बुधवार, 3 नवंबर 2010

इन्द्रेश जी निशाने पर क्यों..? संघ से न जुड़े मुसलमान ..!




- अरविन्द सीसोदिया 
देश के कई अहम मशलों यथा महा भ्रष्टाचार , महा मंहगाई , महा आंतरिक अशांती और हिंषाचार के बीच केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी के लोग बार - बार संघ और हिन्दू समाज को बदनाम करने के प्रयास कर रहे हैं .., कारण क्या हो सकता है.., पहला कारण तो साफ़ है की कांग्रेस मुस्लिम वोट को अपनी और खींच कर उसके बल पर देश पर राज करते रहना चाहती है...!  दूसरे जिस तरह से ब्रिटिश राज में हिन्दू - मुस्लीम को मुर्गों कि तरह आपस में लड़ा कर अपनी सत्ता बरकरार रखते थे वही कांग्रेस करती है..!! तीसरे मुसलमान के वोट के द्वारा सत्त और सत्त के द्वारा इसाइयत को भारत में स्थापित करने का काम कीया जा रहा है.., 
असल वजह 
 असल वजय यह है कि इन्द्रेश जी वह नाम जिसे राष्ट्रवादी मुसलमान बहुत ही इज्जत के साथ लेता है..! आम मुसलमान जानता है की उसका भाग्य भारत से जुड़ चुका है अब पीढियां दर पीढीयाँ भारत में ही रहना और भारत में ही मरना है.., सो इन्द्रेश जी के कारण आज  मुसलमान संघ की और राजनैतिक क्षैत्र में भाजपा की और मुड़ना प्रारंभ हो गया है .., इसी के कारण द्वेष वश यह कार्यवाही प्रचारित की जा रही है कि ..,इन्द्रेश जी का फला बम कांड से, फलां उससे और फलां उससे संबंध है...!! ताकी इस पवित्र कार्य में विघ्न उत्पन्न किया ज सके...!! जिस तरह अंगेज कहते थे की हमको बिना तनखाह के करोड़ों शुभ चितक ( मुसलमान ) मिल गए .., लगभग ठीक ठीक वही बात कांग्रेस की नीति में है , वह देश के मुसलमान को बरगला कर , गलत तरह से भ्रमित करके .., ६० साल  से १० प्रतिशत से अधिक वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल कर रही है !!! उसे कभी भी राष्ट्रीय बनाने की बात नहीं सिखाती.., जब देखो जब उसे याद दिलाती है कि तुम अलग हो..!! तुम्हे इससे खतरा है , उससे खतरा है , तुम्हारी रक्षा सिर्फ कांग्रेस ही करती है..!! बातों ही बातों में वोट लेना और फिर.....!! मुसलमान ठनठन - गोपाल...!! कांग्रेस मूलरूप से संघ और इन्द्रेश जी से इसलिए घवराई हुई है कि वे मुसलमान को राष्ट्रवादी क्यों बना रहे हैं...!! कांग्रेस मुसलमान को अपना वोट बैंक बना कर रखना चाहती है उसमें अब सेंध लगने का डर है सो यह तमाशा हो रहा है !! कांग्रेस के हिसाब से तो , देश में साम्प्रदायिक तनाव रहे यह तो अच्छा है .., दोनों समुदाय मिलें  बैठे यह गलत है..!!  
संघ एक राष्ट्र चेतना का सतत अभियान 
 
संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत 1925 से होती है। उदाहरण के तौर पर 1962 के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को गणतंत्र दिवस के 1963 के परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये।
    वर्तमान समय में संघ के दर्शन का पालन करने वाले कतिपय लोग देश के सर्वोच्च पदों तक पहुँचने मे भीं सफल रहे हैं। ऐसे प्रमुख व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति पद पर भैरोसिंह शेखावत, प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी ( तीन वार प्रधान मंत्री और एक वार मंत्री तथा कई वार नेता प्रति पक्ष ) एवं उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण आडवाणी ( दो वार मंत्री और कई वार नेता प्रति पक्ष ) जैसे लोग शामिल हैं | 
संघ में जो प्रार्थना, प्रतिदिन संघ स्थान पर की जाती है उसका अर्थ निम्न प्रकार से है...! इसे पढ़ कर हार कोई समझ सकता है कि यह संगठन राष्ट्र के प्रति कितना समर्पित  है ||  


        सघ की प्रार्थना का अर्थ 
      हे मातृभूमि, तुम्हें प्रणाम! इस मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और पुण्यभूमि है। इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह नश्वर शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस भूमि को बार-बार प्रणाम करता हूँ।
        हे सर्व शक्तिमान परमेश्वर, इस हिन्दू राष्ट्र के घटक के रूप में मैं तुमको सादर प्रणाम करता हूँ। आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। हमें इस कार्य को पूरा करने किये आशीर्वाद दे। हमें ऐसी शक्ति दीजिये कि हम इस पूरे विश्व को जीत सकें और ऐसी नम्रता दें कि पूरा विश्व हमारे सामने नतमस्तक हो सके। यह रास्ता काटों से भरा हुवा है, इस कार्य को हमने स्वयँ स्वीकार किया है और इसे सुगम कर काँटों रहित करेंगे।
       ऐसा उच्च आध्यात्मिक सुख और ऐसी महान ऐहिक समृद्धि को प्राप्त करने का एकमात्र श्रेष्ट साधन उग्र वीरव्रत की भावना हमारे अन्दर सदेव जलती रहे। तीव्र और अखंड ध्येय निष्ठा की भावना हमारे अंतःकरण में जलती रहे। आपकी असीम कृपा से हमारी यह विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने में समर्थ हो।
       भारत माता की जय।
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कांग्रेस ने द्वेषता पूर्वक संघ पर तीन वार प्रतिबन्ध लगाते और वे सभी बिना शर्त हटे...
१- 26-02-1948 गांधी हत्या के ठीक बाद (12-07-1949 को बिना शर्त हटी) / प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु 
२- 04-07-1975 आपातकाल के समय (23-03-1977 को सरकार बदलने से हटी)/ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 
३- 10-12-1992 विवादित ढांचा ढहने के बाद (न्यायालय ने 04-06-1993 को हटाई)/ प्रधानमंत्री नरसिंह राव
 यहाँ में यह भी बता देना चाहता हूँ कि जब जब संघ पर प्रतिबन्ध लगा है तब तब वह और भी अधिक समाज द्वारा स्वीकार्य बना है !! क्यों कि वह निर्लिप्त भाव से पूरे मनोयोग के साथ देश हित में लगा हुआ है , देश  के जरा से अहित से वह व्यथित हो उठता है !!  
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संघ के कारण , जम्मू और कश्मीर प्रांत भारत का अंग 
आज जो जम्मू और कश्मीर प्रांत भारत का अंग है  इसके लिए संघ के ही सार्थक प्रयास काम आये...! क्यों की इस प्रांत के महाराजा हरि सिंह ने प्रथम गोलमेज सम्मलेन में लन्दन में  ब्रिटिश सरकार से भारत के साथ सामान व्यवहार की बात की थी..., इससे चिड कर भारत के ब्रिटिश अधिकारीयों  ने शेख अब्दुल्ला के द्वारा वहां महाराजा के विरुद्ध आन्दोलन चलवाया , इसी तरह के क्रम में मुस्लिम लीग की तरह मुस्लिम कांफेंस बनवाई जिसका  बाद में नेशनल कांफेंस नाम रखा गया , शेख अब्दुल्ला के आन्दोलन को समर्थन   करने गए नेहरु जी को , महाराजा हरि सिंह के गिरिफ्तार कर दिल्ली वापस भेजा था...! यह वह हिचक थी जिसके कारण महाराजा हरि सिंह भारत में विलय करने से हिचक रहे थे...!! नेहरु जी से बदले की भावना से काम करने की आशंका थी..,   यह इस लिए भी बढ़ गई थी कि अन्य रियासतें सरदार पटेल के भरोसे होने के वावजूद कश्मीर को नेहरु जी ने अपने पास रखी थी ..!! तब संघ के तत्कालीन सरसंघचालक, सरदार पटेल के कहने पर सरकारी हवाई जहाज से श्री नगर गए और महाराजा की हिचक दूर की और सरदार पटेल केसाथ का भरोष दिया .., तब कहीं महाराजा का मन भारत में विलय का बना था !! 

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