मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश






मित्रों आज शिवाजी जयंती है। 1303 इ. में मेवाड़ से महाराणा हम्मीर के चचेरे भाई सज्जन सिह कोल्हापुर चले गए थे। इन्ही की 18 व़ी पीढ़ी में छत्रपति शिवाजी महाराज पैदा हुए थे। ये सिसोदिया थे।


सिसोदिया राजपूत वंश के कुलनायक महाराणा प्रताप के वंशज छत्रपति शिवाजी महाराज की आज जयंती है ... शूरवीरता के साक्षात अवतार लोकराज के पुरोधा छत्रपति शिवाजी महाराज के इस जन्मोत्सव पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें
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राज्याभिषेक

सन् १६७४ तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरन्दर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे।

पश्चिमी महारष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु ब्राहमणों ने उनका घोर विरोध किया। शिवाजी के निजी सचीव बालाजी आव जी ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और उन्होंने ने काशी में गंगाभ नमक ब्राहमण के पास तीन दूतो को भेजा, किन्तु गंगा ने प्रस्ताव ठुकरा दिया क्योकि शिवाजी क्षत्रिय नहीं थे ,  उसने कहा की क्षत्रियता का प्रमाण लाओ तभी वह राज्याभिषेक करेगा | बालाजी आव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़  के सिसोदिया वंश से समबंद्ध के प्रमाण भेजे जिससे संतुष्ट होकर वह रायगढ़ आया |
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भारतीय इतिहास की गौरवशाली गाथा है शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक


http://hindi.ibtl.in/news/vande-matrubhoomi/2079/shivajis-coronation-ceremony-at-raigarh-6th-june-1674/

रायगढ़ में ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी तदनुसार 6 जून 1674 को हुआ छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हिंदू इतिहास की सबसे गौरवशाली गाथाओं में से एक है। सैकड़ों वर्ष विदेशियों के गुलाम रहने के पश्चात हिंदुओं को संभवतः महान विजयनगर साम्राज्य के बाद पहली बार अपना राज्य मिला था।

उस दिन, शिवाजी का राज्याभिषेक कशी के विद्वान महापंडित तथा वेद-पुराण-उपनिशदों के ज्ञाता पंडित गंगा भट्ट द्वारा किया गया। शिवाजी के क्षत्रिय वंश से सम्बंधित न होने के कारण उस समय के अधिकतर ब्राह्मण उनका राजतिलक करने में हिचकिचा रहे थे। पंडित गंगा भट्ट ने शिवाजी की वंशावली के विस्तृत अध्ययन के बाद यह सिद्ध किया के उनका भोंसले वंश मूलतः मेवाड़ के वीरश्रेष्ठ सिसोदिया राजवंश की ही एक शाखा है। यह मन जाता था कि मेवाड़ के सिसोदिया क्षत्रिय कुल परंपरा के शुद्धतम कुलों में से थे।

क्यूंकि उन दिनों राज्याभिषेक से सम्बंधित कोई भी अबाध परंपरा देश के किसी हिस्से में विद्यमान नहीं थी, इसलिए विद्वानों के एक समूह ने उस समय के संस्कृत ग्रंथों तथा स्मृतियों का गहन अध्ययन किया ताकि राज्याभिषेक का सर्वोचित तरीका प्रयोग में लाया जा सके। इसी के साथ-साथ भारत के दो सबसे प्राचीन राजपूत घरानों मेवाड़ और आम्बेर से भी जानकारियां जुटाई गई ताकि उत्तम रीति से राजतिलक किया जा सके।

प्रातःकाल शिवाजी ने सर्वप्रथम शिवाजी महाराज ने प्रमुख मंदिरों में दर्शन-पूजन किया। उन्होंने तिलक से पूर्व लगातार कई दिनों तक माँ तुलजा भवानी और महादेव की पूजा-अर्चना की।

6 जून 1674 को रायगढ़ के किले में मुख्य समारोह का आयोजन किया गया। उनके सिंहासन के दोनों ओर रत्न जडित तख्तों पर राजसी वैभव तथा हिंदू शौर्य के प्रतीक स्वरुप स्वर्णमंडित हाथी तथा घोड़े रखे हुए थे। बायीं ओर न्यायादेवी कि सुन्दर मूर्ति विराजमान थी।

जैसे ही शिवाजी महाराज ने आसन ग्रहण किया, उपस्थित संतों-महंतों ने ऊंचे स्वर में वेदमंत्रों का उच्चारण प्रारंभ कर दिया तथा शिवाजी ने भी उन सब विभूतियों को प्रणाम किया। सभामंडप शिवाजी महाराज की जय के नारों से गुंजायमान हो रहा था। वातावरण में मधुर संगीत की लहरियां गूँज उठी तथा सेना ने उनके सम्मान में तोपों से सलामी दी। वाहन उपस्थित पंडित गंगा भट्ट सिंहासन की ओर बढे तथा तथा उन्होंने शिवाजी के सिंहासन के ऊपर रत्न-माणिक्य जडित छत्र लगा कर उन्हें ‘राजा शिव छत्रपति’ की उपाधि से सुशोभित किया।

इस महान घटना का भारत के इतिहास में एक अभूतपूर्व स्थान है। उन दिनों, इस प्रकार के और सभी आयोजनों से पूर्व मुग़ल बादशाहों से अनुमति ली जाती थी परन्तु शिवाजी महाराज ने इस समारोह का आयोजन मुग़ल साम्राज्य को चुनौती देते हुए किया। उनके द्वारा धारण की गयी ‘छत्रपति’ की उपाधि इस चुनौती का जीवमान प्रतीक थी। वे अब अपनी प्रजा के हितरक्षक के रूप में अधिक सक्षम थे तथा उनके द्वारा किया गए सभी समझोते तथा संधियां भी अब पूर्व की तुलना मैं अधिक विश्वसनीय और संप्रभुता संपन्न थे।

शिवाजी महाराज द्वारा स्वतंत्र राज्य की स्थापना तथा संप्रभु शासक के रूप में उनके राज्याभिषेक ने मुगलों तथा अन्य बर्बर विधर्मी शासको द्वारा शताब्दियों से पीड़ित, शोषित, अपमानित प्रत्येक हिंदू का ह्रदय गर्व से भर दिया।  यह दिन भारत के इतिहास में अमर है क्योंकि यह स्मरण करता है हमारे चिरस्थायी गौरव, संप्रभुता और अतुलनीय शौर्य की संस्कृति का। आइये, मिलकर उद्घोष करें:

गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक, यवन-परपीडक, क्षत्रिय कुलावातंश, राजाधिराज, महाराज, योगीराज, श्री श्री श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की जय !

जय भवानी । जय शिवराय !!
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सिसौदिया वंश की उपशाखाएं

चन्द्रावत सिसौदिया
यह 1275 ई. में अस्तित्व में आई। चन्द्रा के नाम पर इस वंश का नाम चन्द्रावत पडा।

भोंसला सिसौदिया - 
इस वंश की स्थापना सज्जन सिंह ने सतारा में की थी।

चूडावत सिसौदिया
चूडा के नाम पर यह वंश चला। इसकी कुल 30 शाखाएं हैं।
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- छत्रसिंह सोलँकी बनकोडा, आदरणीय मित्रवर शिवाजी महाराज मरठा थे वे कैसे महाराणा प्रताप के वँशज हो सकते है?
- Sudhir Kashyap solanki jee maratha word is belong to all those live and follow the shiva jee . shiva also a Maratha Rajpoot,bhi mitron ki jankari ke liye -yah link hai -http://en.wikipedia.org/wiki/Bhosle,es link main " Subclans" dekhen aur Janey tha relation between sisodias and Bhonsle,
- Narendra Singh Tomar
Nst Chhatar singh solanki aur Sudhir Kashyap chhatrapati Shivaji Maharaj was sisodiya Rajput ... Whose ancestor was Maharana Pratap of Mewad Rajasthan. Shivaji Maharaj ki poori vanshavali uplabdh hai. Maratha na to koyi jaati hai aur na dharm. Shivaji Maharaj ki vanshavali main kahin bhi Maratha jaati ya Dharm hone ka ullekh nahi hai. Jo log Shivaji Maharaj ko Maratha kahte aur samajhte hain.... Ve krapaya Shivaji Maharaj ki pichhali 10 peedhiyon tak ki vanshavali yahan avashya likhen
- Rana Vishwajeetsingh Sisodiya Sisodiya Kulwantasya Rajadhiraj Chattrapati Shivaji Raje Bhonsale...--->Bhosaji jo ki Rana Ajay Singhji ki 11 pidhi thi unke naam se vansh chala.
gahlot-ahra vansh ki ek shakha he bhonsale!
 लिक - भोसले

