गुरुवार, 7 जुलाई 2011

सलवा जुड़म पर रोक से माओवाद और पनपेगा !

- अरविन्द सिसोदिया 
 सर्वोच्च न्यायालय नें हालही में दिए एक निर्णय में, आदिवासी आत्मरक्षा से जुड़े सलवा जुड्म और कोय कमांडो को भंग कर दिया है | यह गलत हुआ क्यों की माओवाद को रोकनें में सझम तरीका समाप्त हो जानें से , यह विकराल समस्या और बढेगी !! पूरे देश में आत्म रक्षा के लिए हथियार दिए जाते हैं , उसमें कहीं भी यह नहीं देखा जाता की लायसेंसी की  योग्यता क्या है , क्यों की सवाल आत्मरक्षा का होता  है ? माओवाद ने पूरे देश के लगभग आधे भूभाग पर अपना विस्तार पा लिया है , उनके पीछे कौन सी शक्तियाँ हैं यह भी बात लगभग स्पष्ट है ! मेरी स्पष्ट मान्यता है कि जो मानवाधिकार का उल्लंघन करके अन्याय; अधर्म और अत्याचार करता है वह अपने मानवाधिकार को खो देता  है ! इसी प्रकार जब कोई संगठन संविधान के मार्ग को छोड़ देता  है तो वह संवैधानिक संरक्षण भी खो देता है ! जिस तरह सेना शत्रु से लड़ते वक्त अपने विवेकाधिकार से काम लेने स्वतंत्र है उसी तरह माओवाद से रक्षा सरकार की  व्यवस्था नहीं कर सकती तो , उससे प्रभावितों को आत्म रक्षा के लिए हथियार और क़ानूनी ताकत देना ही तो एक मात्र मार्ग है ! हर घर के आगे पुलिस तो बिठाई नहीं जा सकती ! अच्छा होता सर्वोच्च न्यायालय इसमें सुधार के रास्ते सुझाता ! प्रशिक्षण की बात करते !! मगर एक ही झटके में वहां लोकतंत्र कि रक्षा कर रहे लोगों को भंग किया जाना , माओवादियों को लाभ पहुचना ही होगा ! 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें