मंगलवार, 15 मार्च 2011

पुलिस, राजनीती और कानून में बदलाव अपेक्षित



- अरविन्द सिसोदिया
    आज जब कि पुलिस और अन्य जांच एजेंसियां विफल दर विफल हो रहीं हैं तब यह जरुरत  बन जाती  है कि एक आत्म विश्लेष्ण हो कि कारण क्या हैं ...? विशेष कर यह सत्ता रूढ़ राजनैतिक दलों के चिंता  का कारण तो होना ही चाहिए और प्रतिपक्ष कि और से उठना भी चाहिए ..? स्वंय पुलिस को भी यह सोचना चाहिए ..?
  एक चॅनल ने बताया कि दिल्ली में पांच साल में २०० से अधिक हत्या के आरोपी अदालत ने वरी कर दिए ...! इस विषय पर संसद ठप्प हो जानी चाहिए थी ..! मगर जनता के लोग मरे उनके हत्यारे वरी हुए .., किसी दल को कोई चिता नहीं ...!! क्या ऐसा ही लोकतंत्र हमें बनाना था ..? हिन्दू धर्म कि नीति में तो वही राजा सर्वश्रेष्ठ होता है जो जनता को न्याय दे ..! न्याय को तो छोडो .., राहत और सहानुभूती में भी बेईमानी हो रही है ..? क्या इसे आराजकता नहीं कहेंगे ..? इसलिए आत्म निरिक्षण करना ही चाहिए ..! इस के कारण कई हैं .......
१. अपराध की रिपोर्ट तुरंत लिखी जाये .., चाहे वह झूठी ही क्यों न हो ..! बाद में सही बात तो सामनें ही आ जायेगी ! मगर सच है तो सबूतों को बचाया जा सकता है .., भागनें या गायव किये जानें से रोका जा सकता है ..! चोरी सतर्कता के चलते पकड़ी जा सकत है ..!
- वर्तमान में मोवाइल चोरी से लेकर जेबर ,  मोटर  साईकिल / कार चोरी तक की रिपोर्टें लिखनें में आना कानी की जाती है , जब कोई बड़ा दवाव पढता है तब ही लिखते हैं .., इस तरह पुलिस ही अपराधी को फायदा पंहुचा रही है .., इसका कारण कम से कम रिपोर्टों / अपराधों के आंकड़े दिखाना है ...! इस दुष्कृत्य में सत्ता रूढ़ दल भी शामिल होता है ..! गृह मंत्रालय की शह पर ही यह होता है ..! 
* इसलिए रिपोर्ट प्राप्त करनें की एजेंसी भी अलग / सामानांतर होनी चाहिए और उस पर न्यायलय का नियंत्रण होना चाहिए ताकी राजनैतिक हस्तक्षेप न हो ..! क्यों की राजनैतिक हस्तक्षेप ने ही अन्याय और अधर्म को प्रोत्साहन दिया हुआ है ...!
२. पुलिस जांच दलों का गठन योग्यता / विशेषता के आधार पर..., उनमें साक्ष्य एकत्र करनें की योग्यता हो ..! जैसे की एक हत्या हुई ..उसका अर्थ हत्या ही है और हत्यारे का वजूद है ..! फिर वह पकड़ा क्यों नही गया ..? या उसे सजा क्यों नहीं हुई ..?? आपकी जबावदेही क्यों नहीं है ..? गवाह आपसे सहयोग नहीं करते हैं तो आप अपनें आपमें कमी को ढूंढिए ...! आप विश्वाश क्यों खोये हुए हो ..! 
  हर अपराध को अपराध ही मन जाना चाहिए .., उसमें किन्तु परन्तु नहीं होनी चाहिए ..!
३. अन्य कार्यों के लिए सिविल पुलिस अलग से हो .., पुलिस के माथे अन्य भी बहुत से काम इकट्ठा  हो गए हैं .., जैसे राजनेताओं की सुरक्षा करना.., उनके गनमैन के रूप में नियुक्ति ..! मेलों और आयोजनों तथा धरना प्रदर्शनों अन्य आयोजनों में अपराध वृती रोकने के लिए....!
* मेरा मानना है कि समाज में अपराध नियंत्रण के थानों से अलग डिप्टी पुलिस अधीक्षक स्तर पर कुछ रिजर्व फ़ोर्स होनी चाहिए जो अन्य आयोजनों में अपराध नियंत्रण का काम करे भले ही वह कम योग्यता की ही क्यों न हो ...!जैसे होमगार्ड , एन सी सी इत्यादी का स्थाई स्टाफ बनाया जा सकता है जो भले ही अर्ध शिक्षित हो ..!
* व्ही आई पी लोगों की स्थाई / दौरा कार्यक्रम सुरक्षा में अलग ही तंत्र हो जो जिला स्तर पर एस पी के पास हो  
४. अपराध वृती पर प्रभावी रोकथाम कानूनन हो ...अपराध में अपराधी को जमानत जब जल्द मिल जाती है तो अपराध की पुनरावृति होती है ...,  यदी जमानत को प्रभावी ढंग से तौल कर / सोच समझ कर निर्णय हों ..., तो बहुत कुछ ठीक किया जा सकता है ..! यदी अपराधी ने अपराध की पुनरावृति की है या पुनः अपराध किया हो तो निश्चित रूप से जमानत नहीं होनी चाहिए ..! एक व्यक्ती पेरोल पर निकलता है और एक सत्तारूढ़  दल के विधायक के पुत्र की ह्त्या कर देता है ..! अर्थात जमानत सख्त होनी चाहिए ..! पुनर्वृति पर और भी अधिक सख्त और सजा भी ५० प्रतिशत अधिक हो ..!!
५. सुनवाई प्रक्रिया में बदलाव हो, बार बार जेल से अदालत जानें से मुक्ती मिले ..., आज समय बदल गया है विज्ञानं तरक्की कर चूका है .., अदालत में हुई कार्यवाही सी डी बना कर भी जेल में दिखाई जा सकती है , सीधी वीडियो कांफेंसिग के जरये भी दिखाई / सम्मिलित किया जा सकता है !
६. अदालत यह नजरिया भी छोड़े की हर व्यक्ती निर्दोष है .., जहाँ जहाँ उसे उचित लगे वह स्वंय अपराधी से निर्दोष होनें के प्रमाण मांगले ..! अदालत सम्बन्धित अपराध जैसे की हत्या, बलात्कार , मारपीट इत्यादी में यदी पुलिस पर्याप्त सबूत पेश करनें में विफल है तो उससे सबूत जुटाने को कहे ..क्यों की जो लाश थी वह न्याय मांग रही है ..!! अपराधी बारी हो सकता है मगर अपराध नहीं हुआ यह नहीं कहा जा सकता तो अपराधी को ढूंढ कर सजा देनी ही होगी ..!
७. पुलिस हेल्प लाइन बनें ...., मेरा मानना है कि जिस तरह से रेलवे में अपना अलग टेलीफोन नेटवर्क है सामान्य टेलीफोन से कोई उन्क्स कर्मचारी से बात नहीं कर पता .., इसी तरह पुलिस में अधीक्षक / अतिरिक्त अधीक्षक / उप अधीक्षक के आलावा किसी भी पुलिस कर्मी से बात नहीं की जा सकती .. इस तरह की व्यवस्था हो .., किसी भी राजनेता को कोई काम है तो वह पुलिस अधीक्षक से बात करे ..! हर छोटी छोटी बात पर नेता गिरी बंद हो .., अपराध वृद्धि का एक कारण नेता गिरी भी है ..! सामान्य या छोटे पुलिस कर्मी को काम ही नहीं करने देता ..! जनता की कोई भी समस्या को सुनने और सही जगह वह सूचना पहचानें के लिए आई टी सेल अलग से बना कर जोड़ा जाये ..!
८. चल न्यायालयों की बड़ी संख्या में नियुक्ती हो .., मेरा मानना है कि जब हम व्यवस्था के लिए जनता से टैक्स ले रहें हैं , देश के संसाधनों को बेंच रहे हैं .., तो फिर हमारा पहला कर्तव्य भय मुक्त और कानून का राज स्थापित करना होना ही चाहिए ..! कानून का राज स्थापित करने के लिए ..., चल न्यायालयों की बड़ी भूमिका हो सकती है .. अचानक पहुचना और गलत पाए जानें पर दंड और जुरमाना करना ..!
९. जुर्मानें की रकम स्वतः बडती रहे .., अभी कई मामलों में जुरमाना रकम बहुत ही कम और हास्यपद है .., इसमें उसी तरह वृद्धि होनी चाहिए जैसे स्टांप ड्यूटी वसूलनें के लिए क्षेत्रवार न्यूनतम मूल्य का निर्धारण प्रति एक दो वर्ष में होता रहता है ..., तथा जुरमाना उस समय का लगेगा जब निर्णय होगा ..!
१०. बड़े अपराधियों की जमानत न हो .., मेरा मानना है कि एक बड़े अपराध में कामयाव हो जानें पर सामान्य गुंडा भी नामी इसलिए हो जाता है कि उसे जमानत मिल रही है .., उसके खिलाफ कोई अदालत में सबूत / साक्ष्य इसलिए नहीं  देता की बाहर आकर वह उसे  तंग करेगा / बेइज्जत करेगा ., पुलिस का भी यह काम तोड़े ही है कि वह एक ही गुण्डे  से लोगों कि हिफाजत करती फिरे , उसे तो पहले ही दस काम और हैं .., जनसँख्या के अनुपात में पुलिस पहले ही बहुत काम है ..! भू - माफियाई , चौथ वसूली और सुपारी लेकर हत्या करने के मामलों में इसी तरह के गुण्डे हैं ..! 
जयपुर। मानसरोवर में पांच साल पहले हुई  दारा सिंह उर्फ  दारिया मुठभेड़ / एन्काउन्टर की जांच सी बी आई कर रही है , मगर  एन्काउन्टर में मारा गया कुख्यात गुंडा  था , समाज कंटक था ...
सोहराबुद्दीन मुठभेड़ कांड  की जांच सी बी आई कर रही है , मगर  एन्काउन्टर में मारा गया कुख्यात गुंडा था , समाज कंटक था ... 
  मेरा मानना यह है कि जो लोग जेल से बहार आकर निर्दोष लोगों का अमन चैन ख़त्म करें उन्हें किस  आधार पर मानव अधिकार दिए जा सकते हैं ..? उन्हें क्यों तो छुट्टा छोड़ा जाये और क्यों उनकी चौकीदारी पर जनता की गाड़ी मेहनत का क्यों धन खर्च किया जाये ...? ये वे लोग जिन्हें जमानत नहीं मिलती और अन्दर रखनें का प्रावधान होता तो ये एन्काउन्टर की बात ही नही आती ...! सर्कार को यह बात तो तय करनी होगी कि समाज के सामान्य जन जीवन को बाधित करने वालों से कैसे नींवटा  जाये और फिर उसमें कोई राजनीती न हो ...! पुलिस , राजनीती और कानून में बदलाव अपेक्षित 


 कुल मिला कर बदलते परिवेश में पुलिस में भी जरुरी बदलाव किये जानें चाहिए ..!
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एक रपट जो पढ़नी चाहिए ..
http://www.himanshushekhar.in/?p=130

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