Some of the historical accounts stating that Shahaji and Shivaji were of Rajput descent include:
  • In 1726 when Mahratta armies began to make incursions into the Rajputana terrotiries , Raja Chatrapati Shahu in a letter dated 1726 ordered his generals not to touch the Sisodia territory of pippila state in mewar as well as the other states in Rajputana which belonged to Sisodia rajputs telling them that only did the Rawat of Piplia and the Sisodia Rajputs belong to the same family as that of the Rulers of Satara(Bhosle) but it was mainly due to the courage and sacrifices made by Sisodia rajputs such as Rana Hammir, Maharana Kumbha, Maharana Sanga and Maharana Pratap that Hindu Raj was preserved in India till a certain extent.
  • Radha Madhava Vilasa Champu of poet Jayarama (written in the court of Shahaji at Banglur, 1654) describes the Bhonsles as the descendants from the Sisodias of Chittor. Jayaramas poetry was composed much before Shivajis coronation. In a poem on Shahaji, Jayarama mentions that Shahaji was descended from Dalip (or Dilip Singh) born in the family of the Rana who was the foremost among all kings of the earth. This Dalip was a grandson of Lakshmanasen, Rana of Chittor, who came to the throne in 1303 CE.
  • Shivabharata of Paramananda mentions that Shivaji and Shahji are of the Ikshvaku lineage like the Sisodiyas.
  • Parnalaparvata Grahanakhyana states that Shivaji is a Sisodia
  • Bhushan the Hindi poet speaks of the Bhosales being Rajput
  • Shahji in his letter to the Sultan Adilshah states he is a Rajput
  • The Mughal historian Khafi Khan describes Shivaji as a descendent of the Ranas of Chittor. Khafi Khan was a very harsh critic of Shivaji, and wrote accounts condemming Shivaji to hell. He claimed that though Shivaji's ancestors did come from the family of Ranas of Chittor, they descended through an illegitimate offspring Dilip Singh.
  • Sabhasad Bakhar composed by Shivaji Minister Krishna Bhaskhar in 1694 refers to Bhosle as a Solar Dynasty clan of Sisodia Origin.
  • Persian Farmans(Grants) given to the ancestors of Ghorpade and Bhosles by the Bahmani Sultans and Adil Shahi Sultans relate the Shivaji family of Bhosle and that of Ghorpades directly with the Sisodia family of Udaipur.
Scholars such as Sir Jadunath Sarkar have contested Shivaji Rajput origin and remarks that his Rajput origin was fabrication required during his coronation, however eminent Marathi Historian CV Vaidya dont believe this as works composed years before Shivaji rise to glory Radhav Vilas Champu by Poet Jayaram mentions Shahji Bhosle(Shivaji's Father) as Sisodia Rajputs. Shahji letter to Sultan Adil Shah in 1641 also mentions that Bhosle are Rajputs , these evidences are cited by supporters of Shivaji Rajput origin to reject notions like Shivaji rajput origin was fabricated only at the time of his coronation.. The discovery of Persian Farmans in 1920s also dented the claim of those scholars who assumed that Shivaji sisodia origin was a fabrication to get his coronation done. The Mudhol Farmans which bear seals and tughra of Bahmani and Adil Shahi Sultans establish a direct descent of Shivaji(Bhosle Clan) and that of Ghorpade with that of Sisodia Rajputs of Chittod.
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Nilesh Upsarpanch
सिसोदा - जहां से जुड़े हैं सिसोदिया
गांवों ने कई कुलों को पहचान दी है। जातिगत अटकें भी उनके मूल निवास के गांवों के साहचर्य को पहचानने में सहायक रही है। मेवाड़ का 'सिसोदा' अथवा 'शिशोदा' ऐसा गांव है जहां से जो परिवार निकले, वे 'सिसोदिया' कहलाए। सिसोदिया परिवार देश भर में फैले हुए हैं। न केवल राजपूतों में बल्कि अन्‍य कुल भी सिसोदिया अथवा शिशोदिया के रूप में पहचाने जाते हैं।
वर्तमान में राजसमंद जिले में नाथद्वारा से केलवाड़ा के पुराने मार्ग पर यह गांव अरावली की पहाडि़यों में आबाद है और बहुत पुराना गांव है। मेवाड़ का सिसोदिया गुहिलोत राजवंश यहीं से उठा है। यहीं के हम्‍मीरसिंह ने अलाउद्दीन ख़लजी के काल में मेवाड़ के गौरव को पुन: लौटाने का सार्थक प्रयास किया। हम्‍मीर बहुत पराक्रमी सिद्ध हुआ, उसके पराक्रम के चर्चे उसके अपने जीवनकाल में ही लोकप्रिय हो गए थे क्‍योंकि उसने मूंजा बलेचा जैसे इच्‍छाजीवी को शिकस्‍त दी। मारवाड़ से गुजरात जाने वाले विषम पहाड़ी मार्ग पर हम्‍मीर ने अपनी सिंह जैसी पहचान बनाई, उसने साबरकांठा और झीलवाड़ा पर अपना दबदबा बनाया। इसी कारण उसे कुंभलगढ़ की 1460 ई. की प्रशस्ति, एकलिंगजी मंदिर के दक्षिणीद्वार की 1495 ई. की प्रशस्ति सहित अनेक ग्रंथों में उसे 'विषमघाटी प्रौढ़ पंचानन' कहा गया है।
सिसोदा में इस वंश के प्राचीनकाल में बसे होने के प्रमाण के रूप में वर्तमान में बाणमाता (बायणमाता) मंदिर है। यह सिसोदिया वंश की कुलदेवी मानी गई है जो बाण आयुध का दैविक स्‍वरूप है। चारभुजा मंदिर भी उसी काल का माना जाता है किंतु प्राचीन दुर्ग का कोई प्रमाण नहीं मिलता। हां, पहाडि़यों को खोजने की जरूरत है। यहां के निवासियों को इस बात का गौरव है कि मेवाड़ को सिसोदिया जैसा सम्‍मानित राजवंश इसी धरती ने दिया मगर, सिसोदियाें ने बाद में इस गांव की ओर रुख नहीं किया।
वजह थी, महाराणा भीमसिंह के काल में यह गांव 1818 ई. में चैत्र कृष्‍ण पंचमी के दिन चारण कवि किसना आढ़ा को बतौर जागीर भेंट कर दिया गया था। किसना आढ़ा ने यहां से गुजरते हुए भाणा पटेल से कहा कि वह उनका हुक्‍का भर दे। भाणा ने कहा कि वे कौनसी जागीर जीतकर आ रहे हैं। इस पर आढ़ा ने कहा कि वह जल्‍द ही बताएंगे कि जागीर जीती कि नहीं। बाद में जब उनकी सेवा से प्रसन्‍न होकर महाराणा भीमसिंह ने कुछ मांगने को कहा तो आढ़ा ने सिसोदा मांग लिया। महाराणा इसके अपने पूर्वजों का प्रतिष्ठित निवास मानकर खालसे ही रखना चाहते थे। आढ़ा के रुठकर पांचेटिया गांव चले जाने पर महाराणा ने पत्र भेजकर उनको मनाया और सिसोदा गांव भेंट किया। आढ़ा ने इस पर गीत रचा :
कीजै कुण मीढ न पूजै कोई, धरपत झूठी ठसक धरै।
तो जिम भीम दिये तांबापतर कवां अजाची भलां करै।।
पटके अदत खजांना पेटां देतां बेटां पटा दियै।
सीसोदाै सांसण सीसोदा थारा हाथां मौज थियै।।
किसना आढ़ा कर्नल जेम्‍स टॉड का भी निकट सहयोगी रहा। टॉड के हस्‍तक्षेप से ही उसको इस गांव का पक्‍का पट्टा मिला था। किसना आढ़ा को भीम‍विलास काव्‍य ही नहीं, 'रघुवर जस प्रकाश' जैसा ग्रंथ रचने का श्रेय भी है जिसमें डिंगल के सैकड़ों गीतों के उदाहरण के रूप में रामायण की कथा को लिखा गया है।
बाद में, किसना के पुत्र महेस आढ़ा की शादी में महाराणा जवानसिंह ने गज से सिसोदा की यात्रा की... और रावले के पास हाथी बांधने के लिए कुंभाला गाड़ा। महेस की आशियाणी पत्‍नी ने सिसोदा में बावड़ी बनवाई। सिसोदा का मंदिर भी बनवाया। महेस की स्‍मारक छतरी वहां खारी नदी के किनारे रावला रहट के पास बनी है।
हां, महाराणा हम्‍मीर से जुड़ा स्‍थान तलाशना बाकी है। कभी सिसोदिया शासक अपने दान, अनुदान अग्रहार को 'सिसोद्या रो दत्‍त' ही कहते थे जो इस गांव की स्‍मृति से जुड़ा हुआ माना जाता था। और भी कई बातें सिसोदा के साथ जुड़ी हुई है। यहां आकर बाणमाता सहित चारभुजा और भैरूजी के दर्शन तो होते ही हैं, एक गौरवशीली अतीत को आत्‍मसात करने का अवसर भी मिलता है। लौटते हैं तो नजर उन पहाडि़यों पर जरूर पड़ती है जो इन दिनों हरियाली की चादर आेढ़े हैं, कभी इन्‍हीं घाटियों में लक्ष्‍मणसिंह, अरिसिंह और हम्‍मीरसिंह तथा उनके सैनिकों के अश्‍वों की टापें गूंजती थीं... श्रीनीलेश पालीवाल का उपहार है। जय-

कभी दुर्गा बनके कभी काली बनके


माता का भजन - १

कभी दुर्गा बनके कभी काली बनके
चली आना मैया जी चली आना

तुम कन्या रूप में आना, तुम दुर्गा रूप में आना
सिंह साथ लेके, त्रिशूल हाथ लेके,
चली आना मैया जी चली आना ................

तुम काली रूप में आना, तुम तारा रूप में आना
खप्पर हाथ लेके, शांति साथ लेके,
चली आना मैया जी चली आना ................

तुम लक्ष्मी रूप में आना, तुम माया रूप में आना
उल्लू साथ लेके, दौलत हाथ लेके,
चली आना मैया जी चली आना ................

तुम शीतला रूप में नाना, तुम ठन्डे रूप में आना
झाड़ू हाथ लेके, गदहा साथ लेके,
चली आना मैया जी चली आना ................

तुम सरस्वती रूप में आना, तुम विध्या रूप में आना
हंस साथ लेके, वीणा हाथ लेके,
चली आना मैया जी चली आना ...............

राधिका गोरी से, बृज की छोरी से, मैया करा दे मेरा व्याह..


