सोमवार, 30 मई 2011

महाराण प्रताप : सूरवीर राष्ट्रभक्त

 यह आलेख क्षत्रिय कल्याण सभा भिलाई .. के द्वारा परिश्रम पूर्वक तैय्यार किया गया है ....

  महाराणा प्रताप और सिसोदिया राजवंश 
सन 712 ई० में अरबों ने सिंध पर आधिपत्य जमा कर भारत विजय का मार्ग प्रशस्त किया। इस काल में न तो कोई केन्द्रीय सत्ता थी और न कोई सबल शासक था जो अरबों की इस चुनौती का सामना करता। फ़लतः अरबों ने आक्रमणो की बाढ ला दी और सन 725 ई०  में जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। ऐसे लगने लगा कि शीघ्र ही मध्य पूर्व की भांति भारत में भी इस्लाम की तूती बोलने लगेगी। ऐसे समय में दो शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक ओर जहां नागभाट ने जैसलमेर. मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली, वहां दूसरी ओर बप्पा रायडे ने चित्तौड के प्रसिद्ध दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई० में मेवाड में गुहिल वंश का वर्चश्व स्थापित किया और इस प्रकार अरबों के भारत विजय के मनसूबों पर पानी फ़ेर दिया।मेवाड का गुहिल वंश संसार के प्राचीनतम राज वंशों में माना जाता है। मेवाड राज्य की केन्द्रीय सत्ता का उद्भव स्थल सौराष्ट्र रहा है। जिसकी राजधानी बल्लभीपुर थी और जिसके शासक सूर्य वंशी क्षत्रिय कहलात्र थे। यही सत्ता विस्थापन के बाद जब ईडर में स्थापित हुई तो गहलौत मान से प्रचलित हुई। ईडर से मेवाड स्थापित होने पर रावल गहलौत हो गई। कालान्तर में इसकी एक शाखा सिसोदे की जागीर की स्थापना करके सिसोदिया हो गई। चुंकि यह केन्द्रीय रावल गहलौत शाखा कनिष्ठ थी। इसलिय्र इसे राणा की उपाधि मिली। उन दिनों राजपुताना में यह परम्परा थी कि लहुरी शाखा को राणा उपाधि से सम्बोधित किया जाता था। कुछ पीढियों बाद एक युद्ध में रावल शाखा का अन्त हो गया और मेवाड की केन्द्रीय सत्ता पर सिसोदिया राणा का आधिपत्य हो गया। केन्द्र और उपकेन्द्र पहचान के लिए केन्द्रीय सत्ता के राणा महाराणा हो गये। अस्तु गहलौत वंश का इतिहास ही सिसोदिया वंश का इतिहास है।
मान्यता है कि सिसोदिया क्षत्रिय भगवान राम के कनिष्ठ पुत्र लव के वंशज हैं। सूर्यवंश के आदि पुरुष की 65 वीं पीढी में भगवान राम हुए 195 वीं पीढी में वृहदंतक हुये। 125 वीं पीढी में सुमित्र हुये। 155 वी. पीढी अर्थात सुमित्र की 30 वीं पीढी में गुहिल हु जो गहलोत वंश की संस्थापक पुरुष कहलाये। गुहिल से कुछ पीढी पहले कनकसेन हुए जिन्होंने सौराष्ट्र में सूर्यवंश के राज्य की स्थापना की। गुहिल का समय 540 ई० था। बटवारे में लव को श्री राम द्वारा उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र मिला जिसकी राजधानी लवकोट थी। जो वर्तमान में लाहौर है। ऐसा कहा जाता है कि कनकसेन लवकोट से ही द्वारका आये। हालांकि वोश्वस्त प्रमाण नहीं है। टाड मानते है कि 145 ई० में कनकसेन द्वारका आये तथा वहां अपने राज्य की परमार शासक को पराजित कर स्थापना की जिसे आज सौराष्ट्र क्षेत्र कहा जाता है। कनकसेन की चौथी पीढी में पराक्रमी शासक सौराष्ट्र के विजय सेन हुए जिन्होने विजय नगर बसाया। विजय सेन ने विदर्भ की स्थापना की थी। जिसे आज सिहोर कहते हैं। तथा राजधानी बदलकर बल्लभीपुर ( वर्तमान भावनगर ) बनाया। इस वंश के शासकों की सूची कर्नल टाड देते हुए कनकसेन, महामदन सेन, सदन्त सेन, विजय सेन, पद्मादित्य, सेवादित्य, हरादित्य, सूर्यादित्य, सोमादित्य और शिला दित्य बताया। - 524 ई० में बल्लभी का अन्तिम शासक शिलादित्य थे। हालांकि कुछ इतिहासकार 766 ई० के बाद शिलादित्य के शासन का पतन मानते हैं। यह पतन पार्थियनों के आक्रमण से हुआ। शिलादित्य की राजधानी पुस्पावती के कोख से जन्मा पुत्र गुहादित्य की सेविका ब्रहामणी कमलावती ने लालन पालन किया। क्योंकि रानी उनके जन्म के साथ ही सती हो गई। गुहादित्य बचपन से ही होनहार था और ईडर के भील मंडालिका की हत्या करके उसके सिहांसन पर बैठ गया तथा उसके नाम से गुहिल, गिहील या गहलौत वंश चल पडा। कर्नल टाड के अनुसार गुहादित्य की आठ पीढियों ने ईडर पर शासन किया ये निम्न हैं - गुहादित्य, नागादित्य, भागादित्य, दैवादित्य, आसादित्य, कालभोज, गुहादित्य, नागादित्य।
जेम्स टाड के अनुसार शिकार के बहाने भीलों द्वारा नागादित्य की हत्या कर दी। इस समय इसके पुत्र बप्पा की आयु मात्र तीन वर्ष की थी। बप्पा की भी एक ब्राहमणी ने संरक्षण देकर अरावली के बीहड में शरण लिया। गौरीशंकर ओझा गुहादित्य और बप्पा के बीच की वंशावली प्रस्तुत की, वह सर्वाधिक प्रमाणिक मानी गई है जो निम्न है - गुहिल, भोज, महेन्द्र, नागादित्य, शिलादित्य, अपराजित, महेन्द्र द्वितीय और कालभोज बप्पा आदि। यह एक संयोग ही है कि गुहादित्य और मेवाड राज्य में गहलोत वंश स्थापित करने वाले बप्पा का बचपन अरावली के जंगल में उन्मुक्त, स्वच्छन्द वातावरण में व्यतीत हुआ। बप्पा के एक लिंग पूजा के कारण देवी भवानी का दर्शन उन्हे मिला और बाबा गोरखनाथ का आशिर्वाद भी। बडे होने पर चित्तौड के राजा से मिल कर बप्पा ने अपना वंश स्थापित किया और परमार राजा ने उन्हे पूरा स्नेह दिया। इसी समय विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण को बप्पा ने विफ़ल कर चित्तोड से उन्हे गजनी तक खदेड कर अपने प्रथम सैन्य अभिमान  में ही सफ़लता प्राप्त की। बप्पा द्वारा धारित रावल उपाधि रावल रणसिंह ( कर्ण सिंह ) 1158 ई० तक निर्वाध रुप से चलती रही। रावण रण सिंह के बाद रावल गहलोत की एक शाखा और हो गई। जो सिसोदिया के जागीर पर आसीन हुई जिसके संस्थापक माहव एवं राहप दो भाई थे। सिसोदा में बसने के कारण ये लोग सिसोदिया गहलौत कहलाये।
सत्ता परिवर्तन, स्थान परिवर्तन, व्यक्तिगत महत्वकांक्षा एवं राजपरिवार में संख्या वृद्धि से ही राजपूत वंशों में अनेक शाखाओं एवं उपशाखाओं ने जन्म लिया है। यह बाद गहलौत वंश के साथ भी देखने को मिली है। बप्पा के शासन काल मेवाड राज्य के विस्तार के साथ ही उसकी प्रतिष्ठा में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है। बप्पा के बाद गहलौत वंश की शाखाओं का निम्न विकास हुआ।
  1. अहाडिया गहलौत - अहाड नामक स्थान पर बसने के कारण यह नाम हुआ।
  2. असिला गहलौत - सौराष्ट्र में बप्पा के पुत्र ने असिलगढ का निर्माण अपने नाम असिल पर किया जिससे इसका नाम असिला पडा।
  3. पीपरा गहलौत - बप्पा के एक पुत्र मारवाड के पीपरा पर आधिपत्य पर पीपरा गहलौत वंश चलाया।
  4. मागलिक गहलौत - लोदल के शासक मंगल के नाम पर यह वंश चला।
  5. नेपाल के गहलोत - रतन सिंह के भाई कुंभकरन ने नेपाल में आधिपत्य किया अतः नेपाल का राजपरिवार भी मेवाढ की शाखा है।
  6. सखनियां गहलौत - रतन सिंह के भाई श्रवण कुमार ने सौराष्ट्र में इस वंश की स्थापना की।
  7. सिसौद गहलौत - कर्णसिंह के पुत्र को सिसौद की जागीर मिली और सिसौद के नाम पर सिसौदिया गहलौत कहलाया।
सिसौदिया वंश की उपशाखाएं -
  1. चन्द्रावत - यह 1275  ई० में अस्तित्व में आई। चन्द्रा के नाम पर इस वंश का नाम चन्द्रावत पडा।
  2. भोंसला सिसौदिया - इस वंश की स्थापना सज्जन सिंह ने सतारा में की थी।
  3. चूडावत - चूडा के नाम पर यह वंश चला। इसकी कुल 30 शाखाएं हैं।
मेवाड - वीर प्रसूता मेवाड की धरती राजपूती प्रतिष्ठा, मर्यादा एवं गौरव का प्रतिक तथा सम्बल है। राजस्थान के दक्षिणी पूर्वी अंचल का वह राज्य अधिकांशतः अरावली की अभेद्य पर्वत श्रृंखला से परिवेष्टिता है। उपत्यकाओं के परकोटे सामरिक दृष्टिकोण के अत्यन्त उपयोगी एवं महत्वपूर्ण है। इन्ही परकोटों के बीच छोटी - बडी अनेक पहाडियों को अपने सीने पर उठाए हुए समतल उपजाऊ एवं कुछ कम उपजाऊ मैदानी भू - भाग है। कुल मिलाकर यही मेवाड राज्य है। संभवतः मेव जाति का निवास होने के कारण मेववाड और बाद में मुख सुख के कारण मेवाड बन गया होगा। उदयपुर, चित्तौड, भीलवाडा वर्तमान में इनके तीन जिलें हैं।
मेवाड में गहलोत राजवंश - बप्पा ने सन 734 ई० में चित्रांगद गोरी परमार से चित्तौड की सत्ता छीन कर मेवाड में गहलौत वंश के शासक का सूत्रधार बनने का गौरव प्राप्त किया। इनका काल सन 734 ई० से 753 ई० तक था। इसके बाद के शासकों के नाम और समय काल निम्न था -
  1. रावल बप्पा ( काल भोज ) - 734 ई० मेवाड राज्य के गहलौत शासन के सूत्रधार।
  2. रावल खुमान - 753 ई०
  3. मत्तट - 773 - 793 ई०
  4. भर्तभट्त - 793 - 813 ई०
  5. रावल सिंह - 813 - 828 ई०
  6. खुमाण सिंह - 828 - 853 ई०
  7. महायक - 853 - 878 ई०
  8. खुमाण तृतीय - 878 - 903 ई०
  9. भर्तभट्ट द्वितीय - 903 - 951 ई०
  10. अल्लट - 951 - 971 ई०
  11. नरवाहन - 971 - 973 ई०
  12. शालिवाहन - 973 - 977 ई०
  13. शक्ति कुमार - 977 - 993 ई०
  14. अम्बा प्रसाद - 993 - 1007 ई०
  15. शुची वरमा - 1007- 1021 ई०
  16. नर वर्मा - 1021 - 1035 ई०
  17. कीर्ति वर्मा - 1035 - 1051 ई०
  18. योगराज - 1051 - 1068 ई०
  19. वैरठ - 1068 - 1088 ई०
  20. हंस पाल - 1088 - 1103 ई०
  21. वैरी सिंह - 1103 - 1107 ई०
  22. विजय सिंह - 1107 - 1127 ई०
  23. अरि सिंह - 1127 - 1138 ई०
  24. चौड सिंह - 1138 - 1148 ई०
  25. विक्रम सिंह - 1148 - 1158 ई०
  26. रण सिंह ( कर्ण सिंह ) - 1158 - 1168 ई०
  27. क्षेम सिंह - 1168 - 1172 ई०
  28. सामंत सिंह - 1172 - 1179 ई०
क्षेम सिंह के दो पुत्र सामंत और कुमार सिंह। ज्येष्ठ पुत्र सामंत मेवाड की गद्दी पर सात वर्ष रहे क्योंकि जालौर के कीतू चौहान मेवाड पर अधिकार कर लिया। सामंत सिंह अहाड की पहाडियों पर चले गये। इन्होने बडौदे पर आक्रमण कर वहां का राज्य हस्तगत कर लिया। लेकिन इसी समय इनके भाई कुमार सिंह पुनः मेवाड पर अधिकार कर लिया। 
  1. कुमार सिंह - 1179 - 1191 ई०
  2. मंथन सिंह - 1191 - 1211 ई०
  3. पद्म सिंह - 1211 - 1213 ई०
  4. जैत्र सिंह - 1213 - 1261 ई०
  5. तेज सिंह  -1261 - 1273 ई०
  6. समर सिंह - 1273 - 1301 ई०
समर सिंह का एक पुत्र रतन सिंह मेवाड राज्य का उत्तराधिकारी हुआ और दूसरा पुत्र कुम्भकरण नेपाल चला गया। नेपाल के राज वंश के शासक कुम्भकरण के ही वंशज हैं।
रतन सिंह ( 1301-1303  ई० ) - इनके कार्यकाल में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौडगढ पर अधिकार कर लिया। प्रथम जौहर पदमिनी रानी ने सैकडों महिलाओं के साथ किया। गोरा -  बादल का प्रतिरोध और युद्ध भी प्रसिद्ध रहा।
