गुरुवार, 28 जून 2012

एक और पाकिस्तान






कश्‍मीर के वार्ताकार बनवाएंगे एक और पाकिस्तान
जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के दायरे से बाहर करने (1952) तुष्टीकरण की प्रतीक और अलगाववाद की जनक अस्थाई धारा 370 को विशेष कहने, भारतीय सुरक्षा बलों की वफादारी पर प्रश्नचिन्ह लगाने, पाकिस्तान को कश्मीर मुद्दे पर एक पक्ष बनाने, पाक अधिकृत कश्मीर को पाक प्रशासित मानने और प्रदेश के 80 प्रतिशत देशभक्त नागरिकों की अनदेखी करके मात्र 20 प्रतिशत पृथकतावादियों की ख्वाइशों/ जज्बातों की कदर करने जैसी सिफारिशें किसी देशद्रोह से कम नहीं हैं।

लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त वार्ताकारों ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए एक रपट तैयार की है। यदि मुस्लिम तुष्टीकरण में डूबी सरकार ने उसे मान लिया तो देश के दूसरे विभाजन की नींव तैयार हो जाएगी। यह रपट जम्मू-कश्मीर की अस्सी प्रतिशत जनसंख्या की इच्छाओं, जरूरतों की अनदेखी करके मात्र बीस प्रतिशत संदिग्ध लोगों की भारत विरोधी मांगों के आधार पर बनाई गई है। तथाकथित प्रगतिशील वार्ताकारों द्वारा प्रस्तुत यह रपट स्वतंत्र कश्मीर राष्ट्र का रोड मैप है।

रपट का आधार अलगाववाद

1952-53 में जम्मू केन्द्रित देशव्यापी प्रजा परिषद महाआंदोलन के झंडे तले डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने के लिए अपना बलिदान देकर जो जमीन तैयार की थी उसी जमीन को बंजर बनाने के लिए अलगाववादी मनोवृत्ति वाले वार्ताकारों ने यह रपट लिख दी है। इस रपट के माध्यम से भारत के राष्ट्रपति, संसद, संविधान, राष्ट्र ध्वज, सेना के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिए गए हैं। देश के संवैधानिक संघीय ढांचे अर्थात एक विधान, एक निशान और एक प्रधान की मूल भावना को चुनौती दी गई है।

आईएसआई के एक एजेंट गुलाम नबी फाई के हमदर्द दोस्त दिलीप पडगांवकर, वामपंथी चिंतक एम. एम. अंसारी और मैकाले परंपरा की शिक्षाविद् राधा कुमार ने अपनी रपट में जो सिफारिशें की हैं वे सभी कश्मीर केन्द्रित राजनीतिक दलों, अलगाववादी संगठनों, आतंकी गुटों और कट्टरपंथी मजहबी जमातों द्वारा पिछले 64 वर्षों से उठाई जा रहीं भारत विरोधी मांगें और सरकार, सेना विरोधी लगाए जा रहे नारे हैं। स्वायत्तता, स्वशासन, आजादी, पाकिस्तान में विलय, भारतीय सेना की वापसी, सुरक्षा बलों के विशेषाधिकारों की समाप्ति, जेलों में बंद आतंकियों की रिहाई, पाकिस्तान गए कश्मीरी आतंकी युवकों की घर वापसी, अनियंत्रित नियंत्रण रेखा और जम्मू-कश्मीर एक विवादित राज्य इत्यादि सभी अलगाववादी जज्बातों, ख्वाइशों को इस रपट का आधार बनाया गया है।

तुष्टीकरण की पराकाष्ठा

रपट के अनुसार एक संवैधानिक समिति का गठन होगा जो 1953 के पहले की स्थिति बहाल करेगी। 1952 के बाद भारतीय संसद द्वारा बनाए गए एवं जम्मू-कश्मीर में लागू सभी कानूनों को वापस लिया जाएगा जो धारा 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को दी गई स्वायत्तता का हनन करते हैं। इस सीमावर्ती प्रदेश के विशेष दर्जे को स्थाई बनाए रखने के लिए धारा 370 के साथ जुड़े अस्थाई शब्द को विशेष शब्द में बदल दिया जाएगा, ताकि स्वायत्तता कायम रह सके।

रपट में स्पष्ट कहा गया है कि प्रदेश में तैनात भारतीय सेना और अर्द्धसैनिक बलों की टुकडि़यां कम की जाएं और उनके विशेषाधिकारों को समाप्त किया जाए। वार्ताकार कहते हैं कि राज्य सरकार के मनपसंद का राज्यपाल प्रदेश में होना चाहिए। जम्मू-कश्मीर में कार्यरत अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की संख्या पहले घटाई जाए और बाद में समाप्त कर दी जाए। जिन्होंने पहली बार अपराध किया है उनके केस (एफ आई आर) रद्द किए जाएं। अर्थात् एक-दो विस्फोट माफ हों, भले ही उनमें सौ से ज्यादा बेगुनाह मारे गए हों।

पाकिस्तान का समर्थन

रपट की यह भी एक सिफारिश है कि कश्मीर से संबंधित किसी भी बातचीत में पाकिस्तान, आतंकी कमांडरों और अलगाववादी नेताओं को भी शामिल किया जाए। रपट में पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) को पाक प्रशासित जम्मू-कश्मीर (पीएजेके) कहा गया है। वार्ताकारों के अनुसार कश्मीर विषय में पाकिस्तान भी एक पार्टी है और पाकिस्तान ने दो तिहाई कश्मीर पर जबरन अधिकार नहीं किया, बल्कि पाकिस्तान का वहां शासन है, जो वास्तविकता है।

ध्यान से देखें तो स्पष्ट होगा कि वार्ताकारों ने पूरे जम्मू-कश्मीर को आजाद मुल्क की मान्यता दे दी है। इसी मान्यता के मद्देनजर रपट में कहा गया है कि पीएजेके समेत पूरे जम्मू-कश्मीर को एक इकाई माना जाए। इसी एक सिफारिश में सारे के सारे जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले करने के खतरनाक इरादे की गंध आती है। पाकिस्तान के जबरन कब्जे वाले कश्मीर को पाक प्रशासित जम्मू-कश्मीर मानकर वार्ताकारों ने भारतीय संसद के उस सर्वसम्मत प्रस्ताव को भी अमान्य कर दिया है जिसमें कहा गया था कि सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न भाग है। 1994 में पारित इस प्रस्ताव में पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेने का संकल्प भी दुहराया गया था।

राष्ट्रद्रोह की झलक

कश्मीर विषय पर पाकिस्तान को भी एक पक्ष मानकर वार्ताकारों ने जहां जम्मू-कश्मीर में सक्रिय देशद्रोही अलगाववादियों के आगे घुटने टेके हैं, वहीं उन्होंने पाकिस्तान द्वारा कश्मीर को हड़पने के लिए 1947, 1965, 1972 और 1999 में भारत पर किए गए हमलों को भी भुलाकर पाकिस्तान के सब गुनाह माफ कर दिए हैं। भारत विभाजन की वस्तुस्थिति से पूर्णतया अनभिज्ञ इन तीनों वार्ताकारों ने महाराजा हरिसिंह द्वारा 26 अक्तूबर, 1947 को सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर का भारत में किया गया विलय, शेख अब्दुल्ला के देशद्रोह को विफल करने वाला प्रजा परिषद् का आंदोलन, 1972 में हुआ भारत-पाक शिमला समझौता, 1975 में हुआ इन्दिरा-शेख समझौता और 1994 में पारित भारतीय संसद का प्रस्ताव इत्यादि सब कुछ ठुकराकर जो रपट पेश की है वह राष्ट्रद्रोह का जीता-जागता दस्तावेज है।

केन्द्र सरकार के इशारे और सहायता से लिख दी गई 123 पृष्ठों की इस रपट में केवल अलगाववादियों की मंशा, केन्द्र सरकार का एकतरफा दृष्टिकोण और पाकिस्तान के जन्मजात इरादों की चिंता की गई है। जो लोग भारत के राष्ट्र ध्वज को जलाते हैं, संविधान फाड़ते हैं और सुरक्षा बलों पर हमला करते हैं, उनकी जी-हुजूरी की गई है। यह रपट उन लोगों का घोर अपमान है, जो आज तक राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को थामकर भारत माता की जय के उद्घोष करते हुए जम्मू-कश्मीर के लिए जूझते रहे, मरते रहे।

कांग्रेस और एनसी की मिलीभगत

वार्ताकारों ने जम्मू-कश्मीर की आम जनता के अनेक प्रतिनिधिमंडलों से वार्ता करने का नाटक तो जरूर किया है, परंतु महत्व उन्हीं लोगों को दिया है जो भारत के संविधान की सौगंध खाकर सत्ता पर काबिज हैं (कांग्रेस के समर्थन से) और भारत के संविधान और संसद को ही धता बताकर स्वायत्तता की पुरजोर मांग कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अनेक बार अपने दल नेशनल कांफ्रेंस (एन.सी.) के राजनीतिक एजेंडे श्पूर्ण स्वायत्तता की मांग की है। स्वायत्तता अर्थात् 1953 के पूर्व की राजनीतिक एवं संवैधानिक व्यवस्था। इस रपट से पता चलता है कि इसे केन्द्र की कांग्रेसी सरकार, नेशनल कांफ्रेंस, आईएसआई के एजेंटों और तीनों वार्ताकारों की मिलीभगत से घढ़ा गया है।

अगर यह मिलीभगत न होती तो जम्मू-कश्मीर की 80 प्रतिशत भारत-भक्त जनता की जरूरतों और अधिकारों को नजरअंदाज न किया जाता। देश विभाजन के समय पाकिस्तान, पीओके से आए लाखों लोगों की नागरिकता का लटकता मुद्दा, तीन- चार युद्धों में शरणार्थी बने सीमांत क्षेत्रों के देशभक्त नागरिकों का पुनर्वास, जम्मू और लद्दाख के लोगों के साथ हो रहा घोर पक्षपात, उनके राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक अधिकारों का हनन, पूरे प्रदेश में व्याप्त आतंकवाद, कश्मीर घाटी से उजाड़ दिए गए चार लाख कश्मीरी हिन्दुओं की सम्मानजनक एवं सुरक्षित घरवापसी और प्रांत के लोगों की अनेकविध जातिगत कठिनाइयां इत्यादि किसी भी समस्या का समाधान नहीं बताया इन सरकारी वार्ताकारों ने।

फसाद की जड़ धारा 370

इसे देश और जनता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पिछले छह दशकों के अनुभवों के बावजूद भी अधिकांश राजनीतिक दलों को अभी तक यही समझ में नहीं आया कि एक विशेष मजहबी समूह के बहुमत के आगे झुककर जम्मू-कश्मीर को धारा 370 के तहत दिया गया विशेष दर्जा और अपना अलग प्रांतीय संविधान ही वास्तव में कश्मीर की वर्तमान समस्या की जड़ है। संविधान की इसी अस्थाई धारा 370 को वार्ताकारों ने अब विशेष धारा बनाकर जम्मू-कश्मीर को पूर्ण स्वायत्तता देने की सिफारिश की है। क्या यह भारत द्वारा मान्य चार सिद्धांतों, राजनीतिक व्यवस्थाओं-पंथ निरपेक्षता, एक राष्ट्रीयता, संघीय ढांचा और लोकतंत्र का उल्लंघन एवं अपमान नहीं है?

यह एक सच्चाई है कि भारतीय संविधान की धारा 370 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर के अलग संविधान ने कश्मीर घाटी के अधिकांश मुस्लिम युवकों को भारत की मुख्य राष्ट्रीय धारा से जुड़ने नहीं दिया। प्रादेशिक संविधान की आड़ लेकर जम्मू-कश्मीर के सभी कट्टरपंथी दल और कश्मीर केन्द्रित सरकारें भारत सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय महत्व के प्रकल्पों और योजनाओं को स्वीकार नहीं करते। भारत की संसद में पारित पूजा स्थल विधेयक, दल बदल कानून और सरकारी जन्म नियंत्रण कानून को जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं किया जा सकता।

देशघातक और अव्यवहारिक सिफारिश

सरकारी वार्ताकारों ने आतंकग्रस्त प्रदेश से सेना की वापसी और अर्धसैनिक सुरक्षा बलों के उन विशेषाधिकारों को समाप्त करने की सिफारिश की है जिनके बिना आधुनिक हथियारों से सुसज्जित प्रशिक्षित आतंकियों का न तो सफाया किया जा सकता है और न ही सामना। आतंकी अड्डों पर छापा मारने, गोली चलाने एवं आतंकियों को गिरफ्तार करने के लिए सामूहिक कार्रवाई के अधिकारों के बिना सुरक्षा बल स्थानीय पुलिस के अधीन हो जाएंगे जिसमें पाक समर्थक तत्वों की भरमार है। वैसे भी जम्मू-कश्मीर पुलिस इतनी सक्षम और प्रशिक्षित नहीं है जो पाकिस्तानी घुसपैठियों से निपट सके।

अलगाववादी, आतंकी संगठन तो चाहते हैं कि भारतीय सुरक्षा बलों को कानून के तहत इतना निर्बल बना दिया जाए कि वे मुजाहिद्दीनों (स्वतंत्रता सेनानियों) के आगे एक तरह से समर्पण कर दें। विशेषाधिकारों की समाप्ति पर आतंकियों के साथ लड़ते हुए शहीद होने वाले सुरक्षा जवान के परिवार को उस आर्थिक मदद से भी वंचित होना पड़ेगा जो सीमा पर युद्ध के समय शहीद होने वाले सैनिक को मिलती है।

क्या आजाद मुल्क बनेगा कश्मीर?

1953 से पूर्व की राज्य व्यवस्था की सिफारिश करना तो सीधे तौर पर देशद्रोह की श्रेणी में आता है। इस तरह की मांग, सिफारिश का अर्थ है कश्मीर में भारतीय प्रभुसत्ता को चुनौती देना, देश के किसी प्रदेश को भारतीय संघ से तोड़ने का प्रयास करना और भारत के राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय गान, संविधान एवं संसद का विरोध करना। सर्वविदित है कि 1953 से लेकर आज तक भारत सरकार ने अनेक संवैधानिक संशोधनों द्वारा जम्मू-कश्मीर को भारत के साथ जोड़कर ढेरों राजनीतिक एवं आर्थिक सुविधाएं दी हैं। जम्मू-कश्मीर के लोगों द्वारा चुनी गई संविधान सभा ने 14 फरवरी, 1954 को प्रदेश के भारत में विलय पर अपनी स्वीकृति दे दी थी। 1956 में भारत की केन्द्रीय सत्ता ने संविधान में सातवां संशोधन करके जम्मू-कश्मीर को देश का अभिन्न हिस्सा बना लिया।

इसी तरह 1960 में जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय को भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में लाया गया। 1964 में प्रदेश में लागू भारतीय संविधान की धाराओं 356-357 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की संवैधानिक व्यवस्था की गई। 1952 की संवैधानिक व्यवस्था में पहुंचकर जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान के जबड़े में फंस जाएगा। पाक प्रेरित अलगाववादी संगठन यही तो चाहते हैं। तब यदि राष्ट्रपति शासन, भारतीय सुरक्षा बल और सर्वोच्च न्यायालय की जरूरत पड़ी तो क्या होगा? क्या जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले कर देंगे?

भारत की अखण्डता से खिलवाड़

पाकिस्तान का अघोषित युद्ध जारी है। वह कभी भी घोषित युद्ध में बदल सकता है। जम्मू-कश्मीर सरकार अनियंत्रित होगी। हमारी फौज किसके सहारे लड़ेगी। जब वहां की स्वायत्त सरकार, सारी राज्य व्यवस्था, न्यायालय सब कुछ भारत सरकार के नियंत्रण से बाहर होंगे तो उन्हें भारत के विरोध में खड़ा होने से कौन रोकेगा? अच्छा यही होगा कि भारत की सरकार इन तथाकथित प्रगतिशील वार्ताकारों के भ्रमजाल में फंसकर जम्मू-कश्मीर सहित सारे देश की सुरक्षा एवं अखंडता के साथ खिलवाड़ न करे।

कश्मीर घाटी से हिन्दू संहारक अफगान शासन को उखाड़ फेंकने में सफल हुआ एक हिन्दू नेता पंडित बीरबल धर






गौरवशाली इतिहास-9
कश्मीर घाटी से हिन्दू संहारक अफगान शासन को उखाड़ फेंकने में सफल हुआ एक हिन्दू नेता
 पंडित बीरबल धर -नरेन्द्र सहगल
तारीख: 6/23/2012
कश्मीर प्रदेश की अंतिम हिन्दू साम्राज्ञी कोटा रानी के आत्म बलिदान के पश्चात् सत्ता पर काबिज हुए प्रथम मुस्लिम शासक शाहमीर के राज्यकाल से प्रारंभ हुआ बलात् मतान्तरण का सिलसिला अंतिम सुल्तान सूबेदार आजम खान के राज्य तक निरंतर 500 वर्षों तक अबाध गति से चलता रहा। पूर्व का हिन्दू कश्मीर अब तलवार के जोर से मुस्लिम कश्मीर में बदल दिया गया। इस कालखंड में हिन्दू समाज और संस्कृति को समाप्त करने के लिए सभी प्रकार के घृणित एवं नृशंस उपायों का इस्तेमाल किया गया। क्रूरतम और अमानवीय हथकंडों के बावजूद ये विधर्मी विदेशी शासक कश्मीर के मूल समाज को पूर्णतया समाप्त नहीं कर सके। कश्मीर के हिन्दू समाज ने लगातार पांच सौ वर्षों तक बलिदानों की अद्भुत परंपरा को बनाए रखते हुए भारतीय जीवन मूल्यों की रक्षा की।
हिन्दू रक्षा का संकल्प
सूबेदार आजम खान के कालखंड में भी कश्मीर के संभ्रांत पंडितों ने कश्मीर एवं हिन्दू समाज को बचाने का निर्णय किया। किसी भी ढंग से अपने देश और समाज को बचाने के पवित्र राष्ट्रीय उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण गुप्त बैठक का आयोजन किया गया। इस समय पड़ोसी राज्य पंजाब में एक शक्तिशाली सिख महाराजा रणजीत सिंह का राज्य था। पंडित नेताओं ने गहरे विचार-विमर्श के बाद महाराजा रणजीत सिंह से वार्तालाप करने और सैनिक सहायता प्राप्त करने का फैसला किया। राजनीतिक दृष्टि से चतुर हिन्दू नेता पंडित बीरबल धर को यह कार्य सम्पन्न करने की जिम्मेदारी सौंपी गई।
इस योजना की कुछ धुंधली सी जानकारी किसी तरीके से सूबेदार को मिल गई। उसने तुरंत अपने एक विश्वस्त हिन्दू नेता मिर्जा पंडित को बुलाकर पूछताछ की। परंतु मिर्जा पंडित ने अत्यंत चतुराई से काम लेकर सूबेदार को शांत कर दिया। उस समय तक पंडित बीरबल धर अपने युवा बेटे राजा काक के साथ अपने ध्येय की पूर्ति हेतु घर से निकल चुका था। महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में पहुंचना उसका उद्देश्य था। उस समय पंजाब की राजधानी लाहौर थी।
देशभक्त मुसलमानों का योगदान
श्रीनगर से थोड़ी दूर देवसर नामक स्थान पर थोड़ी देर रुककर दोनों पिता पुत्र आगे की यात्रा पर निकले। स्थानीय मुस्लिम समाज की सहायता से दोनों पीर पंजाल पर्वत को पार करने में सफल हो गए। इस राष्ट्रीय कार्य के लिए स्थानीय मुस्लिम बंधुओं ने सहायता करके अपने राष्ट्रीय कर्तव्य को निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इन देशभक्त मुसलमानों का नाम भी कश्मीर के इतिहास में उज्ज्वल है।
पंडित बीरबल और उसके पुत्र का इस प्रकार सूबेदार को चकमा देकर सुरक्षित निकल जाना और वह भी स्थानीय मुसलमानों की मदद से, यह बात सूबेदार और उसके दरबारियों के कलेजे पर सांप की तरह लोटने लगी। समाचार प्राप्त होते ही सूबेदार ने चारों ओर अपने सैनिक छोड़ दिए। उन्होंने बीरबल धर और उसके पुत्र काक को पकड़ने के लिए प्रदेश का कोना-कोना छान मारा। परंतु तीर धनुष से छूट चुका था।
वीर पत्नी की देशभक्ति
सूबेदार आजम खान पागलों की तरह छटपटाने लगा। उसने हिन्दुओं और मतान्तरित मुसलमानों पर जुल्मों की चक्की चला दी। जिसने भी विरोध किया, तलवार की भेंट चढ़ा दिया गया। इस एकतरफा विनाशलीला से जब वह थक गया तो उसने पंडित बीरबल धर के परिवार की स्त्रियों को जबरदस्ती पकड़कर उसके हरम में लाने का आदेश अपने सैनिकों को दिया। परंतु यहां भी उसको मुंह की खानी पड़ी। कुछ हिन्दुओं ने अपनी चतुराई से उनके घर की स्त्रियों के सम्मान को आजम खान की हवस का शिकार होने से बचा लिया। सूबेदार हाथ मलता रह गया।
पंडित बीरबल ने घर से निकलने से पूर्व अपनी पत्नी से भेंट की। पत्नी ने सहर्ष पति को राष्ट्र पथ पर बढ़ने की प्रेरणा और अश्रुपूर्ण मौन स्वीकृति दे दी। इस वीर पत्नी ने स्वयं सब प्रकार के कष्ट सह लेने परंतु कर्तव्य से विमुख न होने का आश्वासन अपने राष्ट्रसेवी पति को दिया। उसने अपने पति के हाथ को अपने हाथ में लेकर भीष्म प्रतिज्ञा की कि वह किसी भी विधर्मी को अपने शरीर को छूने से पहले अपने प्राण त्यागने में संकोच नहीं करेगी। राष्ट्रीय कार्य के लिए जाते हुए पति के समक्ष पत्नी द्वारा भी समय आने पर आत्मबलिदान का निश्चय किया गया। कितना भावुक और प्रेरणास्पद  रहा होगा वह ऐतिहासिक क्षण।
फिर सामने आया देशद्रोह
पास ही खड़े युवा बेटे काक ने भी मां के चरण छूकर आशीर्वाद मांगा। मां ने बेटे को सीने से लगा लिया। उसने मालूम था कि बेटे के साथ भी उसका यह अंतिम मिलन है। वीर माता ने वीर पुत्र की अंगुली वीर पिता के हाथ में थमा दी। जाने से पूर्व पंडित बीरबल ने अपने परिवार की सुरक्षा की जिम्मेदारी अपने एक विश्वस्त मुसलमान मित्र कादिस खान को सौंप दी। दोनों महिलाएं सास और बहू (बेटे काक की पत्नी) कादिस खान के घर चली गईं।
सूबेदार आजम खान ने इन दोनों महिलाओं को ढूंढने में साम दाम दंड भेद का सब नीतियों का इस्तेमाल करके देख लिया, परंतु कुछ भी हाथ न लगा। कादिस खान ने भी इनकी रक्षा करने में पूरी बुद्धि और शक्ति झोंक दी। परंतु भाग्य ने साथ नहीं दिया। कादिस खान के एक नजदीकी दोस्त की स्वार्थलिप्सा और अराष्ट्रीय मनोवृत्ति के कारण यह खबर सूबेदार तक पहुंच गई। सूबेदार के आदेश से कादिस के घर को घेर लिया गया। कादिस ने पूरी ताकत के साथ दोनों स्त्रियों को छिपाने और बचाने की कोशिश की। परंतु लड़ते-लड़ते शहीद हो गया। सास-बहू को गिरफ्तार कर लिया गया।
सास-बहू का बलिदान
जब सूबेदार आजम खान के सैनिक पंडित बीरबल की पत्नी और युवा बहू को ले जा रहे थे, तो रास्ते में मौका देखकर सास ने अपनी हीरे की अंगूठी निगलकर अपने पेट में उतार ली। परंतु बहू ऐसा न कर सकी। इन दोनों को जब सूबेदार के सामने उपस्थित किया गया तो पंडित बीरबल की पत्नी ने नफरत भरी निगाहों से आजम खान को देखा और शेरनी की तरह दहाड़ते हुए कहा कि 'मेरा पति और बेटा महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में पहुंच चुके हैं। शीघ्र ही विधर्मी और नीच शासकों द्वारा कश्मीर के हिन्दुओं पर ढाए जा रहे अत्याचारों का अंत होगा और अफगान शासन भी तबाह होगा।' उसकी यह बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि उसकी मृत्यु हो गई।
इस तरह बीरबल पंडित की पत्नी द्वारा आत्मबलिदान देने के बाद उसकी बहू को जालिमों ने एक अफगान सूबेदार के साथ काबुल भेज दिया। वहां उसके साथ मजहबी उन्मादियों ने क्या किया होगा इसकी कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
दो सभ्यताओं में अंतर
कितना अंतर है दोनों सभ्यताओं और जीवन मूल्यों में। सर्वविदित है कि जब मराठा सैनिकों ने कल्याण (पुणे के पास) के मुस्लिम सूबेदार को एक युद्ध में पराजित कर दिया तो सूबेदार का तोपखाना और महिलाओं का हरम मराठा सैनिकों के हाथ लगा। मराठा सैनिकों ने सूबेदार की जवान बेटी को लाकर छत्रपति शिवाजी महाराज के समक्ष उपस्थित कर दिया।
शिवाजी ने अपने सैनिकों को डांटा और भविष्य में फिर कभी ऐसा घृणित कार्य न करने की आज्ञा दी। फिर शिवाजी ने सूबेदार की बेटी को मां जैसा सम्मान देकर उसे स्वर्ण आभूषण देकर सुरक्षित सूबेदार के पास भिजवा दिया। बस यही अंतर है दोनों सभ्यताओं में।
रणजीत सिंह ने बदला इतिहास
उधर पंडित बीरवल धर और उसका युवा पुत्र राजा काक जम्मू के महाराजा गुलाब सिंह के दरबार में पहुंचने में सफल हो गए। राजा गुलाब सिंह ने महाराजा रणजीत सिंह के प्रधानमंत्री राजा ध्यान सिंह के नाम एक परिचय पत्र देकर उन्हें लाहौर भेजने की व्यवस्था कर दी। लाहौर पहुंचने पर राजा ध्यान सिंह ने प्रयासपूर्वक इन्हें महाराजा रणजीत सिंह से मिलवा दिया। पंडित बीरबल ने सारी व्यथा महाराजा को सुना दी।
महाराजा रणजीत सिंह ने सारी बात ध्यान से सुनी। उन्हें लगा कि इस समय कश्मीर में हिन्दुओं की समस्या को राष्ट्रीय संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वे एक सच्चे सिख थे। महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी शरण में आए कश्मीरी पंडितों की रक्षा करने का निश्चय किया। इस महापुरुष ने अफगानी शासन को शक्ति के साथ जड़मूल से समाप्त करके कश्मीर प्रदेश और वहां के हिन्दुओं की रक्षा करने का सीधा फैसला कर लिया। महाराजा ने अपनी विशाल सिख सेना को कश्मीर की ओर कूच करने के आदेश दे दिए।
अत्याचारी शासन समाप्त
महाराजा रणजीत सिंह ने अपने पांच सर्वश्रेष्ठ वीर सेनाधिकारियों के साथ पचास हजार चुने हुए सैनिकों को पंडित बीरबल के मार्गदर्शन में भेजा। पंडित बीरबल धर ने बाकायदा सैन्याधिकारियों के साथ रहकर उन्हें पूरी भौगोलिक जानकारी दी। इस समाचार को सुनते ही कश्मीर का शासक सूबेदार आजम खान काबुल भाग गया। उसके बेटे जबर खान ने शासन संभाला। ठीक इसी समय रणजीत सिंह की सेना ने धावा बोल दिया।
जम्मू के राजा गुलाब सिंह, लाहौर के हरिसिंह नलवा, फिरोजपुर के ज्वाला सिंह, अमृतसर के हुकुम सिंह और अटारी के श्याम सिंह इत्यादि सेनापतियों ने अपनी पूरी शक्ति से जबर खान की सेना के पांव उखाड़ दिए। जबर खान भी अपने बाप की तरह दुम दबाकर भाग गया। सिख सेना की विजय हुयी। 20 जून 1819 ई.को पंडित बीरबल ने सिख फौज के साथ श्रीनगर में प्रवेश किया।
पंडित बीरबल अगर चाहते तो अपनी विजय के बाद बदला ले सकते थे। पांच सौ वर्षों में बर्बाद कर दिए गए मठ, मंदिरों, जला दिए गए शिक्षा केन्द्रों और अपनी पत्नी और बहू सहित लाखों हिन्दू महिलाओं के अपमान का बदला मस्जिदों, मकबरों और मुस्लिम समाज से ले सकते थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे हिन्दुओं को वापस अपने धर्म में लाकर राष्ट्रवाद का धरातल भी तैयार कर सकते थे, परंतु ऐसा भी नहीं किया गया।
फिर लौट आया वैभव काल
महाराजा रणजीत सिंह की कश्मीर विजय के बाद कश्मीर पर सत्ताईस वर्ष तक उनका आधिपत्य रहा। इस कालखंड में कश्मीर में दस गवर्नर नियुक्त किए गए। शासन की नीतियां उदार थीं। हिन्दुओं पर जुल्मों का दमनचक्र पूर्णतया थम गया। मुस्लिम जागीरदार जो हिन्दुओं पर एकतरफा अत्याचार करते थे, सभी काबुल भाग गए। हिन्दू स्त्रियां अब सम्मान एवं स्वतंत्रता-पूर्वक कश्मीर घाटी में आने जाने लगीं। मंदिरों में आरती वंदन के स्वर फिर गूंजने लगे। ऐसा आभास होने लगा कि वैभवकाल पुन: लौट आया है। परंतु इस वैभव को स्थाई बनाने के लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को पुनर्जीवित करने के ठोस प्रयास नहीं हुए। बस अल्पकाल के लिए कहीं छिप गया विधर्मी कट्टरवाद।
ऐतिहासिक मापदंड, राजनीतिक चातुर्य और भविष्य के लिए विदेशी ताकतों को खबरदार करने की दृष्टि से पंडित बीरबल को शठे शाठ्यं समाचरेत की नीति पर चलते हुए कश्मीर की धरती से विदेशी आक्रांताओं और उनके सभी चिन्हों तक को पूर्णतया समाप्त करना चाहिए था या नहीं, इस बात को आज की कश्मीर समस्या के संदर्भ में सोचना अत्यंत जरूरी है। आखिर हिन्दुओं की उदारता कब तक अपने भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर पड़ने वाली चोटों को बर्दाश्त करती रहेगी?

मंगलवार, 26 जून 2012

मायावती : सत्ता दुरउपयोग : 86 करोड़ रुपए से रिनोवेटेड बंगला, एक-एक खिड़की 15 लाख की


ये है मायावती का 86 करोड़ रुपए से रिनोवेटेड बंगला, एक-एक खिड़की 15 लाख की


मायावती: गरीब और दलितों के नाम पर वोट बटोरने वाली इस महिला ने भी सत्ता के दुरउपयोग में कोई कसर नहीं छोडी, रहने के बंगले पर किया गया खर्चा मुह आश्चर्य से खुला रखने के लिये पर्याप्त है।

ये है मायावती का 86 करोड़ रुपए से रिनोवेटेड बंगला,
एक-एक खिड़की 15 लाख की
प्रकाशन तरीख : 09-May-2012 21:07:18 स्त्रोत: एजेंसी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने राजधानी लखनउच्च् के 13 माल एवेन्यू स्थित अपने बंगले की मरम्मत के लिये राजकोष से 86 करोड़ रुपए से ज्यादा की धनराशि खर्च की है। राज्य के मौजूदा काबीना मंत्री शिवपाल सिंह यादव द्वारा सूचना का अधिकार :आरटीआई: के तहत मांगी गयी जानकारी में इस बात का खुलासा हुआ है।
सूत्रों ने आज यहां बताया कि शिवपाल सिंह यादव ने मायावती के पूर्ववर्ती शासनकाल में नेता प्रतिपक्ष की हैसियत से दाखिल आरटीआई अर्जी में मायावती द्वारा अपने बंगले के लिये सरकारी धन खर्च किये जाने सम्बन्धी जानकारी मांगी थी। अब इस बारे में जाहिर की गयी जानकारी में खुलासा हुआ है कि मायावती ने अपने बंगले की मरम्मत और जीर्णोद्वार के लिये सरकारी कोष से 86 करोड़ रुपए खर्च किये थे। मायावती इस समय राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से इस बंगले का इस्तेमाल कर रही हैं।
सूत्रों के मुताबिक राज्य सम्पत्ति विभाग द्वारा खर्च की गयी इस धनराशि का आंकड़ा 100 करोड़ तक भी पहुंच सकता है, क्योंकि महकमा मायावती के बंगले के लिये व्यय की गयी कुल धनराशि का आकलन कर रहा है। राज्य के लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि इस प्रकरण की जांच के आदेश दे दिये गये हैं और वित्तीय अनियमितता के दोषी पाये जाने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
लखनउच्च् के माल एवेन्यू में पांच एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैले इस बंगले की मरम्मत और जीर्णोद्वार का काम वर्ष 2007 में मायावती के मुख्यमंत्री बनने के फौरन बाद शुरू हुआ था, लेकिन वह काम उनके कार्यकाल की समाप्ति तक यानी इस साल के शुरू में पूरा हो सका।
मायावती ने 13 माल एवेन्यू में शामिल करने के लिये गन्ना आयुक्त कार्यालय को ध्वस्त करा दिया था।

मायावती के इस एक मंजिला बंगले में बने लम्बे गलियारे में लॉकरों की पूरी श्रृंखला बनी हुई है। इस गलियारे में बसपा प्रमुख की वर्ष 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए विशाल तस्वीर भी टंगी है।

इस गलियारे के बाहर एक बरामदा बना है, जिसमें बुलेटप्रूफ शीशे से युक्त दो खिड़कियां लगायी गयी हैं। इनमें से हर खिड़की की कीमत करीब 15 लाख रुपए है। इन खिड़कियों को खासतौर पर चंडीगढ़ में डिजायन किया गया था।

बंगले में ही 14 शयनकक्षों से युक्त दो मंजिला आलीशान अतिथि गृह भी बनवाया गया है, जिसमें गुलाबी इतालवी संगमरमर का फर्श है। परिसर में मायावती और बसपा संस्थापक कांशीराम की 20-20 फुट की दो प्रतिमाएं भी लगी हैं।

अपनी सुरक्षा के प्रति खासी चिंतित रहने वाली मायावती के इस बंगले में हिफाजत के भी पुख्ता बंदोबस्त हैं। बंगले की चहारदीवारी के चारों तरफ कंटीले तार बांधे गये हैं और हर आने-जाने वाले पर पैनी नजर रखने के लिये क्लोज सर्किट टेलीविजन का पूरा संजाल लगाया गया है।
सूत्रों के मुताबिक इस बंगले पर खर्च होने वाली ज्यादातर धनराशि राज्य सम्पत्ति विभाग ने व्यय की है लेकिन बाकी का खर्च निर्माण निगम, लखनउच्च् नगर निगम, गृह तथा संस्कृति विभागों द्वारा किया गया है।

amarujala : नेताजी की मौत का सच क्यों छिपा रहे थे प्रणब?


pranab mukherjee behind cover up on Subhash Chandra Bose air crash
नेताजी की मौत का सच क्यों छिपा रहे थे प्रणब?
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
Tuesday, June 26, 2012
http://www.amarujala.com

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राष्ट्रपति पद के यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत का सच छुपाने का आरोप लगाया गया है। पूर्व पत्रकार अनुज धर ने अपनी जल्द ही प्रकाशित होने वाली किताब में प्रणब मुखर्जी पर गंभीर आरोप लगाए हैं।
किताब के मुताबिक आजाद हिंद फौज के संस्‍थापक सुभाष चंद्र बोस की मौत विमान हादसे में नहीं हुई थी। प्रणब मुखर्जी ने अपने विदेश मंत्री कार्यकाल के दौरान अपनी सीमा से बाहर जाकर इस सच को छुपाया। किताब के मुताबिक नेताजी ने आखिरी दिन कैसे गुजारे, इस पर पर्दा डालने में भी प्रणब मुखर्जी शामिल थे।
सरकारी दस्तावेज के मुताबिक सुभाष चंद्र बोस की मौत 1945 में ताइवान में हुए विमान हादसे में हुई थी। अनुज धर की किताब में इस बात को नकारा गया है कि सुभाष चंद्र बोस के मौत विमान हादसे में हुई। यह किताब अम‌ेरिका और ब्रिटेन की गुप्त सूची से हटाए गए रिकॉर्ड और भारतीय प्रशासन के दस्तावेजों पर आधारित है, जिन्हें पिछले 65 सालों से सीक्रेट रखा गया।
किताब में अनुज धर ने प्रणब मुखर्जी पर आरोप लगाया है कि उन्होंने अपने विदेश मंत्री कार्यकाल के दौरान विमान हादसे की थ्योरी को अपनी सीमा से बाहर जाकर समर्थन किया था। हालांकि सबूतों से साफ जाहिर था कि नेताजी की मौत विमान हादसे में नहीं हुई थी।
1996 की एक घटना का हवाला देते हुए धर कहते हैं कि विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने एक सीक्रेट नोट के जरिए सलाह दी थी कि भारत को बोस की मौत से जुड़े सबूत जमा करने के लिए रशियन फेडरेशन को सख्त कदम उठाने संबंधित नोटिस जारी करना चाहिए।
किताब के मुताबिक मुखर्जी ने इस नोट को देखा और विदेश सचिव सलमान हैदर को संयुक्त सचिव से मिलने का आदेश दिया। मीटिंग के बाद संयुक्त सचिव नोटिस के बारे में भूल गए और स्वार्थी हो गए। उन्हें ऐसा लगा कि केजीबी आर्काइव्स को खंगालने से भारत और रूस के संबंध खराब होंगे। ऐसे में मुखर्जी बोस की मौत की ताईवान थ्योरी के सबसे पहले समर्थक बन गए।

मेरे और  लेख 


नेताजी सुभाषचन्द्र बोस , मास्को जेल में..?
http://arvindsisodiakota.blogspot.in/2012/06/amarujala.html

सोमवार, १७ जनवरी २०११

सुभाष जिनकी मृत्यु भी रहस्यमय है ..

