शुक्रवार, 23 मार्च 2012

अंग्रेज ए.ओ. ह्यूम : भारतीयों की चिन्ता क्यों ?


ह्यूम को भारतीयों के हित की ऐसी क्या चिन्ता हो गई जो उसने कांग्रेस बनायी ?


आप जानते ही होंगे कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किसी भारतीय ने नहीं बल्कि एक अंग्रेज ए.ओ. (अलेन ऑक्टेवियन) ह्यूम ने सन् 1885 में, ब्रिटिश शासन की अनुमति से, किया था। कांग्रेस एक राजनैतिक पार्टी थी और इसका उद्देश्य था अंग्रेजी शासन व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी दिलाना। ब्रिटिश पार्लियामेंट में विरोधी पार्टी की हैसियत से काम करना। अब प्रश्नयह उठता है कि ह्यूम ,सिविल सर्विस से अवकाश प्राप्त अफसर था, को ही भारतीयों के राजनैतिक हित की चिन्ता क्यों जाग गई?
सन् 1885 से पहले अंग्रेज अपनी शासन व्यवस्था में भारतीयों का जरा भी दखलअंदाजी पसंद नहीं करते थे। तो फिर एक बार फिर प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों दी ब्रिटिशशासन ने एक भारतीय राजनैतिक पार्टी बनाने की अनुमति?
यदि उपरोक्त दोनों प्रश्नों का उत्तर खोजें तो स्पष्ट हो जाता है कि भारतीयों को अपनी राजनीति में स्थान देना अंग्रेजों की मजबूरी बन गई थी। सन् 1857 की क्रान्ति ने अंग्रेजों की आँखें खोल दी थी।अपने ऊपर आए इतनी बड़ी आफत का विश्लेषण करने पर उन्हें समझ में आया कि यह गुलामी से क्षुब्ध जनता का बढ़ता हुआ आक्रोश ही था जो आफत बन कर उन पर टूटा था। यह ठीक उसी प्रकार था जैसे कि किसी गुब्बारे का अधिक हवा भरे जाने के कारण फूट जाना।
समझ में आ जाने पर अंग्रेजों ने इस आफत से बचाव के लिए तरीका निकाला और वह तरीका था सेफ्टी वाल्व्ह का। जैसे प्रेसर कूकर में प्रेसर बढ़ जाने पर सेफ्टी वाल्व्ह के रास्ते निकल जाता है और कूकर को हानि नहीं होती वैसे ही गुलाम भारतीयों के आक्रोश को सेफ्टी वाल्व्ह के रास्ते बाहर निकालने का सेफ्टी वाल्व्ह बनाया अंग्रेजों ने कांग्रेस के रूप में। अंग्रेजों ने सोचा कि गुलाम भारतीयों के इस आक्रोश को कम करने के लिए उनकी बातों को शासन समक्ष रखने देने में ही भलाई है। सीधी सी बात है कि यदि किसी की बात को कोई सुने ही नहीं तो उसका आक्रोश बढ़ते जाता है किन्तु उसकी बात को सिर्फ यदि सुन लिया जाए तो उसका आधा आक्रोश यूँ ही कम हो जाता है। यही सोचकर ब्रिटिश शासन ने भारतीयों की समस्याओं को शासन तक पहुँचने देने का निश्चय किया। और इसके लिए उन्हें भारतीयों को एक पार्टी बना कर राजनैतिक अधिकार देना जरूरी था। एक ऐसी संस्था का होना जरूरी था जो कि ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारतीयों का पक्ष रख सके। याने कि भारतीयों की एक राजनैतिक पार्टी बनाना अंग्रेजों की मजबूरी थी।
किसी भारतीय को एक राजनैतिक पार्टी का गठन करने का गौरव भी नहीं देना चाहते थे वे अंग्रेज। और इसीलिए बड़े ही चालाकी के साथ उन्होंने ह्यूम को सिखा पढ़ा कर भेज दिया भारतीयों के पास एक राजनैतिक पार्टी बनाने का ढ़ोँग करने के लिए। इसका एक बड़ा फायदा उन्हें यह भी मिला कि एक अंग्रेज हम भारतीयों के नजर में महान बन गया, हम भारतीय स्वयं को अंग्रेजों का एहसानमंद भी समझने लगे। ये था अंग्रेजों का एक तीर से दो शिकार!
इस तरह से कांग्रेस की स्थापना हो गई और अंग्रेजों को गुलाम भारतीयों के आक्रोश को निकालने के लिए एक सेफ्टी वाल्व्ह मिल गया।
आज भी काग्रेस की चोटी पर विदेशी ही बैढ़े हैँ जो की A O HUME से भी बड़ा ढ़ोँग रच कर बैढ़े हैँ
हम उनकी गुलामी कर रहैँ उन्हैँ महान बता रहैँ
उस वक़्त के वायसराय लोर्ड डफरिन के निर्देशन, मार्गदर्शन और सलाह पर ही AO HUME ने इस संगठन को जन्म दिया था, ताकि उस समय भारतीय जनता में पनपते बढ़ते आक्रोश और असंतोष को हिंसा के रूप मों फूटनेसे रोका जा सके. मतलब एक हिंसक क्रांति दस्तक दे रही थी, जो की कांग्रेस की स्थापना के कारण टल गयी. Young India में १९१६ में प्रकाशित अपने लेख में गरमपंथी नेता लाला लाजपत राय ने सुरक्षा वाल्व की इस परिकल्पना का इस्तेमाल कांग्रेस के नरमपंथी पक्ष पर प्रहार करने के लिए किया था. और कांग्रेस लोर्ड डफरिन के दिमाग की उपज है यह कहा था. और यह भी कहा था की कांग्रेस अपने आदर्श के प्रति इमानदार नहीं है, और आज भी नहीं है......
काश उस समय काग्रेस ना बनायी जाती तो भारतीयोँ का आक्रोश अंग्रेजोँ को कबका खदेड़ देता
और आज हम सेफ्टी वाल्व की मानसिक गुलामी ना कर रहे होते

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