बुधवार, 2 मार्च 2011

सजा इतनी तो होनी ही चाहिए कि फिर कोई गोधरा न हो ...



- अरविन्द सिसोदिया
     हमारे देश के कमजोर, गैर जिम्मेवार और सत्तालोलुप हुक्मरानों के कारण,  देश में हिन्दू - मुस्लिम को आपस में मुर्गों की तरह लडानें का सिलसिला अभी भी चल रहा है ..!! अंग्रेजों ने तो यह खेल अपनी सत्ता  बनाये रखनें के लिए खेला था..!  देश की न्यायपालिका,प्रशासन और मिडिया वह मंच था जो निष्पक्ष होजाता तो .., यह सिलसिला रु सकता था .., न्यायलय को छोड़ कर अन्य तंत्रों नें अपनी विश्वसनीयता खो दी है ..! 
   .....मगर कांग्रेस ने भी वही अंग्रेज खेल लगातार अपनी सत्ता बनाये रखनें के लिए खेला और निर्दोष हिन्दू और मुसलमानों को आपस  में लड़वाया ..!!  उन्हें आपस में लड़वा कर ; अपना सत्ता  सुख सुनिश्चित किया ; गोधरा वह सच है जिसमें यह स्पष्ट है कि कांग्रेस के नेता गण अपराध का नेतृत्त्व कर रहे थे ..! यह सजा इसलिए कम है कि इस अत्यंत गैर जिम्मेवार ढंग से कि गई अपराधिका  से दोनों पक्षों के यथा हिन्दू और मुस्लमान जो निर्दोष थे ; मरे गए ; बेघर हुए.., दंगे हुए थे .., पूरा देश ही दंगों कि लपेट में आ सकता था ..! 
       ....इसलिए सजा इतनी तो होनी ही चाहिए कि फिर कोई गोधरा न हो ...!! गोधरा में सवारमती यात्री गाड़ी के दो कोचों को जलानें में जो भी सम्मिलित रहा है उसे जीनें का अधिकार नहीं है..! क्यों कि वह सिर्फ रेल यात्री हिन्दुओं के ही हत्यारे नहीं हैं बल्कि वे वाद में प्रतिक्रिया स्परूप हुई हिंसा को भड्कानें और उसमें हुई जान - माल की हानी के लिए भी जिम्मेवार हैं ..! इसलिए इतनें बड़े और व्यापक विद्वेष के कर्क तत्वों को पूरी पूरी सजा मिलना चाहिए..!!  
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अहमदाबाद। विशेष अदालत ने गोधरा कांड में दोषी करार दिए 31 आरोपियों को १ मार्च 2011को सजा सुना दी। इनमें से 11 को फांसी तथा 20 को उम्रकैद मिली। फैसले को तीन माह के भीतर हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। साबरमती जेल में जज पीआर पटेल की विशेष अदालत ने करीब 900 पेज का फैसला दिया। जून 2009 से मामले की सुनवाई कर रही विशेष अदालत ने 25 फरवरी को बहस के बाद सजा के बिंदु पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।
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नईदिल्ली। 2002 के गोधरा कांड में दोषी पाए गए 31 लोगों के खिलाफ गुजरात कीएक विशेष अदालत ने मंगलवार को सज़ा का ऐलान किया। अदालत ने इस मामले में 11 दोषियों को फांसी और बाकी 20 दोषियों को उम्र कैद की सज़ा सुनाई है। पाठकों ने इस फैसले पर मिलीजुली प्रतिक्रिया दी है। आइए, देखें गोधरा कांड में आए फैसले पर चुनिंदा पाठकों की राय:-
'गोधरा पर कोर्ट के फैसले का सभी को स्वागत करना चाहिए। न्यायपालिका में सबको यकीन करना चाहिए। मुस्लिम भाइयों को राष्ट्र को और मजबूत और उन्नति के लिए मिलजुल कर काम करने की जरूरत है। अनावश्यक तनाव देश को तोड़ता है।हमें सिरफिरे चरमपंथियों से किनारा करना चाहिए, ताकि पूरी कौम बदनाम न हो।अगर ऐसे राष्ट्रद्रोही सिरफिरे हमारे आस-पास दिखे, या जानकारी में आएं, तो एक सच्चे मुसलमान होने के नाते उसकी जानकारी नजदीकी पुलिस थाने में देकर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। जय हिंद।' - मोहम्मद उस्मान (तिरूवनंतपुरम, केरल)
'जब एक हजार लोग ट्रेन पर हमला करते हैं तो सज़ा फिर सिर्फ 31 लोगों को कही क्यों दी गई?'
- रोहित
'गोधरा कांड में सिर्फ 11 लोगों को फांसी की सज़ा सुनाना काफी नहीं है। सरकार को सुप्रीम कोर्ट में अपील करनी चाहिए।' - नवीन (बेल्लारी, कर्नाटक)
'सरकार का कामकाज देखकर लग रहा है कि इस देश में सच और झूठ का फर्क ही खत्म हो गया है। हर मामले में सिर्फ यही देखा जाता है कि उससे किस पार्टी को फायदा होगा और किसको नुकसान होगा। गोधरा कांड पर दो आयोग गठित किए गए है और दोनों ने अलग-अलग रिपोर्ट दी। अगर गुजरात में भी कांग्रेस होती तो गोधरा कांड में आरोपी बनाए गए लोगों को शायद ही सजा होती। लालू ने ही बनर्जी आयोग गठित किया था जिसने बताया था कि गोधरा कांड साजिश नहीं दुर्घटना थी, लेकिन हमारे देश के लोगों को जो थोड़ी बहुत उम्मीद है वह न्यायपालिका से ही बची हुई है। वह भी इसलिए बची है कि न्यायपालिका में न्याय सबूतों के आधार पर होता है न कि राजनीति और पैसे के बल पर। नहीं तोयहां से भी लोगों को मायूस ही होना पड़ता। अब वक्त आ गया है जनता जागे औरऐसे लोगों को सबक सिखाएं जो देश को बेच रहे हैं। जब तक जनता सोती रहेगीउन्हें मूर्ख बनाने वाले पैदा होते रहेंगे।' - मोहन, दिल्ली
'बहुत अच्छा हुआ कि इन्हें फांसी हुई। अब गुजरात दंगों के जिम्मेदार लोगो को भी फांसी दो। तभी हिसाब बराबर होगा। नहीं तो ये हिंदुस्तान कि न्यायपालिका पर कलंक होगा कि 1984 और 2001 के दंगों के लिए जिम्मेदार किसी भी एक आदमी को सज़ा नहीं हुई।' - गुरमीत सिंह पटियाला (पंजाब)
'सच तो यह है कि भारत में होने की वजह सज़ा कम हुई और देर से भी। इस मामले में अब भी कानूनी अड़चनों और अपील की सुविधा के चलते सज़ा कब अमल मेंलाई जाएगी, किसी को पता नहीं।' -अजय, इंदौर
'बेहतर होगा कि इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई भी टिप्पणी न करें। इस देशके सभी संप्रदायों को न्यायपालिका पर विश्वास है। उसे अपना काम करने दें।' -राजेश, मुंबई

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