बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

भारतीय नववर्ष की अनमोल वैज्ञानिकता :अरविन्द सीसौदिया



भारतीय नववर्ष की वैज्ञानिकता अनमोल
- अरविन्द सीसौदिया
ईश्वर प्रदतता,  नववर्ष व्यवस्था है ; भारतीय संवत्सर.....!
जब भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ला एकम की शुभ बेला आती है, तब भारतीय प्रायद्वीप का माहौल आनंदवर्द्धक हो जाता है। प्रातः का सम तापमान सभी ओर नई चेतना, नई शक्ति, नई उर्जा का संचार करता हेै। ऐसा प्रतीत होता है मानों, एक नया उल्लास, एक नई ललक प्राणी समूह में व्याप्त हो रही है। वृक्ष अपनी पुरानी पत्तियां गिरा कर नई कोंपलें ला रहे होते हैं, सागर में नऐ बादल आकाश का रूख करना प्रारम्भ करते हैं जो नई वर्षा के साथ पृथ्वी को पुनः एक वर्ष के लिए आनन्दित करने वाला वर्षक्रम होता हैं। शक्ति स्वरूपा देवी के नवों स्वरूपों की आराधना प्रारम्भ की जाती है। यह नौ दुर्गा पूजन भी नवदुर्गा पूजन कहलाता हैं। किसान अपनी फसल कोेे खलिहान से घर ला चुका होता है और अगले वर्ष की नई फसल योजनाओं के सपने बुन रहा होता है। नई खेती का शुभारम्भ करता है। खेतों की ग्रीष्मकालीन हंकाई-जुताई, खाद व कुडे-करकट को खेतों में डालना, नहरों, कुओं की सफाई तालाबों की खुदाई...... आदी आदी कार्यों के द्वारा नई शुरूआत, नया शुभारम्भ प्रारम्भ होता है।व्यापारी नये खाते खोलते हैं। उनका पुराना भुगतान होता है, गांवों में सालभर बर्तनों को देने वालेे प्रजापतियों को किसान अन्न दे कर हिसाब करता है, यही हाल धोबी, लुहार और बढ़ई को उसकी सालभर की मजदूरी प्रदान करने का होता है, चिकित्सक का हिसाब होता है। इसी तरह मुनाफा कास्त, बटाई कास्त एवं कृषि श्रमिकों के साल की तयपाई इसी समय होती है अर्थात भारतीय नववर्ष जिसे संवतसर कहा जाता है, भारती प्रायद्वीप ही नहीं पूरे एशिया महाद्वीप पर गम्भीर प्रभाव रखता है। सच यह है कि पहले ब्रिटेन में भी मार्च से नयासाल प्रारम्भ होता था, 25 मार्च नये साल के प्रारम्भ की तारीख रहा करती थी, बाद में इसमें परिवर्तन कर जनवरी से मनाने का फैसला किया गया है। जिसका कोई प्राकृतिक या सृष्टिगत आधार नहीं है। कुल मिला कर ऐसा लगता है जैसे ईश्वर की सृष्टी नवचेतना के संकल्प लिए मधुर बांसुरी बजा रही है,जिसकी मादक बेला हमें नई शक्ति, नई क्रियाशीलता से भर रहा है। मानो ऊर्जा की वर्षा हो रही हो। सच तो यह है कि भारतीय नव सम्वत्सर मानवीय न होकर प्राकृतिक नववर्ष है, इस समय आम वातावरण इस तरह का हो जाता है, मानों पुरानी बैटरी हटा कर नई बैटरी लगाई गई हो, जिसमें दमदार करेंट है। इस प्राकृतिक सत्य को, इस ईश्वरीय सत्य को भारतवासियों ने अनुभवों के द्वारा पहचाना उसमें अनुसंधान किये, सत्य की खोज की सनातन परम्परा के मार्ग पर चल कर कालचक्र के गहरे रहस्यों को जाना-समझा। इसी सारे ताने बाने को अपने में समेटे है भारतीय पंचांग। जो भारतीय जीवन पद्धती का एक अभिन्न अंग और भारतीय नववर्ष शुभारम्भ का महान दस्तावेज भी है। ......
23 मार्च शुक्रवार  से भारत्तीय  संवतसर विक्रमी 2069 का शुभारम्भ होने जा रहा है, इस अवसर पर हमारे बीच यह जिग्ज्ञासा सहज जाग उठती है कि संवतसर क्या है,कब से है..,क्यों है..,इसका एक संझिप्त विश्लेषण की कोशिश प्रस्तुत है।
भारत के द्वारा अंतरिक्ष में छोडा गया उपग्रह आर्यभट्ट, कालगणना व खगोल के महान भारतीय वैज्ञानिक का आर्यभट्ट का अभिनंदन है, सम्मान है। भारतीय वेदों के अनुसार पृथ्वी पर सृजन की उत्पती 197 करोड वर्ष पूर्व हुई है,आश्चर्य है कि आज की आधुनिकतम तमाम वैज्ञानिक भी इसी नतीजे पर पहुचे कि लगभग 2 अरब वर्ष पूर्व से सृजन अस्तित्व में आया,दानों गणनायें पूरी तरह एक दूसरे से मिल रहीं हैं, भारतीय गणना पर विश्व का वैज्ञानिक समाज अचम्भित है कि भारतीयों ने इतनी सटीक गणना कैसे की,ग्रहों की चाल कैसे जानी,सूर्यग्रहण-चंद्र ग्रहण को कैसे पहचाना...!
ऋग्वेद के प्रथम अध्याय के 130 वें सूक्त में चंद्रमा को नक्षत्रेश कहा गया है,वेदों को पाश्चात्य विश्लेषक भी 10-15 हजार वर्ष पूर्व रचित मानते है। हमारे महाभारत में भी आया है कि वेदों का पुनःलेखन वेदव्यासजी ने किया है।इस प्रकार इतना तो स्पष्ट है कि विश्व को कालगणना का प्रथम कार्य व विचार भारत ने ही किया व दिया...।
जिस सूर्य सिद्यांत पर अंग्रेजी सन चल रहा है,उस सबसे पहले पटना में जन्में आर्यभट्ट ने परिष्कृत किया,उन्होने घोषित किया था कि पृथ्विी सूर्य का चक्कर लगाती है। वर्षमान 365.8586805 दिन भी उन्होने ही तय किया व त्रिकोणमिति का अविष्कार किया था, इसी प्रकार उज्जैन में जन्में वराह मिहिर ने खगोल पिण्डों की गहन छानबीन की,भास्कराचार्य ने सबसे पहले गुरूत्वाकर्षण के सिद्यांत को स्थापित करते हुए बताया कि सारा बृम्हांण्ड एक दूसरे के गुरूबल अंतरो पर अबलंवित व गतिशील है।
इसलिये सबसे पहले हमें यह जानना चाहिये कि हमारी पृथ्वी के निवासियों को पूर्व दिशा से दो महान अनुभूतियां पश्चिम को जाती हैं,पहला सूर्य का प्रकाश जो पूर्व से प्रारम्भ हो कर पश्चिम की ओर जाता है दूसरा सनातन संस्कृति (सत्य का नूतनतम ज्ञान जानने वाली संस्कृति)के ज्ञान का प्रकाश जिसने पश्चिम को कदम दर कदम मार्गदशर््िात किया। यहां में इतना स्पष्ट करना चाहूगा कि पश्चिम ने भी जब सत्य को पहचानने की कोशिश की तभी से वह विज्ञान मे। आगे बड पाया है।
भारतीय संस्कृति विलक्षण प्रतिभा के मनीषियों की एक येशी श्रृंखला है जिसने सत्य की खोज में घोर परिश्रम किया और समाज की व्यवस्था को व्यवस्थित किया। भारतीय अनुशंधानकर्ताओं के विश्व स्तरीय ज्ञान के रूप में कालगणना व खगोल सम्बंधी वैज्ञानिकता आज तक प्रमाणिकता से अपना सीना ताने खडी है।
कई बार अंग्रेजी सन की संवत से तुलना की जाने लगती है वह गलत है,सन महज एक सुविधाजनक केलेंडर है जिससे दैनिक राजकार्यो को निर्धारित करने व मजदूरी आदी के भुगतान के लिये काम में लिया गया, इसे सूर्य पर आधारित वर्षगणना मानी जा सकती है,हिसाब - किताब की व्यवस्था की एक विधा मानी जा सकती है मगर इसे कालचक्र का गणित नहीं माना जा सकता। मगर यह खगोल पिण्डों की स्थिती,गती, प्रभाव सहित भारतीय व्रत-त्यौहार आदी में अंग्रेजी सन बहुत ही बौना साबित है न कॉफी व उसकी कोई उपयोगिता नहीं होती है।
हजारो वर्षाे से व्रत, त्यौहार, विवाह, जन्म, पूजा-अर्चना,शुभाशुभ कार्य आदी में भारतीय संवत्सर ही अपनी विशेष भूमिका निभाता है। चाहे दीपावली हो, चाहे होली हो, चाहे कृष्ण जन्माष्टमी हो अथवा रामनवमी हो, संवतसर से ही इनकी गणना होती है। विवाह, जन्मपत्री बनाने, मुण्डन, भविष्यवाणी करने, उद्घाटन, शिलान्यास, शुभ महुर्त अथवा किसी भी प्रकार के शुभ कार्य आदी में महती भूमिका भारतीय कालगणना की है।
सृष्टि की उत्पति, उसके विविध स्वरूपों की व्यवस्था और उनकी निरतरतम गतिविधियों और अन्त (प्रलय) के संदर्भ में जब अध्ययन प्रारम्भ होता है तो सबसे पहला प्रश्न यही उत्पन्न होता है कि खगोल क्या है, कब से है, कब तक रहेगा? हमारे पूर्वजों की इसी जिज्ञासा और सामाजिक व्यवस्थापन की आवश्यकताओं ने कालगणना को जन्म दिया ।
सनातन ऋषियों ने सबसे पहले यह महसूस किया कि पृथ्वी पर होने वाले दिन व रात का समय घटता-बढ़ता रहता है मगर दिन और रात का संयुक्त समय एक ही रहता है, चन्द्रमा का रात्रि दर्शन लगभग निश्चित क्रम में बढ़ता और घटता है एवं लगभग निश्चित अंतर से रात्री में पूर्ण प्रकाश (पूर्णिमा) और अप्रकाश (अमावश्या) आता है। यह भी सामने आया कि पूर्णिमा या अमावश्या भी एक निश्चित समय के पश्चात पुनः आते है जो माह से जाना गया। इतना ही नही जब अन्य क्षैत्रों पर ध्यान दिया गया तो पाया कि वर्षा, सर्दी, गर्मी के तीनों मौसम निश्चित अंतर से पुनः आते हैं। सभी 6 ऋतुओं का भी सुनिश्चित चक्र है और इसी चक्र से अन्ततः स्थापित हुआ वर्ष, क्योंकि यह महसूस किया गया कि बारह पूर्णिमाओं के बाद हम ठीक उसी स्थिति में होंगे हैं जिस स्थिति में इस समय हैं। इसी कारण 12 माह कि एक इकाई के रूप में वर्ष शब्द आया और इस वर्ष के शुभारम्भ को वर्ष प्रतिपदा कहा गया।
काल व्यस्थापन की आवश्यता व रोजमर्रा की भूमिका बढ़ती गई और इसी क्रम में अध्ययन भी बढ़ता गया और मनुष्य की आयु के कारण आया शताब्दि ! फिर अपनी निशानियों को याद रखने और वंश की श्रृंखला निश्चित करने या किसी विशेष घटना को याद रखने के क्रम मे नाम वाले संवत आये। इस तरह के संवतों में विक्रमी संवत नवीनतम है। जो विक्रमादित्य द्वारा विदेशियों पर विजय प्राप्त कर, उन्हे भारत से बाहर खदेड देने की स्मृति में है।
किन्तु इन सभी कृत्यों के चलते हुए भी काल की सही गणना, उसके वैज्ञानिक विश्लेषण, घटित होने वाले प्रभावों से लेकर मानव जीवन तक पर पडने वाले प्रभावों का गहन अध्ययन हुआ, जांचा परखा और खरा पाया गया तत्व संग्रहीत किया गया। उससे किसी ने छेडछाड नहीं की और वह निरंतर चलता रहा, ज्योतिष के रूप में निरंतर परीक्षा की कसौटी पर कसा जाता रहा। यह सारा गणित शुद्ध रूप से वैज्ञानिक अनुसंधान की वह विधा है जो निरंतर नई खोजों में व्याप्त है।
समय के लघु, मध्यम, वृहद और वृहदेत्तर स्थितियों को लेकर सनातन अनुसंधानों में कई इकाईयों और सिंद्धातों को स्थापित किया। लघु क्षैत्र में एक दिन और रात्री का संयुक्त समय 60 घटी अथवा 24 होरा में विभाजित हुआ, उसमें पल, विपल,  वलिप्त, पर और तत्पर का भी अन्तर विभाजन हुआ। भास्कराचार्य ने जिस त्रुटि को समय की इकाई का अंश माना वह सेकेंड का 33750वां हिस्सा है। वहीं काल की महानतम इकाई महाकल्प घोषित की जो कि वर्तमान ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण आयु अर्थात 31,10,40,00,00,00,000 वर्ष है।
समय की छोटी इकाईयों में -
1 पूर्ण दिन (दिन व रात्री) = 60 घटी = 24 होरा
1 घटी = 60 पल = 24 मिनिट
1 पल = 60 विपल = 24 सेकेंड
1 विपल = 60 वलिप्त
1 वलिप्त = 60 पर
1 पर   = 60 तत्पर
समय की दैनिक इकाईयां-
7 दिन = 1 सप्ताह
15 दिन = 1 पक्ष /कृष्णपक्ष /शुक्लपक्ष
2 पक्ष = 1 माह
2 माह = 1 ऋतु
6 ऋतु = 1 वर्ष
2 आयन = 1 वर्ष /
100 वर्ष = 1 शताब्दी
समय की बडी इकाईयों में -
सतयुग  = 17,28,000 वर्ष , त्रेतायुग= 12,96,000 वर्ष
द्वापरयुग= 8,64,000 वर्ष,   कलयुग= 4,32,000 वर्ष
इन चारों युगों के जोड को महायुग कहा जाता है।
महायुग =43,20,000वर्ष, 71 महायुग = 1 मनवंतर
14 मनवंतर व संधिकाल = 1000
1000महायुग = 1 कल्प
1000 महायुग  = 1 कल्प = 432 करोड वर्ष
1 ब्रह्मदिवस  = 2 कल्प (1 कल्पदिन व 1 कल्परात)
   = 864 करोड वर्ष
360 बह्म दिवसों (720 कल्प) का एक ब्रह्म वर्ष
1000 ब्रह्म वर्षों, ब्रम्हा की आयु मानी जाती है।
कुल मिलाकर ब्रह्माण्ड और उसमें व्याप्त उर्जा अनंत है, न तो उसका प्रारम्भ ज्ञात हो सकता न अंत हो सकता। यह सतत व निरंतर है, मगर वर्तमान ब्रह्माण्ड संदर्भ में जो पूर्वजों द्वारा खोजी गई आयु और अंत की वैज्ञानिक खोज है, उसी का नाम संवत्सर की कालगणना है।
भारत में नववर्ष संवतसर चैत्रशुक्ला एकम रविवार से  प्रारम्भ होता है। 1752 ई.तक इग्लैंड में भी नववर्ष 25 मार्च से ही प्रारम्भ होता था। बाद में इसे जनवरी से प्रारम्भ किया गया। संवत पहले दिन से ही पूर्ण व्यवस्थित रहा मगर सन में कई बार सुधार हुए, यहां तक की यह पहले मात्र 10 महीने का ही था।
अंग्रेज सुविधाभोगी अधिक रहे, इससे  कुछ विसंगतियां हैं। हमारे  ऋषिवर जटिलताओं व कठिनाईयों से घबराते नहीं थे वे गूढ़ रहस्यों को भी खोज कर स्पष्टता से सामने लाते थे। चुनौतियों को स्वीकार करते थे और सत्यता को स्थापित करने की कोशिश होती थी। इसी कारण हमारा कालचक्र व उससे जुडे विविध उपयोग मौसम और भविष्यवाणियां अधिक सटीक  हैं।
सौर एवं चन्द्र वर्ष:-
भारत में वर्ष गणना दो प्रकार की स्वीकारी गई है। चन्द्रमा के पृथ्वी परिभ्रमण काल को आधार मानकर जो गणना की जाती है, उसे चन्द्र वर्ष का निर्धारण होता है एवं पृथ्वी के सूर्य परिभ्रमण को आधार मान कर जो गणना की जाती है उसे सौर वर्ष का निर्धारण होता है।
चन्द्रमा पृथ्वी का परिभ्रमण जितने समय में पूरा कर लेता है, सामान्यतः वह समय एक चान्द्रमास कहलाता है। मास के जिस पक्ष में चन्द्रमा घटता है, उसे कृष्ण पक्ष एवं जिस पक्ष में बढ़ता है, उसे शुक्ल पक्ष कहते है। सम्पूर्ण गोल 360 अंशो में समाहित है। इन 360 अंशो में व्याप्त गोल 30-30 अंश के 12 भाग है। 12 राशियॉ एक-एक राशि में  2 नक्षत्र आते है, (एक नक्षत्र 13 अंश 20 कला का होता है।)
पृथ्वी, चंद्र, सूर्य, ग्रह, धूमकेतु, आकाशगंगायें, निहारिकायें सबके सब घूम रहे है, घूमते हुए परिक्रमा कर रहे है, ऐसी स्थिति में स्थिर चिन्हों की खोज हुई, ताकि दिशाओं का निश्चित निर्धारण हो सके, परिणाम स्वरूप ब्राह्मण के 27 स्थिर तारा समूह नक्षत्र के रूप पाये गये जिनका नाम अश्रिवनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, आद्वा, पुर्नवसु, पुष्य, आश्लेषा, माघ, पू.फाल्गुनी, उ.फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठ, मूल, पूर्वाषाढा, उत्तरा आषाढा़, श्रवण, श्रविष्ठा, शतभिषक, पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद, रेवती ।
इसी प्रकार सम्पूण ब्राह्मण को निश्चित 12 भागों में बांटा गया ये भाग राशी कहलाते हैं, मेष,  वृष,  मिथुन, कर्क,  सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन आदी 12 राशियां हैं। नक्षत्रों एवं राशियों से ही ग्रहों की गत्यात्मक स्थिति की जानकारी प्राप्त होती है। ग्रह गतिशील ज्योतिर्पिण्ड है, जो निरन्तर सूर्य की परिक्रमा करते रहते है। पृथ्वी अन्य ग्रहों की भांति सूर्य की परिक्रमा करती है एवं चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है ।
एक चन्द्र मास लगभग 29 दिन का होता है। सूक्ष्म गणनानुसार चन्द्रमा के बारह महीनों को वर्ष सौर वर्ष से 11 दिन 3 घटि 48 पल छोटा है। इस प्रकार 32 माह (लगभग तीन वर्षो) में चन्द्र वर्ष; सौर वर्ष से लगभग एक माह पिछड जाता है, चन्द्र वर्ष एवं सौर वर्ष में गणना में संगति अथवा सामंजस्य बनाये रखने के लिए हर 32 माह के बाद एक अधिमास आता है जिसे मल मास भी कहा जाता है।
शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा बढ़ते बढ़ते जिस नक्षत्र में जाकर पूर्ण होता है उसी नक्षत्र के नाम के आधार पर मास का नाम होता है, इसे यो समझें के किसी मास में पूर्णिमा के दिन यदि चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र में है तो वह माह चैत्र होगा। यदि विशाखा में है तो वह माह वैशाख होगा। पूर्णिमा की इन नाक्षत्रिक स्थितियों के आधार पर बारह माहों का नाम निर्धारण किया गया है। चैत्र, वैशाख, जेष्ठ, आषाढ, साबन, भादों, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीष, पौष, माघ, फाल्गुन आदी बारह माह हैं।भारतीय मासों के नाम किसी हीरों अथवा देवता के नाम पर न होकर शुद्व खगोलीय स्थिति पर आधारित है, प्रत्येक पूर्णिमा की संन्ध्या को पूर्व क्षितिज में विद्यमान नक्षत्र को पहचान कर चन्द्र स्थिति से इस सत्य की पुष्टि की जा सकती है।
नक्षत्रों के सापेक्ष सूर्य एक दिन में एक अंश चलता है एवं चन्द्रमा लगभग 13 अंश। अमावस्या को सूर्य एवं चन्द्र साथ होने से उनके बीच अन्तर शून्य अंश हो जाता है। आगामी 24 घण्टें में सूर्य एक अंश चलता है एवं चन्द्र 13 अंश। परिणामतः इन दोनों के बीच (13-1) याने 12 अंश का अन्तर हो जाता है। चन्द्रमा एवं सूर्य के बीच 12 अंश को अन्तर होने की जो समयाविधि होती है उसे ही तिथि कहतें है। जब कोई तिथि दो क्रमागत सूर्योदयों तक रहती है तो तिथि की वृद्वि कहलाती है अर्थात दोनों दिन एक ही तिथि मानी जाती है क्योंकि सूर्योदय के दिन जो तिथि होती है वही तिथि सारे दिन मानी  जाती है। दो क्रमागत सूर्योदयों के बीच जब कोई तिथि पड़ती है तब उस तिथि का क्षय माना जाता है ऐसी तिथि की अवधि प्रायः 60 घडी से भी कम होती है। प्रत्येक तिथि क्रम से प्रतितिथि सूर्य एवं चन्द्रमा का अन्तर 12-12  अंश करके बढ़ता जाता है। पूर्णिमा को यह अन्तर 15 गुणा 12=180 अंश हो जाता है। पूर्णिमा को सूर्य एवं चन्द्र पृथ्वी से आमने सामने दिखाई देते है। पूर्णिमा की आगामी तिथि (कृष्ण पक्ष प्रतिपदा) से सूर्य एवं चन्द्रमा का अन्तर 12 अंश घटते घटते लगभग 15 दिन में यह शून्य हो जाता है तब अमावस्या की स्थिति आ जाती है । अर्थात चन्द्रमास में तिथियों को क्रम मनमाने आधार पर नही है यह क्रम चन्द्रमा एवं सूर्य की गति एवं उनकी दूरी पर निर्भर करता है । जो लोग भारतीय तिथियों में मनमानापन बताते है उन्हे भारतीय कालगणना का ज्ञान नही है। तिथि गणना साधार एवं वैज्ञानिक है
पृथ्वी से सबसे निकट ग्रह चन्द्र है उसके पश्चात बुध,  शुक्र,  सूर्य, मंगल, बृहस्पति एवं शनि है। यदि निकटता एवं दूरी को ध्यान में रखकर इनकी गणना सूर्य से आरंभ करे तो एक वृत्ताकार क्रम बनता है सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र, शनि, गुरू एवं मंगल। प्रत्येक अहोरात्र (रात दिन) में 24 होरा (घण्टे ) होते है एवं प्रत्येक होरा एवं प्रत्येक होरा पर किसी ग्रह का अधिपत्य होता है। सूर्योदय के समय पर प्रथम होरा पर जिस ग्रह का अधिकार होता है वह दिन उसी ग्रह के नाम से माना जाता है। सृष्टि के आरंभ के दिन चैत्र, शुक्ला प्रतिपदा थी एवं रविवार था, अतः दिन की गणना रविवार से एवं होरा गणना रवि (सूर्य) से की जाती है। पूर्वाेक्त क्रम से 24 होरा के मध्य सातों ग्रहों का प्रभाव क्रमशः होता है एवं 25वां होरा आगामी दिन का प्रथम होरा होता है। रविवार के प्रथम होरा से गणना करे तो सूर्य, शुक्र, बुध, चन्द्र, शनि, गुरू, मंगल इस क्रम से गणना करने पर 25वां होरा चन्द्र का होता है। अतः रविवार से आगामी वार चन्द्रवार है, चन्द्रवार से गणना, प्रथम होरा से चन्द्रमा से आरंभ करेगें तो 25 वॉ होरा अर्थात आगामी दिन का प्रथम होरा मंगल को आयेगा अतः सोमवार से आगामी वार मंगल हुआ। स्पष्ट है कि वारों के क्रम निर्धारण में एक व्यवस्थित आधार को लेकर चला गया है और आज विश्व के लगभग सभी पंचाग भारत के इसी वार क्रम को अपना रहे है । यह वार क्रम भी वैज्ञानिक है, साधार है ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार पृथ्वी सूर्य का परिभ्रमण करने में 365 दिन 15 घडी 31 पल 31 विपल एवं 24 प्रतिविपल का समय लेती है । वस्तुतः यही एक वर्ष का मान है । ईस्वी सन का दिनांक मध्य रात्री 12 से आरंभ होता है अर्थात रात्री के 12 बजे के पश्चात् अगला दिन वहां आरंभ हो जाता है, इसका सीधा सा अर्थ है कि उस समय भारत में सूर्योदय हो रहा होता है, इस तरह से इतना तो स्पष्ट है कि पाश्चात्य कालगणना भारतीय कालगणना से अत्याधिक प्रभावित है।
हमारा राष्ट्रीय संवत्, शक संवत् है जो सौर गणना पर आधारित है। शकों को पराजित करने वाले प्रतिष्ठानपुर के राजा शलिवाहन की स्मृति में शक-शालिवाहन संवत् आरंभ हुआ । इसमें एवं विक्रमी संवत् में 135 वर्षो का अन्तर है। सम्राट विक्रमादित्य इनसे पूर्व के है उन्होने सिन्धु तट पर शको को निर्णायक रूप से परास्त किया था। उन्होने शाकारि की उपाधि     धारण की थी एवं विक्रमी संवत् आरंभ किया था। यह चान्द्र वर्ष है एवं हमारे सभी पर्वों एवं सांस्कृतिक उत्सवों का आधार है। वस्तुतः चान्द्र वर्ष एवं सौर वर्ष दोनों ही हमारी संस्कृति की अभेद्य कालगणनाएं है एवं दोनो को ही आधार मानकर  भारतीय जनजीवन निरन्तर विकास की ओर अग्रसर रहा है । ऋतु निर्धारण,  उत्तरायण, दक्षिणायण, लग्न, आनयन आदि में सौर गणना मुख्य है। वृत्त उत्सव, यज्ञ, देवार्चन, विवाह आदि एवं अन्यान्य मुहूर्त प्रकरणों में चन्द्रगणना का विशेष महत्त्व हैं।  

नए चित्र भारतीय नव वर्ष विक्रम संवत २०६९
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गुड़ी पड़वा : हिन्दू नववर्ष : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
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भारतीय काल गणना सृष्टि की सम्पूर्ण गति, लय एवं प्रभाव का महाविज्ञान है
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भारतीय नववर्ष की अनमोल वैज्ञानिकता :अरविन्द सीसौदिया
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वैज्ञानिक और प्रमाणिक : भारतीय काल गणना का महासत्य
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विक्रमी संवत 2069 : भारतीय नव वर्ष
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वैज्ञानिक और प्रमाणिक : भारतीय काल गणना का महासत्य











- अरविन्द सिसोदिया
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ऋग्वेद के सृष्टि संदर्भ ऋचाओं का भाष्य करते हुए ‘‘कार्य सृष्टि’’ शब्द का प्रयोग किया है, अर्थात् सृष्टि अनंत है,वर्तमान सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व भी सृष्टि थी। जो सृष्टिक्रम अभी काम कर रहा है वह कार्य सृष्टि है।
बृम्हाण्ड सृष्टि का पूर्व ज्ञान...
- 5150 वर्ष पूर्व ,महाभारत का युद्ध, कौरवों की विशाल सेना के सेनानायक ‘भीष्म’..., कपिध्वज अर्थात् हनुमान जी अंकित ध्वज लगे रथ पर अर्जुन गाण्डीव (धनुष) हाथ में लेकर खड़े हैं और सारथी श्रीकृष्ण (ईश्वरांश) घोड़ों की लगाम थामें हुए है। रथ सेनाओं के मध्य खड़ा है।
- अर्जुन वहां शत्रु पक्ष के रूप में, चाचा-ताऊ, पितामहों, गुरूओं, मामाओं, भाईयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, श्वसुरों और शुभचिंतकों को देख व्याकुल हो जाता है। भावनाओं का ज्वार उसे घेर लेता है, वह सोचता है, इनके संहार करने से मेरे द्वारा मेरा ही संहार तो होगा...! वह इस ‘अमंगल से पलायन’ की इच्छा श्रीकृष्ण से प्रगट करता है।
- तब श्रीकृष्ण कहते हैं ‘‘ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैं न रहा होऊं या तुम न रहे तो अथवा ये समस्त राजा न रहे हों और न ऐसा है कि भविष्य में हम लोग नहीं रहेंगे।’’ उन्होंने कहा ‘‘जो सारे शरीर में व्याप्त है, उसे ही तुम अविनाषी समझो । उस अव्यय आत्मा को नष्ट करने में कोई भी समर्थ नहीं है अर्थात् आत्मा न तो मारती है और न मारी जाती है।’’
- अंत में योगेश्वर श्रीकृष्ण को अपना विराट स्वरूप दिखाना पड़ता है, इस विराट रूप में विशाल आकाश, हजारों सूर्य और तेज अर्जुन को दिखता है।
‘‘दिवि सूर्य सहस्रस्य भवेद्युगपदुल्पिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याभ्दासस्तस्य।।12।।
  - श्रीमद्भगवतगीता (अध्याय 11)
-अर्जुन ने ‘‘एक ही स्थान पर स्थित हजारों भागों में विभक्त ब्रह्माण्ड के अनन्त अंशों को देखा’’
‘‘तत्रैकस्थं जगत्वृत्सनं प्रविभममनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा।।13।।
  - श्रीमद्भगवतगीता (अध्याय 11)
-अर्जुन आश्चर्यचकित होकर कहता है ‘‘हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, आपमें न अंत दिखता है, न मध्य और न आदि।’’
-तब अर्जुन आगे कहता है ‘‘यद्यपि आप एक हैं, किंतु आप आकाश तथा सारे लोकों एवं उनके बीच के समस्त अवकाश में व्याप्त हैं।’’
‘‘द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशष्च सर्वाः।
दृष्टाभ्दुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्।।20।।
  - श्रीमद्भागवतगीता (अध्याय 11)
-भयातुर अर्जुन परम् ईश्वर को अपने ऊपर कृपा करने की प्रार्थना करता है। तब भगवान कहते हैं ‘‘समस्त जगत को विनष्ट करने वाला काल मैं हूं।’’
  ‘‘कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो’’
    - श्रीमद्भागवतगीता (अध्याय 11)
- ब्रह्माण्ड दर्शन की दूसरी बड़ी घटना, इससे पूर्व की है और वह भी श्रीकृष्ण से जुड़ी हुई है, जिसका वर्णन हमें श्रीमद्भागवत के दशम् स्कन्ध में मिलता है ।
   एक दिन बलराम जी आदी ग्वाल-बाल श्रीकृष्ण के साथ खेल रहे थे। उन लोगों ने माता यशोदा के पास आकर कहा ‘‘मां ! कन्हैया ने मिट्टी खायी।’’ हितैषिणी यशोदा ने श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लिया और मिट्टी खाने की बात पर डांटा। तब श्रीकृष्ण ने कहा आरोप झूठा है, तो यशोदा ने मुंह खोलकर दिखाने को कहा। श्रीकृष्ण ने मुंह खोल कर दिखाया। यशोदा जी ने देखा कि श्रीकृष्ण के मुंह में चर-अचर सम्पूर्ण जगत विद्यमान है। आकाश, दिशायें, पहाड़, द्वीप और समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु, वैद्युत, अग्नि, चन्द्रमा और तारों के साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल,जल, तेज, पवन, वियत्, वैकारिक अहंकार के देवता, मन-इन्द्रिय, पञ्चतन्मात्राएं और तीनों गुण श्रीकृश्ण के मुख में दीख पड़े। यहां तक कि स्वयं यशोदा ने अपने आपको भी श्रीकृष्ण के मुख में देखा, वे बड़ी शंका में पड़ गई.....!
- आज भी वह स्थान ‘‘ब्रह्माण्ड’’ के नाम से बृज में तीर्थ रूप में स्थित है।
इसका सीधा सा अर्थ इतना ही है कि जिस ब्रह्माण्ड को आज वैज्ञानिक खोज रहे हैं, वह हजारों-लाखों वर्ष पूर्व हिन्दूओं को मालूम थे।
  जीवसŸाा के विनाश का ज्ञान.
‘‘ततो दिनकरैर्दीप्तै सप्तभिर्मनुजाधिय।
पीयते सलिलं सर्व समुद्रेशु सरित्सु च।।’’
  -महाभारत (वन पर्व 188-67)
   इसका अर्थ है कि ‘‘एक कल्प अर्थात् 1 हजार चतुर्युगी की समाप्ति पर आने वाले कलियुग के अंत में सात सूर्य एक साथ उदित हो जाते हैं और तब ऊष्मा इतनी बढ़ जाती है कि पृथ्वी का सब जल सूख जाता है। हमारी कालगणना से एक कल्प का मान 4 अरब 32 करोड़ वर्ष है।
देखिये आज का विज्ञान क्या कहता है ‘‘नोबल पुरूस्कार से सम्मानित चन्द्रशेखर के चन्दशेखरसीमा सिद्यांत के अनुसार यदि किसी तारे का द्रव्यमान 1.4 सूर्यों से अधिक नहीं है, तो प्रारम्भ में कई अरब वर्ष तक उसका हाईड्रोजन, हीलियम में संघनित होता रहकर, अग्नि रूपी ऊर्जा उत्पन्न करता रहेगा। हाईड्रोजन की समाप्ति पर वह तारा फूलकर विशाल लाल दानव (रेड जायन्ट) बन जायेगा। फिर करीब दस करोड़ साल तक लाल दानव की अवस्था में रहकर तारा अपनी शेष नाभिकीय ऊर्जा को समाप्त कर देता है और अन्त में गुठली के रूप में अति सघन द्रव्यमान का पिण्ड रह जाता है। जिसे श्वेत वामन (व्हाईट ड्वार्फ) कहा जाता है। श्वेत वामन के एक चम्मच द्रव्य का भार एक टन से भी  अधिक होता है। फिर यही धीरे-धीरे कृष्ण वामन (ब्लेक हॉल) बन जाता है।
   लगभग 5 अरब वर्ष में हमारा सूर्य भी लाल दानव बन जायेगा, इसके विशाल ऊष्मीय विघटन की चपेट में बुध और शुक्र समा जायेंगे। भीषण तापमान बढ़ जाने से पृथ्वी का जीवन जगत लुप्त हो जायेगा और सब कुछ जलकर राख हो जायेगा।
   महाभारत युग में यह कल्पना कर लेना कितना कठिन था मगर इस पुरूषार्थ को हमारे पूर्वजों ने सिद्ध किया।
वैज्ञानिक गणना
मूलतः सूर्य सिद्धांत ग्रंथ सत्युग में लिखा माना जाता है, वह नष्ट भी हो गया, मगर उस ग्रन्थ के आधार पर ज्योतिष गणना कर रहे गणनाकारों के द्वारा पुनः सूर्य सिद्धान्त गं्रथ लिखवाया गया, इस तरह की मान्यता है।
अस्मिन् कृतयुगस्यान्ते सर्वे मध्यगता ग्रहाः।
बिना तु पाद मन्दोच्चान्मेषादौ तुल्य तामिताः।।
इस पद का अर्थ है ‘कृतयुग’ (सतयुग) के अंत में मन्दोच्च को छोड़कर सब ग्रहों का मध्य स्थान ‘मेष’ में था। इसका अर्थ यह हुआ कि त्रेता के प्रारम्भ में सातों ग्रह एक सीध में थे। मूलतः एक चतुर्युगी में कुल 10 कलयुग होते हैं, जिनमें सतयुग का मान 4 कलयुग, त्रेतायुग का मान 3 कलयुग, द्वापरयुग का मान दो कलयुग और कलयुग का मान एक कलयुग है।
वर्तमान कलियुग,महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात प्रारम्भ हुआ,  (२२ मार्च २०१२ संध्या ७ बज कर १० मिनिट   से)  ५११४  कलि संवत् है। (अर्थात् ई.पू. 3102 वर्ष में 20 फरवरी को रात्रि 2 बजकर 27 मिनिट, 30 सेकेण्ड पर कलियुग प्रारम्भ हुआ।)
‘संवतसर बहुत पुराना’’
-ऋग्वेद के 7वें मण्डल के 103वें सूक्त के मंत्र क्रमांक 7 में संवतसर की चर्चा है।
‘‘ब्राह्मणासो अतिरात्रे ने सोमे सरो न पूर्णमभितो वदन्तः।
संवत्सरस्य तदहः परिष्ठः यन्मण्डूका प्रावृषीणं बभूव।।
गणित से ही गणना
- काल को कितना ही जानने समझने के बाद भी उसका इकाई निर्धारण करना और गिनना एक अत्यंत कठिन कार्य था। यह शून्य और दशमलव के बिना सम्पन्न नहीं था।
- आधुनिक गणित के मूर्धन्य विद्वान प्रो. जी.पी. हाल्स्टेंड ने अपनी पुस्तक ‘गणित की नींव तथा प्रक्रियाएं’ के पृष्ठ 20 पर लिखा है कि ‘‘शून्य के संकेत के आविष्कार की महत्ता कभी बखानी नहीं जा सकती। ‘कुछ नहीं को न केवल एक नाम तथा सत्ता देना वरन् एक शक्ति देना, हिंदू जाति का लक्षण है, जिनकी यह उपज है। यह निर्वाण को डायनमों की शक्ति देने के समान है। अन्य कोई भी एक गणितीय आविष्कार बुद्धिमता तथा शक्ति के सामान्य विकास के लिए इससे अधिक प्रभावशाली नहीं हुआ।’’
- इसी प्रकार हिंदुओं के द्वारा गणित क्षैत्र में दूसरी महान खोज दशमल का आविष्कार था, जिसने सोच और समझ के सभी दरवाजे खोल दिये।
‘हिन्दू गणना में बहुत आगे रहे...’
(क) प्राचीन ग्रीक में सबसे बड़ी ज्ञात संख्या ‘‘मीरीयड’’ अर्थात् 10,000 थी।
(ख) रोमन की सबसे बड़ी ज्ञात संख्या 1000 थी।
(ग) यजुर्वेद संहिता में सबसे बड़ी ज्ञात संख्या 10 ऊपर 12 (दस खरब) थी।
(घ) ईसा पूर्व पहली शताब्दी में ‘ललित विस्तार’ बौद्ध ग्रंथ में 107 संख्या बोधिसत्व कोटी के नाम से बताई गई और इसके आगे प्रारम्भ कर, १० के ऊपर 53 (तल्लक्षण) तक सामने आती है।
(ङ) जैन ग्रन्थ ‘अनुयोग द्वार’ में ‘असंख्येय’ का मान 10 ऊपर 140 तक सामने आता है।
- अंकगणित, बीजगणित की भांति ही रेखागणित का जन्म भी भारत में ही हुआ। पाई का मान हमार आर्यभट्ट ने बताया।
- ऋग्वेद में नक्षत्रों की चर्चा है, राशी चक्र को आरों के रूप में सम्बोधित किया गया है। कुछ नक्षत्रों के नाम भी मिलते हैं।,अर्थववेद में ,जैन ग्रन्थों में 28 नक्षत्रों के नाम आये हैं, इनमें से एक अभिजित नक्षत्र हमारी आकाशगंगा का नहीं होने से गणना में 27 नक्षत्र ही रखे जाते है। जो आज भी वैज्ञानित तथ्यों पर खरे है।
और अनंत की कालगणना...
- श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास हुआ था,श्रीराम का समय 17 लाख 50 हजार वर्ष पूर्व का गणना से बैठता है। अर्थात तब काल गणना थी। सबसे बडी बात तो यह है कि रामेश्वरम सेतु जो समुद्र में डूबा हुआ है की आयु अमरीकी वैज्ञानिकों ने भी लगभग इतनी ही आंकी है।
- विराट नगर की चढ़ाई के समय कृष्णपक्ष की अष्टमी को जब अर्जुन,अज्ञातवास त्यागकर प्रगट हुए व कौरवों को ललकारा ,तो समस्या यह खडी हुई कि अज्ञातवास का समय पूरा हुआ अथवा नहीं, तब कर्ण और दुर्योधन ने ‘अभी तो तेरहवां वर्ष चल रहा है, अतएव पाण्डवों का तेरह वर्ष का प्रण पूर्ण नहीं हुआ और प्रतिज्ञानुसार उन्हें पुनः12 वर्ष वन में ओर रहना चाहिये । इस प्रकार की मांग करते हुए, भीष्मपितामह समय-निर्णय के लिए व्यवस्था देने को कहा, तब भीष्म ने कला-काश्ठादि से लेकर संवत्सर पर्यन्त के कालचक्र की बात कहकर व्यवस्था दी कि ‘ज्योतिष चक्र के व्यतिक्रम के कारण वेदांगज्योतिष की गणना से तो 13 वर्ष, 5 महीने और 12 दिन होते हैं; किंतु पाण्डवों ने जो प्रण की बातें सुनी थी, उनको यथावत् पूर्ण करके और अपनी प्रतिज्ञा की पूर्ति को निश्चयपूर्वक जानकर ही अर्जुन आपके समक्ष आया है।’ अर्थात तब संवतसर भी था और काल गणना भी थी।
-काल की छोटी गणनाओं के बारे में तो बहुत आता रहता है मगर बडी गणनायें,जिनका यूरोपवाले मजाक उडाते थे ,मगर हिन्दू ऋषिओं की जानकारी ने आश्चर्य से मुंह में उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया है।
- जब हमारे सामने 71 चतुर्युगी का मान 4,32,0000000 वर्ष यानि ‘कल्प’ 4 अरब 32 करोड़ वर्ष। कल्प अहोरात्र यानि 4 अरब 32 करोड़ वर्ष का दिन और इतने ही मान की रात्रि यानि कि 8 अरब 64 करोड़ वर्ष।
-ब्रह्मवर्ष: 31 खरब 10 अरब 40 करोड़ वर्ष
-ब्रह्मा की आयु: 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्ष
- आकाशगंगा की एक परिक्रमा में लगभग 25 से 27 करोड़ वर्ष का अनुमान है। संध्यांश सहित एक मन्वन्तर का काल खण्ड भी 30 करोड़ 84 लाख 28 हजार वर्ष का है।
   यूरोप के प्रसिद्ध ब्रह्माण्डवेत्ता ‘कार्ल वेगन’ ने उनकी पुस्तक“COSMOS” में लिखा है कि ‘‘विश्व में हिन्दू धर्म एक मात्र ऐसा धर्म है, जो इस विश्वास पर समर्पित है कि इस ब्रह्माण्ड में उत्पत्ति और लय की एक सतत प्रक्रिया चल रही है और यही एक धर्म है जिसने समय के सूक्ष्मतम से लेकर वृहदतम नाप, जो सामान्य दिन-रात से लेकर 8 अरब 64 करोड़ वर्ष के ब्रह्मा के दिन-रात तक की गणना की है, जो संयोग से आधुनिक खगोलीय नापों के निकट है।’’
-इस संदर्भ में,नई खोजों से बहुत स्पष्टता से सामने आ रही है कि ब्रह्माण्ड में 100 से अधिक बहुत ही शक्तिशाली ”क्वासर“ स्रोत हैं जिनका नीला प्रकाश हमारे पास अरबों प्रकाश वर्ष दूर से चल कर आ रहा है। जिसका सीधा गणितीय अर्थ यह है कि वह प्रकाश इतने ही वर्ष पूर्व अपने स्रोत से हमारी ओर चला..., अर्थात् हमें मिल रही किरणों की आयु मार्ग में लगे प्रकाषवर्ष जितनी है।
- ‘‘‘क्वासर’3 सी 273’’ से 3 अरब वर्ष, ‘‘क्वासर’3 सी 47’’ से 5 अरब वर्ष और ‘‘क्वासर ओएच 471’’ से 16 अरब वर्ष पूर्व चलीं किरणें प्राप्त हो रही हैं। अर्थात् आकाश में जो कुछ हो रहा है, उसके मायनों में हमारे कल्पों की गणना, ब्रह्मा के वर्ष, ब्रह्मा की आयु की गणना ! ब्रह्मा की आयु जो विष्णु के पलक झपकने (निमेष) मात्र होती है तथा फिर विष्णु के बाद रूद्र का प्रारम्भ होना आदी आदी सच के कितने करीब खडे है।
-इसी प्रकार वैदिक ऋषियों के अनुसार वर्तमान सृष्टि पंचमण्डल क्रम वाली हैः-1.चन्द्र मण्डल 2.पृथ्वी मण्डल 3. सूर्य मण्डल 4.परमेष्ठी मण्डल (आकाशगंगा का ) 5.स्वायम्भू मण्डल (आकाशगंगाओं से परे )..! आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि यह सभी मण्डल वास्तविक तौर पर हैं ,पूरी गति व लय के साथ गतिशील हैं,चलायमान हैं..!!
बृम्हांण्ड,गणित और काल की विश्व में इतनी विशाल प्रमाणिक जानकारी हिन्दूओं के अलावा कोई नहीं कर सका...! और आज विज्ञान उन बातों की बेमन से ही सही मगर हां भरने को मजबूर है।

अरविंद सीसौदिया
-राधाकृष्ण मंदिर रोड़,
डडवाड़ा, कोटा जं. ( राजस्थान )
 
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नए चित्र भारतीय नव वर्ष विक्रम संवत २०६९
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गुड़ी पड़वा : हिन्दू नववर्ष : चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
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भारतीय काल गणना सृष्टि की सम्पूर्ण गति, लय एवं प्रभाव का महाविज्ञान है
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भारतीय नववर्ष की अनमोल वैज्ञानिकता :अरविन्द सीसौदिया
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वैज्ञानिक और प्रमाणिक : भारतीय काल गणना का महासत्य
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विक्रमी संवत 2069 : भारतीय नव वर्ष
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मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

विक्रमी संवत 2069 : भारतीय नव वर्ष







23 March 2012 
आओ मनाऐं नया साल-विक्रमी संवत 2069 
> विनोद बंसल 
पाश्चात्य देशों के अंधानुकरण व अंग्रेजियत के बढते प्रभाव के बावजूद भी आज चाहे बच्चे के जन्म की की बात हो या नामकरण की बात हो या शादी की, गृह प्रवेश की हो या व्यापार प्रारम्भ करने की, सभी में हम एक कुशल पंडित के पास जाकर शुभ लग्न व मुहूर्त पूछते हैं। और तो और, देश के बडे से बडे राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का इंतजार करते हैं जो कि विशुध्द रूप से विक्रमी संवत् के पंचांग पर आधारित होता है। भारतीय मान्यतानुसार कोई भी काम यदि शुभ मुहूर्त में प्रारम्भ किया जाये तो उसकी सफलता में चार चांद लग जाते हैं। वैसे भी भारतीय संस्कृति श्रेष्ठता की उपासक है। जो प्रसंग समाज में हर्ष व उल्लास जगाते हुए एक सही दिशा प्रदान करते हैं उन सभी को हम उत्सव के रूप में मनाते हैं। राष्ट्र के स्वाभिमान व देश प्रेम को जगाने वाले अनेक प्रसंग चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से जुडे हुए हैं। यह वह दिन है जिस दिन से भारतीय नव वर्ष प्रारम्भ होता है। आइये इस दिन की महानता के प्रसंगों को देखते हैं :-
ऐतिहासिक महत्व:
1) सृष्टि रचना का पहला दिन : आज से एक अरब 97 करोड़, 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्मा जी ने जगत की रचना इसी दिन की थी।
2) प्रभु राम का राज्याभिषेक दिवस : प्रभु राम ने भी इसी दिन को लंका विजय के बाद अयोध्या आने के बाद राज्याभिषेक के लिये चुना।
3) नवरात्र स्थापना : शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात्, नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है। प्रभु राम के जन्मदिन रामनवमी से पूर्व नौ दिन उत्सव मनाने का प्रथम दिन।
4) गुरू अंगददेव जी का प्रकटोत्सव : सिख परंपरा के द्वितीय गुरू का जन्मदिवस।
5) आर्य समाज स्थापना दिवस : समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
6) संत झूलेलाल जन्म दिवस : सिंध प्रान्त के प्रसिध्द समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल इसी दिन प्रकट हुए।
7) डा0 हैडगेबार जन्म दिवस : राष्ट्रीय स्वयं सेवक संध के संस्थापक डा0 केशव राव बलीराम हैडगेबार का जन्मदिवस।
8)शालिवाहन संवत्सर का प्रारंभ दिवस : विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।
9) युगाब्द संवत्सर का प्रथम दिन : 5111 वर्ष पूर्व युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ।
प्राकृतिक महत्व: पतझड की समाप्ति के बाद वसंत ऋतु का आरंभ वर्ष प्रतिपदा से ही होता है। शरद ऋतु के प्रस्थान व ग्रीष्म के आगमन से पूर्व वसंत अपने चरम पर होता है। फसल पकने का प्रारंभ यानि किसान की मेहनत का फल मिलने का भी यही समय होता है।
आघ्यात्मिक महत्व :
हमारे ऋषि-मुनियों ने इस दिन के आध्यात्मिक महत्व के कारण ही वर्ष प्रतिपदा से ही नौ दिन तक शुध्द-सात्विक जीवन जीकर शक्ति की आराधना तथा निर्धन व दीन दुखियों की सेवा हेतु हमें प्रेरित किया। प्रात: काल यज्ञ, दिन में विविध प्रकार के भंडारे कर भूखों को भोजन तथा सायं-रात्रि शक्ति की उपासना का विधान है। असंख्य भक्तजन तो पूरे नौ दिन तक बिना कोई अन्न ग्रहण कर वर्षभर के लिए एक असीम शक्ति का संचय करते हैं। अष्टमी या नवमीं के दिन मां दुर्गा के रूप नौ कन्याओं व एक लांगुरा (किशोर) का पूजन कर आदर पूर्वक भोजन करा दक्षिणा दी जाती है।
वैज्ञानिक महत्व :
विश्व में सौर मण्डल के ग्रहों व नक्षत्रों की चाल व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके सूक्ष्मतम भाग आधारित होते हैं। इसमें खगोलीय पिण्डों की गति को आधार बनाया गया है। हमारे मनीषियों ने पूरे भचक्र अर्थात 360 डिग्री को 12 बराबर भागों में बांटा जिसे राशि कहा गया। प्रत्येक राशि तीस डिग्री की होती है जिनमें पहली का नाम मेष है। एक राशि में सवा दो नक्षत्र होते हैं। पूरे भचक्र को 27 नक्षत्रों में बांटा गया। एक नक्षत्र 13 डिग्री 20 मिनिट का होता है तथा प्रत्येक नक्षत्र को पुन: 4 चरणों में बांटा गया है जिसका एक चरण 3 डिग्री 20 मिनिट का होता है। जन्म के समय जो राशि पूर्व दिशा में होती है उसे लग्न कहा जाता है। इसी वैज्ञानिक और गणितीय आधार पर विश्व की प्राचीनतम कालगणना की स्थापना हुई।


एक जनवरी से प्रारम्भ होने वाली काल गणना को हम ईस्वी सन् के नाम से जानते हैं जिसका सम्बन्ध ईसाई जगत् व ईसा मसीह से है। इसे रोम के सम्राट जूलियस सीजर द्वारा ईसा के जन्म के तीन वर्ष बाद प्रचलन में लाया गया। भारत में ईस्वी सम्वत् का प्रचलन अग्रेंजी शासकों ने 1752 में किया। अधिकांश राष्ट्रो के ईसाई होने और अग्रेंजों के विश्वव्यापी प्रभुत्व के कारण ही इसे विश्व के अनेक देशों ने अपनाया। 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से शुरू होता था किन्तु 18वीं सदी से इसकी शुरूआत एक जनवरी से होने लगी। ईस्वी कलेण्डर के महीनों के नाम में प्रथम छ: माह यानि जनवरी से जून रोमन देवताओं (जोनस, मार्स व मया इत्यादि) के नाम पर हैं। जुलाई और अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उनके पौत्र आगस्टस के नाम पर तथा सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासों के आधार पर रखे गये। जुलाई और अगस्त, क्योंकि सम्राटों के नाम पर थे इसलिए, दोनों ही इकत्तीस दिनों के माने गये आखिर क्या आधार है इस काल गणना का? यह तो ग्रहों व नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित होनी चाहिए।


ग्रेगेरियन कलेण्डर की काल गणना मात्र दो हजार वर्षों के अति अल्प समय को दर्शाती है। जबकि यूनान की काल गणना 3581 वर्ष, रोम की 2758 वर्ष यहूदी 5769 वर्ष, मिश्र की 28672 वर्ष, पारसी 189976 वर्ष तथा चीन की 96002306 वर्ष पुरानी है। इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़, 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष है। हमारे प्रचीन ग्रंथों में एक-एक पल की गणना की गयी है।


जिस प्रकार ईस्वी सम्वत् का सम्बन्ध ईसा जगत से है उसी प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मुहम्मद साहब से है। किन्तु विक्रमी सम्वत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न हो कर सारे विश्व की प्रकृति, खगोल सिध्दांत व ब्रह्माण्ड के ग्रहों व नक्षत्रों से है। इसलिए भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है। इतना ही नहीं, ब्रह्माण्ड के सबसे पुरातन ग्रंथ वेदों में भी इसका वर्णन है। नव संवत् यानि संवत्सरों का वर्णन यजुर्वेद के 27वें व 30वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमश: 45 व 15 में विस्तार से दिया गया है। क्या एक जनवरी के साथ ऐसा एक भी प्रसंग जुड़ा है जिससे राष्ट्र प्रेम जाग सके, स्वाभिमान जाग सके या श्रेष्ठ होने का भाव जाग सके ?


कैसे मनाऐं नया साल:
नव वर्ष की पूर्व संध्या पर दीप दान करें। घरों में सायंकाल 7 बजे घंटा घडियाल व शंख बजा कर मंगल ध्वनि करके इसका जोरदार स्वागत करें। भवनों व व्यावसायिक स्थलों पर भगवा पताका फहराऐं तथा द्वारों पर विक्रमी संवत 2069 की शुभ कामना सूचक वाक्य लिखें। होर्डिंग, बैनरों, बधाई पत्रों, ई-मेल व एस एम एस के द्वारा नव वर्ष की बधाई व शुभ कामनाऐं प्रेषित करें। नव वर्ष की प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर मंगलाचरण कर सूर्य देव को प्रणाम करें, प्रभात फेरियां निकालें, हवन करें तथा एक पवित्र संकल्प लें। भारत में अनेक स्थानों पर इस दिन से नौ दिन का श्री राम महोत्सव भी मनाते हैं जिसका समापन श्री राम नवमी के दिन होता है।
तो, आइये! विदेशी को फैंक स्वदेशी अपनाऐं और गर्व के साथ भारतीय नव वर्ष यानि विक्रमी संवत् को ही मनायें तथा इसका अधिक से अधिक प्रचार करें।
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नए चित्र भारतीय नव वर्ष विक्रम संवत २०६९
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भारतीय काल गणना सृष्टि की सम्पूर्ण गति, लय एवं प्रभाव का महाविज्ञान है
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भारतीय नववर्ष की अनमोल वैज्ञानिकता :अरविन्द सीसौदिया
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शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

