मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

शहीदी जोड़ मेला : धर्म की रक्षा के लिए दुनिया की सबसे अजीम व महान शहादत




शहादत को नमन के लिए शहीदी जोड़ मेला
दशम पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह, बाबा फतेह सिंह तथा माता गुजर कौर जी की चरण छोह प्राप्त फतेहगढ़ साहिब की पवित्र धरती पर 26 दिसबंर को लाखों की तादाद में दुनिया के कोने कोने से संगत गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब और गुरुद्वारा श्री ज्योति स्वरूप साहिब में उनकी महान शाहदत को श्रद्धा सुमन अर्पित करने पहुंचेगी।
धर्म की रक्षा के लिए दुनिया की सबसे अजीम व महान शहादत की याद में तीन दिवसीय शहीदी जोड़ मेल 26 दिसबंर से 28 दिसबंर तक फतेहगढ़ साहिब में लगेगा। गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब उस महान शहादत की एक यादगार मिसाल।श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह बाबा फतेह सिंह जिनकी उस समय आयु सात वर्ष दस माह और पांच वर्ष दस माह थी, को मुगल नबाव वजीर खां के हुक्म पर गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब के भौरा साहिब में जिंदा दीवारों में चिनवां दिया गया था। इस स्थान का नाम छोटे साहिबजादे बाबा फतेह सिंह जी के नाम पर ही गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब रखा गया था।
वर्णनीय है कि जब गुरुगोबिंद सिंह जी से अलग हो माता गुजरी छोटे साहिबजादों समेत गंगू ब्राह्माण के साथ उसके गांव खेड़ी पहुंची, तो माता जी के पास सोने की मोहरे देख उसकी नीयत बदल गई। रात के समय माता जी और छोटे साहिबजादे जब आराम कर रहे थे तो उसने वह मोहरे चुरा ली। अगली सुबह माता जी के पूछने पर गुस्से में आते हुए उसने कसूर मानने की बजाए माता गुजरी और छोटे साहिबजादों की सूचना मोरिंडा के थाने में दे दी। जहां से मुगलों के द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद तीन दिन छोटे साहिबजादों को सरहिंद के नबाव की कचहरी में पेश कर उन्हें सिख धर्म छोड़ने के लिए लालच दिए गए, लेकिन साहिबजादे अपने बचनों पर अटल खड़े रहे। अंत में छोटे साहिबजादों को जिंदा दीवारों में चिनवा दिए जाने के आदेश जारी कर दिए गए थे। इसके उपरांत दोनों साहिबजादों को भोरा साहिब के स्थान पर 13 पोह 1704 को जिंदा दीवारों में चिनवा दिया गया।
इस महान शहादत को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब में तीन दिवसीय शहीदी जोड़ मेल लगाया जाता है। इस मेल को लेकर पहले दो दीवान फतेहगढ़ साहिब क्षेत्र में जगह-जगह धार्मिक दीवान सजाएं जाते है। तीसरे दीवान के अवसर पर गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब से एक विशाल नगर कीर्तन निकाला जाता है, जो कि गुरुद्वारा श्री ज्योति स्वरूप साहिब जा कर सम्पन्न होता है। इस भव्यनगर कीर्तन में श्री अकाल तख्त साहिब जी के जत्थेदार, पांचों तख्त के सिंह साहिबान, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान और लाखों की तादाद में सिख संगत शामिल होते है।


----
फतेहगढ़ साहिब में शहीदी जोड़ मेल आज से...
Punjab >> Fatehgarh sahib
दशम पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह के छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह व बाबा फतेह सिंह तथा माता गुजरी की शहादत को समर्पित जोड़ मेल का शुभारंभ आज से हो रहा है। 
३ दिन चलने वाले इस ऐतिहासिक जोड़ मेल में देश भर से तकरीबन 25 लाख श्रद्धालु गुरुद्वारा साहिब में माथा टेकेंगे। जिला प्रशासन व एसजीपीसी ने सभी तैयारी कर ली हैं। सोमवार {26.12.2011} सुबह गुरुद्वारा श्री ज्योति स्वरूप साहिब में श्री अखंड पाठ साहिब के आरंभ के साथ ही वार्षिक शहीदी जोड़ मेल का शुभारंभ होगा। बेशक मेल औपचारिक तौर पर सोमवार से शुरू होगा, लेकिन आज रविवार के चलते भारी तादात में संगत व सुरक्षा के लिए पुलिस व प्रशासन द्वारा तमाम इंतजाम किए गए हैं।श्रद्धालुओं के लिए 400 से अधिक लंगर लग चुके है तथा अधिकतर की ओर से अपनी सेवा भी शुरू कर दी गई, जबकि इससे ज्यादा आसपास के क्षेत्रों में लगे हैं।
धर्म न बदलने पर चुनवाया दीवार में
सिख इतिहास में फतेहगढ़ साहिब का अहम स्थान है। इस पवित्र धरती पर गुरु गोबिंद सिंह के दो छोटे साहिबजादे बाबा जोरावर सिंह तथा बाबा फतेह सिंह को जिंदा ही दीवारों में चुनवाया गया था तथा उनके गम में माता गुजरी ने भी अपना शरीर त्याग दिया था। सिख इतिहास में गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब में बना ठंडा बुर्ज शिक्षा की सबसे बड़ी पाठशाला माना जाता है। जहां पर माता गुजरी ने आठ व छह वर्ष के दोनों छोटे साहिबजादे को धर्म व कौम की रक्षा का पाठ पढ़ाया था। इसी ठंडे बुर्ज में पोह की सर्द रातों में माता गुजरी ने बाबा जोरावर सिंह बाबा फतेह सिंह को धर्म की रक्षा के लिए शीश न झुकाते हुए धर्म पर कायम रहने की शिक्षा दी थी। यहीं पर सरहिंद के नवाब वजीर खां ने छोटे साहिबजादे को दीवार में चुनवाया था।

1 टिप्पणी: