गुरुवार, 29 सितंबर 2011

प्रथम युद्ध विजेता प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री



- अरविन्द सीसौदिया , कोटा, राजस्थान ।

हम महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को मनाते हैं और उसमें भारत के प्रथम युद्ध विजेता प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी का व्यक्तित्व दवा बैठते है। याद रहे भारत की आजादी के बाद पाकिस्तान को सीधे युद्ध के मैदान में हरानें का गौरव हमें लम्बे समय के इंतजार के बाद मिला । इससे पहले हम हारने वाले लोग मानें जाते थे। 2 अक्टूबर को हमें शास्त्रीजी की जयंती भी व्यापक और उत्साह पूर्वक मनानी चाहिये। एक प्रकार से विजय दिवस के रूप में मनानी चाहिए..!

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लालबहादुर शास्त्री (2 अक्तूबर, 1904 - 11 जनवरी, 1966),भारत के दूसरे स्थायी प्रधानमंत्री थे । वह 1963-1965 के बीच भारत के प्रधान मन्त्री थे। शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में लाल बहादुर श्रीवास्तव के रुप में हुआ था। उनके पिता शारदा प्रसाद एक गरीब शिक्षक थे, जो बाद में राजस्व कार्यालय में लिपिक (क्लर्क) बने।
भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रुप में नियुक्त किया गया था। वो गोविंद बल्लभ पंत के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में प्रहरी एवं यातायात मंत्री बने।1951 में, जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व मे वह अखिल भारत काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। उन्होने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों मे कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिए बहुत परिश्रम किया। जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद, शास्त्री जी ने 9 जुन 1964 को प्रधान मंत्री का पद भार ग्रहण किया। उन्हे वर्ष 1966 मे भारत रत्न से सम्मनित किया गया
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५ अगस्त १९६५ को २६००० से ३०००० के बीच पाकिस्तानी सैनिको ने कश्मीर की स्थानीय आबादी की वेषभूषा मे नियंत्रण रेखा को पार कर भारतीय कश्मीर मे प्रवेश कर लिया । भारतीय सेना ने स्थानीय आबादी से इसकी सूचना पाकर १५ अगस्त को नियंत्रण रेखा को पार किया |शुरुवात मे भारतीय सेना को अच्छी सफलता मिली उसने तोपखाने की मदद से तीन महत्वपूर्ण पहाड़ी ठिकानो पर कब्जा जमा लिया । पाकिस्तान ने टिथवाल उरी और पुंछ क्षेत्रो मे महत्वपूर्ण बढत कर ली पर १८ अगस्त पाकिस्तानी अभियान की ताकत मे काफी कमी आ गयी थी भारतीय अतिरिक्त टुकड़िया लाने मे सफल हो गये भारत ने पाकिस्तान के क्ब्जे वाले कश्मीर मे ८ किलोमीटर अंदर घुस कर हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया । इस कब्जे से पाकिस्तान सकते मे आ गया अभियान जिब्राल्टर के घुसपठिये सनिको का रास्ता भारतीयो के कब्जे मे आ गया था और अभियान विफल हो गया यही नही पाकिस्तान की कमान को लगने लगा कि पाकिस्तानी कश्मीर का महत्वपूर्ण शहर मुजफ्फराबाद अब भारतीयो के कब्जे मे जाने ही वाला है | मुजफ्फराबाद पर दबाव कम करने के लिये पाकिस्तान ने एक नया अभियान ग्रैंड स्लैम शुरू किया ।