वीर सावरकर : सबल समाज से अच्छे-अच्छे उद्दण्ड कांपते हैं



२६ फरवरी, वीर सावरकर की पुण्यतिथि पर जयंती पर विशेष
सबल समाज से अच्छे-अच्छे उद्दण्ड कांपते हैं
- अरविन्द सीसौदिया
नामर्दी के बुतों को चौराहों से उतार फैंकना होगा,
देश को दिशा दे सकें, वें तस्वीरें लगानी होगी।
उन विचारों को खाक पढ़े, जो कायरता में डूबे हों,
पढें वह,जो ज्वालामुखी सा तेज हर ललाट पर लाये।
स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की भूमिका न केवल महत्वपूर्ण थी, अपितु अंग्रेजों की असल नींद हराम  इसी रास्ते पर चले महान योद्धाओं ने की थी। स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर इस यशस्वी श्रृंखला की एक प्रमुख कडी थे। उनके ओजस्वी लेखन से ब्रिटिश सरकार कांपती थी। उन्हंे राजद्रोह के अपराध में, दो जन्मों की कैद की सजा सुनाई गई थी, अर्थात कम से कम 50 वर्ष उन्हें काले पानी की जेल में कोल्हू फेरते-फेरते और नारियल की रस्सी बनाते-बनाते बिताने थे।
महाराष्ट्र के नासिक जनपद में एक छोटा सा स्थान भगूर है। इसी में दामोदर पंत सावरकर एवं उनकी              धर्मपत्नि राधादेवी के चार संताने थीं। बडे पुत्र का नाम गणेश, दूसरे का नाम विनायक तीसरा के नाम नारायण था एवं पुत्री थी मैना। ये तीनों पुत्र महान स्वतंत्रता सैनानी हुये। माता-पिता का निधन बचपन में ही प्लेग की महामारी में हो गया था, विनायक 28 मई 1883 को जन्में तथा विवाह यमुना के साथ हुआ था। उनके एक पुत्री प्रभात एवं एक पुत्र विश्वास था।
सावरकर में विलक्षण तर्क शक्ति  थी, उन्हें महाभारत के योगेश्वर कृष्ण अत्यधिक प्रिय थे। गीता को उन्होंने अपना आर्दश माना था, उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि यदि हिन्दुओं ने गीता के ज्ञान को विस्मृत नहीं किया होता और  शत्रु के प्रति अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाया होता,तो हम शत्रु संहार में प्रभावी रूप से सफल रहे  होते..!
ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के शासन का स्वर्ण - जयंति महोत्सव मनाया जा रहा था, वहीं महाराष्ट्र अकाल एवं भंयकर प्लेग की चपेट में था,मक्खी-मच्छरों की तरह 1 लाख 73 हजार भारतवासी प्लेग से मौत के मुँह में समा चुके थे, प्लेग कमिश्नर रेण्ड और उनके सहायक आर्मस्ट जनता के ऊपर प्लेग के बहाने अत्याचार ढहा रहे थे, महिलाओं के शीलभंग किये जा रहे थे।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का अखबार केसरी अंग्रेज अत्याचारों के विरूद्ध आग उगल रहा था। अंग्रेज शासन इनकी चिन्ता के बजाये खुशियां मनाने में व्यस्त था, देशभक्तों का खून खौल उठा, व्यायाम मंडल ने प्लेग कमिश्नर रेण्ड और उनके सहायक आर्मस्ट को गोली से उड़ा दिया। फलस्वरूप व्यायाम मंडल संचालक दामोदर हरि चाफेकर और बालकृष्ण हरि चाफेकर बंधुओं को फांसी पर लटका दिया गया, इसी संघर्ष में वासुदेव हरि चाफेकर और महादेव विनायक रानाडे को भी फांसी दे दी तथा तिलक जी को 18 माह की सजा लोगों को भड़काने का आरोप लगा कर दी गई। इस संघर्ष में चाफेकर परिवार का दीपक ही बुझ गया था....तीनों भाई राष्ट्र के लिये बलिदान हो गये..! इस घटना ने सावरकर सहित महाराष्ट्र के युवाओं की दिशा ही बदल दी, विनायक ने मात्र 15 वर्ष की आयु में संकल्प लिया कि वे चाफेकर बंधुओं के राष्ट्र धर्म के मार्ग को आगे बढ़ायेंगे और सावरकर परिवार के भी तीनों भाईयों ने राष्ट्र के लिये जेलें भोगीं।
  उन्होंने किशोरवय में व्यायाम मंडल की तरह ”मित्र-मैला“ के नाम से राष्ट्रभक्ति की साप्ताहिक गोष्ठियां कीं, जो क्रांतिकारियों का प्रमुख केन्द्र बन गयीं थीं। युवा होेते ही ”अभिनव भारत“ नामक गुप्त क्रांतिकारी संगठन खड़ा किया, जिसका काम महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और लंदन तथा पैरिस में प्रमुख रूप से फैला।
रौलट कमेटी की रिर्पोट के अनुसार भारत में संगठित आतंकवादी आंदोलन ;राष्ट्रवादी क्रांतिकारीद्ध का आरम्भ महाराष्ट्र से हुआ, जिसके आरम्भ का श्रेय चाफेकर बंधुओं के बलिदान को जाता है। जिसे देश एवं विदेश में विनायक दामोदर सावरकर के कारण विस्तार मिला....!
दशहरे पर होली....
वे 1905 में पुणे के फर्ग्युसन कालेज के छात्रावास में रहते हुए अध्ययनरत थे, उन्होंने अपने साथियों के साथ बंगभंग के विरोध में, दशहरे पर विदेशी कपड़ों की होली जलाई, जिसमें लोकमान्य बालगंगाधर तिलक भी सम्मिलित हुए थे। कालेज प्रशासन ने उनकी बी.ए. की उपाधी छीन ली। इसी तरह विलायत में भी देशभक्ति के जुर्म के कारण, उन्हें बेरिस्टरी की सनद नहीं दी गईं।
स्वतंत्रता का पहला आगाज: स्टुटगार्ड में तिरंगा
1906 में सावरकर जी लंदन में बैरिस्टरी की शिक्षा प्राप्त करने गये थे, वहां वे प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्यामकृष्ण वर्मा, मादाम भीखाजी रुस्तम कामा, मदनलाल धींगड़ा के सम्पर्क में आये। वे इण्डिया हाऊस छात्रावास में रहते थे। सावरकर ओजस्वी विचारों एवं लेखन क्षमता के बल पर लंदन के क्रांतिकारियों के नेता हो गये थे। उन्होंने छात्रों को एकत्र कर विक्टोरिया राज की छाती पर भारतीय स्वतंत्रता की आवाज बुलंद करने का निर्णय लिया और ‘‘फ्री इण्डिया सोसायटी’’ की स्थापना की। उन्हीं की सलाह पर मैडम कामा ने स्टुटगार्ड में हुए अन्तर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारत का अलग तिरंगा ध्वज फहरा कर विक्टोरिया साम्राज्य से अलग अस्तित्व का आगाज किया था...!  इस तिरंगे की ऊपरी पट्टी में पांच तारे, बीच की पट्टी में वन्दे मातरम् और नीचे की तीसरी पट्टी के एक ओर सूर्य और दूसरी ओर चन्द्रमा था।
ओजस्विता का ज्वालामुखी
सावरकर पर इटली के एकीकरण की घटना का गहरा प्रभाव पड़ा, इस क्रांति के महानायक जोसेफ मैजिनी और गेरीबाल्डी ने भारतीय राष्ट्रभक्ति को उत्साहित किया, उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता समर का धधकाने के लिये, इंग्लैण्ड  में मैजिनी चरित्र लिखा, इसे छपवाने के लिए भारत भेजा, अप्रकाशित पाण्डुलिपी को लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जी ने पढ़ा। वे इस पुस्तक की औजस्विता और तेजस्वितापूर्ण शैली से बहुत प्रभावित हुए, उन्होंने कहा था ”यह पुस्तक भारत के किसी भी युवक को स्वातंत्र्यवीर बना सकती है। यदि ब्रिटिश सरकार के हाथ यह पाण्डुलिपि पड़ गई तो वह इसे अवश्य ही जब्त कर लेगी।“ उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई, ”जोसेफ मैजिनी“ पर लिखी इस पुस्तक को जब्त कर लिया गया।
इसी तरह उन्होंने सिखों का इतिहास  पुस्तक लिखी थी, जिसे प्रकाशित होने से पूर्व ही ब्रिटिश सरकार ने भनक मिलते ही डाक से गड़बड़ करके जब्त कर लिया गया।
उन्हीं दिनों 1857 के गदर के 50 वर्ष पूर्ण होने जा रहे थे, उस समय तक ब्रिटिश सरकार 1857 की घटना को सिपाहियों का मामूली सा विद्रोह कह कर महत्वहीन बनाने पर तुली थी तो, सावरकर जी की क्रांतिकारी संस्था अभिनव भारत ने इस अवसर को वर्तमान में चल रहे स्वतंत्रता समर में उर्जा प्रदान करने के अवसर के रुप में उपयोग की ठानी। लंदन में भारतीय छात्रों ने जोर  शोर से 10 मई 1907 को स्वर्ण जयन्ति मनाई। सावरकर जी ने इस अवसर पर ‘ओ शहीदों’ नामक पर्चा निकाला। 1857 के बलिदानी महारानी लक्ष्मीबाई, मंगल पाण्डे, तांत्या टोपे, कुंवर सिंह आदी को श्रद्धांजली दी गई और स्वातंत्र्य  शपथ ली। सावरकर के विचारों से प्ररित होकर उनके साथी मदनलाल धींगरा ने भारत सचिव ए.डी.सी.कर्नल सर वाईली की गोली मार कर हत्या कर दी, उन्हें मृत्यु दण्ड दिया गया। दुर्भाग्यवश इस घटना की निंदा आगा खां की अध्यक्षता में हुई शोक सभा में की गई जिसमें अंग्रेजों की जी हजूरी करने वाले भारतीय पहुंचे, मगर सावरकर के विरोध से शोकसभा में शोक प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया।
उनके बड़े भाई  गणेश  सावरकर जो बाबा के नाम से जाने जाते थे, के कंधों पर परिवार की जिम्मेवारी होने से, वे सीधे क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग न लेकर गुप्त रूप से भारत में अभिनव भारत के क्रांतिकारियों की भरपूर मदद करते थे। मूलतः माना जाता है कि महाराष्ट्र के क्रांतिकारियों की बागडोर उनके हाथ में थी। अभिनव भारत सशस्त्र क्रांति के अलावा वैचारिक क्रांति पर भी  अधिक जोर देता था।
पुस्तक ‘1857 का प्रथम स्वातंत्र्य समर’ का प्रकाशन इग्लैंड में संभव नहीं था, पांडुलिपि बड़े भाई बाबा को भारत भेजी गई, बाबा ने काफी कोशिशों के बाद महसूस किया कि यह पांडुलिपी भारत में अंग्रेजों के हाथ पड़ सकती है तथा इसको अंग्रेजी में अनुवाद करवा कर छपवाया जाये तो यह पुस्तक सम्पूर्ण विश्व में भारतीय पक्ष में जनमत तैयार करने का काम करेगी, अंततः इसको फ्रांस में अंग्रेजी अनुवाद कर छपवाया गया।
धीरे-धीरे प्रकाशित प्रतियाँ भारत में आने लगी। अंग्रेजों ने पुस्तक प्रतिबंधित कर दी, विनायक सावरकर के बड़े भाई गणेश सावरकर उर्फ बाबा को भारत में गिरफ्तार कर लिया। पुस्तक के प्रकाशन की जिम्मेवारी उनके ऊपर डालते हुए राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और आजीवन कारावास की सजा सुना कर काले पानी भेज दिया।
जिस अंग्रेज अधिकारी जैक्सन ने यह सजा सुनाई थी, उसे अभिनव भारत के क्रांतिकारी अनंत लक्ष्मण कन्हारे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। विनायक सावरकर को भी लंदन में गिरफ्तार कर उन पर अवैद्य रूप से भारत में पिस्तोलें एवं कारतूस भेजने का आरोप लगाया, वे जिस जहाज से भारत भेजे गये, उसके टोयलेट होल से समुद्र में कूद गये और तैर कर फ्रांस तट पहुँचे, दीवार फांद कर फ्रंास में प्रवेश कर गए, मगर फांसीसी सैनिकों की नासमझी से उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर नासिक षड़यंत्र के आरोप में आजीवन निर्वासन की सजा दी गई, उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया तथा विश्व में वे पहले ऐसे सजायाफ्ता थे जिन्हें दो जन्मों की कैद की सजा सुनाई गई हो अर्थात कम से कम 50 वर्ष उन्हें काले पानी की जेल! अंग्रेज की हेग न्यायालय ने सजा देते हुए कहा था कि मौत की सजा देने से उतना दंड नहीं मिल सकता जितना बड़ा राजद्रोह का अपराध सावरकर ने किया है । इसलिए दो जन्मों का सश्रम कारावास की सजा दी जाती है । उनके तीसरे भाई डॉ. नारायण सावरकर को भी लार्ड मिण्टो बम कांड में सजा हो गई थी।
आजादी का र्तीथ: कालापानी
कलकत्ता से 1400 किलोमीटर और चैन्नई से 1300 किलोमीटर सुदुर हिन्द महासागर का एक छोटी सी टापू श्रंखला अंडमान निकोबार द्वीप समूह स्थित है। भारत से इतनी अधिक दूर स्थित यह स्थान भारतीय स्वतंत्रता की तीर्थस्थली है, हाल ही में इसके हवाई अड्डे का नाम वीर सावरकर हवाई अड्डा रखा गया है। इससे पहले इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा भी दिया जा चुका है। खूंखार और अंग्रेजों पर भारी पड़ने वाले विद्रोहियों को यहाँ की सैलूलर जेल में रखा जाता था। इसका निर्माण 1896 में प्रारम्भ होकर 1906 में पूरा हुआ था, इसमें 10 गुणा 7 की 696 कोठरियां है, यहां कैदियों से 12 से 18 घंटे तक कोल्हू चलवा कर तेल निकलवाया जाता था तथा नारियल के रेशे कुटवा कर रस्सी बनवाई जाती थी। हालांकि इस जेल में राष्ट्रभक्तों के जत्थे सजा पाकर पहुँचते ही रहे, मगर तीन दौर अत्यंत महत्वपूर्ण थे, 1906 से 1914, 1916 से 1920 और 1932 से 1938 जब जेलों की कोठरियों में “वंदेमातरम्“ और ”सरफरोशी की तमन्ना“ की लहरियां गूंजती थी। उष्ण कटिबंधीय इस भूमि के तपते पत्थरों पर 44-45 डिग्री का तापमान भी राष्ट्रभक्ति की आग के आगे फीका लगता था। इसमें विनायक दामोदर सावरकर और उनके बड़े भाई  गणेश दामोदर सावरकर ने लगभग 10 वर्ष बिताये। इस जेल में अलीपुर षड़यंत्र, चटगांव डकैती, काकोरी कांड, लाहौर बम कांड, मोपला विद्रोह, नासिक षडयंत्र अनगिनित विद्रोह अनगिनत क्रांतिवीर... आते ही रहे।