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शनिवार, २२ जनवरी २०११

सुभाष जी का सच, सामने आना चाहिए ....!!

http://arvindsisodiakota.blogspot.com/2011/01/blog-post_22.html

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यह  लेख  भी पढ़ना चाहिए ...नेताजी की मृत्यु भारत में ही हुई बताया गया है .... 


सोमवार, 25 जून 2012

25 जून: आपातकाल दिवस:याद रहे, लोकतंत्र की रक्षा का महाव्रत


25 जून: आपातकाल दिवस के अवसर पर

याद रहे, लोकतंत्र की रक्षा का महाव्रत
अरविन्द सीसौदिया
मदर इण्डिया नामक फिल्म के एक गीत ने बड़ी धूम मचाई थी:
दुख भरे दिन बीते रे भईया,
अब सुख आयो रे,
रंग जीवन में नया छायो रे!
सचमुच 1947 की आजादी ने भारत को लोकतंत्र का सुख दिया था। अंग्रेजों के शोषण और अपमान की यातना से मातृभूमि मुक्त हुई थी, मगर इसमें ग्रहण तब लग गया जब भारत की सबसे सशक्त प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने 1975 में आपातकाल लगा दिया, तानाशाही का शासन लागू हो गया और संविधान और कानून को खूंटी पर टांग दिया गया। इसके पीछे मुख्य कारण साम्यवादी विचारधारा की वह छाया थी जिसमें नेहरू खानदान वास्तविक तौर पर जीता था, अर्थात साम्यवाद विपक्षहीन शासन में विश्वास करता हैं, वहां कहने को मजदूरों का राज्य भले ही कहा जाये मगर वास्तविक तौर पर येनकेन प्रकारेण जो इनकी पार्टी में आगे बढ़ गया, उसी का राज होता है।

भारतीय लोकतंत्र की धर्मजय
भारत की स्वतंत्रता के साठ वर्ष से अधिक हो चुके हैं। इस देश ने गुलामी और आजादी तथा लोकतंत्र के सुख और तानाशाही के दुःख को बहुत करीब से देखा। 25 जून 1975 की रात्री के 11 बजकर 45 मिनिट से 21 मार्च 1977 का कालखण्ड इस तरह का रहा जब देश में तानाशाही का साम्राज्य रहा, सबसे बडी बात यह है कि इस देश ने तानाशाही को तुरन्त ही संघ शक्ति से पराजित कर पुनः लोकतंत्र की स्थापना की!
आपातकाल
  तत्कालीन प्रधनमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने आन्तरिक आपातकाल की जंजीरों में सम्पूर्ण देश को बांध दिया था। निरपराध हजारों छोटे-बड़े नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को उन्होंने कारागारों में ठूंस दिया। पर कोई भी इसके विरूद्ध किसी प्रकार की आवाज नहीं उठा सकता था। एकाधिकारवाद का क्रूर राक्षस सुरसा की तरह अपना जबड़ा अधिकाधिक पसार रहा था...।

हिन्दुत्व का मजबूत मस्तिष्क
भारतीय संस्कृति में त्रिदेव और तीन देवियों का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। त्रिदेव के रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश जाने जाते हैं, जो मूलतः सृष्टीक्रम के जनक, संचालक और संहारकर्ता हैं। वहीं दैवीय स्वरूप सृष्टी संचालन का गृहस्थ पक्ष है, जिसमें सरस्वती बुद्धि की, लक्ष्मीजी अर्थव्यवस्था की और दुर्गा सुरक्षा शक्ति की संचालिकाएं मानी जाती हैं। इन्हीं के साथ वेद, पुराण और उपनिषदों का एक समृद्ध सृष्टि इतिहास साहित्यिक रूप में उपलब्ध है। यह सब मिलकर हिन्दुत्व का मस्तिष्क बनते हैं और इसलिए हिन्दुत्व की सन्तान हमेशा ही पुरूषार्थी और विजेता के रूप में सामने आती रही है। निरंतर अस्तित्व में रहने के कारण ये सनातन कहलाई है। इसी कारण अन्य सभ्यताओं के देहावसान होने के बाद भी हिन्दू संस्कृति अटल अजर, अमर बनी हुई है। यह इसी संस्कृति का कमाल यह है कि घोर विपŸिायों में भी घबराये बगैर यह अपनी विजय की सतत प्रयत्नशील रहती है। इसी तत्वशक्ति ने आपातकाल में भी सुदृढ़ता से काम किया और विजय हासिल की।
स्वतंत्रता की रक्षा का महानायक: संघ
वर्तमान काल में देश की स्वतंत्रता का श्रेय महात्मा गांधी सहित उस विशल स्वतंत्रता संग्राम को दिया जाना उचित है तो हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस देश की स्वतंत्रता को तानाशाही से मुक्त कराने और जन-जन की लोकतंत्रीय व्यवस्था को अक्षुण्य बनाये रखने में उतना ही बड़ा योगदान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के और उसके तत्कालीन सरसंघचालकों का है।
मा. बालासाहब देवरस और उनका मार्गदर्शन व अनुसरण करने वाले विशाल स्वयंसेवक समूह को यह श्रैय जाता है। यदि आपातकाल में संघ के स्वयंसेवकों ने स्वतंत्रता की पुनर्प्राप्ति के लिए बलिदानी संघर्ष न किया होता तो आज हमारे देश में मौजूद लोकतंत्र का वातावरण नहीं होता, जनता के मूल अधिकार नहीं होते, लोककल्याण के कार्यक्रम नहीं होते। चन्द साम्राज्यवादी कांग्रेसियों की गुलामी के नीचे उनकी इच्छाओं के नीचे, देश का आम नागरिक दासता की काली जेल में पिस रहा होता। 
स्मरण रहे वह संघर्ष
इसलिए आपातकाल के काले अध्याय का स्मरण करना, उसके विरूद्ध प्रभावी संघर्ष को मनन करना हमें लोकतंत्र की रक्षा की प्रेरणा देता है। इन प्रेरणाओं को सतत् जागृत रखना ही हमारी स्वतंत्रता का मूल्य है। जिस दिन भी हम इन प्रेरणाओं को भूल जायेंगे, उसी दिन पुनः तानाशाही ताकतें हमको फिर से दास बना लेंगी।
नेहरू की साम्यवादिता ही मूल समस्या
कांग्रेस में महात्मा गांधी सहित बहुत सारे महानुभाव रहे हैं, जिन्होंने सदैव लोकतंत्र की तरफदारी की है, किन्तु कांग्रेस का सत्तात्मक नेतृत्व पं. जवाहरलाल नेहरू और उनके वंशजों में फंस कर रह गया है। पं. जवाहरलाल नेहरू स्वयं में घोर कम्यूनिस्ट थे, वे रूस से अत्यधिक प्रभावित थे, इसलिए कांग्रेस मूलतः एक तानाशाह दल के रूप में रहा। उसने जनता को ठगने के लिए निरन्तर छद्म लोकतंत्र को ओढ़े रखा। हमेशा कथनी व करनी में रात-दिन का अंतर रखा और यही कारण था कि इस दल ने लोकतंत्र व राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगाने में हमेशा ही फुर्ती दिखाई। सबसे पहले डॉ. हेडगेवार जी के समय में नागपुर क्षैत्र की प्रांतीय सरकार ने संघ में सरकारी लोगों को जाने पर प्रतिबन्ध लगाया, जिसमें पं. जवाहरलाल नेहरू और डॉ. हार्डीकर का हाथ होने की बात समय समय पर सामनें आती रही थी। इसके बाद स्वतंत्र भारत में महात्मा गांधी की हत्या की ओट में संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। वीर सावरकर व पूज्य श्रीगुरूजी को गिरफ्तार किया गया। इसी प्रकार आपातकाल के दौरान सरसंघचालक मा. बाला साहब देवरस को गिरफ्तार किया गया और संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया। इसी तरह बाबरी मस्जिद ढ़हने पर नरसिम्हा राव सरकार ने भी भाजपा शासित राज्य सरकारों को बर्खास्त कर, संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। 
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा जी से पराजित राजनारायण के द्वारा दायर याचिका पर तमाम दबावों को नकारते हुए देश की सबसे मजबूत प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द कर दिया तथा 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। उन्होंने 20 दिन के समय पश्चात यह निर्णय लागू करने के निर्देश भी दिये। 
20 जून 1975: कांग्रेस की समर्थन रैली
श्रीमति इंदिराजी न्यायालय के निर्णय का सम्मान करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर स्थगन ले सकतीं थीं, मगर न्यायालय के इस निर्णय के विरूद्ध जनशक्ति का दबाव बनाने के लिए कांग्रेस पार्टी की ओर से एक विशाल रैली आयोजित की गई और कांग्रेस ने उन्हे प्रधनमंत्री पद पर बने रहने का आग्रह किया, जिसमें एक नारा दिया गया:
इंदिरा तेरी सुबह को जय, शाम की जय
तेरे काम की जय, तेरे नाम की जय
उन्होंने अपनी जिद को प्राथमिकता देते हुए संवैधानिक व्यवस्था को नकार दिया। इसी का परिणाम ‘आपातकाल’ था।
25 जून 1975: आपातकाल
निर्वाचन रद्द करने के मुद्दे पर पूरे देश में आन्दोलन प्रारम्भ हो गया और प्रधानमंत्री पद से इंदिरा जी का इस्तीफा मांगा जाने लगा। उनके पक्ष कर 20 जून को रैली हुई तो उसका जवाब 25 जून को विपक्ष की ओर से दिया गया।
हालांकी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के तानाशाह रवैये के विरोध में एक लोक संघर्ष समिति पहले ही बन चुकी थी, जिसके संगठन कांग्रेस के मोरारजी भाई देसाई अध्यक्ष और भारतीय जनसंघ के नानाजी देशमुख सचिव थे। इसी समिति के द्वारा 25 जून 1975 को इसी क्रम में रामलीला मैदान दिल्ली में विशाल आमसभा आयोजित हुई थी। उसमें उमड़ी विशाल जन भागेदारी ने इन्दिरा सरकार को झकझोर कर रख दिया। इस आमसभा में जयप्रकाश नारायण ने मांग की थी कि ‘‘प्रधानमंत्री त्यागपत्र दें, उन्हें प्रधानमंत्री पद पर रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। वास्तविक गणतंत्र की परम्परा का पालन करें।’’ इसी सभा में सचिव नानाजी देशमुख ने घोषणा कर दी थी कि 29 जून से राष्ट्रपति के सम्मुख सत्याग्रह किया जायेगा, जो प्रतिदिन चलेगा।
राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद का आपातकाल
ठीक इसी समय इंदिरा जी के बंगले पर उनके अति विश्वस्त सिद्धार्थ शंकर राय, बंशीलाल, आर.के.धवन और संजय गांधी की चौकड़ी कुछ और ही षडयंत्र रच रहे थे, जिससे 28 वर्षीय लोकतंत्र का गला घोंटा जाना था।
उसी समय राष्ट्रपति भवन भी इस षडयंत्र में प्रभावी भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा था। राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद, संविधान की पुस्तकों और आपातकाल लागू करने के प्रारूपों पर परामर्श ले रहे थे। कई तरह के असमंजस इसलिये थे कि ऐसा क्रूर कदम देश के इतिहास में पहली बार होना था।
श्रीमति गांधी, सिद्धार्थ शंकर राव और आर.के. धवन रात्रि में राष्ट्रप्रति भवन पहुंच गये और रात्रि 11 बजकर 45 मिनट पर आपातकाल लगा दिया।
राज्यों के मुख्यमंत्रियों, प्रशासनिक अधिकारियों को, पुलिस प्रशासन को निर्देष जारी कर दिये गये कि देश भर के प्रमुख विपक्षी राजनेताओं को बंदी बना लिया जाये, जहां से विरोध का स्वर उठ सकता है, उसे धर दबोचा जाये और सींखचों के पीछे डाल दिया जाये।
मीसा
न दलील, न वकील, न अपील
पूरा देश कारागार में बदल दिया
1970 में पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे जन विद्रोह के चलते, 1971 में श्रीमती गांधी ने संसद से एक कानून पारित करवा लिया,जो ‘‘मीसा’’ के नाम से जाना जाता है। तब संसद में यह कहा गया था कि देश में बढ़ रहे भ्रष्टाचार, तस्करी और आसामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण हेतु इसे काम में लाया जायेगा। परन्तु यह प्रतिपक्ष को कुचलने के काम लिया गया। इसे नौवीं सूची में डालकर न्यायालय के क्षैत्राधिकारी से बाहर रखा गया। हालांकि इस तरह का कानून 1950 में ही पं. नेहरू ने निरोध नजरबंदी कानून के रूप में लागू कर दिया था, जो निरंतर बना रहा।
जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, राजमाता सिंधिया, मधु दण्डवते, श्यामनंदन मिश्र, राजनारायण, कांग्रेस के युवा तुर्क चन्द्रशेखर, चौधरी चरण सिंह, मदरलैण्ड के सम्पादक के आर. मलकानी, 30 जून को संघ के सरसंघचालक बालासाहब देवरस को नागपुर स्टेशन पर बंदी बना लिया गया।
आपातकाल के इन्दिरा लक्ष्य
श्रीमती गांधी के आक्रमण की छः प्रमुख दिशायें थीं:
1. विपक्ष की गतिविधियों को अचानक ठप्प कर देना।
2. आतंक का वातावरण तैयार कर देना।
3. समाचार व अन्य प्रकार के सभी सम्पर्क व जानकारी के सूत्रों को पूरी तरह नियंत्रित कर देना।
4. प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को ही नहीं, सर्व सामान्य जनता को भी यह आभास कराना कि विपक्ष ने भारत विरोध विदेशी शक्तियों के साथ सांठ-गांठ कर श्रीमती गांधी का तख्ता पलटने का व्यापक हिंसक षडयंत्र रचा था जिसे श्रीमती गांधी ने समय पर कठोर पग उठाकर विफल कर दिया।
5. कोई न केाई आकर्षक जादुई कार्यक्रम घोषित कर बदले वातावरण में कुछ ठोस काम करके जनता को अपने पक्ष में करना और 
6. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शक्ति को तोड़कर देशव्यापी संगठित प्रतिरोध की आशंका को समाप्त कर देना।
इन सभी दिशाओं में उन्होंने एक साथ आक्रमण कर दिया। इस आक्रमण को प्रभावी व सफल बनाने हेतु वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ अपने पास ओम मेहता, बंसीलाल, विद्याचरण शुक्ल, एच.आर. गोखले, सिद्धार्थ शंकर राय और देवकान्त बरूआ के समान लोगों का गिरोह भी संगठित कर लिया। संजय इन सभी की देखरेख कर रहे थे। 
आपातकाल का समापन
19 महीने बाद 18 जनवरी 1977 को अचानक इंदिरा जी ने आम चुनाव की घोषणा कर दी। वे यह समझ रही थीं कि अब अन्य राजनैतिक दलों का धनी- धोरी कोई बचा नहीं है, कार्यकर्ताओं का जीवट समाप्त हो चुका है, कुल मिलाकर कोई चुनौती सामने नहीं है। इसी कारण उन्होंने राजनैतिक नेताओं की मुक्ति प्रारम्भ कर दी गई।
देश में राजनीतिक घटनाक्रम बिजली की-सी तेजी से बदला। जिस दिन नए चुनावों की घोषणा हुई उसी दिन जयप्रकाश नारायणजी ने जनता पार्टी के निर्माण की घोषणा की और अट्ठाईस सदस्यीय एक राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति बनाई, जिसमें मोरारजी देसाई को अध्यक्ष और चौधरी चरण सिंह को उपाध्यक्ष बनाया गया। इसके सदस्य चार दलों जनसंघ, कांग्रेस (ओ), सोशलिस्ट पार्टी और लोकदल थे, जिन्होंने विलय के बाद एक नए दल को जन्म दिया। मधु लिमये, रामधन और सुरेंद्र मोहन लालकृष्ण आडवाणी इसके चार महासचिवों थे । 
नये दल का नाम नेता, ध्वज, चुनाव चिन्ह सभी तय हो गये। इस दल की राजनैतिक और आर्थिक नीतियों को भी लिपिबद्ध कर लिया गया। उस वक्त मौजूद अन्य विपक्षी दलों ने भी इस दल के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने का फैसला लिया। जनता पार्टी के जन्म से देश में राजनीतिक स्थितियाँ बदल गईं। ऐसा लगता था कि यह एक विशाल और जन हितैषी शक्ति है, जो भारत को उन्नीस महीने के निरंकुश शासन से मुक्ति दिलायेगी। हवा में तानाशाही पर लोकतंत्र की विजय की तरंग घुल गई । जो तानाशाह युग के समापन और एक नए युग के उदय हुआा। निश्चित रूप से भारत में यह दूसरा स्वतंत्रता संग्राम विजयी थी। 
देश भर में दबा हुआ जनस्वर विस्फोटित होने लगा, कांग्रेस में घबराहट बढ़ने लगी, तमाम छोटे-बड़े सहारे लिये जाने लगे। यहां तक कि बॉबी जैसी हल्की फिल्म का दूरदर्शन पर प्रसारण करवाकर विपक्ष की रैली विफल करने की कोशिश हुई। किन्तु अंततः 20 मार्च 1977 की रात्रि में ही आम चुनावों में इंदिरा गांधी के पिछड़ने के समाचार दिल्ली पहुंच चुके थे। उनके करीबी अशोक मेहता और आर.के. धवन सक्रीय हो चुके थे और उन्होंने रायबरेली कलक्टर को टेलीफोन किया कि मतगणना धीमी कर दो और पुनर्मतगणना के आदेश दो। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के माध्यम से भी दबाव डाला गया। किन्तु चुनाव अधिकारी ने कोई दखल नहीं दिया और अंततः इंदिरा गांधी रायबरेली सहित पूरे देश में चुनाव हार गई। उनके पुत्र संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए , कांग्रेस 350 सीटों से घट कर 154 पर सिमट गई। तत्कालीन उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाण और दिल्ली में एक भी सीट कांग्रेस को नहीं मिली । जनता पार्टी को 542 सदस्यीय सदन में 295 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिला। 
21 मार्च की सुबह आपात स्थिति समाप्ति की घोषणा हो गई, जेलों के द्वार खुल गये और संघ के सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस सहित देश की तमाम जेलों से 15,000 के लगभग निर्दोष बंदियों को मुक्ति मिली। मोरारजी भाई देसाई पहली बार लोकसभा में गैर कांग्रेसी सरकार के प्रधानमंत्री बने, 30 वर्ष का कांग्रेस का एक छत्र केन्द्रीय शासन समाप्त हो गया। भारतीय जनसंघ के अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री और लालकृष्ण आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने। इसी सरकार ने नीलम संजीव रेड्डी को पहला गैर कांग्रेसी राष्ट्रपति भी निर्वाचित किया। 
भले ही यह सरकार बाद में बिखर गई, इंदिरा गांधी स्वयं भी वापस सत्ता में आ गई, मगर आपातकाल के संघर्ष ने जो परिणाम दिये तथा जनता ने जिस तरह का राजनैतिक न्याय किया उसका एक सुखद परिणाम यह है कि अब किसी भी राजनैतिक दल में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह आपातकाल जैसे तानाशाही कदम उठाने की बात भी सोच सके। मगर इस चीज को हमेशा स्मरण में रखकर न्याय प्राप्त करने की प्रतिबद्धता दृढ़ करते रहना आवश्यक है अन्यथा ‘सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’ की तरह जैसे ही ‘सतत् सतर्कता कम हुई कि तानाशाही फिर हावी’ हो जायेगी।