१ सितम्बर १९६५ को पाकिस्तान ने ग्रैंड स्लैम नामक एक अभियान के तहत सामरिक द्रुष्टी से महत्वपूर्ण शहर अखनूर जम्मू और कश्मीरपर कब्जे के लिये आक्रमण कर दिया । इस अभियान का उद्देश्य कश्मीर घाटी का शेष भारत से संपर्क तोड था ताकि उसकी रसद और संचार वय्वस्था भंग कर दी जाय । पाकिस्तान के इस आक्रमण के लिये भारत तैयार नही था और पाकिस्तान को भारी संख्या मे सैनिको और बेहतर किस्म के टैंको का लाभ मिल रहा था । शुरूवात मे भारत को भारी क्षती उठानी पड़ी इस पर भारतीय सेना ने हवाई हमले का उपयोग किया इसके जवाब मे पाकिस्तान ने पंजाब और श्रीनगर के हवाई ठिकानो पर हमला कर दिया । युद्ध के इस चरण मे पाकिस्तान अत्यधिक बेहतर स्थिती मे था और इस अप्रत्याशित हमले से भारतीय खेमे मे घबराहट फैल गयी थी । अखनूर के पाकिस्तानी सेना के हाथ मे जाने से भारत के लिये कश्मीर घाटी मे हार का खतरा पैदा हो सकता था ।ग्रैंड स्लैम के विफल होने की दो वजहे थी सबसे पहली और बड़ी वजह यह थी कि पाकिस्तान की सैनिक कमान ने जीत के मुहाने मे पर अपने सैनिक कमांडर को बदल दिया ऐसे मे पाकिस्तानी सेना को आगे बढने मे एक दिन की देरी हो गयी और उन २४ घंटो मे भारत को अखनूर की रक्षा के लिये अतिरिक्त सैनिक और सामान लाने का मौका मिल गया खुद भारर्तीय सेना के स्थानीय कमांडर भौचक्के थे कि पाकिस्तान इतनी आसान जीत क्यों छोड़ रहा है । एक दिन की देरी के बावजूद भारत के पश्चिमी कमान के सेना प्रमुख यह जानते थे कि पाकिस्तान बहुत बेहतर स्थिती मे है और उसको रोकने के लिये उन्होने यह प्रस्ताव तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी को दिया कि पंजाब सीमा मे एक नया मोर्चा खोल कर लाहौर पर हमला कर दिया जाय । जनरल चौधरी इस बात से सहमत नही थे लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शाष्त्री ने उनकी बात अनसुनी कर इस हमले का आदेश दे दिया ।
भारत ने ६ सितम्बर को अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा कॉ पार कर पश्चिमी मोर्चे पर हमला कर युद्ध की आधिकारिक शुरूवात कर दी[12] । ६ सितम्बर को भारत की १५वी पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेत्रत्व मे इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे मे पाकिस्तान के बड़े हमले का सामना किया । इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी । इस हमले मे खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी हमला हुआ और उन्हे अपना वाहन छोड़ कर भागना पड़ा । भारत ने प्रतिआअक्रमण मे बरकी गांव के समीप नहर को पार करने मे सफलता अर्जित कर ली । इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अडडे पर हमला करने की सीमा मे पहुच गयी इसके परिणामस्वरूप अमेरिका ने अपने नागरिको को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की । इसी बीच पाकिस्तान ने लाहौर पर दबाव को कम करने के लिये खेमकरण पर हमला कर उस पर कब्जा कर लिया बदले मे भारत ने बेदियां और उसके आस पास के गावों पर हमला कर दिया ।
६ सितम्बर कॉ लाहौर पर हमले मे भारतीय सेना के प्रथम पैदल सैन्य खन्ड (इनफैंट्री डिविजन) के साथ द्वितीय बख्तरबंद उपखन्ड(ब्रिगेड) के तीन टैंक दस्ते शामिल थे । वे तुरंत ही सीमा पार करके इच्छोगिल नहर पहुच गये पाकिस्तानी सेना ने पुलियाओं पर रक्षा दस्ते तैनात कर दिये जिन पुलो को बचाया नही जा सकता था उनको उड़ा दिया गया पाकिस्तान के इस कदम से भारतीय सेना का आगे बढना रुक गया । जाट रेजीमेंट की एक इकाई 3 जाट ने नहर पार करके डोगराई और बातापोर पर कब्जा कर लिया[13] । उसी दिन पाकिस्तानी सेना ने बख्तरबंद इकाई और वायुसेना की मदद से भारतीय सेना की १५वे खन्ड पर बड़ा प्रतिआक्रमण किया हालाकि इससे ३ जाट को मामूली नुकसान ही हुआ लेकिन १५वे खन्ड को पीछे हटना पड़ा और उसके रसद और हथियारो के वाहनो को काफी क्षती पहुची । भारतीय सेना के बड़े अधिकारियो को जमीनी हालात की सही जानकारी नही थी अतः उन्होने इस आशंका से कि ३ जाट को भी भारी नुकसान हुआ है उसे पीछे हटने का आदेश दे दिया इससे ३ जाट के कमान आधिकारी को बड़ी निराशा हुई [14] और बाद मे उन्हे डोगराई पर फिर कब्जा करने के लिये बड़ी कीमत चुकानी पड़ी ।
८ दिसम्बर १९६५ को ५ मराठा लाईट इनफ़ैन्ट्री का एक दस्ता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कस्बे मुनाबाव मे तैनात राजस्थान सैन्य बल कॊ मजबूती प्रदान करने के लिये भेजा गया । उनको पाकिस्तानी सेना के पैदल द्स्ते को आगे बढने से रोकने का आदेश मिला था पर वे केवल अपनी चौकी की रक्षा ही कर पाये पाकिस्तानी सेना के तोपखाने से हुई भारी बमबारी और हवाई और पैदल सैन्य आक्रमण के बीच ५ मराठा के जवानो ने बड़ी वीरता का परिचय दिया परिणाम स्वरूप आज उस चौकी कॊ मराठा हिल के नाम से जाना जाता है । ५ मराठा की मदद के लिये भेजे गये ३ गुरखा और ९५४ भारी तोपखाना का दस्ता पाकिस्तानी वायु सेना के भारी हमले के कारण पहुच नही पाया और रसद ले कर बारमेर से आ रही ट्रैन भी गर्दा रोड रेल अड्डे के पास हमले का शिकार हो गयी १० सितम्बर को मुनाबाओ पर पाकिस्तान का कब्जा हो गया ।[17]
९ सितम्बर के बाद की घटनाओं ने दोनो देशो की सेनाओ के सबसे गर्वित खन्डो का दंभ चूर चूर कर दिया । भारत के १ बख्तरबंद खन्ड जिसे भारतीय सेना की शान कहा जाता था ने सियालकोट कि दिशा मे हमला कर दिया । छाविंडा मे पाकिस्तान की अपेक्षाक्रुत कमजोर ६ बख्तरबंद खन्ड ने बुरी तरह हरा दिया भारतीय सेना को करीब करीब १०० टैंक गवाने पड़े और पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा । इससे उत्साहित होकर पाकिस्तान की सेना ने भारतीयो पर प्रतिआक्रमण कर दिया और भारतीय सीमा मे आगे घुस आयी । दूसरे मोर्चे पर पाकिस्तान की शान माने जाने वाले १ बख्तरबंद खन्ड ने अमृतसर पर कब्जे के इरादे से खेमकरण पर हमला कर दिया । पाकिस्तानी सेना खेमकरण से आगे ही नही बढ पायी और उसे भारत के ४ पैदल खण्ड के हाथो करारी शिकस्त मिली करीब ९७ टैंक असल उत्तर नामक भारतीय अभियान मे भारतीयो के कब्जे मे आ गये थे जबकि भारत के केवल ३० टैंक क्षतिग्रस्त हुए थे । इसके बाद यह जगह अमेरिका मे बने पैटन नाम के पाकिस्तानी टैंको के उपर पैटन नगर के नाम से जानी जाने लगी । इस लड़ाई के बाद पाकिस्तान की शान माने जाने वाले १ बख्तरबंद खन्ड ने १९६५ के युद्ध मे आगे भाग नही लिया ।
इस समय तक युद्ध मे ठहराव आ गया था और दोनो देश अपने द्वारा जीते हुए इलाको की रक्षा मे ज्यादा ध्यान दे रहे थे । लड़ाई मे भारतीय सेना के ३००० और पाकिस्तानी सेना के ३८०० जवान मारे जा चुके थे । भारत ने युद्ध मे ७१० वर्ग किलोमीटर इलाके मे और पाकिस्तान ने २१० वर्ग किलोमीटर इलाके मे कब्जा कर लिया था । भारत के क्ब्जे मे सियालकोट , लाहौर और कश्मीर के उपजाऊ इलाके थे.और पाकिस्तान के कब्जे मे सिंध और छंब के अनुपजाऊ इलाके थे .

