शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

23 जुलाई : जन्म तिथि : चन्द्रशेखर आजाद





- अरविन्द सीसौदिया
मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में स्थित रियासत अलीराजपुर के ग्राम भादरा में माता जगरानी देवी की कोख से जन्में चन्द्रशेखर तिवारी उर्फ चन्दू के पिता सीताराम तिवारी थे। सीताराम तिवारी मूलतः उत्तरप्रदेश के उन्नव जिला स्थित बदरका के थे तथा दुर्भिक्ष अकाल के दौरान भादरा आ गये थे। डा.भगवानदास माहौर और सदासिव मल्कापुर ने भादरा जा कर आजाद की माताजी जगरानी देवी को ढॅढकर , अपने साथ झांसी में रखा था तथा खूब सेवा की थी। माता जगरानी के क्षरा ही पुत्र चन्दू की जन्म तिथि तय की गई जो सावनी दूज सोमवार अर्थात 23 जुलाई 1906 की तारीख होती है।

प्रसिद्ध क्रांतीकारी विश्वनाथ वैशम्पायन अपने अन्य साथियों के साथ, आजाद की शहादत के बाद ,उनसे भादरा जा कर मिले थे व कुछ दिन उनकी माता जी के साथ रहे थे। वे रतलाम से दोहाद पहुचे थे वहां से बस द्वारा अलीराजपुर रियासत के भादरा गांव में पंहुचे थे जो कि कुकसी नदी के किनारे बसा हुआ , भील जनजाती बहुल क्षैत्र है।

चंद्रशेखर बचपन से ही साहसी प्रकृति के थे, वे वनारस में संस्कृत का अध्ययन करने गये थे तब 15 वर्ष की किशोर आयु में उन्हे सरकार के विरूद्ध महात्मा गांधी के किसी आंदोलन के पक्ष में प्रचार करते हुए गिरिफतार कर लिया गया था। जब उन्हे मजिस्टैट के समझ प्रस्तुत किया गया । मजिस्टैट पारसी बिरादरी के थे खरेघाट। जब खरेघाट ने उनसे उनका नाम पूछा जो वे बोले - आजाद, पिता का नाम पूछा तो वे बोले - स्वाधीन,जब निवास पूछा तो वे बोले - जेलखाना ....! इस पर मजिस्टैट ने चिढ कर 15 बेंत की अतिरिक्त सजा सुनाई थी, जो कि बहुत कष्टदायक थी। तभी से वे क्रांतिकारियों के बीच आजाद नाम से ख्याती प्राप्त हुए।
आजाद तबसे भारतमाता की सेवा तल्लीन हो गये,साहस और सटीक व्यूह रचना के कारण, कुछ ही समय में उत्तर भारत के क्रांतिकारियों के नेता बन गये। उनकी क्षमता और गुणबत्ता इसी से साबित होती है कि 7 साल तक सक्रीय क्रांतीकारी रहे और उनका मार्गदर्शन शहीद भगतसिंह ने भी स्विकार किया।

दुश्मन की गोलियों का सामना करेंगे।
आजाद ही रहे और आजाद ही मरेंगे।।

वे हमेशा अपने साथियों से कहते थे, पुलिस की पक डमें आने से बेहतर है कि हम अपने आप को गोली मार लें। यह उन्होने किया भी,जब 27 फरवरी 1931 को इलाहबाद में एल्फे्रड पार्क में वे पुलिस से घिर गये तो उन्होने साहस पूर्वक दुश्मन का मुकाबला किया और आखिरी गोली अपनी कनपाटी में मारकर शहादत दी। देश उन्हे सदा ही शहीद भगतसिंह की बराबरी के साथ याद करता है और याद करता रहेगा।
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चंद्रशेखर आजाद को उनकी पुण्यतिथि पर नमन...
बताता चलू की कम लोग इस बात को जानते हैं की चंद्रशेखर आजाद की मुखबिरी करने वाले हमारे प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु थे.. फेसबुक पर तर्क और सबूत के साथ बात करने की दुहाई देने वाले सेक्युलर नाम के हिंदू और देश द्रोहियो से बस एक सवाल,,,,, जिस महान चंद्र शेखर आज़ाद को पूरी ब्रिटिश सरकार पूरी दुनिया मे कई साल खोजने के बाद पकड़ना तो दूर उसकी एक फोटो तक ना खोज पाई.....उसी महान भारत माता के सपूत को ब्रिटिश सरकार ने ३ भाग खंडित भारत के सब से बड़े ज़िम्मेदार जवाहर लाल नेहरू के घर से बस कुछ कदम की दूरी पर कैसे खोज लिया जिस मे भारत माता का सब से बहादुर सपूत वीरगति को प्राप्त हुआ ??? क्या इसमे उस गद्दार की मुखबिरी और साजिश की बू नही आती ????? तर्क ये है की चंद्र शेखर जी के जीते जी भारत के 3 टुकड़े करने के सपने पालने वाले के 300 टुकड़े हो जाते..... इसलिए महान आज़ाद जी की वीरगति की अंग्रेज़ो से ज़यादा जल्दी भारत के उस गद्दार को थी जिस के मन मे सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत की सत्ता पाने की इच्छा थी...जैसे आज कल हर कांग्रेसी मे है....भले ही उस का अंजाम भारत और हिंदुत्व के विनाश के रूप मे सामने आए.... 25 साल की उम्र में भारत माता के लिए शहीद होने वाले इस महापुरुष के बारें में जितना कहा जाए उतना कम है. अपने पराक्रम से उन्होंने अंग्रेजों के अंदर इतना खौफ पैदा कर दिया था कि उनकी मौत के बाद भी अंग्रेज उनके मृत शरीर को आधे घंटे तक सिर्फ देखते रहे थे, उन्हें डर था कि अगर वह पास गए तो कहीं चन्द्रशेखर आजाद उन्हें मार ना डालें. वीरता के ऐसे नमूने कम ही देखने को मिलते हैं

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