बुधवार, 18 जुलाई 2012

स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्र-ध्यान – II


स्वामी विवेकानन्द का राष्ट्र-ध्यान – II


स्वामी विवेकानन्द ने सारे भारत को अत्यन्त निकट से देखा था। उन्होंने भारतीयता को अपने अन्दर जीया था। इस जीवन्त अनुभूति पर आधारित उनका चिन्तन था। सामान्यतः इतिहास को विदेशी दृष्टि से देखने के आदी आधुनिक विद्वान स्वामीजी की अन्तर्दृष्टि की गहराई को नहीं पकड़ पाते है। उन्हें स्वामीजी की राष्ट्रभक्ति व उनकी मानवता में विरोधाभास दिखाई पड़ता है। इसका कारण उनका स्वयं का राष्ट्रबोध आधुनिक पश्चिमी विचार से प्रभावित है। पश्चिम में प्रथमतः साम्राज्य की राजनैतिक दृष्टि से राष्ट्रबोध जगा और द्वितीय महायुद्ध के बाद जब साम्राज्यों का पतन हुआ तब अमेरिकी नेतृत्व में आर्थिक राष्ट्रवाद का उद्भव हुआ। इन दोनों ही दृष्टि से भारत को समझने का प्रयत्न असफल ही होगा। वास्तव में इन अधुरी धारणाओं से वे भी स्वयं को परिभाषित नहीं कर पा रहे हैं। आर्थिक आधार पर अपनी मुद्राको एक कर युरोप में एक संघीय रचना युरोजोन का निर्माण हुआ किन्तु ब्रिटन मुद्रा के स्तर पर आज भी उससे अलग है और जर्मनी ने मुद्रा भले ही अपना ली किन्तु अपनी राष्ट्रीय पहचान कायम रखी है। युरोप की वर्तमान उथलपुथल का ठीक से अध्ययन करने से हम इस राजनैतिक-आर्थिक राष्ट्रवाद के खोखलेपन को समझ सकते है।


सोवियत रुस को भी द्वितीय महायुद्ध में माक्र्स के साम्यवाद के आधार पर लोगों में राष्ट्रप्रेम जगाना असम्भव हो गया था। तब धर्म को अफीम मानने वाले साम्यवादी देश ने अपने पारम्पारिक गिरीजा (Russian Orthodox Church) को बन्धनों से मुक्त किया और पादरियों ने लोगों में देशभक्ति जागृत की। स्टालीन ने उसके बाद पूरे देश में ही चर्च को उनके स्थान वापिस लौटाये। आज चीन को भी यह मर्म समझ आया है। अतः अपनी जड़ों को सुदृढ़ करने के लिये उन्होंने बौद्ध व कन्फूशियस धारणाओं को पुनर्जीवित करना प्रारम्भ कर दिया है। विश्व के 100 से अधिक विश्वविद्यालयों में इनके अध्ययन केन्द्र खोलने के लिये चीन सरकार ने पैसा लगाया है। अमेरिका में भी अपने स्वत्व की खोज गत 25-30 वर्षों से हो रही है। 9/11/2001 के आतंकी हमले के बाद तो उसमें अधिक आग्रह आ गया है। विभिन्न सभ्यताओं के पिघलन पात्र (Melting Pot) के रुप में परिभाषित किये जाने वाले राष्ट्र ने स्वयं की खोज के लिये एक रणनीति विशेषज्ञ सेम्यूएल हण्टिंग्टन को प्रकल्प दिया ‘हम कौन है?’ (Who are We?) उस अनुसंधान के निष्कर्ष में वह लिखता है अमेरिका में भलेही विश्व के लगभग सभी समुदायों के लोग बसते हो किन्तु अमेरिका की मौलिक पहचान ‘श्वेत, आंग्ल-सैक्सन, प्रोटेस्टण्ट’ (WASP– White, Anglo-Saxon, protestant) यही है। बाकि सभी समुदायों को अपने आप को इसमें सम्मिलित (Assimilate) करना ही होगा। परसो ही ख्रिसमस के अवसर पर ऑक्सफोर्ड में बोलते हुए ब्रिटिश प्रधानमन्त्री ने घोषणा की कि ब्रिटेन एक इसाई राष्ट्र है और इसे कहने में किसी संकोच अथवा भय की आवश्यकता नहीं है।