अंडमान की सेलूलर जेल में भी उन्हें अत्यंत घातक श्रेणी ”डी“ का मुजरिम घोषित किया गया था, उन्होंने कालापानी से मुक्त होने के लिए ये 6 प्रयास किये, तत्कालीन गृहसचिवों ने उनके खिलाफ रिर्पोटे देकर उनकी मुक्ति में बाधा खड़ी की, गृहसचिव क्रेडोक ने लिखा है ”मैं उनसे अंडमान मिलने गया, उन्हें अपने किये का कोई पछतावा नहीं है, अंडमान से उन्हें आजादी देना संभव नहीं है, वह भारत की किसी भी जेल से भाग निकलेगा।’’ इसी तरह एक अन्य गृहसचिव मेक्फर्सन ने लिखा “ विनायक ही असली खतरनाक व्यक्ति है, उसके पास दिमाग है और जन्मजात नेता का स्वभाव है। उसकी रिहाई पर आपत्ति का कारण यह नहीं है कि उसका अपराध गंभीर है। बल्कि यह उसका स्वभाव है।’’ वे 1910 से 1921 तक कालापानी की जेल में रहे तथा 1921 से 1937 तक प्रतिबंधित निगरानी में रत्नागिरी (महाराष्ट) में रहे।
स्वतंत्रता का प्रथम दर्शन कालापानी
यदि अंग्रेजों ने इस जेल से सावरकर जी को मुक्त नहीं किया होता, तो भी इस द्वीप समूह पर जापान ने कब्जा कर लिया था तथा इसे भारतीय की प्रथम स्वतंत्र अस्थायी सरकार को दे दिया था, इसी क्रम में इस सरकार के प्रधानमंत्री नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 29 दिसम्बर 1943 को अंडमान यात्रा की और वे कुछ दिन वहां रहे।  इसलिए यह कालापानी का टापू भारत की स्वतंत्रता के क्रांतिकारी आंदोलन का एक अद्वितीय तीर्थस्थल है।
मार्ग चलता रहा...
काल कोठारी वाली लोह सलाखें गर्माई होंगी,
फांसी के तख्ते पर लटकी रस्सी चिल्लाई होगी।
सावरकर की आंखों से तब, खारा जल छलका होगा,
कोल्हू से उस वक्त, तेल की जगह लहू टपका होगा।।
- विनीत चौहान
निग्रोस्तान स्वीकार क्यों नहीं करते.........
   सावरकर भारत विभाजन का डटकर विरोध कर रहे थे। इसी दौरान प्रख्यात अमरीकी पत्रकार व लेखक ‘‘लुई फिशर’’ भारत में बड़े नेताओं से भेंटकर उनके विचार जान रहे थे। वे जिन्ना के विचार जानने के बाद सावरकर से मिले और प्रश्न किया ‘‘ आपको मुसलमानों को अलग देश ‘पाकिस्तान’ देने में आपत्ति क्या है?’’ सावरकर ने उलट उनसे प्रश्न कर डाला ‘‘आप लोग भारी मांग के बाद भी मूल निवासी निग्रो लोगों के लिए आपकी सरकार ‘निग्रोस्तान’ क्यों नहीं स्वीकार कर लेते ?’’ सहज ही लुई फिशर के मुंह से निकल गया ‘‘देश का विभाजन राष्ट्रीय अपराध है।’’
देशहित का अनोखा चिन्तक
सावरकर लिखते है, ”पारकीय  लोग शस्त्र प्रयोग से हिन्दुओं का जितना विनाश नहीं कर सके, उतना विनाश स्वयं हिन्दुओं ने ही अपनी सद्गुणी विकृति से कर लिया है, काश, गीता की ”देशकाल पात्र“ के विवेक की सावचेतना न भुलाई गई होती, हिन्दुओं को गीता के इस सापेक्ष उपदेश की विस्मृति हुई, इसीलिए उनका घात ;पतनद्ध हुआ।
       उन्होंने पृथ्वीराज चौहान द्वारा यु(बंदी बनाये गये शत्रु को प्राणदान देने और छोड़े जाने को एक भयंकरतम महान भूल कहा। उनका मत था जिनका धर्म काफिरों का विच्छेद हो उनसे ”जैसे को वैसा“ व्यवहार करना ही न्याय की नैतिकता होती...।
वीर सावरकर आधुनिक विश्व से, वैज्ञानिकता में सब कुछ सीखकर उनसे भी आगे निकलने की आवश्यकता महसूस करते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि विश्व में शान्ति और प्रभुत्व की स्थापना में सर्वाधिक योगदान शक्ति का ही रहता है। वीर ही वसंुधरा का भोग करते हैं!  एक अन्य लेख में उन्होंने लिखा है कि इस विज्ञान के युग में समाज संस्था का पुर्नगठन करना, वह भी प्रत्यक्ष, ऐहिक तथा विज्ञाननिष्ठ सि(ांतों पर करना चाहिये। वह मार्ग अपनाते समय इंगलैंड, रूस, जापान ये राष्ट्र बलवान हुए है। ठीक वैसे ही भारत भी बलवान होकर रहेगा।
वे हिन्दुत्व के कट्टर समर्थक थे, उन्होंने वामपंथी भटकाव पर चेतावनी देते हुए कहा कि पहले परधर्मी ही विरोधी थे, किन्तु अब स्वधर्मी भी विरोध कर रहे हैं, जो बहुत ही गंभीर एंव चिंतन का विषय है। वे स्पष्ट घोषणा करते थे ‘‘तुम शपथ लो, इन्द्र पद यदि मुझे मिल रहा हो, तो भी प्रथम अहिन्दू होकर जीने से, अंतिम हिन्दू होकर मरना मैं श्रेयकर मानूगाँ। माता पिता भी भले ही हिन्दुत्व को भूल जाये, किन्तु तुम हिन्दुत्व को मत छोड़ो। उनका बहुत स्पष्ट कहना था राजनीति के लिए धर्म और धर्म के लिए राजनीति है। इसी तरह वे ये भी हमेशा ही कहते थे कि सबल समाज से अच्छे-अच्छे उद्दण्ड कांपते हैं, इसलिए सबल समाज का निर्माण करो। ’’
1937 में ब्रिटिश सरकार ने उन पर से सारे प्रतिबंध उठा लिये थे। उन्होंने हिन्दू महासभा के अखिल भारतीय अध्यक्ष का पद संभाला तथा उसे सक्रीयता दी। इसी का परिणाम था कि भारत की प्रथम राष्ट्रीय सरकार में हिन्दू महासभा के कोटे से उनके सहयोगी डॉ. श्याम प्रसाद मुखर्जी उद्योग मंत्री बनाये गये। दुर्भाग्यवश महात्मा गांधी पाकिस्तान को सहयोग देने की नीति के शिकार हुए। उनकी हत्या के जुर्म में सावरकर जी को भी गिरफ्तार कर लिया गया मगर वे न्यायालय द्वारा बाईज्जत बरी किये गये।
उन्होंने हिन्दुत्व नामक पुस्तक के द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्वाद की दिशा दी एवं ‘भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ’ नामक महान गं्रथ की रचना की जो भारतवासियों के स्वाभिमान को गौरवान्वित एवं उत्थान के लिए प्रेरित करता है। उन्हांेने असंख्य लेख एवं पुस्तकें लिखीं। नागपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें ऐतिहासिक साहित्य सृजन के लिए ‘‘डॉक्टरेट’’ की उपाधी से अलंकृत किया था।
सतत सतर्कता के प्रहरी..
वे आजाद भारत को हमेशा आगाह करते रहे कि ‘‘हिन्दुस्तानी शासन सेना की ओर से लापरवाही बरत रहा है, जब तक हिन्दुस्तान सैनिक शक्ति के रूप में शक्तिशाली नहीं बन जाता, तब तक उसके शब्दों को मूल्य नहीं मिल सकेगा।’’ यह तथ्य सत्य भी हुआ चीन ने भारत के कान पकड़ी छेरी ;बकरीद्ध की तरह व्यवहार किया। अमेरिका- ब्रिटेन ने भारत से निरंतर कुटनीति खेली। विश्व में भारत की आवाज को मा. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा किये गये परमाणु परीक्षण के बाद आज महत्व मिल पाया है।
1947 में जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरिसिंह की फौज के अधिकांश मुस्लिम सैनिकों ने महाराजा के विरू( विद्रोह कर पाकिस्तानी आक्रमणकारियों का स्वागत किया था और साथ दिया था। महाराजा को अपनी जान बचाकर रातों रात श्रीनगर से जम्मू पहुँचना पड़ा था।  यदि भारत में ब्रिटिश फौज में हिन्दू नवयुवक अच्छी संख्या में न होते तो यह दृश्य अन्य जगह भी उपस्थित होता।
आखिर में इस बात का खंडन भी करना चाहता हूँ कि सावरकर ने हिन्दू और मुसलमानों को अलग अलग किया। हिन्दू और मुसलमान को बांटकर भारत पर राज्य बनाये रखने की साजिश में विक्टोरिया ताज 1857 के बाद भी सक्रिय हो गया था। 1870-90 के दशकों में अंग्रेजों से मुसलमान को जोड़ने की कोशिशें प्रारम्भ हो गई थी। तत्पश्चात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हिन्दूओं के विरू( मुसलमान को खड़ा करने के ट्रेनिंग सेंटर के रूप में विकसित हो गया था। इसके प्राचार्य इसाई             धर्मावलम्बी प्रिंसीपल बेक और प्रिंसीपल आर्चबोल्ड प्रमुख कर्ताधर्ता थे। जहाँ तक सावरकर के जीवनकाल में हिन्दु मुस्लिम एकता का प्रश्न है, इस दौर में मुस्लिम लीग ने और पाकिस्तान ने भारतीय हितों पर कुठाराघात ही किया और हिन्दू मुस्लिम एकता कभी नहीं होने दी।
सावरकर की कुशल कुटनीति ने अंग्रेजों को भगाया:
वे कई वर्षो तक हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे। उन्हांेने जब 1942 में हिन्दू नवयुवकों को भारतीय फौज में भर्ती होेने का आव्हान किया, तब कांग्रेस ने उनकी आलोचना की मगर यह बहुत ही महत्वपूर्ण एवं राष्ट्रहित से जुड़ी गहरी सूझबूझ का कार्य था। जिसका इतिहास में सही मूल्यांकन नहीं किया जा  सका..। देश की आजादी की स्थितियाँ बन रही थी, विश्व के तमाम राष्ट्र एक दूसरे के विरु( शस्त्र लिये खड़े थे। भारतीय ब्रिटिश फौज में अधिकतम हिन्दू युवक पहँुचकर, भारतीय फौज की मुख्य मारक क्षमता को अपने कब्जे में करलंे और उपयुक्त समय पर शस्त्र के बल पर तख्ता पलट कर देश को स्वतंत्र करा ले। इस तरह की महान राष्ट्रभक्त गुप्त योजना का ही यह परिणाम है कि जब नेताजी सुभाष चंद्र बौस की आजाद हिन्द फौज के बंदी सिपाहियों पर अंग्रेजों ने सजा सुनाने की कोशिश की तो देश में जनविद्रोह खडा हुआ, इसी क्रम में नेवी विद्रोह से सैनिक विद्रोह खड़ा हुआ, जो पुलिस तक में फैल गया, तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने हाउस आफ कामन्स में पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल को बताया था कि ‘....अब भारत में फौज हमारे साथ नहीं है, इसलिए भारत अब तुरंत छोड़ना होगा’ और प्रधानमंत्री एटली ने भारत की स्वतंत्रता की पूर्व घोषणा जून 1948 को भी कम कर दिया और यह निर्णय लिया कि 15 अगस्त, 1947 तक भारत को छोेड़ देंगे। अंग्रेजों को बोरिया बिस्तर बांधकर भागने की स्थिती बन गई थी,यदि इस अवसर पर कांग्रेस विद्रोही सैनिकों के सामने नहीं खड़ी होती तो, अखंड भारत ही स्वतंत्र होता।
जैसे जिये, वैसे ही स्वर्ग पधारे...
वे अपने जीवन के अंतिम दौर में अस्वस्थ रहते थे।  उन्होंने स्वयं की मृत्यु के लिए आत्मार्पण किया तथा भोजन त्याग कर मृत्यु को आमंत्रित किया, 26 फरवरी 1966 को उनकी आत्मा परमात्मा में लीन हो गई। उन्होंने जीवन के अंतिम दौर में राष्ट्र चिंता नहीं छोड़ी थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘‘लाल बहादुर शास्त्री को ताशकंद नहीं जाना चाहिऐ, वहां उन पर दबाव डाला जायेगा और रण में जो जूझ कर पाया वह उसे खो देंगे और हुआ भी वही, शास्त्री जी ने जीती हुई चौकियां ही नहीं खोई, बल्कि अपने प्राण भी खो दिये।’’
अंत में डॉ. बृजेन्द्र अवस्थी की कविता की दो पंक्तियों से इस आलेख का समापन करते हैं:-
‘‘ले बढ़ा देश का स्वाभिमान, तोड़ता कड़ी व्यवधानों की,
गद्दार ‘महत्ता’ क्या जानें, सावरकर के बलिदानों की।’’
 छुटभैया कांग्रेसी क्या जाने........!
1. परतंत्र भारत में, 1923 में कांग्रेस के काकीनाड़ा       अधिवेशन में सावरकर की रिहाई का सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित हुआ।
2. 1937 में बम्बई प्रांत में कांग्रेस की सरकार निर्वाचित हुई, उसने सबसे पहले ‘रत्नागिरी’ में नजरबन्द सावरकर की नजरबन्दी समाप्त की..!
3. सावरकर के देहावसान पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत की महान विभूति बताते हुए कहा था ‘‘साहस और देशभक्ति के पर्याय सावरकर आदर्श क्रांतिकारी के सांचे में ढ़ले थे। अनगिनत लोगों ने उनके जीवन से प्रेरणा ली।’’
4. इंदिरा गांधी के कार्यकाल में ही सूचना एवं प्रसारण मंत्री बसंतराव साठे की देखरेख में एक वृत्तचित्र भी सावरकर जी पर बना था।

