सोमवार, 27 जून 2011

पेड न्यूज वर्तमान मीडिया..???


मीडिया के अंडरवर्ल्‍ड पर दिलीप मंडल की नयी किताब

 
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन | दिल्ली, पटना, इलाहाबाद
पेड न्यूज वर्तमान मीडिया विमर्श का सबसे चर्चित विषय है। समाचार को लेकर जिस पवित्रता, निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और ईमानदारी की शास्त्रीय कल्पना है, उसका विखंडन हम सब अपनी आंखों के सामने देख रहे हैं। मीडिया छवि बनाता और बिगाड़ता है। इस ताकत के बावजूद भारतीय मीडिया अपनी ही छवि का नाश होना नहीं रोक सका। देखते-देखते पत्रकार आदरणीय नहीं रहे। लोकतंत्र का चौथा खंभा आज धूल धूसरित गिरा पड़ा है। खबरें पहले भी बिकती थीं। सरकार और नेता से लेकर कंपनियां और फिल्में बनाने वाले खबरें खरीदते रहे हैं। बदलाव सिर्फ इतना है कि पहले खेल पर्दे के पीछे था। अब मीडिया अपना माल दुकान खोलकर और रेट कार्ड लगाकर बेच रहा है। विलेन के रूप में किसी खास मीडिया हाउस को चिन्हित करना काफी नहीं है। सारा कॉरपोरेट मीडिया ही बाजार में बिकने के लिए खड़ा है। बहरहाल, मीडिया की बंद मुट्ठी क्या खुली, एक मूर्ति टूटकर बिखर गयी। यह किताब इसी विखंडन को दर्ज करने की कोशिश है।
देश-काल की बड़ी समस्याओं पर लिखी गयी किताबों में आमतौर पर समाधान की भी बात होती है। समस्या का विश्लेषण करने के साथ ही अक्सर यह भी बताया जाता है कि रास्ता किस ओर है। इस मायने में यह किताब आपको निराश करेगी। हाल के वर्षों में जनसंचार के क्षेत्र के सबसे विवादित और चर्चित विषय पेड न्यूज को केंद्र में रखकर लिखी गयी यह किताब समस्या का कोई समाधान नहीं सुझाती।
यह पुस्तक यह समझने की कोशिश भर है कि पेड न्यूज बीमारी है, या फिर बीमार का लक्षण। पुस्तक में मीडिया अर्थशास्त्र और व्यवसाय के जरिये यह बताने की कोशिश की गयी है कि अपनी वर्तमान संरचना की वजह से मीडिया के लिए खबरें बेचना अस्वाभाविक नहीं है। मीडिया के लिए पैसे कमाना महत्वपूर्ण है और इसके लिए छवि की कुर्बानी कोई बड़ी कीमत नहीं है।
मीडिया के लिए छवि की चिंता उसी हद तक है, जहां उसकी कमाई पर बुरा असर न होने लगे। यह पुस्तक मीडिया के बारे में आपकी स्थापित मान्यताओं को लगातार चुनौती देगी, आपको नये सिरे से सोचने के लिए मजबूर करेगी। इसे मीडियाकर्मियों, मीडिया के विद्यार्थियों, शोधार्थियों के साथ ही उन तमाम लोगों को ध्यान में रखकर लिखा गया है, जो भारतीय मीडिया को देखकर कहते हैं – यह क्या हो रहा है?
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उत्तर प्रदेश में ही बलात्कार मीडिया को क्यों दिख रहा है ...? अन्य प्रान्तों में क्या राम राज्य है ..???
यह पुस्तक मीडिया के बदलते स्वरूप पर काफी कुछ लिखा है ......
- अरविन्द सिसोदिया 

2 टिप्‍पणियां:

  1. vaah arvind ji saahsik or schche lekhan ke liyen bdhaai svikar kare ...akhtr khan akela kota rajsthan

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  2. जय जय भारत के अरविन्द सिसोदिया काफी दिनों से देश की तस्वीर बदलने के लियें लिख रहे हैं
    अरविन्द सिसोदिया जो पिछले कई दिनों से पत्रकारिता और लेखन कार्यों से जुड़ने के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता राजस्थान के पूर्व राज्य मंत्री और सांसद रघुवीर सिंह कोशल के निजी सहायक के रूप में कार्य कर चुके हैं ..भाई अरविन्द सिसोदिया ने अपने इस कार्यकाल में वफादारी से अपना फर्ज़ निभाया और अपना लेखन कार्य भी जारी रखा पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ साथ वोह अपने राजनितिक कार्यों में भी लगे रहे और भाजपा के मिडिया प्रकोष्ट के कोटा के प्रभारी भी रहे ........भाई अरविन्द जी वर्ष २०१० से जय जय भारत के नाम से इंटरनेट पर हिंदी ब्लोगिग्न शुरू की और आज वोह रोज़ जिवंत मुद्दों पर लिखने वाले बहतरीन ब्लोगर बनते जा रहे हैं ..हर गंभीर मुद्दे पर नियमित लेखन और घटनाओं पर त्वरित टिपण्णी होने से भाई अरविन्द सिसोदिया की ब्लोगिंग की दुनिया में विशिष्ट पहचान बन चुकी है ...भाजपा के पदाधिकारी होने के बाद भी सभी लोगों के साथ हिल मिल कर रहने वाले भाई अरविन्द कोटा राजस्थान के है और यहाँ इनकी लेखनी से एक तरफ तो यह भाजपा विचारधारा के प्रमुख विचारक हैं तो दूसरी तरफ आम जन में क्रान्ति की अलख जगा रहे हैं ...अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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