सोमवार, 20 दिसंबर 2010

फ़ासिस्टवाद ; भारत नहीं इटली की विरासत है.....


- अरविन्द सीसोदिया
मूलतः कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह, संघ और भाजपा पर हिटलर और नाजी और फासिस्ट शब्दों का प्रयोग करते वक्त यह भूल जाते हैं  कि न तो हिन्दू फासिस्ट हो सकता,न तो हिन्दू नाजी हो सकता ,न तो हिन्दू हिटलर हो सकता और  न ही इस देश को किसी अन्य देश से कोई राष्ट्रधर्म का सबक लेना है ! क्योंकि इस भारत माता ने  तो पहले ही गुरु गोविन्द सिंह, महाराणा प्रताप , रानी दुर्गावती,छत्रपति शिवाजी, झांसी  की रानी लक्ष्मी बाई , चन्द्रशेखर आजाद और शहीद भगत सिंह जैसे अनेक वीर सपूतों को पैदा किया है ! शकों और  हूणों  से लेकर अंग्रेजों  तक देश के हर संघर्ष को यहाँ के हिंदुत्व ने ही विजयी बनाया है ! 
सिंह साहब ये शब्द वहां के हैं जहाँ से यू पी ए की अध्यक्षा सोनिया गांधी हैं और वे ही इन कृत्यों की रोशनी को ज्यादा समझतीं हैं.....! उनके पिता जी को महान फासिस्ट बेनेतो मुसोलीन के लिए काम करने का अनुभव रहा है ...! हिन्दुओं को क्या सीख देते हो, सीख देना है तो कांग्रेस पर सवार फासिज्म को सीख  दें कि इस देश का संविधान व्यक्तिवाद , वंशवाद और अधिपत्य प्रणाली को तरजीह नहीं देता इसलिए जानता कि दशा  और दिशा  सुधारें , कोरी बातों के शंख बजानें  से काम नहीं चलता .......!  इस देश ने इटालियन क्वात्रोची को भी देख है.......जिसनें सोनिया जी की सरपरस्ती में ही इस देश के हर कानून और संविधान के मूल्यों को ठोकर मर कर अपनी चली और फिर चला गया .., बेखोफ ...!!
फ़ासिस्टवाद का सच ... 
-- फासीवाद या फ़ासिस्टवाद (फ़ासिज़्म) इटली में बेनितो मुसोलिनी द्वारा संगठित "फ़ासिओ डि कंबैटिमेंटो" का राजनीतिक आंदोलन था जो मार्च, 1919 में प्रारंभ हुआ। इसकी प्रेरणा और नाम सिसिली के 19वीं शती के क्रांतिकारियों-"फासेज़"-से ग्रहण किए गए। मूल रूप में यह आंदोलन समाजवाद या साम्यवाद के विरुद्ध नहीं, अपितु उदारतावाद के विरुद्ध था।
-- प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अपने आरंभिक दिनों में फ़ासिस्टवादी आंदोलन का ध्येय राष्ट्र की एकता और शक्ति में वृद्धि करना था। 1919 और 1922 के बीच इटली के कानून और व्यवस्था को चुनौती सिंडिकैलिस्ट, कम्युनिस्ट तथा अन्य वामपंथी पार्टियों द्वारा दी जा रही थी। उस समय फ़ासिस्टवाद एक प्रतिक्रियावादी और प्रतिक्रांतिवादी आंदोलन को समझा जाता था। स्पेन, जर्मनी आदि में भी इसी प्रकृति के आंदोलनों ने जन्म लिया और फ़ासिस्टवाद, साम्यवाद के प्रतिपक्ष (एंटीथीसिस) के अर्थ में लिया जाने लगा। 1935 के पश्चात् हिटलर-मुसोलिनी-संधि से इसके अर्थ में अतिक्रमण और साम्राज्यवाद भी जुड़ गए। युद्ध के दौरान मित्रराष्ट्रों ने फ़ासिज्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम कर दिया। यदि द्वितीय विश्व युद्ध मित्र राष्ट हार जाते तो फासिस्ट की पूजा लोकतंत्र की ही तरह होती , जो हार जाता है उसका सब बुरा और जीत जाता है उसका सब अच्छा ..!  इतिहासकारों की लेखनीं में यही सिद्धांत कम करता है |  
मुसोलिनी की प्रिय उक्ति थी : फ़ासिज्म निर्यात की वस्तु नहीं है। फिर भी, अनेक देशों में, जहाँ समाजवाद और संसदीय लोकतंत्र के विरुद्ध कुछ तत्व सक्रीय  थे, यह आदर्श के रूप में ग्रहण किया गया। इंग्लैंड में "ब्रिटिश यूनयन आव फ़ासिस्ट्स" और फ्रांस में "एक्शन फ्रांकाइसे" द्वारा इसकी नीतियों का अनुकरण किया गया। जर्मनी (नात्सी) , स्पेन (फैलंगैलिज़्म) और दक्षिण अमरीका में इसके सफल प्रयोग हुए। हिटलर तो फ़ासिज्म का कृता ही था। नात्सीवाद के अभ्युदय के पूर्व स्पेन के रिवेरा और आस्ट्रिया के डालफ़स को मुसोलिनी का पूरा सहयोग प्राप्त था। सितंबर, 1937 में "बर्लिन-रोम-धुरी" बनने के बाद जर्मनी ने फ़ासिस्टवादी आंदोलन की गति को बहुत तेज किया। लेकिन 1940 के बाद अफ्रीका, रूस और बाल्कन राज्यों में इटली की लगातार सैनिक पराजय ने फ़ासिस्टवादी राजनीति का पतन  कर दिया। जुलाई, 1943 का सिसली पर ऐंग्लो-अमरीकी-आक्रमण फ़ासिस्टवाद पर अंतिम और अंतकारी प्रहार था।

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