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वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध के 44 साल बाद पाकिस्तान ने स्वीकार किया है कि उनके देश की ‘घुसपैठ’ के कारण ही भारत को युद्ध के लिए मजबूर होना पड़ा था. पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सेवानिवृत मेजर जनरल महमूद अली दुर्रानी ने एक टीवी समाचार चैनल से कहा ‘‘हमने सीमा पर से घुसपैठ की शुरुआत की और मुझे लगता है कि हमें उस समय भारत की ओर से आने वाली प्रतिक्रिया के बारे में सोचना चाहिए था.’’

दुर्रानी ने युद्ध में भाग लिया था, जिसके बाद पूर्व राष्ट्रपति जिया उल-हक के कार्यकाल में वह सैन्य सचिव थे. उन्होंने कहा कि भारतीय सेना ने 1965 में युद्ध शुरू किया क्योंकि ‘‘छोटे स्तर की झड़पें पाकिस्तान की ओर से शुरू हुई थीं.’’ उन्होंने कहा कि उच्चस्तरीय सैन्य शासन ‘भारत को परेशान करने की रणनीति’ में शामिल नहीं था, लेकिन राजनेता जानते थे कि सीमा पर क्या हो रहा है. तत्कालीन विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को भी अंदाजा नहीं था कि भारत अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करेगा.

इसी दौरान उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को अतीत में भारत के साथ युद्ध करके ‘कुछ नहीं मिला.’ उन्होंने कहा ‘‘हमें भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहिए और लंबित मुद्दों को सुलझाने के लिए शांति वार्ता शुरू करनी चाहिए.’’ इसके पहले दुर्रानी ने पत्रकारों के सामने स्वीकार किया था कि मुंबई हमलों में गिरफ्तार अजमल कसाब पाकिस्तानी नागरिक है, जिसके बाद उन्हें प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने बर्खास्‍त कर दिया था.

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