शनिवार, 29 जनवरी 2011

गांधीजी को बचाया जा सकता था ....

- अरविन्द सीसोदिया 
भारत की जिस महान आत्मा ने स्वतंत्रता के  महान संघर्ष का नेत्रत्व किया उसका नाम मोहनदास  करमचंद  गांधी था ! इस महान व्यक्तित्व नें रघुपति राघव राजा राम से लेकर हे राम तक के सफ़र में हमेशा हिन्दू मूल्यों को जिया और उनके महान असर से विश्व को परचित  करवाया ..! राष्ट्रपिता महात्मा  गांधी  की हत्या एक ऐसा सन्दर्भ  है जो कई प्रश्न खड़े करता है ??  उनकी सुरक्षा में कौताही क्यों बरती गई ????? यह बात स्वीकार नहीं की जा सकती  की गांधी जी ने यह नहीं करने दिया या वह नहीं करने दिया !! जिस दिन देश का गृह मंत्री कुशलक्षेम पूछ कर जाये , उसके कुछ घंटों में ही उसकी हत्या हो जाये ? यह एक एतिहासिक प्रश्न है !!
गांधी वध के मूलमें ....
* गांधी जी विभाजन के पक्ष में नहीं थे मगर उनके  करीबी सहयोगियों ने बंटवारे को एक सर्वोत्तम उपाय के रूप में स्वीकार इसलिए कर लिया था की उनके हाथ में सत्ता आनीं तय था ! नेहरु व सरदार पटेल ने गांधी जी को समझाने का प्रयास किया कि नागरिक अशांति वाले युद्ध और आराजकता को रोकने का यही एक उपाय है। मज़बूर गांधी ने अपनी अनुमति दे दी। 
* १९४७ के (Indo-Pakistani War of 1947) भारत-पाकिस्तान युद्ध प्रारंभ होने के कारण , जब भारत सरकार ने पाकिस्तान को, विभाजन परिषद द्वारा तय समझौते के अनुसार ५५ (Rs.) करोड़ रू.(crore) न देने का निर्णय लिया। इसका कारण था कि पाकिस्तान इस धन का उपयोग भारत के खिलाफ़ हथियार खरीदनें और जंग जारी रखनें में कर सकता है।(उसनें किया भी ) मगर तब गांधी जी नें इस निर्णय के विरुद्ध दिल्ली में अपना  आमरण अनशन आरंभ किया जिसमें दो मांगें रखी गईं - १. साम्प्रदायिक हिंसा को सभी के लिए तत्काल समाप्त करने और २. पाकिस्तान को 55 करोड़ रू. का भुगतान किया जाये। गांधी जी को डर था कि पाकिस्तान का भारत के प्रति  गुस्सा और बढ़ जाएगा तथा सारी सीमा पर हिंसा फैल जाएगी। उन्हें आगे भी डर था कि हिंदु और मुस्लिम अपनी शत्रुता को फिर से नया कर देंगे और उससे नागरिक युद्ध हो जाने की आशंका बन सकती है। जीवन भर गांधी जी  का साथ देने वाले सहयोगियों के साथ भावुक बहस, के बाद गांधी जी ने उनकी बात मानने से इंकार कर दिया और फिर सरकार को अपनी नीति से पीछे हटाना पड़ा तथा पाकिस्तान को ५५ करोड़ की राशी का भुगतान कर दिया गया । 
       इस अनशन  का असर न केवल सरकार पर विपरीत पड़ा बल्कि इससे सम्पूर्ण राष्ट्र में भी गहरी आलोचना हुई! कुछ जलूस भी निकले जिनमें कहा गया कि गांधी मरता है तो मरनें दो .., उस समय जम्मू-कश्मीर का विवाद चरम पर था पाकिस्तान उसे हर हालत में पाना चाहता था ! उसनें युध्य छेड़ रखा था , दुर्भाग्यवश उसी दौरान महात्मा गांधी भी पाकिस्तान यात्रा पर जाना चाहते थे .., उनकी एक सचिव पाकिस्तान प्रवास का कार्यक्रम भी बना रहीं थी ..! इस बात नें भी आग में घी का काम किया ...!! सरदार पटेल तो इस बात से बहुत ही ज्यादा नाराज थे !वे दिल्ली छोड़ कर मुम्बई चले गये थे और मंत्री मण्डल छोडनें का मानस बना रहे थे ! 
***** 
         ३० जनवरी, १९४८, नई दिल्ली (New Delhi).के बिड़ला भवन (बिरला हाउस Birla House) प्राथना सभा के दौरान ,  गांधी जी की  गोली मारकर हत्या कर दी गई । गांधी जी की हत्या  का दोषी  नाथूराम गौड़से (Nathuram Godse) पूना के अग्रणी और हिन्दू राष्ट्र नामक अख़बारों के संपादक और  पत्रकार, राष्ट्र के ताजा हालातों का जानकार  और प्रवुध  व्यक्ति था |  वह गांधी जी द्वारा  पाकिस्तान को ५५ करोड़ रूपये के भुगतान  करने के मुद्दे को लेकर बहुत ज्यादा आक्रोशित था और उसनें इस घटना को भारत को कमजोर बनाने के लिए जिम्मेदार ठहराया था। मुझे लगता है कि कहीं न कहीं गांधी जी कि प्रस्तावित  पाकिस्तान यात्रा की चल रहीं तैय्यारियाँ भी देश को नए खतरे की आवाज दे रहीं थीं .., शायद डर यह था कि  अभी तो पाकिस्तान को ५५ करोड़ दिलाये हैं और पाकिस्तान में पहुच कर जम्मू- कश्मीर न दे आयें या जिद न करनें लगें ...!
पाकिस्तान   यात्रा 
गांधी जी पाकिस्तान को ५५ करोड़ दिलवानें के बाद पाकिस्तान शांति यात्रा कि पूर्व तैयारियों में मग्न थे, २६ जनवरी को उनकी परम शिष्या डा. सुशीला नैयर को पाकिस्तान में जाकर तीन दिन में ही सब प्रबंध कर  लौटनें के निर्देश गांधी जी दे चुके थे , वे पाकिस्तान जा भी चुकीं थीं ! उनकी   योजना में अमृतसर से क्वेटा और पेशावर तक की पद यात्रा का चित्र था ! 
गांधी जी की हत्या से १० दिन  पूर्व हत्या का प्रथम प्रयत्न .....
- गांधी जी  की हत्या के षड्यंत्र में जो लोग थे वे सभी राष्ट्र भक्त थे , भारत माता के हितों के लिए चिंतित थे ,  उनके नाम निम्न प्रकार से हैं १- नाथूराम गौड़से , २- नारायण आप्टे,३- विष्णु करकरे ,४- गोपाल गौडसे ,५- मदनलाल पाहवा और  ६- दिगंबर बडगे  
- इनमें से कुछ १७  जनवरी को  और शेष १९ जनवरी को दिल्ली पहुच गये ,ये पहला प्रयास २० जनवरी को करते हैं , जिसमें एक बम गांधी जी पर फेंका जाता है योजनानुसार कार्य पूरा नहीं हो पाता , गांधी जी बच जाते हैं मगर बम फेंकने वाला मदनलाल पाहवा पकड़ा जाता है , गांधी जी की हत्या के प्रयास का पूरा राज खुल जाता है किन्तु अन्य घटना स्थल से फरार होने में कामयाव होते हैं ...!!!
गांधीजी को बचाया जा सकता था ....
जब गांधी जी की हत्या का पहला प्रयत्न हुआ तो तत्कालीन जवाहरलाल नेहरु सरकार को यह पता चल गया था की गांधी जी की जान खतरे में है ! गांधीजी जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ती की सुरक्षा में चूक क्यों रखी गई की मात्र १० दिन के अंतर से यानी कि ३० जनवरी को हत्यारे आये हत्या करदी !!!!!!!!!  सबसे बड़ी बात यह है कि देश के गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल गांधी जी से मिल कर गये और उसके कुछ ही घंटों बाद गांधी वध हो गया !                          मेरा मानना है कि जब १० दिन पूर्व सब कुछ खुल चुका था तो गांधी को नहीं बचा पाने बाले क्यों अपराधी नहीं हैं....????? तत्कालीन केंद्र सरकार जिस पर दिल्ली कि सुरक्षा का भार था, क्या उसकी शिथिलता  पर विचार हुआ!!! नहीं हुआ तो क्यों ????? गांधी जी को मारने वालों में निसंदेह संकल्प शक्ती थी वे भारत माता के हित में अपने प्राण उत्सर्ग कर देश हित करना चाहते थे , मगर इसी तरह की संकल्प शक्ती बचानें वालों में भी होती तो गांधी जी का बाल भी बांका नहीं होता ...!!!!
३० जनवरी, १९४८, सांय ५ बाज कर १७ मिनिट - गांधीवध 
पहला प्रयत्न विफल होनें पर इन लोगों नें हार नहीं मानी और नये सिरे से नई रणनीति से पुनः काम शिरू किया और ३० जनवरी को गांधी जी कि हत्या करदी ! नाथूराम गोड़से (पूना के अग्रणी और हिन्दू राष्ट्र नामक अख़बारों के संपादक )और उसके उनके सहयोगियों  नारायण आप्टे (Narayan Apte पूना के अग्रणी और हिन्दू राष्ट्र नामक अख़बारों के प्रबधक ) को बाद में केस चलाकर सजा दी गई तथा १५ नवंबर१९४९ को इन्हें फांसी दे दी गई। ) शेष दोषी गोपाल गोड़से ,  विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, डाक्टर दात्रात्रे परचुरे और शंकर किस्तेय्या को आजीवन कारावास कि सजा दी गई ! दिगंबर बडगे को सरकारी गवाह बन जानें से माफ़ कर दिया गया ! उच्च न्यायलय ने अपील  में  डाक्टर दात्रात्रे परचुरे और शंकर किस्तेय्या को दोष मुक्त कर दिया था ! 
 हे राम 
राजधाट (Rāj Ghāt), नई दिल्ली (New Delhi), में गांधी जी के स्मारक ( या समाधि पर "देवनागरी:में हे राम " लिखा हुआ है। क्यों की गोली लगते ही गांधी जी के मुह से हे राम शब्द निकला था  ! 

भगवद गीता के उपदेशों का ऋणी हूँ-गाँधी


- अरविन्द सीसोदिया 
महात्मा गाँधी का जन्म हिंदू धर्म में हुआ, उनके पूरे  जीवन में अधिकतर सिधान्तों की उत्पति हिंदुत्व से ही हुई ,  साधारण हिंदू कि तरह वे सारे धर्मों को समान रूप से आदर करते  थे और सारे प्रयासों जो उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए कोशिश किए जा रहे थे उसे उन्होंने अस्वीकार किया. वे ब्रह्मज्ञान के जानकार थे और सभी प्रमुख धर्मो को विस्तार से पढ़तें थे. उन्होंने हिंदू धर्म के बारे में  कहा है.हिंदू धर्म के बारें में जितना मैं जानता हूँ यह मेरी आत्मा को संतुष्ट करता है |  और सारी कमियों को दूर  करता   है जब मुझे संदेह घेर लेता  है, जब निराशा मुझे घूरने लगती है और जब मुझे आशा की कोई किरण नजर नही आती है, तब मैं भगवद् गीता को पढ़ लेता हूँ और तब मेरे मन को असीम शान्ति मिलती है और तुंरत ही मेरे चेहरे से निराशा के बादल छंट जातें हैं और मैं खुश हो जाता हूँ.मेरा पुरा जीवन त्रासदियों से भरा है और यदि वो दृश्यात्मक और अमिट प्रभाव मुझ पर नही छोड़ता, मैं इसके लिए भगवद गीता के उपदेशों का ऋणी हूँ.

गाँधी ने भगवद गीता की व्याख्या गुजराती में भी की है.महादेव देसाई ने गुजराती पाण्डुलिपि का अतिरिक्त भूमिका तथा विवरण के साथ अंग्रेजी में अनुवाद किया है गाँधी के द्वारा लिखे गए प्राक्कथन के साथ इसका प्रकाशन १९४६ में हुआ था .[१][२]
१.  महादेव देसाईअनाशक्तियोग : द गोस्पेल ऑफ़ सेल्फ्लेस एक्सन, या द गीता अकोर्डिंग टू  गाँधी .नवजीवन प्रकाशन घर; अहमदाबाद (प्रथम संस्करण १९४६).अन्य संस्करण; १९४८, १९५१, १९५६.
२. देसाई की अतिरिक्त कमेन्ट्री के एक बड़े भागी को काटने के बाद एक छोटा संस्करण अनाशक्तियोग : द गोस्पेल ऑफ़ सेल्फ्लेस एक्सन के रूप में प्रकाशित किया गया। जिम रंकिन,सम्पादक. लेखक एम् के की सूचि में आते हैं गाँधी; अनुवादक महादेव देसाई (ड्राई बोनस प्रेस, सन फ्रांसिस्को, १९९८) ISBN १ - ८८३९३८ - ४७ ३

गांधी जी ने गिनाए , सात सामाजिक पाप



- अरविन्द सीसोदिया
वर्तमान भारतीय राजनीति का मूल स्त्रोत स्वतंत्रता के आन्दोलन के दौरान उपजा कांग्रेस नामक दल ही बना जो आज तमाम सिद्धांतों  और नैतिकताओं को छोड़ चुका है और उसी के प्रभाव से भारत की तमाम राजनीति भी दूषित हुई..! सामाजिक न्याय के रास्ते में जो अनैतिक्तायें आती हैं , उन्हें गांधीजी ने सात सामाजिक पाप के नाम से समय रहते गिनाया था !  वे जो आज भी प्रासंगिक हैं जिनकी आज भी उपयोगिता है ..! नीचे उन्हें दिया जा रहा है ..! महात्मा गांधी ही पुन्य तिथि पर इनका अनुशरण भारतीय राजनीति करे तो यह बापू को सबसे बड़ी श्रधांजलि होगी ! 
मोहनदास करमचंद गांधी (2 अक्तूबर 1869 - 30 जनवरी1948) भारत एवं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे।सत्‍य के मूल्‍यों की सार्थकता और अहिंसा को महात्‍मा गांधी द्वारा दशकों पहले आरंभ किया गया और ये मान्‍यताएं आज भी सत्‍य हैं। विभिन्‍न संस्‍कृतियों और धर्मों के आदर से हम एक दूसरे की बात सुनें, आपस में बोलें और सभी की प्रशंसा करें। एक अनोखी लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था वह है जहां प्रत्‍येक के लिए चिंता, प्रमुख रूप से निर्धनों, महिलाओं और वंचित वर्ग के समूहों, को आदर  पूर्वक  संबोधित किया जाए। 
सत्‍याग्रह और अहिंसा की विचारधारा को वैश्विक समुदाय में भी उच्‍च प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त है, इसलिए संयुक्‍त राष्‍ट्र में गांधी जी के जन्‍म दिवस, 2 अक्‍तूबर को 'अंतरराष्‍ट्रीय अहिंसा दिवस' के रूप में अपनाया है। इससे पता लगता है कि हमारे राष्‍ट्र पिता का यह संदेश समय की सीमाओं से परे आने वाले लंबे समय तक अनेक संस्‍कृतियों में मान्‍यता पाता रहेगा।महात्‍मा गांधी ने लोगों की स्थिति में सुधार लाने के लिए सत्‍याग्रह का उपयोग किया और वे इन क्षेत्रों में सामाजिक न्‍याय लाने के लिए निरंतर कार्य करते रहे जैसे सार्वत्रिक शिक्षा, महिलाओं के अधिकार, साम्‍प्रदायिक सौहार्द, निर्धनता का उन्‍मूलन, खादी के उपयोग को प्रोत्‍साहन आदि। 
गांधी जी ने सात सामाजिक पाप गिनाए, जो इस प्रकार हैं :
१- सिद्धांतों के बिना राजनीति
२- परिश्रम के बिना संपत्ति
३- अंतरात्‍मा के बिना आनंद
४- चरित्र के बिना ज्ञान
५- नैतिकता के बिना वाणिज्‍य
६- मानवता के बिना विज्ञान
७- त्‍याग के बिना पूजा

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

इटालियन सेक्स स्केंडल

- अरविन्द सीसोदिया 


अय्याशी की कहानी बताकर रो पड़ी बार डांसर
इटली के प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी का सेक्स स्कैंडल में नाम आने के बाद इटली की रजनीति में बवाल उठ खड़ा हुआ है। मोरक्को की रहने वाली रूबी का नाम भी बर्लुस्कोनी से संबंध बनाने में आया। मोरक्को की रहने वाली रूबी ने एक टेलीविजन शो में अपना पूरा दर्द बयान किया। अभी इस पूरे मामले में जांच की जा रही है कि क्या रूबी को बर्लुस्कोनी ने सेक्स संबंधों के लिए रकम चुकाई थी। आरोप है कि जिस वक्त बर्लुस्कोनी ने रूबी के साथ संबंध बनाया उस वक्त रूबी की उम्र महज 17 साल की थी जो कि इटली में अपराध की श्रेणी में आता है |



इटली के प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी के साथ एक मॉडल ने सेक्स करने की बात मानी है.
इटली के प्रधानमंत्री सिल्विया बर्लुस्कोनी को लेकर चल रहा सेक्स स्कैंडल का मामला ठंडा पड़ने का नाम नहीं ले रहा है. इस मामले में एक लड़की ने कहा है कि उसने बर्लुस्कोनी के साथ सेक्स किया था. 
टेलीग्राफ ने इटली की मीडिया की रिपोटरें के हवाले से लिखा है कि डोमिनिकन रिपब्लिक निवासी मारिया इस्टर गार्सिया पोलांको नामक इस 25 वर्षीय मॉडल ने प्रधानमंत्री के साथ सेक्स करने की बात स्वीकारी है . हालांकि उसने इस बात से इंकार कर दिया है कि उसने बर्लुस्कोनी के साथ सेक्स पैसे के लिए किया था. मारिया ने कहा कि बर्लुस्कोनी ने उसकी पांच वर्षीय बेटी के तत्काल ईलाज के लिए सहायता मुहैया कराई थी इसलिए उसने यह कृतज्ञता के रूप में किया. मारिया के अनुसार बर्लुस्कोनी से उसे टेलीविजन शो गर्ल के रूप में काम दिलवाने में भी काफी मदद की थी.


पेरिस, (एजेंसी)... बर्लुस्कोनी ने पैसे दिए और मैंने सेक्स कर लिया... जी हां मोरक्को की एक युवा मॉडल का यही कहना है.... मॉडल ने खुलासा किया है कि उसने बर्लुस्कोनी के साथ पैसों और तोहफे के बदले सेक्स किया। इटलेलियन मीडिया की खबरों के मुताबिक रूबी नाम की इस अवैध आप्रवासी लड़की ने दावा किया है कि उसने प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी के साथ उनके घर पर अपनी मर्जी से सेक्स किया। जांचकर्ताओं ने लड़की के दावों पर फाइल तो तैयार कर ली है लेकिन जांच शुरु नहीं की है। जांचकर्ताओं का कहना है कि फिलहाल बर्लुस्कोनी के खिलाफ कोई जांच नहीं की जा रही है। लड़की के दावों की पुष्टि करने के प्रयास किए जा रहे हैं। बर्लुस्कोनी के भाई के अखबार ने इस मामले में लिखा है कि यह बर्लुस्कोनी को फंसाने के लिए एक और सेक्स स्कैंडल हो सकता है। अखबार लिख सकता है कि यह मामला भी पिछले साल एक वेश्या डी एडारियो के दावे जैसा ही हो सकता है। डी एडारियो नाम की एक वेश्या ने दावा किया था कि बर्लुस्कोनी ने अपने आवास पर उसके साथ सेक्स किया था। मामले की जांच करे रहे मजिस्ट्रेट ने भी कहा है कि मोरक्को की मॉडल का दावा इटली के 74 वर्षीय प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी को ब्लैकमेल या बदनाम करने की साजिश भी हो सकता है। रूबी (18) का दावा है कि पिछले साल उसने प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी के आवास पर दी गई कई पार्टियों में शिरकत की और इस दौरान उसने बर्लुस्कोनी के साथ सेक्स भी किया। बर्लुस्कोनी ने इसके बदले उसे काफी पैसा और महंगे गिफ्ट्स दिए। रूबी उन युवतियों में से एक हैं जिनका परिचय इटली की सो बिजनेस एजेंट लीला मोरा ने प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी से करवाया था

लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया


- अरविन्द सीसोदिया 
 सीआरपीएफ ने लाल चौक पर फहराया तिरंगा श्रीनगर, 
 सीआरपीएफ ने बुधवार २६ जनवरी २०११  को यहां के एतिहासिक लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया। राजधानी के बेहद संवेदनशील इस इलाके में भाजपा ने तिरंगा फहराने की घोषणा की थी, जिसको मुख्यधारा की पार्टियों ने एक उत्तेजक कदम बताया था। सीआरपीएफ ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि उसके द्वारा लाल चौक के पैलेडियम पोस्ट पर सुबह 8:00 बजे राष्ट्रीय ध्वज फहराया , सीआरपीएफ के प्रवक्ता प्रभाकर त्रिपाठी ने तिरंगा फहराने की पुष्टि करते हुए कहा कि स्थानीय बटालियन के कमांडेंट ने पोस्ट पर राष्ट्रीय ध्वज 
फहराया है।
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तिरंगा यात्रा का कारण 
यह उठाना लाजिमी है कि भारतीय जनता पार्टी को 20 साल बाद लाल चैक पर तिरंगा फहराने की याद क्यों आयी। इसके जिम्मेदार भी उमर  अब्दुला ही है। भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी द्वारा 20 वर्ष पूर्व लाल चौक  पर तिरंगा फहराये जाने के बाद प्रतिवर्ष सुरक्षाबलों द्वारा राष्ट्रीय पर्वों   पर तिरंगा फहराया जाता था। गत स्वाधीनता दिवस पर उमर अब्दुला सरकार द्वारा लाल चौक  पर तिरंगा फहराये जाने का कोई कार्यक्रम नहीं किया गया। इस कारण भाजपा की युवा शाखा के द्वारा यह यात्रा दुबारा की गई..! देश का ध्यान आकर्षित करने का यह लोकतान्त्रिक तरीका जायज है !

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

तिरंगे से बड़ी सत्ता है कांग्रेस के लिए


- अरविन्द सीसोदिया
तिरंगा जम्मू - कश्मीर में पहलीबार फहराने की बात हो रही हो यह नहीं है ,पहले भी कई वार और लगातार हर साल वहां तिरंगा फहराया जाता रहा है ! तिरंगे में आग भी लगाई जाती रही है , आग लगाने वालों पर कोई कार्यवाही नहीं होती क्यों की तिरंगे के अपमान के विरुद्ध दंड देने वाला कानून जम्मू और कश्मीर में लागू नहीं होता !  मगर कांग्रेस के समर्थन पर टिकी सरकार तिरंगा फहराने से मना कर रही है यह आश्चर्य है ..! और उससे बड़ा आश्चर्य कांग्रेस के द्वारा तिरंगा फहरानें से रोकने वालों की होंसला अफजाई है ..! कांग्रेस  सत्ता के लिए इतनी गिर सकती है यह सोचा भी नहीं जा सकता ...!
दूसरी बात यह है की भाजपा की जम्मू के लाल चौक पर तिरंगा फहराने की कोशिस राजनीति से प्रेरित है तो आप तिरंगा फहरा कर उसके राजनैतिक एजेंन्ड़े को फेल करदो या हथिया लो ..! देश में राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान भी कांग्रेस की कायरता का शिकार होता है तो यह स्थिति दुर्भाग्य  पूर्ण ही होगी!! उसकी  तमाम   विफलताओं  में  गिनती  बड़ाने  वालीं  होगी !   
'राष्ट्रीय एकता यात्रा'जम्मू एवं कश्मीर की सीमा में प्रवेश   
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की 'राष्ट्रीय एकता यात्रा' २५ जनवरी २०११ मंगलवार शाम को 300 से अधिक कार्यकर्ताओं के साथ जम्मू एवं कश्मीर की सीमा में प्रवेश कर गई.
           प्रवेश करने के कुछ ही समय बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं अरुण जेटली और सुषमा स्वराज सहित अन्य नेताओं व कार्यकर्ताओं को आदेशों का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. पंजाब की तरफ से रावी नदी पर बने पुल को पार करने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपनी खुशी का इजहार विजय चिन्ह बनाकर किया. कार्यकर्ताओं ने घोषणा की कि अपने वादे के अनुसार वे जम्मू एवं कश्मीर में प्रवेश कर चुके हैं.गिरफ्तार होने से पहले सुषमा स्वराज ने कहा, "हम यहां जम्मू एवं कश्मीर में हैं, कल तक हमें राज्य से बाहर रोके रखने के लिए सरकार ने जिन फासीवादी प्रवृत्तियों का प्रदर्शन किया, उसका यह करारा जवाब है."
* प्रशिध्द ब्लोगर सुरेश चिपलूनकर ने कहा है ....
(१) इससे राज्य में “कानून-व्यवस्था”(?) की स्थिति खराब होगी… (मानो पिछले 60 साल से वहाँ रामराज्य ही हो)
(२ ) लोगों की भावनाएं(?) आहत होंगी… (लोगों की, यानी गिलानी-मलिक और अरूंधती जैसे “भाड़े के टट्टुओं” की)
(३ ) तिरंगे का राजनैतिक फ़ायदा न उठाएं… (क्योंकि तिरंगे का राजनैतिक फ़ायदा लेने का कॉपीराइट सिर्फ़ कांग्रेस ने ले रखा है)
* कानून की तेजतरार शख्शियत सुब्रह्मण्यम स्वामी ने  कहा..... 
 नई दिल्ली | जनता पार्टी प्रमुख सुब्रह्मण्यम स्वामी ने केंद्र को श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने के वास्ते दायित्व बाध्य करार देते हुए रविवार को कहा कि यदि राज्य सरकार वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराने में सहयोग करने में विफल रहती है तो जम्मू कश्मीर में केंद्र शासन लगा दिया जाना चाहिए। स्वामी ने यहां जारी एक बयान में कहा, संविधान में उल्लेखित नियमों के पालन के तहत संप्रग सरकार का यह दायित्व है कि वह लाल चौक पर आधिकारिक रूप से तिरंगा फहराए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति (सीसीपीए) ने वर्ष 1991 में जनवरी के पहले सप्ताह में इस संबंध में एक प्रस्ताव मंजूर किया था। उस समय चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे और वह केंद्रीय कानून, न्याय एवं वाणिज्य मंत्री थे। उन्होंने कहा, वरिष्ठ मंत्री एवं सीसीपीए का सदस्य होने के नाते मैंने यह मुद्दा सीसीपीए में उठाया था क्योंकि वीपी सिंह सरकार ने इस मामले पर विचार करने के बाद वर्ष 1990 में लाल चौक पर झंडा फहराने की परंपरा पर रोक लगाने का फैसला किया क्योंकि इससे राज्य की जनता की भावनाओं को ठेस पहंुच सकती थी। स्वामी ने कहा, चंद्रशेखर सेवा प्रमुख , गुप्तचर प्रमुखों और कैबिनेट सचिव से बात करने के बाद मुझसे सहमत हुए और निर्देश दिया कि सरकार झंडा फहराए और यदि कोई समस्या खड़ी होती है तो सेना सुरक्षा मुहैया कराए। राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला ने बाद में इससे सहमति जताने के साथ ही 26 जनवरी 1991 को तिरंगा झंडा फहराए जाने के दौरान शांति व्यवस्था सुनिश्चित करने में सहयोग प्रदान किया। उन्होंने कहा कि लाल चौक को कोई बाजार क्षेत्र नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक स्थान है जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री भी स्वीकार कर चुके हैं इसलिए वह मांग करते हैं कि 26 जनवरी को वहां पर तिरंगा फहराया जाए। यदि राज्य सरकार सहयोग नहीं करती है तो राज्य में केंद्र शासन घोषित करके शासन व्यवस्था सेना को सौंप दिया जाए।
* जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट प्रमुख मोहम्मद यासीन मलिक ने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि पार्टी को श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा नहीं फहराने दिया जाएगा.पूर्व आतंकी मालिक ने ललकारते हुए कहा, ‘मैं भाजपाइयों को चुनौती देता हूं कि वे लालचौक में घंटाघर पर तिरंगा फहराकर दिखाएं. हम उन्हें यहां बताएंगे कि झंडा कैसे फहराया जाता है और कौन फहरा सकता है.’
* उमर अब्दुल्ला से एक सवाल करना चाहते हैं कि उन्होंने क्या जम्मू कश्मीर के लिए कोई अलग राष्ट्रीय झंडा निर्धारित कर रखा है? अगर ऐसा नहीं, तो राष्ट्रीय झंडा क्यों नहीं फहराया जा सकता?
     जिस तिरंगे को फहराने के लिए बड़े-बड़े राष्ट्रीय आयोजन किए जाते हैं. पूरे देश की जनता आयोजन को एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाती है. जिस तिरंगे पर गांधी से लेकर गांव के अंतिम व्यक्ति को भी नाज़ है. उसे फहराने के लिए उन्माद भड़कने जैसी क्या बात? रह गयी बात राज्य के अलगाववादी नेताओं की, तो उसपर मुख्यमंत्री का अंकुश तो होना ही चाहिए, यदि ऐसा नहीं तो राज्य की जेलें क्या देशभक्तों के लिए बनी हैं? अगर यह भी नहीं कर सकते तो मैं कहूंगा कि या तो उनकी देशभक्ति पर सीधा सवाल है या उनके पद की काबिलियत पर? durbhagy 

सोमवार, 24 जनवरी 2011

श्रीनगर में तिरंगा : शर्म आती है इस प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार पर

- अरविन्द सीसोदिया 
     अपने देश में अपना झंडा फहरानें के विरोध में देश की केंद्र सरकार सक्रीय हो यह भारत के अलावा कहीं भी देखनें में नहीं आसकता..., यह देश की इस कमजोर और कायर सरकार की असलियत के उजागर होने का भी अवसर है.....! जम्मू और कश्मीर तथा तिब्बत के मामलें में देश के साथ धोका और विश्वास घात की इबारत  कांग्रेस और उसके नेहरु वंश के ही नाम दर्ज है ! ये ही वे लोग हैं जिन्होनें ये नासूर बोये और बड़े किये ..! अब तो  इनकी असलियत ही प्रश्न चिन्हित है ? ये देश के हैं देश विरोधी सत्ता स्वार्थी हैं !!
एक खबर है -----
26 जनवरी २०११  को श्रीनगर के लाल चौक पर भाजपा कि युवा शाखा के द्वारा राष्‍ट्रीय झंडा फहराने का मामला राष्‍ट्रीय स्‍तर पर तूल पकड़ चुका है। २४ जनवरी २०११ सोमवार को जम्‍मू पहुंचे भाजपा के आला नेताओं को एयरपोर्ट से नहीं निकलने दिया जा रहा है। भाजपा की सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और अनंत कुमार जम्मू एयरपोर्ट पर ही धरने पर बैठ गए। चूंकि एयरपोर्ट का क्षेत्र केंद्र सरकार के अधीन है और जैसे ही ये नेता एयरपोर्ट से बाहर निकलकर जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य के क्षेत्र में पहुंचेंगे, इन्‍हें गिरफ्तार किया जा सकता है क्‍योंकि शहर में निषेधाज्ञा लागू है। वहीं, एयरपोर्ट के बाहर जमा हंगामे पर आमादा करीब 100 भाजपा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है। इनमें पूर्व प्रदेश अध्‍यक्ष अशोक खजूरिया और महिला मोर्चा की नेता पूनम महाजन भी शामिल हैं। शहर में भी भाजपा कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए हैं और नारेबाजी कर रहे हैं। जम्मू से श्रीनगर के बीच मंगलवार को यातायात ठप रहेगा। राज्‍य में पंजाब से घुसते समय पड़ने वाले सबसे पहले प्‍वाइंट लखनपुर में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई है।
        भाजयुमो के राष्ट्रीय अध्यक्ष व सांसद अनुराग ठाकुर ने ऐलान किया है कि लाल चौक पर ध्वजारोहण का विरोध करने वाली कांग्रेस को लाल किले की प्राचीर पर झंडा फहराने का कोई अधिकार नहीं है। उन्‍होंने कहा, 'अब चाहे जान चली जाए, कोलकाता से शुरू हुई राष्ट्रीय एकता यात्रा नहीं रुकेगी। यात्रा का विरोध करने वाले अलगाववादियों के सामने केंद्र सरकार ने भले ही घुटने टेक दिए हों, देश के युवा अपने फैसले पर अडिग हैं।' लेकिन भाजपा की सहयोगी पार्टी जद(यू) ने इसे गलत बताया है और कहा है कि पार्टी को यात्रा रोक देनी चाहिए।
         जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा के लिए उच्च स्तरीय बैठक बुलाई है। वहीं, राज्य के कैबिनेट मंत्री आरएस चिब ने कहा है कि सरकार यात्रा को रोकने और उससे निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार है।  कांग्रेसी नेता ने कहा है कि उनकी पार्टी इस तरह की चुनौती के लिए तैयार है। चिब ने पंजाब सरकार से कहा है कि वह जम्मू-कश्मीर की हुकूमत को सलाह न दें।
       * राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य राम माधव ने कहा, 'कश्मीर में पुलिस पर पत्थर फेंकने वालों को यह कह कर इनाम दिया जाता है कि वे बेरोजगार युवा है। लेकिन तिरंगा फहराने के लिए कहा जाता है कि इससे शांति भंग हो जाएगी। आखिर इससे कैसे शांति भंग होगी?'
       प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा जम्मू-कश्मीर सरकार ने अलगाववादियों के सामने समर्पण कर दिया है। सरकार जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया और आशंका जाहिर कर रही है। इससे पहले, प्रधानमंत्री तथा राज्य सरकार ने भाजपा की 26 जनवरी को श्रीनगर के लाल चौक में तिरंगा फहराने की योजना पर सख्त एतराज जताया था।प्रधानमंत्री के  बयान पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि भाजपा युवा मोर्चा राजनीतिक लाभ उठाने के बजाय अलगाववादियों की चुनौती से निपटने के लिए यह कोशिश कर रहा है। सरकार अलगाववादियों के सामने समर्पण कर रही है। आडवाणी ने कार्यकर्ताओं के खिलाफ जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों की भी कड़ी आलोचना की। प्रधानमंत्री ने भाजपा का नाम लिए बगैर कहा था कि गणतंत्र दिवस जैसे मौके पर पार्टियों को विभाजनकारी एजेंडे को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। उन्हें राजनीतिक फायदा उठाने से बचना चाहिए।
-- यह सारा मामला है जम्मू - कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में तिरंगा झंडा फहरानें से रोकने के लिए !

रविवार, 23 जनवरी 2011

किन किन भारतीय नेताओं ने सुभाष बाबू को सोंपनें का सौदा किया था



- अरविन्द सीसोदिया
२३ जनवरी १८९७ में , आज के ही दिन जन्में थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस , जिन्होनें भारत कि स्वतंत्रता के लिए अदम्य  सहास  का प्रदर्शन करते हुए अपना जीवन भारत माता के चरणो में समर्पित कर दिया ! उनके सहास और बलिदान का मूल्यांकन यह है कि आज भी देश उन्हें जीवित देखना चाहता है और मानता है कि वे जीवित होते तथा भारत में होते तो देश विभाजित नहीं होता ...! अंग्रेजों की द्रष्टि में सुभाष भी सावरकर की ही तरह मानसिक रूप से घोर ब्रिटिश विरोधी थे ,तत्कालीन  ब्रिटिश प्रधान मंत्री एटली ने  ब्रिटिश संसद में घोषणा की थी कि भारतीय नेताओं से उनका समझौता हो गया  है सुभाष जैसे ही पकड़ में आयेंगे वे उन्हें ब्रिटेन को युद्ध अपराधी के रूप में सोंप देंग | उस समय भारतीय  नेता तो जवाहर लाल नेहरु ही थे ! आज यह जरुरी है कि यह भी जांच हो कि किन किन भारतीय नेताओं ने सुभाष  बाबू को सोंपनें का सौदा किया था !
- इस समझोते का अर्थ यह है कि नेताजी सुभाष की हवाई दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी ! 
भारत की पहली सरकार ....
 - पूर्व एशिया पहुँचकर सुभाषबाबू ने सर्वप्रथम, वयोवृद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस से भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सँभाला। सिंगापुर के फरेर पार्क में रासबिहारी बोस ने भारतीय स्वतंत्रता परिषद का नेतृत्व सुभाषबाबू को सौंप दिया।

जापान के प्रधानमंत्री जनरल हिदेकी तोजो ने, नेताजी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर, उन्हे सहकार्य करने का आश्वासन दिया। कई दिन पश्चात, नेताजी ने जापान की संसद डायट के सामने भाषण किया।
21 अक्तूबर, 1943 के दिन, नेताजी ने सिंगापुर में अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद (स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार) की स्थापना की। वे खुद इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और युद्धमंत्री बने। इस सरकार को कुल नौ देशों ने मान्यता दी। नेताजी आज़ाद हिन्द फौज के प्रधान सेनापति भी बन गए।
आज़ाद हिन्द फौज में जापानी सेना ने अंग्रेजों की फौज से पकडे हुए भारतीय युद्धबंदियोंको भर्ती किया गया। आज़ाद हिन्द फ़ौज में औरतो के लिए झाँसी की रानी रेजिमेंट भी बनायी गयी।
पूर्व एशिया में नेताजी ने अनेक भाषण करके वहाँ स्थायिक भारतीय लोगों से आज़ाद हिन्द फौज में भरती होने का और उसे आर्थिक मदद करने का आवाहन किया। उन्होने अपने आवाहन में संदेश दिया तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फौज ने जापानी सेना के सहयोग से भारत पर आक्रमण किया। अपनी फौज को प्रेरित करने के लिए नेताजी ने चलो दिल्ली का नारा दिया। दोनो फौजो ने अंग्रेजों से अंदमान और निकोबार द्वीप जीत लिए। यह द्वीप अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद के अनुशासन में रहें। नेताजी ने इन द्वीपों का शहीद और स्वराज द्वीप ऐसा नामकरण किया। दोनो फौजो ने मिलकर इंफाल और कोहिमा पर आक्रमण किया। लेकिन बाद में अंग्रेजों का पगडा भारी पडा और दोनो फौजो को पिछे हटना पडा।
जब आज़ाद हिन्द फौज पिछे हट रही थी, तब जापानी सेना ने नेताजी के भाग जाने की व्यवस्था की। परंतु नेताजी ने झाँसी की रानी रेजिमेंट की लडकियों के साथ सैकडो मिल चलते जाना पसंद किया। इस प्रकार नेताजी ने सच्चे नेतृत्व का एक आदर्श ही बनाकर रखा।
6 जुलाई, 1944 को आजाद हिंद रेडिओ पर अपने भाषण के माध्यम से गाँधीजी से बात करते हुए, नेताजी ने जापान से सहायता लेने का अपना कारण और अर्जी-हुकुमत-ए-आजाद-हिंद तथा आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना के उद्येश्य के बारे में बताया। इस भाषण के दौरान, नेताजी ने गाँधीजी को राष्ट्रपिता बुलाकर अपनी जंग के लिए उनका आशिर्वाद माँगा । इस प्रकार, नेताजी ने गाँधीजी को सर्वप्रथम राष्ट्रपिता बुलाया।  

शनिवार, 22 जनवरी 2011

काले धन का महा कुम्भ : भारत



750 × 532 - ... जिनके नाम अकूत धन स्विस बैंकके खाते में ...
bhopalreporter.blogspot.com

भास्कर डाट कॉम पर ,२१ जनवरी २०११ को एक समाचार है - 
विदेशों में काली  कमाई जमा करने वालों की पहचान में जुटी सरकार   
कुछ अंश इस प्रकार से हैं ......
विदेशों में भारतीयों की खरबों रुपये की काली कमाई जमा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि  भारत सरकार चाहे तो स्विस बैंक में खरबों रुपयों का काला धन जमा करने वाले भारतीयों के नाम का खुलासा हो सकता है। पर सरकार ने इस दिशा में कभी सक्रियता नहीं दिखाई। सरकार ने अब जो मदद मांगी है, उसका भी कोई नतीजा निकलने की उम्‍मीद नहीं है, क्‍योंकि दोनों सरकारों के बीच इस तरह की मदद करने संबंधी कोई समझौता नहीं है।
टैक्स चोरी के मामलों पर निगाह रखने वाली संस्था टेक्स जस्टिस नेटवर्क के डायरेक्टर जॉन क्रिश्चियनसेन ने कहा है कि भारत का अरबों रुपया स्विस बैंक में जमा है और भारत यह रकम वापस ला सकता है। स्विटजरलैंड के वित्त विभाग ने भी भारत सरकार से कहा है कि यदि वे किसी व्यक्ति द्वारा कर चोरी के ठोस सबूत देती है और उसका किसी स्विस बैंक में एकाउंट हैं तो उसकी पूरी जानकारी भारत को दी जाएगी।
लेकिन सरकार गंभीर नहीं
लेकिन भारत सरकार इस मामले में फिलहाल कार्रवाई करने की असमर्थता जता रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बुधवार को स्विस बैंक में जमा धन को लेकर मजबूरी जताई थी। बुधवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने काले धन के मामले में केंद्र सरकार को तगड़ी लताड़ लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी कि सरकार विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के अरबों रुपए के धन की जानकारी देना नहीं चाहती। कोर्ट ने कहा कि यह केवल कर चोरी का मामला नहीं है बल्कि भारत की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। 
कितना भारतीय धन है जमा विदेशों के बैंकों में
ग्लोबल फाइनेंशियल इंटीग्रिटी स्टडी द्वारा कुछ समय पहले किए गए आंकलन के अनुसार केवल पिछले पांच सालों में  692,328 करोड़ रुपया विदेशी बैंकों में अवैध रूप से जमा किया गया है। कुल मिलाकर भारतीयों ने कम से कम 71 लाख करोड़ रुपया विदेशी बैंकों में जमा किया है। यह सारा पैसा केवल स्विस बैंक में ही जमा नहीं हुआ है। विश्व में ऐसे करीब 70 देश हैं, जहां काला धन जमा करने में दिक्कत नहीं हैं। इनमें से 40 देश तो काला धन जमा करने वालों को प्रोत्साहित करते हैं। स्विट्जरलैंड के अलावा जिन देशों में भारतीयों ने ज्यादा काला धन जमा किया है उनमें  लिचटेंस्टीन, लक्समबर्ग और चैनल आइलैंड प्रमुख हैं। 
इसी समाचार पर एक प्रतिक्रिया  
RAJESH
Hi,Our Indians' Money - 71, 00,000 Crores Rupees In Swiss Bank 
1) Yes, 71 lakhs crores rupees of India are lying in Switzerland banks. This is the highest amount lying outside any country, from amongst 180 countries of the world , as if India is the champion of Black Money .
2) Swiss Government has officially written to Indian Government that they are willing to inform the details of holders of 70 lakh crore rupees in their Banks, if Indian Government officially asks them. 
3) On 22-5-08 , this news has already been published in The Times of India and other Newspapers based on Swiss Government's official letter to Indian Government. 
4) But the Indian Government has not sent any official enquiry to Switzerland for details of money which has been sent outside India between 1947 to 2008.. The opposition party is also equally not interested in doing so because most of the amount is owned by politicians and it is every Indian's money. 
5) This money belongs to our country. From these funds we can repay 13 times of our country's foreign debt. The interest alone can take care of the Center s yearly budget. People need not pay any taxes and we can pay Rs. 1 lakh to each of 45 crore poor families. 
6) Let us imagine, if Swiss Bank is holding Rs. 70 lakh Crores, then how much money is lying in other 69 Banks? How much they have deprived the Indian people? Just think, if the Account holder dies, the bank becomes the owner of the funds in his account. 
7) Are these people totally ignorant about the philosophy of Karma? What will this ill-gotten wealth do to them and their families when they own/use such money, generated out of corruption and exploitation? 
8) Indian people have read and have known about these facts. But the helpless people have neither time nor inclination to do anything in the matter. This is like "a new freedom struggle" and we will have to fight this. 
9) This money is the result of our sweat and blood.. The wealth generated and earned after putting in lots of mental and physical efforts by Indian people must be brought back to our country. थैंक्स
अन्य सूचनाएं जो चोंका देंती हैं .....

स्विस बैंकों में सख्ती के बाद अब भारतीयों ने दुबई की ओर रुख कर लिया है।
संयुक्त अरब अमीरात के दो बड़े शहरों आबू धाबी और दुबई से खबरें आ रही हैं कि पिछले कुछ महीनों में वहां के बैंकों में बड़े पैमाने पर काला धन जमा किया गया ह। वहां के बैंकरों का कहना है कि यह पैसा भारत से ही आ रहा है।
30 अगस्त को भारत और स्विट्जरलैंड के बीच काले धन पर करार होने के बाद वहां बैंकों में पैसा डिपॉजिट कराने की होड़ सी लग गई है। अकेले अक्टूबर महीने में संयुक्त अरब अमीरात के बैंकों में 11 अरब डॉलर जमा किए गए। वहां अमूमन हर महीने 2.7 अरब डॉलर जमा होते हैं।
ऐसा समझा जा रहा है कि बेईमान भारतीय अपना पैसा स्विस बैंकों से निकालकर दुबई और आबूधाबी के बैंकों में जमा कर रहे हैं। भारत सरकार ने स्विटजरलैंड के अलावा बरमूडा की सरकार से भी काले धन के बारे में समझौता किया है।
दुबई के बैंकों में पैसा जमा कराना बेहद आसान है। इसके लिए वहां के फ्री ट्रेड जोन में एक कंपनी खोलनी होती है। इसमें स्थानीय लोगों के डायरेक्टर रखना होता है। इसके बाद फर्म के नाम किसी भी देश से यहां पैसा ट्रांसफर किया जा सकता है।
'ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल" ने भ्रष्ट देशों की हालिया सूची में भारत को 87वें स्थान पर रखा है।'अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो आप भ्रष्टाचार की समस्या से निपट सकते हैं। हमने अध्ययनों में पाया है कि दागी नेताओं को दल बेहिचक टिकट दे देते हैं।" पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने कहा था कि अगर वह सत्ता में आती है तो स्विस बैंकों में जमा काले धन को देश में वापस लाएगी। वहीं, कांग्रेस ने वादा किया था कि सरकार बनने के 100 दिन के भीतर वह भी इस दिशा में कदम उठाएगी। वादे तो हुए हैं लेकिन कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति इस दिशा में एक अवरोध है।
माल कितना ........ 
pankaj bedrdi

स्विस बैंक में सबसे ज्यादा पैसा इंडियंस का


स्पष्टीकरण : यह खबर नवभारत टाइम्स के प्रिंट एडिशन में 18.11.2010 को प्रकाशित हुई थी। इस खबर के प्रकाशित किए जाने के बाद हमें पता चला है कि जिस रिपोर्ट के आधार पर यह खबर बनाई गई थी, उस रिपोर्ट की प्रामाणिकता संदिग्ध है। दरअसल, इस रिपोर्ट की जानकारी हमारे संवाददाता को एक महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति ने दी है लेकिन इससे जुड़े दस्तावेज हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं इसलिए इसके तथ्यात्मक रूप से सही होने की हम तस्दीक नहीं कर सकते।


जोसफ बर्नाड
नई दिल्ली ।। कहा जाता है कि 'भारत गरीबों का देश है, मगर यहां दुनिया के बड़े अमीर बसते हैं।' यह बात स्विस बैंक की एक चिट्ठी ने साबित कर दी है। काफी गुजारिश के बाद स्विस बैंक असोसिएशन ने इस बात का खुलासा किया है कि उसके बैंकों में किस देश के लोगों का कितना धन जमा है। इसमें भारतीयों ने बाजी मारी है। इस मामले में भारतीय अव्वल हैं। भारतीयों के कुल 65,223 अरब रुपये जमा है। दूसरे नंबर पर रूस है जिनके लोगों के करीब 21,235 अरब रुपये जमा है। हमारा पड़ोसी चीन पांचवें स्थान हैं, उसके मात्र 2154 अरब रुपये जमा है।


भारतीयों का जितना धन स्विस बैंक में जमा है, तकनीकी रूप से वह हमारे जीडीपी का 6 गुना है। सरकार पर दबाव है और कोशिशें भी जारी है कि इस धन को वापस देश में लाया जाए। तकनीकी रूप से यह ब्लैक मनी है। अगर यह धन देश में वापस आ गया तो देश की इकोनॉमी और आम आदमी की बल्ले-बल्ले हो सकती है।


कर्ज नहीं लेना पड़ेगा
प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक भारत को अपने देश के लोगों का पेट भरने और देश को चलाने के लिए 3 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेना पड़ता है। यही कारण है कि जहां एक तरफ प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है, वही दूसरी तरफ प्रति भारतीय पर कर्ज भी बढ़ता है। अगर स्विस बैंकों में जमा ब्लैक मनी का पहले चरण में 30 से 40 पर्सेंट भी देश में आ गया तो हमें कर्ज के लिए आईएमएफ या विश्व बैंक के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ेंगे। धन की कमी स्विस बैंक में जमा धन पूरा करेगा।


30 साल का बजट बिना टैक्स के
स्विस बैंकों में भारतीयों का जितना ब्लैक मनी जमा है, अगर वह सारी राशि भारत को मिल जाती है तो भारत देश को चलाने के लिए बनाया जाने वाला बजट बिना टैक्स के 30 साल के लिए बना सकता है। यानी बजट ऐसा होगा कि जिसमें कोई टैक्स नहीं होगा। आम आदमी को इनकम टैक्स नहीं देना होगा और किसी भी वस्तु पर कस्टम या सेल टैक्स नहीं देना होगा।


सभी गांव जुड़ेंगे सड़कों से
सरकार सभी गांवों को सड़कों से जोड़ना चाहती है। इसके लिए 40 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। मगर सरकार के पास इतना धन कहां हैं। अगर स्विस बैंक से ब्लैक मनी वापस आ गया तो हर गांव के पास एक ही चार लेन की सड़क बन सकती है।


कोई बेरोजगार नहीं
देश में कोई भी बेरोजगार नहीं रहेगा। जितना धन स्विस बैंक में भारतीयों का जमा है, उससे उसका 30 पर्सेंट भी देश को मिल जाए तो करीब 20 करोड़ नई नौकरियां पैदा की जा सकती है। 50 पर्सेंट धन मिलेगा तो 30 करोड़ नौकरियां मार्केट में आ सकती हैं।


देश से गरीबी गायब
अमेरिकी एक्सपर्ट का अनुमान है कि स्विस बैंकों में भारतीयों का जितना धन जमा है, अगर वह उसका 50 पर्सेंट भी भारत को मिल गया तो हर साल प्रत्येक भारतीय को 2000 रुपये मुफ्त में दिए जा सकते हैं। यह सिलसिला 30 साल तक जारी रहा सकता है। यानी देश में गरीबी दूर हो जाएगी|


सुभाष जी का सच, सामने आना चाहिए ....!!












 - अरविन्द सीसोदिया 
जवाहरलाल  नेहरु  के  शव  के  पास  सुभाष जी का होना माना जाता है ... 
http://uchcharandangal.uchcharan.com/2010/08/blog-post_18.html
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक द्वारा लिख गया लेख यथावत संलग्न है ...
1- ब्रिटिश पार्ल्यामेंट  में मि. एटिली (तत्कालीन प्रधानमंत्री) ने 18 अगस्त, 1945 में कहा था कि उनका भारतीय नेताओं से समझौता हो चुका है कि  नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के पकड़े जाने पर उन्हें ब्रिटिश सरकार के हवाले कर दिया जायेगा!
2- 1948 में मास्को में दार्शनिक सम्मेलन में भाग लेने गये (पूर्व राष्ट्रपति) भारत के प्रख्यात दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन की मुलाकात नेता जी सुभाष चन्द्र बोस  से हुई थी!
3- नेता जी सुभाष चन्द्र बोस तिब्बत में एकनाथलाता के रूप में 1960 में रहे!
4- श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित की मुलाकात 1948 में रूस में नेता जी सुभाष चन्द्र बोस  से हुई थी! उस समय वे भारत की विदेश मंत्री थी! शांताक्रूज हवाई अड्डे पर उन्होंने यह घोषणा की थी कि वह भारतवासियों के लिए एक अच्छी खबर लाई हैं परन्तु नेहरू जी के दबाव में आकर उन्होंने जीवनभर अपनी जबान नहीं खोली!
5- नेता जी सुभाष चन्द्र बोस 1960 से 1970 तक शारदानन्द के रूप में प.बंगाल में शौलमारी आश्रम में रहे!
6- नेता जी 1964 में नेहरू जी की मत्यु के बाद उनके शव के साथ देखे गये थे!

7- नेता जी सुभाष चन्द्र बोस 1971 में काँग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इन्दिरा जी के साथ देखे गये!

8- नेता जी सुभाष चन्द्र बोस गुमनामी बाबा के रूप में फैजाबाद में 1985 तक रहे!
9- तेरह मई,1962 को नेहरू जी ने नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के बड़े बाई श्री सुरेशचन्द्र बोस को पत्र क्रमांक-704, पी.एम. / 62 में लिखा था कि हमारे पास  नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु का कोई प्रमाण नही है!
10- कस्बा पूरनपुर जनपद-पीलीभीत में 15 फरवरी 2009 को भारतीय सुभाष सेना के संस्थापक परम पूज्य महान संत सम्राट सुभाष जी द्वारा यह घोषणा की गई थी कि वे ही  नेताजी सुभाषचन्द्र बोस हैं
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परिचय
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और माँ का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। पहले वे सरकारी वकील थे, मगर बाद में उन्होंने निजी प्रैक्टिस शुरू कर दी थी। उन्होंने कटक की महापालिका में लंबे समय तक काम किया था और वे बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रहे थे। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें रायबहादुर का खिताब दिया था। प्रभावती देवी के पिता का नाम गंगानारायण दत्त था। दत्त परिवार को कोलकाता का एक कुलीन परिवार माना जाता था। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाषचंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था। शरदबाबू प्रभावती और जानकीनाथ के दूसरे बेटे थें।