राधाकृष्ण मंदिर रोड़, डडवाड़ा, कोटा जंक्शन
09414180151



शनिवार, 23 जून 2012

रेव पार्टी का काला सच : लग्जरी लाइफ



रेव पार्टी: एक्‍टर अपूर्व का ब्‍लड सैंपल पॉजिटिव, क्रिकेटर को क्‍लीन चिट पर सवाल
रेव पार्टी: एक्‍टर अपूर्व का ब्‍लड सैंपल पॉजिटिव, क्रिकेटर को क्‍लीन चिट पर सवाल
मुंबई। कुछ दिनों पहले जुहू के पॉश होटल ओकवुड में रेव पार्टी करते पकड़े गये 128 लोगों में से 44 लोगों का ब्लड सैंपल पॉजीटिव पाया गया है। यह जानकारी मुंबई के पुलिस आयुक्त अरुप पटनायक ने दी है। जिन लोगों के सैंपल पॉजीटिव पाए गए हैं, उनमें अभिनेता अपूर्व अग्निहोत्री भी शामिल हैं। हालांकि इस पार्टी के दौरान पकड़े गए क्रिकेटर राहुल शर्मा के पिता के बयान ने सवाल खड़े कर दिए हैं। राहुल के पिता का दावा है कि उनके बेटे को इस मामले में क्‍लीन चिट मिल गई है जबकि पुलिस को अभी उनके ब्‍लड सैंपल की रिपोर्ट ही नहीं मिली है।
पटनायक ने बताया कि जिनके भी ब्लड सैंपल पॉजीटिव पाये गये हैं, उनके खिलाफ नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रापिक सब्सटेंश (एनडीपीएस) एक्ट के तहत कार्रवाई की जायेगी। उन्होंने बताया कि 44 लोगों में से 2 ने एमडीएमए ड्रग का सेवन किया था। इसके अलावा 16 ने एमडीएम ड्रग के साथ-साथ चरस का भी सेवन किया था, जबकि 29 लोगों ने शराब पी हुई थी।
महत्वपूर्ण है कि यह खुलासा जुहू के होटल ओकवुड में पकड़ी गई उसी रेव पार्टी का है जिसमें पुणे वॉरियर्स के खिलाड़ी राहुल शर्मा और वेन पार्नेल भी पकड़े गये थे। मुंबई पुलिस कमिश्‍नर ने बताया कि शर्मा का ब्लड सैंपल अभी तक पुलिस को नहीं मिला है। बता दें कि पुलिस को मिले सभी 44 ब्लड सैंपल पुरुषों के हैं। यही कारण है कि एकता कपूर की ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ सीरियल से मशहूर हुई टीवी अभिनेत्री शिल्पा सकलानी को लेकर अब भी सस्पेंस बना हुआ है। शिल्पा और उनके पति को भी पुलिस ने इसी होटल से 20 मई 2012 को पकड़ा था।
उल्लेखनीय है कि इस रेव पार्टी का आयोजन होटल ओकवुड के मालिक विषय हांडा ने फेसबुक के जरिए किया था। पटनायक का कहना है कि इस रेव पार्टी के डीजे के पास से बरामद हुए 4 हजार ट्रेकर्स की भी रिपोर्ट आ गई है, जिसमें 95 प्रतिशत ट्रांस म्यूजिक के पाये गये हैं जो ऐसी रेव पार्टियों में उत्तेजना बढ़ाने का काम करते हैं।
Source: विनोद यादव

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रेव पार्टी पर रेड, 15 कॉल गर्ल्स समेत 30 गिरफ्तार
23 Jun 2012,हैदराबाद
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    हैदराबाद में भी रेव पार्टी का एक मामला सामने आया है। शहर के हयातनगर में पुलिस ने शुक्रवार देर रात एक रेव पार्टी पर छापा मारकर 15 कॉल गर्ल्स समेत 30 लोगों को गिरफ्तार किया है। इस पार्टी में कॉल गर्ल्स हैदराबाद, मुंबई और बेंगलुरु से मंगाई गई थीं। पुलिस को वहां से अश्लील सीडी और कॉन्डम भी बरामद किए है।गिरफ्तार किए गए लोगों में बड़े कारोबारियों और नौकरशाहों के बच्चे शामिल हैं।
आंध्र प्रदेश के रंगा रेड्डी जिला पुलिस ने हयातनगर के पिगलीपुरम स्थित एक रिजॉर्ट पर छापा मारा। पुलिस के मुताबिक, रिजॉर्ट में रेव पार्टी का आयोजन श्रीनिवास रेड्डी नाम के शख्स के बर्थडे पर आयोजित की गई थी। पार्टी कॉल गर्ल्स हैदराबाद, मुंबई और बेंगलुरु से मंगाई गई थीं। पुलिस को वहां से शराब, अश्लील सीडी, कॉन्डम, फल, फूल और कपड़े मिले हैं। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि वहां से 15 कारों को भी जब्त किया गया है। पुलिस ने यह कार्रवाई हयातनगर के निवासियों के शिकायत पर की थी। कहा जा रहा है कि मुंबई के एक शख्स ने इस रिजॉर्ट को लीज पर लिया था।
गौरतलब है कि पिछले महीने मुंबई में इसी तरह का मामला सामने आया था। वहां के जुहू स्थित होटल ओकवुड में रेव पार्टी में 92 लोग पकड़े गए थे, जिनमें 46 लोगों की रिपोर्ट आ गई है। इसमें 44 लोगों के ब्लड सैंपल पॉजिटिव पाए गए है। जिन लोगों को ब्लड सैंपल पॉजिटिव पाए गए हैं, उनमें फिल्म कलाकार अपूर्व अग्निहोत्री भी शामिल हैं।
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रेव का मतलब डांस मस्ती और ड्रग्स
नवभारत टाइम्स | May 22, 2012,
 एनबीटी रिपोर्टर॥ मुंबई
रेव पार्टियों के लिए मुंबई पूरे इंडिया में मशहूर हैं। इसके अलावा गोवा , पुणे , बेंगलुरु , नई दिल्ली में भी ऐसी पार्टियां होती हैं। रेव पार्टियों का मतलब ऐसी पार्टियों से हैं जहां लड़के - लड़कियां लाउड म्यूजिक पर थिरकते हैं। बेसुध होकर नाचने के लिए यह लोग ड्रग्स का सेवन करते हैं। ऐसी पार्टियों में आमतौर पर मारीजुआना , हशीश , कोकीन और नशीले पदार्थों का नशा धड़ल्ले से होता है। कई पार्टियों में पार्टीबाज खुद अपना ड्रग्स लेकर आते हैं और कई पार्टियों में आयोजकों की तरफ से मुहैया कराया जाता है। इन नशीले पदार्थों का सेवन गैरकानूनी है और ऐसा करने पर एनडीपीएस ऐक्ट के तहत गुनाह है।
मुंबई के कोलाबा , परेल एरिया का नया कॉर्पोरेट एरिया , बांद्रा , सांताक्रुज , जुहू , लोखंडवाला , वर्सोवा , आदि जगह काफी बदनाम हैं। यहां देर रात तक पार्टियां चलती हैं जिसमें फिल्मी हस्तियां , टीवी सीरियल के कलाकार , क्रिकेट खिलाड़ी , धनाढ्य परिवारों के लड़के - लड़कियां शामिल होते हैं। चूंकि ड्रग्स की कीमत काफी ज्यादा होती है , इसलिए इसे वही लोग अफोर्ड करते हैं जिनकी जेब में पैसा होता है। इस तरह की पार्टियां अक्सर रात दस बजे से शुरू होकर भोर तक चलती रहती हैं। फॉर्म हाउस या निर्जन स्थानों पर आयोजित होने वाली रेव पार्टी दो - तीन दिन तक भी चलती हैं।
कर्जत में रेव पार्टी
पिछले साल जून में रायगढ़ पुलिस ने एक ऐसी रेव पार्टी पर छापे मारे थे जो कर्जत के होटेल माउंड व्यू में हुई थी। कर्जत मुंबइकरों के लिए सैकंड होम जैसा है। यहां अनेक होटेल और रईसों के बंगले हैं। ऐसी ही एक पार्टी में एंटी नारकोटिक्स सैल का एक इंसपेक्टर अनिल जाधव अरेस्ट किया गया था। क्योंकि रेव पार्टी आयोजित करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस पार्टी मंे करीब 300 लड़के - लड़कियां थी। इनकी आयु 20-25 साल थी। यहां से भारी मात्रा में ड्रग्स बरामद हुई।
फिल्मी हस्ती शामिल
अक्टूबर , 2011 में एक नाइट क्लब में हुई पार्टी में बॉलीवुड एक्टर शक्ति कपूर के बेटा और आदित्य पंचाली की बेटी भी रेव पार्टी में पकड़ी गई। इस पार्टी में कुल 231 लोग अरेस्ट हुई। इन सभी को एनडीपीएस ऐक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया। यह पार्टी बॉम्बे 72 डिग्री ईस्ट नाम के नाइट क्लब में चल रही थी।
सब पैसे का खेल है : पुलिस
डीएन नगर पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ निरीक्षक विजय कुमार भोइटे के अनुसार , ' यह सब अनाप - शनाप पैसों के कारण हो रहा है। इन लोगों को यह ' गलतफहमी ' होती है कि पैसा है तो सब कुछ किया जा सकता है। बांद्रा से दहिसर में अनेक उद्योगपति - व्यापारी , फिल्म वाले , ग्लैैमर वर्ल्ड से जुड़े लोग रहते हैं। इन लोगों की पहुंच ऊपर तक है। ये लोग देर शाम को घरों से निकलते हैं और रात भर मस्ती करते हैं। '
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रेव पार्टी का काला सच
Updated on: Sat, 23 Jun 2012
मुंबई। तेज रोशनी और धमाकेदार संगीत, बिना लय ताल के थिरकते नौजवान, लहराते और एक दूसरे से टकराते जिस्म, हर तरफ धुआं ही धुआं, फिजा में तैरती तीखी और नशीली गंध. कुछ ऐसा ही होता है रेव पार्टी का नजारा।

हाई प्रोफाइल रेव पार्टियों को ऑर्गनाइज करने से अंजाम देने तक पूरी प्रक्रिया की भाषा में कोड व‌र्ड्स का इस्तेमाल किया जाता है। पार्टी स्थल, तारीख और नशे में इस्तेमाल होने वाली चीज, हर एक का नाम तय कर दिया जाता है। अगर इस प्रक्रिया में कुछ भी गड़बड़ होती है, तो पूरी पार्टी का भंडाफोड़ हो जाता है। पिछले महीने मुंबई में जुहू के ऑकवुड प्रीमियम अपार्टमेंट में ऐसी ही एक रेव पार्टी आयोजित की गई थी। जिसमें पुलिस ने रेड मारकर आइपीएल के खिलाड़ी राहुल शर्मा, वेन परनेल के अलावा छोटे पर्दे के कलाकार अपूर्व अग्निहोत्री और उनकी पत्‍‌नी शिल्पा पकड़ी गई थीं। हालांकि इस पार्टी के लिए पूरी प्राइवेसी का इस्तेमाल किया गया था। फेसबुक पर 'डिजाइनर हिप्पीज' नाम के पेज पर 15 मई को पार्टी की पहली इन्फर्मेशन डाली गई थी।

-रेव पार्टियों की विशेष लैंग्वेज

-पार्टी का हिस्सा बनने वाले लोगों का एक खास स्लोगन होता है, मसलन ऑकवुड में हुई पार्टी का स्लोगन था 'प्रमोट म्यूजिक नॉट ड्रग्स'।

-पार्टी में एंट्री के लिए ड्रेस कोड होता है और कोड्स को बताने पर एक सिंबल दिया जाता है, जैसे- रिस्टबेंड, बड़े ग्लासेस, कलर्ड गॉगल्स इत्यादि।

-रेव पार्टी के स्पेशल कोड- क्लब ड्रग , क्रश ऑन यू (केटामाइन), कोक (कोकीन), ब्लैक टोन (अंधेरे में नशे के साथ लड़की), टाइम पास (गाजा या सस्ता नशीला पदार्थ), फन गेम (पार्टी स्थल), कैल्क्युलेटर (पार्टी का वक्त)।

-कैसे मिलता है तस्करों को बढ़ावा

दुनिया भर में नशीले पदाथरें के व्यापार को बढ़ावा देने वाले नशे के सौदागर इस धंधे को आगे बढ़ाने में गरीब और अनाथ बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके लिए वे बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से बच्चों की तस्करी कर रहे हैं। यह बहुत खतरनाक ट्रेंड है जो लगातार बढ़ता जा रहा है। मादक पदाथरें की तस्करी करने वाले बच्चों को बाल न्याय अधिनियम के तहत बहुत कम सजा दी जाती है, जिसका तस्कर फायदा उठाते हैं।

-यूनाइटेड नेशन ऑन ड्रग ऐंड क्राइम (यूएनओडीसी) के मुताबिक, पूरी दुनिया में नशीले पदार्थो का सेवन करने वाले लोगों की संख्या तकरीबन 21 करोड़ तक पहुंच गई, यानी दुनिया की कुल जनसंख्या का लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा ड्रग्स का आदी है।

-21 करोड़ में से हर साल लगभग 2 लाख लोग की मौत नशे की वजह से होती है।

-यूएनओडीसी के आकड़ों के मुताबिक, साल 2010 में विश्व भर में 195700 हेक्टेयर में अफीम की खेती हुई। अफगानिस्तान में विश्व भर के कुल अफीम का करीब 74 प्रतिशत हिस्सा यानी 3600 टन अफीम पैदा होती है।
-मादक पदाथरें की तस्करी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा व्यवसाय है।
-नशीली दुनिया की एबीसीडी :
मुंबई महानगरों से लेकर छोटे गावों तक नशे का हर एक इंतजाम मौजूद है। दस हजार में बिकने वाली कोकीन की पुड़िया से लेकर दस रुपये में बिकने वाली इंक की बॉटल, सभी का इस्तेमाल नशे में होता है।
-कोकीन : इसे कोक, चार्ली या ब्लो भी कहा जाता है। इसके सेवन से नर्वस सिस्टम स्ट्यूमलेट होता है, जिससे एनर्जी बढ़ जाती है। इससे शरीर का तापमान और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। यह अफ्रीकी देशों, मलयेशिया और थाइलैंड से स्मगल होती है।
-क्रैक : यह यूरोपियन देशों और अमेरिका से आती है लेकिन इंडिया में इसकी स्मगलिंग अफ्रीकी देशों, मलयेशिया और थाइलैंड से होती है। यह कोकीन का हलका रूप है।
-चरस : यह उत्तर भारत, पाकिस्तान और हिमालय की तराई में उगाई जाती है। यह मुंबई में सड़क के रास्ते आती है।
-हेरोइन : यह ड्रग अफगानिस्तान, पाकिस्तान और म्यामार से आती है।
-गाजा : नशे के लिए इसे तंबाकू में मिलाया जाता है।
-ऐक्सटेसी : यह ड्रग लेने से यूजर्स को काफी एनर्जी मिलती है, लेकिन इसके गलत असर भी संभव हैं। जैसे- जी मिचलाना, उल्टी आना, व्यग्रता, डिप्रेशन, दिल का तेजी से धड़कना और ब्लड प्रेशर हाई होना। यदि इस ड्रग को ज्यादा दिन लिया जाए, तो दिमाग के सेल खराब हो सकते हैं। महिलाओं में इसके दुष्परिणाम जल्द आते हैं।
-केटामाइन : इस ड्रग को या तो सूंघा जाता है, या स्मोक किया जाता है। इससे दिमाग काम करना बंद कर देता है। इस क्लब ड्रग से व्यक्ति कोमा में भी जा सकता है।
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कुछ ऐसे होती है रेव पार्टी, यूं चढ़ता है शराब और शबाब का नशा
Source: db.com   |  10/06/2012
हैदराबाद के बंजारा हिल्स के एक अपार्टमेंट में चल रही रेव पार्टी पर छापा मारकर आंध्रा पुलिस ने दो महिलाओं सहित पांच लोगों को गिरफ्तार किया है। इसमें एक शख्स पार्टी में ड्रग्स बेचने का काम करता था। पर सवाल उठता है है कि आखिर यह रेव पार्टी होती क्‍या है। आइये हम आपको बताते हैं कि इस गैरकानूनी काम में दरअसल चल क्‍या रहा होता है।

रेव पार्टी शराब, ड्रग्‍स, म्‍यूजिक, नाच गाना और सेक्‍स का कॉकटेल होता है। ये पार्टियां बड़े गुपचुप तरीके से आयोजित की जाती हैं और जिनको बुलाया जाता है वे लोग पार्टी के बारे में वे 'सर्किट' के बाहर के लोगों को जरा भी भनक नहीं लगने देते।

नशीले पदार्थ बेचने वालों के लिए ये रेव पार्टियाँ धंधे की सबसे मुफीद जगह बन गई हैं। मुंबई, पुणे, खंडाला, पुष्‍कर और दिल्‍ली के आसपास के इलाके इन रेवियों के लिए बड़ी मुफीद जगह हैं।

इन पार्टियों में आम लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। धनकुबेरों के आवार लड़के लड़कियों की कुत्सित वासनाएं पूरा करने के लिए रात के अंधेरों में इन पार्टियों का आयोजन किया जाता है।

मॉडल लड़के लड़कियां तो इन पार्टियों में अकसर देखे जाते हैं। हम भले ही लड़कों के अनुपात में लड़कियों की संख्या में कमी होने का रोना रोते हों लेकिन इन रेव पार्टियों के मामले में लड़कियों ने लड़कों को काफी पीछे छोड़ दिया है। सौ रेवियों में लड़कियों की संख्या 60 होती ही है।

महानगरों के युवक युवतियों में रेव के प्रति आकर्षण बढ़ता ही जा रहा है। इन पार्टियों में दो गैरकानूनी ड्रग्‍स चलते हैं एसिड और इक्सटैसी। इसे लेने के बाद युवा लगातार 8 घंटे तक डांस कर सकते हैं। ये ड्रग्स उनमें लगातार नाचने का जुनून पैदा करते हैं। जिनके पास पैसे होते हैं वे एसिड व इक्सटेसी जैसे महँगे ड्रग लेते हैं। जिनके पास उतना पैसा नहीं होता वे हशीश या गाँजा से ही काम चला लेते हैं।
रेव पार्टियों में 20 हजार, 30 हजार या 60 हजार वाट का म्यूजिक भी बजता है, सुपर फास्ट। इस तेज संगीत और नशे के मिश्रण से सारे बंधन टूट जाते हैं और मनुष्‍य अपने आदिम स्वरूप में आ जाता है। नाचते हुए इश्क ने जोर मारा तो कई रेव पार्टियों में उसकी व्यवस्था भी रहती है। रेव वेन्यू पर उसके लिए हट बनने लगे हैं। स्वैपिंग इज ऑलसो कूल। इसमें भाग लेने वाले बिंदास युवकों के लिए सेक्स और प्यार की नैतिकता कोई मायने नहीं रखती।
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बर्थ डे पार्टी के नाम पर होती थी जिस्‍मफरोशी
Voice of Faridabad, 25-June-2012
बर्थडे पार्टी पर रेव र्पार्टी का चलन तो होता रहा है मगर आजकल इन पार्टियों में सुनियोजित ढंग से जिस्‍म परोसा जा रहा है। सोमवार को एक ऐसा ही मामला मुंबई के लोखंडवाला इलाके में सामने आया। पुलिस ने एक रेस्‍तरां में छापेमारी के दौरान 11 लड़कियों को गिरफ्तार किया जो आई तो थी बर्थडे पार्टी में शुमार होने मगर उनका मुख्‍य उद्देश्‍य जिस्‍म का कारोबार करना था। इन लड़कियों में बॉलीवुड में एक अदाकारा भी शामिल है।
मुंबई पुलिस की सोशल सर्विस सेल ने इस बात का खुलासा किया कि बर्थडे पार्टी के नाम पर खुलेआम लड़कियां परोसी जाती थीं। पुलिस ने पार्टी आयोजक मोहन तोलानी के साथ रेस्टोरेंट के मालिक और मैनेजर को गिरफ्तार कर लिया है। मिड डे अखबार के मुताबिक पुलिस ने बताया कि आरोपी तोलानी अपनी महिला मित्रों को ज्यादा पैसे कमाने का लालच देकर पार्टी में बुलाता था। बर्थडे के नाम पर पार्टी में आने वाले लड़कों से तीन हजार रुपये लिए जाते थे जबकि युवतियों की एंट्री फ्री थी। पुलिस के अनुसार इन लड़कियों में से अधिकतर कॉलेज स्टूडेंट्स, मॉडल्स, एक्ट्रेस और अच्छे घर की विवाहित महिलाएं हैं। सभी पैसे और लग्जरी लाइफ के चक्कर में यहां खिंची चली आती थीं।
न्‍यूली मैरिड महिलाओं की खासी मांग
पुलिस ने बताया कि जिन लड़कियों को गिरफ्तार किया गया है उसमें ज्‍यादातर नई नवेली शादीशुदा महिला हैं। उन्‍होंने बताया कि पति से खुश ना होने के कारण ये महिलाएं इस धंधे में उतर जाती हैं और इसके चलते उन्‍हें पैसे भी मिल जाते हैं। पुलिस ने बताया कि नई नवेली महिलाओं में ज्‍यादातर ग्‍लैमर को लेकर एक भ्रम सा होता है। वो खाली समय में (जब पति बाहर हो) तो वो अपनी सेक्‍सुअल चाहत पूरा करने के लिये इस तरह की पार्टियों का हिस्‍सा बन जाती हैं।
कुछ ऐसे होता है जिस्‍म का सौदा
पार्टी में सबसे पहले लड़के-लड़कियों की एक-दूसरे से पहचान कराई जाती है। ड्रिंक के बाद लड़के तय करते हैं कि उसे किस लड़की के साथ जाना है। इसके बाद मोल-भाव होता है और सभी अपने-अपने पार्टनर के साथ मौज मस्ती के लिए अपने ठिकाने निकल जाते हैं। लड़कियों को महिला सुधार गृह भेज दिया गया है जबकि उनके पुरुष साथियों से पूछताछ जारी है।
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एक्‍ट्रेस सोफिया ने बुलाया था आईपीएल खिलाडि़यों को रेव पार्टी में
Voice of Faridabad, 25-June-2012
 मुंबई।आईपीएल खिलाडि़यों की मुंबई की रेव पार्टी में  मौजूदगी ने सबको चौंका कर रख दिया था। चमचमाती लाइटों के बीच लगभग 38 लड़कियों वाली रेव पार्टी में एक नया खुलासा सामने आया है जिसके मुताबिक मॉडल और बॉलीवुड एक्ट्रेस सोफिया हयात ने आईपीएल प्लेयर राहुल शर्मा और वायने पर्नेल को मुंबई के ऑकवुड प्रीमियर होटल में आयोजित रेव पार्टी में बुलाया था।
मुंबई पुलिस के मुताबिक पब्लिक रिलेशंस रिप्रजेंटेटिव नम्रता कुमार ने हयात को पर्नेल और अन्य प्लेयर को रेव पार्टी में लाने को कहा था। गौरतलब है  कि रेव पार्टी में छापेमारी के दौरान पुणे के खिलाड़ी राहुल शर्मा और पर्नेल हिरासत में लिए गए थे। नम्रता कुमार हयात के जरिए पर्नेल के संपर्क में आई थी। एक मैगजीन के फोटो शूट के दौरान हयात की नम्रता से दोस्ती हुई थी। पुलिस के मुताबिक कुमार ने हयात को पार्टी में आने का न्योता दिया था। पर्नेल ने खुद पुलिस को दिए बयान में कहा था कि वह अपनी एक मित्र के कहने पर पार्टी में गया था।  
उसकी मित्र एक पीआर रिप्रजेंटेटिव को जानती थी। पर्नेल के मुताबिक उसे बताया गया था कि होटल में बर्थ डे पार्टी है। उधर हयात ने भी कहा है कि वह पर्नेल को जानती है लेकिन राहुल शर्मा के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है। हयात के मुताबिक वह रविवार शाम 7 बजे पार्टी में जाने वाली थी लेकिन उससे पहले ही पुलिस ने छापा मार दिया। हयात के मुताबिक उसे पता था कि पर्नेल न तो शराब पीता है और न ही ध्रूमपान करता है।



गुरुवार, 21 जून 2012

चलो महंगाई का भ्रष्टाचार प्रमाणित हुआ : सीमेंट उद्योग को महंगा पड़ा जोड़


11 सीमेंट कंपनियों पर 6000 करोड़ रुपये जुर्माना

चलो महंगाई का भ्रष्टाचार प्रमाणित हुआ :

 सीमेंट उद्योग को महंगा पड़ा जोड़

बीएस संवाददाता / नई दिल्ली June 21, 2012

भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने आज 11 सीमेंट कंपनियों और सीमेंट मैन्युफैचरर्स एसोसिएशन (सीएमए) पर सांठगांठ करने के लिए 6,307 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। इस सूची में एसीसी, अंबुजा सीमेंट्स, अल्ट्राटेक और जेपी सीमेंट्स शामिल हैं।
कंपनी मामलों के मंत्रालय ने कहा, 'भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने सीमेंट विनिर्माताओं ने प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के उल्लंघन का दोषी पाया।' जिन अन्य सीमेंट कंपनियों को सांठगांठ का दोषी पाया गया और जुर्माना लगाया गया उनमें अल्ट्राटेक सीमेंट्स में विलय हो चुकी ग्रासिम सीमेंट्स, लफार्ज इंडिया, जे के सीमेंट, इंडिया सीमेंट्स, मद्रास सीमेंट्स, सेंचुरी सीमेंट्स और बिनानी सीमेंट्स शामिल हैं।
आदेशानुसार प्रत्येक कंपनी को वित्त वर्ष 2009-10 और 2010-11 के दौरान कमाए गए मुनाफे की 50 फीसदी रकम 90 दिन के भीतर जुर्माने के तौर पर चुकानी होगी। सीसीआई के सदस्य आर प्रसाद ने कहा कि जुर्माने की रकम सरकार के संचयी कोष में जाएगी। जांच के दौरान आयोग ने पाया कि इन कंपनियों ने आपूर्ति घटाने के लिए अपनी पूरी क्षमता से उत्पादन नहीं किया, जिससे मांग बढऩे पर वे सीमेंट के दाम बढ़ा सकें। सीसीआई ने आदेश में कहा, 'आयोग ने पाया कि प्रतिद्वंद्वी कंपनियों ने सीएमए के जरिये कीमत, क्षमता और उत्पादन को आपस में साझा करने के तंत्र को संस्थागत रूप दिया है, जिससे उत्पादन व आपूर्ति को सीमित किया जा सके  ताकि सीमेंट का दाम तय करने में आसानी हो जाए।'
सीसीआई ने कहा कि बाजार में सीमेंट की आपूर्ति सीमित करने और प्रतिस्पर्धा रोधी करार के जरिये सीमेंट के दाम के साथ छेड़छाड़ कर कंपनियों ने न सिर्फ उपभोक्ताओं को बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है। आदेश में यह भी कहा है कि इस तरह की सांठगांठ के लिए किसी तरह का लिखित करार हो, यह जरूरी नहीं। आदेश में सीसीआई ने कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे करार, कीमतों पर समझौता, उत्पादन और बाजार में सीमेंट की आपूर्ति से जुड़ी किसी भी गतिविधि में शामिल होने से 'परहेज करें'। हालांकि आदेश में भविष्य में ऐसी सांठगांठ रोकने के लिए किसी प्रक्रिया की बात नहीं कही गई है।
प्रसाद ने कहा, 'अगर भविष्य में इन कंपनियों को फिर सांठगांठ का दोषी पाया गया, तो मामले की दोबारा जांच की जाएगी और उन पर ज्यादा भारी भरकम जुर्माना लगाया जाएगा।' उम्मीद है कि सीमेंट उद्योग सीसीआई के इस आदेश के खिलाफ कानूनी कदम उठा सकता है।
मद्रास सीमेंट्स के मुख्य कार्याधिकारी ए वी धर्मकृष्णन ने कहा, 'अभी हमने आदेश पढ़ा नहीं है। एक बार आदेश पढऩे के बाद ही हम जरूरी कानूनी कदम उठाएंगे। हमने कुछ गलत नहीं किया है इसलिए हमें पूरा भरोसा है कि हम अपना बचाव कर सकते हैं।' लफार्ज इंडिया के प्रवक्ता ने कहा, 'हम आदेश का अध्ययन कर रहे हैं, जिसके बाद ही हम कानूनी कार्र्रवाई करेंगे।'
प्रसाद ने बताया कि हम इन सभी कंपनियों को अगले 60 दिन के भीतर नोटिस जारी करेंगे। बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआई) द्वारा शिकायत करने पर जांच महानिदेशक ने 39 सीमेंट कंपनियों की जांच की। इसी जांच के आधार पर सीसीआई ने फैसला सुनाया है। बीएआई ने आरोप लगाया था कि  सीमेंट के भाव एक समान रखने के लिए कंपनियों ने सांठगांठ की है। 2010 में गंभीर अपराध जांच कार्यालय (एसएफआईओ) ने भी इसकी जांच कर रिपोर्ट कंपनी मामलों के मंत्रालय को सौंपी थी।
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11 सीमेंट कंपनियों पर 6000 करोड़ रुपये जुर्माना
Thursday, June 21, 2012

नई दिल्ली : भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने गुरुवार को 11 सीमेंट कंपनियों पर 6000 करोड़ रुपये का जुर्माना लगा दिया। आयोग ने कंपनियों को व्यापार संघ बनाकर कीमत का निर्धारण करने का दोषी ठहराया। प्रभावित कम्पनियों में अम्बुजा सीमेंट, एसीसी, अल्ट्राटेक और इंडिया सीमेंट जैसी कम्पनियां शामिल हैं। प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा लगाया गया यह अब तक का सर्वाधिक जुर्माना है।

आयोग ने 11 कम्पनियों से कहा है कि कारोबारी साल 2009-10 और 2010-11 में कम्पनियों ने जितना म

ुनाफा कमाया है, उसका आधा हिस्सा जुर्माना के रूप में अदा करें। कंपनी मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान के मुताबिक कि इस आधार पर जुर्माना की राशि 6000 करोड़ रुपये से अधिक बैठती है। जिन कम्पनियों पर जुर्माना लगाया गया है, उनमें शामिल हैं एसीसी, अम्बुजा सीमेंट्स लिमिटेड, अल्ट्राटेक सीमेंट्स, ग्रासीम सीमेंट्स अब इसका अल्ट्राटेक सीमेंट्स में विलय हो गया है, जेके सीमेंट्स, इंडिया सीमेंट्स, मद्रास सीमेंट्स, सेंचुरी सीमेंट्स, बिनानी सीमेंट्स, लफार्ज इंडिया और जेपी सीमेंट्स। आयोग ने सीमेंट मैन्यूफैक्च र्स एसोसिएशन पर भी जुर्माना लगाया।

आयोग ने बिल्डर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की शिकायत के बाद डायरेक्टर्स जेनरल ऑफ इनवेस्टिगेशन की जांच के बाद जुर्माना लगाया। (एजेंसी)


सोमवार, 18 जून 2012

जब नेता बेईमान हो जाता है - अरविन्द सीसौदिया



जब नेता बेईमान हो जाता है,
- अरविन्द सीसौदिया
जब नेता बेईमान हो जाता है,
नीति मर जाती है, न्याय मर जाता है,
जिधर देखो उधर शैतान नजर आता है,
विश्वास में विष, आशीर्वाद में आघात,
हमदर्दी में दुखः-दर्द, मिठास में मधुमेह,
पावनता में महापतन और...,
ईमान में महाबेईमान घटित हो जाता है।
(1)
भगवान भी जिसके भय से कांपने लगता है,
राष्ट्रधर्म प्राण बचाकर भागने लगता है,
सूरज भी पश्चिम से उगता है यारों,
जब राजसिंहासन बेईमान हो जाता है...!
लोगों, जीवन नर्क बन जाता है
बातों की नकाबों में, इन शैतानों में,
सम्पत्ति की होड़ - धनलूट की दौड़ ,
बीस साल पहले,
जिस पर कोड़ी भी नहीं थी यारों,
वह करोपतियों में भी सिरमौर नजर आता है।
(2)
गले में महानता के उसूल टांगे,
वाणी में संतों की सम्प्रभुता की बांगें,
जो मिले उसे लूट लेना हैं मकशद,
अपनी तो हवस मिट ही जायेगी,
असल इंतजाम तो,
अगली अस्सी पीढ़ी का कर जाना है यारों...!
(3)
जो मिले, जहां मिले, जितना मिले,सब स्वीकार है,
भिष्ठा में मिले, मदिरा में मिले, मंदिर में मिले..,
किसी की घर गृहस्थी और जायदाद में मिले,
किसी के सुख-सुकून और संतान में मिले,
वह सब हमें मिले, यही प्रार्थना, यही कामना है,
इसी का इंतजार है !
(4)
गद्दार-ए-वतन को तो फांसी दे सकते हैं यारों,
मक्कार को मुसीबत खडी कर सकते हैं यारों,
जो ईमान पर चले उस पर ठहाके लगा सकते हैं,
मगर क्या करें इन नेताओं के प्रभुत्व का,
इनके खिलाफ कानून भी दुम दबाकर भाग जाता है,
कितना भी बड़ा भ्रष्टाचार हो,
कितनी भी बड़ी रकम डकार हो,
कितने भी महल फैक्ट्रियां ध्ंाधे
क्यों न पल-क्षण में खडे़ हों,
इन से क्या पूछे ,
ये तो कानून पालनहार हैं ?
(5)
अमरीका से आयात होता नहीं,
चीनी सामान में मिलता नहीं,
इन्हें सुधारे कौन सा यंत्र ?
इन्हे नापे तौले कौन सा तंत्र ?
हर धर्म, हर मजहब में टटोला,
सुधारने की कोई इबारत काम कर जाये,
पता चला कि अब ये ही सब आदर्श पुरूष हैं,
ये स्वयंभू ईश्वर से कम नहीं,
ये इबादत हैं, धर्मप्राण हैं,
महान है, मंत्र हैं,अनुष्ठान हैं,
इनसेे संसद चलती है, गिरती है,
इनसे विधानसभाएं बनती हैं, बिगड़ती हैं,
जिला परिषद हो, पंचायत समिति हो,
संगठन से सरपंच तक इनका ही बोलवाला है,
इसलिए यारों आजकल ये ही महाप्रभुत्वमय हैं।
इनकी जयजयकार करो, इसी में निहाल है !
(6)
क्या हो गया इस देश की जवानी को ?
क्या हो गया इस देश की कुर्बानी को ?
कहां चले गए सब मजहब और धर्मों के कुनबे ?
कहां चली गई नीतियों और सिद्धान्तों की इबारतें ?
क्या नई गुलामी कुबूल करना ही स्वतंत्रता है !
क्या राम से लेकर गांधी तक,
सबको दीवारों पर टंगना है?
अच्छाईयां और आदर्शं,
भग्नावशेषी खण्डहर बनने थे ?
(7)
सारे प्रचार तंत्र, बन गये दुष्चारक,
सेवासदन बन गये षडयंत्र सदन,
किस राष्ट्रवाद पर विश्वास करें,
जो सिर्फ गुलछर्रे उडाता हो,
धनबल की मौलतौल में योग्यता को भुलाता है,
बहला फुसला कर महज बर्बादी पर अटकाता है,
इनसे तो वे सैनिक महान है ,
जो सीमा पर अपनी आहूती से सत्य को निभाते हैं,
कुछ सीखो समय से,
आने वाले कल में सब इतिहास बन जाता है।
(8)
देखो, सुनो, बदलनी होगी ये तस्वीर,
सत्य का सामना सत्य से ही करना होगा,
देखो, सुनो, सुननी होगी, गरीब की आह,
उसके दुखदर्द के लिये जम कर लडना होगा,
देखो, सुनो, छोड़ना होगा, आलस्य और स्वार्थ,
तुम्हें वीर बनना होगा,
प्रजातंत्र की हीर बनना होगा,
पुरखे नहीं आएंगे, हक परस्ती के मैदाने जंग में,
मगर इतिहास की स्फूर्ति संग,
तुम्हें विजेता बनना होगा।
(9)
हम देश हैं, हम धर्म हैं,
नैतिकता और जनतंत्र हैं,
हक हमारे लूटे हैं, हुक्म हमारा छिना है,
हम जो थे, उसे छला गया है,
पुरखों को जलील किया गया है,
मगर, गुलामी के अवशेषों पर जश्न है,
हम जो होने थे, उसे भी लूटा गया है,
नेताओं की सत्तामदी धृतराष्ट्रों से,
प्रशासन हुआ दुशासन ,
अन्याय, लूट, डकैती, चोरी और शोषण का आसन।
शकुनियों ने घेरा सिंहासन,राजधर्म हुआ निद्रासन,
सुबह स्वार्थपूजा, शाम को मदिरासन है,
क्या हो गया यह? क्यों हो गया है ?
(10)
सुनो कान खोल,
चंद पूंजीपतियों के लिए,
सारा देश गरीब नहीं होगा,
चंद महली खुशियों के लिए,
सारा देश आंसू नहीं पियेगा,
चंद कंपनियों की खातिर,
घर-घर का धंधा बंद नहीं होगा,
मत छेडो इस आग को,
इसमें तुम्हे भी स्वाहा होना होगा,
(11)
उद्योग में, व्यापार में, खेत में खलिहान में,
दूसरे मुल्कों का सिक्का चलना स्वीकार नहीं,
हम गोलियां खाएं, आत्महत्या करें,
जहर पिएं, फांसी लगाएं,  
मुनाफा बाहरी खायें,ये नहीं चलेगा !
ये नहीं चलेगा !!
(12)
ललकार भी हम बनें,
हूंकार भी हम बनें,
तोड़ें ये बेडियां सारी,
हर घर में सुख का दिया जले,
इसके लिए यदि जीवन ज्योति अपनी बुझे,
तो बुझा दें अभी,मगर चुप न बैठो,
चौराहों पर आओ,
चर्चा करो, प्रश्न पूछो,
उत्तरों से जूझो,खूब बहस करो,
देश हमारा, धरती अपनी,
इसका मर्म हमारा दुख-दर्द है!
(13)
प्रजातंत्र जन्मसिद्ध अधिकार है,
राष्ट्र रक्षा सर्वोपरि स्वीकार है,
जो गरीब को सुख समृद्धि दे उसके पीछे चलो,
जो गरीब का निवाला छीने,
न्याय का, नैतिकता का,
व्यवस्था का गला घोंटे,
अपने स्वार्थ के लिए समाज का,
समर्थन का मोल वसूले,
उसे धक्का देकर पीछे करो-पीछे करो,
खुद आगे बढो,आगे बढो ,
संभालों अपने ताज को,
संभालो अपने काज को,
कहो जोर से, जय श्री राम,
नहीं लेंगे अब विश्राम।
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रविवार, 17 जून 2012

जीजाबाई : छत्रपति शिवाजी माताजी




राजमाता जीजाबाई उपनाम : जीजामाता

जन्मस्थल : महाराष्ट्र  मृत्युस्थल : महाराष्ट्र

जन्म और पारिवारिक जीवन :  मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी राजा भोसलेकी माता जीजाबाई का जन्म  १२ जनवरी १५९८ को सिंदखेड गांव में हुआ था । यह स्थान वर्तमानमें महाराष्ट्रके विदर्भ प्रांतमें बुलढाणा जिलेके मेहकर जनपदके अन्तर्गत आता है । उनके पिताका नाम लखुजी जाधव तथा माताका नाम महालसाबाई था । जीजाबाई उच्चकुलमें उत्पन्न असाधारण प्रतिभाशाली स्त्री थीं । जीजाबाई जाधव वंशकी थीं और उनके पिता एक शक्तिशाली सामन्त थे ।  जीजाबाईका विवाह शाहजीके साथ अल्प आयुमें ही हो गया था । उन्होंने राजनीतिक कार्योंमें सदैव अपने पतिका साथ दिया । शाहजीने तत्कालीन निजामशाही सल्तनतपर मराठा राज्यकी स्थापनाका प्रयास किया । परंतु वे मुगलों और आदिलशाहीके संयुक्त बलोंसे हार गए थे । संधिके अनुसार उनको दक्षिण जानेके लिए बाध्य किया गया था । उस समय शिवाजीकी आयु मात्र १४ सालकी थी अतः वे मांके साथ ही रहे । बडे बेटे संभाजी अपने पिताके साथ गए । जीजाबाईका पुत्र संभाजी तथाउनके पति शाहजी अफजल खानकेसाथ एक युद्धमें वीरगतिको प्राप्त हुए । शाहजीकी मृत्यु होनेपर जीजाबाई ने सती (अपने आप को पति की चिता में जल द्वारा आत्महत्या) होने का प्रयत्न किया, परंतु शिवाजीने अपने अनुरोधसे उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया ।
        प्रेरक मातृत्व वीर माता जीजाबाई छत्रपति शिवाजीकी माता होनेके साथ- साथ उनकी मित्र, मार्गदर्शक और प्रेरणास्त्रोत भी थीं । उनका सारा जीवन साहस और त्यागसे पूर्ण था । उन्होंने जीवन भर कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियोंको झेलते हुए भी धैर्य नहीं खोया और अपने पुत्र ‘शिवा’ को वे संस्कार दिए, जिनके कारण वह आगे चलकर हिंदू समाजके संरक्षक ‘छात्रपति शिवाजी महाराज’ बने । शिवाजी महाराज के चरित्र पर माता- पिता का बहुत प्रभाव पडा । बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओंको भली प्रकार समझने लगे थे ।
 १७ जून १६७४ को माता जीजाबाई का देहावसान हो गया परंतु तब तक उन्होंने अपने पुत्र के माध्यम से स्वराज का स्वप्न पूरा कर लिया धन्य है


शौर्य और पराक्रम की शौर्यगाथा रानी दुर्गावती




24 जून पुण्यतिथि पर विशेष

शौर्य और पराक्रम की देवी रानी दुर्गावती 

- अरविन्द सिसोदिया 
शौर्य का सिर ऊंचा रहा हमेशा जबलपुर के निकट बारहा गांव है,महारानी दुर्गावती यहीं घायल हो गई थीं,एक तीर उनकी आंख में व एक गर्दन में लगा था,बाढ़ के कारण मार्ग अवरूद्ध थे तथा सुरक्षित स्थान पर पहुचना असम्भव था, सो उन्होने अपनी ही कटार को छाती में घोंप कर अपनी जीवन लीला समाप्त करली थी। इस महान बलिदान की स्मृति में एक सुन्दर स्तम्भ खडा किया गया है। जो आज सीना तान कर भारत मॉं की कोख से जन्मी गौंडवाने की शेरनी रानी दुर्गावती के शौर्य और पराक्रम को
कामुक  अकबर
क्रूर और कामुक मुगल शासक अकबर जिसकी लिप्सा मात्र भारतीय राजघरानों की स्त्रिीयों से अपने हरम को सजानेे की रही, उसने 34 विवाह किए जिसमें से 21 रानियां राजपूत परिवारों की राजकुमारियां थीं।
तीन सपूत
अकबर के शासनकाल के समय जिन तीन महान राष्ट्रभक्तों को भारतमाता ने देश सेवा हेतु जन्म दिया, उनमें प्रथम रानी दुर्गावती  दूसरे शूरवीर महाराणा प्रताप थे और तीसरे हिन्दु धर्म की आधुनिक ध्वजा गोस्वामी तुलसीदास थे। रानी दुर्गावती का शासनकाल सन1550 से 1564 तक का है। तो महाराणा प्रताप का शासनकाल 1572 से 1597 तक का है। तुलसीदास 1497 में जन्म और 1623 में परलोक गमन किया, मगर तीनों ने अपने अपने तरह से देश की महान सेवा की जिसे देशवासी लम्बे समय तक याद रखेंगें और प्रेरणास्त्रोत के रूप में उन्हे स्मरण करते रहेंगें।
जन्मभूमि
रानी दुर्गावती चन्देल वंशीय राजपूत  राजा कीर्तीराय की एक मात्र पुत्री थीं,उनका जन्म कलंजर किले (वर्तमान में बांदा जिला,उत्तरप्रदेश में ) में 5 अक्टूबर1524 को हुआ था,तब उनके पिता तत्कालीन महोवा राज्य के राजा थे। चंदेल इतिहास प्रशिद्ध राजवंश रहा है। कलिंजर और खुजराहों के विशाल किले इसी राजवंश के प्रशाद रहे है।
उनका विवाह पडौसी राज्य गौंडवाने के सूर्यवंशी राजगौैैड़ राजा दलपतशाह से 1542 में हुआ था तथा प्रथम व एकमात्र संतान पुत्र वीरनारायण का जन्म 1545 में हुआ। रानी का सुख अधिक दिन टिक नहीं सका और अज्ञात रोग से दलपतशाह की मृत्यु हो गई। वे 1550 में विधवा  हो गई। पुत्र वीरनारायण को सिंहासन पर बिठा कर उन्होने राज्यशासन संभाला,मालवा और दिल्ली के मुस्लिम शासकों से निरंतर संघर्ष करते हुए उन्होने 24 जून 1564 को युद्ध भूमि में  वीरगति प्राप्त की।
समाज ने दिया सम्मान
चन्देलों की बेटी थी,
गौंडवाने की रानी थी,
चण्डी थी रणचण्डि थी,
वह दुर्गावती भवानी थी।
रानी दुर्गाावती कीर्ति स्तम्भ,रानी दुर्गाावती पर डाकचित्र,रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय,रानी दुर्गावती अभ्यारण,रानी दुर्गावती सहायता योजन,रानी दुर्गावती संग्रहालय एवं मेमोरियल,रानी दुर्गावती महिला पुलिस बटालियन आदि न जाने कितनी र्कीती आज बुन्देलखण्ड से फैलते हुए सम्पूर्ण देश को प्रकाशित कर रही है।
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से रानी दुर्गावती का शौर्य किसी भी प्रकार से कम नहीं रहा है,दुर्गावती के वीरतापूर्ण चरित्र को लम्बे समय तक इसलिए दबाये रखा कि उसने मुस्लिमों शासकों के विरूद्ध संर्घष किया और उन्हे इनेकों वार पराजित किया। क्यों कि सरकार इतिहास की सत्यता को भी वोटों के मोलतौल पर तौलती रही । देर सबेर ही सही मगर आज वे तथ्य सम्पूर्ण विश्व के सामने हैं कि तथाकथित अकबर महान ने अपनी कामुक लिप्सा के लिए,एक विधवा पर किसी तरह के जुल्मों की कसर नहीं छोडी थी और धन्य ही रानी का पराक्रम जिसने अपने मान सम्मान,धर्म की रक्षा और स्वतंत्रता के लिए युद्ध भूमि को चुना और अनेकों बार शत्रुओं को पराजित करते हुए बलिदान दे दिया।
जन जन में रानी ही रानी
वह तीर थी,तलवार थी,
भालों और तापों का वार थी,
फुफकार थी, हुंकार थी,
शत्रु का संहार थी!
आल्हा-ऊदल के शौर्य से रचीपटी बुन्देलखण्ड की वीर भूमि यंू तो मेवाड जैसी है, जिसमें रानी की कीर्ती बुन्देलखण्ड की बेटी और गौंडवाने की बहू होने से कई प्रदेशों में फैली हुई है।
उप्र के महोवा कालिंजर मप्र जबलपुर दमोह मंडला नरसिंहपुर होते हुए चंद्रपुर महाराष्ट्र तक इसका विस्तार हे। कहा जाता है कि गौंडवाने में 52 गढ और 35 हजार गांव थे। जिनमें चौरागढ,सिंगौरगढ
बहुत ही विशाल गढ थे। बुन्देलखण्ड के बारे में कवियों ने कुछ पंक्तियों लिखि हैं-
भैंस बंधी ओरछे,पडा होसंगाबाद।
लगवैया है सागरे,चपिया रेवा पार।।
रेवा नाम नर्मदा नदी का है। यह बुन्देंलखण्ड के क्षैत्रफल का वर्णन है। झांसी,बांदा,हमीरपुर,
जालौन,ग्वालियर,दतिया,विदिशा,बीना,भोपाल,सागर,दमोह, टीकमगढ,पन्ना,जबलपुर,होसंगावाद लगभग 28-30 जिलों का विशाल भूभाग बुन्देलखण्ड कह लाता है। महाराष्ट्र का एकीकरण तो हो गया मगर राजनैतिक इच्छाशक्ति के अभाव में बुन्देलखण्ड का एकीकरण नहीं हो सका।
इस महान धरा ने गाैंडवाने की रानी दुर्गावती (महोबा,बांदा) के साथ-साथ तुलसीदास (बांदा) दिये जिनकी अमर कृति रामचरित्र मानस हमारे देश व धर्म की ध्वजा बन गयी। वीर चम्पतराय और धर्म वीर छत्रशाल की यह भूमी अनंत गौरवों से युक्त है।
मालवा की पराजय
1555 से 1560 तक मालवा के मुस्लिम शासक बाजबहादुर और मियानी अफगानी के आक्रमण गौंडवाने पर कई वार हुए, हर बार रानी की सेना की ही विजय हुई। रानी स्वंय युद्धभूमि में रह कर युद्ध करती थी। जिससे वे सैनिकों व आम जन में बहुत लोकप्रिय थीं।
अकबर से संघर्ष और बलिदान
थर-थर दुश्मन कांपे,
पग-पग भागे अत्याचार,
नरमुण्डो की झडी लगाई,
लाशें बिछाई कई हजार,
जब विपदा घिर आई चहुंओर,
सीने मे खंजर लिया उतार।
अकबर के कडा मानिकपूर के सूबेदार ख्वाजा अब्दुल मजीद खां जो आसफ खां के नाम से जाना जाता था ने रानी दुर्गावती के विरूद्ध  अकबर को उकसाया,अकबर अन्य राजपूत घरानों की तरह दुर्गावती को भी रानवासे की शोभा बनाना चाहता था। रानी दुर्गावती ने अपने धर्म और देश की दृडता पूर्वक रक्षा की ओर रण क्षैत्र में अपना बलिदान 1564 में कर दिया,उनकी मृत्यु के पश्चात उनका देवर चंन्द्र शाह शासक बना व उसने मुगलों की आधीनता स्वीकार कर ली,,जिसकी हत्या उन्ही के पुत्र मधुकर शाह ने कर दी। अकबर को कर नहीं चुका पाने के कारण मधुकर शाह के दो पुत्र प्रेमनारायण और हदयेश शाह बंधक थे। मधुकरशाह की मृत्यु के पश्चात 1617 में  प्रेमनारायण शाह को राजा बनाया गया।
चौरागढ का जौहर
आसफ खां रानी की मृत्यु से बौखला गया,वह उन्हे अकबर के दरबार में पेश करना चाहता था, उसने राजधानी चौरागढ (हाल में जिला नरसिंहपुर में) पर आक्रमण किया,रानी के पुत्र राजा वीरनारायण ने वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की, इसके साथ ही चौरागढ में पवित्रा को बचाये रखने का महान जौहर हुआ,जिसमें हिन्दुओं के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं ने भी अपने आप को जौहर के अग्नि कुंड में छलांग लगा दी थी।
किंवदंतीयों में है कि आसफखां ने अकबर को खुश करने के लिये दो महिलाओं को यह कहते हुए भेंट किया कि एक राजा वीरनारायण की पत्नि है तथा दूसरी दुर्गावती की बहिन कलावती है। राजा वीरनायायण की पत्नि ने जौहर का नेतृत्व करते हुए बलिदान किया था और रानी दुर्गावती की कोई बहिन थी ही नहीं,वे एक मात्र संतान थीं। बाद में आसफखां से अकबर नराज भी रहा,मगर मेवाड के युद्ध में वह मुस्लिम एकता नहीं तोडना चाहता था।
बदला पूरा हुआ
धर्म का प्राण थी,
कर्म का मान थी,
आजादी की शान थी,
शौर्य का अनुसंधान थी!
सिर्फ दुर्गावती नहीं वह दुर्गा का मान थी।
रानी दुर्गावती के नाती निजामशाह ने घोषणा की, कि जो आसफ खां ( रानी दुर्गावती की वीरगती का जो कारण था) का सिर लायेगा उसको इनाम दिया जायेगा। खलौटी के महाबली ने आसफ खां का सिर काट दिया और उसे बदले में कर्वधा का राज्य दिया गया। आसफ खां का सिर गढा मंढला में और बांकी धड मडई भाटा में गढा हुआ है।
......
नमन् कर रहा है।
सुनूगीं माता की आवाज,
रहूंगीं मरने को तैयार।
कभी भी इस वेदी पर देव,
न होने दूंगी अत्याचार।
मातृ मंदिर में हुई पुकार,
चलो में तो हो जाऊ बलिदान,
चढा दो मुझको हे भगवान!!
स्वतंत्रता संग्राम की महान महिला सेनानी व ” खूब लडी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी “ की शौर्यगाथा काव्य को लिखने वाली, वीररस की महान कवियित्री श्रीमति सुभद्रा कुमारी चौहान के ये शब्द ही,अद्वितीय शौर्य का प्रदर्शन करते हुए अमर बलिदान करने वाली रानी दुर्गावती की सच्ची कहानी कहते हुए महसूस होते हैं।


राधाकृष्ण मंदिर रोड,
डडवाडा,कोटा, राजस्थान।
09414180151


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रानी दुर्गावती 'एक वीरांगना'
रानी दुर्गावती ने मुगल साम्राज्य अधीन आने से मना कर दिया की मुगल सम्राट अकबर मध्यभारत में अपने पैर जमाना चाहता था। 5 गोंड़ों राज्य में से एक पर रानी दुर्गावती का साम्राज्य था। सम्राट अकबर ने रानी दुर्गावती को शांतिपूर्वक अपने साम्राज्य में मिलाने पर दबाव डाला, लेकिन महारानी दुर्गावती ने मुगल साम्राज्य के खिलाफ जंग लड़ना पसंद किया। हालांकि रानी दुर्गावती की सेना की तादाद बहुत ज्यादा नहीं थी, इसके विपरीत अकबर के पास एक बहुत बड़ी सेना थी। रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 में कालांजर जो कि अब बांदा (उत्तर प्रदेश) में हुआ, वह चंदेल वंश की थीं। जिसने मोहम्मद गजनवी की अधीनता अस्वीकार कर दी। चंदेल वंश जिन्होंने खजुराहो में 85 मंदिर बनवाये थे, जिनमें से 22 अभी अच्छी स्थिति में हैं। 1542 में दुर्गावती का विवाह दलपतशाह से हुआ। दलपतशाह गोंड राजा संग्राम शाह के सबसे बड़े पुत्र थे। विवाह के उपरांत रानी दुर्गावती ने अपने वीर पति दलपतशाह के साथ राज्य के प्रशासन और विस्तार में सक्रिय भागीदारी निभायी थी। दुर्भाग्य से कुछ वर्षों में ही दलपतशाह की मृत्यु हो गयी। उस समय उनके पुत्र वीरनारायण बहुत छोटे थे, ऐसे में रानी दुर्गावती को राजगद्दी संभालनी पड़ी। रानी ने अपने प्रशासन को वीरतापूर्वक चलाया। महिला शासक को कमजोर समझ कर बहुत से शासकों ने उन पर आक्रमण किये, परंतु रानी के रणकौशल के आगे उन्हें सिर पर पैर रखकर भागना पड़ा। रानी दुर्गावती ने अपने शासन में आर्थिक और सांस्कृतिक पहलू को विशेष महत्व दिया। वह एक मजबूत और समझदार शासिका साबित हुईं। रानी अपनी राजधानी सिंगौरगढ़ से चौरागढ़ ले गयीं। गढ़ा राज्य अपनी वैभव समृद्धि के लिए दूर-दूर तक चर्चित था। बाजबहादुर की तरह कड़ा मानिकपुर का सूबेदार आसफ खां ललचाई हुई दृष्टि से इस प्राकृतिक संपदा से लबालब राज्य को हड़पना चाहता था। उसने अचानक गढ़ा राज्य पर सन् 1564 के मध्य में 10 हजार घुड़सवार, सशस्त्र सेना और तोपखाने के साथ आक्रमण किया तो दुर्गावती ने तत्काल 2000 सैनिक एकत्र कर आक्रमण का सामना किया। यह मुकाबला सिंगौरगढ़ के शहर के एक मैदान में हुआ, जहां अब एक गांव गिरामपुर है। गोंड सेना के साथ रानी दुर्गावती ने भी हाथी पर बैठकर इस युद्ध का सामना किया था। यह युद्ध तोप का सामना तलवार से उिक्त की तरह ही था। आसफ खां का तोपखाना साथ था। रानी और रानी की गोंड सेना तोप का मुकाबला करती रही। इस साहस की कथा और गाथा का अन्त कारूणिक ही होना था। रानी अपने जंगी हाथी शर्मन पर सवार युद्ध के मैदान में डटी रही। 21 साल का राजा वीर नारायण भी बहादुरी से लड़ते हुए घायल हो गया था। रानी ने राजकुमार वीरनारायण को सुरक्षित स्थान पर भेजा और स्वयं डटी रहीं। आंख और गले में तीर लगने के बाद रानी मूर्छित हो गयी थी। महावत को रानी ने घायलावस्था में आदेश दिया था कि उन्हें अपनी कटार से मार डाले पर महावत ने ऐसा न करके उन्हें बचाना चाहा। वह सुरक्षित स्थान पर ले जाने का प्रयास करने लगा। मैदान में दुश्मनों की जीत को देखते हुए रानी ने स्वयं को दुश्मनों के हाथों में जाकर दास बनने से बेहतर मरना स्वीकार कर लिया था। रानी दुर्गावती एक वीरांगना थी।
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24 जून/बलिदान-दिवस

महारानी दुर्गावती का बलिदान

महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। महोबा के राठ गांव में 1524 ई0 की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस और शौर्य के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी।

उनका विवाह गढ़ मंडला के प्रतापी राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपतशाह से हुआ। 52 गढ़ तथा 35,000 गांवों वाले गोंड साम्राज्य का क्षेत्रफल67,500 वर्गमील था। यद्यपि दुर्गावती के मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी। फिर भी दुर्गावती की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर राजा संग्राम शाह ने उसे अपनी पुत्रवधू बना लिया।

पर दुर्भाग्यवश विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया। उस समय दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय नारायण ही था। अतः रानी ने स्वयं ही गढ़मंडला का शासन संभाल लिया। उन्होंने अनेक मंदिर,मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया।

रानी दुर्गावती का यह सुखी और सम्पन्न राज्य उनके देवर सहित कई लोगों की आंखों में चुभ रहा था। मालवा के मुसलमान शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया; पर हर बार वह पराजित हुआ। मुगल शासक अकबर भी राज्य को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था।

उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधारसिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा। रानी ने यह मांग ठुकरा दी। इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में सेनाएं भेज दीं। आसफ खां गोंडवाना के उत्तर में कड़ा मानकपुर का सूबेदार था।

एक बार तो आसफ खां पराजित हुआ; पर अगली बार उसने दुगनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया। इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये। रानी की भी अपार क्षति हुई। रानी उसी दिन अंतिम निर्णय कर लेना चाहती थीं। अतः भागती हुई मुगल सेना का पीछा करते हुए वे उस दुर्गम क्षेत्र से बाहर निकल गयीं। तब तक रात घिर आयी। वर्षा होने से नाले में पानी भी भर गया।

अगले दिन 24 जून, 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। आज रानी का पक्ष दुर्बल था। अतः रानी ने अपने पुत्र नारायण को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। तभी एक तीर उनकी भुजा में लगा। रानी ने उसे निकाल फेंका। दूसरे तीर ने उनकी आंख को बेध दिया। रानी ने इसे भी निकाला; पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया।

रानी ने अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे; पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं। गढ़मंडला की इस जीत से अकबर को प्रचुर धन की प्राप्ति हुई। उसका ढहता हुआ साम्राज्य फिर से जम गया। इस धन से उसने सेना एकत्र कर अगले तीन वर्ष में चित्तौड़ को भी जीता।

जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, वहां रानी की समाधि बनी है। देशप्रेमी वहां जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।      (संदर्भ   : दैनिक स्वदेश 24.6.2011)

शनिवार, 16 जून 2012

महान वीरांगनाः रानी लक्ष्मीबाई


1857 की क्रांति की महानायिका महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस 18 जून के अवसर पर
जनक्रांति 1857 की महान वीरांगनाः रानी लक्ष्मीबाई
अरविन्द सीसौदिया



शक्ति की अवतारी वीरांगना लक्ष्मी बाई
मूलतःमहाराष्ट,सतारा जिले के ‘बाई’गांव के निवासी
पिता -मोरोपंत तांबे, माता -भागीरथी देवी, स्थान-काशी ;गंगा तट
जन्मतिथि - ज्यादातर जगह 19 नवम्बर और कुछ जगह 13 नवम्बर 1835,जाति - मराठा ब्राह्मण,बलिदान -18 जून 1858; कुछ पुस्तकों में 17 जून भी लिखा है।  अंतिम संस्कारकर्ता -रघुनाथ सिंह, पठान गुल मोहम्मद और रामचन्द्रजी,बलिदान स्थल - स्वर्णनाला,ग्वालियर,अंतिम शब्द - ‘हर-हर महादेव’ ‘ऊं वासुदेवाय नमः’,गद्दार - झांसी का  दीवान दुल्हाजु, ग्वा,अंतिम साथी - जूही, मुंदर, रघुनाथ सिंह
पुत्र - दामोदर राव दत्तकपुत्र
हिन्दू वीरांगनाओं की परम्परा
भारतीय नारी की गौरव गाथा महामाया भगवती की अनन्य वीरता से प्रारम्भ होती है। बुद्धि के क्षैत्र में सरस्वती, अर्थ क्षैत्र में लक्ष्मी जी और शक्ति क्षैत्र में दुर्गा का सहज स्मरण हर हिन्दू को है। इसी वीरता, त्याग और बलिदान की परम्परा इस समाज में निरंतर बनी रही है। चाहे चित्तौड़ की महारानी पद्यमनी का जौहर हो, चाहे शिवाजी की मां जीजाबाई द्वारा दी गई स्वराज्य की प्रेरणा हो, चाहे महाराणा उदयसिंह की जीवन रक्षा के लिए अपने पुत्र का बलिदान करने वाली पन्ना धाय हो, चाहे मुगलों से लोहा लेने वाली रानी दुर्गावती हो, चाहे अंग्रेज सल्तनत को दिन में तारे दिखा देने वाली रानी लक्ष्मीबाई हो या पाकिस्तान के दो टुकडे कर देने वाली प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी हो, यह अजर-अटल परम्परा हिन्दुत्व की शौर्य सिद्धी का परियच और परिणाम है।
अंग्रेजों की विश्वव्यापी सल्तनत के विरूद्ध हुए 1857 के महानतम स्वतंत्रता आन्दोलन में नायकत्व तो कई वीरों को हासिल है, मगर जिस एक चरित्र ने महानायकत्व का शौर्य प्रदर्शन करते हुए, राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए जीवन उत्सर्ग कर दिया उसका नाम झांसी की रानी लक्ष्मीबाई है....!
नेहरू ने मानी 1857 की महता
सामान्य तौर पर राष्ट्रवाद को सामान्य अंक भी नहीं देने वाले पं.जवाहरलाल नेहरू ने भी यह स्वीकार किया था कि 1857 के समर ने ही अंग्रेजों की जड़ें उखाड़ने का पहला साहस किया जो सम्पूर्ण विश्व में फैल कर विश्व मुक्ति का मार्ग बन गया।
अंग्रेजों के छल कपट पाखण्ड
ईस्ट इण्डिया कम्पनी, भारत में व्यापार करने आई थी। उसने हमारी आपसी फूट और मानवतावादी सोच का फायदा उठाकर, छल, कपट और पाखण्ड की तमाम अमानवीय, घृणित और अक्षम्य कृत्यों से अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी। उसने अगले कदम के रूप में रजवाड़ों के राज्य क्षैत्र हड़पने के षडयंत्र के तहत ही एक मनमाना फरमान जारी किया कि ‘‘दत्तक ;गोद लियाद्ध पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी नहीं बन सकता।’’ इसी के चलते, झांसी को हड़पने की साजिश प्रारम्भ हुई। झांसी के राजा गंगाधर राव और रानी लक्ष्मी बाई की संतान तो उत्पन्न हुई मगर कुछ समय पश्चात ही उसका निधन हो गया, इस कारण दामोदरराव को गोद लिया गया।
पूर्वज का शौर्य बना प्रेरणा...
महाराष्ट्र के सतारा जिले के ‘बाई’ गांव के रहने वाले बलवंतराव (ब्राह्मण) के दोनों पुत्र मोरोपंत और सदाशिव, विवता के कारण पूना में पेशवा के दरबार में कार्यरत थे। अंग्रेजों ने पूना को अपने अधिकार में लेकरे पेशवा बाजीराव को मोटी पेंशन सहित बिठुर उŸारप्रदेश  की जागीर दे दी। पेशवा पूना छोड़कर बिठुर चले गये, मगर पेशवा के छोटे भाई चिमण जी बिठुर न जाकर काशी आ गए। उनका विशेष स्नेह मोरोपंत से था, सो वे उन्हें भी अपने साथ ले आये। लक्ष्मीबाई बचपन का नाम मनु, इन्हीं मोरोपंत की इकलौती पुत्री थीं। जब लक्ष्मी बाई 4 महीने की थी, तब उनकी माता जी भागीरथी देवी का स्वर्गवास हो गया। उधर पेशवा बाजीराव ने मोरोपंत को बिठुर बुला लिया सो बालिका लक्ष्मी भी बिठुर (उतरप्रदेश) पहुंच गई। बिठुर में लक्ष्मी बाई का पालन पोषण पेशवा परिवार के नाना साहब (पेशवा बाजीराव के दत्तक पुत्र) तथाराव सहाब और  तांत्या टोपे (नाना सहाब के अंतरंग मित्र) के साथ ही हुआ।
शास्त्र और शस्त्र शिक्षा राजमहल में राजकुमारों जैसी ही हुई। यूं तो सम्पूर्ण महाराष्ट्र में, मराठाओं, छत्रपति शिवाजी की यश गाथाओं का गहरा असर था। मराठा पेशवाओं की यशोगाथाऐं भी कम नहीं था, इसी कारण अक्सर लक्ष्मी बाई कहा करती थीं, ‘‘हम वीरों की कथायें पढ़ने या सुनने के लिए नहीं है, बल्कि हमें भी विजेता बनने के लिए है।’’
महारानी लक्ष्मीबाई का विवाह 1842 में झांसी के विदुर एवं निःसन्तान राजा गंगाधर राव से हुआ। आयु का भी काफी अंतर था। मगर एक सामान्य दरबारी की बेटी रानी बने, ऐसा बहुत कम होता है। रानी बनते ही उसे पांच दासियां मिली, सुन्दर, मुन्दर,झलकारी ,जूही और काशी। रानी ने उन्हें अपनी दासी न मानते हुए सखी की तरह रखा और उन्हें भी घुड़सवारी, तलवारबाजी और शस्त्र विद्या में निपुण किया। रानी का मन इस आशंका से हमेशा ग्रस्त रहा कि उसे मैदाने जंग में उतरना ही पडेगा और उसकी हमेशा यह तैयारी भी रही कि चुनौती को आते ही निबटा जाये।
रानी को एक पुत्र रत्न प्राप्त हुआ, मगर तीन माह की अवस्था में चल बसा। गंगाधर राव का स्वास्थ्य खराब रहने लगा, राजा का अंतिम समय निकट जानकर एक स्वजातीय बालक ‘आनन्द राव’ को गोद लिया गया, उसका नया नाम ‘दामोदर राव’ रख दिया गया।
राजा जानते थे कि उनके दत्तक पुत्र को ईस्ट इण्डिया कम्पनी की अधिकारिक मान्यता दिलवाना आवश्यक है अन्यथा वे उसे झांसी राज्य का उत्तराधिकारी स्वीकार नहीं करेंगे। सो उन्होंने स्वयं कम्पनी के उच्च अधिकारी मेजर एलिस को बुलवाया, एक खरीता गोद की स्वीकृति के लिए राज्य के प्रधानमंत्री से लिखवाया और अपने हाथ से अंग्रेज अफसरों को दे दिया। कम्पनी राज ने स्वीकृति का जवाबी उत्तर कभी नहीं दिया और 21 नवम्बर 1853 को अन्ततः गंगाधर राव का निधन हो गया। रानी विधवा हो गई। लगभग 18-19 वर्ष की आयु में ही विधवा होने का दुःख और दत्तक पुत्र दामोदर राव का भार.....!
बुझा दीप झांसी का, तब डलहौजी मन में हर्षाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौज भेज दुर्ग पर अपना झण्डा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झांसी आया
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झांसी हुई विरानी थी।
      - सुभ्रदाकुमारी चौहान
हालांकि रानी ने बड़े जीवट से झांसी का राज्य संचालन अपने हाथ में ले लिया था और वह कुशलता से चल भी रहा था। मगर झांसी स्थित अंग्रेजों की सैनिक छावनी में गतिविधियां बढ़ रही थीं, तैयारियों को नये सिरे से परखा जाने लगा था, जो भविष्य का संकेत था।
लॉर्ड डलहौजी का फरमान
27 फरवरी 1854 को लॉर्ड डलहौजी ने झांसी को अंग्रेज राज में मिलाने की घोषणा कर दी।
‘‘झांसी राज्य पेशवा का अखिल राज्य था। 1804 की संधि में शिवराव भाऊ ने इस बात को कबूल किया था। हमको ऐसे आश्रित राज्यों में गोद मानने, न मानने का अधिकार है। रामचन्द्र राव ने 1835 में, जिसको हमने सन् 1832 में राजा की उपाधि दी थी, मरने से एक दिन पहले किसी को गोद लिया था। वह गोद ब्रिटिश सरकार ने नहीं मानी थी। हम दामोदर राव की गोद को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। इसलिए झांसी राज्य खालसा किया जाता है और अंग्रेजी राज्य में मिलाया जाता है। पोलिटिकल एजेण्ट की सिफारिश के अनुसार रानी को मासिक वृत्ति दी जायेगी।’’
7 मार्च 1854 में लॉर्ड डलहौजी के निर्णय के क्रम में मेजर एलिस को कम्पनी सरकार की घोषणा भेज दी गई, जिसे मेजर ने रानी लक्ष्मीबाई को पढ़कर सुनाया ‘‘दत्तक को गवर्नर जनरल ने नामंजूर किया है। इसलिए भारत सरकार 7 मार्च 1854 की आज्ञा के अनुसार झांसी का राज्य ब्रिटिश इलाके में मिलाया जाता है। इश्तिहार के जरिए सब लोगों को सूचना दी जाती है कि सम्पत्ति झांसी प्रदेश का शासन मेजर एलिस के अधीन समझे और मेजर एलिस को कर दिया करें और सुख तथा संतोष के साथ जीवन निर्वाह करें।’’
रानी के लिए 5 हजार रूपया मासिक की वृत्ति की भी व्यवस्था कम्पनी सरकार ने की थी। रानी ने प्रथम तो इसे स्वीकार नहीं किया और झांसी राज्य देने से भी इनकार कर दिया। मगर बाद में उन्होंने चाणक्य नीति से काम लेते हुए सीधी लड़ाई टालने और आवश्यक तैयारी के लिए समय हासिल करने की ठानी और कम्पनी द्वारा तय की पेंशन लेने की स्वीकृति दे दी। जिससे मेजर एलिस ने मालकम के माध्यम से गवर्नर जनरल डलहौजी को एक सिफारिश भेजी -
‘‘रानी लक्ष्मीबाई को आजीवन पांच हजार रूपये मासिक दिये जायें और नगरवाला राजमहल उनकी सम्पत्ति समझी जाकर उन्हीं को दे दिया जाए। रानी या उनके नौकरों पर ब्रिटिश अदालतों की सत्ता न रहे। अपने नौकरों के अपराधों का वे स्वयं न्याय करें। राजा का निज का धन, रियासत के लेन-देन का हिसाब करके जो बाकी बचे वह और राज्य के सब जवाहरात रानी को दे दिए जाएं। राजा और रानी के रिश्तेदारों, नातेदारों की सूची बनाई जाये और उन लोगों के निर्वाह की व्यवस्था कर दी जाए।’’
लॉर्ड डलहौजी बहुत चतुर था, उसने सारी सिफारिशें स्वीकारते हुए भी एक सिफारिश बदल दी कि ‘‘राजा की निज सम्पत्ति और रियासत, जवाहरात रानी के हों, उन्होंने निर्णय किया कि यद्यपि दामोदर राव को कम्पनी ने आधिकारिक मान्यता नहीं दी है मगर हिन्दू शास्त्र के अनुसार गंगाधर राव की सभी निजी सम्पत्ति का अधिकार उसे है।’’
25 मार्च 1854 को डलहौजी की यह आज्ञा जारी हुई - पॉलिटिकल एजेण्ट ने झांसी के खजाने से 6 लाख रूपये निकालकर दामोदर राव के नाम से अंग्रेज खजाने में जमा करवा दिये जो दामोदर राव के बालिग होने पर लौटाने की बात कही गई। अंग्रेज सरकार ने झांसी का किला खाली करवाकर शहर का महल रानी को रहने के लिए दे दिया।
झांसी पर अंग्रेज अत्याचार
अंग्रेजों ने झांसी पर अधिकार करते ही तोपखाना नष्ट कर दिया,हथियार हडप लिए, रानी की फौज को कलमबंद बर्खास्त कर दिया, दीवानी, जागीरदारी, जमींदारी हड़प ली। उन्हें मामूली और अपमानजनक नौकरियां दी गई। रानी की फौज जो कलमबंद बर्खास्त की थी, उसमें से ज्यादातर को छः-छः महीने की तनख्वाह देकर छुट्टी कर दी। कर्मचारियों को पटवारीगिरी और कानूनगो बनाया, बहुत सारे छोटे जागीरदारों को भी पटवारी जैसे छोटे मोटे काम पर लगाया, एक जागीरदार आनन्द राव ने पटवारी बनने से इनकार कर दिया तो उसे नायब थानेदार बनाया। रोजी रोटी और बच्चों के कारण इस अपमानजनक व्यवहार को स्वीकार करना पड़ा। छोटे-मोटे पदों पर नौकरों की तरह काम करते हुए जमींदार वर्ग दुखी था।
रानी ने दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी स्वीकार किये जाने की अपील ब्रिटेन भेज रखी थी, वे इसका ही इंतजार कर रही थी, मगर 2 अगस्त 1854 को यह अपील भी खारिज हो गई। झांसी में कमिश्नरी शासन घोषित कर दिया गया। कई जिले बनाये गये और झांसी जिले का डिप्टी कमिश्नर गार्डन को नियुक्त किया गया।
गरीब जनता बेबस थी, किसानों पर अत्याचार बढ़ गये थे, खेतों में अनाज हो न हो, उगाही जबरिया होती थी। किसानों से बड़ी बेरहमी की जाती थी, पशु धन जब्त हो जाता था, जमीदारों को विशेष वेषभूषा या रहन सहन पर अपमानित किया जाता था।
काशी यात्रा की अर्जी रद्द
रानी को लोहे का टोप पहनने और उस पर साफा बांधने में बालों के कारण दिक्कत आती थी। उन्होंने सोचा, काशी जाकर बाल मुंडवा लिये जायें। जन्मभूमि के दर्शन और गंगा स्नान भी हो जायेगा। इस हेतु तब डिप्टी कमिश्नर गार्डन को काशी यात्रा की इजाजत  हेतु अर्जी दी गई, तो उसने उसे रद्द करते हुए इजाजत नहीं दी। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि अंग्रेज कितने निरंकुश और अमानवीय थे।
रोटी और कमल क्रांतिदूत
सम्पूर्ण भारत में एक साथ क्रांति हेतु 31 मई 1857 को 11 बजे से तय की गई थी। पूरे देश में संदेशे भेजे जा रहे थे। गुप्त चिट्ठियां सैनिक छावनियों में पहुंच रही थीं। आमजन भी इस विद्रोह के लिए तैयार थे, एक गांव से दूसरे गांव कमल का फूल या रोटी भेजी जाती थी, जो इस बात की प्रतीक थी कि हम तैयार हैं, हमारा समर्थन है, हम पूरी ताकत से भाग लेंगे।
21 दिन पहले ही धधक उठी क्रांति की आग
मेरठ छावनी में जिन सैनिकों को व्रिदोह की जिम्मेवारी दी गई थी, वे सब्र नहीं कर सके। समय से पहले 10 मई 1857 को मंगल पाण्डे ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। मेरठ और दिल्ली के सैनिकों की क्रांति का फल यह रहा कि दिल्ली के लाल किले पर सैनिकों का अधिकार हो गया, बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित किया गया। बहादुर शाह जफर  ने ‘गौवध बंद’ करने की आज्ञा जारी कर दी।
अंगेजों ने बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून (़ बर्मा ) भेज दिया गया, मंगल पाण्डे को फांसी दे दी गई। मगर क्रांति की आग फैलती ही जा रही थी, काबू में नहीं आ रही थी। सारा उत्तर भारत क्रांति की आग से धधक उठा।
चतुर लक्ष्मी बाई
झांसी में कम्पनी सरकार के पास पर्याप्त फौज नहीं थी। उसने रानी लक्ष्मी बाई से मदद मांगी, रानी ने चतुराई से कहा हमारे पास फौज तो नहीं है यदि आप अनुमति दें तो नई फौज भर्ती कर लूं। जनता की रक्षा के लिए एक अच्छी फौज जरूरी है। उन्हें स्वीकृति मिल गई।
झांसी में विद्रोह
‘‘जून को झांसी में भी एक हवलदार गुरूबख्श सिंह ने कुछ सैनिकों के साथ विद्रोह कर कम्पनी सरकार के एक पुराने किले पर कब्जा कर लिया।
अंग्रेज अफसरों को लगा कि यह कुछ सिपाहियों का मामूली विद्रोह है, सामान्य तौर पर हिन्दुस्तानी सैनिक उनके साथ हैं। इसी चक्कर में ‘डनलप’ झांसी फौज के निरीक्षण को जा पहुंचा, ज्यों ही उसने रौब से आदेश दिया, त्यों ही एक नायक ने डनलप को गोली से उड़ा दिया। अंग्रेजों में भगदड़ मच गईं।
भड़के सैनिक बेकाबू
रानी अंग्रेजों से रणनैतिक यु( लड़ना चाहती थी, मगर झांसी में तैनात अंग्रेज पलटन के विद्रोही सैनिकों ने एक न मानी और अंग्रेज अधिकारियों के किले को घेर लिया। डिप्टी कमिश्नर गार्डन को एक तीर से भारतीय सैनिक ने मार डाला, स्कीन को भी मार डाला गया। इन विद्रोही सैनिकों ने अंग्रेजों का कत्ले आम शुरू कर दिया। समय से पहले, अनियंत्रित जंग ने झांसी को अब मुकाबले के लिए मैदान में ला खड़ा किया।
फिर झांसी की रानी
झांसी में अंग्रेजों का सर्वनाश कर ये विद्रोही सैनिक रानी लक्ष्मीबाई के महल पहुंचे, उन्हें अभिवादन की गद्दी सम्भालने का आग्रह किया और ज्यादातर सिपाही दिल्ली की ओर कूच कर गये। रानी जानती थी कि झांसी की गद्दी मिल तो गई, मगर इसकी रक्षा आसान नहीं है। मगर उन्होंने सबके सामने प्रण किया कि हमारी मातृभूमि है, इसके लिए बलिदान की आवश्यकता है तो हम बलिदान देंगे।
झांसी में भी जयचन्द
झांसी के राजा गंगाधर राव का निकटतम रिश्तेदार सदाशिव राव था, जो झांसी का वारिस बनने के लिए अनेक प्रयत्न कर चुका था। उसने मौके का फायदा उठाकर झांसी राज्य क्षैत्र के करेरा किले पर कब्जा कर लिया। जबाबी हमले में रानी की सखी सेना ने उसे पराजित कर करेरा किला खाली करवा लिया। वह भाग कर ग्वालियर के सिंधिया महाराजा की शरण में जा पहुंचा। सिंधिया ने उसे सेना उपलब्ध करवाई मगर रानी की सेना ने उसे ‘ नरवर ’ से पकड़ कर झांसी के बंदीगृह में डाल दिया।
वीरता बेमिसाल
अंग्रेजों की कैद से फरार डाकू कुंवर सागर सिंह एक राष्ट्रवादी परिवार की सन्तान था, अंग्रेज राज्य में जमकर डकैती करता था, उसका भयानक आतंक था। जब रानी पर झांसी का भार आया तो ,उसने इस डाकू को स्वंय जाकर पकड लिया। उसे माफ करते हुये फौज में भर्ती कर लिया। जो अंग्रेजों से रानी की ओर से लडते हुये  बलिदान हुआ।
झांसी के गद्दार
झांसी भी जयचन्द और मीर जाफरों से बची नहीं रही। वहां भी गद्दारों का घरौंदा था, जो झांसी की सत्ता लेना चाहते थे। इनमें प्रमुख थे नवाब अली बहादुर और उनका सेवादार पीर अली तथा दीवान दल्हाजू।
प्रथम तो टीकमगढ़ (ओरछा) के दीवान नत्थे खां से नवाब ने झांसी पर आक्रमण करवाया, रानी ने कुशल रणनीति और तेज आक्रामकता के आगे उसे पराजय मिली और भागना पड़ा। उसी के साथ नवाब अली बहादुर भी झांसी छोड़ गया। पीर अली झांसी में ही बना रहा और रानी से वफादारी की चालाकी पर चालाकी खेलता रहा।
पराजित नत्थे खां के आग्रह पर ही कम्पनी सरकार के जनरल ह्यूरोज ने ही झांसी पर आक्रमण किया। पीर खां ने झांसी के दीवान दुल्हाजू को अंग्रेजों के लिए खरीद लिया और उनसे मिलवाकर झांसी को पराजित करवाया दिया।
झांसी हारी ,रानी जीती
झलकारी बाई ने रानी का छद्म रूप धरकर अंग्रेजों को चक्कर में डाल दिया और रानी को किले से निकल दिया, झलकारी बाई और उसके पति पूरन सिंह ने अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति पाई। रानी बच कर निकल गई और कालपी जा पहुंची। दुर्भाग्यवश उनके पिता मोरोपंत तांबे अंग्रेज फौज द्वारा पकड़े गये और उन्हें झांसी में ही फांसी दे दी गई।
अंग्रेजों ने झांसी पर कब्जा कर, विशालकाय पुस्तकालय जला दिया, असंख्य मकान जला दिये, बालक, युवा, वृद्धों को गोलियों से उड़ा दिया, वध कर दिया। पहले दिन अंग्रेज सिपाहियांे ने नगर की लूटपाट की दूसरे दिन मद्रासी दस्ते को लूटपाट का अवसर दिया गया। तीसरे दिन निजाम हैदराबाद की पलटन ने लूटा। मानवता का कहीं कोई नामोनिशान नहीं था, दुर्भाग्य यह था कि हिन्दुस्तान को गुलाम बने हिन्दुस्तानी रौंद रहे थे।
कालपी जा पहुंची रानी
रानी पुत्र दामोदर राव सहित कालपी जा पहुंची। वहां उसे राव साहब, तांत्या टोपे सभी मिल गये, उन्होंने रानी का स्वागत किया।जनरल ह्यूरोज ने कौंच का विद्रोह कुचल कर कालपी पर विजय प्राप्त करने के लिए सेना को कूच कर दिया।
1818 में पेशवा बाजीराव द्वितीय को कानपुर के निकट बिठुर भेज दिया गया था तथा उन्हें 8 लाख रूपये वार्षिक पेंशन देना तय किया गया। उनके कोई पुत्र नहीं था, सो उन्होंने नाना धुन्धपंत (नाना साहब) को गोद ले लिया था। पेशवा के निधन के साथ ही अंग्रेजों ने पेंशन देना बंद कर दिया, जिससे नाना साहब अंग्रेजों के कट्टर शत्रु बन गये थे।
‘ग्वालियर’ जीता
कालपी की हार  के बाद तांत्या टोपे, रानी लक्ष्मी बाई और राव साहब के संयुक्त नेतृत्व में ग्वालियर पर कब्जा कर लिया, उनका स्वागत जनता और सैनिकों ने किया। अंग्रेजों के मित्र महाराज जिवाजी राव सिंधिया को ‘ग्वालियर’ छोड़कर ‘आगरा’ भागना पड़ा। राव सहाब को ‘ग्वालियर’ का महाराजा बना दिया गया।
यमुना तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिन्धिया ने छोड़ी राजधानी थी।
- सुभद्रा कुमारी चौहान
अंग्रेज सेनापति स्मिथ ने ग्वालियर किले पर आक्रमण किया, रानी ने उसे पीछे धकेल दिया। दूसरे दिन ह्यूरोज भी अपनी सेना लेकर ग्वालियर आ गया। भयंकर युद्ध हुआ और यह दिन भी रानी की जीत का रहा। 18 जून को निर्णायक युद्ध हुआ, रानी के साथ मुन्दर, जूही, रघुनाथ सिंह, रामचन्द्र देशमुख तथा गुल मौहम्मद ने शानदार युद्ध कौशल दिखाया। अंग्रेजों की सेना को चीरते हुए यह दल स्वर्ण रेखा नाले पर पहुंच गया।
तो भी रानी मारकाट चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी, उसे वीरगति पानी थी।
- सुभद्रा कुमारी चौहान
संध्या का समय था, रानी के घोड़े के सामने जो स्वर्ण नाला आया, तो उसे घोड़ा कूद नहीं सका। दोनों पैरों पर खडा हो गया,पीछे लगे अंग्रेज सैनिकों ने रानी के मस्तक पर पीछे से वार किया। रानी के मस्तक का दायां हिस्सा कट गया। वह गंभीर रूप से घायल हो गई। इस बीच पठान गुल मोहम्मद और रघुनाथ सिंह ने उन अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। रानी को सहारा देकर बाबा गंगादास की कुटिया तक ले जाया गया ,
रानी गंगाजल लाने को कहा,गंगाा जल का पान कर हरहर महादेव बोलते हुये,रानी ने प्राण त्याग दिये। उनकी सहेली मुंदर के भी प्राण पखेरू उड़ चुके थे। उसी कुटिया की लकड़ियों से चिता सजी और अंतिम संस्कार कर दिया गया। अग्नि सी तेजस्विता अग्नि में विलीन हो गई।
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई, बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई पथ,हमको जो सीख सिखानी थी।
रानी गई स्वर्ग सिधार,चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी
- सुभद्रा कुमारी चौहान
पुरूखों की वीरता ने तेजस्वी बनाया
बिठुर के राजमहल में जिन तीन बाल सखाओं ने रणकौशल साथ-साथ सीखा था, वे थे नाना साहब, लक्ष्मी बाई और तांत्या टोपे...! काश इन तीनों की ही तरह वीरता का वरण पूरे हिन्दुस्तान ने किया होता तो स्वतंत्रता 1857-58 में ही मिल गई होती और वह खण्डित न होकर अखण्ड होती।
राधाकृष्ण मंदिर रोड,
डडवाडा,कोटा, राजस्थान।
09414180151