- राधाकृष्ण मंदिर रोड़,  डडवाड़ा, कोटा जं0 ;राजस्थानद्ध

लोकतंत्र तार - तार : अजित की सभा में महिला कलाकारों के कपड़े फाड़े


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लोकतंत्र तार - तार
चुनाव प्रचारों का यह पतन बताता है कि हमारे नेताओं में अब जनता को आकर्षित करने का दम चुक गया जो हल्के  किस्म के तरीकों से भीड खींचने के उपाय  अपनाकर लोकतंत्र को तार - तार कर रहे है। चुनाव आयोग को इस तरह के बेवुनियद आयोजनों पर रोक लगाना चाहिए..जो लोकतंत्र का स्तर नीचे गिराते हों ....
अजित की सभा में महिला कलाकारों के कपड़े फाड़े
http://navbharattimes.indiatimes.com
मेरठ।। राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया चौधरी अजित सिंह की चुनावी सभा में, सरधना के फलावदा में 23-2-2012{गुरुवार} को आरएलडी-कांग्रेस उम्मीदवार हाजी याकूब के समर्थन में अजित सिंह की सभा थी। सभा में भीड़ जुटाने के लिए महिला रागिनी कलाकारों को बुलाया गया था। अजित के भाषण देकर मंच से उतरने के बाद गीत-संगीत का कर्यक्रम शुरू हो गया। इस दौरान भीड़ बेकाबू हो गई और कुछ लोगों ने महिलाओं से छेड़खानी शुरू कर दी। कुछ लोगों ने कलाकारों को खींचने का प्रयास किया। इस पर महिलाएं इधर-उधर भागने लगीं, तो अराजक तत्वों ने उन्हें दबोच लिया और कपड़े फाड़ दिए। बीच-बचाव में आए उनके साथी कलाकारों को भी पीटा गया। आरोप है कि उनसे 50 हजार की नकदी और अन्य समान भी लूट लिए।
शरारती तत्वों की इस हरकत को देख पुलिस और नेताओं के पसीने छूट गए। पुलिस ने मुश्किल से कलाकारों को भीड़ से निकाला और पास के मकान में लेकर गई। इसके बाद भी जब भीड़ शांत नहीं हुई तो सिपाहियों ने लाठियां फटकार कर कलाकारों को उनकी कार तक पहुंचाया। उन्मादी भीड़ गाड़ी का पीछा करने लगी और

