मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

कांग्रेस : गरीव का घोर अपमान


- अरविन्द सिसोदिया 
 हमारे देश में इस तरह के सत्ताधीस हें जो आम आदमी को राज लूटनें में तो लगे हैं मगर जब उसे कुछ देनें की बात आती हें तो ठेंगा दिखा देते हें ...योजना आयोग ने कहा कि इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला शख्स बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है। इस रिपोर्ट पर खुद प्रधानमंत्री ने हस्ताक्षर किए थे।............यह सच एक गरीव का घोर अपमान हे .......इसके लिए कांग्रेस अपनी जिम्मेवारी और जबावदेही से पल्ला नहीं छुड़ा सकती ...........
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"जब देश स्वतंत्र हुआ था तब मात्र 9% लोग ही गरीबी की रेखा के नीचे थे. आज 40 % गरीबी की रेखा के नीचे और 30 % गरीबी की रेखा के ठीक ऊपर हैं, यानी देश के 70 % की आबादी दरिद्रों अतिदरिद्रों की है . देश के कुल 7 % लोगों को ही शुद्ध पेयजल उपलब्ध हो पा रहा है. स्वास्थ सेवा पहाड़ सी हैं पर पिद्दी से मच्छर डेंगू से पराजित होती नज़र आती हैं. टाट - पट्टी स्कूल और अभिजात्य पब्लिक स्कूलों के बीच सामान मुफ्त शिक्षा का नारा हतप्रभ खड़ा है. 30 % महिलायें खुले मैं शौच जाने को अभिशिप्त हैं और झुनझुना बजाया जा रहा है महिलाओं के राजनीति में आरक्षण का. रोशनी , रास्ते , राशन और रोजगारों पर शहरों का कब्जा है और असली भारत बेरोजगार अँधेरे में उदास, अपमानित बैठा है."--- राजीव चतुर्वेदी
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निर्धनता रेखा
http://hi.wikipedia.org
मुक्त ज्ञानकोष विकिपीडिया से
गरीबी रेखा या निर्धनता रेखा (poverty line) आय के उस स्तर को कहते है जिससे कम आमदनी होने पे इंसान अपनी भौतिक ज़रूरतों को पूरा करने मे असमर्थ होता है । गरीबी रेखा अलग अलग देशों मे अलग अलग होती है । उदहारण के लिये अमरीका मे निर्धनता रेखा भारत मे मान्य निर्धनता रेखा से काफी ऊपर है ।
यूरोपीय तरीके के रूप में परिभाषित वैकल्पिक व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें गरीबों का आकलन 'सापेक्षिक' गरीबी के आधार पर किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति की आय राष्ट्रीय औसत आय के 60 फीसदी से कम है, तो उस व्यक्ति को गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिताने वाला माना जा सकता है। औसत आय का आकलन विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए माध्य निकालने का तरीका। यानी 101 लोगों में 51वां व्यक्ति यानी एक अरब लोगों में 50 करोड़वें क्रम वाले व्यक्ति की आय को औसत आय माना जा सकता है। ये पारिभाषिक बदलाव न केवल गरीबों की अधिक सटीक तरीके से पहचान में मददगार साबित होंगे बल्कि यह भी सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी ऐसा व्यक्ति जो गरीब नहीं है उसे गरीबों के लिए निर्धारित सब्सिडी का लाभ न मिले। परिभाषा के आधार पर देखें तो माध्य के आधार पर तय गरीबी रेखा के आधार पर जो गरीब आबादी निकलेगी वह कुल आबादी के 50 फीसदी से कम रहेगी।
योजना आयोग ने 2004-05 में 27.5 प्रतिशत गरीबी मानते हुए योजनाएं बनाई थी। फिर इसी आयोग ने इसी अवधि में गरीबी की तादाद आंकने की विधि की पुनर्समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया था, जिसने पाया कि गरीबी तो इससे कहीं ज्यादा 37.2 प्रतिशत थी। इसका मतलब यह हुआ कि मात्र आंकड़ों के दायें-बायें करने मात्र से ही 100 मिलियन लोग गरीबी रेखा में शुमार हो गए।
