China, Liu Xiaobo, the 2010 Nobel Peace Prize Laureate, has become the most visible symbol of the struggle. A long-term exponent of non-violent protest, he is currently serving an 11-year prison term

Liu Xiaobo and his wife, Liu Xia. Photo taken in Beijing, China, 2008.
Photo: http://liuxiaobo.eu/








From left: Zhou Duo, Liu Xiaobo, Hou Derchien and Gao Xin during a hunger strike at Tian'anmen Square, Beijing, 2 June 1989.
Photo: http://liuxiaobo.eu/

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी सामग्री बहुत अच्छी है आप क्यों नोवुल पुरस्कार क़ा बिरोध कर रहे है वाह योग्य है या नहीं लेकिन लोकतंत्र क़ा पक्ष और विश्व क़ा जनमत उसके पक्ष में होने के करण 'ली ओं साओ' को नोवुल पुरस्कार मिलना ही चाहिए.

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  2. इन पुरुस्कारों की पवित्रता हमेशा संदिग्ध रही है , ब्रिटेन की साहित्यिक संस्था ने भी अरूधंती रॉय को मात्र एक उपन्यास पर ही इनाम देकर ओहदा उंछ कर दिया और अब वे दूसरे उपन्यास लिखने के बजाये भारत में जितने भी विध्वंश तत्व हैं उनकी तरफदारी कर रहीं हैं...! यह एक सिस्टम है...! मेने लिऊ को वास्तव में पुरूस्कार देना चाहिए यही लिखा है मगर उसे , अपने स्वार्थ के आधार पर देना गलत है ! शायद आपने पोस्ट ठीक से पढी नहीं ..!!! एक अंश निम्न प्रकार से है......
    अपवित्र कर दिया नोबेल को
    प्रश्न यह है कि जब लिऊ को वास्तव में पुरूस्कार देना चाहिए था ..., में उसे इसके हक़दार के तौर पर स्वीकार करता हूँ..! मगर जब उसे ताकत देने का वक्त था , तब तो उसे दिया नहीं गया.., आज जब उस दौर को २१-२२ साल हो गए तब आप उसे पुरूस्कार इसलिए दे रहे हो कि चीन में फिर बगावत हो....!! पुरुस्कार कितना ही पवित्र क्यों न हो मगर उसका उपयोग आपने अपनी गर्ज के लिए; अपने स्वार्थ के लिए, अपने गंदे काम के लिए करके, उसे अपवित्र कर दिया...! क्यों कि आज वही चीन जिसे आपने आगे आगे रखा था वह आपके वश में नहीं है..., अमरीकी गलत नीतियों के कारण आज वह भस्मासुर हो गया ..!! भारत को नीचा दिखाने के लिए आपने लम्बे समय तक पाकिस्तान और चीन की मदद की...!! आज वह आपकी वैज्ञानिकता, आर्थिकता और विश्व वर्चस्व को खतरा बन गया है तो आपने उसे इस तरह से संकट में डालने की ठानी जो ठीक नहीं है ! दूसरे के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाना अनुचित है.., सीधा मुकावला करो.., हो जाये तीसरा विश्व युद्ध .., वह होना तो है ही.., और यह भी तय है की चीन के कारण ही होगा तीसरा विश्व युद्ध...!!

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  3. इन पुरुस्कारों की पवित्रता हमेशा संदिग्ध रही है , ब्रिटेन की साहित्यिक संस्था ने भी अरूधंती रॉय को मात्र एक उपन्यास पर ही इनाम देकर ओहदा उंछ कर दिया और अब वे दूसरे उपन्यास लिखने के बजाये भारत में जितने भी विध्वंश तत्व हैं उनकी तरफदारी कर रहीं हैं...! यह एक सिस्टम है...! मेने लिऊ को वास्तव में पुरूस्कार देना चाहिए यही लिखा है मगर उसे , अपने स्वार्थ के आधार पर देना गलत है ! शायद आपने पोस्ट ठीक से पढी नहीं ..!!! एक अंश निम्न प्रकार से है......
    अपवित्र कर दिया नोबेल को
    प्रश्न यह है कि जब लिऊ को वास्तव में पुरूस्कार देना चाहिए था ..., में उसे इसके हक़दार के तौर पर स्वीकार करता हूँ..! मगर जब उसे ताकत देने का वक्त था , तब तो उसे दिया नहीं गया.., आज जब उस दौर को २१-२२ साल हो गए तब आप उसे पुरूस्कार इसलिए दे रहे हो कि चीन में फिर बगावत हो....!! पुरुस्कार कितना ही पवित्र क्यों न हो मगर उसका उपयोग आपने अपनी गर्ज के लिए; अपने स्वार्थ के लिए, अपने गंदे काम के लिए करके, उसे अपवित्र कर दिया...! क्यों कि आज वही चीन जिसे आपने आगे आगे रखा था वह आपके वश में नहीं है..., अमरीकी गलत नीतियों के कारण आज वह भस्मासुर हो गया ..!! भारत को नीचा दिखाने के लिए आपने लम्बे समय तक पाकिस्तान और चीन की मदद की...!! आज वह आपकी वैज्ञानिकता, आर्थिकता और विश्व वर्चस्व को खतरा बन गया है तो आपने उसे इस तरह से संकट में डालने की ठानी जो ठीक नहीं है ! दूसरे के कंधे पर बन्दूक रखकर चलाना अनुचित है.., सीधा मुकावला करो.., हो जाये तीसरा विश्व युद्ध .., वह होना तो है ही.., और यह भी तय है की चीन के कारण ही होगा तीसरा विश्व युद्ध...!!

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