कुलमिलाकर आज विश्व भी यह मानने की ओर चल पड़ा है कि राष्ट्रीयता का आधार संस्कृति व धर्म ही होता है। स्वामी विवेकानन्द ने इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का परिचय भारत को करवाया। उन्होने हिन्दूत्व को भारत की राष्ट्रीय पहचान के रुप में पतिष्ठित किया। ‘हिन्दू राष्ट्र’ इस शब्दावली का प्रथम प्रयोग सम्भवतः स्वामी विवेकानन्द ने ही किया है। शिकागों में अपने प्रथम भाषण में उन्होंने अपने हिन्दू होने पर गर्व का विस्तार से वर्णन किया है। 17 सितम्बर को तो उनके द्वारा प्रस्तुत ‘हिन्दू धर्म पर प्रबन्ध’ हिन्दूत्व की राष्ट्रीय परिभाषा है। (http://www.ramakrishnavivekananda.info/vivekananda/volume_1/vol_1_frame.htm) इस राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समझने पर हमें हमारे विशाल देश की बाहरी विविधता में अन्तर्निहित एकात्मता के दर्शन होते है। विविधता राजनैतिक व्यवस्था में भी रही हेागी किन्तु सहस्राब्दियों से यह भारतवर्ष, आर्यावर्त एकसंध सांस्कृतिक राष्ट्र रहा है। स्वामीजी ने शिकागो दिग्विजय से वापसी पर पूरे भारत में इसी राष्ट्रवाद का जागरण किया। उन्होने स्पष्ट घोषणा की कि केवल अन्ध देख नहीं पाते और विक्षिप्त बुद्धि समझ नहीं सकते कि यह सोया देश अब जाग उठा है। अपने पूर्व गौरव को प्राप्त करने से इसे अब कोई नहीं रोक सकता।

उन्होंने हिन्दूओं को सब भेदों से उपर उठकर अपनी राष्ट्रीय पहचान पर गर्व करना सिखाया। लाहौर में जब आर्यसमाज व सनातनी उनका अलग अलग सम्मान करना चाहते थे तब उन्होंने स्वीकार नहीं किया। एक मंच पर आर्यसमाज, सनातन धर्म सभा व सिख समाज ने उनका स्वागत किया। उन्होंने वक्तव्य का विषय चुना, ‘हिन्दूत्व के सामान्य आधार’। (http://www.ramakrishnavivekananda.info/vivekananda/volume_3/vol_3_frame.htm) समस्त विविधताओं, मतभेदों व कभी कभार तो विवादों से उपर हिन्दूत्व की एकात्मक भुमिका को स्वामीजी ने सैद्धान्तिक विश्लेषण के साथ प्रस्थापित किया। प्रत्येक हिन्दू को यह व्याख्यान अवश्य पढ़ने चाहिये। स्वामीजी के इस विचार को उनके अनुयायी भगीनी निवेदिता तथा योगी अरविन्द और अधिक विस्तार से अपने लेखन में स्पष्ट किया है। भगीनी निवेदिता द्वारा लिखित ‘आक्रमक हिन्दूत्व’ ( Aggressive Hinduism – http://www.archive.org/stream/selectessaysofsi015303mbp/selectessaysofsi015303mbp_djvu.txt) तथा योगी अरविन्द की ‘भारतीय संस्कृति की रक्षा के द्वारा भारत का नवजागरण’  (The Renaissance in India with the Defence of Indian Culture – http://www.sriaurobindoashram.org/ashram/sriauro/writings.php)  यह दो विशेष पठनीय हैं। उस समय पश्चिमी पाठकों के लिये लिखी इन रचनाओं को आज के आधुनिक भारतीय युवा भी ठीक से समझ सकते है।

कन्याकुमारी में स्वामीजी ने भारत के पतन के जिन कारणों पर चिन्तन किया होगा उनमें यह आत्मविस्मृति प्रथम स्थान पर होगा। ऐसा हम इस आधार पर कह सकते है कि इसी के उपाय के लिये वे सारा जीवन कार्यरत रहे। उनका पश्चिम प्रवास व भारत लौटने के बाद विपरित स्वास्थ्यदशा के बावजूद पूरे देश का तुफानी दौरा दोनों ही भारत के स्वत्व व स्वाभमान के जागरण का माध्यम बनें। लगभग एक शताब्दी के ब्रिटिश शासन ने वह आघात किया था जिसे अब तक के कोई आक्रांता नहीं कर पाये थे। भारत के मन को तोड़ने का कार्य ब्रिटिश लेखकों, शासकों व शिक्षाविदों ने सफलतापूर्वक किया था। स्वामीजी प्रताड़ना करते है कि यह कौनसी शिक्षा है जो आपको पहला पाठ पढ़ाती है कि आपके माता-पिता व पूर्वज मूर्ख है और आपके आराध्य देवी देवता शैतान। 50 वर्ष पूर्व जिस देश के बारे में कहा जाता था कि यहाँ लोग दीन नहीं है। किसी के भी आँखों में भय अथवा संकोच नहीं है उस देश में स्वामीजी ने जब निस्तेज युवाओं को देखा तो उनके मन को कितनी पीड़ा हुई होगी। मद्रास के युवाओं को अपनी समरनीति समझाते हुए वे पूछते है क्या आपकी रातों की नींद नहीं उड़ जाती जब आप इन ऋषियों के वंशजोंको अज्ञान व अंधविश्वास के अन्धःकार में पड़ा देखते हो? यह बात हमें बताती है कि उनके मन में इस विषय को लेकर कितनी पीड़ा थी और क्यों वे रात रात भर सो नहीं पाते थे? अमेरिका की सुख सुविधा में भी उनके यजमान सुबह उनके तकिये को भीगा हुआ क्यों पाते थे? अपने देशबांधवों के प्रति इस करुणा का आधार केवल भौतिक विपन्नता नहीं था। अधिक गहरी पीड़ा खोये स्वत्व की थी। सिंह का सिंहत्व जगाने की चुनौति उन्होंने अपने जीवनव्रत के रुप में कन्याकुमारी में स्वीकार की। स्वामी विवेकानन्द ने इस बात को कई बार दोहराया था कि भारत के पतन का कारण धर्म नहीं है, अपितु, धर्म के मार्ग से दूर जाने से ही भारत का पतन हुआ है। इतिहास साक्षी है कि जब जब हम अपने धर्म को भूल गये तब तब हमारा पतन हुआ। हर बार धर्म के जागरण से ही नवोत्थान की लहर चली। स्वामीजी के समय धर्मग्लानी के जो तीन प्रखर लक्षण स्वामीजी ने देखे थे वे आज भी कमोवेश समाज में वैसे ही व्याप्त दिखाई देते है। ये लक्षण थे
1.    जन सामान्य का अनादर
2.    नारी शक्ति का अवमान
3.    शुभकार्य में रत लोगों में आपसी ईष्र्या
स्वामीजी का मानना था कि इन तीन समस्याओं का निदान ही भारत के उत्थान का एकमात्र उपाय है। हालांकि इन तीनों स्तरोंपर विलक्षण कार्य गत शताब्दी में हुआ है। संविधान व विधिक संरचना के स्तर पर सामान्य जनों व नारी के लिये विभिन्न अवसरों का निर्माण स्वतन्त्र भारत में किया गया। समाज के इन घटकों में बड़ी मात्रा में जागरण भी देखने को मिला है। आज भी अनेक पीछड़े क्षेत्रों में हम नहीं पहुँच पाये है फिर भी प्रयासों में कमी नहीं है। गति व प्रगति दोनों हो रही है। ईष्र्या को दूर कर संगठित होने का प्रक्रम भी समाज के स्तर पर तो बड़ी मात्रा में चला है। विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण स्वामीजी की प्रेरणा से ही हुआ है। आज समाज के विविध क्षेत्रों में स्वयंसेवक निःस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे है। फिर भी इन कार्यों में प्रामाणिकता से संलग्न कार्यकर्ताओं से लेकर आरामकुर्सी में बैठकर समाचारवाहीनियों पर चर्चा सुनते हुए क्रांति की बाते करनेवाले घरेलु विचारकों तक कोई भी देश की वर्तमान अवस्था से संतुष्ट नहीं होगा। विदेशी मानसिकता, बौद्धिक दासता, स्वार्थी राजनीति ऐस बाह्य कारकों पर दोष ड़ालकर भी हम अपने आप से संतुष्ट नहीं हो सकते। हम जानते है कि बात इतनी भर नहीं है।
सामान्यसा चिकित्सक भी जानता है कि केवल लक्षणों का उपाय करने से स्थायी उपचार सम्भव नहीं है। इस बाह्य विघटन के जड़ में है आत्मविस्मृति। हम अपने स्वत्व को ही भूल गये है। अमेरिका की तरह ही भारत को भी अपने आप से पूछना होगा। ‘हम है कौन?’ भारतीय होने का अर्थ क्या है? अपने स्वयं के ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर अपनी खोज। अपने पूर्वजों के धर्म व संस्कृति के आधार पर अपनी राष्ट्रीयता की खोज। इस सबके लिये आवश्यक है -धर्म जागरण। जबतक भारत में पुनः धर्म को प्रतिष्ठित नहीं किया जायेगा तब तक सारे प्रयास अधुरे ही होंगे। स्वामीजी ने इस नवजागरण का सुत्रपात किया था। उन्होंने आहवान किया था युवाओं का कि उनकी इस योजना पर कार्य करें। आश्वासन भी दिया था कि जो उनके कार्य में जुट जायेगा वे स्वयं कंधे से कंधा लगाकर उसका साथ देंगे। आज भी उनके कार्य को अपना जीवनव्रत बनानेवाले युवा इस सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव करते है। एक अनुपम अवसर हमारे समक्ष है। 2013 स्वामीजी की सार्ध शती, 150 वी जयंति का वर्ष है। पूर्वतैयारी प्रारम्भ हो चुकी है। एक स्वामी विवेकानन्द का कार्य पूर्ण करने शत-सहस्रों समर्पित युवाओंकी आवश्यकता है।

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