राजा अजय सिंह ( 1303 - 1326 ई० )  - हमीर राज्य के उत्तराधिकारी थे पर्न्तु अवयस्क थे। इसलिए अजय सिंह गद्दी पर बैठे।
महाराणा हमीर सिंह ( 1326 - 1364 ई० )  - हमीर ने अपनी शौर्य, पराक्रम एवं कूटनीति से मेवाड राज्य को तुगलक से छीन कर उसकी खोई प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की और अपना नाम अमर किया महाराणा की उपाधि धारं किया। इसी समय से ही मेवाड नरेश महाराणा उपाधि धारण करते आ रहे हैं।
महाराणा क्षेत्र सिंह ( 1364 - 1382 ई० ) -
महाराणा लाखासिंह ( 1382 - 11421 ई० ) - योग्य शासक तथा राज्य के विस्तार करने में अहम योगदान। इनके पक्ष में ज्येष्ठ पुत्र चुडा ने विवाह न करने की भीष्म प्रतिज्ञा की और पिता से हुई संतान मोकल को राज्य का उत्तराधिकारी मानकर जीवन भर उसकी रक्षा की।
महाराणा मोकल ( 1421 - 1433 ई० ) -
महाराणा कुम्भा ( 1433 - 1469 ई० ) - इन्होने न केवल अपने राज्य का विस्तार किया बल्कि योग्य प्रशासक, सहिष्णु, किलों और मन्दिरों के निर्माण के रुप में ही जाने जाते हैं। इनके पुत्र उदा ने इनकी हत्या करके मेवाड के गद्दी पर अधिकार जमा लिया।
महाराणा उदा ( उदय सिंह ) ( 1468 - 1473 ई० ) - महाराणा के द्वितीय पुत्र मे रायमल जो ईडर में निरासित जीवन व्यतितकर रहा था। आक्रमण करके उदय सिण्ह को पराजित कर सिंहासन की प्रतिष्ठा बचा ली। अन्यथा उदा पांच वर्षों तक मेवाड का विनाश करता रहा।
महाराणा रायमल ( 1473 - 1509 ई० ) - सबसे पहले महाराणा रायमल के माडु के सुल्तान गयासुद्दीन को पराजित किया और पानगढ, चित्तौड्गढ और कुम्भलगढ किलों  पर पुनः अधिकार कर लिया पूरे मेवाड को पुनर्स्थापित कर लिया। इसे इतना शक्तिशाली बना दिया कि कुछ समय के लिये बाह्य आक्रमण के लिये सुरक्षिर हो गया। लेकिन इनके पुत्र संग्राम सिंह, पृथ्वीराज और जयमल में उत्तराधिकारी हेतु कलह हुआ और अंततः दो पुत्र मारे गये। अन्त में संग्राम सिंह गद्दी पर गये।
महाराणा सांगा ( संग्राम सिंह ) ( 1509 - 1527 ई० ) - महाराणा सांगा उन मेवाडी महाराणाओं में एक था जिसका नाम मेवाड के ही वही, भारत के इतिहास में गौरव के साथ लिया जाता है। महाराणा सांगा एक साम्राज्यवादी व महत्वाकांक्षी शासक थे, जो संपूर्ण भारत पर अपना अधिकार करना चाहते थे। इनके समय में मेवाड की सीमा का दूर - दूर तक विस्तार हुआ। उनके हृदय में यह भावना रहती थी कि मेवाड के सिसोदिया वंश का इतिहास शूरता से रक्तरंजीत इतिहास है। जिसकी बराबरी दूसरा वंश नही कर सकता। महाराणा हिन्दु रक्षक, भारतीय संस्कृति के रखवाले, अद्वितीय योद्धा, कर्मठ, राजनीतीज्ञ, कुश्ल शासक, आश्चर्यजनक, सहनशक्ति, उच्चतम शक्तिशाली शरणागत रक्षक, मातृभूमि के प्रति समर्पित, शूरवीर, दूरदर्शी थे। इनका इतिहास स्वर्णिम है। जिसके कारं आज मेवाड के उच्चतम शिरोमणि शासकों में इन्हे जाना जाता है।
महाराणा रतन सिंह ( 1528 - 1531 ई० ) -
महाराणा विक्रमादित्य ( 1531 - 1534ई० ) - यह अयोग्य सिद्ध हुआ और गुजरात के बहादुर शाह ने दो बार आक्रमण कर मेवाड को नुकसान पहुंचाया इस दौरान 1300  महारानियों के साथ कर्मावती सती हो गई। विक्रमादित्य की हत्या दासीपुत्र बनवीर ने करके 1534 - 1537 तक मेवाड पर शासन किया। लेकिन इसे मान्यता नहीं मिली। इसी समय सिसोदिया के उदय सिंह को पन्नाधाय ने अपने पुत्र की जान देकर भी बचा लिया और मेवाड के इतिहास में प्रसिद्ध हो गई।
महाराणा उदय सिंह ( 1537 - 1572 ई० ) -  1537 ई० में उदय सिंह ने सरदारों के नेतृत्व में चित्तौडगड को पुनः जीत लिया। इनके काल में शेरशाह सूरी का आक्रमण हुआ जिससे उन्होने बिना युद्ध किये चित्तौडगड किला इन्होने दे दिया। अकबर के 1567 के आक्रमण के समय सपरिवार भाग गये। चार माह बाद 15 फ़रवरी 1568 को अकबर ने चित्तौडगढ  पर अधिकार कर लिया। ऐसे में रानियों ने जौहर किया। अकबर ने भयंकर कत्लेआम कराया। 40 हजार लोग मारे गये। इस युद्ध में जयमल और पत्ता ने अदभुत शौर्य का परिचय दिया। अकबर स्वयं इनकी प्रशंसा की और आगरे के किले के द्वार पर  उनकी मूर्तियां लगवाई। उनके ज्येष्ठ पुत्र प्रताप थे परन्तु अपने जिवन काल में उत्तराधिकार वे जगमाल को सौंप चुके थे अंततः सरदारों ने प्रताप को ही उत्तराधिकारी बनाया है।
महाराणा प्रताप ( 1572 -1597 ई० ) -  इनका जन्म 9 मई 1540 ई० मेम हुआ था। राज्य की बागडोर संभालते समय उनके पास न राजधानी थी न राजा का वैभव, बस था तो स्वाभिमान, गौरव, साहस और पुरुषार्थ। उन्होने तय किया कि सोने चांदी की थाली में नहीं खाऐंगे, कोमल शैया पर नही सोयेंगे, अर्थात हर तरह विलासिता का त्याग करेंगें। धीरे - धीरे प्रताप ने अपनी स्थिति सुधारना प्रारम्भ किया। इस दौरान मान सिंह अकबर का संधि प्रस्ताव लेकर आये जिसमें उन्हे प्रताप के द्वारा अपमानित होना पडा। परिणाम यह हुआ कि 21 जून 1576 ई० को हल्दीघाटी नामक स्थान पर अकबर और प्रताप का भीषण युद्ध हुआ। जिसमें 14 हजार राजपूत मारे गये। परिणाम यह हुआ कि वर्षों प्रताप जंगल की खाक छानते रहे, जहां घास की रोटी खाई और निरन्तर अकबर सैनिको का आक्रमण झेला, लेकिन हार नहीं मानी। ऐसे समय भीलों ने इनकी बहुत सहायता की। प्रताप की कठिनाईयों को सुनकर अकबर का भी हृदय कांप उठा। उसने प्रताप के तप, त्याग और बलिदान की प्रशंसा की। बादशाह अकबर ने सिसोदिया वंश के एक स्वाभिमानी पुत्र को छॊड कर सबको मोल ले लिया, परन्तु वह प्रताप को नहीं खरीद सका। अन्त में भामा शाह ने अपने जीवन में अर्जित पूरी सम्पत्ति प्रताप को देदी। जिसकी सहायता से प्रताप चित्तौडगढ को छोडकर अपने सारे किले 1588 ई० में मुगलों से छिन लिया। 15 जनवरी 1597 में चांडव में प्रताप का निधन हो गया।
प्रताप के शौर्य न केवल अनुकरणीय हैं, वंदनीय हैं, सराहनीय है, बल्कि जीवन के हर संघर्ष में पथ आलोकित करने वाली है। अकबर जैसे सम्राट से आजीवन संघर्ष करके उन्होने यह सिद्ध कर दिया कि यदि व्यक्ति ठान ले तो कुछ भी असंभव नहीं है। यही कारण है कि अकबर ने भी उनका लोहा माना। महाराणा प्रताप के जीवन से जुडी हुई ऐसी अनेक घटनाऐं है जो उनके हिन्दुत्व, प्रेम, आन - बान की रक्षा, अटूट देश भक्ति दृढ आत्मविश्वास, अदम्य साहस, दृढ संकल्प जैसे उत्कृष्ठ चारित्रिक गुणों की परिचायक है।
महाराणा अमर सिंह -(1597 - 1620 ई० ) - प्रारम्भ में मुगल सेना के आक्रमण न होने से अमर सिंह ने राज्य में सुव्यवस्था बनाया। जहांगीर के द्वारा करवाये गयें कई आक्रमण विफ़ल हुए। अंत में खुर्रम ने मेवाड पर अधिकार कर लिया। हारकर बाद में इन्होनें अपमानजनक संधि की जो उनके चरित्र पर बहुत बडा दाग है। वे मेवाड का अंतिम स्वतन्त्र शासक  है।
महाराणा कर्ण सिद्ध ( 1620 - 1628 ई० ) - इन्होनें मुगल शासकों से संबंध बनाये रखा और आन्तरिक व्यवस्था सुधारने तथा निर्माण पर ध्यान दिया।
महाराणा जगत सिंह ( 1628 - 1652 ई० ) -
महाराणा राजसिंह ( 1652 - 1680 ई० ) - यह मेवाड के उत्थान का काल था। इन्होनेण औरंगजेब से कई बार लोहा लेकर युद्ध में मात दी। इनका शौर्य पराक्रम और स्वाभिमान महाराणा प्रताप जैसे था। इनकों राजस्थान के राजपूतों का एक गठबंधन, राजनितिक एवं सामाजिक स्तर पर बनाने में सफ़लता अर्जित हुई। जिससे मुगल संगठित लोहा लिया जा सके। महाराणा के प्रयास से अंबेर, मारवाड और मेवाड में गठबंधन बन गया। वे मानते हैं कि बिना सामाजिक गठबंधन के राजनीतिक गठबंधन अपूर्ण और अधूरा रहेगा। अतः इन्होने मारवाह और आमेर से खानपान एवं वैवाहिक संबंध जोडने का निर्णय ले लिया। हालांकि महाराणा प्रताप के कट्टर समर्थक इअसका प्रबल विरोध कर दिया जिसे दबाने के लिये सिन्धिया नरेश "ग्वालियर" ने मदद किया। जिसके बदले मेवाड का बडा भू-भाग सिंधिया ने हथिया लिया।
महाराणा जय सिंह ( 1680 - 1698 ई० ) -
महाराणा अमर सिंह द्वितीय ( 1698 - 1710 ई० ) - इसके समय मेवाड की प्रतिष्ठा बढी और उन्होनें कृषि पर ध्यान देकर किसानों को सम्पन्न बना दिया। इनके निधन से मेवाड और राजस्थान की बडी क्षति हुई।
महाराणा संग्राम सिंह ( 1710 - 1734 ई० ) - महाराणा संग्राम सिंह दृढ और अडिग, न्यायप्रिय, निष्पक्ष, सिद्धांतप्रिय, अनुशासित, आदर्शवादी थे। इन्होने 18 बार युद्ध किया तथा मेवाड राज्य की प्रतिष्ठा और सीमाओं को न केवल सुरक्षित रखा वरन उनमें वृध्दि भी की।
महाराणा जगत सिंह द्वितीय ( 1734 - 1751 ई० )  - ये एक स्क्षम, अदूरदर्शी और विलासी शासक थे। इन्होने जलमहल बनवाया।
महाराणा प्रताप सिंह द्वितीय ( 1751 - 1754 ई० )  -
महाराणा राजसिंह द्वितीय ( 1754 - 1761 ई० )  -
महाराणा अरिसिंह द्वितीय ( 1761 - 1773 ई० )  -
महाराणा हमीर सिंह द्वितीय ( 1773 - 1778 ई० )  - इनके कार्यकाल में सिंधिया और होल्कर मेवाड राज्य को लूटपाट करके उसे तहस - नहस कर दिया। अर्थात अपनों ही ने अपनों को लूटा।
महाराणा भीमसिंह ( 1778 - 1828 ई० )  -  इनके कारकाल में भी मेवाड आपसी गृहकलह से दुर्बल होता चला गया। आर्थिक जर्जरता के कारण मराठों से पांच लाख कर्ज लेना पडा। वस्तुतः अब मेवाड सिन्धि भी होल्कर आंबा लकवा के लिये चारागाह हो गया। मेवाड राज्य की नियती यह हो गई कि युद्ध कोई भी करे या लडे क्षतिपूर्ति मेवाढ राज्य को ही देनी होती। होल्कर और सिंधिया धन वसूली कर करके मेवाड राज्य को बरबादी के कगार पर पहुंचा दिया। 13 जनवरी 1818 को ईस्ट इंडिया कम्पनी और मेवाड राज्य में समझौता हो गया। अर्थात मेवाड राज्य ईस्ट इंडिया के साथ चला गया।
मेवाड राज्य में ब्रिटिश सेना के पहुंच जाने मात्र से ही मेवाड को जीवनदान मिल गया। मराठों ,पठानों और पिडारियों का भी हस्तक्षेप बंद हो गया। उदंड भील भी मार्यादित आचरण करने लगे। मेवाड के पूर्वजों की पीढी में बप्पारावल, कुम्भा, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप जैसे तेजस्वी, वीर पुरुषों का प्रशासन मेवाड राज्य को मिल चुका था। प्रताप के बाद अधिकांश पीढियों में वह क्षमता नहीं थी जिसकी अपेक्षा मेवाड को थी। महाराजा भीमसिंह योग्य व्यक्ति थे\ निर्णय भी अच्छा लेते थे परन्तु उनके क्रियान्वयन पर ध्यान नही देते थे। इनमें व्यवहारिकता आभाव था। इनके समय चतुर्दिक अराजकता फ़ैल गई। लेकिन ब्रिटिश एजेन्ट से तालमेल बैठाकर इस अराजकता की एक -एक करके दूर किया जाने लगा। कृषि, व्यापार उन्नत होने लगा। ब्रिटिश एजेन्ट के मार्गदर्शन, निर्देशन एवं सघन पर्यवेक्षण से मेवाड राज्य प्रगति पथ पर अग्रसर होता चला गया। 