अगर हम गरीबी की पैमाइश के अंतरराष्ट्रीय पैमानों की बात करें, जिसके तहत रोजना 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) खर्च कर सकने वाला व्यक्ति गरीब है तो अपने देश में 456 मिलियन (लगभग 45 करोड़ 60 लाख) से ज्यादा लोग गरीब हैं।
भारत में योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि खानपान पर शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले शख्स को गरीब नहीं माना जा सकता है। गरीबी रेखा की नई परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने कहा कि इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला शख्स बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है। अपनी यह रिपोर्ट योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामे के तौर पर दी। इस रिपोर्ट पर खुद प्रधानमंत्री ने हस्ताक्षर किए थे। आयोग ने गरीबी रेखा पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहा कि दिल्ली, मुंबई, बंगलोर और चेन्नई में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3860 रुपये खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता।
बाद में जब इस बयान की आलोचना हुई तो योजना आयोग ने फिर से गरीबी रेखा के लिये सर्वे की बात कही।
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मुद्दा 
गरीब की गड़बड़ गणना / देविंदर शर्मा
http://raviwar.com/news
एक महत्त्वपूर्ण पहल के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने गरीबों की गिनती पर बेहद बुनियादी सवाल उठाए हैं. यह महसूस करते हुए गरीबी रेखा नजरअंदाज की जाती रही है, न्यायालय ने वह काम सम्भव किया है, जिसे अंजाम देने में हमारे अर्थशास्त्री हाल के वर्षो में विफल हुए हैं.
सर्वोच्च न्यायालय में दायर हलफनामे का बचाव करने वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को इसकी कैफियत देने में काफी पीड़ा हो रही है कि कांग्रेस के भीतर और बाहर गरीबी के विवादित आंकड़े को ‘अवांछित’ क्यों बताया जा रहा है? लेकिन अगले दिन टीवी चैनलों पर भारी मजमे के बीच उन्होंने इसकी कैफियत देने की कोशिश की. 
इसमें एक बात जो बेहद स्पष्ट थी, वह यह कि गरीबी रेखा को जानबूझकर नीचे रखते हुए अर्थशास्त्री और योजनाकार वास्तव में गरीब से छल कर रहे थे. अहलूवालिया ने कहा,‘वास्तव में यह 1973-74 के दौरान गरीबी रेखा से नीचे वालों का जीवनस्तर’ था. उन्होंने माहवार खर्च की रकम को नीचे रखने पर स्पष्टीकरण देते हुए बताया कि यह केवल ‘गुजर-बसर का निम्नतम स्तर को परिलक्षित करने’ के लिए था. 
दुर्भाग्य से, गरीबी के गड़बड़ अनुमान विकास की तमाम रणनीतियों और कार्यक्रमों की बुनियाद बना दिये गए हैं. ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि आजादी के 64 वर्ष बाद भी गरीबी अपनी पूरी हनक के साथ बनी हुई है. इस पूरे प्रकरण में यह मसला मीडिया की आंखों से भी ओझल हो गया कि योजना आयोग शहरी इलाके में रोजाना 17 रुपये और ग्रामीण इलाके में 12 रुपये प्रतिदिन की कमाई को गरीबी का मापक मानता रहा है. गरीबी रेखा तय करने की विभिन्न समितियों और उनके आंकड़े गड़बड़ अनुमानों पर आधारित हैं और इसलिए भी वह गरीबी या असमानता मिटाने के काम पर सकारात्मक असर छोड़ने में विफल हो गए हैं. 
योजना आयोग ने 2004-05 में 27.5 प्रतिशत गरीबी मानते हुए योजनाएं बनाई थी. फिर इसी आयोग ने इसी अवधि में गरीबी की तादाद आंकने की विधि की पुनर्समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया था, जिसने पाया कि गरीबी तो इससे कहीं ज्यादा 37.2 प्रतिशत थी. इसका मतलब यह हुआ कि मात्र आंकड़ों के दायें-बायें करने मात्र से ही 100 मिलियन लोग गरीबी रेखा में शुमार हो गए.
