गुरुवार, 23 जून 2011

डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी : राष्ट्रहित के अमर बलिदानी





- अरविन्द सिसोदिया 
             जवाहर लाल नेहरु ने देश की गद्दी पर बैठते ही जम्मू और कश्मीर राज्य के प्रति पूर्वाग्रह  से ग्रस्त देश विरोधी  नीति पर अमल किया जिसके  कारण आज तक देश को भयंकर हानी भुगतनी पड़ रही है | उन्होंने जहाँ पाकिस्तान से अपनी पूरी जमीं वापस लिए बिना युद्ध विराम किया , उसके कारण एक बड़ा भूभाग आज भी पाकिस्तान के कब्जे में है , वहीँ सीमा विवाद को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गए सो यह भूमि युद्ध के द्वारा भी नहीं जीती जा सकती |
                 वही इस प्रान्त को सह राष्ट्र जैसा अस्तित्व देकर वहां स्वतंत्रता की गुन्जाईस  रख कर मुसीवत पैदा करदी !  नेहरु जी ने शेख से जो समझौता किया था उसमें जम्मू और कश्मीर राज्य  का अलग झंडा , अलग संविधान , अलग प्रधान मंत्री बनता था | भारत के सर्वोच्च न्यायलय सहित तमाम उच्च संस्थान
के अधिकार क्षेत्र से यह राज्य बहार था |  भारतीय जनसंघ के राष्ट्रिय अध्यक्ष डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के इस धारा  ३७० के विरोध और बलिदान के बाद पूरा देश जगा | बाद में शेख अब्दुल्ला जेल में बंद किये गए , धारा ३७० के काफी कुछ असर कम हुए हैं | अब इस धारा को पूरी तरह से हटाना शेष है | सच यह है की आज जम्मू और कश्मीर राज्य सिर्फ  डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी  के  बलिदान के कारण ही है |    

* ८ मई १९५३ को प्रातः साढ़े ६ बजे पंजाब जाने वाली ट्रेन दिल्ली रेलवे  स्टेशन  से चली , स्टेशन पर मुखर्जी को विदाई देने आये हजारों लोगों को मालूम नहीं था की यह विदाई उन्हें अंतिम विदाई है !!!
भारत माता की जय !
भारत केशरी डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी जिंदाबाद !
फूलमालाओं से उस डिब्बे को सजा दिया गया , उनके साथ गुरुदत्त ,अटलबिहारी वाजपेयी , डा. बर्मन , टेकचंद और बलराज मधोक थे ! रास्ते में रुकते  हुए  ११ मई को अमृतसर से पठान कोट पहुचे और वहां से रवि पुल जो जम्मू और कश्मीर राज्य का बार्डर है पहुचे !
*  ११ मई १९५३ सांय ४ बजे माधोपुर चेक पोस्ट से आगे जब वे पुल के मध्य में पह्चें , उनकी जीप रोक ली गई और जम्मू और कश्मीर राज्य पुलिस नें उन्हें गिरिफ्तर कर लिया गया , उनके साथ गुरुदत्त और टेकचंद  भी गिरिफ्तर किये गए | शेष साथियों को उन्होंने वापस यह कह कर भेज  दिया कि " देशवासियों को बता देना कि हमनें जम्मू और कश्मीर राज्य में प्रवेश कर लिया है , भले ही यह एक कैदी के रूप में हो, जम्मू और कश्मीर हमारा था और हमारा ही रहेगा | " वापसी करनें वालों में से एक अटल विहारी वाजपेयी भी थे जो बाद में देश के प्रधानमंत्री बनें ||
* गिरिफ्तर मुखर्जी १२ मई को श्री नगर पहुंचे ,उन्हें शहर से ८ मील दूर निशात बाग़ नाम के छोटे से बंगले में जिसे जेल का रु दे दिया गया था में ठहराया गया | जिसमें उनके जीवन के शेष ४० दिन गुजरे |
* देश में उनकी गिरफ्तारी पर विरोध प्रदर्शन हुए | 
* मुखर्जी के पुत्र को भी बीमार पिता से मिलने के लिए  जम्मू और कश्मीर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई |
* मुखर्जी डायरी लिखते थे  जम्मू और कश्मीर की शेख सरकार नें वह डायरी भी गायब कर अपने पासा ही रखली ताकि सच बहार नहीं जा सके | 
* २६ मई को नेहरूजी और काटजू श्री नगर में विश्राम करनें गए मगर वे अपने पूर्व मन्त्र मंडल के साथी और सदन के प्रमुख सांसद मुखर्जी से मिलाने का शिष्टचार तक नहीं निभा पाए | 
* सच यह है की १८ मई से ही मुखर्जी अस्वस्थ हो गए थे , सरकार ने उनके स्वास्थ्य को उपेक्षा जानबूझ  कर की ताकि वह अपने षड्यंत्र में सफल हो सके | 
* लोकसभा की कार्यवाहियां बताती हैं की नेहरू  को निरुत्तर करनें की क्षमता मुखर्जी में थी | मुखर्जी से शेख से कहीं अधिक भयग्रस्त नेहरु रहते थे | 
* २२ जून को मुखर्जी को चिकित्सालय में भर्ती कर क्या किया गया यह अभी तक पता नहीं है , उन्हें २३ जून के प्रातः ३ बज कर ४५ मिनिट पर मृत घोषित कर दिया गया , क्यों की २४ जून को कश्मीर हाईकोर्ट उन्हें मुक्त कर सकत था !!  
* मुखर्जी की मृत्यु को पुरे देश ने हत्या माना, देश के कोनें कोनें में हड़तालें हुई , शोक सभाएं हुई और जम्मू - कश्मीर के पूर्ण विलय की मांग उठी ! 
* जब हवाई जहाज से मुखर्जी का शव कलकत्ता पंहुचा तो विशाल लाखों की संख्या में जन समूह हवाई अड्डे के बहर मोजूद था , हवाई अड्डे से १४ मील की दुरी पर  दक्षिण कलकत्ता में उनका निवास था , वहां तक शव पहचानें में रात्रि के १० बजे से सुबह की ५ बज गई थी ! सड़कों और छतों पर लोगों का अपार जन समूह जमा था !!
मुखर्जी की शहादत बेकार नहीं गई .., 
देश की अखंडता पर वह पहली बली थी ,
नेहरु की राष्ट्रघाती निति का वह पहला प्रखर विरोध था ,
हम सभी उन्हें युग युग तक नमन करते रहेंगे | 
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युग युग तव गान चले 
- कमला मधोक 
हिमालय के आँगन में ,ज्योतिष्कर अस्त हुआ ,
कुच्क्रियों के ह्रदय खिले , देश समस्त त्रस्त हुआ | 
-१-
वह था अकलंक संत , उज्जवल परिधान रहा ,
साधक था अविचल वह , सत्य महा प्राण रहा |
-२-
पावित्र्य पौरुषपूर्ण जीवन , हो यही चिर कामना थी |
जिससे ही निस्सृत हुई, उत्सर्ग की निज भावना थी |
-३- 
वाणी का वह भक्त अनन्य,ब्राह्यण वह तेजोमय ,
जगमंगल हेतु सदा ,कटिबद्ध था यशोमय |  
-४- 
वह दीप बुझा एक , किन्तु अगणित दीप जले ,
धरती नभ ज्योतित कर , युग युग तव गान चले ||  

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