महाराणा जवान सिंह ( 1828 - 1838 ई० )  - निःसन्तान। सरदार सिंह गोद ले लिया था।
महाराणा सरदार सिंह ( 1838 - 1842 ई० )  - निःसन्तान। भाई को गई थी।
महाराणा स्वरुप सिंह ( 1842 - 1861 ई० )  - इनके समय 1857 की क्रान्ति हुई। इन्होनेण विद्रोह कुचलने में अंग्रेजों की मदद की। सतीप्रथा बंद करा दिये।
महाराणा शंभू सिंह ( 1861 - 1874 ई० ) - निःसन्तान। शंभू सिंह को कोद दिया। 1868 में घोर अकाल पडा। अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढा।
महाराणा सज्जन सिंह ( 1874 - 1884 ई० )  - बागोर के महाराज शक्ति सिंह के कुंवर सज्जन सिंह को महाराणा का उत्तराधिकार मिला। उत्तराधिकार का झगडा शुरु हो गया। ब्रिटिश एजेन्ट ने इन्हे स्वीकृति दे दी। इन्होनें राज्य की दशा सुधारनें में उल्लेखनीय योगदान दिया।
महाराणा फ़तह सिंह ( 1883 - 1930 ई० )  - सज्जन सिंह के निधन पर शिवरति शाखा के गजसिंह के अनुज एवं दनक पुत्र फ़तेहसिंह को महाराणा बनाया गया। फ़तहसिंह कुटनीतिज्ञ, साहसी स्वाभिमानी और दूरदर्शी थे। क्रान्तिकारी की भी गुप्त रुप से मदद करते थे। महाराणा की सोच एवं कार्यप्रणाली अंग्रेजों के हित में नहीं थी। लेकिन भूपाल सिंह को अंग्रेजों ने अपने वस में करके पिता फ़तहसिंह को झुका दिया। मेवाड राज्य की जर्जर अर्थव्यवस्था को महाराणा ने अपनी पूरी क्षमता से सुदृढ बनाया। अपने उत्तराधिकारियों को महाराणा ने एक सुदृढ अर्थ्व्यवस्था एवं राज्यकोष सौंपा, कर्ज नहीं सौंपा था।
महाराणा भूपाल सिंह (1930 - 1955 ई० )  - वैसे तो अंग्रेजों ने मिलकर 1921 में मेवाड की प्रशासनीक सत्ता छिन ली थी भले औपचारिक गद्दी 1930 में मिली। विदेश शासन के हस्तक्षेप एवं स्थानीय केन्द्रीय शासन की उदासीनता से जमीनदार निरवंश हो गये थे। किसानों में विद्रोह भरता जा रहा था। शिक्षा की हालत दयनीय थी इनके समय भारत को स्वतन्त्रता मिली और भारत या पाक मिलने की स्वतंत्रता। भोपाल के नवाब पाक में मिलना चाहते थे और मेवाड को भी उसमें मिलाना चाहते थे। इस पर उन्होनें कहा कि मेवाड भारत के साथ था और अब भी वहीं रहेगा। यह कह कर वे इतिहास में अमर  हो गये। स्वतंत्र भारत के वृहद राजस्थान संघ के भूपाल सिंह प्रमुख बनाये गये।
महाराणा भगवत सिंह ( 1955 - 1984 ई० )  - में शिवरती शाखा के थे। गोद लिये गये थे।
महाराणा महेन्द्र सिंह 1984 ई० - में अखिल भारतीय महासभा के भी अध्यक्ष  रहे। महेन्द्र सिंह एक समाजसेवी व्यक्ति थे।
इस तरह 556 ई० में जिस गुहिल वंश की स्थापना हुई बाद में वही सिसोदिया वंश के नाम से जानी गयी। जिसमें कई प्रतापी राजा हुए, जिन्होने इस वंश की मानमर्यादा, इज्जत और सम्मान को न केवल बढाया बल्कि इतिहास के गौरवशाली अध्याय में अपना नाम जोड दिया। महाराणा महेन्द्र तक यह वंश कई उतार-चढाव और स्वर्णिम अध्याय रचते हुए आज भी अपने गौरव और श्रेष्ठ परम्परा के लिये जाना पहचाना जाता है। मेवाड अपनी समृद्धि, परम्परा, अधभूत शौर्य एवं अनूठी कलात्मक अनुदानों के कारण संसार के परिदृश्य में दे दीप्यमान है। स्वाधिनता एवं भारतीय संस्कृति की अभिरक्ष के लिए इस वंश ने जो अनुपम त्याग और अपूर्व बलिदान दिये सदा स्मरण किये जाते रहेंगे। मेवाड की वीर प्रसूता धरती में रावल बप्पा, महाराणा सांगा, महाराण प्रताप जैसे सूरवीर, यशस्वी, कर्मठ, राष्ट्रभक्त व स्वतंत्रता प्रेमी विभूतियों ने जन्म लेकर  न केवल मेवाड वरन संपूर्ण भारत को गौरान्वित किया है। स्वतन्त्रता के अखल जगाने वाले प्रताप आज भी जन-जन के हृदय में बसे हुये, सभी स्वाभिमानियों के प्रेरक बन हुए है। धन्य है वह मेवाड और धन्य सिसोदिया वंश जिसमें ऐसे ऐसे अद्वीतिय देशभक्त दिये।

1 महाराणा प्रताप: सूरवीर राष्ट्रभक्त 
2 वीर सपूत महाराणा प्रताप
3 महाराणा प्रताप की जयंती
महाराणा प्रताप कठे
http://arvindsisodiakota.blogspot.in/2010/06/blog-post_15.html 




वीर सपूत महाराणा प्रताप



४ जून २०११ को तिथि के अनुसार जन्मदिन है ........
http://www.pravakta.com/story/10555

पराक्रमी देशभक्त - महाराणा प्रताप 
_ विनोद बंसल
देश और धर्म की रक्षा के लिए प्रण-पण से अपने आपको आहूत कर देने वाले महान पुरूषों में मेवाड सपूत महाराणा प्रताप का नाम सदा अग्रणी रहा है। जब मुगलों के आतंक व अत्याचार के चलते लोग हताश हो रहे थे ऐसे समय वीर बालक महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की भूमि को मुगलों के चंगुल से छुड़ाने हेतु न सिर्फ वीरता पूर्वक संघर्ष किया बल्कि समस्त देशवासियों के लिए एक अनन्य प्रेरणा का संचार किया।
ज्येष्ठ शुक्ल तीज सम्वत् 1597 को मेवाड़ के राजा उदय सिंह के घर जन्मे उनके ज्येष्ठ पुत्र महाराणा प्रताप को बचपन से ही अच्छे संस्कार, अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान और धर्म की रक्षा की प्रेरणा अपने माता-पिता से मिली। उन दिनों दिल्ली में सम्राट अकबर का राज्य था जो भारत के सभी राजा-महाराजाओं को अपने अधीन कर मुगल साम्राज्य का ध्वज फहराना चाहता था। मेवाड़ की भूमि को मुगल आधिपत्य से बचाने हेतु महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मेवाड़ आजाद नहीं होगा, मैं महलों को छोड़ जंगलों में निवास करूंगा, स्वादिष्ट भोजन को त्याग कंदमूल फलों से ही पेट भरूंगा किन्तु, अकबर का अधिपत्य कभी स्वीकार नहीं करूंगा। 1576 में हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप और अकबर के बीच ऐसा युद्ध हुआ जो पूरे विश्व के लिए आज भी एक मिसाल है। अभूतपूर्व वीरता और मेवाड़ी साहस के चलते मुगल सेना के दांत खट्टे कर दिये और सैकड़ों अकबर के सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया गया।
बालक प्रताप जितने वीर थे उतने ही पितृ भक्त भी थे। पिता राणा उदयसिंह अपने कनिष्ठ पुत्र जगमल को बहुत प्यार करते थे। इसी कारण वे उसे राज्य का उत्ताराधिकारी घोषित करना चाहते थे। रामायण के प्राण धन भगवान श्रीराम के राज्य त्याग व वनवास के आदर्श के सदा पुजारी रहे महाराणा प्रताप ने पिता के इस निर्णय का तनिक भी विरोध नहीं किया। उनके मन में बाल्यावस्था से ही सदा यही बात खटकती थी कि भरत भूमि विदेशियों की दास्तां की बेड़ियों में सिसक रही है। स्वदेश मुक्ति की योजना में वे सदा चिंतनशील रहते थे। कभी-कभी बालक प्रताप महाराणा कुंभ के विजय स्तम्भ की परिक्रमा कर मेवाड़ की धूलि मस्तक पर लगा, कहा करते थे कि, ”मैने वीर छत्राणी का दुग्ध पान किया है। मेरे रक्त में राणा सांगा का ओज प्रवाहित है। चित्तौड़ के विजय स्तम्भ ! मैं तुमसे स्वतंत्रता और मातृ भूमि भक्ति की शपथ लेकर कहता हूं कि तुम सदा उन्नत और सिासौदिया गौरव के विजय प्रतीक बने रहोगे। शत्रु तुम्हे अपने स्पर्श से मेरे रहते अपवित्र नहीं कर सकते।”
जंगल-जंगल भटकते हुए तृण-मूल व घास-पात की रोटियों में गुजर बसर कर पत्नी व बच्चे को विकराल परिस्थितियों में अपने साथ रखते हुए भी उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया। पैसे के अभाव में सेना के टूटते हुए मनोबल को पुनर्जीवित करने के लिए दानवीर भामाशाह ने अपना पूरा खजाना समर्पित कर दिया। तो भी, महाराणा प्रताप ने कहा कि सैन्य आवश्यकताओं के अलावा मुझे आपके खजाने की एक पाई भी नहीं चाहिए। ऐसे पराक्रमी भारत मां के वीर सपूत महाराणा प्रताप को जन्म दिन तिथि के अनुसार (4 जून) पर राष्ट्र का शत्-शत् नमन।

1 महाराणा प्रताप: सूरवीर राष्ट्रभक्त 
2 वीर सपूत महाराणा प्रताप
3 महाराणा प्रताप की जयंती
महाराणा प्रताप कठे
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रविवार, 29 मई 2011

संविधान के पुनर्लेखन की जरूरत

- अरविन्द सिसोदिया 
      यह सही है की जब भारत का संविधान बना तब , भारत पर अंग्रेजों का अत्यधिक प्रभाव था , जवाहरलाल नेहरु परोक्ष गुलामी के दस्ताबेज कामनवेल्थ पर दस्तखत करके , ब्रिटेन की महारानी और अंग्रेजी ताज के प्रति प्रतिवद्धता संधि कर चुके थे ! अंगेजो और नेहरूजी की सांठ - गांठ से बना संविधान देश पर तब  लागू हुआ | उसमें आज तक लगभग १०० से अधिक संशोधन हो चुके हैं | इसे भारतीय स्थिति के प्रतिकूल ; संघ के पूर्व सरसंघ चालक सम्मानीय  सुदर्शन जी ने भी ठहराया था, भारतीय स्थिति,देशहित और  वास्तविक लोकतंत्र के लिए संविधान को नए सिरे से लिखे जाने की जरूरत बताया था | इसलिए डॉ. मुरली मनोहर जोशी के वक्तव्य का स्वागत किया जाना चाहिए |
 *  लोक लेखा समिति के अध्यक्ष व वरिष्ठ भाजपा नेता सांसद डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने बदलते समय और राष्ट्रीय भावना की मांग के अनुसार भारतीय संविधान के पुनर्लेखन की जरूरत पर जोर दिया है। लागू संविधान को ब्रितानी हुकूमत के नियमों का रूपांतर करार देते हुए भाजपा नेता ने प्रकारांतर से इस मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस की शुरूआत की। उनका कहना था कि यह संविधान भारत की मनीषा से नहीं उत्पन्न हुआ है और यह भारत की जनता के मन को प्रकट करने वाला नहीं है। इसमें राष्ट्र शब्द का उल्लेख तक नहीं किया गया है। डा. जोशी ने कहा कि जब संविधान लिखा जा रहा था तब भी देश के राष्ट्रवादी नेताओं ने राष्ट्रीय भावनाओं के प्रतिबिंबन के हवाले से अपनी असहमति जताई थी मगर उनके मशवरे की अनसुनी की गई।

शनिवार, 28 मई 2011

सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो शुंगुलू समिति के आरोपों की जांच


- अरविन्द सिसोदिया 
   जिस भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद और महत्वपूर्ण पदाधिकारी रहे सुरेश कलमाड़ी जेल में बंद हैं तथा उसी आयोजन से जुड़े दिल्ली सरकार के भ्रष्टाचार को केंद्र सरकार की जांच कमेटी शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट में दोषी ठहराया गया है ..! इसलिए मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को तुरंत पद से हटाया जाना चाहिए  अन्यथा जांच हो ही नहीं सकेगी ..? हाल ही में उन्होंने जिस तरह से रिपोर्ट रद्द की यह स्थिति खुद ही बता रही है की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सच सामनें नहीं आने देंगी..!!
* शीला दीक्षित जितनी ही कोशिश कर रही हैं शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट को नकारने की वो इस जाल उतनी ही फंसती जा रही हैं. मुश्किल ये कि विपक्ष के साथ-साथ अब उनकी पार्टी से भी विरोध के सुर निकलने लगे हैं. कांग्रेस के दिल्ली प्रभारी वीरेंद्र सिंह चौधरी ने कहा है कि कमेटी की सिफारिशों पर आगे जांच होनी चाहिए.
शुंगलू रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के लिए अपनी ही पार्टी के अंदर से मुश्किलें पैदा हो रही हैं. शीला दीक्षित शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट को खारिज कर चुकी हैं लेकिन पार्टी के महासचिव वीरेंद्र सिंह चौधरी मानते हैं कि आगे भी जांच होनी चाहिए.
* विभिन्न जांच एजेंसियों की छानबीन में जिस तरह से बडे पैमानें पर राष्ट्रमंडल घोटालों की परत दर परत खुल रही है उसे देखते हुए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और राज्य सरकार के वे मंत्री जिनकी देखरेख में इन परियोजनाओं का काम किया गया है तुरन्त पद से हटाकर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में इन पर मुकदमा चलाकर दोषियों को सजा दी जाए।
पहले नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) और उसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा गठित शुंगुलू समिति, केन्द्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) और अब केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने राज्य सरकार पर राष्ट्रमंडल खेलों की परियोजनाओं में बडे पैमाने पर भ्रष्टाचार, आपराधिक लापरवाही, ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने, अयोग्य व्यक्तियों को ठेका देने और परियोजनाओं को शुरू करने में देरी के आरोप  हैं।इसे देखते हुए दीक्षित और इन परियोजनाओं को देखने वाले मंत्रियों को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं रह गया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पर गैर जरूरी परियोजनाओं में अनाप शनाप तरीके से धन की बडे पैमाने पर बर्बादी, घटिया सामग्री इस्तेमाल करने और अपनी चहेती कंपनियों को लूटने की खुली छूट देने जैसे आरोप भी राज्य सरकार पर लगाए गए हैं।
मुख्यमंत्री और उन मंत्रियों जिनकी देखरेख में राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़ी परियोजनाओं को जारी किया गया उन्हें तत्काल प्रभाव से उनके पदों से हटा कर इनके कार्यकाल में करवाए गए सभी कार्यों की जांच निष्पक्ष एजेंसी से कराई जाए। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में इन पर मुकदमा चलाया जाए और दोषियों को सजा दी जाए।

वीर सावरकर



- अरविन्द सिसोदिया 
  भारतीय स्वतंत्रता के महान पुरोधा वीर विनायक दामोदर सावरकर की आज जयंती है , उन्हें शत शत नमन!
 विनायक दामोदर सावरकर (२८ मई, १८८३ - २६ फरवरी, १९६६)  भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। उन्हें प्रायः वीर सावरकर के नाम से सम्बोधित किया जाता है। हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा (हिन्दुत्व) को विकसित करने का बहुत बडा श्रेय सावरकर को जाता है। ये न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रांतिकारी, चिंतक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वे एक ऐसे इतिहासकार भी हैं जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रमाणिक ढंग से लिपिबद्ध किया है। उन्होंने १८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिख कर ब्रिटिश शासन को हिला डाला था।
लिक्स.....

शुक्रवार, 27 मई 2011

बिनायक सेन : भारतीय अदालतों में विदेशी षडयंत्रकारीयों को अनुमति क्यों ..?


- अरविन्द सिसोदिया 
     भारत  में कांग्रेस सरकार को यह अधिकार किसनें दे दिया कि वह देश को फिरसे विदेशी गुलामी में धकेले और व्यवस्था कि छिन्न भिन्न करावा कर, अपराधियों के हाथ में सत्ता  को परोक्ष सोंप दे ..!! आतंकवाद से लेकर नक्सलवाद तक यही हो रहा है !! हर बड़ा अपराधी देश का बाप हो जाता है , उसकी आवभगत दामाद कि तरह होनें लगाती है , यह क्या पाखंड है देश के साथ ..!! 
       जिस तरह अमरीका और उसके मित्र देशों नें सोवियत रूस के खिलाफ अफगानिस्तान में पाकिस्तान के माध्यम से तालिवान और आतंकवादियों को पैदा किया और फिर वे ही अब नासूर बन गए , येसा ही  कार्य पश्चिमी देशों के पाखंडी तत्व , नक्सलवादियों को समर्थन देकर कर रहे हैं , उनकी हाँ हजूरी में कांग्रेसियों और एनी कुछ लोगों का खड़ा होना दुर्भाग्यपूर्ण है ! 

यह बात बहुत पहले २००८ में ही स्पष्ट हो गई थी कि नक्सलवादियों को ईसाई मिशनरीज   का परोक्ष अपरोक्ष सहयोग है और इनमें भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक  और राजनैतिक व्यवस्था को हथियानें का कोई करार है! यह तथ्य उड़ीसा में स्वामी लक्ष्मणानन्द  सरस्वती की हत्या के अवसर पर सामनें आई थी ! कुख्यात नक्सली नेता स्ब्यसांची पांडा ने इस हत्या की जोम्मेवारी ली थी ! तब यही मन गया था की यह इसाई मिसनारियों के हित में किया गया है , क्यों कि  स्वामी लक्ष्मणानन्द  सरस्वती के प्रयासों से आदिवासी क्षेत्रों में इसाई मिसनारियों का  धर्मान्तरण बहुत कमजोर पड़ गया था | 
 हालाँकि आंध्र प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस ने इन्ही नक्शालियों कि मदद से चंद्रबाबू नायडू से चुनाव जीता था , तब बताया गया था कि नक्शालियों नें एक लाल परचा बाँट कर कांग्रेस को जिताया था | नक्सलपंथ के यूरोपीय सहयोगियों का असली चेहरा उजागर करनें का समय आ गया है , ताकि सच को पहचाना जा सके ..! 
  * भारत सरकार के केन्द्रीय गृह मंत्रालय नें , उच्चतम न्यायलय में नक्सल समर्थक बिनायक सेन कि जमानत याचिका सुनवाई पर, उसके पर्यवेक्षण की अनुमति यूरोपियन संघ के तीन सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल को दी ...? ये तीन सदस्य फ्रांस के रफेल मार्टिन डे लागरडे , डेनमार्क कि मिस लूइस डे ब्रास  और यूरोपियन यूनियन की मिस वोगियर चटर्जी थे | 
* इसी वर्ष जनवरी में केंद्र सरकार नें बेल्जियम , डेनमार्क , जर्मनी , फ्रांस , हंगरी , स्वीडन , यूनाइटेड किंगडम और  यूरोपियन यूनियन  के दिल्ली स्थित दूतावासों के प्रतिनिधियों को छतीसगढ़ उच्च  न्यायलय में बिनायक सेन मामलें में चल रही सुनवाई के पर्यवेक्षण कि अनुमति दी | 
*हाल ही में ११ मई २०११ को, केंद्र सरकार नें योजना आयोग के सदस्य के रूप में बिनायक सेन को सम्मिलित किया है | एक सजा याफ्ता व्यक्ति जिसे अभी तक न्यायलय नें देश के खिलाफ युद्ध छेडनें के लिए नक्सलियों से सांठ - गांठ का दोषी ठहराया हुआ है , उसे योजना आयोग में सदस्य बना कर देश को क्या सन्देश दिया गया है , यह केंद्र सरकार ही बता सकती है , किन्तु इस से यह सवित हो गया कि नक्सल और कांग्रेस और ईसाई देशों में कनेक्शन है ..! 

*बिलासपुर हाईकोर्ट में भी सुरक्षा बढ़ा दी गई है, जहां बिनायक सेन की जमानत अर्जी पर सोमवार को सुनवाई होनी है। बेल्जियम, जर्मनी, स्वीडन, फ्रांस, हंगरी और ब्रिटेन के प्रतिनिधियों समेत कुल आठ लोगों का यह दल रविवार रात रायपुर पहुंचा तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लगभग सौ कार्यकर्ताओं ने हवाई अड्डे के बाहर नारेबाजी की और काले झंडे दिखाकर अपना विरोध जताया। वे ईयू प्रतिनिधिमंडल के वापस जाने की मांग कर रहे थे।
दूसरी तरफ, कुछ जानकारों का कहना है कि ऎसा शायद पहली बार हो रहा है कि कोई विदेशी प्रतिनिधिमंडल अदालती कार्यवाही के दौरान अदालत में मौजूद रहने पर अड़ा हो। इससे पहले इस संबंध में यूरोपीय संघ ने भारत के विदेश मंत्रालय से अदालत की कार्यवाही देखने की अनुमति मांगी थी। इस दल में हंगरी के पीटर किम्पियन, फ्रांस के राफेल मार्टिन, स्वीडन की एलग्जांद्रा बर्ग, जर्मनी के फ्लोरियन बुकहार्ट, बेल्जियम के जोकहेन और ब्रिटेन के लेन टि्वग्ग शामिल हैं। जिस विमान से यह प्रतिनिधिमंडल रायपुर पहुंचा, उसी से भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद और मशहूर वकील राम जेठमलानी भी पहुंचे। वे बिनायक सेन की तरफ से सोमवार को हाईकोर्ट में पैरवी करेंगे।

वेल्लूर के प्रतिष्ठित क्रिस्चियन मेडिकल कॉलेज से पढ़ाई करने वाले सेन ने जमानत मांगते हुए दलील दी थी कि निचली अदालत ने उन्हें दोषी ठहराते हुए भूल की है जबकि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है.
न्यायमूर्ति एच एस बेदी और न्यायमूर्ति सीके प्रसाद की पीठ ने 11 अप्रैल को सुनवाई टाल दी थी. तब छत्तीसगढ़ सरकार ने मामले में दलील देने के लिए और समय मांगा था.पिछली सुनवाई के दौरान सेन के परिजन, पीयूसीएल के कार्यकर्ता और सेन के मामले पर निगरानी रख रहे यूरोपीय संघ के दो सदस्य मौजूद थे.सेन की जमानत अर्जी का विरोध करते हुए प्रदेश सरकार ने अपने हलफनामे में कहा था कि सेन को कोई राहत नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि उनके कट्टर नक्सलियों से करीबी रिश्ते हैं.
* तथा कथित  मानवाधिकार कार्यकर्ता बिनायक सेन (Binayak Sen) को ग्वांगजू पुरस्कार-2011 (Gwangju award-2011) 18 मई को प्रदान किया जाना है. बिनायक सेन का चयन करने वाली 32 सदस्यीय समिति ने अपने निर्णय में बताया कि चिकित्सक के रूप में डॉ बिनायक सेन (Binayak Sen) ने गरीबों को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराकर और उन पर होने वाली हिंसा व मानवाधिकार हनन के खिलाफ पुरजोर वकालत कर खुद को विशिष्ट बना लिया.( यह बिलकुल झूठ है सच यह है कि वे नक्सलादियों के मुबिर के रूपमें काम कर रहे हैं )
 ग्वांगजू पुरस्कार (Gwangju award) प्रत्येक वर्ष एशिया में मानवाधिकार, शांति, लोकतंत्र और न्याय के लिए काम करने वालों को दिया जाता है. इससे पहले मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला को भी यह पुरस्कार मिल चुका है.

 

गुरुवार, 26 मई 2011

पाकिस्तान में रहनें वाले हिन्दुओं की दर्दनाक रिपोर्ट : इण्डिया टुडे


इण्डिया टुडे के १ जून २०११ का अंक बाजार में आचुका है , इसमें पाकिस्तान में रहनें वाले हिन्दुओं की दर्दनाक रिपोर्ट छपी है , पढ़े  और महामहिम राष्ट्रपति महोदया और प्रधान मंत्री महोदय को पत्र लिखें , की वह हिन्दुओं के  मानव अधिकारों की रक्षा  के लिए कुछ करें ..! पूरी दुनिया में फैले हुए उन मानव अधिकारवादियों को भी आव्हान करें कि वे हिन्दुओं के साथ होनें वाले मानव अधिकार उलंघन को भी देखें ..!

मंगलवार, 24 मई 2011

सावधान भारत ...पाक परमाणु बम आतंकवादियों के हाथ में ....


* अरविन्द सिसोदिया 
- सावधान भारत ...पाक परमाणु बम आतंकवादियों के हाथ में ....
- संयक्त राष्ट्र संघ पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को अपने कब्जे में ले
पाकिस्तान में परमाणु बम भी आतंकवादियों के कब्जे में जा सकते हैं ,क्यों कि पाकिस्तान के मेहरान नौसेना के एयरबेस पर पर जहाँ  हमला कर कब्जे में लिया गया था उससे मात्र २४ किलोमीटर दूर पर पाकिस्तान का परमाणु जखीरा मौजूद था | यदि हमलावरों ने इस जखीरे पर कब्ज़ा कर लिया होता तो क्या होता ...! यह तो तय हो गया कि अब पाकिस्तान असुरक्षित राष्ट्र हो गया है , उसके परमाणु बम और अन्य हथियार सुरक्षित नहीं है ! ये किसी भी वक्त आतंकवादियों के हाथ में जा कर मानवता कि तवाही मचा सकते हैं ..!! संयक्त राष्ट्र संघ पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को अपने कब्जे में ले . यही अच्छा होगा ! भारत कि विश्व स्तर पर इस तरह कि सक्रिय पहल करनी चाहिए, क्यों कि इस तरह के हालत उत्पन्न होनें पर भारत को ही सबसे ज्यादा तवाही झेलनी पड़ सकती है | 
   आतंकवादियों पर,सुरक्षाबलों को काबू पानें में पसीनें छुट गए हैं ..!  इस में पाकिस्तानी सेना के 10 जवान मारे गए, जबकि 15 घायल हो गए। मुठभेड़ में 5 आतंकी मारे गए और 7 को गिरफ्तार किया गया है। पाकिस्तानी तालिबान ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए इसे अल कायदा के आतंकवादी ओसामा बिन लादेन की मौत का इंतकाम करार दिया है। 

सोमवार, 23 मई 2011

तकरार से शिरुआत यूपीए २ के तीसरे साल की ...






- अरविन्द सिसोदिया 
यूपीए २ के दो साल पूरे होनें और तीसरी साल शिरू होनें के अवसर पर , दो बड़े घटकों के मुखिया जश्न में शामिल नहीं हुए | यूपीए की सरकार में कांग्रेस के साथ जो दो सबसे बड़े घटक हैं वे हैं ममता बनर्जी उनकी पार्टी पर १९ संसद हैं , दुसरे हैं द्रुमुक जो १८ सांसदों के साथ है | अब ये दिनों नाराज हैं .., मगर सबक नहीं सिखा सकते .., क्यों कि मुलायम और मायावती कांग्रेस को समर्थन देनें , सर्कार में शामिल होनें तैय्यार बैठे हैं ..| क्योंकि दोनों आय से अधिक संम्पत्ति के मामलों में फंसे हुए है और कांग्रेस ने ही सी बी आई के द्वारा डोर को अभी ढील देने के इशारे के कारण, मामला सुस्ती में है |
ममता इसलिए नाराज है कि उसके शपथ ग्रहण समारोह में सोनिया नहीं पहुची , करुनानोधी इसलिए नाराज हैं क्वात्रोच्ची बचाया जा सकता है तो उनकी बेटी भी बचाई जा सकती थी , कांग्रेस सोची समझी साजिस के तहत ही उन्हें फंसा रही है ! इन कारणों से दोनों प्रमुख घटक दलों के मुख्यों कि जगह उनके प्रतिनिधि ही प्रधान मंत्री  के द्वारा दी गई पार्टी में पहुचे |

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रविवार, 22 मई 2011

मुकेश अंबानी का 27 मंजिलों वाला नया घर : स्वतंत्रता का अनर्थ ही कहा जाएगा

- अरविन्द सिसोदिया 
  क्या भारत के गरीवों के मुह पर यह तमांचा  नहीं है की मुकेश अंबानी या अन्य कोई इतनें बड़े मकानों में रहे की वह अन्य नागरिकों की भावनाओं को अपमानित करे ..? समता के संवैधानिक मूल अधिकार पर आघात करे .., भारत सरकार तय करे की एक नागरिक को अधिकतम कितना स्थान आवास हेतु चाहिए ..? १००० वर्ग फुट, १५०० या २००० वर्ग फुट ...अनाप सनाप क्यों ..असीमित क्यों.! यह स्वतंत्रता का अनर्थ ही कहा जाएगा !!
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 मुकेश अंबानी का 27 मंजिलों वाला नया घर , एक चॅनल के अनुसार २० लाख वर्ग फीट में बनें इस बंगले में , ४ मंजिल गार्डन और ६ मंजिला पार्किंग , ५ सदस्यीय परिवार के लिए बनें इस महल में ६०० कर्मचारी साफ़ सफाई के लिए है | ७० लाख रूपये बिजली का बिल है | सुख-सुविधा इतनीं  की फाइव और इससे अधिक सितारा वाले  होटल भी कहीं नहीं लगते ..!! क्या यह एसो आराम , हराम नहीं है ..!!
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दुनिया के चौथे सबसे अमीर व्यक्ति रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष मुकेश अंबानी का 27 मंजिलों वाला नया घर दुनिया का सबसे महंगा घर है।प्रतिष्ठित पत्रिका ‘फोर्ब्स’ के मुताबिक अंबानी परिवार की इस माह अपने नए घर ‘अंतिला’ में प्रवेश करने की योजना है।


 
      स्थानीय समाचार पत्र ‘द टेलीग्राफ’ ने फोर्ब्स के हवाले से कहा है कि इस घर की कीमत 63 करोड़ पाउंड यानी करीब एक अरब डॉलर ( १ डालर लगभग ४५ से ५० रूपये के मध्य कीमत रखता है )है। यह दुनिया का सबसे महंगा घर है। इससे पहले वर्ष 2009 में पत्रिका की सूची में सबसे महंगा घर कैन्डी स्पेलिंग्स का बेवरली हिल्स स्थित मकान सबसे महंगा था जिसकी कीमत 15 करोड़ डॉलर थी।पत्रिका ने कहा कि एक अरब डॉलर का अंतिला दुनिया के किसी भी कोने में मौजूद महंगे घरों के मुकाबले सबसे महंगा घर है।
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         टाटा समूह के प्रमुख रतन टाटा ने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के प्रमुख मुकेश अंबानी के मुंबई में बने 27 मंज़िला घर 'एंटिला'के बारे में कहा है कि ये इस बात का उदाहरण है कि अमीर भारतीयों को ग़रीबों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है.लंदन के 'द टाइम्स' अख़बार को दिए इंटरव्यू में रतन टाटा ने कहा कि,''मुझे ये देखकर हैरानी होती है कि कोई ऐसा कैसे कर सकता है?''
रतन टाटा ने ये टिपण्णी अख़बार के भारत में आय की बढ़ती असमानता पर पूछे गए सवाल के जवाब में कही.
रतन टाटा ने ये भी कहा कि जो व्यक्ति इतने महंगे घर में रह रहा हो, उसे अपने आसपास के माहौल के प्रति भी संवेदनशील होना चाहिए और ख़ुद से ये सवाल पूछना चाहिए कि क्या वो इसमें कुछ बदलाव ला सकता है? अगर ऐसा नहीं है तो ये दुख का विषय है क्योंकि भारत को ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो अपनी अकूत संपत्ति का कुछ हिस्सा लोगों की परेशानियों को कम करने के उपाय ढूंढने में लगाने को तैयार हों.'द टाइम्स' को दिए इंटरव्यू में 73 वर्षीय रतन टाटा ने कहा कि, ''भारत में अमीरों और ग़रीबों के बीच जो खाई है उसे कम करने के लिए हम बहुत कम प्रयास कर रहे हैं, लेकिन चाहते ज़रूर हैं कि ये असमानता ख़त्म हो जाए.''

मदद का राजनीतिकरण


भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में ग्रेटर नोएडा के भट्टा परसौल में हुई हिंसा में गंभीर रूप से ज़ख्मी हुए लोगों को 50 हज़ार रुपए और मामूली रूप से ज़ख्मी हुए लोगों को 10 हज़ार रुपए की वित्तीय मदद देने का ऐलान किया है. २२ मई २०११ / रविवार को प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ़ से जारी बयान में इसकी सूचना दी गई है कि उत्तर प्रदेश के भट्टा परसौल और गौतम बुद्ध नगर ज़िले के अन्य इलाक़ों के ज़ख्मी किसानों और उनके परिवार के सदस्यों को ये वित्तीय मदद दी जाएगी.
      उत्तर प्रदेश राज्य सरकार द्वारा किए गए भूमि अधिग्रहण के एवज़ में ज़्यादा मुआवज़े की मांग कर रहे किसानों के हिंसक होने पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने कथित तौर पर उनकी पिटाई की थी.इस हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी जबकि ज़िला कलक्टर और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ज़ख्मी हो गए थे.
पिछले हफ़्ते कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के किसानों के समर्थन में भट्टा परसौल पहुंचने और पीड़ित किसानों के परिजनों के साथ पूरा दिन बिताने पर ये एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया था.इसके बाद माहौल बिगड़ने की आशंका को देखते हुए पुलिस ने राहुल गांधी को ग़िरफ़्तार कर लिया था हालांकि कुछ ही घंटे बाद उन्हें छोड़ दिया गया था.
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने कांग्रेस पर मामले का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया था.
पूर्व बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी भट्टा परसौल पहुंचने की कोशिश की थी लेकिन उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दी गई थी.इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के रवैये और राज्य में बढ़ते कथित क़ानून-व्यवस्था के संकट के ख़िलाफ़ गाज़ियाबाद में 24 घंटे का उपवास किया था.

यूपीए २ .......दो साल .. भूल गया सब कुछ .. याद रही मंहगाई .....