अगर हम गरीबी की पैमाइश के अंतरराष्ट्रीय पैमानों की बात करें, जिसके तहत रोजना 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) खर्च कर सकने वाला व्यक्ति गरीब है तो अपने देश में 456 मिलियन (लगभग 45 करोड़ 60 लाख) से ज्यादा लोग गरीब हैं. अगर हम अजरुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट को मानें, जिसके मुताबिक 836 मिलियन लोग रोजाना 20 रुपये से भी कम कमाते हैं, और मैं मुतमईन हूं कि शायद ही कोई इससे इत्तेफाक नहीं रखेगा, तो इतनी तादाद में लोग भयंकर रूप से गरीब हैं.
यूएनडीपी के 10 मानक श्रीमती सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने सीधे 50 प्रतिशत आबादी के गरीब होने पर खूंटा ठोक दिया है. एनएसी भी बीपीएल अर्हता के गलत पैमाने को मानने के लिए उतना ही कसूरवार है. इसने कभी गरीबी तय करने के दोषपूर्ण नियमों-मानकों पर कभी सवाल नहीं उठाए लेकिन इस मुद्दे पर मौजूदा जनविरोध को देखते हुए बीच बहस में उन कामों के लिए श्रेय लूटने की गरज से कूद पड़ा, जो वस्तुत: उसने कभी किए ही नहीं थे. तिस पर भी, गरीबी आंकने पर फिर लौटा गया, मानो इतना सारा जो कुछ हुआ वह काफी नहीं था.
अब हमारे पास ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के तत्वावधान में मानवीय विकास पहल के पैमाने हैं, जिसके तहत देश की आबादी का 55 प्रतिशत हिस्सा गरीब है. इसने अपनी पैमाइश में शिशु मृत्यु दर, स्कूलों में दाखिला दर, पीने का पानी और सफाई समेत 10 मानकों को शामिल किया है.
इसके पहले की आप दफा हो जाएं, मुझे उन मानकों को स्पष्ट करने दें जिनका इस्तेमाल खाद्यान्न असुरक्षा और भूख के मौजूदा स्तर को पहले आंकने में किया जाता है.
पहले भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के तय किए गए नियमों पर गरीबी का आकलन किया जाता था. इसके अनुसार गांवों में 2400 कैलोरी और शहरों में 2100 कैलोरी के उपभोग को गरीबी आकलन का आधार माना गया. यह पूर्व योजना आयोग के गरीबी आकलन का आधार था. बाद में तेंडुलकर कमेटी ने कुछ अस्पष्ट कारणों से शहरी इलाकों में गरीबी के आधार के लिए 1999 कैलोरी ही रखा. 

भारत जो गरीबी में जीता है, वहां इसके आकलन के कई आंकड़े हैं. योजना आयोग का मानना था कि देश में 26 प्रतिशत लोग गरीब हैं. तेंडुलकर कमेटी ने इसे बढ़ा कर 37.2 प्रतिशत कर दिया. जैसा कि हम पहले कह आए हैं कि अजरुन सेनगुप्ता समिति के मुताबिक 77प्रतिशत आबादी गरीब है क्योंकि वह रोजाना मात्र 20 रुपये ही खर्च करने की हैसियत रखती है. आप इससे सहमत होंगे कि इतने पैसे में पालतू कुत्ते का भी पेट नहीं भरा जा सकता. 
इसके अलावा, बुनियादी मानकों को दुरुस्त किए बिना ऑक्सफोर्ड और यूएनडीपी के 10 मानकों को भी गरीबी मापने का आधार बनाना न्यायसंगत नहीं होगा. एमपीआई हमें बताता है कि दिल्ली गरीबी सूचकांक में देश के अन्य राज्यों में बेहतर है. मैं नहीं जानता कि इस निष्कर्ष के लिए किन पैमाने का इस्तेमाल किया गया है लेकिन उन लोगों के लिए, जो नई दिल्ली में पिछले 20 सालों से रह रहे हैं, मैं पाता हूं कि यह राष्ट्रीय राजधानी दरअसल गरीबी का हौज है. कोलकाता और मुंबई की तुलना में दिल्ली निश्चित रूप से बेहतर है. लेकिन गुजरते सालों में कंक्रीट के पसरते जा रहे जंगलों के बीच मैंने गरीबी को बदतर होते हुए ही देखा है.
यह तस्वीर है. एक व्यक्ति गहरे कुएं में गिर पड़ा है और मदद के लिए गुहार लगा रहा है. यह कुआं कोई 200 फीट गहरा है. उधर से गुजर रहा एक अर्थशास्त्री उसकी चीख-पुकार सुन कर अन्य तमाशबीनों में शामिल हो जाता है. वह तुरंत अंकों का अपना हिसाब लगाता है और 100 फीट लम्बी रस्सी लाने को कहता है. तमाशबीन इसे मान लेते हैं कि क्योंकि उन्हें लगता है कि अर्थशास्त्री को इसकी बेहतर जानकारी है. इस बीच, अर्थशास्त्री उस रस्सी की कीमत को जोड़ता है और कुएं में गिरे व्यक्ति को बाहर निकालने में लगने वाले बल को थाहता है. वह अपने सूत्र पर अमल करते हुए यह अपेक्षा करता है कि डूब रहा व्यक्ति कुएं की दीवार पर 100 फीट तक चढ़ेगा. इसके आगे वह रस्सी पकड़ेगा और उसके सहारे ऊपर आएगा.
मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों ने दरअसल यही किया है. वे ऐसे कठोर तरीके से गरीबी मापते हैं कि गरीबों को भान भी नहीं होता कि किसने उन पर प्रहार किया है. अगर आप अपने पालतू कुत्ते को इतने पैसे में भरपेट नहीं खिला सकते तो आप यह कैसे सोच सकते हैं कि गरीब आदमी इतनी छोटी रकम में गुजारा कर लेगा? हालांकि अर्थशास्त्री इसकी कसम खाते हैं, लेकिन हम सभी जानते हैं कि यह काल्पनिक रेखा बकवास है. 
यही वह दोषपूर्ण आकलन है जिस पर सरकार गरीबी से लड़ने के अपने कार्यक्रम और योजनाएं बनाती हैं. इस तरीके से गरीबी के कुएं में पड़े गरीबों को कभी सुरक्षित उबारा नहीं जा सकता. अधिकतर कार्यक्रम और परियोजनाएं गरीबों की वास्तविक जरूरतों को पूरी करने में पिछड़ जाती हैं.
आप कह सकते हैं कि दोष उस खास समूह के अर्थशास्त्रियों का है, जो गरीबी का पहले आकलन करते हैं. मैं इससे इत्तेफाक रखता हूं. लेकिन अर्थशास्त्रियों की मौजूदा खेप ही अच्छी नहीं है. वस्तुत: वे गरीबी के बीजगणित से खेलते रहे हैं जो सत्ता को मुफीद हो. इससे भिन्न राय रखने वाले कुछ अर्थशास्त्रियों को हाशिए पर डाल दिया गया है. विरोध की उनकी आवाज मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों की बुलडोजरी चुप्पी के तले दबा दी गई है तथापि मैं समझता हूं कि यह सारी कवायद नव उदारवादी सुधार के चलते गरीबी में गिरावट दर्शाने के लिए की गई है.
विश्व बैंक (और संयुक्त राष्ट्र भी) बाजार अर्थव्यवस्था का हिमायती रहा है. एक भारतीय अनुसंधान केंद्र ने तो आंकड़ों का घालमेल करके यह जताने की कोशिश की कि बाजार में सुधार की प्रक्रिया के बाद से सामाजिक संकेतकों में सकारात्मक रुख आया है. क्या ये तमाम आकलन-अनुमान गरीबों की हालत में कोई गुणात्मक बदलाव लाएंगे. 
लेकिन वे गरीब तो यह भी नहीं जानते कि इनमें से किन आकलनों में सटीक होंगे. बस एक ही बात वह अच्छी तरह जानते है कि गरीबी उनकी किस्मत में लिखी हुई है. केवल चमत्कार (या अपराधी होकर) ही उन्हें वास्तविक नरक से छुटकारा दिला सकता है. बाकी सारा कुछ तो आर्थिक बाजीगरी है.
09.10.2011



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