रविवार, 3 जून 2012

राष्ट्रवाद के महानायक ‘‘परमपूज्य श्री गुरूजी’



5 जून पूज्य श्री गुरूजी की पुण्यतिथि पर विशेष

राष्ट्रवाद के महानायक ‘‘परमपूज्य श्री गुरूजी’ 

- अरविन्द सीसौदिया
भारतीय राजनैतिक क्षितिज में जिन व्यक्तित्वों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है , उनमें से एक प्रखर राष्ट्रवादी ‘माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर’ उपनाम ‘श्री गुरूजी’ थे। जिन्होने भारतीय जनसंघ जैसा राजनैतिक दल देश को दिया जो आज भारतीय जनता पार्टी के नाम से जाना जाता है। स्वतंत्र भारत में जब राष्ट्रहित और न्याय की रक्षा की महती आवश्यकता थी तब तत्कालीन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक गुरूजी की प्रेरणा से ही जनसंघ का जन्म हुआ और इसे खडा करने में सभी स्तरों पर स्वंययेवकों को राजनीति में भेजा गया हे। उनकेे प्रखर व्यक्तित्व का सम्मान उनके स्वर्गवास होने तक बना रहा और आज भी वे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सबसे आदरणीय प्रथम दो में से एक हैं।
इसी कारण पूज्य श्रीगुरूजी के संदर्भ में बी.बी.सी. लंदन ने तब अपने प्रसारण में कहा था ‘‘नेहरू और सरदार पटेल के बाद कौन....? इस प्रश्न का उत्तर वामपंथियों के नेता नहीं, संघ प्रमुख गोलवलकर हैं।’’ श्रीगुरूजी के कृतित्व और व्यक्तित्व के संदर्भ में कोई एक पंक्ति में बात कहनी हो तो वह सिर्फ यह है कि ‘‘श्री गुरूजी के विचारों को देश की तत्कालीन नेहरूजी की सरकार ने सुना होता तो, आज भारत, अमरीका ख चीन की तरह विश्व नेतृत्व कर रहा होता।’’
उन्होंने भारतमाता को परम वैभव पर पहुंचाने के लिए 33 वर्ष तक जो अनवरत साधना की,उसी का परिणाम है कि भारत में आज भी राष्ट्रवाद है,न्याय है,कश्मीर है और लोकतंत्र है। जम्मू और कश्मीर का भारत में विलय स्वंय गुरूजी ने महाराजा हरीसिंह से बात कर संभव किया था। इस क्षैत्र की उनके ही प्रेरित स्वंयसेवक राष्ट्रभक्तों की शक्ति थी, जिसने पाकिस्तानी कबाईली सेनाओं से जम्मू की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। और यह भी सभी जानते हैं जम्मू और कश्मीर को भारत का पूर्ण अंग बनाने के संघर्ष में ही भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष एवं सांसद डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपना बलिदान किया था।
यह भी सर्व विदित है कि संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलीरात हेडगेवार एक स्वतं.ता सेनानी थे और संघ ने सर्दव इस संर्घष में ब्उ चड कर हिस्सा लिया । 1942 के भारत छोडो आंदोलन में भी स्वयंसेवकों ने भरपूर काम किया, रियासतों के विलय करने में तो सर्वाधिक मेहनत किसी ने की तो वह संघ ने की थी। बिना श्रेय लिये सब कुछ करने की आदत के कारण भले ही इतिहास के पन्नों पर वे कम अंकित हों मगर जिन्होने इन कार्यों को किया उन्हंे सब कुछ मालूम है। यह भी सर्व विदित है कि 1975 में लागू किये गये कांग्रेस के लोकतंत्र के अपहरण रूपी आपातकाल के हिटलरी साम्राज्य को देश से समाप्त करने पर मजबूर करने में संघ के ही संघर्ष किया था, डीआईआर में ये ही स्वंयसेवक ही अपना जीवन दावं पर लगा कर गिरिफतारी देने सामने आये थे।
आत्मरक्षा: जन्मसिद्ध अधिकार
वर्ष 1946 में नागपुर में आयोजित विजयदशमी महोत्सव अवसर पर उन्होने कहा था ”प्रतिकार न करने की भाषा पराक्रमी वृत्ति का घोतक नहीं है। आप भले ही प्रतिकार न करें, परन्तु उतने से ही आप पर आक्रमण करने के लिए तैयार बैठे लोग अपनी काली करतूतों से बाज थोड़े ही आने वाले हैं ? यह कभी न भूलिये कि काली मंदिर में बलि के लिए ले जाने वाला अजापुत्र (बकरा) अप्रतिकार की ही साक्षात मूर्ति होता है। हमें बलि का बकरा नहीं बनना है। आत्मरक्षा प्रत्येक व्यक्ति और समाज का प्रकृति सिद्ध अधिकार है।“
देशभक्त है संघ: सरदार पटेल
पटेल का संघ को कांग्रेस के विलय का आमंत्रण
भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल, विभाजन के दौरान व्यवस्था निर्माण और रियासतों के विलय में संघ के सहयोग से बहुत प्रसन्न थे। विभाजन के दौरान संघ का ही सेवा कार्य पाकिस्तान से भारत आये हिन्दुओं के काम आ रहा था । संघ के बडे बडे अधिकारी भारत आ रहे हिन्दुओं को बसाने की दौड-घूप में दिन रात जुटे और यही कारण है कि भारत में आज यह भेद कहीं नजर नहीं आता कि कौन कहां से आया। जबकि पाकिस्तान में भारत से गये मुस्लिमों कि दुर्दर्शा पर काई आंसू बहाने वाला भी नहीं है।
पूरे देश का एक सूत्र में पिरोने के लिये, रियासतों का विलय संभव करवाने में संघ ही पटेल के साथ खडा था। पटेल ने 1948 में परम पूज्य श्रीगुरूजी को एक पत्रोत्तर में लिखा ‘‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने संकटकाल ( विभाजन के दौरान ) में हिन्दू समाज की सेवा की, इसमें कोई संदेह नहीं। ऐसे क्षैत्रों में जहां उनकी सहायता की आवश्यकता थी, संघ के नवयुवकों ने स्त्रियों तथा बच्चों की रक्षा की तथा उनके लिए काफी काम किया। किंतु मुझे विश्वास है कि संघ के लोग अपने देशप्रेम को कांग्रेस के साथ मिलकर ही सम्पन्न कर सकते हैं।’’
हालांकि यह दूसरी बात है कि संघ ने कभी भी अन्य किसी संस्था में अपने विलय के आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया। और इस मुद्छे पर कांग्रेस में भी अंदर मतभेद था।
सरदार पटेल की कांग्रेस को चेतावनी
6 जनवरी 1948 को आकाशवाणी केन्द्र, लखनऊ से सरदार पटेल का भाषण प्रसारित हुआ, जिसमें उन्होंने संघ को श्रेष्ठ राष्ट्रभक्ति का स्रोत ठहराते हुए कहा ‘‘कांग्रेस में जो लोग सत्तारूढ़ हैं, सोचते हैं कि वे अपनी सत्ता के बल पर संघ को कुचल सकेंगे। डण्डे के बल पर आप किसी संगठन को दबा नहीं सकते। डण्डा तो चोर - डाकुओं के लिए होता है। आखिर संघ के लोग चोर - डाकू तो हैं नहीं ! वे देशभक्त हैं और अपने देश से प्रेम करते हैं।’’
चीनी आक्रमण से पूर्व सचेत किया
18 मई 1956 के पाचंजन्य साप्ताहिक में श्रीगुरूजी का ‘‘तिब्बत और कम्यूनिस्ट मुक्ति’’ नामक लेख प्रकाशित हुआ। उसमें उन्होंने सचेत किया ‘‘......यह सब मानव की लिप्सा, विस्तार वृत्ति और निरंकुशता का ही नया रूप है, जो आज तिब्बत में खुलकर मृत्यु का ताण्डव रच रहा है। तिब्बत में चीनी विजय पर खुशियां मनाने वालों के लिए तथा अपने इस देश में भी इसी प्रकार की ‘मुक्ति’ का स्वप्न देखने वालों के लिए इतिहास का यह सबक है।’’ वे लगातार कहते रहे हैं कि चीन की आंख भारत पर है, वह लद्दाख को निगल जाना चाहता है। मगर तब और न अब भारत सरकार ने कोई सार्थक नीति चीन के विरूद्ध बनाई ।
प्रधानमंत्री नेहरू के आमंत्रण पर
गणतंत्र दिवस की परेड में संघ
वाक्या तब का है जब नेहरूजी चीन युद्ध हार चुके थे और दौरान श्रीगुरूजी और संघ की देशसेवा से नेहरूजी अति प्रशन्न थे। नई दिल्ली में 26 जनवरी 1963 को गणतंत्र दिवस समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री,जवाहरलाल नेहरू के अचानक संघ को मुख्य राष्ट्रीय परेड में सम्मिलित होनें का आमंत्रण दिया । तब परेड़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक टुकड़ी लगभग 3000 की संख्या में सम्मिलित हुई। उसने पूर्ण गणवेशधारी स्वयंसेवकों की स्फूर्ति और कदमताल ने अपनी आभा अलग ही बिखेरी। गणतंत्र दिवस परेड़ का एक प्रमुख आकर्षण संघ का यह दल रहा। तब भी कुछ कांग्रेसी नेताओं ने संघ को परेड में आमंत्रित किये जाने पर आपत्ति की थी, पंडित नेहरू ने यह कहते हुए उनकी आपत्ति रद्द कर दी थी कि ‘‘देशभक्त नागरिकों को मैंने आमंत्रित किया है।’’
नेहरू की समझ में जब संघ आया और साम्यवादी विश्वासघात का पर्दा उठा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। चीन जमीन हड़प चुका था, देश की फौजों ने निशस्त्र लड़ाई लड़ी, बलिदान दिया, पंढित प्रदीप की बलिदानियों को श्रृद्धांजली ” ये मेरे वतन के लोगो जरा आंख में भरलो पानी “ आया था और इसी पश्चाताप में नेहरूजी 1964 में चल बसे।
अणुबम बनाया जाये: श्रीगुरूजी
गुरूजी ंने सरकार को चेताया था कि ‘‘सरकार को चाहिये कि सभी उद्योगपतियों, वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों का आव्हान करें तथा उनके सहयोग से यथाशीघ्र ऐसे आयुधों का निर्माण करें जो शत्रु को प्राप्त आयुधों से श्रैष्ठतर हों। कम्यूनिस्ट चीन के पास अणुबम होने से, उसका बनाना हमारे लिए भी अत्यावश्यक हो गया है। यह हमारी अंतिम विजय प्राप्ति की क्षमता के सम्बन्ध में जनता तथा सेना के मस्तिष्क में विश्वास उत्पन्न करेगा। सिद्धान्त एवं तात्विक निषेधों को बाधास्वरूप इसके मार्ग में नहीं आने देना चाहिए।’’ इस वक्तव्य के पश्चात श्रीमति इंदिरा गांधी ने इस पर कार्य को किया और 1971 में हमनें परमाणु क्षमता अर्जित कर चुके थे, मगर अमरीकी दबाव में आगे देश का परमाणु कार्यक्रम पंगु पडा रहा उसे आगे नहीं बढाया जा सका था।
जब 1998 में अटलबिहारी वाजपेयी ( एक संघ का स्वंयसेवक जिसे श्रीगुरूजी ने राजनिती में भेजा था ) की 13 महीने की दूसरी सरकार कार्यरत थी तब 11 और 13 मई को पांच परमाणु परीक्षण कर भारत में अपने आप को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश घोषित कर दिया। तब से सारी दुनिया में भारत का सम्मान बढ़ गया और उसकी बात सुनी जाने लगी।
युअर आर्मी नहीं अवर आर्मी,,,,
1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया। प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने श्रीगुरूजी को दूरभाष करके दिल्ली बुलाया और सर्वपक्षीय मंत्रणा समिति की बैठक में भाग लेने का अनुरोध किया। गुरूजी ने बैठक में जोर देकर कहा ‘‘हमारा ‘एम’ (लक्ष्य) निश्चित है, वह है अपने सम्मान की रक्षा कर आक्रामकों को करारा सबक सिखाना और विजय प्राप्त करना।’’ इसी बैठक में एक सहभागी बार-बार ‘‘युअर आर्मी’’ ( तुम्हारी सेना) शब्द का प्रयोग कर रहे थे, जब उन्होंने तीसरी बार यही शब्द कहा तो श्रीगुरूजी ने टोकते हुए कहा ‘‘युअर आर्मी नहीं अवर आर्मी (हमारी सेना) बोलिये।’’
यह एक रस हिन्दू राष्ट्र है: श्री गुरूजी
श्रीगुरूजी ने काशी विश्वविद्यालय में पहले छात्र और फिर प्राध्यापक के रूप में रहते हुए वहां के पुस्तकालय से अनेक ग्रन्थ उन्होंने पढ़े। दर्शनशास्त्र के गहन अध्ययन ने उन्हें आध्यात्म से जोड़ दिया। उन्होंने विविध उपासना मार्गों का मनोयोग से अध्ययन किया, मगर उनके तार्किक मन की तृप्ति नहीं हुई, उनकी भेंट स्वामी विवेकानन्द के गुरूभाई स्वामी अखण्डानन्द जी से हुई, जो उस समय रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष भी थे। सारगाछी में उनसे ‘‘श्रीगुरूजी’’ ने सन्यास जीवन की दीक्षा ली। अखण्डानन्द जी के निधन के पश्चात वे नागपुर लौट आये और संघ के संस्थापक केशव बलीराम हेडगेवार के सानिध्य में राष्ट्रवाद के महायज्ञ के सह भागी हो गये ।
प्रतिज्ञा: संघ में सक्रीय प्रवेश
‘‘सर्वशक्तिमान श्री परमेश्वर तथा अपने पूर्वजों का स्मरण कर मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि अपने पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति तथा हिन्दू समाज का संरक्षण कर हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं। संघ का कार्य मैं प्रमाणिकता, निःस्वार्थ-बुद्धि तथा तन-मन-धन पूर्वक करूंगा और इस व्रत का मैं आजन्म पालन करूंगा। भारत माता की जय।’’
पूर्व में ही काशी में उनके संघ से सम्बन्ध जुड़ गया था, नागपुर में तुलसी बाग मुख्य शाखा के कार्यवाह का कार्य उन्होंने किया था, मुम्बई जाकर प्रचारक का काम किया था। अकोला के संघ शिक्षा वर्ग के सर्वाधिकारी के नाते भी उत्तम कार्य किया था।
उन्होंने डॉ. हेडगेवार जी से धर्म, राष्ट्र, स्वतंत्रता, समाज-सुधार, संस्कृति आदि विषयों पर गहन विचार विमर्श किया। डॉक्टर साहब के विचार सटीक और स्पष्टता से पूर्ण होते थे, जिनका गहरा प्रभाव श्री गुरूजी पर पड़ा।
‘‘हेडगेवार जी की दृष्टि में श्री गुरूजी’’
‘‘माधवराव (श्री गुरूजी) प्राध्यापक हैं, अधिवक्ता हैं, विद्वान हैं, विचारक हैं और सबसे अधिक संघ के निष्ठावान स्वयंसेवक हैं।’’
हिन्दुत्व का शंखनाद: हम स्वराज चाहते हैं
अपनी भूमिका को स्पष्ट करते हुए उन्होंने प्रारम्भ में ही लिखा ‘‘राष्ट्रीय पुनरूत्थान के लिए कटिबद्ध होकर हम खड़े हैं। कुछ राजनीतिक अधिकारों का सतनजा बने हुए नये राज्य भाव के लिए नहीं! हम स्वराज्य चाहते हैं। ‘स्व-राज्य’ अर्थात् हमारा राज्य! पर हम कौन हैं ? हमारी ‘राष्ट्रीयता’ क्या है ? आज के इस क्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण इस प्रश्न का समुचित उत्तर देने का अब हम प्रयास करेंगे।’’ यही था श्री गुरूजी का संकल्प, यही था वह शंखनाद, जिसने उनकी भी और देश की भी एक नई राह तय कर दी, जो स्वाभिमान और सार्वभौमिकता के स्वावलम्बन से सम्मुन्नत थी।
यह हिन्दू राष्ट्र है.....
‘मराठे, राजपूत, सिख आदि क्षात्रतेज से चमकते वीरों ने प्राणों की बाजी लगाकर इस हिन्दू राष्ट्र को बनाये रखा। वह दुर्बल हुआ, पर विजीत या नमित नहीं हुआ। आज भी वह लड़ाई चल रही है।जी हां, यह राष्ट्र है। यह हिन्दू राष्ट्र है। देश, वंश, धर्म, संस्कृति और भाषा इन पांच प्रमुख घटकों से युक्त, यह एक रस हिन्दू राष्ट्र है।
ताशकन्द वार्ता भूल सिद्ध होगी: श्री गुरूजी
12 दिसम्बर 1965 को अंग्रेजी साप्ताहिक ‘‘ऑर्गेनाईजर’’ में गुरूजी की एक विशेष भेंटवार्ता प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने कहा था ‘‘मेरे मतानुसार प्रधानमंत्री के लिए ताशकन्द न जाना ही उचित होगा, क्योंकि आक्रांता और आक्रान्त को समान धरातल पर रखकर दोनों को ही वार्ता के लिए आमंत्रण दिया गया है। ताशकन्द वार्ता में यदि कोई परिणाम निकला तो वह भारतवर्ष के राष्ट्रीय हितों के लिए अत्याधिक घातक होगा। पाकिस्तान अभी भी आक्रामक दृष्टिकोण बनाए हुए है। इसलिये वृहद परिणाम पर पुनः युद्ध अवश्य होगा।
उनकी बात सही निकली, ताशकन्द में जीती जमीन वापस गई, सैनिकों का बलिदान व्यर्थ हुआ। प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जीवित नहीं लौटे और 1971 में फिर से युद्ध हुआ। पाकिस्तान का विभाजन हुआ और बांग्लादेश नया राष्ट्र बना।
प्रमुख संगठनों की स्थापना के मार्गदर्शी
सामाजिक क्षैत्र के जिन संगठनों को स्थापित करवाने में श्री गुरूजी ने महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया उनमें प्रमुख हैंः
1. विद्यार्थी क्षैत्र में अखिल भारत विद्यार्थी परिषद
2. राजनैतिक क्षैत्र में भारतीय जनसंघ (जो अब भा.ज.पा. है।)
3. श्रमिक क्षैत्र में भारतीय मजदूर संघ
4. कृषि क्षैत्र में किसान संघ
5. हिन्दु समाज के लिये विश्व हिन्दू परिषद।
जन्मकाल
गुरूजी का जन्म, फाल्गुन कृष्ण पक्ष, विजया एकादशी, सोमवार, संवत् 1962, दिनांक 19 फरवरी 1906, भोर के 4 बजकर 21 मिनिट, जन्म स्थान नागपुर, मूल नक्षत्र, चतुर्थ चरण, धनु लग्न, चन्द्र भी धनु में हुआ था।
श्रीगुरूजी के नाम से विख्यात, उदीयमान भारत के प्रतिरूप राष्ट्रचेतना के महानायक मा. माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघ चालक थे। उन्होंने अथक परिश्रम और निरंतर देश भ्रमण से लगभग 33 वर्ष तक इस पद पर रहते हुए भारत के राष्ट्रीय चरित्र के उत्थान का नवनिर्माण किया। उनकी प्रेरणा से भारतमाता को परम वैभव पर पहुंचाने के लिए एक विशाल श्रृंखला समाज के विविध क्षैत्रों में निरंतर कार्यबद्ध हैं।
वे अंग्रेजी, विज्ञान और विधि के प्रकाण्ड विद्ववान थे,  आध्यात्मिक संवेगों के कारण वे आजीवन संत के रूप में सामाजिक उन्नयन, विकास और कुरीतियों के निवारणार्थ मानवता की सेवा में कार्यरत रहे। उन्हें अपनी मृत्यु का आभास था। उन्होंने मृत्यु से पूर्व 2 अप्रैल 1973 को ही तीन पत्र लिख कर नागपुर संघ कार्यालय प्रमुख पांडुरंग पंत क्षीरसागर को सौंप दिये थे और उन्हें उनकी मृत्यु के उपरांत खोले जाने को कह दिया था।
अंतिम समय में भी हास्य-विनोद
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी लिखते हैं ‘‘दिनांक 5 जून 1973, सवेरे का समय, चायपान का वक्त, परम पूज्य श्री गुरूजी के कमरे में जब हम लोग प्रविष्ट हुए तब वे कुर्सी पर बैठे हुए थे। चरण स्पर्श के लिए हाथ बढ़ाते ही उन्होंने पैर पीछे खींच लिए। श्री गुरूजी विनोद वार्ता सुनाने लगे कि एक मरीज एक डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने पूछा - क्या कष्ट है ? सारी कहानी सुनाओ ! मरीज बिगड़ गया और बोला ‘‘अगर मुझे ही अपना रोग बताना है तो फिर आप निदान क्या करेंगे ? बिना बताये जो बिमारी समझे, ऐसा डॉक्टर मुझे चाहिये! ’’ डॉक्टर एक क्षण चुप रहे, फिर बोले ‘‘ठहरो, तुम्हारे लिये दूसरा डॉक्टर बुलाता हूं।’’ दूसरा डॉक्टर आया, वह जानवरों का डॉक्टर था, बिना कुछ कहे सब समझ लेता था।’’ यह कहानी सुन कर सभी हंसने लगे। मृत्यु शैया, कठिन बीमारी, अशक्त शरीर के बावजूद इतना अधिक आत्मबल, एक तरफ शरीर छूट रहा है, दूसरी तरह कोई दुःखी न हो, इसलिए वे लगातार विनोद किये जा रहे हैं और अन्ततः इसी दिन रात्रि 9 बजकर 5 मिनिट पर उनकी इस लोक की यात्रा पूरी हुई।
तृतीय सरसंघचालक बाला साहब देवरस
श्री गुरूजी द्वारा पांडुरंग पंत क्षीरसागर को दिये गये तीनों पत्र सबके सामने खोले गये। एक पत्र में श्री गुरूजी ने संघ के सरसंघचालक के नाते नेतृत्व का भार श्री बालासाहब देवरस के कंधो पर सौंपा था। दूसरे पत्र में उन्होंने आज्ञा दी थी कि उनका कोई स्मारक न बनाया जाये। तीसरे पत्र में श्रीगुरूजी ने अत्यंत विनम्रता से भावभीने शब्दों में प्रार्थना की थी।
अंतिम संस्कार
गुरूजी की अंतिम संस्कार यात्रा ‘रेशम बाग’ में सायं 7ः45 बजे सम्पन्न हुई। उनके चचेरे भाई वासुदेव राव गोलवलकर ने मुखाग्नि दी। लगभग तीन लाख लोगों ने इस अंतिम यात्रा में भाग लिया। देश के लगभग सभी बड़े राजनेताओं, समाचार पत्र समूहों और संतों ने उनको श्रृद्धांजलियां अर्पित की। जिसमें आचार्य विनोबा भावे, शंकराचार्य कांची कोटि पीठ स्वामी जयेन्द्र सरस्वती, पुरी के जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ, स्वामी करपात्री जी महाराज, जैन संत तुलसी, राष्ट्रपति व्ही.व्ही. गिरी, उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरूप पाठक, प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी, लोकसभा अध्यक्ष गुरूदयाल सिंह ढिल्लो, जयप्रकाश नारायण, बाबू जगजीवन राम, बाल ठाकरे, कामरेड़ तकी रहीम, साहित्यकार गुरूदत्त सहित नागपुर टाईम्स, ट्रिब्यून, टाइम्स ऑफ इण्डिया, इण्डियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, ब्लिट्ज सहित यह श्रृंखला अनन्त अनगिनत थी।

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