- अरविन्द सिसोदिया 
यूपीए २  .......दो साल .. 
भूल गया सब कुछ .. याद रही मंहगाई ..... 
.......पिछले काफी समय से आम जनता मांहगाई से परेशान है, काफी धरने और हा-हा-कर कर के भी देख लिया सबने, लेकिन यूपीये सरकार के कानो पर जूं तक नहीं रैंगी। प्रधानमंत्री जी ने भी जनता को कह दिया कि वो इस बारे में चर्चा करेंग और कहे मुताबिक उन्होंने मांहगाई के मुद्दे पर काफी विचार-विमर्श भी किया। अब आप सोच रहे होंग की भाई उन्होंने तो ठीक ही किया है, जनता कि परेशानी को समझा और उस पर विचार भी किया। भाई वो तो बहुत अच्छे प्रधानमंत्री है, लेकिन मुझे ये समझाए कि सिर्फ चर्चा करने भर से ही परेशानी का हल थोड़ी निकल आता है। प्रधानमंत्री साहब के सामने जब भी कोई समस्या रखता है तो वो उस समस्या पर अपने सभी ज्ञानी मंत्रियों के साथ बैठ कर चर्चा करते है। चाय पकोड़े खाते है, यूपीए सरकार के मंत्रियों को बस चाय-पकोड़े खाने में ही दो-चार घंटों का समय लग जाता है और चाय-पकोड़े खाने में ही चर्चा का सार समय खत्म हो जाता है। तभी तो चर्चा करने के बाद भी प्रधानमंत्री साहब के पास जनता की समस्याओं का कोई हल नहीं होता है। लेकिन ठीक तो है इसी बहाने प्रधानमंत्री साहब चाय-पकोडे भी खा लेते है और इसी बहाने वो अपने मंत्री मंडल का हाल-चाल भी जान लेते है। जनता का क्या हो उसका तो काम ही हो-हल्ला मचाना है, और वैसे भी बैबस आदमी हो-हल्ला करने के आलावा और कर भी क्या सकता है ? 



नई दिल्ली [जयप्रकाश रंजन]। घर में लगी आग को बुझाने में ही सरकार दो साल तक ऐसे व्यस्त रही कि उसका शुरुआती सौ दिनों का सामाजिक एजेंडा कभी कागजों से बाहर ही नहीं निकल सका। न गरीब जनता को दो रुपये किलो गेहूं व तीन रुपये किलो चावल मिल पाया और न ही लोगों को महंगाई से निजात मिल सकी।
सत्ता में वापसी के साथ ही संप्रग-2 सरकार ने एलान किया था कि वह पहले सौ दिनों के भीतर इस तरह के तमाम कदम उठाएगी। रविवार को सरकार अपनी दूसरी वर्षगांठ सौ दिन के वादों की बदहाली के साथ मनाएगी।
संप्रग-2 के सौ दिनों के एजेंडे की जानकारी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए दी थी। आलाकमान के निर्देश पर विभिन्न मंत्रालयों ने भी अपने पहले सौ दिनों का कार्यक्रम तैयार किया था। इनमें स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, मानव संसाधन विकास, शहरी विकास और कृषि मंत्रालय प्रमुख थे। लेकिन इनके सौ दिनों का एजेंडा अधूरा का अधूरा ही रहा। अधिकांश घोषणाओं पर ये मंत्रालय चुप्पी साधे हुए हैं।
सरकार के सौ दिनों के एजेंडे में सबसे ऊपर था खाद्य सुरक्षा विधेयक और महिला आरक्षण विधेयक को संसद में पारित करवाना। राज्यसभा से पारित होने के बावजूद महिला आरक्षण विधेयक के भविष्य को लेकर तमाम तरह की चिंताएं बरकरार हैं। जबकि खाद्य सुरक्षा विधेयक पर बैठकों से आगे बात नहीं बढ़ी है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की गणना के बाद ही सही तस्वीर निकलेगी।
महंगाई को लेकर सरकार का वादा पूरी तरह से मुंह चिढ़ाने वाला साबित हुआ है। सरकारी आंकड़े स्वयं गवाह हैं कि महंगाई की दर पर लगाम लगाने की सारी कोशिशें बेकार साबित हुई है। उस समय महंगाई सिर्फ खाद्य उत्पादों में थी, लेकिन अब यह अन्य उत्पादों को भी अपनी जद में ले चुकी है। खाद्य उत्पादों की महंगाई दर पिछले दो वर्षो से औसतन दहाई अंकों में हैं। मौद्रिक उपायों की वजह से कर्ज लेना काफी महंगा हो चुका है। इसी तरह सरकार ने काले धन पर रोक लगाने और विदेशी बैंकों में जमा धन को स्वदेश लाने की बात कही गई थी। इस पर भी सरकार के पास दिखाने के लिए कुछ खास नहीं है।
घोषणाएं जो एजेंडे से बाहर नहीं निकल सकीं :
1. भारत निर्माण की त्रैमासिक रिपोर्ट जारी होगी
2. पीएमओ में कार्य निष्पादन मानीटरिंग यूनिट का गठन
3. केंद्र सरकार की नौकरियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के संगठित प्रयास
4. महिला सशक्तिकरण पर एक राष्ट्रीय मिशन
5. मनरेगा से संबंधित शिकायत निवारण के लिए जिला स्तर पर लोकायुक्त नियुक्त करना
6.प्रमुख कार्यक्रमों में जनता के प्रति जबावदेही बढ़ाने के लिए स्वतंत्र मूल्यांकन कार्यालय की स्थापना
7. पंचायतों में इलेक्ट्रॉनिक शासन व्यवस्था।

कांग्रेस ने ७ प्रतिशत वोटर गँवा दिए



- अरविन्द सिसोदिया 
यूपीए २ की दूसरी वर्ष गाँठ पर स्टार न्यूज चॅनल के लिए नीलसन कंपनी द्वारा किये गए सर्वेक्षण में पता चला है की कांग्रेस ने इन दो वर्षों में अपने ७ प्रतिशत वोटर गँवा दिए हैं..! २८ शहरों के ९ हजार नागरिकों में से २००९ में ३७ प्रतिशत ने कांग्रेस को वोट दिया था , अब उन्ही से ३० प्रतिशत वोट प्राप्त हुआ है | खबर के अनुसार २३ प्रतिशत लोग भाजपा को वोट कर रहे हैं | यह खबर विस्तार से राष्ट्रदूत के अंक में आज २२ मई २०११ के अंक में प्रकाशित हुई है |
  इसकी मुख्य वजह वे हताशा मूल्यवृद्धि और २ जी स्पेक्ट्रम सहित भ्रष्टाचार है | इस रायसुमारी में बहुमत ने महसूस किया है कि नक्सल समस्या , कानून व्यवस्था , रोजगार , लोगों के आर्थिक हालत और भारत-पाक संम्बन्धों में कोई कार्यवाही नहीं हुई है | यह आम राय है कि खाद्ध एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों पर नियंत्रण न रखपाना सबसे बड़ी विफलता है |  

शनिवार, 21 मई 2011

रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के ख़ज़ाने में नक़ली नोट ...



मेंने यह खबर फेसबुक पर पड़ी है ..यदि यह सही है तो अत्यंत गंभर बात है ....., इसकी जांच सर्वोच्च न्यायलय की देखरेख में होनी चाहिए .....
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एक जानकारी जो पूरे देश से छुपा ली गई________,

अगस्त 2010 में सीबीआई की टीम ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के वाल्ट में छापा मारा. सीबीआई के अधिकारियों का दिमाग़ उस समय सन्न रह गया, जब उन्हें पता चला कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के ख़ज़ाने में नक़ली नोट हैं. रिज़र्व बैंक से मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिसे पाकिस्तान की खु़फिया एजेंसी नेपाल के रास्ते भारत भेज रही है. सवाल यह है कि भारत के रिजर्व बैंक में नक़ली नोट कहां से आए? क्या आईएसआई की पहुंच रिज़र्व बैंक की तिजोरी तक है या फिर कोई बहुत ही भयंकर साज़िश है, जो हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को खोखला कर चुकी है. सीबीआई इस सनसनीखेज मामले की तहक़ीक़ात कर रही है. छह बैंक कर्मचारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की है. इतने महीने बीत जाने के बावजूद किसी को यह पता नहीं है कि जांच में क्या निकला? सीबीआई और वित्त मंत्रालय को देश को बताना चाहिए कि बैंक अधिकारियों ने जांच के दौरान क्या कहा? नक़ली नोटों के इस ख़तरनाक खेल पर सरकार, संसद और जांच एजेंसियां क्यों चुप है तथा संसद अंधेरे में क्यों है????

फिर जले आग में देश : जातीय जनगणना



- अरविन्द सिसोदिया 
  केंद्र सरकार ने जातीय जनगणना के आदेश देकर वह आग फिरसे लगादी है जो कभी मंडल आयोग के द्वारा प्रधान मंत्री वी पी सिंह के समय लगी गई थी |  अब यह होगा की जातीय जनगणना के आंकड़े आते ही मुलायम सिंह , लालू यादव , रामविलास पासवान देश में नये आरक्षण फार्मूले के नाम पर हुड़दंग करेंगे , चुनावी मुद्दों से भ्रष्टाचार , भुखमरी, स्विस बैंकों में जमा काला धन  और  महंगाई जैसे असली असली मुद्दे फिर से गायब हो जायेंगे और जातीय आरक्षण का नया मुद्दा सामनें आ जाएगा | देश भर में जनता आपस में मुर्गों की तरह लडेगी , राजनेता इस लडाई का आनंद उठाएंगे |
कुल  मिला  कर  जातीय  जनगणना , जनता को आपस में मुर्गों की तरह लड़ने का खेल है ..!   


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सागर जिले के बीना में भारत-ओमान रिफायनरी लिमिटेड के लोकार्पण समारोह में प्रधानमंत्री की मौजूदगी में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जातिगत जनगणना के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा , "जाति के आधार पर जनगणना हिन्दुस्तान में फिर से मत कराइए। महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी कहा था कि जातिगत भेदभाव ठीक नहीं है, सामाजिक समरसता की नई बयार हिन्दुस्तान में चले क्योंकि 'जात-पात पूछे नहीं कोई हरि को भजे से हरि को होई'।"
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ई दिल्ली।। केंद्र सरकार ने जाति, धर्म और आर्थिक स्थिति के आधार पर जनगणना के प्रस्ताव को गुरुवार को हरी झंडी दे दी। इससे गरीबी रेखा के नीचे तथा उसके ऊपर जीवनयापन कर रहे लोगों और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि के बारे में सही जानकारी मिल सकेगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इसे मंजूरी दी गई।

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, जनगणना के लिए सर्वेक्षण जल्द ही शुरू हो जाने की उम्मीद है। जाति तथा धर्म के बारे में जानकारी से इस बात के मूल्यांकन में मदद मिलेगी कि सामाजिक तथा धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण देश के बहुत से नागरिकों के लिए आर्थिक अवसर कहां तक सीमित होते हैं।

जनगणना करने वाले कर्मचारी लोगों के बीच धर्म और जाति से संबंधित प्रश्नावली बांटेंगे । लोगों को सिर्फ दो सवालों के जवाब देने होंगे कि उनकी जाति क्या है और उनका धर्म क्या है? लेकिन गरीबी रेखा के संबंधित सवाल पर कई प्रश्न पूछे जाएंगे, जैसे- परिवार के सदस्यों की संख्या, रोजाना की आय तथा खर्च।

गरीबी से संबंधित जनगणना इससे पहले 2002 में कराई गई थी, लेकिन जाति और धर्म को जनगणना में पहली बार शामिल किया जा रहा है।
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भारत में जाति आधरित जनगणना क्या उचित है? यह जनगणना देश में जातियों में बंटवारा है आश्चर्य है कि भारत का प्रधानमंत्री विश्व का इतना बड़ा अर्थशास्त्री है वह किसके दबाव में आकर जातिगत जनगणना करा रहे हैं। वैसे इस सवाल पर जितनी गंभीरता से सोचा जाना चाहिए, उतनी गंभीरता से प्रधानमंत्री ने इसपर विचार नहीं किया। भारत में जनगणना का इतिहास काफी पुराना है। अंग्रेजो के समय की बात को लो तो, ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने में देशव्यापी जनगणना शुरु करने से पहले लगभग 70 साल प्रयोग इसके किए गए कि उचित रहेगा भी कि नहीं?