राधिका गोरी से बृज की छोरी से
मैया करा दे मेरा व्याह


जो नहीं व्याह करावे तेरी गैया नहीं चरावु
आज के बाद मोरी मैया तेरी देहली पर न आवु
आएगा रे - २  मजा रे मजा अब जीत हार का
राधिका गोरी से बृज............

चन्दन की चौकी पर मैया तुझे बैठाऊ
अपनी राधिका से मै चरण तोरे दबवाऊ
भोजन बनवाऊंगा -२  मै छत्तीस प्रकार के
राधिका गोरी से बृज............

छोटी सी दुलहनिया जब आँगन में डोलेगी
तेरे सामने मैया वो घुंघट न खोलेगी
दाऊ से जा कहो -२  वो बैठेगे द्वार पे
राधिका गोरी से बृज............

सुन कर बातें लल्ला की मैया बैठी मुस्कराए
लेकर बलैया मैया, हिवडे से अपने लगाये
नजर कहीं न लगे - २ न लगे मेरे लाल को
राधिका गोरी से बृज............
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कृष्णा कन्हैया का भजन - १

वृन्दावन का कृष्ण कन्हैया, सबकी आँखों का तारा
मन ही मन क्यों जले राधिका, मोहन तो है सबका प्यारा

यमुना तट पर नन्द का लाला, जब जब रास रचाए रे
तन मन डोले कान्हा ऐसी, बंसी मधुर बजाए रे
सुध-बुध खोये कड़ी गोपिया, जाने कैसा जादू डारा
वृन्दावन का कृष्ण कन्हैया..................

रंग सलोना ऐसा जैसे छाई हो घटा सावन की
ऐसी मई तो हुई दीवानी, मन मोहन मन भावन की
तेरे कारण देख संवारे, छोड़ दिया जग सारा रे
वृन्दावन का कृष्ण कन्हैया..................
   

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

अक्षय तृतीया : आखा तीज : स्वयंसिद्ध अभिजीत मुहूर्त






 भारतीय कालगणना के अनुसार वर्ष में चार स्वयंसिद्ध अभिजीत मुहूर्त होते हैं, अक्षय तृतीया (आखा तीज) भी उन्हीं में से एक है। इसके अलावा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा), दशहरा और दीपावली के पूर्व की प्रदोष तिथि भी अभिजीत मुहूर्त हैं।

अक्षय तृतीया


“अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं। तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥
उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यैः। तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥„


अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है।
इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है।
वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है।
* भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की युगादि तिथियों में गणना होती है,
* सतयुग और त्रेता युग का प्रारंभ इसी तिथि से हुआ है।
* भगवान विष्णु ने नर-नारायण, हयग्रीव और परशुराम जी का अवतरण भी इसी तिथि को हुआ था।
* ब्रह्माजी के पुत्र अक्षय कुमार का आविर्भाव भी इसी दिन हुआ था। इस दिन श्री बद्रीनाथ जी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है और श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन किए जाते हैं।
* प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के कपाट भी इसी तिथि से ही पुनः खुलते हैं।
* वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी जी मन्दिर में भी केवल इसी दिन श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं, अन्यथा वे पूरे वर्ष वस्त्रों से ढके रहते हैं।
* जी.एम. हिंगे के अनुसार तृतीया ४१ घटी २१ पल होती है तथा धर्म सिंधु एवं निर्णय सिंधु ग्रंथ के अनुसार अक्षय तृतीया ६ घटी से अधिक होना चाहिए।
* पद्म पुराण के अनुसार इस तृतीया को अपराह्न व्यापिनी मानना चाहिए।
* इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था और
* द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ था। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता।
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अक्षय तृतीया : गुरु-सूर्य का सुंदर योग

अक्षय तृतीया पर 'राजा और मंत्री' का दिव्य संयोग
अक्षय तृतीया के अति पावन शुभ अवसर पर इस बार राजा सूर्य और मंत्री गुरु का दिव्य संयोग बन रहा है। ज्योतिषी के अनुसार 24 अप्रैल को अक्षय तृतीया के दिन 12 वर्ष बाद राजा-मंत्री यानी गुरु-सूर्य का सुंदर योग बन रहा है। इससे पहले 6 मई 2000 को ऐसा योग बना था। 2012 के बाद 2024 में यह योग बनेगा। इस दिन रोहिणी नक्षत्र पूरे दिन-रात को रहेगा।
अक्षय तृतीया को अनंत-अक्षय-अक्षुण्ण फलदायक कहा जाता है। इस दिन सूर्य एवं चंद्रमा दोनों ही अपनी-अपनी उच्च राशि में रहेंगे और वह भी गुरु के साथ। सूर्य के साथ मेष राशि में गुरु भी रहेंगे। जो कभी क्षय नहीं होती उसे अक्षय कहते हैं। कहते हैं कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए भी विशेष अनुष्ठान होता है जिससे अक्षय पुण्य मिलता है।
स्वयंसिद्ध मुहूर्त : इस दिन बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। क्योंकि शास्त्रों के अनुसार इस दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। इस बार की अक्षय तृतीया पर मंगलवार के दिन सूर्यदेवता अपनी उच्च राशि मेष में रहेंगे। और वही इस दिन के स्वामी भी होंगे। रात्रि के स्वामी चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में रहेंगे।
* शुक्र अपनी स्वराशि वृषभ में रहेंगे। 27 तरह के योगों में अक्षय तृतीया के दिन सौभाग्य नामक योग रहेगा। यह अपने नाम के अनुसार ही फल देता है। उच्च के सूर्य के साथ मंगल कार्यों के स्वामी बृहस्पति अपनी मित्र राशि मेष में होंगे। ऐसी स्थिति प्रत्येक 12 वर्ष बाद बनती है।
मंगल कार्य जो किए जा सकते हैं : इस दिन समस्त शुभ कार्यों के अलावा प्रमुख रूप से शादी, स्वर्ण खरीदें, नया सामान,गृह प्रवेश, पदभार ग्रहण, वाहन क्रय, भूमि पूजन तथा नया व्यापार प्रारंभ कर सकते हैं।
क्यों है इस दिन का महत्व : भविष्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन सतयुग एवं त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। भगवान विष्णु के 24 अवतारों में भगवान परशुराम, नर-नारायण एवं हयग्रीव आदि तीन अवतार अक्षय तृतीया के दिन ही धरा पर आए। तीर्थ स्थल बद्रीनारायण के पट भी अक्षय तृतीया को खुलते हैं। वृंदावन के बांके बिहारी के चरण दर्शन केवल अक्षय तृतीया को होते हैं। वर्ष में साढ़े तीन अक्षय मुहूर्त है, उसमें प्रमुख स्थान अक्षय तृतीया का है। ये हैं- चैत्र शुक्ल गुड़ी पड़वा, वैशाख शुक्ल अक्षय तृतीया सम्पूर्ण दिन, आश्विन शुक्ल विजयादशमी तथा दीपावली की पड़वा का आधा दिन।
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अशोक गहलोत , मुख्य मंत्री , राजस्थान : मुख्यमंत्री जी से संपर्क करें


अशोक गहलोत , मुख्य मंत्री , राजस्थान 

मुख्यमंत्री जी से संपर्क करें निवास
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राजस्थान, भारत

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फोटो दीर्घा   नाम फोन न. फैक्स न.
श्री श्रीमत् पाण्‍डेय प्रमुख सचिव
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श्री विजय पाल सिंह उप सचिव
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रविवार, 22 अप्रैल 2012

Truth Is God : M. K. Gandhi


Gandhi's Views On Truth
Truth Is God

God Is
THERE IS an indefinable mysterious Power that pervades everything. I feel it, though I do not see it. It is this unseen Power which makes itself felt and yet defies all proof, because it is so unlike all that I perceive through my senses. It transcends the senses. But it is possible to reason out the existence of God to a limited extent.
I do dimly perceive that whilst everything around me is ever changing, ever-dying, there is underlying all that change a Living Power that is changeless, that holds all together, that creates, dissolves, and re-creates. That informing Power or Spirit is God. And since nothing else I see merely through the senses can or will persist, He alone is.
And is this Power benevolent or malevolent? I see it as purely benevolent. For I can see, that in the midst of death life persists, in the midst of untruth truth persists, in the midst of darkness light persists. Hence I gather that God is Life, Truth, Light. He is Love. He is the Supreme Good.
I confess… that I have no argument to convince… through reason. Faith transcends reason. All I can advise… is not to attempt the impossible. I cannot account for the existence of evil by any rational method. To want to do so is to be co-equal with God. I am, therefore, humble enough to recognize evil as such; and I call God long-suffering and patient precisely because He permits evil in the world. I know that He has no evil in Him and yet if there is evil, He is the author of it and yet untouched by it.
I know, too, that I shall never know God if I do not wrestle with and against evil even at the cost of life itself. I am fortified in the belief by my own humble and limited experience. The purer I try to become the nearer to God I feel myself to be. How much more should I be near to Him when my faith is not a mere apology, as it is today, but has become as immovable as the Himalayas and as white and bright as the snows on their peaks?

My Faith
I can easily put up with the denial of the world, but any denial by me of God is unthinkable.
I know that I can do nothing. God can do everything. O God, make me Thy fit instrument and use as thou wilt!
I have not seen Him, neither have I known Him. I have made the world's faith in God my own and as my faith is ineffaceable, I regard that faith as amounting to experience. However, as it may be said that to describe faith, as experience is to tamper with truth, it may perhaps be more correct to say that I have no word for characterizing my belief in God.
I am surer of His existence than of the fact that you and I are sitting in this room. Then I can also testify that I may live without air and water but not without Him. You may pluck out my eyes, but that cannot kill me. You may chop off my nose, but that will not kill me. But blast my belief in God, and I am dead.
You may call this a superstition, but I confess it is a superstition that I hug, even as I used to hug the name of Rama in my childhood when there was any cause of danger or alarm. That was what an old nurse had taught me.
I believe that we can all become messengers of God, if we cease to fear man and seek only God's Truth. I do believe I am seeking only God's Truth and have lost all fear of man.
…I have no special revelation of God's will. My firm belief is that He reveals Himself daily to every human being, but we shut our ears to the 'still small voice'. We shut our eyes to the Pillar of Fire in front of us. I realize His omnipresence.
Some of my correspondents seem to think that I can work wonders. Let me say as a devotee of truth that I have no such gift. All the power I may have comes from God. But He does not work directly. He works through His numberless agencies.

Nature of God
To me God is Truth and Love; God is ethics and morality; God is fearlessness. God is the source of Light and Life and yet He is above and beyond all these. God is conscience. He is even the atheism of the atheist. For in His boundless love God permits the atheist to live. He is the searcher of hearts. He transcends speech and reason. He knows us and our hearts better than we do ourselves. He does not take us at our word, for He knows that we often do not mean it, some knowingly and others unknowingly.
He is a personal God to those who need His personal presence. He is embodied to those who need His touch. He is the purest essence. He simply is to those who have faith. He is all things to all men. He is in us and yet above and beyond us…
He cannot cease to be because hideous immoralities or inhuman brutalities are committed in His name. He is long-suffering. He is patient but He is also terrible. He is the most exacting personage in the world and the world to come. He metes out the same measure to us that we mete out to our neighbors-men and brutes.
With Him ignorance is no excuse. And withal He is ever forgiving, for He always gives us the chance to repent.
He is the greatest democrat the world knows, for He leaves us 'unfettered' to make our own choice between evil and good. He is the greatest tyrant ever know, for He often dashes the cup from our lips and under cove of free will leaves us a margin so wholly inadequate as to provide only mirth for Himself at our expense.
Therefore it is that Hinduism calls it all His sport-lila, or calls it all an illusion-maya. We are not, He alone Is. And if we will be, we must eternally sing His praise and do His will. Let us dance to the tune of His bansi-lute, and all would be well.
God is the hardest taskmaster I have known on this earth, and He tries you through and through. And when you find that your faith is failing or your body is failing you and you are sinking, He comes to your assistance somehow or other and proves to you that you must not lose your faith and that He is always at your beck and call, but on His terms, not on your terms. So I have found. I cannot really recall a single instance when, at the eleventh hour, He has forsaken me.
In my early youth I was taught to repeat what in Hindu scriptures are known as one thousand names of God. But these one thousand names of God were by no means exhaustive. We believe--and I think it is the truth--that God has as many names as there are creatures and, therefore, we also say that God is nameless and, since God has many forms, we also consider Him formless, and since He speaks to us through many tongues, we consider Him to be speechless and so on. And so when I came to study Islam, I found that Islam too had many names for God.
I would say with those who say God is Love, God is Love. But deep down in me I used to say that though God may be Love, God is Truth, above all. If it is possible for the human tongue to give the fullest description of God, I have come to the conclusion that, for myself, God is Truth.
But two years ago I went a step further and said that Truth is God. You will see the fine distinction between the two statements, viz., that God is Truth and Truth is God. And I came to the conclusion after a continuous and relentless search after Truth, which began nearly fifty years ago.
I then found that the nearest approach to Truth was through love. But I also found that love has many meanings in the English language at least and that human love in the sense of passion could become a degrading thing also. I found too that love in the sense of ahimsa had only a limited number of votaries in the world. But I never found a double meaning in connection with truth and not even atheist had demurred to the necessity or power of truth.
But, in their passion for discovering truth, the atheists have not hesitated to deny the very existence of God--from their own point of view, rightly. And it was because of this reasoning that I saw that, rather than say that God is Truth, I should say that Truth is God.
God is Truth, but God is many other things also. That is why I say Truth is God…. Only remember that Truth is not one of the many qualities that we name. It is the living embodiments of God, it is the only Life, and I identify Truth with the fullest life, and that is how it becomes a concrete thing, for God is His whole creation, the whole Existence, and service of all that exists-Truth-is service of God.
Perfection is the attribute of the Almighty, and yet what a great democrat He is! What an amount of wrong and humbug He suffers on our part! He even suffers us insignificant creatures of His to question His very existence, though He is in every atom about us, around us and within us. But He has reserved to Himself the right of becoming manifest to whomsoever He chooses. He is a Being without hands and feet and other organs, yet he can see Him to whom He chooses to reveal Himself.

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God Through Service
If I did not fee the presence of God within me, I see so much of misery and disappointment every day that I would be a raving maniac and my destination would be the Hooghli.
If I am to identify myself with the grief of the least in India, aye, if I have the power, the least in the world, let me identify myself with the sins of the little ones who are under my care. And so doing in all humility, I hope some day to see God--Truth--face to face.
I am endeavoring to see God through service of humanity, for I know that God is neither in heaven, nor in down below, but in every one.
I am a part and parcel of the whole, and I cannot find Him apart from the rest of humanity. My countrymen are my nearest neighbors. They have become so helpless, so resourceless, so inert that I must concentrate on serving them. If I could persuade myself that I should find Him in a Himalayan cave, I would proceed there immediately. But I know that I cannot find Him apart from humanity.
I claim to know my millions. All the 24 hours of the day I am with them. They are my first care and last because I recognize no God except the God that is to be found in the hearts of the dumb millions. They do not recognize His presence; I do. And I worship the God that is Truth or Truth, which is God through the service of these millions.

Guide and Protector
I must go… with God as my only guide. He is a jealous Lord. He will allow no one to share His authority. One has, therefore, to appear before Him in all one's weakness, empty-handed and in a spirit of full surrender, and then He enables you to stand before a whole world and protects you from all harm.
I have learned this one lesson--that what is impossible with man is child's play with God and if we have faith in that Divinity which presides on the destiny of the meanest of His creation, I have no doubt that all things are possible; and in that final hope, I live and pass my time and endeavor to obey His will.
Even in darkest despair, where there seems to be no helper and no comfort in the wide, wide world, His Name inspires us with strength and puts all doubts and despairs to flight. The sky may be overcast today with clouds, but a fervent prayer to Him is enough to dispel them. It is because of prayer that I have known no disappointment.
…I have known no despair. Why then should you give way to it? Let us pray that He may cleanse our hearts of pettinesses, meannesses and deceit and He will surely answer our prayers. Many I know have always turned to that unfailing source of strength.
I have seen and believe that God never appears to you in person, but in action which can only account for your deliverance in your darkest hour.
Individual worship cannot be described in words. It goes on continuously and even unconsciously. There is not a moment when I do not feel the presence of a Witness whose eye misses nothing and with whom I strive to keep in tune.
I have never found Him lacking in response. I have found Him nearest at hand when the horizon seemed darkest in my ordeals in jails when it was not all-smooth sailing for me. I cannot recall a moment in my life when I had a sense of desertion by God.

Self-realization
I believe it to be possible for every human being to attain to that blessed and indescribable, sinless state in which he feels within himself the presence of God to the exclusion of everything else.
What I want to achieve, -what I have been striving and pining to achieve…,--is self-realization, to see God face to face, to attain moksha. I live and move and have my being in pursuit of this goal. All that I do by way of speaking and writing and all my ventures in the political field are directed to this same end.
For it is an unbroken torture to me that I am still so far from Him, who, as I fully know, governs every breath of my life, and whose offspring I am. I know that it is the evil passions within that keep me so far from Him, and yet I cannot get away from them.
This belief in God has to be based on faith, which transcends reasons. Indeed, even the so-called realization has at bottom an element of faith without which it cannot be sustained. In the very nature of things it must be so. Who can transgress the limitations of his being?
I hold that complete realization is impossible in this embodied life. Nor is it necessary. A living immovable faith is all that is required for reaching the full spiritual height attainable by human beings. God is not outside this earthly case of ours. Therefore, exterior proof is not of much avail, if any at all.
We must ever fail to perceive Him through the senses, because He is beyond them. We can feel Him if we will but withdraw ourselves from the senses. The divine music is incessantly going on within ourselves, but the loud senses drown the delicate music, which is unlike and infinitely superior to anything we can perceive or hear with our senses.

- M. K. Gandhi

 


शनिवार, 21 अप्रैल 2012

आज जंग की घडी की तुम गुहार दो


आरम्भ है प्रचंड बोल मस्तकों के झुण्ड,
आज जंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान या की जान का हो दान
आज इक धनुष के बाण पे उतार दो,
मन करे सो प्राण दे,जो मन करे सो प्राण ले,
वही तो एक सर्वशक्तिमान है ,
विश्व की पुकार है यह भागवत का सार है,
की युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है कौरवो की भीड़ हो या, 
पांडवो का नीड़ हो ,
जो लड़ सका है वोही तो महान है 
जीत की हवास नहीं, किसी पे कोई वश नहीं
,क्या जिंदिगी है ठोकरों पे मार दो 
मौत अंत है नहीं तो मौत से भी क्यूँ डरे,
जा के आसमान में दहाड़ दो ,
आज जंग की घडी की तुम गुहार दो ,
आन बान शान या की जान का हो दान 
आज इक धनुष के बाण पे उतार दो,
वो दया का भाव या की शौर्य का चुनाव 
या की हार का वो घांव तुम यह सोच लो,
या की पुरे भाल पर जला रहे विजय का लाल, 
लाल यह गुलाल तुम सोच लो, 
रंग केसरी हो या मृदंग केसरी हो 
या की केसरी हो ताल तुम यह सोच लो ,
जिस कवी की कल्पना में जिंदगी हो प्रेम गीत 
उस कवी को आज तुम नकार दो ,
भिगती मसो में आज, फूलती रगों में आज 
जो आग की लपट का तुम बखार दो, 
आरम्भ है प्रचंड बोल मस्तकों के झुण्ड 
आज जंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान या की जान का हो दान 
आज इक धनुष के बाण पे उतार दो,उतार दो ,
उतार दो ,आरम्भ है प्रचंड 

‘डर्टी पिक्चर’ : डर्टी ..डर्टी ...

- अरविन्द सिसोदिया 

अगर देश में कोई जिम्मेवार सरकार होती तो फिल्म उद्योग पोर्नोग्राफी  में न बदलता , महेश भट्ट जैसे कामुक लोगों को आम नागरिकों की भावनाओं से खेलनें का अवसर नहीं मिलाता , सन्नी लिओन को भारत की नागरिकता नहीं मिलती ..! मगर जो केंद्र सरकार का मुखिया दल है वाही जिस्म -१, जिस्म -२ और जिस्म -३ में मसगुल हो तो , उनसे अपेच्छ भी क्या हो सकती है..भला हो उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने ‘डर्टी पिक्चर’ को टीवी पर प्रदर्शित करने पर , 56 आपत्तिजनक सीन व संवाद हटा दिए हैं। इसका मतलब यही हुआ की फिल्म अश्लील ,  द्विअर्थी अभद्र भाषा के साथ साथ असामाजिक है ....

56 आपत्तिजनक सीन व डायलॉग काटने के बाद दिखाई जाएगी यह फिल्म

Bhaskar News Network   21/04/२०१२
http://www.bhaskar.com/article
नागपुर. विद्या बालन की ‘डर्टी पिक्चर’ को टीवी पर प्रदर्शित करने पर अंतरिम रोक लगाने से उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने इनकार कर दिया है।
न्यायमूर्ति भूषण धर्माधिकारी व अशोक भंगाले की संयुक्तपीठ ने याचिका को अंतिम सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। शुक्रवार को बालाजी फिल्म्स और सोनी टेलीविजन ने दलील दी कि उक्त फिल्म को सेंसर बोर्ड से ‘यूए’ प्रमाणपत्र हासिल हुआ है। यदि केवल ‘ए’ श्रेणी का प्रमाणपत्र हासिल होता, तो वे दिन में इस फिल्म को टीवी पर नहीं दिखा सकते थे।
लेकिन इस फिल्म को ‘यूए’ प्रमाणपत्र हासिल होने की वजह से वे इसे किसी भी समय टीवी पर दिखा सकते हैं। बावजूद इसके उन्होंने इस फिल्म को टीवी पर प्रदर्शित करने के लिए इसके 56 आपत्तिजनक सीन व संवाद हटा दिए हैं।
बच्चों के मन पर पड़ेगा बुरा प्रभाव: याची
याचिकाकर्ता प्रवीण किशोर दाहाट के अनुसार यह फिल्म वयस्कों की श्रेणी में आती है एवं फिल्म में अश्लील दृश्य दिखाए गए हैं। साथ ही फिल्म में द्विअर्थी अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया है। इस वजह से उक्त फिल्म को रविवार के दिन प्रदर्शित नहीं करने देना चाहिए। चूंकि रविवार के दिन बच्चों की स्कूल से छुट्टी होती है, वे घर पर ही रहते है।
इस फिल्म को देखकर अवयस्क बच्चों के मन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। केबल टीवी ऑपरेटरों पर नियंत्रण रखने के लिए सरकार ने जो नियम बनाए हैं, उसके अनुसार केबल टीवी पर वयस्क श्रेणी के कार्यक्रम अथवा फिल्में केवल रात के 12 बजे से सुबह 6 बजे के बीच ही दिखाए जा सकते हैं।
इसलिए याचिकाकर्ता ने उक्त फिल्म को 22 अप्रैल को प्रसारित करने पर अंतरिम रोक लगाने एवं बाद में भी उक्त फिल्म को दिन में केबल चैनल पर दिखाने पर रोक लगाने के आदेश देने की प्रार्थना अदालत से की थी।

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

हाईकोर्ट की रोक के बावजूद कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता और राज्‍यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की कथित अश्‍लील सीडी सार्वजनिक हो गई है


समाचार आ रहा है कि हाई कोर्ट की रोक के बावजूद कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता और राज्‍यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की कथित अश्‍लील सीडी सार्वजनिक हो गई है। 



रोक के कोर्ट की  बावजूद 'अश्लील सीडी' फेसबुक पर जारी

dainikbhaskar.com 20/04/२०१२
http://www.bhaskar.com
नई दिल्ली.  नई दिल्ली. दिल्‍ली हाई कोर्ट की रोक के बावजूद कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता और राज्‍यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की कथित अश्‍लील सीडी सार्वजनिक हो गई है। यह सीडी यूट्यूब और सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए आम कर दी गई है।

जिस फेसबुक अकाउंट से वीडियो अपलोड किया गया है, वह 19 अप्रैल को ही बनाया गया है। फिर उसी गूगल अकाउंट से फेसबुक पेज बनाकर फेसबुक के जरिए यह वीडियो वायरल किया जा रहा है। पेज 'सिंघवी वीडियो' नाम से बनाया गया है। सिंघवी कह चुके हैं कि उनकी ऐसी कोई सीडी नहीं है। उनका आरोप है कि सीडी के साथ किसी ने छेड़छाड़ किया है। लेकिन फेसबुक पेज पर वीडियो अपलोड करने वाले ने दावा किया है कि यह सिंघवी की ही सीडी है।
वीडियो अपलोड करने वाले को पता है कि यह वीडियो ब्लॉक किया जा सकता है इसलिए उसने अपनी ईमेल आईडी देकर कहा है कि वीडियो ब्लॉक होने की स्थिति में उससे वीडियो प्राप्त किया जाए।
यही नहीं फेसबुक और यूट्यूब पर खाता भी नेता के नाम पर ही बनाया गया है। फेसबुक पर पेज 9 घंटे पहले यानि 19 अप्रैल को दोपहर के वक्त बनाया गया है।
12 मिनट 40 सेकंड के इस वीडियो को अश्लील सीडी की सीरीज का पहला वीडियो बताया गया है। इस पर अभी सिंघवी या कांग्रेस की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।
सिंघवी कांग्रेस के प्रवक्‍ता हैं, लेकिन यह प्रकरण सामने आने के बाद से वह मीडिया से दूर ही दिख रहे हैं। इस बीच खबर ऐसी भी आई है कि कांग्रेस प्रवक्‍ता पद से उनकी छुट्टी कर सकती है।
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रामसेतु राष्ट्रीय धरोहर मुद्दा : कांग्रेस नेतृत्व सरकार की विहिप ने आलोचना की




- अरविन्द सिसोदिया
समझा में नहीं आता यह कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह जी की केंद्र सरकार हिन्दू विरोधी है या वह भारत की सरकार है भी  या ..........? यदि इस देश में सबसे पुरातन धर्म स्थल हे और उसकी पूज्यनीयता  है तो वह है , रामसेतु जहाँ भगवान राम ने भगवान शिव की पूजा की थी ..जिसका वैज्ञानिक पक्ष यह कहता है की यह विश्व की अद्भुत  संरचना है..आप उसे ही राष्ट्रिय धरोहर घोषित नहीं करें तो क्या  पाकिस्तान को राष्ट्रिय धरोहर घोषित करोगे..? कुछ लज्जा भी बची है या उसे भी ..............

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रामसेतु पर सरकार की विहिप ने की आलोचना
नई दिल्ली, एजेंसी
First Published:20-04-12
रामसेतु  को राष्ट्रीय धरोहर घोषित  किए जाने के पक्ष में केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपना जवाब दाखिल न किए जाने पर विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने शुक्रवार को केंद्र सरकार की आलोचना की। विहिप ने सरकार के इस रुख को हिंदू विरोधी कदम करार दिया है। विहिप दिल्ली के महामंत्री सत्येंद्र मोहन ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के इस रुख को हिंदू विरोधी कदम करार दिया।
विहिप के मीडिया प्रमुख विनोद बंसल ने कहा कि रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किए जाने के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र सरकार द्वारा जवाब दाखिल न किए जाने से विहिप काफी आहत है। बैठक में केंद्र सरकार के इस रवैये की निंदा की गई।
बंसल के मुताबिक बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि हिंदू समाज आदि काल से ही रामसेतु की पूजा करता आया है और आज भी यह स्थान हिंदू समुदाय के लिए देवता तुल्य है। इस सबके बावजूद केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय धरोहर न मानते हुए जो बात न्यायालय को बताई है उससे केंद्र की हिंदू विरोधी मानसिकता जाहिर होती है।
प्रस्ताव में सेतु समुद्रम परियोजना को रद्द करने एवं रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग की गई है। साथ ही रामसेतु के संदर्भ में गठित पचौरी सिमति की सिफारिशों को सार्वजनिक करने की भी मांग की गई है।
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बुधवार, 18 अप्रैल 2012

महात्मा गांघी के खून तक को नीलम : बिट्रिश नैतिकता की पोल खुल गई

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बिट्रिश नैतिकता की पोल खुल गई ,धन के लिए उन्होंने महात्मा गांघी के खून तक को नीलम कर दिया , ये नंगे भूखे लोग दुनिया को लूटते तो रहे , जब हर रफ से हर के घर बैठ गए तो भी नंगेपन से बाज नहीं आये...यही है इनकी असलियत .................
और ...........
भारत सरकार का निक्काम्मापन वह सारा तमाशा देखती रही ....क्या बापू ने यही सब देखने के लिए भारत को स्वतंत्र करवाया था....

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बापू के खून से सनी घास 10,000 पाउंड में नीलाम

लंदन, एजेंसी
First Published:17-04-12
साल 1948 में जिस जगह महात्मा गांधी की हत्या हुई थी वहां की खून से सनी घास और मिट्टी मंगलवार को 10,000 पाउंड में यहां नीलाम की गई। बापू से जुड़ी जिन चीजों को आज नीलाम किया गया उनमें उनका गोल चश्मा भी शामिल था। नीलामी से पहले चश्मे को जितनी कीमत मिलने का अंदाजा लगाया गया था वह इससे दोगुनी कीमत पर बेचा गया।
चश्मे की नीलामी 34,000 पाउंड में हुई जबकि बापू के चरखे को 26,000 पाउंड की कीमत मयस्सर हुई। नीलामी घर मुलॉक्स ने इस महीने की शुरुआत में ही ऐलान कर दिया था कि वह गांधी से जुड़ी चीजों की नीलामी करने जा रहा है। मुलॉक्स के इस कदम का कई तबके में विरोध भी किया गया और नीलामी को रद्द करने की मांग की गई थी। सामान खरीदने वालों की पहचान अभी नहीं हो सकी है।
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बापू से जुड़ी वस्तुओं की नीलामी दुर्भाग्यपूर्ण : आजाद

18 Apr 2012, 2332 hrs IST,भाषा
जम्मू।। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्मृति चिह्नों की नीलामी को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने दुर्भाग्यपूर्ण बताया। जम्मू में हुए उन्होंने कहा कि वह इन कीमती चीजों की नीलामी के पक्ष में नहीं हैं।
आजाद ने कहा, 'इंग्लैंड में जो हुआ उसके बारे में मैं पहले ही कह चुका हूं कि मैं नीलामी के पक्ष में नहीं हूं।' उन्होंने कहा, 'यह दुर्भाग्यपूर्ण है। हम नहीं चाहते कि गांधीजी से जुड़ी चीजें बेची जाए। ये अनमोल स्मृति चिह्न हैं।'
वर्ष 1948 में जिस जगह गांधीजी की हत्या हुई थी वहां की, बापू के खून में भीगी चुटकी भर रेत और खून से सनी घास को लंदन में गुरुवार को एक नीलामी में 10,000 पाउंड में
बेच दिया गया।
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नीलामी का विरोध: गिरिराज किशोर ने लौटाया 'पद्मश्री', बापू की पौत्री भी भड़कीं 

Source: Agency   |   Last Updated 16:32(18/04/2012)
 नई दिल्‍ली. महात्मा गांधी की जिस जगह हत्या हुई थी वहां उनके खून की कुछ बूंदें गिरी थीं। उस जगह से ली गई घास, मिट्टी और बापू से जुड़ी कई वस्तुएं मंगलवार को लंदन में 81 लाख रुपए में नीलाम हुई। नीलाम हुई वस्तुओं में खून लगी कुछ ब्लेड, उनका गोल रिम वाला चश्मा और हथौड़ा भी शामिल था। महात्‍मा गांधी की पौत्री तारा ने कहा है कि बापू से जुड़ी चीजों को नीलाम किए जाने के बजाय समुद्र में विसर्जित कर देना चाहिए था।
गांधीवादियों और कई हस्तियों ने पीएम, राष्‍ट्रपति को खत लिखकर इस मामले में दखल देने का अनुरोध किया था, लेकिन कुछ हो नहीं सका। इसलिए अब यहां इसका विरोध तेज हो गया है। राष्‍ट्रपिता का सामान नीलाम होने के विरोध में गिरिराज किशोर ने पद्मश्री सम्‍मान वापस करने के लिए राष्‍ट्रपति को चिट्ठी लिखी है। प्रतिभा पाटिल को लिखे खत में किशोर ने कहा कि सरकार इस नीलामी को रोक नहीं सकी, लिहाजा अब उनके पास सम्‍मान लौटाने के सिवा कोई रास्‍ता नहीं बचा है। गिरिराज किशोर ने गांधी जी के जीवन के एक हिस्‍से पर आधारित उपन्‍यास 'पहला गिरमिटिया' लिखा जिसके लिए उन्‍हें अपार प्रशंसा मिली।
बापू की यादगार वस्तुओं की नीलामी अपेक्षा से दोगुनी से ज्यादा दाम में हुई। मिट्टी और घास को लकड़ी के एक छोटे से बक्से में कांच लगाकर रखा गया था। इन वस्तुओं को एक पतर के साथ पीपी नांबियार ने सहेज कर रखा था। 24 सितंबर 1996 को लिखे गए इस पत्र में कहा गया, 'जिस स्थान पर 30 जनवरी, 1948 को हमारे राष्ट्रपिता एमके गांधी की गोली मारकर हत्या की गई थी। मैंने उसी पवित्र स्थल से मिट्टी का कुछ अवशेष और यह घास एकत्र की है।'  
इस नीलामी में शामिल चश्मा बापू ने 1890 में खरीदा था। जब वे लंदन में कानून की पढ़ाई कर रहे थे। यह मूल रूप से एच केनम ऑप्टिशियन, 23 एल्डेट स्ट्रीट, ग्लाउसेस्टर द्वारा तैयार किया गया था। इसमें एक नरम कपड़ा भी लगा हुआ है। चरखे के बारे में बताया गया कि यह चालू अवस्था में है।
बीबीसी के मुताबिक, गांधी जी के खून वाली घास और मिट्टी, उनका चश्मा और उनका चरखा एक भारतीय ने खरीद ली है। समझा जा रहा है कि इसे भारत सरकार को लौटा दिया जाएगा। इन चार चीजों को खरीदने वाले ने फोन पर बोली लगाई, लेकिन उनकी पहचान नहीं बताई गई है। नीलाम करवाने वाली संस्था मुलॉक्स के एक अधिकारी ने बताया कि उन्हें पूरा विश्वास है कि ये चीजें भारत लौट जाएंगी।

.भारत में अश्लीलता : 'हेट स्टोरी' के हॉट पोस्टर्स न दिखाएं: हाईकोर्ट

केंद्र  सरकार  के निकम्मेपन के कारण.भारत में अश्लीलता का इस  तरह खुला प्रदर्शन   हो रहा जैसे यह भगवान की कोई पवित्र मूर्तियाँ हों..सरकार को समाज हित में कठोर  कदम उठाने  चाहिए थे मगर वह तो सन्नी लिओन को नागरिकता देने में ज्यादा व्यस्त  रही..यह सरकार की विकृत  मनोविकृति  का उदाहरण  है...कोलकाता उच्च न्यायालय ने स्वागत योग्य निरणय दिया हे ...
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'हेट स्टोरी' के हॉट पोस्टर्स न दिखाएं: हाईकोर्ट
18 Apr 2012
कोलकाता ।। कोलकाता उच्च न्यायालय ने इसी शुक्रवार को रिलीज होने वाली हिन्दी फिल्म ' हेट स्टोरी ' के वितरकों को आज निर्देश दिया कि वे फिल्म के प्रचार के लिए उत्तेजक पोस्टरों का प्रदर्शन नहीं करें।

जस्टिस दीपांकर दत्त ने पश्चिम बंगाल सरकार के उस आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया जिसमें वितरकों को ऐक्ट्रेस पाउली दाम को उत्तेजक मुद्राओं में दिखाने वाले पोस्टर प्रदर्शित नहीं करने का निर्देश दिया गया था। अदालत ने वितरक और राज्य सरकार से कहा कि वे अपने दावों के समर्थन में हलफनामे पेश करें।

वितरकों ने दावा किया कि फिल्म को पहले ही यू / ए प्रमाणपत्र दिया जा चुका है और इस कारण राज्य सरकार फिल्म के दृश्य के पोस्टर दिखाने पर रोक लगाने का निर्देश नहीं दे सकती।
राज्य के अडवोकेट जनरल अनिद्य मित्र ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि ऐसे पोस्टरों को सार्वजनिक स्थलों पर नहीं लगाया जा सकता जहां बच्चे भी जाते हैं। अदालत ने उनकी दलील स्वीकार करते हुए कहा कि वह राज्य सरकार के आदेश पर रोक नहीं लगाएगी।
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रविवार, 15 अप्रैल 2012

अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा के 12 बॉडीगार्ड सेक्‍स स्‍कैंडल में फंसे


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अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा के 12 बॉडीगार्ड  सेक्‍स स्‍कैंडल में फंसे


15/04/2012
वॉशिंगटन. दक्षिण अमेरिकी देश कोलं‍बिया में चल रहे अमेरिकी देशों के शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा की सुरक्षा में तैनात सीक्रेट सर्विस के 12 एजेंटों को कथित तौर पर वेश्‍यायों के साथ रंगरंलियां मनाने आरोप के कारण हटा दिया गया है। यह घटना शुक्रवार को ओबामा के कार्टाजेना में पहुंचने से पहले प्रकाश में आई।
'न्यूयार्क टाइम्स' के  अनुसार 'सीक्रेट सर्विस के प्रवक्ता एडविन एम. डॉनोवेन ने स्वीकार किया कि दुराचार के आरोपों के कारण कुछ एजेंटों को वापस बुलाया गया है और इसलिए उनकी जगह दूसरे कर्मियों को तैनात किया जायेगा हालांकि उन्होंने यौनकर्मियों के साथ संबंध की खबर पर कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की। अखबार ने कहा है कि कोलंबिया के खास इलाकों में वेश्यावृत्ति वैध है।
फेडरल लॉ के एक अधिकारी जॉन एडलर ने 'वाशिंगटन पोस्ट' से कहा कि यह आरोप कम से कम एक एजेंट के कार्टाजेना में वेश्यावृत्ति में शामिल होने से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि पूरी इकाई को जांच के लिए बुलाया गया है।
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http://www.indiatvnews.com/news

Obama's Secret Service Agents Caught With Sex Workers In Colombia

Updated 15 Apr 2012,
Cartagena (Colombia),  Apr 15:
Eleven Secret Service agents  who guard US President Barack Obama were recalled to Washington last week after nearly all of them allegedly brought  sex workers to their rooms for a wild party at a luxury hotel in Colombia, The Washington Post  and Daily Mail reported.The team was in the country to scout the security situation ahead of Obama's trip there for the Summit of the Americas this weekend.The Secret Service agents - who have now been placed on leave - reportedly capped off a week of heavy drinking at the beachfront Hotel Caribe in Cartagena by cavorting with sex workers.
The partying was exposed when one of the women caused a commotion after an agent refused to pay her. Local police and hotel security were called.
Five U.S. military personnel, who were working with the Secret Service, could also be involved in misconduct and have been confined to their rooms and ordered not to have contact with others. They face possible disciplinary charges.
Rep Peter King, who was briefed on the incident, said 11 agents, many of them married, were in the team that was recalled to the U.S. - instead of 12 as originally reported - and that 'close to' all of them were involved.
King said he was told that anyone visiting the hotel overnight was required to leave identification at the front desk and leave the hotel by 7am.When a woman failed to do so, it raised questions among hotel staff and police, who investigated. They found the woman with the agent in the hotel room and a dispute arose over whether the agent should have paid her. Mr King said he was told that the agent did eventually pay the woman.
The incident was reported to the U.S. embassy, prompting further investigation.

During their week-long stay at the five-star hotel in Cartagena, the agents were seen drinking heavily, according to waiters there.

A number of the White House staff and traveling press corps were also staying at the hotel.

The White House said President Obama had been briefed about the incidents but would not comment on his reaction.
'The President does have full confidence in the United States Secret Service,' presidential spokesman Jay Carney said when asked.
Carney insisted the matter was more a distraction for the media than Obama.
But Secret Service assistant director Paul Morrissey said in a statement: 'We regret any distraction from the Summit of the Americas this situation has caused.'
The Washington Post  reported that Jon Adler, president of the Federal Law Enforcement Officers Association, said the accusations related to at least one agent having involvement with sex workers.
The association represents federal law enforcement officers, including the Secret Service.
Ronald Kessler, a former Post reporter and the author of a book about the Secret Service, told the newspaper that he had learned that among the agents involved, several are married.
Although prostitution is legal in parts of Colombia, the Secret Service is said to consider solicitation inappropriate behaviour for its agents.
Colombia has become known as 'the Thailand of Latin America' for its loose laws on prostitution and the easy availability of sex workers.
The incident threatened to overshadow Obama's economic and trade agenda at the Summit of the Americas and embarrass the U.S.
Secret Service spokesman Ed Donovan would not confirm that prostitution was involved, saying, 'The Secret Service takes all allegations of misconduct seriously.'
'These personnel changes will not affect the comprehensive security plan that has been prepared in advance of the President’s trip,' said Donovan of the conference in the Colombian port city attended by Obama and more than 30 world leaders.
He said the allegations of misconduct were related to activity before the president's arrival on Friday night.
Obama was attending a leaders' dinner on Friday night at Cartagena's historic Spanish fortress.
He was due to attend summit meetings with regional leaders on Saturday and Sunday.
Those involved had been sent back to their permanent place of duty and were being replaced by other agency personnel, Donovan said.
The matter was turned over to the agency's Office of Professional Responsibility, which handles the agency's internal affairs.
On the steamy streets of Cartagena, a resort city with a teeming prostitution trade, there was condemnation for the Secret Service agents for what residents saw as abusing their station and dishonoring their country.
Edwin Yepes, a souvenir vendor, said: 'They are supposed to come here and set an example.
We are an inferior culture, and so it's better if they don't come than if they damage our image of them.'
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BJP : भाजपा

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स्वतंत्रता संग्राम से जन्मा: हिन्दुत्व का महानायक केशव


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दीनदयाल उपाध्याय,एक रहस्यमय राजनैतिक हत्या

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प्रभु से प्रार्थना : रहे ध्यान तुम्हारे चरणों मे







प्रभु से प्रार्थना :  रहे ध्यान तुम्हारे चरणों मे 

मिलता है सच्चा सुख केवल, भगवन तुम्हारे चरणों मे..
यह विनती है पल पल छिन छिन, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों मे..
मिलता है सच्चा सुख केवल.............

जिव्हा पर तेरा नाम रहे, तेरी याद सुबह और शाम रहे..
बस काम यह आठो याम रहे, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों मे..
मिलता है सच्चा सुख केवल.............

चाहे संकट ने मुझे घेरा है, चाहे चारो और अँधेरा हो..
पर चित्त न डगमग मेरा हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों मे..
मिलता है सच्चा सुख केवल.............

चाहे अग्नि मे भी जलना हो, चाहे कांटो पर ही चलना हो..
चाहे छोड़ के देश निकलना हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों मे..
मिलता है सच्चा सुख केवल.............

चाहे ग्रेह्स्थ का फर्ज निभाना हो, चाहे घर - घर अलख जगाना हो..
चाहे दुश्मन सारा जमाना हो, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों मे..
मिलता है सच्चा सुख केवल.............

चाहे बीच भवर मे नैया हो, चाहे कोई ना उसका खिवैया हो..
भवसागर पार उतरने को, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों मे..
मिलता है सच्चा सुख केवल.............

चाहे बैरी सब संसार बने, चाहे जीवन मुझ पर भार बने..
चाहे मौत गले का हार बने, रहे ध्यान तुम्हारे चरणों मे..
मिलता है सच्चा सुख केवल.............

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

वैशाखी : विशेष गौरव : जलियांवाला बाग नरसंहार : शहीद ए आजम उधम सिंह


गुरु गोविंद सिंह जी, वैशाखी दिवस को विशेष गौरव देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने ने 1699 ई. को वैशाखी पर श्री आनंदपुर साहिब में विशेष समागम किया। इसमें देश भर की संगत ने आकर इस ऐतिहासिक अवसर पर अपना सहयोग दिया। गुरु गोविंद सिंह जी ने इस मौके पर संगत को ललकार कर कहा- 'देश को ग़ुलामी से आज़ाद करने के लिए मुझे एक शीश चाहिए। गुरु साहिब की ललकार को सुनकर पांच वीरों 'दया सिंह खत्री, धर्म सिंह जट, मोहकम सिंह छीवां, साहिब सिंह और हिम्मत सिंह' ने अपने अपने शीश गुरु गोविंद सिंह जी को भेंट किए। ये पांचो सिंह गुरु साहिब के 'पंच प्यारे' कहलाए। गुरु साहिब ने सबसे पहले इन्हें अमृत पान करवाया और फिर उनसे खुद अमृत पान किया। इस प्रकार 1699 की वैशाखी को 'खालसा पंथ' का जन्म हुआ, जिसने संघर्ष करके उत्तर भारत में मुग़ल साम्राज्य को समाप्त कर दिया। हर साल वैशाखी के उत्सव पर 'खालसा पंथ' का जन्म दिवस मनाया जाता है।
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जलियांवाला बाग


जब डायर ने किया दो हजार हिन्दुस्तानियों का कत्ल...






सरकारी आंकड़ों में मरने वालों की संख्या 379 बताई गई, जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे. स्वामी श्रद्धानंद के मुताबिक मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी. अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन के मुताबिक मौत का यह आंकड़ा 1800 से ज्यादा था.
इस घटना की दुनियाभर में निन्दा हुई, लेकिन जनरल डायर ने कहा कि लोगों को सबक सिखाने के लिए यह जरूरी था. ब्रिटेन के एक अखबार ने इसे आधुनिक इतिहास का सबसे नृशंस हत्याकांड करार दिया.
डायर ने आजादी के दीवानों की जान तो ले ली, लेकिन इस नरसंहार के बाद लोगों का आजादी पाने का जज्बा और भी बुलंद हो गया. आजादी के दीवानों के मन में इतनी आग भर गई कि वे जान की परवाह किए बिना स्वतंत्रता के हवनकुंड में कूदने लगे.
घटना से गुस्साए उधम सिंह ने कसम खाई कि वे माइकल ओडवायर को मारकर इस घटना का बदला लेंगे. 13 मार्च 1940 को उनकी यह प्रतिज्ञा पूरी हुई और उन्होंने लंदन के कॉक्सटन हाल में ओडवायर को गोलियों से भून डाला. वहीं दूसरी ओर जनरल डायर कई तरह की बीमारियों से तड़प-तड़पकर मर गया.
जलियांवाला बाग की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान मौजूद हैं, जो ब्रितानिया हुकूमत के जुल्मों की कहानी कहते नजर आते हैं.सभा को विफल करने के लिए हुकूमत ने तरह-तरह के हथकंडे अपनाए. सभा में भाग लेने मुम्बई से अमृतसर आ रहे महात्मा गांधी को पलवल रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया.
हुकूमत की कारगुजारियों से गुस्साए लोग हजारों की संख्या में 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग पहुंच गए.
इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओडवायर ने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर को आदेश दिया कि वह हिन्दुस्तानियों को सबक सिखा दें. इस पर जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग को घेर लिया और जैसे ही सभा शुरू हुई मशनीगनों से अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी गई. वे लगभग 10 मिनट तक निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाते रहे. उनकी बंदूकें तब तक खामोश नहीं हुई, जब तक कि उनकी गोलियां खत्म नहीं हो गईं.
बाग तीन ओर से उंची-उंची दीवारों से घिरा था और इसमें आने-जाने का एक ही रास्ता होने की वजह से लोग भाग भी नहीं पाए. जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी, लेकिन वे भी नहीं बचे और पानी में डूबने से उनकी मौत हो गई. बहुत से लोग भगदड़ में मारे गए. बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुएं से ही मिले
सरकारी आंकड़ों में मरने वालों की संख्या 379 बताई गई, जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे. स्वामी श्रद्धानंद के मुताबिक मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी. अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन के मुताबिक मौत का यह आंकड़ा 1800 से ज्यादा था.
इस घटना की दुनियाभर में निन्दा हुई, लेकिन जनरल डायर ने कहा कि लोगों को सबक सिखाने के लिए यह जरूरी था. ब्रिटेन के एक अखबार ने इसे आधुनिक इतिहास का सबसे नृशंस हत्याकांड करार दिया.
डायर ने आजादी के दीवानों की जान तो ले ली, लेकिन इस नरसंहार के बाद लोगों का आजादी पाने का जज्बा और भी बुलंद हो गया. आजादी के दीवानों के मन में इतनी आग भर गई कि वे जान की परवाह किए बिना स्वतंत्रता के हवनकुंड में कूदने लगे.
घटना से गुस्साए उधम सिंह ने कसम खाई कि वे माइकल ओडवायर को मारकर इस घटना का बदला लेंगे. 13 मार्च 1940 को उनकी यह प्रतिज्ञा पूरी हुई और उन्होंने लंदन के कॉक्सटन हाल में ओडवायर को गोलियों से भून डाला. वहीं दूसरी ओर जनरल डायर कई तरह की बीमारियों से तड़प-तड़पकर मर गया.
जलियांवाला बाग की दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान मौजूद हैं, जो ब्रितानिया हुकूमत के जुल्मों की कहानी कहते नजर आते हैं. (13 अप्रैल को जलियांवाला बाग नरसंहार पर विशेष)

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ड्वायर को मारकर लिया जलियांवाला बाग का बदला


भाषा | नई दिल्‍ली, 30 जुलाई 2010
शहीद ए आजम उधम सिंह एक ऐसे महान क्रांतिकारी थे जिन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने के लिए अपना जीवन देश के नाम कुर्बान कर दिया. लंदन में जब उन्होंने माइकल ओ. ड्वायर को गोली से उड़ाया तो पूरी दुनिया में इस भारतीय वीर की गाथा फैल गई.
तेरह अप्रैल 1919 को अमृतसर में बैसाखी के दिन हुए नरसंहार के समय ओ.ड्वायर ही पंजाब प्रांत का गवर्नर था. उसी के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनाल्ड डायर ने जलियांवाला बाग में सभा कर रहे निर्दोष लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं थीं.
26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में जन्मे उधम सिंह ने जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार का बदला लेने की प्रतिज्ञा की थी जिसे उन्होंने अपने सैकड़ों देशवासियों की सामूहिक हत्या के 21 साल बाद खुद अंग्रेजों के घर जाकर पूरा किया.
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चमन लाल का कहना है कि उधम सिंह एक ऐसे निर्भीक योद्धा थे जिन्होंने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया में भारतीयों की वीरता का परचम फहराया.
सन 1901 में उधम सिंह की मां और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया. इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी. उधम सिंह के बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह था, जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधम सिंह और साधु सिंह के रूप में नए नाम मिले.
अनाथालय में उधम सिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया और वह दुनिया में एकदम अकेले रह गए. 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए.
डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी तथा रोलट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में लोगों ने 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन एक सभा रखी जिसमें उधम सिंह लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे.
इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ.ड्वायर ने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड डायर को आदेश दिया कि वह भारतीयों को सबक सिखा दे. इस पर जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग को घेर लिया और मशीनगनों से अंधाधुंध गोलीबारी कर दी जिसमें सैकड़ों भारतीय मारे गए. जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी. बाग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सिर्फ कुएं से ही मिले.
आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए थे. स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी, जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डाक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी. राजनीतिक कारणों से जलियांवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई.
इस घटना से वीर उधम सिंह विचलित हो उठे और उन्होंने जलियांवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ.ड्वायर को सबक सिखाने की शपथ ली. उधम सिंह अपने काम को अंजाम देने के उद्देश्य से 1934 में लंदन पहुंचे. वहां उन्होंने एक कार और एक रिवाल्वर खरीदी तथा उचित समय का इंतजार करने लगे.
भारत के इस योद्धा को जिस मौके का इंतजार था, वह उन्हें 13 मार्च 1940 को उस समय मिला जब माइकल ओ.ड्वायर लंदन के काक्सटन हाल में एक सभा में शामिल होने के लिए गया. उधम सिंह ने एक मोटी किताब के पन्नों को रिवाल्वर के आकार में काटा और उनमें रिवाल्वर छिपाकर हाल के भीतर घुसने में कामयाब हो गए.
सभा के अंत में मोर्चा संभालकर उन्होंने ओ.ड्वायर को निशाना बनाकर गोलियां दागनी शुरू कर दीं. ओ.ड्वायर को दो गोलियां लगीं और वह वहीं ढेर हो गया. इस मामले में 31 जुलाई 1940 को पेंटविले जेल में उधम सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया जिसे उन्होंने हंसते हंसते स्वीकार कर लिया. 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए.

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खुशी की फुहार लाई बैसाखी  

- गोविन्द बल्लभ जोशी
कैलेंडर और मान्यताएँ : बैसाखी प्रत्येक वर्ष अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 13 अप्रैल को मनाई जाती है। कभी 12-13 वर्ष में 14 तारीख की भी हो जाती है। इस वर्ष 14 अप्रैल को यह रंगीला एवं छबीला पर्व मनाया जाएगा। अतः बैसाखी आकर पंजाब के तरुण वर्ग को याद दिलाती है। वह याद दिलाती है उस भाईचारे की जहाँ माता अपने दस गुरुओं के ऋण को उतारने के लिए अपने पुत्र को गुरु के चरणों में समर्पित करके सिख बनाती थी। ऐसी वंदनीय भूमि को सादर नमन करते हैं।

बैसाखी का पर्व भारत वर्ष में सभी जगह मनाया जाता है। इसे खेती का पर्व भी कहा जाता है। किसान इसको बड़े आनंद के साथ मनाते हुए खुशियाँ का इजहार करते हैं। संक्रांति का दिन होने से इस कृषि पर्व को आध्यात्मिक पर्व के रूप में भी मान्याता मिली है। उत्तर भारत में विशेष कर पंजाब वैशाखी पर्व को बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाता है। ढोल-नगाड़ों के साथ युवक और युवतियाँ प्रकृति के इस उत्सव का स्वागत करते हुए गीत गाते हैं एक-दूसरे को बधाइयाँ देते हैं और झूम-झूमकर नाच उठते हैं। इससे कहा जा सकता है कि कृषि प्रधान देश का यह ऋषि और कृषि पर्व है।


ND
भारतीय ज्योतिष में चंद्र गणना के अनुसार चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा वर्ष का प्रथम दिन है और सौर गणना के अनुसार बैसाखी (मेष संक्रांति) होती है। भारत में महीनों के नाम नक्षत्रों पर रखे गए हैं। बैसाखी के समय आकाश में विशाखा नक्षत्र होता है। विशाखा युवा पूर्णिमा में होने के कारण इस मास को वैशाखी कहते हैं। इस प्रकार वैशाख मास के प्रथम दिन को वैशाखी कहा गया और पर्व के रूप में स्वीकार किया गया।

बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में संक्रमण करता है अतः इसे मेष संक्रांति भी कहते हैं। इस दिन समस्त उत्तर भारत की पवित्र नदियों एवं सरोवरों में स्नान करने का माहात्म्य माना जाता है। अतः सभी नर-नारी चाहे खालसा पंथ के अनुयायी हों अथवा वैष्णव धर्म के प्रातःकाल नदी अथवा सरोवरों में स्नान करना अपना धर्म समझते हैं। इस दिन गुरुद्वारों में विशेष उत्सव मनाए जाते हैं। खेत में खड़ी फसल पर हर्षोल्लास प्रकट करने का दिन है।

बैसाखी मुख्यतः कृषि पर्व है। पंजाब की शस्य-श्यामला भूमि से जब रबी की फसल पककर तैयार हो जाती है और वहाँ का बाँका-छैला जवान उस अन्न-धन रूपी लक्ष्मी को संग्रहीत करने के लिए लालायित हो उठता है, 'बल्लिए कनक दिए ओनू स्वांणजे नसीबा वालै।' इस गीत को ढोल की थाप के साथ पंजाब की युवतियाँ गा उठती हैं, 'हे प्रीतम, मैं सोने की दाँती बनवाकर गेहूँ के पचास पूले काटूँगी। मार्ग में झोपड़ी बनवा लेंगे। ईश्वर इच्छा पूरी करेगा।'

वह इस प्रकार गाती हैं-

दांता बनायां सार दी पलू बड़स पंगाह।
राह विच पाले कुल्ली करवां दी।
तेरी रब मचाऊं आस गबरुआ ओए आस।

बैसाखी पर्व केवल पंजाब में ही नहीं बल्कि उत्तर भारत के अन्य प्राँतों में भी उल्लास के साथ मनाया जाता है। सौर नव वर्ष या मेष संक्रांति के कारण पर्वतीय अंचल में इस दिन अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं। लोग इस दिन श्रद्धापूर्वक देवी की पूजा करते हैं। उत्तर में नहीं बल्कि उत्तर-पूर्वी सीमा के असम प्रदेश में भी मेष संक्रांति आने पर बिहू का पर्व मनाया जाता है। वैशाख माह में वसंत ऋतु अपने पूर्ण यौवन पर होती है।