कांग्रेस के कमाईखोर : कृपाशंकर सिंह


कांग्रेस के कमाईखोर   

पूरी फिल्‍मी है कृपाशंकर की कहानी :
आलू बेचने से लेकर अरबपति राजनेता बनने तक
http://www.mediadarbar.com/4842/kripa/
हाई कोर्ट के आदेश के बाद कुचर्चा में आए कृपाशंकर सिंह की कहानी किस फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट से कम नहीं है। चार दशक पहले जौनपुर से चलकर मुंबई पहुंचे कृपाशंकर सांताक्रूज में आलू बेचने से लेकर मायानगरी में कांग्रेस के अध्‍यक्ष के पद पर काबिज होने तक की कहानी बहुत ही दिलचस्‍प है। इस सफर में ना जाने किसी स्‍याह-सफेद कारस्‍तानियां दफन हैं। इस फिल्‍मी कहानी का सच एक जनहित याचिका के बाद उजागर हुई है। जिसके बाद हाई कोर्ट ने कृपाशंकर तथा उनके परिजनों की सम्‍पत्ति जब्‍त करने का निर्देश दिया है। बीएमसी में पार्टी की हार के बाद परेशानियों में आए कृपाशंकर के लिए हाई कोर्ट का आदेश जले पर नमक छिड़कने जैसा है।

कृपाशंकर भले ही कह रहे हों कि यह मामला पूरी तरह से राजनीति प्रेरित है, लेकिन हाई कोर्ट ने इस मामले में जिस तरह से कड़ा रुख अपनाया है, उससे नहीं लगता कि इस तरह की दलीलें काम आने वाली हैं। कृपाशंकर के वकील मुकुल रोहतगी भी याचिका दायर करने वाले संजय तिवारी को आरटीआई की आड़ में भाजपा व शिवसेना के हितों को फायदा पहुंचाने की बात कह रहे हैं। उल्‍लेखनीय है कि सोशल एक्टिविस्‍ट संजय तिवारी ने कृपाशंकर और उनके परिवार के सदस्‍यों की बेनामी सम्‍पत्ति की जानकारी को आरटीआई के तहत संकलित कर सीबीआई, इनकम टैक्‍स और ईडी को लिखित शिकायत दी थी तथा कार्रवाई की मांग की थी.

लेकिन जब इन सरकारी एजेंसियों ने संजय तिवारी की शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया तो उन्‍होंने 25 मार्च 2010 को मुंबई हाई कोर्ट में पीआईएल दाखिल कर विशेष जांच दल गठित करने की अपील की। इस मामले की सुनवाई करते हुए बाम्‍बे हाईकोर्ट ने 10 जून, 2010 को सभी सरकारी एजेंसियों को हलफनामा सौंपने का निर्देश दिया, लेकिन एजेंसियां इस मामले में दिलचस्‍पी दिखाने की बजाय टालमटोल करती रहीं। यहां तक कि 15 जुलाई 2010 को कृपाशंकर के वकीलों ने याचिका की वैधता पर ही सवाल खड़ा कर दिया और उसे खारिज करने की अपील की। लेकिन 16 दिसम्‍बर 2010 को बाम्‍बे हाई कोर्ट में जस्टिस रंजना देसाई और जस्टिस आरबी मोरे ने तीनों सरकारी एजेंसियों को सीलबंद रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया और कहा कि इस मामले में ये एजेंसियां एक दूसरे का सहयोग करें।

इसके बाद 3 मार्च 2011 को हाईकोर्ट ने रिपोर्ट का अध्‍ययन करने के बाद तीनों एजेंसियों को 31 मार्च 2011 तक अंति‍म रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। इसी के बाद बीते बुधवार को हाईकोर्ट ने कृपाशंकर सिंह के खिलाफ भ्रष्‍टाचार निरोधक कानून के तहत मामला दर्ज कर उनकी अचल सम्‍पत्ति को जब्‍त करने का आदेश पारित किया। उधर, इस आदेश के पारित होते ही बीएमसी चुनावों में पार्टी की हार के बाद इस्‍तीफा दे चुके कृपाशंकर का पार्टी हाई कमान ने तुरंत इस्‍तीफा भी स्‍वीकार कर लिया। इसके बाद से कभी महाराष्‍ट्र की राजनीति में ताकतवर माने जाने वाले कृपाशंकर और मुश्किलों में घिर गए हैं। इनके ऊपर आरोपों की भी लम्‍बी फेहरिस्‍त है।

1- कृपाशंकर सिंह के नाम दो पैन कार्ड का मामला
2- समता सहकारी बैंक में परिजनों के खाते में करोड़ों की संपत्ति
3- निजी बॉडीगार्ड को पॉवर ऑफ अटार्नी देकर नवी मुंबई के पनवेल में करोड़ों की संपत्ति
4- रत्नागिरी जिले के वाड़ा पेण में सैकड़ों एकड़ जमीन
5- जौनपुर में व्यावसायिक संकुल एवं जमीन
6- मुंबई के बांद्रा पश्चिम में बंगला, सांताक्रूज में जमीन व एड्रेस बिल्डिंग में फ्लैट
7- चुनाव के दौरान शैक्षणिक योग्यता की गलत जानकारी
8- मुंबई के ही पश्चिमी उपनगर विलेपार्ले के ज्यूपिटर बिल्डिंग में डुपलेक्स प्लैट
9- बेटे-बेटी और पत्नी के नाम कई खाते की जानकारी छिपाने का आरोप
10- मुंबई के पवई में 1900 वर्गफीट का फ्लैट।

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

रामलीला मैदान में लाठीचार्ज गलत, दोषी पुलिस वालों पर कार्रवाई की जाए : सुप्रीम कोर्ट


"इस घटना से सरकार की ताकत का पता चलता है, जिसने पूरी ताकत से लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार किया. ये घटना सरकार और जनता के बीच टूटते विश्वास का जीता जागता उदाहरण है. पुलिस का काम शांति बहाल करना है, लेकिन उस दिन पुलिस ने खुद ही शांति भंग करने का काम किया. दिल्ली पुलिस ने अपनी ताकत का ग़लत इस्तेमाल किया और जनता के बुनियादी अधिकारों को रौंदा. इस घटना में शामिल पुलिस वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए, चाहे वह किसी भी ओहदे पर हों."




रामलीला मैदान में लाठीचार्ज गलत: सुप्रीम कोर्ट
Thursday, 23 February 2012
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने चार और पांच जून की आधी रात में रामलीला मैदान में हुई पुलिसिया कार्रवाई को ग़ैर-जरूरी करार देते हुए इस पूरे घटनाक्रम में बाबा रामदेव को भी जिम्मेदार ठहराया.अदालत ने गुरुवार ने अपने फैसले में कहना है कि रामलीला मैदान में लाठीचार्ज किया जाना गलत था और दिल्ली पुलिस को निर्देश किया कि दोषी पुलिस वालों पर कार्रवाई की जाए.
कोर्ट का साफ कहना था कि पुलिस का लाठीचार्ज करना और आँसू गैस के गोले दाग़ना गलत था. कोर्ट ने इस कार्रवाई को संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया.अदालत ने इस मामले में बाबा रामदेव के भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को भी जिम्मेदार ठहराया और कहा कि अगर पुलिस कार्रवाई कर रही थी तो रामदेव को भीड़ की भावनाएं नहीं भड़कानी चाहिए थी.अदालत ने टिप्पणी की, "इस घटना से सरकार की ताकत का पता चलता है, जिसने पूरी ताकत से लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार किया. ये घटना सरकार और जनता के बीच टूटते विश्वास का जीता जागता उदाहरण है. पुलिस का काम शांति बहाल करना है, लेकिन उस दिन पुलिस ने खुद ही शांति भंग करने का काम किया." कोर्ट ने इसके आगे कहा, "दिल्ली पुलिस ने अपनी ताकत का ग़लत इस्तेमाल किया और जनता के बुनियादी अधिकारों को रौंदा. इस घटना में शामिल पुलिस वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए, चाहे वह किसी भी ओहदे पर हों."
ग़ौरतलब है कि अदालत ने इस पूरे मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस, गृह मंत्रालय और बाबा रामदेव को नोटिस जारी किया था.अदालत ने दोषी पुलिस वालों और बाबा रामदेव के समर्थकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज करने के निर्देश दिए. अदालत ने साफ कहा कि पुलिसिया कार्रवाई के दौरान  रामदेव के जो समर्थक हिंसक व्यवहार कर रहे थे उनके खिलाफ भी मामले दर्ज किए जाएं.
ग़ौरतलब है कि बाबा रामदेव ने आरोप लगाया था कि गृह मंत्रालय के निर्देश पर पुलिस कार्रवाई को अंजाम दिया गया था. उनकी मांग रही है कि उन लोगों पर कार्रवाई की जाए जिन लोगों ने इस कार्रवाई के निर्देश दिए थे.हालांकि, दिल्ली पुलिस का दावा है कि रामदेव ने अपने समर्थकों को हिंसा के लिए उकसाया, जिसके कारण पुलिस को आधी रात को कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा.
अदलती आदेश
"इस घटना से सरकार की ताकत का पता चलता है, जिसने पूरी ताकत से लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार किया. ये घटना सरकार और जनता के बीच टूटते विश्वास का जीता जागता उदाहरण है. पुलिस का काम शांति बहाल करना है, लेकिन उस दिन पुलिस ने खुद ही शांति भंग करने का काम किया. दिल्ली पुलिस ने अपनी ताकत का ग़लत इस्तेमाल किया और जनता के बुनियादी अधिकारों को रौंदा. इस घटना में शामिल पुलिस वालों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिए, चाहे वह किसी भी ओहदे पर हों."

अदालत की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपने फैसले में कहा कि इस हादसे में राजबाला नाम की जिस महिला की मृत्यु हो गई थी उनके परिवार वालों को पांच लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए, जबकि इस कार्रवाई में घायल हुए लोगों को 50-50 हज़ार रुपए दिए जाएं.इसके साथ ही अदालत ने कहा कि मुआवज़े की 25 फीसदी रकम भारत स्वाभिमान ट्रस्ट दे यानी बाबा रामदेव को देने को कहा है.ग़ौरतलब है कि चार जून को बाबा रामदेव का भ्रष्टाचार और काले धन को लेकर अनशन शुरू हुआ था. चार जून को दिन में रामदेव की सरकार के प्रतिनिधियों से बात भी हुई, जो विफल हो गई, लेकिन रात होते होते रामलीला मैदान में पांच हजार पुलिस वाले दाखिल हुए और हज़ारों की भीड़ को खदेड़ दिया.
पुलिस ने रामलीला मैदान में आधी रात को उस वक्त कार्रवाई जब मैदान में हज़ारों महिलाएं, बच्चे, बुज़ुर्ग और नौजवान सो रहे थे या सोने की तैयारी कर रहे थे.दिलचस्प बात यह है कि पुलिसिया कार्रवाई से एक दिन पहले केंद्र सरकार के चार-चार वरिष्ठ मंत्री जिनमें लोकसभा के नेता और सबसे वरिष्ठ मंत्री प्रणव मुखर्जी भी शामिल थे, दिल्ली एयरपोर्ट पर जाकर रामदेव से मुलाकात की थी, ताकि बाबा रामदेव को आंदोलन नहीं करने के लिए मनाया जा सके.प्रणव के अलावा जो मंत्री रामदेव से मिलने गए थे, उनमें कपिल सिब्बल, सुबोध कांत सहाय शामिल थे.
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बिना आदेश के ही बरसी थीं रामदेव समर्थकों पर लाठियां?