पहली जनगणना 14 फरवरी 1881 को शुरु हुई थी। उस समय भारत के भाग्य विधाता ईस्ट-इंडिया कंपनी की कोर्ट आॅफ डायरेक्टर ने 1856 में ही भारत में दस साल जनगणना का निर्णय लिया था, पर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के तूफान ने इसको उड़ा दिया। 1864 में पुनः शुरु हुई और राज्यों में कहीं-2 प्रयोग भी हुए। प्रयोगों की सफलता के बाद1881 में जनगणना हुई। अंग्रेजो ने इस कार्य को रोकने में 70 साल लगाया अंग्रेज बिना मकसद के कोई काम नहीं करते थे इस कार्य में भी ब्रिटिश हुकूमत का एक मकसद था जिस कारण से उन्होंने जनगणना नीति का विकास किया। मेरा मुख्य सवाल है प्रधानमंत्री से कि क्या उन्होंने जनगणना नीति के बारे में पुनर्विचार किया है, क्या उनका मकसद कोई नीति लेकर आने का है? या फिर हम यह माने कि वे सिर्फ राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए विपक्ष की मांग पर समय व्यतीत कर रहे हैं। क्या हमें यह नहीं देखना चाहिए कि हम यह देखे कि अंग्रेजो ने जिस नीति का विकास किया, उसका असल लक्ष्य क्या था? ब्रिटिश प्रशासन ने पहली जनगणना के बाद लंदन में कहा था,हमने पहली बार भारत के प्रत्येक जन को पहचाना है। सभी पेड़ों पर निशान लगाया है, प्रत्येक पालतू जानवरों को गिना है, यह सभी करने के पीछे सिर्फ एक लक्ष्य था कि फूट डालो और राज करो उन्होंने जनगणना में महजब व जाति को सामाजिक वर्गीकरण का मुख्य आधार बनाया। हिन्दू केा भी इस्लाम और ईसाई के बराबर में रखा। ब्रिटिश हुकूमत ने पहली बार 1901 में सामाजिक उच्चता का सिद्धांत भी प्रतिपादित किया। इस सिंद्धात के आधार पर उन्होंने जातियों ऊंच-नीच की खाई पैदा की और उस खाई से निकली जाति आधारित महासभाएं। 1931 तक तो यह नीति अंग्रेजों को ठीक लग रही थी। 1935 का गवर्नमेट आॅफ इंडिया एक्ट इसी की देन है। खास यह है किइस एक्ट के80 प्रतिशत से अधिक हिस्से को हमारे संविधान में शामिल कर लिया गया, उस एक्ट में एसटी, एससी के लिए आरक्षण का सिद्धांत शामिल था। जब देश आजाद हो गया तो हमारे संविधान निर्माताओं और नेताओें ने अंग्रेजो की ‘फूट डालो’ नीति से हटते हुए जनगणना से जाति का कालम हटा दिया और एक लक्ष्य रखा कि हम हिन्दुस्तान को जाति विहीन समाज बनाएंगे। आखिर मनमोहन से यह प्रश्न क्यो नही किया जा रहा है कि उन्होंने पंडित नेहरु या महात्मा गांधी या कंाग्रेस के अन्य महानतम नेताओं के जाति विहीन समाज के सपने क्यों खारिज कर दिया।
ब्रिटिश राजनीति में छाई अनिश्चितता पर नजर रखने वाले पर्यवेक्षक प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन और उनके साथियों की किसी हालत में सत्ता में बने रहने की लालसा केा देखकर हैरान हैं। स्पष्ट तौर पर घबराहट पैदा करने वाले जनादेश द्वारा नकार दिए गए, ब्राउन ने खुद को अनुपातिक प्रतिनिधित्व के चैपियन के रुप में रुपंातरित कर लिया है। इंग्लैण्ड की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को यह मुद्दा बहुत अधिक प्रिय है जितना कि भाजपा को धारा 370 का उन्मूलन। तथाकथित व्यवस्था की पुष्टि के कारण बिल्कुल स्पष्ट है। लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को समर्थन किया। इसमें कुछ छोटी पार्टियों और कुछ विदेश में रह रहे लोगों के वोटो को भी शामिल कर ले तो स्पष्ट हो जाता है कि ब्रिटेन के सामने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा चुनाव प्रणाली में बदलाव लाना है। यह आंकड़ा उतना चैंकाने वाला नहीं है 75 प्रतिशत मतदातों ने ब्रिटेन की विद्यमान फस्र्ट पास्ट-द पोस्ट व्यवस्था पर मुहर लगाते हुए यह जनादेश दिया कि वहां की सरकार को अपना समय और ऊर्जा आर्थिक संकट हल करने पर लगानी चाहिए। समय की कसौटी पर खरा उतरने वाली चुनाव प्रणाली का लक्ष्य स्थिर सरकार का गठन है। ब्राउन किसी भी कीमत पर सत्ता पाने वाली धाराओं में पश्चिम की बू सी आती है। गांधीवादी विचारधारा चलायी वह पश्चिम से बड़ी और उनको सुधारने वाली थी। अब बात आती है समकालीनो में चाहे वो ज्योतिबा फूले हो या पेरियार हो या कम्युनिस्ट या अंबेडकरवादी नेता इन सब ने जो विचार धाराएं चलायीं वे सभी अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह के आश्वासन की वजह से चारांे खाने चित पड़ गई। इसको मै एक बिंडबना ही मानती हँू कि जिस लोहिया के अनुयायी मुलायम या लालू अपने को मानता हँू, ये लोग जाति की पहचान व पहचान की राजनीति को आज की सबसे बड़ी जरुरत समझ रहे हैं यही वजह है ये लोग जाति की पूछ पकड़ कर सत्ता की वैतरणी को पार करने में जुटे हंै। जाति एक सामाजिक यथार्थ है पर इसका उपयोग सत्ता की राजनीति नही होनी चाहिए। यदि नेता वास्तव मे ईमानदार है तो उनको जनगणना की सुस्पष्ट नीति तैयार करनी चाहिए, जिसमे सामाजिक यथार्थ का पूरा-लेख-जोखा हो, जनगणना का जो प्रयोजन होता है, उसके लिए ही जनगणना हो, आज की जनगणना 2014 के चुनाव केा ध्यान में रखकर हो रही है, पर 2014 जाति को पूरे आंकड़े नही मिल सकेगे।
कितना हास्यास्पद लगता है कि अंतिम निर्णय एक ऐसे व्यक्ति को सांैपा गया है भारत में पहले जनगणना के जातीय विभाजन के कारण उथल-पुथल से अनभिज्ञ हंै। इस मसले पर नागरिक समाज से न तो विचार-विमर्श किया गया और न ही सरकार या विपक्ष ने ही सुझाया कि ऐसे फैसले किसी भी स्वार्थ के निहितार्थ के कारण शीघ्र नहीं लिये जा सकते। क्या हमारे प्रधानमंत्री ने इसके दुष्प्रभाव पर विचार किया? शायद नहीं? हमारे राजनेता इतने आलसी है कि जो वो कर रहे है। उसका परिमाण क्या होगा उसका अनुमान वो नही लगा पाते?

राजनीतिक मोलभाव के लिए जातीय संख्या का इस्तेमाल पहले डींग मारने के लिए किया जा चुका है, पर इस बार वास्तविक संख्या पर आधारित होगा, इसमें अधिक हिस्सेदारी की मांग होगी। इससे घिनौना यह होगा कि अगर वे बहुमत की राय को उलट दे और अनुपातिक प्रतिनिधित्व के औजार के तौर पर राजनीतिक ब्लैक मेटन पर आमादा हो गए है।
अच्छी राजनीति केवल पारदर्शिता के ऊपर निर्भर नही रहती। निर्णय लेने और सलाह-मशविरा की प्रक्रिया भी इतनी ही महत्वपूर्ण है। इंग्लैण्ड इसलिए मतदान और प्रतिनिधित्व की प्रणाली मे बदलाव करता है कि लेबर पार्टी केा अल्पमत को बहुमत मेें बदलने के लिए सांसदो की जरुरत है तो इसमें समझदारी नहीं होगी। जो परिवर्तन राजनीतिक मूलाधार को प्रभावित करते हैं, उन पर बड़े धैर्य और सूझबूझ के साथ विचार किया जाना चाहिए। मेरा इसको बताने का एक मकसद है कि हमारे प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों एवं जिम्मेदार लोगो की सीखना चाहिए,जिन भी महानुभावों ने जातिय आधार पर जनगणना 2011 का भयावह फैसला है। लगभग 60 साल पुरानी नीति जिसमें जंग लग चुका था उसको बिना साफ सफाई के अर्थात् पुरानी नीति केा गंभीर बहस के बिना ही अचानक बदलने में पड़यंत्र की बू सी आ रही। यह एक संगीन अपराध और भी संगीन इसलिए भी हो जा रहा है क्योंकि इतने महत्वपूर्ण विषय पर फैसला बिना किर्सी तर्क के ही स्वीकारा गया आखिर क्यों? कुछ समय पहले कांग्रेस अध्यक्ष ने बड़ी उदारता दिखाते हुए जाति आधारित जनगणना को स्वीकार कर लिया, इससे सोनिया का कद और ऊँचा होगा और कांग्रेस के बिगड़ते जा रहेे रिश्तों में सुधार की आस भी बंधती नजर आ रही है।
इसे मैं स्वीकार करती हँू कि जाति का शामिल करना सामाजिक यथार्थ को जानने के लिए उपयोगी है, पर यदि लोग सही बताएं तो जो जाति आधरित राजनीति हो रही है, आने वाले समय में उसकी हवा निकल सकती है। वैसे सच है कि हमारे देश में जाति एक सामाजिक यथार्थ मनु के समय से ही है जो लोग जाति विहीन समाज की बात करते है, वे सामाजिक यथार्थ से अनजान है जिन भी लोगो ने सुधारवादी आंदोलन चलाए और उसके लिए विचाराधाराएं गढ़ी,उन सभी विचार हमेशा साठ सालों से हमारे यहां आधुनिकता वादियों का एक वर्ग जाति वर्ग से ऊपर उठने की कोशिश कर रहा है, इन्होंने सामाजिक संस्था को विवाह और मिलाप के रीतिरिवाजों तक ही सीमित रखा है। सोनिया और मनमोहन ने एक ही झटके में जाति केा एक केन्द्रीय बिन्दु बना डाला। अब हमारे देश में भारतीय फिर से भारतीयों केा उनकी जाति से पारिभाषित करेगा अर्थात् पहचान जाति के आधार पर होगी। राजनीति भी जातीय आधार पर ही होंगी। कंाग्रेस की जो प्रबंधन नीतियां है वह आने वाले समय में देश केा काफी भारी पड़ेगी इसमें सब समाहित हो जाएगा कुछ भी बाकी नहीं बच पाएगा। हम फिर ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों पर चल रहे है सोनिया इटली की नीतियां यहां भी लागू कर रही हैं। अभी वक्त है मेरा आग्रह जनता से है कि जातिगत जनगणना को न स्वीकारें।


पाक - चीन गठजोड़ : सिर्फ बातों ही बातों से काम चला रही है भारत सरकार




- अरविन्द सिसोदिया 
    इन दिनों यूपीए २ कि कांग्रेस नेतृत्व भारत सरकार इतनी निकम्मी सरकार हो गई है  की वह अन्दर - बहार , दोनों तरफ पूरी तरह फैल है ! सिर्फ बातों ही बातों से काम चला रही है | अकर्मण्यता की यह स्थिति है कि वह चीन और पाकिस्तान से भी भयभीत है ! मनमोहन सिंह अफगानिस्तान में कहते हैं भारत, अमरीका जैसी कार्यवाही पाकिस्तान में आंतकीयों के खिलाफ नहीं कर सकता ..! यही हाल चीन के खिलाफ है वह भारतीय सीमा के अन्दर आकर पाकिस्तान के पक्ष में बहुत सारे निर्माण कर रहा है , भारत सरकार विरोध तक नहीं कर पा रही | यदि इतने निकम्मे नेता ही कुर्सियों  पर बैठे रहे तो देश का भविष्य अंधकार मय हो चुका  है|
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समाचार .......
       पाकिस्तान और चीन के बीच बढ़ते रक्षा संबंधों पर भारत ने गहरी चिंता जाहिर की है। भारत ने कहा है कि इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए हमें अपनी क्षमता बढ़ानी होगी। तीनों सेनाओं के साझा कमांडर सम्मेलन को संबोधित करने के बाद रक्षा मंत्री ए.के.एंटनी ने कहा कि इस नई चुनौती का एक ही जवाब है कि हम अपनी ताकत में इजाफा करें। रक्षा मंत्री ने यह टिप्पणी चीन से हुई इस घोषणा के बाद की है कि वह पाकिस्तान को 50 जेएफ-17 थंडर लड़ाकू विमान बेचेगा। 
          रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि ओसामा बिन लादेन के मारे जाने का असर भारत के पड़ोसी इलाकों के अलावा भारत पर भी पडेगा। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह ही भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात है। पाकिस्तान यदि भारत के साथ गंभीरता से अपने रिश्ते बेहतर करना चाहता है तो उसे अपने यहां सभी आतंकवादी गिरोहों के गढ़ बंद कर देने चाहिए। पाकिस्तान में किसी आतंकवादी शिविर पर हमला करने की क्षमता वाले जनरल वी. के. सिंह और एयर चीफ मार्शल पी. वी. नायक के कथनों के बारे में पूछे जाने पर रक्षा मंत्री ने कोई टिप्पणी किये बिना कहा कि प्रधानमंत्री ने इस बारे में अपनी राय दी है। उन्हें इसके अलावा और कुछ नहीं कहना। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री ने कहा था कि भारत इस तरह की हमला कार्रवाई नहीं करेगा। 
             जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के पार हालात के बारे में पूछे जाने पर रक्षा मंत्री ने कहा कि पिछले सालों की तुलना में हिंसा का स्तर कम हुआ है लेकिन कई मौकों पर घुसपैठ की कोशिशें हुई हैं। संघर्ष विराम के उल्लंघन की घटनाएं हुई हैं। लेकिन हालात बेहतर हुए हैं। अमेरिका से सी-17 ग्लोबमास्टर परिवहन विमान खरीदे जाने के बारे में रक्षा मंत्री ने कहा कि यह मसला अब सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति के सामने है और इसके लिए कोई समय सीमा नहीं तय की जा सकती है। 
सर क्रीक सीमा विवाद पर बातचीत शुरू
भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय वार्ता प्रक्रिया के तहत शुक्रवार को सर क्रीक सीमा विवाद के मुद्दे को लेकर दो दिवसीय वार्ता शुरू हो गयी। दोनों मुल्कों के बीच समुद्री सीमा विवाद को लेकर चार सालों के बाद यह बातचीत रावलपिंडी में शुरू हुई। भारत की तरफ से आठ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सर्वेयर जनरल एस . सुब्बा राव कर रहें हैं , जबकि पाकिस्तानी शिष्टमंडल का नेतृत्व अतिरिक्त रक्षा सचिव रियर ऐडमिरल शाह सुहैल मसूद कर रहे हैं ।

