शनिवार, 5 मई 2012

देवर्षि नारद जयन्ती : विश्व पत्रकारिता दिवस


देवर्षि नारद मुनि

देवर्षि नारद ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए। नारद मुनि, हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों मे से एक हैं । उन्होंने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है । वे भगवान विष्णु के प्रिय भक्तों में से एक माने जाते है।
महायोगी नारद जी ब्रह्मा जी के मानसपुत्र हैं। वे प्रत्येक युग में भगवान की भक्ति और उनकी महिमा का विस्तार करते हुए लोक-कल्याण के लिए सर्वदा सर्वत्र विचरण किया करते हैं।
भक्ति तथा संकीर्तन के ये आद्य-आचार्य हैं। इनकी वीणा भगवज्जप-महती के नाम से विख्यात है। उससे 'नारायण-नारायण' की ध्वनि निकलती रहती है। इनकी गति अव्याहत है। ये ब्रह्म-मुहूर्त में सभी जीवों की गति देखते हैं और अजर–अमर हैं। भगवद-भक्ति की स्थापना तथा प्रचार के लिए ही इनका आविर्भाव हुआ है।
भक्ति का प्रसार करते हुए वे अप्रत्यक्ष रूप से भक्तों का सहयोग करते रहते हैं। ये भगवान् के विशेष कृपापात्र और लीला-सहचर हैं। जब-जब भगवान का आविर्भाव होता है, ये उनकी लीला के लिए भूमिका तैयार करते हैं। लीलापयोगी उपकरणों का संग्रह करते हैं और अन्य प्रकार की सहायता करते हैं इनका जीवन मंगल के लिए ही है।
देवर्षि नारद, व्यास, बाल्मीकि तथा महाज्ञानी शुकदेव आदि के गुरु हैं। श्रीमद्भागवत, जो भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य का परमोपदेशक ग्रंथ-रत्न है तथा रामायण, जो मर्यादा-पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पावन, आदर्श चरित्र से परिपूर्ण है, देवर्षि नारदजी की कृपा से ही हमें प्राप्त हो सकें हैं। इन्होंने ही प्रह्लाद, ध्रुव, राजा अम्बरीष आदि महान भक्तों को भक्ति मार्ग में प्रवृत्त किया। ये भागवत धर्म के परम-गूढ़ रहस्य को जानने वाले- ब्रह्मा, शंकर, सनत्कुमार, महर्षि कपिल, स्वायम्भुव मनु आदि बारह आचार्यों में अन्यतम हैं। देवर्षि नारद द्वारा विरचित 'भक्तिसूत्र' बहुत महत्वपूर्ण है। नारदजी को अपनी विभूति बताते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण श्रीमद् भागवत् गीता के दशम अध्याय में कहते हैं- अश्वत्थ: सर्ववूक्षाणां देवर्षीणां च नारद:।
नारद के भक्तिसूत्र के अलावा
नारद-महापुराण,
बृहन्नारदीय उपपुराण-संहिता-(स्मृतिग्रंथ),
नारद-परिव्राज कोपनिषद नारदीय-शिक्षा के साथ ही अनेक स्तोत्र भी उपलब्ध होते हैं। देविर्षि नारद के सभी उपदेशों का निचोड़ है- सर्वदा सर्वभावेन निश्चिन्तितै: भगवानेव भजनीय:।
अर्थात सर्वदा सर्वभाव से निश्चित होकर केवल भगवान का ही ध्यान करना चाहिए।

देवर्षि नारद भगवान के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। ये भगवान की भक्ति और माहात्म्य के विस्तार के लिये अपनी वीणा की मधुर तान पर भगवद्गुणों का गान करते हुए निरन्तर विचरण किया करते हैं। इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इनके द्वारा प्रणीत भक्तिसूत्र में भक्ति की बड़ी ही सुन्दर व्याख्या है। अब भी ये अप्रत्यक्षरूप से भक्तों की सहायता करते रहते हैं। भक्त प्रह्लाद, भक्त अम्बरीष, ध्रुव आदि भक्तों को उपदेश देकर इन्होंने ही भक्तिमार्ग में प्रवृत्त किया। इनकी समस्त लोकों में अबाधित गति है। इनका मंगलमय जीवन संसार के मंगल के लिये ही है। ये ज्ञान के स्वरूप, विद्या के भण्डार, आनन्द के सागर तथा सब भूतों के अकारण प्रेमी और विश्व के सहज हितकारी हैं।
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गत वर्ष का आयोजन 

नारद जयन्ती पर विश्व संवाद केन्द्र द्वारा सम्मानित किये गये पत्रकार     

लखनऊ। लोक मंगल की कामना से जन-जन में अपनी संवाद शैली एवं सम्पर्क कला से अलख जगाने वाले आचार्य देवर्षि नारद के बारे में शायद ही कोई ऐसा हो, जो न जानता हो। सत्य की विजय तथा असत्य, अधर्म के विनाष के लिए संचार करने वाले महात्मा नारद जी की जयन्ती ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया के दिन मनायी जाती है। देवर्षि नारद ही हमारे वह पूर्वज हैं जिन्होंने विश्व में सर्वप्रथम पत्रकारिता की नीव डाली। यह सारी बाते आज विश्व संवाद केन्द्र द्वारा आयोजित सम्मान समारोह के दौरान तमाम वरिष्ठ पत्रकारों ने कहीं। इस दौरान विश्व संवाद केन्द्र लखनऊ की ओर से स्वतंत्र भारत के पूर्व सम्पादक नन्द किशोर श्रीवास्तव, ए.एन.आई. की उ.प्र. ब्यूरो प्रमुख कामना हजेला, दैनिक जागरण के राज्य ब्यूरो प्रमुख नदीम, दैनिक जागरण के छायाकार संदीप रस्तोगी का सम्मान अंगवस्त्रम्, देवर्षि नारद की प्रतिमा तथा प्रमाण पत्र प्रदान करके किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डा. रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि ‘‘आज के पत्रकार को देखना है तो नारद को देखिए और नारद के रूप में आज के पत्रकार को देखिये’’। अगले चरण में वीर विक्रम बहादुर जी ने कहा कि‘‘ नारद सर्वेश्वर एवं सत्ता के बीच की कड़ी है पर आज की पत्रकारिता इस मार्ग से भटक गयी है आज की पत्रकारिता सर्वेश्वर के पास कभी नहीं जाती है। नारद जी एकबार भी लंका नहीं गये वे जब भी गये क्षीरसागर को ही गये। महन्त देवी पाटन शक्तिपीठ मन्दिर श्री कौशलेन्द्र नाथ योगी जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि‘‘ मानवता की भावनाओं को पनपाने का जो अभियान चलाते है वह वेद वक्ताओं के सम्वाददाता थे। उनके व्यक्तित्व व चरित्र के विषय में शब्दों में उल्लेख नहीं किया जा सकता है। उनका व्यक्तित्व राष्ट्रवादी, कल्याणकारी, लोक मंगलकारी रहने की प्रेरणा देता है लेकिन आज इन सबका ह्रास हो रहा है’’।
कार्यक्रम में प्रमुख रुप से विश्व संवाद केन्द्र के राम निवास जैन, प्रो. एस. के द्विवेदी, पंकज अग्रवाल, बाबू लाल शर्मा, उ.प्र. जर्नलिस्ट एशोसिएशन के महामंत्री सर्वेश सिंह, उ.प्र. होम्योपैथी के डायरेक्टर डा. बी.एन. सिंह, डा. हृदयेश विहारी, जनविकास सेवा समिति के सचिव मनोज ‘मौन’, संघ के विभागकार्यवाह प्रशान्त भाटिया, प्रान्त के सहसंघचालक प्रभुनारायण श्रीवास्तव, हृदय नारायण श्रीवास्तव, अमर उजाला, लखनऊ जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान के निदेशक अशोक सिन्हा, पत्र लेखक मंच के डा. राज कुमार साहू, मृत्युन्ज्य दीक्षित, जन सन्देश के भारत सिंह, जागरण के सुभाष सिंह, लखनऊ विश्वविद्यालय पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ आर.सी. त्रिपाठी सहित पत्रकारिता जगत के तमाम लोगउपस्थित रहे।
संवाददाता/लेखक अतुल मोहन समदर्शी युवा पत्रकार एवं दैनिक जनकदम के लखनऊ स्थित प्रशासनिक कार्यालय में समाचार संपादक हैं। Posted on- 21/05/11

1 टिप्पणी:

  1. aaj aap ka netportal arvindsisodiakota.blogspot.in dekh kar man bahut prashann hai. aapko bahut bahut badhaee. santosh gangele

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