बिना आदेश के ही बरसी थीं रामदेव समर्थकों पर लाठियां?
23/02/२०१२ दैनिक  भास्कर
 नई दिल्ली. दिल्ली पुलिस कमिश्नर बी. के. गुप्ता ने बाबा रामदेव और उनके समर्थकों पर लाठीचार्ज के मामले में सफाई देते हुए कहा, ' पुलिस को लाठीचार्ज का आदेश नहीं दिया गया था। दो-तीन पुलिस वालों ने लाठीचार्ज किया था। हम जांच करेंगे और रिपोर्ट पेश करेंगे। ' उन्होंने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि हम लोग कोर्ट के फैसले का अध्ययन कर रहे हैं।
पिछले साल रामलीला मैदान में हुए लाठीचार्ज के मामले में सुप्रीम कोर्ट के गुरुवार के फैसले (सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा, पढ़ने के लिए रिलेटेड आर्टिकल पर क्लिक करें) पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए बाबा रामदेव ने कहा है कि सरकार कदम-कदम पर संविधान और कानून का उल्लंघन कर रही है। हर रोज सरकार लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है।
प्रेस कांफ्रेस में बाबा रामदेव के साथ ही मौजूद भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की पैरवी करने वाले वकील राम जेठमलानी ने पी. चिदंबरम पर निशाना साधते हुए कहा, 'मैं जानना चाहता हूं कि इस नासमझ (स्टूपिड) गृह मंत्री को किसने यह अधिकार दे दिया कि वह तय करें कौन विरोध कर सकता है और कौन नहीं।' जेठमलानी ने कहा, 'मेरा सवाल यही है कि उस रात बवाल किसने शुरू किया था? तथ्य यही है कि 4 जून की उस रात जनता रामलीला मैदान में सो रही थी। जब उन पर हमला हुआ। मुझे आज इस बात की चिंता है कि इस मामले में गृह मंत्री की इस मामले में क्या भूमिका थी?'
देश के जाने माने वकील जेठमलानी ने तल्‍ख तेवर अपनाते हुए कहा, ‘स्‍टूपिड होम मिनिस्‍टर’ को यह ‘पॉवर’ किसने दिया कि रामदेव को प्रदर्शन और आमरण अनशन की इजाजत नहीं है और यदि वह ऐसा करते हैं तो उन्‍हें दिल्‍ली के बाहर उठा कर फेंक दिया जाए। देश का गृह मंत्री ही संविधान का दुश्मन है।’
जेठमलानी ने कहा, 'हम सुप्रीम कोर्ट नहीं गए थे। हमने देश की जनता के सामने अपनी बात रखी थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी तरफ से नोटिस जारी किया था। मेरे हिसाब से बाबा रामदेव ने मुकदमा जीता है।'
जेठमलानी ने आगे कहा, 'सब लोग जानते हैं कि बाबा रामदेव काले धन के खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे। सरकार और सीबीआई ने काले धन के मुद्दे पर कुछ नहीं किया। स्विस पत्रिका ने उन लोगों के नाम छापे थे, जिन पर काले धन रखने का आरोप है। मुझे इस बात पर शर्म आती है कि उसमें राजीव गांधी का भी नाम था। लेकिन कांग्रेस ने इस पत्रिका को चुनौती नहीं दी?' जेठमलानी ने कहा कि वे काले धन की लड़ाई में बाबा रामदेव का साथ देते रहेंगे।
सोते हुए लोगों पर क्रूरता
बाबा रामेदव ने अपनी तरफ से सफाई देते हुए कहा, 'केंद्र के आदेश पर सोते हुए लोगों पर क्रूरता की गई थी। ताकत का गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया। मैंने शांति की अपील की थी।'
रामदेव ने कहा, ‘केंद्र के कहने पर पुलिस ने क्रूरता की। राजबाला की मौत पर सरकार के संवेदना के एक शब्‍द भी नहीं कहे। यदि आंदोलन या विरोध प्रदर्शन करना अपराध है तो गांधी, जेपी ने भी अपराध किया। उस वक्‍त कई लोग मारे गए लेकिन सरकार ने गांधी या जेपी को जिम्‍मेदार नहीं ठहराया गया। यह (मौजूदा केंद्र) सरकार तो ब्रिटिश सरकार से भी क्रूर है।
रामदेव ने केंद्र सरकार पर रामलीला मैदान की घटना की वीडियो फुटेज कांट छांट कर अदालत में पेश करने का आरोप लगाया। योग गुरु ने सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के हलफनामे का जिक्र करते हुए कहा कि केंद्र सरकार हिंदुओं को आतंकवादी और मुसलमानों को राष्‍ट्रविरोधी मानती है। काले धन के खिलाफ दिल्‍ली में फिर से प्रदर्शन होगा। अगले आंदोलन की घोषणा जल्‍द होगी और इस बार आर पार की लड़ाई होगी।  
राजबाला की पुत्रवधु की प्रतिक्रिया
रामलीला मैदान में पुलिसिया कार्रवाई के दौरान घायल होकर दम तोड़ने वाली राजबाला की पुत्रवधु भी रामदेव के साथ प्रेस काफ्रेंस में मौजूद थीं। उन्‍होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हम सम्‍मान करते हैं। उन्‍होंने कहा, ‘हम मुआवजा के लिए सुप्रीम कोर्ट नहीं गए थे। हमारी मांग है कि एक निष्‍पक्ष जांच कमेटी बनाई जाए जो रामलीला मैदान में हुई घटना का सच सामने आए। दोषी को सजा दी जाए। स्‍वामी जी का निजी आंदोलन नहीं था बल्कि देश की जनता के लिए था।’  

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

देवास-एंट्रिक्स घोटाले : सरकार है सौदे की जिम्मेदार




- अरविन्द सिसोदिया 
2 जी  स्पेक्ट्रम  से भी कई गुना बड़ा घोटाला , एस बैंड  स्पेक्ट्रम आबंटन है  तथा  स्वंय  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अंतर्गत रहने वाले अन्तरिक्ष विभाग का यह मामला बेहद गंभीर है और केंद्र सरकार पूरी तरह से इसमे  लिप्त है .... इसकी पूरी जाँच पड़ताल संसद की लोक  लेखा समिति से होनी चाहिए...
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2जी से बड़ा एस-बैंड घोटाला, घेरे में पीएम
मंगलवार, फरवरी 8, 2011
http://hindi.oneindia.in/news
नई दिल्ली। 1.76 लाख करोड़ के घोटाले के बाद पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा चारों तरफ से घिर गए। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है, जिसमें राजा से भी बड़े बेताज बादशाह के होने की खबर आयी है। घोटालों का यह बादशाह कौन है, यह तो अभी नहीं पता चला है, लेकिन हां इस बार घोटाले की रकम 2जी से ज्‍यादा 2 लाख करोड़ रुपए है। यह है एस-बैंड स्‍पेक्‍ट्रम घोटाला। खास बात यह है कि इस घोटाले के घेर में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी आ गए हैं। 
कैग की रिपोर्ट एस-बैंड स्पेक्ट्रम की बिक्री में हुए 2 लाख करोड़ रुपये का यह घोटाला देश की सुरक्षा को ताक पर रखकर किया गाय। वर्ष 2005 में भारतीय अंतरिक्ष शोध संस्थान (इसरो) के व्यवसायिक धड़े एंट्रिक्स कॉपोरेशन लिमिटेड और देवास मल्टी मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के बीच 70 मेगा हर्ट्ज स्पेक्ट्रम आवंटन को लेकर 20 वर्ष का करार हुआ था। 
इस स्‍पेक्‍ट्रम के माध्‍यम से अपनी पहुंच दूर-दराज़ के इलाकों तक बढ़ाई जा सकती है। दूरदर्शन ने देश के दूरदराज के इलाकों में अपना प्रसारण पहुंचाने के लिए इस स्‍पेक्‍ट्रम और तकनीक का इस्तेमाल किया था। इस स्पेक्ट्रम के जरिए तकरीबन पूरे देश में संपर्क किया जा सकता है। आरोप है कि एंट्रिक्‍स ने देश के सुरक्षा नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए देवास मल्‍टीमीडिया को बिना नीलामी के स्‍पेक्‍ट्रम आवंटित कर दिया। 
सीएजी को संदेह है कि एस-बैंड स्पेक्ट्रम आवंटन में सरकारी खजाने को करीब दो लाख करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा है। इस घोटाले के उजागर होते ही इसरो ने जांच शुरू कर दी है। खास बात यह है कि यह विभाग सीधे प्रधानमंत्री के नियंत्रण में आता है। इस लिहाज से इस घोटाले में पीएम मनमोहन सिंह भी घेरे में आ गए हैं। यही नहीं भारतीय जनता पार्टी ने अपनी कमान से निकले तीर प्रधानमंत्री पर चलाने शुरू भी कर दिए हैं। 
भाजपा ने इस मामले को हाथों-हाथ लेते हुए इसे 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले से भी बड़ा घोटाला करार दिया और सीधे मनमोहन सिंह से सफाई मांगी। भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने सोमवार को संवाददाताओं को सम्बोधित करते हुए कहा, "सीएजी ने एस-बैंड स्पेक्ट्रम की बिक्री में हुए कथित घोटाले को लेकर जो अनुमान लगाया है उससे प्रतीत होता है कि यह 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले से भी बड़ा घोटाला है। यह अंतरिक्ष मंत्रालय का मामला है और यह मंत्रालय सीधे तौर पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधीन है। इसलिए हम चाहते हैं प्रधानमंत्री सीधे इस मामले पर अपना बयान दें।"

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वैज्ञानिक नहीं, सरकार है सौदे की जिम्मेदार
उपमिता वाजपेयी / बेंगलुरु 
http://www.bhaskar.com
दो लाख करोड़ रुपए के देवास-एंट्रिक्स घोटाले में देश के चार शीर्ष अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को काली सूची में डालने के मामले में दो अहम मोड़ आए हैं। इसरो के पूर्व चेयरमैन जी. माधवन नायर ने कहा कि मैंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। मुझे उम्मीद है कि वे मेरे साथ न्याय करेंगे। अगर यहां मुझे न्याय नहीं मिला तो मेरे सामने दूसरे विकल्प भी हैं। दूसरी ओर सरकार ने अटॉर्नी जनरल वाहनवती से राय मांगी है। उनसे पूछा गया है कि चारों वैज्ञानिकों को काली सूची में डालने से कहीं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन तो नहीं हुआ। 


इन विवादों के बीच भास्कर ने पड़ताल की तो सामने आई हकीकत। सरकार की तरफ से वैज्ञानिकों को ब्लैकलिस्टेड करने के जो कारण बताए गए, वे संदिग्ध हैं। आहत माधवन कह रहे हैं 'सरकार ने चार वैज्ञानिकों को अछूत बना दिया। ऐसा फैसला तो तानाशाह करते थे।' डील की जांच कर रही प्रत्युष सिन्हा कमेटी ने डील में घोटाले के बजाय सिर्फ प्रक्रिया की खामी मानी। 
कमेटी की आप कहती  है कि पूरी प्रक्रिया सरकार की जानकारी में लाए बिना पूरी की गई। जबकि हकीकत कुछ और है। भास्कर के पास सबूत मौजूद हैं। जिनसे पता चलता है कि एक या दो नहीं, पांच बार ऐसे मौके आए जब डील की प्रक्रिया सरकार के पांच-पांच मंत्रालयों, कैबिनेट बैठकों से गुजरी। 


सरकार ने जनवरी 2012 में ४ वैज्ञानिकों (माधवन नायर, इसरो के पूर्व वैज्ञानिक सचिव ए. भास्करनारायण, एंट्रिक्स के पूर्व कार्यकारी निदेशक केआर श्रीधर मूर्ति और इसरो सैटेलाइट सेंटर के पूर्व निदेशक केएन शंकरा) को काली सूची में डाल दिया था। डील 2005 में हुई। सरकार ने इसे सुरक्षा के लिए खतरा बताया। वहीं कैग ने इसमें दो लाख करोड़ के घोटाले की बात कही। 


चार-चार कमेटियां बनीं। 
जांच हुई। रिपोर्ट भी आई। 
खुद इसरो प्रमुख राधाकृष्णन ने भी प्रत्युष सिन्हा की अध्यक्षता में कमेटी बनाई।
हाल में इसने अपनी रिपोर्ट में घोटाले की बात को खारिज करते हुए सिर्फ प्रक्रिया की खामी मानी। दूसरी ओर पीएमओ में राज्यमंत्री नारायणसामी भी मानते हैं कि 'सरकार के पास इन चारों के खिलाफ कोई सबूत नहीं हैं। स्पेक्ट्रम आवंटन का काम दूरसंचार विभाग के दायरे में आता है। इसरो की भूमिका उपग्रहों को प्रक्षेपित करने और उन पर काम करने तक ही सीमित है। यह सौदा तकनीकी सुधार के क्षेत्र में अहम कदम हो सकता था।' माधवन नायर और अन्य तीन वैज्ञानिक भी तो यही कह रहे हैं। फिर उन्हें अपनी बात रखने का मौका क्यों नहीं दिया जा रहा? एंट्रिक्स की ओर से डील पर हस्ताक्षर करने वाले श्रीधर मूर्ति का कहना है कि सैटेलाइट मोबाइल संचार के प्रयोग किए जाने वाले एस बैंड स्पेक्ट्रम का आवंटन करने के लिए हमने पहले से मौजूद नीति का ही पालन किया। आप हमें उसके लिए दोषी कैसे ठहरा सकते हैं। सरकार की मंशा पर सवाल इससे भी उठते हैं कि एंट्रिक्स-देवास डील 28 जनवरी 2005 को हुई। लेकिन इसका खुलासा 27 नवंबर 2005 तक अंतरिक्ष आयोग या कैबिनेट नोट में नहीं किया गया जिसमें जीसैट-6 को लांच करने की मंजूरी मांगी गई थी। 


नीयत पर शक क्यों? राधाकृष्णन के नेतृत्व वाली प्रत्युष सिन्हा कमेटी की नीयत पर सवाल उठाते हुए माधवन कहते हैं कि कमेटी ने रिपोर्ट के उन्हीं अंशों को जारी किया जिससे हमें दोषी ठहराया जा सके। लेकिन वो अंश नहीं बताए जिनमें हमारी कोशिशों की तारीफ की गई थी। रिपोर्ट में भाग 6 के केवल 9 पन्ने ही सार्वजनिक किए। इससे साफ होता है कि यह कपटपूर्ण कार्रवाई थी। अगर आप एक रिपोर्ट जारी करते हैं तो यह पूरी होनी चाहिए। डील की तारीफ करने वाली बीके चतुर्वेदी और रोद्दम नरसिम्हा कमेटी की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक हुई थी। 
स्टोर रूम में सड़ रही सैटेलाइट 
डील रद्द हो गई। जो सैटेलाइट तैयार हो गई थी वे तीन साल से स्टोर रूम में पड़ी हैं। एक सैटेलाइट की उम्र औसतन 6 साल होती है। यानी इनकी आधी उम्र खत्म हो चुकी है। देश को इससे हर साल 10 बिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है। इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशन यूनियन से भारत को मिला ऑर्बिटल स्लॉट मई 2011 में एक्सपायर हो चुका है। पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर 200 ट्रांस्पांडर काम कर रहे हैं। लेकिन विवाद केवल दो ट्रांस्पांडर पर हुआ। 
शेयर में आए उछाल ने चौंकाया 
देवास के दो शेयरहोल्डर वेणुगोपाल और उमेश के पास 1 लाख रुपए के 10 हजार शेयर थे। जिन्हें उन्होंने डील साइन होने के ाद ७.४ करोड़ रुपए में बेच दिया। विदेशी निवेशकों के साथ हुई इस सौदेबाजी ने देश की जांच एजेंसियों को चौंका दिया। मामला अब भी कंपनी मामलों के मंत्रालय के पास है। 
सुरक्षा के नाम पर डील रद्द, सजा घोटाले की 
देवास और एंट्रिक्स के बीच डील को जुलाई 2010 में सरकार ने री-एसेस्मेंट के लिए स्पेस कमिशन भेजा। देश की सुरक्षा के लिए खतरा मानते हुए सरकार ने फरवरी 2011 में इसे रद्द कर दिया। कैग की रिपोर्ट में दो लाख करोड़ के घोटाले की भी बात कही गई। सरकार ने जांच कमेटी बना दी। घोटाले को आधार मानते हुए ही चारों वैज्ञानिकों को काली सूची में डालने का फैसला लिया गया।