शुक्रवार, 20 मई 2011

कांग्रेस : भ्रष्टाचार की जय हो



- अरविन्द सिसोदिया 
   सवाल यह नहीं है की ए राजा किस पार्टी के हैं ..,सवाल यह है की उन्हें किसनें बनाया था और उनसे किसने इतना बड़ा भ्रष्टाचार करवाया ..! इसमें शक नहीं होना चाहिए की कांग्रेस में छोटी छोटी बातों का फैसला हाई  कमान उर्फ़ सोनिया गाँधी जी पर ही छोड़ा जाता है ..! चाहे मनमोहन सिंह जी हों या ए राजा हों .., नियुक्ति किसनें की ..उसकी पार्टी को ही ये अपयश जाएगा की भारत  सत्ता का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत संपत्ति बनाने वाले शीर्ष-10 लोगों की सूची में दूसरे क्रम पर रखा है।

    2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में फंसे पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा को अमेरिकी मैगजीन 'टाइम' ने सत्ता का दुरुपयोग कर व्यक्तिगत संपत्ति बनाने वाले शीर्ष-10 लोगों की सूची में दूसरे क्रम पर रखा है। मैगजीन के मुताबिक ए, राजा की वजह से भारत में सरकारी खजाने को अब तक की सबसे बड़ी चपत लगी है।

टाइम मैगजीन की इस सूची में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन पहले क्रम पर हैं। चर्चित वाटरगेट कांड में महाभियोग झेल चुके निक्सन ने अपने विरोधियों के खिलाफ सत्ता का गलत इस्तेमाल किया था। लीबिया के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी इस सूची में चौथे और इटली के प्रधानमंत्री सिल्वियो बलरुस्कोनी छठे स्थान पर हैं। सातवीं पायदान पर उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग इल का नाम है।

कांग्रेस सरकार : देश की इज्जत की कोई चिता है..?

- अरविन्द सिसोदिया 
इस समय कांग्रेस सरकार चलाना भूल गई है .., उसके सरकारी कामकाज देश को अन्दर तो लम्बे समय से ही विफलता की इबारत लिख रहे हैं ..मगर अब उसने विदेश स्तर पर भी देश की नाक कटाना शिरू  कर दिया है ..! पाकिस्तान को सोंपी गई मोस्ट वांटेड सूची को न तो अपडेट किया गया न ही पुनर्निरीक्षण  की जरुरत समझी गई | उस सूची में से दो मोस्ट वांटेड ठाणें और मुम्बई में ही निकल आये  | तारीख  निकला वारंट लेकर सीबीआई की टीम पुरुलिया मामले के मास्टर माइंड किम डेवी के प्रत्यर्पण के लिए डेनमार्क के कोपनहेगन जा पहुंची, सीबीआई के पास डेवी की गिरफ्तारी के लिए जो वॉरंट था, उसकी समय सीमा पहले ही खत्म हो चुकी थी। 
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पाकिस्तान को सौंपी गई भारत के 50 ‘मोस्ट वांटेड’ भगोड़ों की सूची का एक अपराधी मुंबई की आर्थर रोड जेल में है। इस खुलासे होने के बाद सीबीआई ने एक इंस्पेक्टर को निलंबित कर दिया है और एक एसपी व एक डीएसपी स्तर के अधिकारी का तबादला कर दिया है।

भारत की पाकिस्तान को सौंपी गई ‘मोस्ट वांटेड’ सूची में 24वें स्थान पर फिरोज अब्दुल खान उर्फ हमजा (51) का नाम है, जो 1993 के मुंबई ब्लास्ट मामले का आरोपी है। सीबीआई ने उसे पिछले साल अपनी हिरासत में लिया था। इसके बाद भी सीबीआई ने 1994 में खान के खिलाफ जारी इंटरपोल का रेड कार्नर नोटिस वापस नहीं लिया था।

क्या है आरोप: खान पर मुंबई बम धमाके का आरोप है। विस्फोट की घटना के बाद वह विदेश भाग गया था। 2004 में वह वापस लौटा। 5 फरवरी 2010 को मुंबई क्राइम ब्रांच ने उसे नवी मुंबई के एक गांव से गिरफ्तार कर किया।

पहला नहीं है मामला: भगोड़ों की सूची में वजाहुल कमर खान का नाम शामिल होने की गलती उजागर हुई थी। वजाहुल ठाणे के वागले इस्टेट में पत्नी, मां और बच्चों के साथ रह रहा है। अदालत में सुनवाई के दौरान नियमित तौर पर हाजिर भी हो रहा है। इसके बावजूद उसका नाम सर्वाधिक वांछित भगोड़ों की सूची में शामिल था।

गुरुवार, 19 मई 2011

कोटा में सृष्टि के प्रथम पत्रकार देवर्षि नारद मुनि की जयंती उत्साह पूर्वक मनाई गई









नारद जी सृष्टि के प्रथम पत्रकार थे 
नारद से आज के मिडिया जगत को अप्रभावित   रहना सिखाना चाहिए | 
हम अपनी सांस्कृतिक पहचान को अधिक मुखर करें
     सदैव सत्य कहना,सत्य के मार्ग पर चलना , सत्य को जीवन में धारण करना और जीवन को सत्य के अनंत आकाश में विचरण करनें के लिए आजाद पंछी की भांति छोड़  देना , ये वो गुण हैं , जो देवर्षि मुनि नारद ने समाज को सिखलाये |       
    कोटा १९ मई | राष्ट्र चेतना अभियान समिति , कोटा महानगर के तत्वाधान में,गुरुवार  सांयकाल ६ बजे , मानव विकास भवन , कोटा में एक विचार गोष्ठी आयोजित कर सृष्टि के प्रथम पत्रकार देवर्षि नारद मुनि की जयंती उत्साह पूर्वक मनाई गई | उन्हें भावभीनी  आदरांजलि अर्पित करते हुए धर्म के प्रवक्ता , देवताओं के संवाददाता,  प्रथम पत्रकार और लोक - कल्याण को समर्पित देव व्यक्तित्व के रूप में चित्रित किया गया | 
      गोष्ठी के मुख्यवक्ता अरविन्द सिसोदिया ने आदि काल के पत्रकार देवर्षि नारद जी से जुड़े अनेक प्रशंगों को सुनते हुए उनकी  विविध गुणवत्ताओं तथा बहुआयामी व्यक्तित्व  पर प्रकाश डाला |  उनके जीवन को आधुनिक संदर्भों के लिए नए ढंग से शोध करने तथा सूचीबद्ध करने की जरुरत बताते हुए कहा वे सिर्फ संवाददाता मात्र नहीं थे , बल्कि वे राजनीती  शास्त्र में गुड गवर्नेंस और समाजशास्त्र में कल्याणकारी राज्य की दिशा  के निर्धारक  सूत्रों के भी प्रणेता थे  | सिसोदिया ने कहा आज जब विश्व की कई शक्तियाँ हमें हमारे पूर्वजों के पुरुषार्थो और उनकी विशिष्ठ गुणबत्ताओं  से विस्मृत कर देना चाहती  हैं ! इन परिस्थितियों में हमारा यह कर्तव्य और बढ़ जाता है कि हम अपनी सांस्कृतिक पहचान को अधिक मुखर करें | 
      उन्होंने कहा सरकारेंभिन्न भिन्न प्रकार के विदेशी - डे मनानें के लिए तो विज्ञापन देती है , मगर वह भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को याद करना भूल जाती है ! सरकारें जब देश के स्वाभिमान और गौरवान्वित तथ्यों को निहित योजना के तहत उपेक्षित करतीं हैं तो यह समाज की जबावदेही को और बढ़ा देता है कि हम , अपनें हर गौरवान्वित स्मृतियों को स्वंय याद करें शानदार ढंग से आयोजित करें | 
     सिसोदिया ने कहा नारदजी की जयंती को सृष्टि के प्रथम पत्रकार के रूप में प्रतिवर्ष आयोजित करना चाहिए , इस अवसर पर पत्रकारिता से जुड़े लोगों को सम्मानित करना चाहिए , निबंध एवं एनी प्रकार की प्रतियोगिताएं भी रखनी चाहिए | बड़े आयोजन के रूप में मनानी चाहिए | 
    मुख्य अतिथि एक बड़े समाचार पत्र के पूर्व प्रबंधक आर पी कोठ्यारी ने नारद जी के संवाददाता से जुड़े गुण वैशिष्ठ्य पर प्रकाश डालते हुए कहा नारद की सूचना सत्य में गुणाभाग नहीं लगाती थी .., जो जैसा है वैसा ही होता है , वह कितनी ही बार दोहराया जाये सदैव ही सत्य से डिगती  नहीं थी , जबकि मानवीय सूचनाएँ प्रेरित हो जाती हैं या मानवीय स्वभाव के कारण बढ घट जाती हैं | नारद से आज के मिडिया जगत को अप्रभावित   रहना सिखाना चाहिए | उन्होंने नारद जी के लोक कल्याणकारी स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा मिडिया  का ध्येय सर्व प्रथम समाज कल्याणकारी स्वरूप की प्राथमिकता माय होना चाहिए | 
     कार्यक्रम के अध्यक्ष पूर्व संपादक विनय भार्गव ने अपने संबोधन में कहा आज न्यूसेंस  और निगेटिव न्यूज की प्राथमिकता में मिडिया के मूल उद्देश्य में भटकाव आगया है | मिडिया को स्वंय ही अपनी आचार संहिता बनानी चाहिए | सरकार आचार संहिता बनायेगी तो सेंसर कहा जाएगा , इस कारण पत्रकार जगत को स्वंय पहल कर एक आचार संहिता बना लेनी चाहिए की हम न्यूसेंस और निगेटिव्स  को नकार देंगे तो अपने आप ही न्यूसेंस और निगेटिव्स  का प्रदूषण  समाप्त हो जाये | स्वस्थ पत्रकारिता के लिए जरुरी है अच्छी समाचार सामग्री को हम पर्याप्त प्राथमिकता दें | प्रभावित करने वाले तत्वों को नकार दिया जाते तो समाचार स्वंय अप्रभावित हो जाएगा | 
       वरिष्ठ संपादक प्रताप सिंह तोमर ने कहा नारद जी की निर्भीकता भी हमारे पत्रकारिता गुण को एक मार्ग प्रदान करती है , वे बिना देवों से डरे और बिना दैत्यों से डरे हर जगह पहुचते थे और जो कहना उचित था वे कहते थे , गलत रास्ते पर चलने वालों को भी टोकते थे , सावधान करते थे | उन्होंने कहा नारद जी के लम्बे कथानक जो अनेकों ख्याति प्राप्त संदर्भों में हमें प्राप्त होते हैं , वे यही कहते हैं की एक समाचार किसी भी तरह किसीभी उच्चता से प्रभावित नहीं होना चाहिए | 
 कार्यक्रम में गिरिराज गुप्ता , एड. मनोज गौतम ने भी विचार व्यक्त किये , कार्यक्रम के प्रारंभ में समिति के कार्यों पर महेश शर्मा ने प्रकाश डाला और चिदानंद शर्मा ने संचालन किया | गोष्ठी में खुशपाल सिंह , जटा शंकर शर्मा , नेता खंडेलवाल आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे |