गुरुवार, 17 मार्च 2011

न्यायलय तुम देश बचाओ जनता तुम्हारे साथ हैं ..



- अरविन्द सिसोदिया 
.........इस समय देश में लूटपाट का हमला चल रहा है ...इस आक्रमण से मुकवाला करनें में प्रतिपक्ष भी उतना कारगर जितनें की आवश्यकता है ..! केंद्र की सरकार नें कई दलों को आय से अधिक संपत्ति के मामलों में सीबीआई से बाँध दिया है सो वे भी सरकार के परोक्ष गुलाम बन गए  हैं ..! इस स्थिति में भारतीय न्यायपालिका ने ही देश हित में कुछ कदम उठाये हैं ..! उन्हें भी रोकनें के लिए कांग्रेस ने यह बात चल वाई है की न्यायपालिका अति सक्रीय है ..., जब की सच यह है कि देश के साथ लूट पात की अति सक्रियता  है..! प्रधान मन्त्र के विभाग से एस बैंड स्पेक्ट्रम घोटाला हो जाये और त्यागपत्र की जगह मात्र साफ सफाई से रफा दफा किया जाये ...! एक नहीं .. लगातार असंवैधानिक गतिविधियों में सरकार लिप्त हो तो कौन उसे रोकेगा ..? जबकि आधा विपक्ष बंधक बन चुका हो ..? अतः न्यायलय की सक्रियता आवश्यक है ...इसका स्वागत होना चाहिए ..! न्यायलय तुम देश बचाओ जनता  तुम्हारे साथ हैं .. यह नारा देश में गूंजना चाहिए ..!.........देखिये न्यायपालिका को दवाब में लेने की कोशिस की दो रिपोर्टें .....
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http://www.samaylive.com/vice-president-hamid-ansari
१६ मार्च २०११ को उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि देश में विधायिका और न्यायपालिका के बीच 'उचित संतुलन' बनाये रखने की जरूरत है |  राज्यसभा के सभापति अंसारी ने कहा, 'हमारी व्यवस्था शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर काम करती है. इस सिद्धांत में बारीक भेद है और इस बारीक भेद को समझने की जरूरत है. सार्वजनिक घोषणाओं के दौरान विवेक और नीतियों को लागू करते समय सतर्कता बरतने की जरूरत है ताकि हर समय उचित संतुलन बनाये रखना सुनिश्चित किया जा सके.'
      उन्होंने कहा कि सभी व्यवस्थायें 'दबाव और तनाव' से गुजरती हैं लेकिन लोकतांत्रिक प्रणाली इसका जवाब चर्चा और विचार विमर्श आयोजित करके देती है.उप राष्ट्रपति ने कहा, 'मैं समझता हूं कि चर्चा और विचार विमर्श तथा इसके लिये पर्याप्त समय दिये जाने की जरूरत है. आज के समय में विभिन्न कारणों से यह और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है जब हम इसमें से कुछ चीजों को कम करने की कोशिश कर रहे हैं.' अंसारी ने अपने विचार यहां पर एक किताब का विमोचन करते समय रखे.
     इस अवसर पर राज्यसभा के उप सभापति के रहमान खान ने कहा कि जहां संसद कानून बनाने का सर्वोच्च निकाय है वहीं न्यायपालिका, संविधान और विधायिका संस्थानों द्वारा पारित किये गये कानून की व्याख्या करने की अंतिम शक्ति है. उन्होंने कहा कि हालांकि विधायिका और न्यायपालिका दोनों ही को अपने कार्य के लिये पूर्ण स्वायत्तता और स्वतंत्रता है फिर कुछ ऐसे अवसर आते हैं जब 'संसद और न्यायपालिका के बीच उचित संतुलन उनकी स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर मतभेद के कारण तनाव ग्रस्त हो जाता है.
२********
सुधांशु रंजन 
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/7718836.cms
पिछले कुछ समय से न्यायिक सक्रियता का एक नया दौरशुरू हुआ है। 2- जी घोटाले पर सुप्रीम कोर्ट कठोर टिप्पणी करचुका है और अब उसकी जांच की निगरानी भी कर रहा है।महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्य मंत्री विलासराव देशमुख द्वारा एकआपराधिक मामले में पुलिस पर दबाव डालकर जांच प्रक्रिया कोप्रभावित करने के लिए अदालत ने राज्य सरकार पर 10 लाख रु. का जुर्माना किया। काले धन पर भी सुप्रीम कोर्ट की तल्खटिप्पणियां लगातार आ रही हैं। गत 3 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पी. जे . थॉमस की सीवीसी के रूप में की गई नियुक्ति को निरस्तकर एक नयी सक्रियता का परिचय दिया। यह संभवत : पहलाअवसर है जब किसी अदालत ने न सिर्फ इतनी उच्च पदस्थ नियुक्तिको अवैध करा दिया , बल्कि उस अनुशंसा को रद्द कर दिया जिसके आधार पर यह नियुक्ति की गई थी। अर्थात यह मानाजाएगा कि यह नियुक्ति कभी हुई ही नहीं।


नियुक्ति की समीक्षा 
अदालत ने सरकार और थॉमस की यह दलील खारिज कर दी कि कार्यपालिका द्वारा की गयी नियुक्तियों की समीक्षाअदालत नहीं कर सकती। सरकार का पक्ष था कि कोई भी नियुक्ति उसका विवेकाधिकार है , लेकिन सुप्रीम कोर्ट नेव्यवस्था दी है कि नियुक्ति की न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। किंतु लोकतंत्र में न्यायालय को इसअधिकार का इस्तेमाल संयम के साथ करना चाहिए , हालांकि यह भी न्यायपालिका को ही तय करना है कि उसकी सीमाक्या होगी। विनीत नारायण ; 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट दिशानिर्देश दिए कि सीबीआई और सीवीसी का पुनर्गठन इसप्रकार किया जाना चाहिए ताकि ये बाहरी प्रभावों से पूरी तरह मुक्त रहें।


शून्य भरने का सिद्धांत 
मुख्य न्यायाधीश जे . एस . वर्मा ने शून्य भरने का सिद्धांत दोहराया कि यदि विधायिका अपना काम न करे तोकार्यपालिका को उस शून्य को भरना चाहिए क्योंकि इसका कार्यक्षेत्र विधायिका के साथ मिलता है। और जहांकार्यपालिका भी किसी कारणवश काम न करे , वहां न्यायपालिका को संविधान के अनुच्छेद 32 और 142 के अंतर्गतअपने दायित्वों का निर्वाह करने के लिए शिरकत करनी पडे़गी , जब तक कि विधायिका कानून बनाकर उसे पूरा न करे।अदालत के इन निर्देशों का अनुपालन नहीं हुआ , किंतु इसके अदालत ने सरकार के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरूनहीं की।

प्रकाश पी . हिंदुजा ; 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया - ' ए . के . राय बनाम संघ में यह व्यवस्था दी गई किविधायिका द्वारा बनाए गए कानून को लागू कराने के लिए कोई मैंडामस जारी नहीं किया जा सकता। इसलिए , सीवीसीको कानूनी दर्जा दिये जाने के बारे में दिए गए निर्देश को ऐसा नहीं माना जा सकता , जिसका अनुपालन न किए जाने कोअवमानना माना जाए। ' इस तरह अदालत ने अपनी परिधि से बाहर जाने की बात परोक्ष रूप से स्वीकार कर ली , किंतुइससे विनीत नारायण मामले में दिए गए उसके निर्देशों का मजाक बना। इससे वैसे अदालती आदेशों का अनुपालन नकिए जाने की गुंजाइश खुलती है जो कार्यपालिका की दृष्टि में न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र से बाहर है। लेकिन इधर अदालतका रवैया फिर आक्त्रामक सक्त्रियता वाला दिख रहा है।

अभी पूरी दुनिया में राजनीतिक मसले भी अदालतों के समक्ष लाए जा रहे हैं। चुनावी नतीजों से लेकर सत्ता परिवर्तन ,युद्ध और शांति , सामूहिक पहचान के प्रश्न और सीधे - सीधे राष्ट्र निर्माण से जुड़े मुद्दों पर भी अदालतें विचार कर रहीं हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव , चेचन्या में युद्ध और पाकिस्तान की राजनीतिक उथल - पुथल से लेकर तुर्की में सेक्युलरराजनीतिक व्यवस्था तक पर अदालत को फैसले सुनाने पडे़ हैं। भारतीय सुप्रीम कोर्ट पूरे विश्व में सबसे शक्तिशाली है ,इसलिए यहां यह प्रवृत्ति और ज्यादा मुखर है।

यहां संविधान के लागू होते ही निर्वाचित सांसद यह माननेे लगे कि देश की तकदीर को गढ़ने का जनादेश उन्हें ही प्राप्तहुआ है , लेकिन न्यायपालिका का भी स्पष्ट पक्ष था कि उसकी स्वाधीनता के साथ सरकार या विधायिका को कोई हस्तक्षेपनहीं करना चाहिए। 28 फरवरी 1950 को सुप्रीम कोर्ट के उद्घाटन के अवसर पर मुख्य न्यायाधीश हीरालाल कानिया नेअपना रुख साफ कर दिया था कि न्यायपालिका को छूने की कोई कोशिश कोई न करे। संवधिान के प्रथम संशोधन केसाथ ही नवीं अनुसूची का जन्म हुआ जिसमें डाले गए कानूनों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती थी। सुप्रीम कोर्ट नेहाल में इसे भी निरस्त कर दिया।

जवाहर लाल नेहरू न्यायपालिका की स्वतंत्रता में पूरा विश्वास रखते थे , फिर भी उन्होंने 19 मई 1951 को संसद में कहाथा कि बड़ी योजनाओं और बड़े सामाजिक परिवर्तनों में न्यायपालिका की कोई भूमिका नहीं है। गोलकनाथ मामले में जबसुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती तो उस समय इसे न्यायिकसक्त्रियता का सबसे बड़ा उदाहरण माना गया था। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के सांसद नाथ पई ने संसद के अधिकार कोबहाल करने के लिए एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया। इसका जोरदार विरोध उसी पार्टी के राम मनोहर लोहिया औरमधु लिमये ने किया। बाद में 1973 में केशवानंद भारती मामले में संविधान के मौलिक ढांचे में संशोधन न करने कीव्यवस्था देकर सुप्रीम कोर्ट ने संसद की शक्ति को हमेशा के लिए सीमित कर दिया।


काम में भी दिखे सक्रियता 
न्यायिक सक्त्रियता के कई सुखद परिणाम सामने आए हैं किंतु न्यायपालिका को त्वरित न्याय दिलाने में भी सक्त्रियतादिखानी चाहिए , अन्यथा उसकी सक्त्रियता पूरी तरह सार्थक नहीं हो पाएगी। पी . जे . थॉमस के मामले में अदालत नेउनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर नहीं , प्रक्त्रिया के उल्लंघन पर सवाल उठाया है। थॉमस के खिलाफ आरोप करीब 20 वर्षपुराना है। अगर कोई व्यक्ति किसी मामले में आरोपित होता है तो क्या न्यायपालिका को यह सुनिश्चित नहीं करनाचाहिए कि मामले का जल्द निष्पादन हो जाए ? अगर ऐसा नहीं होता तो क्या आरोपित व्यक्ति ताउम्र सभी पदों के लिएअयोग्य बना रहेगा ?

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