मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

गरिवों की, मंहगाई की बददुआयें .....



- अरविन्द सीसौदिया, कोटा
.
करोडों देशवासियों के अपरोक्ष हत्यारे......
बुरा न मानें , इस देश की दो अर्थशास्त्रीयों , मोंटेक सिंह और मनमोहनसिंह ने बारा बजा कर रखदी है। गरीबी की परिभाषा का जो सच सामनें आया वह बताता है कि भारत सरकार और योजना आयोग में भारतवासीयों के प्रति कितनी हमदर्दी है या कितनी बेदर्दी है। इतनी शत्रुता तो शायद शत्रु भी नहीं करता। गरीब ही नहीं आम व्यक्ति के मुंह से निवाला छीनने में लगे इन दोनों सुख हन्ता व्यक्तियों के कृत्यों की समीक्षा किसी हत्यारे के रूप में ही इतिहास करेगा। करोडों लोगों को मंहगाई रूपी सुरसा के मंुह में डाल कर देशवासियों को धीमी मौत मारने के लिये , ये दोनों इतिहास में हिटलर और मुसोलिनी की तरह ही दोषी ठहराये जायेंगें।

गरीब की उपेक्षा का कारण यह है कि विधायकों और सांसदों को इतनी तनखाह, भत्ते, सुविधायें और सम्मान दे दिया जाता है कि बे भूल जाते हैं कि देश में कोई गरीब भी रहता है और गरीबी नाम की चीज भी हैं । यदि यह तय कर दिया जाये कि प्रत्येक विधायक और सांसद को बी पी एल की आय जितनी तनखाह और सुविधायें ही दीं जायेंगी तो उनको यह सोचने पर निरंतर मजबूर तो होना ही पढेगा कि बी पी एल की प्रतिदिन क्या आय होनी चाहिये और उन्हे क्या क्या सुविधायें मिलनी चाहियें। बी पी एल को मानक या इकाई बनाया जाना जरूरी है तभी देश के गरीबों के वोटों से चुनी जाने वाली सरकारें गरीबों पर ध्यान देगी ।

एक मां से बेटे ने लडते हुए कहा..., आज अष्टमी का पूजन है न पुआ न पकवान न पूडी न सब्जी....., सिर्फ ये खीर बनाई है भगवान के भोग के लिये.., उसमें दूध की जगह पानी ही पानी और चावल की जगह चार दानें...!! मां रोने बैठ गई बेटा कैसे लाउ और कैसे बनाउ.....चीजें इतनी मंहगीं हो गईं कि जो पैसा है उसमें माता का भोग लगाना भी मुस्किल हो गया । गरीब और आम आदमी के मुंह से निवाला छीनने वाली इस सोनिया सरकार को नर्क मिले न मिले मगर इस देश की जनता को इन्होने जीते जी नर्क में धकेल दिया ।

हलांकी 3-10-11 को योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह ने एक प्रेस वार्ता में एक मंत्री के साथ बताया कि सर्वे आने के बाद पुनः इस परिभाषा पर विचार होगा । पर यह देखने वाली बात है कि इस योजना आयोग का अध्यक्ष प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह है। यह आयोग सारे मंत्रालयों की सलाह पर देश के विकास की भावी पंच वर्षीय योजना बनाता है। जिस देश के प्रधानमंत्री को उन तमाम मंत्रालयों को एक गरीब को जीवन जीने की जरूरतों का ज्ञान न हो, वे देश का क्या विकास और क्या जीवनसुख दे सकेगें। यह सामने आई गरीवों की परिभाषा से ही स्पष्ट है। जब ये नई परिभाषा बनायेंगें तब ताज्जुब नहीं कि 32 को 22 और 26 को 16 करदें। क्यों कि दिमाग उल्टा है यह तो सामनें आही चुका है।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें