शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

भारत का प्रथम जलियांवाला हत्याकाण्ड : मानगढ़.राजस्थान

 भारत का प्रथम जलियांवाला मानगढ़ हत्याकाण्ड


Saturday 14 Nov] 2009 08:01 PM

Dr. Deepak Acharya :: Spiritual path
With regard to the quest for spirituality, it can be said that there are various spiritual paths which can be followed, and therefore no objective truth or absolute by which to decide which path is better. Because every person is different, the choice can be left to the individual's own sensitivity and understanding

 देश की जनजातियों में राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात में बसने वाली भील एक प्रमुख जनजाति है। इतिहास में सदा-सदा याद किया जाता रहेगा दक्षिण राजस्थान गुजरात व मध्यप्रदेश के भीलों का योगदान। 19 वी शताब्दी के उत्रार्द्ध में एक ऎसा चमत्कारी अवतारी पुरूष जन्मा जिसने जनजातियों में समाज सुधार का प्रचण्ड आंदोलन छेडकर लाखों भीलों को भगत बनाकर सामाजिक जनजाग्रति एवं भक्ति आंदोलन के जरिये आजादी की अलख जगाई। साथ ही भीलों के सामाजिक सुधार के अनेक कार्य किये। पर वस्तुतः यह अंगे्रजी शासन के खिलाफ स्वाधीनता का आंदोलन था। जन साधारण में असाधारण आंदोलन की नींव रखने वाले इन महान व्यक्ति का नाम गोविन्द गुरु था। उनका जन्म डूंगरपुर नगर से 23 मील दूर स्थित बांसीया गांव में 20 दिसम्बर, 1858 को गोवारिया जाति के बंजारा परिवार में हुआ। इनके बचपन का नाम गोविन्द था। बचपन से ही कुशाग्रबुद्धि व कुछ ऎसे असामान्य लक्षण एवं रूचियां थी जो हरेक को आकर्षित करती थी। उस जमाने में जब स्कूल एवं पाठशालाएं प्रायः नहीं होती थी ऎसे में जंगलों में रहकर भी गोविन्द ने गांव के पुरोहितों से कुछ अक्षर ज्ञान प्राप्त किया। बंजारा जाति के होते हुए भी उनमें बचपन से ही सात्विक संस्कार थे। बचपन से मांस एवं मदिरा से दूर रहने, नित्य स्नान करने, पूजा-अर्चना कर गले में रूद्राक्ष की माला पहनते थे। इसी प्रकार के जीवन के कारण आस-पास के लोग उन्हें गोविन्द गुरु कहने लगे। कहा जाता है कि सन 1881 में स्वामी दयानन्द सरस्वती कई महिनों तक राजस्थान में रहे और जब वे अजमेर होते हुए उदयपुर पहुँचे तो गोविन्द गुरु ने उनसे भेंट की और कुछ समय तक वे स्वामीजी के सान्निध्य में रहे। उस समय गोविन्द गुरु की अवस्था केवल 23 वर्ष की थी किन्तु उन्हें तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों, सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र के अवमूल्यन और अपने भील समाज की कुरीतियों और दुव्र्यसनों का अच्छा ज्ञान था। तत्कालीन परिस्थितियों की अच्छी जानकारी होने के कारण ही वे स्वामी दयानन्द के बारें में जानते थे इसी वजह से उनसे भेंट की और उन्होंने भील समाज को सुधारने और संस्कारित करने के उपायों पर विचार-विमर्श किया। स्वामी दयानंद से अपनी भेंट के कुछ दिन बाद ही गोविन्द गुरु ने डूंगरपुर आकर सुराता गांव में पहला सम्मलेन बुलाया और सम्प सभा की स्थापना की। जिसका उद्देश्य जनजातीय समाज में शिक्षा, एकता, बन्धुत्व और संगठन का प्रचार करना, अंध-विश्वास और कुरीतियों को दूर करना, साथ ही बेगार जैसी अन्यायपूर्ण और घृणित प्रथा का विरोध करना था। सम्प सभा के जरिये काम बढ़ता गया और धीरे-धीरे गोविन्द के लाखों भगतों के गुरु हो गये। दस-बीस बरस में दक्षिण राजस्थान मालवा व गुजरात में भील क्षेत्र में काफी बदलाव आया। इस बीच विधाता का लेख कौन जानता है, कहते हंै सन् 1889 संवत् 1956 में महा दुर्भिक्ष अकाल पड़ा। काफी लोग मारे गये बीमारियां फैली लोग असहाय हो गये। इस अकाल को छप्पनियां काल कहते हैं। ऎसे समय में गोविन्द गुरु व भगतों ने काफी सेवा कार्य किया। गोविन्द गुरु ने दूसरा सम्मेलन बांसिया जिसे ‘छाणी मगरी’ कहते हैं। वहां बुलाकर खास-खास भगतों को सम्मानित किया। गोविन्द गुरु के बढ़ते प्रभाव के कारण डूंगरपुर के महारावल को राज्य का खतरा पैदा होने लगा जिस पर गोविन्द गुरु को गिरफ्तार करवाया और लालच देकर मनाने की कोशिश की लेकिन गोविन्द गुरु नहीं माने। उनकी गिरफ्तारी का समूचे वागड़ क्षेत्र में विरोध हुआ। विद्रोह की तैयारी की गुप्तचर रिपोर्ट हुई, कुरिया भगत डूँगरपुर गये। बातचीत की व गुरु को रिहा किया गया। यह वह समय था जइ उनका कार्य क्षेत्र बढ़ता चला गया। मालवा गुजरात में भी गोविन्द गुरु का काम बढ़ चुका था। इस बढ़ते हुए प्रयास और संगठित भीलों की शक्ति को देखकर अंगे्रजी शासन गोविन्द गुरु के पीछे पड़ गया। उन्होंने संतरामपुर रियासत के डॅूंगर गांव में पूजा पारगी के घर बैठक की जिसमें गुरु के विशेष सहयोगी पूंजा पारगी, कुरिया भगत, कलजी, भेमा भगत, जोरजी भगत, लेम्बा भगत, लखजी भगत, नगजी भगत, शामिल थे, यहां पर उन्होंने अपना आसन मानगढ़ पहाड़ी पर लगाने का निश्चय किया। इससे पहले बताते हैं कि कहीवाड़ा और फलवा गांव में गोविन्द गुरु के हाथ से धूंणी स्थापित की गई। इस प्रकार मानगढ़ मुख्य केन्द्र हुआ जहां से क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर धूणियां स्थापित हुई जिसकी शहादत आज भी मौजूद है। गोविन्द गुरु की सम्प सभा के आर्थिक, सामाजिक आंदोलन के उद्देश्य ये थेः- (1.) शराब मत पीओ और माँस मत खाओ। (2.) चोरी, डाका, लूटमार मत करो। (3.) मेहनत से काम करो, खेती मजदूरी करके अपना व परिवार का जीवन बिताओ। (4.) गांव-गांव में पाठशाला खोलकर बच्चों व बड़ों में ज्ञान का प्रकाश फैलाओ। (5.) भगवान में आस्था रखो, रोज स्नान व हवन करें। नारियल की आहुति दो। अगर पूरी विधि से इतना न कर सको तो भी कम से कम गोबर के कण्डे पर घी की कूछ बूंदें डालकर हवन नियम निभाओ। (6.) अपने बच्चों को संस्कारित करो। गांव -गांव में, घर-घर में कीर्तन-व्याख्यान करो। (7.) अदालतों में मत जाओ और अपने गांव के झगड़ों में गांव की पंचायत के फैसले को सर्वोपरि मानो। (8.) अंगे्रजी की पिट्ठु राजा, जागीरदार या सरकारी अधिकारी को बेगार मत दो। इनमें से किसी का भी अन्याय मत सहो, अन्याय का सामना बहादुरी से करो। (9.) स्वदेशी का उपयोग करो। देश के बाहर की बनी किसी वस्तु का उपयोग मत करो। यद्यपि यह सारी बातें बड़ी निर्दोष थी, किन्तु सामन्तवादी रजवाड़ों को इनसे खतरे की गंध आने लगी। गोविन्द गुरु पाठशालाएं खुलवाते थे और बांसवाडा-डूँगरपुर, उदयपुर, सिरोही, रियासतों के पुलिस और राज्य कर्मचारी स्कूल बंद करवाते थे और बच्चों तथा अध्यापकों को मार-पीट कर भगा देते थे। गोविन्द गुरु की सम्प सभा भील व गरासिया आदि जनजातियों के गांवों में शराब बंदी कराती थी। और रियासती पुलिस उन्हें शराब पीने को मजबूर करती थी। जब रूद्राक्ष की मालाएं पहनने वाले गोविन्द गुरु के अनुयायियों ने बेगार देना बंद कर दिया , तब तो उन पर राजाओं और जागीरदारों के अत्याचार और बढ़ गये। सैकड़ों भीलों को मरवा डाला गया। कोड़े लगवाये और सम्प सभायें भंग करने के लिए तरह-तरह की पीड़ाएं दी गई। किन्तु यह सारे अत्याचार गोविन्द गुरु और उनके भगतों को अपने मार्ग से नही डिगा सके। जब यह तरीका निष्फल हुआ तो गोविन्द गुरु पर यह आरोप लगाया जाने लगा कि वह सत्ता के भूखे हैं और रियासतों के राजाओं को हटाकर उनका सिंहासन छिनना चाहते हैं। इसी तरह की शिकायतें राजाओं ने अंगे्रजी रेजीडेन्ट के पास भेजनी शुरू की। अगे्रज सरकार पहले ही कहाँ चाहती थी की देश में कहीं भी कोई जागृति या सुधार हो। अब तो इन चार रियासतों की शिकायत पर और इन्हीं के कन्धे पर बन्दूक रखकर गोविन्द गुरु के क्रान्तिकारी आन्दोलन को दबाने की उसे सुविधा और बहाना मिल गया था। डूँगरपुर बांसवाड़ा व कुशलगढ़ को राजाओं ने अंगे्रज रेजीडेन्ट के पास लिखित शिकायतें भेजी कि लोग संगठित होकर स्वतंत्र भील राज्य की स्थापना करना चाहते हैं और उसके लिए भारी तैयारियां कर रहे हैं। शिकायतों के साथ ही इन रियासतों ने रेजिडेन्ट से भीलों के विद्रोह को दबाने के लिए सैनिक सहायता मांगी। रेजिडेन्ट को इस बेबुनियाद शिकायत को दूर करने के लिए थोड़ा सा आधार मिल गया। हुआ यह कि गुजरात राज्य के संतरामपुर जिले के गठरा नामक गांव में थानेदार बहुत अत्याचारी था और आदिवासियों की बहु-बेटियां उठवा लिया करता था। उसकी करतुतों से क्रुद्ध होकर पूंजा, धीरा भील ने उसकी हत्या कर दी। संतरामपुर का राजा पहले ही भील आंदोलन से चिढ़ा बैठा था। इस घटना से वह घबरा गया और अपने आस-पास की रियासतों बडौदा, देवगढ़ तथा बारिया के राजाओं और अहमदाबाद तथा गोधरा के अंगे्रज कमिश्नरों को तार भेजा कि भील उसके राज्य के विरूद्ध विद्रोह करने वाले हैं। पास में ही मानगढ़ की एक पहाड़ी है इस पहाडी पर सन् 1903 से प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन गोविन्द गुरु के अनुयायी मेले के रूप में इकट्ठे होते थे और विशाल धूंणी में घी और नारियल चढ़ाते थे। गोविन्द गुरु ने भक्तों को आह्वान किया कि इस दुनियां को जितना जल्दी हो, बदल देना चाहिये अब नयी चुनौतियां सामने हैं। पहले तो जागीरदार, सामंत और रजवाडे़ ही लूटते थे। इस लूट में अब अंगे्रज भी शामिल हो गये हैं। इसे समझो, कुरीतियों को त्यागकर रजवाड़ों तथा अंगे्रजों के खिलाफ आवाज करो। सामाजिक सुधार के लिए आगे बढ़ो और संघर्ष को विकसित करो। जीवन का, स्वाभिमान का यही मूल है। नवम्बर 1913 (कहीं-कहीं दिसम्बर 1908 भी वर्णित है) में यह पूर्णिमा आने ही वाली थी और पहाड़ी पर भीलों का जमघट होने वाला था। संतरामपुर के राजा को बहाना मिल गया और उसने यह अफवाह फैलायी कि मेरे राज्य पर हमला करने के लिए डेढ़ लाख भील मानगढ़ पहाड़ी पर एकत्रित होने वाले हैं। इसके लिए सैनिक कार्यवाही की जाये और भीलों के सेनापति गोविन्द गुरु को गिरफ्तार किया जाए। पूर्णिमा का दिन था उधर श्रृद्धालु भील हाथों में नारियल व घी के कटोरे लिये पहाड़ी पर चढ़ते चले आ-जा रहे थे। स्त्रियां, बच्चे, बूढे, युवतियां सभी इस जन समुुद्र में गाते बजाते शामिल थे। पुरुषों के कन्धों पर उनके धनुष-बाण सुशोभित थे। उधर अंगे्रज रेजिडेन्ट के आदेश पर खैरवाड़ा की छावनी के सैनिक नरसंहार के लिए मानगढ़ पहाडी की और कूच कर रहे थे। गोविन्द गुरु पूर्ण भक्तिभाव से अपनी प्रज्वलित धूनी को देख रहे थे। सैनिकों ने पहाड़ी को घेर लिया और बिना कोई सूचना या चेतावनी दिये अपनी बन्दूक के घोडे़ दबा दिये। धूनी में घी और नारियल चढ़ाने के लिए उठे अचानक निर्जीव होकर गिर गये। इससे पहले कि भक्त समझ सके कि क्या हुआ, सैकड़ों निर्जीव देह भूमि पर बिछ गये। प्रतिरोध का तो सवाल ही नही था। भील लड़ने नहीं, हवन में आहुति डालने आये थे किन्तु यहां तो कितनों को जीवन की ही आहुति देनी पड़ी। इस नरसंहार का कोई सही-सही रिकार्ड नहीं मिलता। लेकिन लाखों की भीड़ पर चारो ओर से कई घण्टे तक गोलीबारी होती रहे तो मरने वालों की संख्या हजारों में ही होगी। अनुमान है कि इस राक्षसी नरसंहार में 15 हजार भील मारे गये। गोविन्द गुरु को गिरफ्तार कर अहमदाबाद की सेन्ट्रल जेल में ढाई मास तक तो बिना सुनवाई के ही रखा गया। और बाद में थानेदार की हत्या के आरोप में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। प्रीवीकाउन्सिल में अपील करने पर फांसी की सजा 10 वर्ष के कारावास में बदल दी गई। गोविन्द गुरु की पत्नी को भी कुछ दिनों के लिए जेल में रखा गया। प्रथम महायुद्ध को जीतने की खुशी में अंग्रेज सरकार ने कुछ कैदियों को माफी दी। इसी सिलसिले में गोविन्द गुरु भी समय से कुछ पूर्व जेल से छूट गये। किन्तु उनके डूँगरपुर, कुशलगढ़ और बांसवाड़ा प्रवेश पर रोक लगा दी गई। अपना अंतिम समय गोविन्द गुरु ने गुजरात के कम्बोई नामक गांव में खेती-बाड़ी करके व सेवा कार्य करके बिताया। आखिर एक न एक दिन तो जाना ही था। भीलों में स्वाधीनता आंदोलन की अलख जगाने वाले महान क्रान्तिकारी सामाजिक धर्मिक आन्दोलन के प्रणेता गोविन्द गुरु का 20 अक्टूम्बर 1931 को कम्बोई (लिमड़ी के पास) में स्वर्गवास हो गया। कम्बोई में उनकी समाधि बनी हुई है जहाँ प्रतिवर्ष आखातीज व भादवी ग्यारस को मेला लगता है। जिसमें पाठ पूजन होता है। गोविन्द गुरु के दो पुत्र थे - हरू (हरिगिर) व अमरू (अमरगिर)। उनके चार पौत्र आज भी हैं हरिगिर के मानसिंह व गणपत व अमरगिर के रामगिरजी व मोतीगिरजी। जलियांवाला बांग में 400 लोग मारे गये थे और 800 घायल हुए थे। इस भीषण काण्ड से सारे राष्ट्र का दिल दहल गया था, किन्तु मानगढ़ पहाडी पर 15 हजार भीलों के नरमेध को आज भी हम जानते तक नहीं। इतिहास में इनका कहीं नाम निशान तक नहीं। उपेक्षा या अज्ञान, कारण कुछ भी रहा हो इस भूल का परिमार्जन यही है कि हम अपने देश के 10 करोड़ भील बन्धुओं के इतिहास को अपना इतिहास मानें, उनके महापुरुषों को अपना और उनकी कुर्बानी को अपनी कुर्बानी मानें। नरसंहार घटना के पश्चात् मानगढ़ पहाड़ी क्षेत्र को प्रतिबंधित कर दिया गया। गुजरात व राजस्थान के मध्य सीमा रेखा को लेकर विवाद भी हुआ। सन् 1952 से गोविन्द गुरु के शिष्य जोरजी भगत ने यज्ञ कर पुनः धूंणी प्रज्वलित की। वर्तमान में इस स्थल पर हनुमान, वाल्मिक भगवान निष्कलंक, राधाकृष्ण, बाबा रामदेव, राम, लक्ष्मण, सीता एवं गोविन्द गुरु की मूर्तियां स्थापित है। गोविन्द गुरु द्वारा स्थापित धूंणी है जहां प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को हजारों देश भक्त श्रृद्धा से नतमस्तक होते हैं घी, नारियल आदि हवन में डालते हैं। महंत नाथूरामजी इस स्थान की देख-रेख करते हैं। गुजरात तथा राजस्थान सरकार द्वारा दो सामुदायिक भवन बनाये गये हैं। राजस्थान सरकार द्वारा आनन्दपुरी से यहां तक पहुंचने के लिए 14 किलोमीटर तक डामर सड़क बनायी गयी है। आज मानगढ़ इस राष्ट्र की ऎतिहासिक धरोहर है तथा गोविन्द गुरु पूज्यनीय है, केवल इस क्षेत्र के भील समुदाय के ही नहीं इस राष्ट्र के जन-जन के लिए पूजनीय हैं। जिन्हें यहां का आदिवासी भील समुदाय गुरु के रूप में मानता है। मानगढ़ हत्याकाण्ड की इतिहास में समुचित स्थान नहीं मिला। इस क्रम में हिन्दी कवि विजयदेवनारायण साही की यह पंक्तियां खरी उतरती हैः- तुम हमारा जिक्र इतिहासों में नहीं पाओगे, क्योंकि हमने अपने को इतिहास के विरूद्ध दे दिया है। छुटी हुई जगह दिखे जहां-जहां, या दबी हुई चीख का अहसास हो, समझना हम वहीं मौजूद थे। आज भी यहां का आदिवासी भील समुदाय पूर्णरूप से विकसित नही हो पाया और सामाजिक और भक्ति आन्दोलन का काम जारी है। लगभग एक शताब्दी बितने के बाद भी इस अंचल के हर गांव हर ढाणी में भगत आन्दोलन अब भी क्षमता और जरूरत से काम कर रहा है। हमारे वागड़ अंचल, मध्य प्रदेश व गुजरात के सीमावर्ती जिलों में बहुसंख्यक समाज आज भी गरीबी, शोषण, अभाव व बीमारियों के मकड़जाल में फंसा हुआ है। गोविन्द गुरु ने जो सपना देखा था वो आज भी अधूरा है। गोविन्द गुरु लोगो को निडर, निर्भीक, स्वावलम्बी और आत्मविश्वासी बनाना चाहते थे और इस हेतु समाज को संगठित करना चाहते थे। सम्प सभा व भगत आन्दोलन दोनों ही इसी के दूसरे नाम कहे जा सकते हैं। आज हजारों जनजातीय लोगों के जीवन में बदलाव लाने के लिए सामाजिक क्रान्ति की आवश्यकता है। इसके लिए गोविन्द गुरु राष्ट्रीय स्तर पर बेहत्तर आदर्श पथ दृष्टा साबित हो सकते हैं।
© Deepa
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Shriji Info Service ij 4/10/2011
गोविन्द गुरु की संप सभा और श्राजस्थान का जलियांवाला बागश् मानगढ़ नरसंहार-
राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, दक्षिणी मेवाड़, सिरोही तथा गुजरात व मालवा के मध्य पर्वतीय अंचलों की आबादी प्रमुखतया भीलों और मीणा आदिवासियों की है। इन आदिवासियों में चेतना जागृत करने एवं उन्हें संगठित करने का बीड़ा डूंगरपुर से 23 मील दूर बांसिया गाँव में जन्मे बणजारा जाति के गुरु गोविंद ने उठाया था। गोविन्द गुरु ने आदिवासियों को संगठित करने के लिए संप-सभा की स्थापना की।
संप का अर्थ है एकजुटता, प्रेम और भाईचारा। संप सभा का मुख्य उद्देश्य समाज सुधार था। उनकी शिक्षाएं थी - रोजाना स्नानादि करो, यज्ञ एवं हवन करो, शराब मत पीओ, मांस मत खाओ, चोरी लूटपाट मत करो, खेती मजदूरी से परिवार पालो, बच्चों को पढ़ाओ, इसके लिए स्कूल खोलो, पंचायतों में फैसला करो, अदालतों के चक्कर मत काटो, राजा, जागीरदार या सरकारी अफसरों को बेगार मत दो, इनका अन्याय मत सहो, अन्याय का मुकाबला करो, स्वदेशी का उपयोग करो आदि।
शनैः शनैः यह संपसभा तत्कालीन राजपूताना के पूरे दक्षिणी भाग में फैल गई। यहाँ की रियासतों के राजा, सामंत व जागीरदार में इससे भयभीत हो गए। वे समझने लगे कि राजाओं को हटाने के लिए यह संगठन बनाया गया है। जबकि यह आंदोलन समाज सुधार का था। गुरु गोविंद ने आदिवासियों को एकजुट करने के लिए सन् 1903 की मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा से गुजरात एवं मेवाड़ की सीमा पर स्थित मानगढ़ पहाड़ी पर धूणी में होम { यज्ञ व हवन } करना प्रारंभ किया जो प्रतिवर्ष आयोजित किया जाने लगा।
7 दिसम्बर 1908 को हजारों भील, मीणा आदि आदिवासी रंगबिरंगी पोशाकों में मानगढ़ पहाड़ी पर हवन करने लगे। इससे डूंगरपुर, बांसवाड़ा और कुशलगढ़ के राजा चिंतित हो उठे। उन्होंने अहमदाबाद में अंग्रेज कमिश्नर ए. जी. जी. को सूचना दे कर बताया कि आदिवासी इनका खजाना लूट कर यहां भील राज्य स्थापित करना चाहते हैं। बंदूकों के साथ फौजी पलटन मानगढ़ पहाड़ी पर आ पहुँची तथा
पहाड़ी को चारों और से घेर लिया एवं अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। पहाड़ी पर एक के बाद एक लाशें गिरने लगी। करीब 1500 आदिवासी मारे गए। अंग्रेजो ने गोविंद गुरु गिरफ्तार कर लिया। यह भीषण नरसंहार इतिहास में दूसरा जलियावाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना जाता है।
प्रस्तुतकर्ता
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गोविन्द गुरु की संप सभा और श्राजस्थान का जलियांवाला बाग मानगढ़
नरसंहार-
राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, दक्षिणी मेवाड़, सिरोही तथा गुजरात व मालवा के मध्य पर्वतीय अंचलों की आबादी प्रमुखतया भीलों और मीणा आदिवासियों की है। इन आदिवासियों में चेतना जागृत करने एवं उन्हें संगठित करने का बीड़ा डूंगरपुर से 23 मील दूर बांसिया गाँव में जन्मे बणजारा जाति के गुरु गोविंद ने उठाया था। गोविन्द गुरु ने आदिवासियों को संगठित करने के लिए संप-सभा की स्थापना की।
संप का अर्थ है एकजुटता, प्रेम और भाईचारा। संप सभा का मुख्य उद्देश्य समाज सुधार था। उनकी शिक्षाएं थी - रोजाना स्नानादि करो, यज्ञ एवं हवन करो, शराब मत पीओ, मांस मत खाओ, चोरी लूटपाट मत करो, खेती मजदूरी से परिवार पालो, बच्चों को पढ़ाओ, इसके लिए स्कूल खोलो, पंचायतों में फैसला करो, अदालतों के चक्कर मत काटो, राजा, जागीरदार या सरकारी अफसरों को बेगार मत दो, इनका अन्याय मत सहो, अन्याय का मुकाबला करो, स्वदेशी का उपयोग करो आदि।
शनैः शनैः यह संपसभा तत्कालीन राजपूताना के पूरे दक्षिणी भाग में फैल गई। यहाँ की रियासतों के राजा, सामंत व जागीरदार में इससे भयभीत हो गए। वे समझने लगे कि राजाओं को हटाने के लिए यह संगठन बनाया गया है। जबकि यह आंदोलन समाज सुधार का था। गुरु गोविंद ने आदिवासियों को एकजुट करने के लिए सन् 1903 की मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा से गुजरात एवं मेवाड़ की सीमा पर स्थित मानगढ़ पहाड़ी पर धूणी में होम { यज्ञ व हवन } करना प्रारंभ किया जो प्रतिवर्ष आयोजित किया जाने लगा।
7 दिसम्बर 1908 को हजारों भील, मीणा आदि आदिवासी रंगबिरंगी पोशाकों में मानगढ़ पहाड़ी पर हवन करने लगे। इससे डूंगरपुर, बांसवाड़ा और कुशलगढ़ के राजा चिंतित हो उठे। उन्होंने अहमदाबाद में अंग्रेज कमिश्नर ए. जी. जी. को सूचना दे कर बताया कि आदिवासी इनका खजाना लूट कर यहां भील राज्य स्थापित करना चाहते हैं। बंदूकों के साथ फौजी पलटन मानगढ़ पहाड़ी पर आ पहुँची तथा
पहाड़ी को चारों और से घेर लिया एवं अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। पहाड़ी पर एक के बाद एक लाशें गिरने लगी। करीब 1500 आदिवासी मारे गए। अंग्रेजो ने गोविंद गुरु गिरफ्तार कर लिया। यह भीषण नरसंहार इतिहास में दूसरा जलियावाला बाग हत्याकांड के नाम से जाना जाता है।
प्रस्तुतकर्ता
 Shriji Info Service 4/10/2011
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प्रेषक
सुनील पण्डया
गौवर्द्धन नाथ मन्दिर के सामने,
मु.पो. धम्बोला, जिला-डूंगरपुर ( राजस्थान )
मोबा. – ९००१६९६८६७
Emain id :: sunildhambola@yahoo.com

जनजातीय पावन क्रांति के प्रतिक- गोविन्द गुरू

 राजस्थान के ठीक दक्षिण में स्थित बांसवाडा रियासत के सुदूर दक्षिण पश्चिम में आनंदपुरी( भूखिया) पंचायत समिति मुख्यालय से १४ किलोमीटर पर अरावली की पर्वतमालाओ के बीच गुजरात व राजस्थान की सीमा पर मानगढ पठार स्थित है। यह मानगढ धाम के नाम से प्रसिद्ध है एवं इतिहास में यह राजस्थान के जालियांवाला कांड के नाम से भी जाना जाता है। मानगढ धाम दबी हुयी चीख के अहसास की अनुभूत का तीर्थ है। गोवीन्द गुरू इसके प्रमुख नायक है, जो कि डूंगरपुर जिले के धम्बोला-सागवाडा रोड पर बासियां गाव में २० दिसम्बर १८५८ को गोवारिया जाति के बंजारा परिवार में जन्म हुआ था। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के एवं उदारचरित्र के गोविन्द की शिक्षा गांव के पुजारी के घर हुई। धार्मिक भावना, देशभक्ति व संस्कारों के कारण गोविन्द को साधु-संत की सेवा एवं सत्संग में आनन्द आने लगा। अपने जीवन के युवा काल में वे स्वामी दयानन्द सरस्वती के सम्पर्क में आकर उनके विचारों व सिद्धांतों से ज्यादा प्रभावित हुए व समाजसेवा में जुड गयें।

गोविन्द गुरू ने २२ वर्श की उम्र में सुराता पाल में भील जाति का एक सम्मेलन कर ‘सम्प सभा’ नामक संगठन खडा किया, जिसका उद्देश्य सुसंस्कारित, शिक्षित, स्वावलम्बी और स्वतन्त्रता प्रेमी समाज का निर्माण करना था। १८९९ के दुर्भिक्ष के समय गोविन्द ने लोगों की सहायता कीं । सहकार का सन्देश दिया और शासन से लगान माफ करने के लिये जोरदार आवाज उठायी। एक तरफ सामंती शासन की बेगारी प्रथा से और अग्रेंजी शासन की गुलामी से उत्पीडित समाज में निर्भिकता व आत्मगौरव जगाने की दृश्टि से उन्होनें १९०२ में सम्प सभा का दूसरा सम्मेलन बांसियां गांव में बुलाया और वहां प्रमुख भक्तों को शिक्षा-दीक्षा देकर सम्मानित किया। इसी सभा में ११ सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया। इन सिद्धांतों को हर प्रत्येक नागरिक को अपनाने पर जोर दिया गया। एवं इसी सिद्धांतों से जनजातिय जीवन में नई क्रांति का सुत्रपात हुआ।
सम्प सभा के सिद्धांतों एवं लोक गीतों में स्वतन्त्रता, स्वदेशी और स्वावलम्बन के गांधीवादी विचार थें तो भाक्ति व जीवन की पवित्रता तथा सामाजिक सद्भाव आर्य समाज के सन्देश थे। जब-जब भी समाज सुधार व सामाजिक संगठन की भनक सामंती शासकों को होती थी, तब दमन चक्र प्रारंभ हो जाता था। डूंगरपुर के तत्कालिन राजा ने अपने शासन पर मंडराता खतरें को देखकर आनन-फानन मेंगोविन्द गुरू को गिरफ्तार कर लिया। लेकिन रियासत में इसका असर शुरू हो गया ,जनजातिय असंतोश व आक्रोश चरम पर पहुंच गया व विद्रोह की तैयारी होने लगी। गुप्तचरों से शासन को पता चला तो कुरिया भगत को डूंगरपुर बुलाया गया तथा बातचित कर गोविन्द गुरू को रिहा किया गया। इसके बाद भी सम्प सभा का क्रांति धर्म नही रूका ओर यह और अधिक फेल गया। गुजरात के पंचमहाल, संतरामपुर, मालवा में झाबुआ व वागड में मानगढ सम्प सभा के प्रमुख कार्यक्षेत्र बने और धुणियां स्थापित हुई। अब सम्प सभा के बढते प्रभाव को देखकर अंग्रेज सरकार भी हतप्रभ रह गयी और वह भी इनके विरूद्ध हो गयी।
संतरामपुर रियासत के डूंगरपुर गांव में भगत पूजा पारगी के घर पर बैठक हुई , जिसमें प्रमुख भगतों ने निर्णय लिया कि अत्यधिक दूर्गम मानगढ पर सम्प सभा की प्रमुख धुणी लगायी जाएं ,जहां सत्तासिनों की पहुंच भी न हो सके।
इसके उपरान्त इस मानगढ पठार पर सम्प सभा की धूणी स्थापित कर गोविन्द गुरू अपने शिष्यों व भक्तों के साथ हवन पूजन किया करते थे। इसके उपरांत १९०३ में सम्प सभा नें निर्णय लिया कि प्रतिवर्श माघ माह की पूणिमा के दिन गुजरात, मालवा व वागड के भील बंधु सम्प सभा में मेला रमाएगं व हवन-पुजन, भजन-कीर्तन व गोविन्द गुरू के सन्देश उपदेश में भाग लेंगे।
इन गतिविधियों की भनक झाबुआ, झालोद व वागड के सामंती शासकों तथा अंग्रेजी सरकार का सिंहासन डोलने लगा जिसके कारण उन्होने गोविन्द गुरू पर राजद्रोह का आरोप लगाकर गिरफ्तार करने का कुचक्र चलाया, लेकिन जनजातिय संगठन की भक्ति के आगे वे लाचार व बेबस हो गये।
प्रतिवर्श की भांति १९०८ में माघ मास को पूर्णिमा पर सम्प सभा का विशाल मेंला लगा था, दूर-दूर से गाते बजाते भीलों का हुजुम शामिल होने लगा। लगभग १५०० भीलों का सम्मेलन हुआ। संतरामपुर के शासक ने अवसर का लाभ उठाने की सोची व अफवाह फेला दी कि गोविन्द गुरू भील सेना के साथ आक्रमण की तैयारी कर रहा है। अंग्रेजी सरकार के राजनीतिक अधिकारियों के आदेश पर खेरवाडा छावनी की फौज के साथ डूंगरपुर, बांसवाडा , मालवा व पंचमहाल के सिपाहियों ने मानगढ को चारो तरफ से घेर लिया और भक्तों पर हमला बोल दिया । यज्ञ, हवन, पूजन, कीर्तन में अर्न्तलिन हजारों भक्तों को कुछ भी पता नहीं चला और चारों ओर से गोलियां की बौछार होन लगी, लाशो के ढेर लगने लगे और लहु की सरिता बहने लगीं। लगभग हजार से ज्यादा भक्त मारे गये व गोविन्द गुरू व उनकी पत्नी को पकड लिया गया व उनको यातना देते हुए अहमदाबाद के सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया। गोविन्द गुरू को राजद्रोह के आरोप में फांसी की सजा सुनायी गयी। बाद में मगर प्रीवी कौंसिल में अपिल करने पर उनकी फांसी की सजा माफ कर दस वर्श की कारावास सजा दे दी गयी।
घटनाक्रम परिवर्तित होत गये प्रथम महायुद्ध में विजयी की ख़ुशी में अंग्रेज सरकार ने अनेक कैदियों को सजा माफ कर जेल से मुक्त कर दिया। उनमें गोविन्द गुरू भी थे। गोविन्द गुरू की सिर्फ सजा ही माफ हुयी थी मगर राजपुताने में जाने की पाबंदी लगा दी थी। यह क्रांतिपुत्र अपने जीवन के उतरार्घ में गुजरात के कम्बोइ मे गुजर-बसर करने लगे थे एवं वहीं पर २० अक्टुम्बर १९३१ को इनका महाप्रयाण हो गया।
सीमावर्तीय पहाडियों पर राजस्थान व गुजरात के शासको द्वारा सामुदायिक विकास कार्यो के निर्माण काल में जमीन की खुदायी के समय प्राप्त ढेरो कारतूस व हथगोले मिसाल की शहादत का साक्ष्य पूरा करते है वहां के अग्निकुण्ड, मन्दिर व प्रतिवर्श आयोजित होने वाले मेले में आते-जाते जनसमुह के कंठ से गूंजते लोक गीत जनजातिय लोकक्रांति के इस मानगढ धाम व गोविन्द गुरू की अमर गाथा को गाते रहेंगें। मगर अफसोस राजस्थान इतिहास के प्रख्यात इतिहासकार गौरीशंकर हीरानंद ओझा व कर्नल जेम्स टॉड ने भी इसका उल्लेख नहीं किया।

शहिदों की चिताओं पर हर बरस लगेंगें मेले,

वतन पर मिटने वालों का बाकि बस यहिं निशां होगा।

प्रेषक
सुनील पण्डया
गौवर्द्धन नाथ मन्दिर के सामने,
मु.पो. धम्बोला, जिला-डूंगरपुर ( राजस्थान )
मोबा. – ९००१६९६८६७
Emain id :: sunildhambola@yahoo.com
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गुरुवार, 30 अगस्त 2012

भारत की दुनिया को देन



भारत की दुनिया को देन
तहलका
1. अलबर्ट आइन्स्टीन - हम भारत के बहुत ऋणी हैं, जिसने हमें गिनती सिखाई, जिसके बिना कोई भी सार्थक वैज्ञानिक खोज संभव नहीं हो पाती।
2. रोमां रोलां (फ्रांस) - मानव ने आदिकाल से जो सपने देखने शुरू किये, उनके साकार होने का इस धरती पर कोई स्थान है, तो वो है भारत।

3. हू शिह (अमेरिका में चीन राजदूत)- सीमा पर एक भी सैनिक न भेजते हुए भारत ने बीस सदियों तक सांस्कृतिक धरातल पर चीन को जीता और उसे प्रभावित भी क
िया।
...
4. मैक्स मुलर- यदि मुझसे कोई पूछे की किस आकाश के तले मानव मन अपने अनमोल उपहारों समेत पूर्णतया विकसित हुआ है, जहां जीवन की जटिल समस्याओं का गहन विश्लेषण हुआ और समाधान भी प्रस्तुत किया गया, जो उसके भी प्रसंशा का पात्र हुआ जिन्होंने प्लेटो और कांट का अध्ययन किया, तो मैं भारत का नाम लूँगा।
5. मार्क ट्वेन- मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान और सृजनशील सामग्री है, उसका भंडार अकेले भारत में है।

6. आर्थर शोपेन्हावर - विश्व भर में ऐसा कोई अध्ययन नहीं है जो उपनिषदों जितना उपकारी और उद्दत हो। यही मेरे जीवन को शांति देता रहा है, और वही मृत्यु में भी शांति देगा।
7. हेनरी डेविड थोरो - प्रातः काल मैं अपनी बुद्धिमत्ता को अपूर्व और ब्रह्माण्डव्याप ी गीता के तत्वज्ञान से स्नान करता हूँ, जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और उसका साहित्य अत्यंत क्षुद्र और तुच्छ जन पड़ता है।
8. राल्फ वाल्डो इमर्सन - मैं भगवत गीता का अत्यंत ऋणी हूँ। यह पहला ग्रन्थ है जिसे पढ़कर मुझे लगा की किसी विराट शक्ति से हमारा संवाद हो रहा है।
9. विल्हन वोन हम्बोल्ट- गीता एक अत्यंत सुन्दर और संभवतः एकमात्र सच्चा दार्शनिक ग्रन्थ है जो किसी अन्य भाषा में नहीं। वह एक ऐसी गहन और उन्नत वस्तु है जैस पर सारी दुनिया गर्व कर सकती है।
10. एनी बेसेंट -विश्व के विभिन्न धर्मों का लगभग ४० वर्ष अध्ययन करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची हूँ की हिंदुत्व जैसा परिपूर्ण, वैज्ञानिक, दार्शनिक और अध्यात्मिक धर्म और कोई नहीं। इसमें कोई भूल न करे की बिना हिंदुत्व के भारत का कोई भविष्य नहीं है। हिंदुत्व ऐसी भूमि है जिसमे भारत की जड़े गहरे तक पहुंची है, उन्हें यदि उखाड़ा गया तो यह महावृक्ष निश्चय ही अपनी भूमि से उखड जायेगा। हिन्दू ही यदि हिंदुत्व की रक्षा नही करेंगे, तो कौन करेगा? अगर भारत के सपूत हिंदुत्व में विश्वास नहीं करेंगे तो कौन उनकी रक्षा करेगा? भारत ही भारत की रक्षा करेगा। भारत और हिंदुत्व एक ही है।

बुधवार, 29 अगस्त 2012

थाईलैंड में भी है एक अयोध्या

साभार - विश्व गुरु भारत (Vishv Guru Bharat) facebook से


थाईलैंड में भी है एक अयोध्या

थाईलैंड में सदियों पुराना भारतीय प्रभाव है। एक अजीब विशेषता है। धर्म तो बौद्ध स्वीकार किया परन्तु संस्कृति हिन्दू अपनाई है। प्रत्येक राजा को ‘राम’ कहा जाता है। आधुनिक राजा ‘राम-8’ कहा जाता है। लगभग 450 वर्ष पूर...
्व इस वंश का प्रथम राजा ‘राम-1’ के नाम से विख्यात हुआ। सन् 1448 तक त्रैलोक नाम के राजा ने राज किया। उसने प्रशासन में उल्लेखनीय सुधार किए।

चौदहवीं सदी में थाईलैंड में अयोध्या की स्थापना हुई थी। वहीं थाईलैंड की राजधानी रही। इस वंश के 36 राजाओं ने 416 वर्षों तक राज किया। आधुनिक राजा के आठवें पूर्व वंशज ने राम नाम जोडऩा शुरू किया जो आज तक चल रहा है। अयोध्या को देवताओं की भूमि कहा जाता है। अद्वितीय इन्द्र देवता की नगरी। इन्द्र ने यह नगर स्थापित किया और विष्णुकरन ने इसका निर्माण किया था। इस राज्य की स्थापना राजा यूथोंग ने चायो फराया नदी के पास की थी। इसे स्याम नाम से भी जाना जाता था।

1782 में बर्मा के आक्रमण के बाद थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में बनाई गई। अयोध्या आज भी इस देश की पुरानी सांस्कृतिक धरोहर की गवाह है। राजा मागेंकुट राजा बनने से पूर्व 27 वर्ष तक बौद्ध भिक्षु रहा। उसने पाली व संस्कृति का पूरा ज्ञान प्राप्त किया। राजा बनने पर उसे राम-4 कहा गया। यहां की भाषा का मूल संस्कृत है।

लोकतंत्र में भी राजशाही का इतना सम्मान यहां की विशेषता है। राजा को आज भी दैवीय शक्ति सम्पन्न माना जाता है। चार सदियों तक रहे यहां की अयोध्या के राजा तो स्वयं को विष्णु का अवतार मानते थे। वर्तमान राजा भूमिवोन अदुलमादेज पिछले 62 वर्षों से राज ङ्क्षसहासन पर हैं। यह विश्व में किसी भी राजा के लिए सर्वाधिक अवधि है। राजमहल में प्रतिदिन की पूजा विशेष भारतीय ब्राह्मण रीति से होती है। भारतीय वंश के ब्राह्मण पुजारी भारतीय वेश में पूजा करवाते हैं। यह पूजा थाई राष्ट्रवाद के लिए की जाती है जिसके तीन स्तम्भ माने गए हैं-थाई सार्वभौमिकता, धर्म और राजशाही। मैं सोच रहा हूँ अगर भारत में यदि भारत के राष्ट्रपति भवन में इस प्रकार की पूजा होने लगे तो भारतीय सैकुलरवादी कितना हो-हल्ला मचाएंगे, उल्टी दस्त हो जायेंगे इन्हें ।

यहां के टी.वी. चैनल का नाम ‘राम चैनल’, और हवाई पत्तन का नाम ‘स्वर्णभूमि हवाई पत्तन’ है। कई सड़कों का नाम ‘राम’ पर है। सैंकड़ों साल पहले जब जहाज, सड़कें नहीं थीं, तब ‘राम’ का नाम ऐसा यहां आया कि आज भी सड़क से लेकर राजा तक राम छाए हुए हैं और भारत में राम के जन्मस्थान पर राम का मंदिर नहीं बन पा रहा।

Papaya for Uric Acid Problem !!!

जनहित में ...........



Facebook - Pudji Hardjono

Papaya for Uric Acid Problem !!! 

Just try it if you've got uric acid after all no harm done.
This is a really effective, just mix green papaya cubes to the ordinary green tea, my cousin-brother tried and found it very effective. 
I have also shared with a friend with gout to try this (his "toe joints" started to deform), after a week of drinking this formula there is significant improvement, and after two weeks the toe joints heal and revert to normal state.
It is almost three years now, the joint pain is gone, but he maintains the intake between 1-3 times monthly to avoid relapse.
Other friends suffering from years of gout problem have also recovered. 
It is good for all, even those without gout.
Good formula! Do share with the people in need!
An improved sequence by Professor Lai from the China School of Pharmacy :
Cut green papaya into small cubes, place into the water, bring to boil, then add tea leaves, similar to the tea-making process. 
Clinical tests show that this brings better effects for treatment of gout, subject to frequent drinking of this formula.
Mr. Liu Qing, Chief of the Rende Town in Tainan, was suffering for years from severe stomach pain around the posterior wall of stomach. 
He used green papaya as a tea pot to prepare the family tea daily, after a month, his chronic disease condition was much improved. 
His family members with high uric acid were also healed by the same papaya tea. 
For this Mr. Liu planted a lot of papaya to share with relatives and friends with similar sickness.
According to Mr. Liu, in selecting the green papaya as tea pot, pick those the shape of which is fat and short, with larger capacity. 
Cut off the top part of the papaya, clear away the seeds, open a small hole at the upper side wall to facilitate pouring of tea. 
Create a small ventilation hole at top cover, put in the tea leaves, pour in boiling water, place the top cover back onto the papaya, you may also use the toothpicks to secure the top cover. 
Similar to normal process of preparing tea.
Liu like to use Oolong tea as the taste is good. 
He was pleasantly surprised that the stomach pains he suffered for many years was healed after a month of drinking tea from the green papaya pot, without taking any other medication. 
He passed some green papaya leaves to a friend who worked at a Medical Center to test and analyse the content. 
The tests confirmed that the healthy enzyme present in papaya is beneficial to human health. 
Now as papaya in Mr. Liu's orchard is yielding suitable size fruits, he would share the fruits with family and friends.
Xu Fuchang, an experienced papaya farmer, said green papaya means to unripe papaya, where the skin is still green in colour. 
Generally, the papaya takes about four months to fully mature and ripen, but the healing effect would be lost after it is fully ripe. 
Green papaya should be harvested when the papaya is approximately three months old, when the fruit is still firm, and the "papaya milk" contains high papaya enzyme and other healthy ingredients.
Not only the green papaya can be used in tea drinking, you may also cut them into cubes, and boil with the ribs, or even slicing the green papaya into fine long pieces and fried with garlic, very tasty, and no adverse effects on the human body.

सोमवार, 27 अगस्त 2012

श्रृद्धांजली:मुकेश: दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां...



श्रृद्धांजली
दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां................
प्रसिद्ध गायक मुकेश ( मुकेशचन्द्र माथुर, दिल्ली ) हमारे बीच से वर्षों पहले ( 27 अगस्त 1976) से जा चुके हैं। मगर ऐसा लगता है जैसे कल की तो बात है। उनकी पुण्यतिथि 27 अगस्
त होती है। यह दिन उनको चाहने वालों के लिये खास होता है। उने गाये गीत होंगें और उनकी मीठी मीठी यादें होंगीं...उनका एक गीत “ओ जाने वाले हो सके तो लौटके आना...“ एवं दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां, तथा सब कुछ सीखा हमनें न सीखी होशयारी, सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाडी, सारे दिन बजेगें। उनके गम भरे नगमों ने तो झाूम मचा दी थी। राजकपूर और मुकेश की आवाज एक दूसरे की पर्याय थी। पुण्यतिथि पर उन्हे शत शत नमन..!!!

इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल
जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल
दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत
कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल
इक दिन बिक जायेगा ...


अनहोनी पग में काँटें लाख बिछाए
होनी तो फिर भी बिछड़ा यार मिलाए 
ये बिरहा ये दूरी, दो पल की मजबूरी
फिर कोई दिलवाला काहे को घबराये, तरम्पम,
धारा, तो बहती है, बहके रहती है
बहती धारा बन जा, फिर दुनिया से डोल
एक दिन


परदे के पीछे बैठी साँवली गोरी
थाम के तेरे मेरे मन की डोरी
ये डोरी ना छूटे, ये बन्धन ना टूटे
भोर होने वाली है अब रैना है थोड़ी, तरम्पम,
सर को झुकाए तू, बैठा क्या है यार
गोरी से नैना जोड़, फिर दुनिया से 
==========


सुभाष चन्द्र बोस धर्मपत्नी एमिली स्चेंक्ल

सुभाष चन्द्र बोस जी उनकी धर्मपत्नी श्री एमिली स्चेंक्ल के साथ एक दुर्लभ फोटो ..उनकी पत्नी काफी समय तक उनकी सेकेट्री रही थी जब सुभाष जी रशिया में थे वही उन होने उनके साथ सन 1937 में शादी की उनकी पुत्री अनीता बोस जी का जन्म सन 1942 में विएन्ना में हुआ ,विएअन...ऑस्ट्रिया की राजधानी हैं




http://nazehindsubhash.blogspot.in/2010/06/12.html

ब्लॉग   नाज़-ए-हिन्द सुभाष से  


जयदीप शेखर

नाज़-ए-हिन्द सुभाष
1.2: ‘विश्वयुद्ध’ की पटकथा और 1.2 (क) एमिली शेंकेल प्रसंग
पिताजी का मन रखने के लिए 1920 में आई.सी.एस. (आज का आई.ए.एस.) अधिकारी बने नेताजी 1921 में ही नौकरी छोड़कर राजनीति में उतरते हैं। ग्यारह बार गिरफ्तार करने के बाद ब्रिटिश सरकार उन्हें 1933 में ‘देश निकाला’ ही दे देती है।
यूरोप में निर्वासन बिताते हुए वे अपनी यकृत की थैली की शल्य-चिकित्सा भी कराते हैं। 1934 में पिताजी की मृत्यु पर तथा 1936 में काँग्रेस के (लखनऊ) अधिवेशन में भाग लेने के लिए वे दो बार भारत आते हैं, मगर दोनों ही बार ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरफ्तार कर वापस देश से बाहर भेज देती है।1933 से ’38 तक यूरोप में रहते हुए नेताजी ऑस्ट्रिया, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, फ्राँस, जर्मनी, हंगरी, आयरलैण्ड, इटली, पोलैण्ड, रूमानिया, स्वीजरलैण्ड, तुर्की और युगोस्लाविया की यात्राएँ करते हैं और यूरोप की राजनीतिक हलचल का गहन अध्ययन करते हैं।
नेताजी भाँप लेते हैं कि एक दूसरे विश्वयुद्ध की पटकथा यूरोप में लिखी जा रही है। वे इस ‘भावी’ विश्वयुद्ध में ब्रिटेन के शत्रु देशों से हाथ मिलाकर देश को आजाद कराने के बारे में सोचते हैं। 
       एक स्थान पर नेताजी लिखते हैं:
"“विश्व में पिछले दो सौ वर्षों में आजादी पाने के लिए जितने भी संघर्ष हुए हैं, उन सबका मैंने गहन अध्ययन किया है, और पाया है कि एक भी ऐसा उदाहरण कहीं नहीं है, जहाँ आजादी बिना किसी बाहरी मदद के मिली हो।"” 
जाहिर है, नेताजी की नजर में भारत को भी अपनी आजादी के लिए किसी और देश से मदद लेनी चाहिए। आखिर किस देश से?
नेताजी की पहली पसन्द हैं- स्तालिन, सोवियत संघ के राष्ट्रपति। नेताजी अनुभव करते हैं कि सोवियत संघ निकट भविष्य में ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती देने वाला है। (वैसे भी, दोनों परम्परागत शत्रु थे।) उनका यह भी मानना है कि भारत को आजाद कराने के बाद सोवियत संघ भारत में पैर नहीं जमायेगा।
मगर नेताजी को सोवियत संघ जाने के लिए वीसा नहीं दिया जाता है। उन्हें ब्रिटेन भी नहीं जाने दिया जाता है।
        यूरोप में ब्रिटिश सरकार ने कोई एक दर्जन जासूस नेताजी की निगरानी में लगा रखे हैं। नेताजी क्या खाते हैं, कहाँ जाते हैं, किन लोगों से मिलते हैं- हर खबर सरकार को मिल रही है।

1.2 (क) एमिली शेंकेल प्रसंग
    यहाँ एमिली शेंकेल का जिक्र करना अनुचित नहीं होगा, हालाँकि यह नेताजी का व्यक्तिगत प्रसंग है। 
       1934 में नेताजी वियेना (ऑस्ट्रिया) में एमिली शेंकेल से मिलते हैं। दरअसल नेताजी को अपनी पुस्तक ‘द इण्डियन स्ट्रगल’ के लिए एक स्टेनोग्राफर की जरुरत है, जो अँग्रेजी जानती हो। इस प्रकार एमिली पहले नेताजी की स्टेनो, फिर सेक्रेटरी बनती है, और फिर दोनों एक-दूसरे से प्रेम करने लगते हैं।
अपनी पुस्तक की भूमिका में नेताजी सिर्फ एमिली को ही नाम लेकर धन्यवाद देते हैं (दिनांक 29 नवम्बर 1934)। कई यात्राओं में एमिली नेताजी की हमसफर होती हैं।
       26 दिसम्बर 1937 को- एमिली के जन्मदिन पर- नेताजी बैडगैस्टीन में उनसे विवाह करते हैं।
       1938 में भारत लौटने के बाद से नेताजी एमिली को नियमित रुप से चिट्ठियाँ लिखते हैं। उनके 162 पत्रों का संकलन पुस्तक के रुप में प्रकाशित हुआ है। हालाँकि दक्षिण-पूर्व एशिया से लिखे गये उनके पत्र इनमें शामिल नहीं हैं- इन पत्रों को द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद ब्रिटिश अधिकारी जब्त कर लेते हैं- वियेना में एमिली के घर की तलाशी के दौरान। ये पत्र अब तक अज्ञात ही हैं।
       1941-43 में जर्मनी प्रवास के दौरान नेताजी एमिली शेंकेल के साथ ही बर्लिन में रहते हैं।
       1942 के अन्त में एमिली और नेताजी माता-पिता बनते हैं। वे अपनी बेटी का नाम अनिता रखते हैं।
***
1944 की बरसात में, जब इम्फाल-कोहिमा युद्ध में हार निश्चित जान पड़ती है, तब नेताजी यह महसूस करते हैं वे शायद अब एमिली और अपनी नन्हीं बेटी से कभी न मिल पायें, क्योंकि अगले साल हार तय है और इस हार का मतलब है- उन्हें कहीं अज्ञातवास में जाना पड़ेगा, या जेल में रहना पड़ेगा, या फिर मृत्यु को गले लगाना पड़ेगा।
       एक शाम, जब आसमान काले बादलों से घिरा है, वे एकान्त पाकर कैप्टन लक्ष्मी विश्वनाथन से कहते हैं, “यूरोप में मैंने कुछ ऐसा किया है, जिसे पता नहीं भारतवासी कभी समझ पायेंगे या नहीं।” उनका ईशारा एमिली की ओर है, कि पता नहीं भारतीय कभी उन्हें ‘नेताजी की पत्नी’ का दर्जा देंगे या नहीं।
कितना भी तो भारतीयों के लिए यह एक ‘गन्धर्व विवाह’ है।
लक्ष्मी कहती हैं, “जरूर समझेंगे।”
एमिली शेंकेल बोस तो खैर कभी भारत नहीं आतीं; मगर 1945 में नेहरूजी तथा नेताजी के परिवारजनों के प्रयासों से बाकायदे एक ट्रस्ट बनाकर एमिली को नियमित आर्थिक मदद दी जाती है, जिसके लिए एमिली नेहरूजी का आभार व्यक्त करती हैं।
एमिली शेंकेल बोस का निधन वर्ष 1996 में होता है।
***
नेताजी की बेटी अनिता बोस बाद के दिनों में ऑग्सबर्ग विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्राध्यापिका बनती हैं। जर्मन संसद में ग्रीन पार्टी के सदस्य मार्टिन पाफ (Martin Pfaff) से वे विवाह करती हैं और उनकी तीन सन्तानों- यानि नेताजी के नाती-नतनियों- के नाम होते हैं- थॉमस कृष्णा, माया कैरिना और पीटर अरूण।
अनिता बोस पहली बार 18 वर्ष की उम्र में 1960 में भारत आती हैं और फिर 2005-06 में 63 वर्ष की उम्र में दुबारा भारत आती हैं। दोनों बार देश उन्हें ‘नेताजी की बेटी’ का सम्मान देता है।आज हार्वर्ड विश्वविद्यालय में सामुद्रिक इतिहास के प्राध्यापक सुगत बोस (Sugata Bose)  नेताजी के पड़पोते- भतीजे के पुत्र- हैं।



शनिवार, 25 अगस्त 2012

लोकदेवता बाबा रामदेव : राम शाह पीर

Pressnote.in
रामदेवरा मेला, रामदेवरा गांव, पोखरण, जैसलमेर,

बाबा रामदेव एक तंवर राजपूत थे जिन्होंने सन 1458 में समाधि ली थी। उनकी समाधि पर लगने वाले इस मेले में हिंदुओं व मुसलमानों की समान आस्था है। 1931 में बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने समाधि पर मंदिर बनवा दिया था। कहा जाता है कि रामदेव की चमत्कारिक शक्तियों की चर्चा दूर-दूर तक थी। उन चर्चाओं को सुनकर मक्का से पांच पीर उन्हें परखने पहुंचे और उनसे अभिभूत होकर लौटे। उसके बाद मुसलमान उन्हें राम शाह पीर कहकर उनका मान करने लगे। मेले में आने वाले श्रद्धालु समाधि पर चावल, नारियल और चूरमे का चढ़ावा चढ़ाते हैं और लकड़ी के घोड़े समर्पित करते हैं। हर मजहब से जुड़े लोग मेले में आते हैं और पूरी रात-रात भर भजन व गीत के कार्यक्रम चलते हैं।

http://www.pressnote.in/Jaisalmer-News_176534.html

जगविख्यात रामदेवरा में 628 वाँ विराट मेला शुरू


स्वर्णमुकुट प्रतिष्ठा व मंगला आरती से हुआ मेले का आगाज
रामदेवरा | अगाध जन श्रद्घा के केन्द्र लोकदेवता बाबा रामदेव की अवतरण तिथि भाद्रपद शुक्ल द्वितीया(भादवा बीज) के उपलक्ष में बाबा की कर्मस्थली रामदेवरा में जगवि यात विराट मेला रविवार को ब्रह्ममूहूर्त में बाबा की समाधि के शीर्ष पर स्वर्ण मुकुट प्रतिष्ठा तथा मंगला आरती की परंपरागत रस्मों से शुरू हुआ।-
- दुनिया- भर में सर्वाधिक ल बी अवधि तक चलने वाले और विराट मेले के रूप में प्रसिद्घ रामदेवरा मेले में लगभग 50 लाख लोग हिस्सा लेते हैं। इस बार यह 628 वाँ मेला है। इस मेले में भारत के विभिन्न हिस्सों से श्रद्घालु हिस्सा लेते हैं। इनके अलावा दुनिया के कई मुल्कों से भी आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए यह मेला आकर्षण का केन्द्र रहा है।
बाबा की समाधि का पंचामृत से अभिषेक
- रविवार को भोर मे राजस्थान अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष गोपाराम मेघवाल, जैसलमेर जिला कलक्टर जैसलमेर शुचि त्यागी एवं पुलिस अधीक्षक ममता राहुल ने बाबा रामदेवजी की समाधि के दर्शन तथा पूजा-अर्चना के साथ ही पंचामृत से अभिषेक किया की और प्रदेश में सर्वांगीण खुशहाली की कामना की।
- इन अतिथियों ने बाबा की समाधि पर इत्र एवं प्रसाद चढाया, चँवर ढुलाया तथा बाबा की अखण्ड जोत के दर्शन किए। इसके बाद दर्शनों के लिए श्रद्घालुओं का अपार सैलाब समाधि की ओर उमड पडा।
मेवा-मिष्ठान एवं मिश्री का भोग
- मंगला आरती के अवसर पर बाबा की समाधि पर दूध ,दही ,शहद,इत्र एवं पंचामृत से अभिषेक किया गया। बाबा को मेवा मिष्ठान व मिश्री का भोग चढाया गया। पुजारी कमल किशोर छंगाणी के साथ ही बाबा के वंशज तंवर समाज के प्रतिष्ठित भक्तगण भी मंगला आरती में उपस्थित थे। बाबा की समाधि पर नई चादर चढाई गई, मुकुट को केशर से तिलक लगाया गया एवं रविवार को प्रातः बाबा रामदेव की भोग आरती की गयी।
अनुजा आयोग अध्यक्ष ने रजत छत्र अर्पित किया
- मंगला आरती की रस्म के बाद अनुजा आयोग के अध्यक्ष गोपाराम मेघवाल ने अपने परिजनों के साथ बाबा की समाधि पर प्रसाद एवं चाँदी का छत्र चढाया। समिति के पुजारी कमल छंगाणी ने अनुजा आयोग के अध्यक्ष मेघवाल, जिला कलक्टर शुचि त्यागी एवं जिला पुलिस अधीक्षक ममता राहुल से परंपरागत विधि-विधान से पूजा-अर्चना कराई और प्रसाद स्वरूप बाबा की समाधि पर अर्पित पुष्पमाला इन अतिथियों को भेंट की।
इनकी रही मौजूदगी
- मंगला आरती के समय उपस्थित मेलाधिकारी एवं उपखण्ड अधिकारी पोकरण अशोक चौधरी,उप अधीक्षक पुलिस विपिन शर्मा , मेला व्यवस्थाओं के लिए नियुक्त आर.ए.एस.प्रशिक्षु ओमप्रकाश विश्नोई, नरेश बुनकर, सहायक मेलाधिकारी एवं तहसीलदार- त्रिलोक चन्द ,सरपंच रामदेवरा भोमाराम मेघवाल, सहायक अभियंता पंचायत समिति सांकडा धन्नाराम विश्नोई के साथ ही मंदिर समिति के पदाधिकारियों आदि ने बाबा की अखण्ड जोत के दर्शन किए एवम् समाधि को श्रद्घापूर्वक नमन किया।
ज्यों द्वार खुला, श्रद्घालुओं का ज्वार उमड आया
- मंगला आरती के समय समाधिमंदिर का प्रमुख प्रवेश द्वार खुलते ही मेलार्थियों का ज्वार उमड आया। बाबा के जयकारे लगाते हुए भक्तों का रेला उत्साह के साथ निज मंदिर में आना शुरू हो गया। इन श्रद्घालुओं ने बाबा की बीज के अवसर पर इष्टदेव के दर्शन कर अपने आप को धन्य महसूस किया। बाबा के दर्शन पाने के लिए रात से ही हजारों मेलार्थियों ने मन्दिर के बार डेरा लगा रखा था।

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

स्वामी विवेकानंद जी के आध्यात्मिक गुरू :स्वामी रामकृष्ण परमहंस


Sri Ramakrishna Quotes on Scriptures and Holy Books

http://www.spiritquotes.com/ramakrishna-quotes-on-scriptures-holy-books.htm
स्वामी विवेकानंद जी के आध्यात्मिक गुरूजी :

रामकृष्ण परमहंस

  http://hi.bharatdiscovery.org

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति


रामकृष्ण परमहंस
Ramkrishna Paramhans

रामकृष्ण परमहंस -----------

रामकृष्ण परमहंस (जन्म- 18 फ़रवरी, 1836 बंगाल - मृत्यु- 15 अगस्त 1886 कोलकाता) भारत के एक महान संत एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर ज़ोर दिया था। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया। रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे। साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है। वे ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं।
जीवन परिचय---------
रामकृष्ण परमहंस ने पश्चिमी बंगाल के हुगली ज़िले में कामारपुकुर नामक ग्राम के एक दीन एवं धर्मनिष्ठ परिवार में 18 फ़रवरी, सन् 1836 ई. में जन्म लिया। बाल्यावस्था में वह गदाधर के नाम से प्रसिद्ध थे। गदाधर के पिता खुदीराम चट्टोपाध्याय निष्ठावान ग़रीब ब्राह्मण थे। वह अपने साधु माता-पिता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने गाँव के भोले-भाले लोगों के लिए भी शाश्वत आनंद के केंद्र थे। उनका सुंदर स्वरूप, ईश्वरप्रदत्त संगीतात्मक प्रतिभा, चरित्र की पवित्रता, गहरी धार्मिक भावनाएँ, सांसारिक बातों की ओर से उदासीनता, आकस्मिक रहस्यमयी समाधि, और सबके ऊपर उनकी अपने माता-पिता के प्रति अगाध भक्ति इन सबने उन्हें पूरे गाँव का आकर्षक व्यक्ति बना दिया था। गदाधर की शिक्षा तो साधारण ही हुई, किंतु पिता की सादगी और धर्मनिष्ठा का उन पर पूरा प्रभाव पड़ा। जब परमहंस सात वर्ष के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया।
दर्शन से कृतार्थ-------
रामकृष्ण परमहंस ने जगन्माता की पुकार के उत्तर में गाँव के वंशपरंपरागत गृह का परित्याग कर दिया और सत्रह वर्ष की अवस्था में कलकत्ता चले आए तथा झामपुकुर में अपने बड़े भाई के साथ ठहर गए, और कुछ दिनों बाद भाई के स्थान पर रानी रासमणि के दक्षिणेश्वर मंदिर कोलकाता में पूजा के लिये नियुक्त हुए। यहीं उन्होंने माँ महाकाली के चरणों में अपने को उत्सर्ग कर दिया। रामकृष्ण परमहंस भाव में इतने तन्मय रहने लगे कि लोग उन्हें पागल समझते। वे घंटों ध्यान करते और माँ के दर्शनों के लिये तड़पते। जगज्जननी के गहन चिंतन में उन्होंने मानव जीवन के प्रत्येक संसर्ग को पूर्ण रूप से भुला दिया। माँ के दर्शन के निमित्त उनकी आत्मा की अंतरंग गहराई से रुदन के जो शब्द प्रवाहित होते थे वे कठोर हृदय को दया एवं अनुकंपा से भर देते थे। अंत में उनकी प्रार्थना सुन ली गई और जगन्माता के दर्शन से वे कृतकार्य हुए। किंतु यह सफलता उनके लिए केवल संकेत मात्र थी। परमहंस जी असाधारण दृढ़ता और उत्साह से बारह वर्षों तक लगभग सभी प्रमुख धर्मों एवं संप्रदायों का अनुशीलन कर अंत में आध्यात्मिक चेतनता की उस अवस्था में पहुँच गए जहाँ से वह संसार में फैले हुए धार्मिक विश्वासों के सभी स्वरूपों को प्रेम एवं सहानुभूति की दृष्टि से देख सकते थे।
आध्यात्मिक विचार--------
इस प्रकार परमहंस जी का जीवन द्वैतवादी पूजा के स्तर से क्रमबद्ध आध्यात्मिक अनुभवों द्वारा निरपेक्षवाद की ऊँचाई तक निर्भीक एवं सफल उत्कर्ष के रूप में पहुँचा हुआ था। उन्होंने प्रयोग करके अपने जीवन काल में ही देखा कि उस परमोच्च सत्य तक पहुँचने के लिए आध्यात्मिक विचार- द्वैतवाद, संशोधित अद्वैतवाद एवं निरपेक्ष अद्वैतवाद, ये तीनों महान श्रेणियाँ मार्ग की अवस्थाएँ थीं। वे एक दूसरे की विरोधी नहीं बल्कि यदि एक को दूसरे में जोड़ दिया जाए तो वे एक दूसरे की पूरक हो जाती थीं।
विवाह------
बंगाल में बाल विवाह की प्रथा है। गदाधर का भी विवाह बाल्यकाल में हो गया था। उनकी बालिका पत्नी शारदामणि जब दक्षिणेश्वर आयीं तब गदाधर वीतराग परमंहस हो चुके थे। माँ शारदामणि का कहना है- "ठाकुर के दर्शन एक बार पा जाती हूँ, यही क्या मेरा कम सौभाग्य है?" परमहंस जी कहा करते थे- "जो माँ जगत का पालन करती हैं, जो मन्दिर में पीठ पर प्रतिष्ठित हैं, वही तो यह हैं।" ये विचार उनके अपनी पत्नी माँ शारदामणि के प्रति थे।

चमत्कार----------
एक दिन सन्ध्या को सहसा एक वृद्धा संन्यासिनी स्वयं दक्षिणेश्वर पधारीं। परमहंस रामकृष्ण को पुत्र की भाँति उनका स्नेह प्राप्त हुआ और उन्होंने परमहंस जी से अनेक तान्त्रिक साधनाएँ करायीं। उनके अतिरिक्त तोतापुरी नामक एक वेदान्ती महात्मा का भी परमहंस जी पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। उनसे परमहंस जी ने अद्वैत-ज्ञान का सूत्र प्राप्त करके उसे अपनी साधना से अपरोक्ष किया। परमहंस जी का जीवन विभिन्न साधनाओं तथा सिद्धियों के चमत्कारों से पूर्ण है, किंतु चमत्कार महापुरुष की महत्ता नहीं बढ़ाते।
अमृतोपदेश------
परमहंस जी की महत्ता उनके त्याग, वैराग्य, पराभक्ति और उस अमृतोपदेश में है, जिससे सहस्त्रों प्राणी कृतार्थ हुए, जिसके प्रभाव से ब्रह्मसमाज के अध्यक्ष केशवचन्द्र सेन जैसे विद्वान भी प्रभावित थे। जिस प्रभाव एवं आध्यात्मिक शक्ति ने नरेन्द्र जैसे नास्तिक, तर्कशील युवक को परम आस्तिक, भारत के गौरव का प्रसारक स्वामी विवेकानन्द बना दिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का अधिकांश जीवन प्राय: समाधि की स्थिति में ही व्यतीत हुआ। जीवन के अन्तिम तीस वर्षों में उन्होंने काशी, वृन्दावन, प्रयाग आदि तीर्थों की यात्रा की। उनकी उपदेश-शैली बड़ी सरल और भावग्राही थी। वे एक छोटे दृष्टान्त में पूरी बात कह जाते थे। स्नेह, दया और सेवा के द्वारा ही उन्होंने लोक सुधार की सदा शिक्षा दी।
आध्यात्मिक प्रेरणा----------
समय जैसे-जैसे व्यतीत होता गया, उनके कठोर आध्यात्मिक अभ्यासों और सिद्धियों के समाचार तेजी से फैलने लगे और दक्षिणेश्वर का मंदिर उद्यान शीघ्र ही भक्तों एवं भ्रमणशील संन्यासियों का प्रिय आश्रयस्थान हो गया। कुछ बड़े-बड़े विद्वान एवं प्रसिद्ध वैष्णव और तांत्रिक साधक जैसे- पं. नारायण शास्त्री, पं. पद्मलोचन तारकालकार, वैष्णवचरण और गौरीकांत तारकभूषण आदि उनसे आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करते रहे। वह शीघ्र ही तत्कालीनन सुविख्यात विचारकों के घनिष्ठ संपर्क में आए जो बंगाल में विचारों का नेतृत्व कर रहे थे। इनमें केशवचंद्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, बंकिमचंद्र चटर्जी, अश्विनीकुमार दत्त के नाम लिए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त साधारण भक्तों का एक दूसरा वर्ग था जिसके सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति रामचंद्र दत्त, गिरीशचंद्र घोष, बलराम बोस, महेंद्रनाथ गुप्त (मास्टर महाशय) और दुर्गाचरण नाग थे। उनकी जगन्माता की निष्कपट प्रार्थना के फलस्वरूप ऐसे सैकड़ों गृहस्थ भक्त, जो बड़े ही सरल थे, उनके चारों ओर समूहों में एकत्रित हो जाते थे और उनके उपदेशामृत से अपनी आध्यात्मिक पिपासा शांत करते थे।
आध्यामिक बंधुत्व--------
आचार्य के जीवन के अंतिम वर्षों में पवित्र आत्माओं का प्रतिभाशील मंडल, जिसके नेता नरेंद्रनाथ दत्त (बाद में स्वामी विवेकानंद) थे, रंगमंच पर अवतरित हुआ। आचार्य ने चुने हुए कुछ लोगों को अपना घनिष्ठ साथी बनाया, त्याग एवं सेवा के उच्च आदर्शों के अनुसार उनके जीवन को मोड़ा और पृथ्वी पर अपने संदेश की पूर्ति के निमित्त उन्हें एक आध्यामिक बंधुत्व में बदला। महान आचार्य के ये दिव्य संदेशवाहक कीर्तिस्तंभ को साहस के साथ पकड़े रहे और उन्होंने मानव जगत की सेवा में पूर्ण रूप से अपने को न्योछावर कर दिया।
मृत्यु---
आचार्य परमहंस जी अधिक दिनों तक पृथ्वी पर नहीं रह सके। परमहंस जी को 1885 के मध्य में उन्हें गले के कष्ट के चिह्न दिखलाई दिए। शीघ्र ही इसने गंभीर रूप धारण किया जिससे वे मुक्त न हो सके। 15 अगस्त, सन् 1886 को उन्होंने महाप्रस्थान किया। सेवाग्राम के संत के शब्दों में 'उनका जीवन धर्म को व्यवहार क्षेत्र में उतारकर मूर्तस्वरूप देने के प्रयास की एक अमरगाथा है।'

कुतुब मीनार: एक भटकता इतिहास


कुतुब मीनार-प्रेम युगल

कुतुब मीनार-प्रेम युगल


कुतुब मीनार--शिव पार्वती

कुतुब मीनार--शिव पार्वती


कुतुब मीनार--गाय ओर बछडा
कुतुब मीनार--गाय ओर बछडा


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पृथ्वी राज चौहान महाभारत काल की बंसा वली में आखरी हिंदू राजा था। मोहम्‍मद गोरी ने छल से उसे सन् 1192 ई में उसे हराया। उसे से पहले वहीं मोहम्‍मद गोरी 16 बार हारा। उसे अंधा कर के अपनी राजधानी ले गया। जहां उसके भाट चंद्रबरदाई ने एक तरकीब से अंधे पृथ्‍वी राज के हाथों मोहम्‍मद गोरी को उसे शब्‍द भेदी बाण से मरवा दिया। कहते है दो का जन्‍म और मरण दिन एक ही था। क्‍योंकि उसने खुद पृथ्‍वी राज को मार कर खुद को भी मार डाला।

क्‍या हो गया था इस बीच भारतीय शासन काल में जिसे मोहम्‍मद गज़नवी की हिम्‍मत नहीं हुई की दिल्‍ली की तरफ मुंह कर सके। उसे मोहम्‍मद गोरी जैसी अदना से शासक ने हरा दिया। इस की तह में कोई राज तो होगा। पहला तो छल था। दूसरा उस समय के जो 52 गढ़ थे वो सभी राजा आपस में भंयकर युद्धों में लिप्‍त थे। इनमें भी मोह बे के चार भाई आल्हा, उदूल, धॉदू और एक चचेरा भाई मल खान ने शादी जैसी परम्‍परा को मान अपमान का करण बना कर युद्ध करते रहे। आज भी बुंदेल खँड़ में बरसात के दो महीनों में वहाँ पर आल्‍हा गाई जाती है, उन दिनों हत्‍या और खून की वारदातें दोगुनी हो जाती है। बड़ी अजीब बात है। पृथ्‍वी राज चौहान की आखरी लड़ाई मोहम्‍मद गोरी से पहले इन्‍हीं आल्‍हा उदल से हुई थी। आल्‍हा का लड़का इंदल पृथ्‍वी राज चौहान की लड़की से शादी करने के लिए आ गए। उन का एक भाई तो पहले से ही धा दु तो पृथ्‍वी राज चौहान के यहां नौकर था वो अपने भाई यों से नाराज हो कर आ गया। युद्ध में बरात के साथ दुल्हा भी मारा गया। और पृथ्‍वी राज चौहान की लड़की बेला वहाँ पर सती हुई। उस समय दिल्‍ली को पथोरा गढ़ के नाम से जानते थे। इन्‍हीं अंदरूनी लडाई यों ने हिंदू राजाओं को कम जोर कर दिया। शादी के लिए इतनी हिंसा….आज भी आप जो बरात देखते है। वो क्‍या है एक फौज है और दुल्हा घोड़े पर बैठ कर तलवार ले कर चलता है। बड़ी अजीब सी रित-रिवाज है। नहीं ये वहीं लड़ाई की परम्‍परा को दोहरा रहे है। आज भी राजस्‍थान, हरियाणा,पंजाब, मध्‍य प्रदेश, और यू पी के बहुत से हिस्‍सों में आप बारात में जब जाकर देखेंगे की जब शादी के फेरे हो रहे होते है। वहां के लोक गीतों में लड़कियां औरतें दुल्हे को कोसती है।

महाभारत के 4000हजार साल तक जो हिन्दू साम्राज्य रहा कमाल है। उसे ने दिल्‍ली में कोई महल परकोटा शिकार गाह, आदी कुछ नहीं बनवाए। आज जीतने भी ऐतिहासिक स्मारक दिल्‍ली में देखेंगे वो सब मुगल कालिन या गुलाम बंस के बनवाए हुए है। और सभी में मजार कब्रगाह की मात्रा अधिक है। इतिहास के साथ न्‍याय नहीं हुआ हमारे देश में क्‍योंकि हमारे देश के राजनेता लम्पट है स्‍वार्थी है। बोट के लिए इस सब का इस्‍तेमाल करते है। बाबरी मस्जिद या राम लल्‍ला जैसे स्मारकों को ऐतिहासिक सच्‍चाई से उन्‍हें कोई लेना देना नहीं उन्‍हें तो बस राज सिंगा हसन पर आसिन होना हे। फिर चाहे वहां कितनी ही लाशें गिरे उन्‍हें इस सब से कुछ लेना देना नहीं है।

इस लिए पुराने इतिहास पर शोध करने वाले भी राजनैतिक प्रभाव या पूर्व धारणा को ले कर ही चलते है। पूर्व धारण आपको या आग्रह हमें सच्‍चाई तक कभी नहीं ले जा सकता। कम से कम बुद्धिजीवी वर्ग को तो एक ऐसी पीढी तैयार करनी होगी जो सत्‍य को आत्‍म सात कर सके। और उसे ढूंढ सके।

स्मारकों की बात हो रही थी। अब लाल किले को ही ले लीजिए उस के ठीक सामने जैन मंदिर है। कोई और शाहजहाँ जिसे ने लाल किला बनवाया उस ने जमा मस्जिद को एक कोने में बनवा दिया और इतनी दरियाँ दिली कि जैन मंदिर को इतना सम्‍मान की गेट से निकलते ही पहले उस के दर्शन हो। बात बड़ी बेबुझीसी पहेली लगती है…….

इसी तरह कहते है कुतुब मीनार को कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनवाया था। कोन था कुतुबुद्दीन ऐबक मात्र एक दास था। मोहम्मद गोरी को बड़ा दरियाँ दिली दिखाई एक दास ने कुतुब की मीनार बना दी और उसके उसका शासन काल कितना था। ।1193-1206 ई और उस के पास जो ‘’अलाई मीनार’’ है, जो 1290-1320 यानि खिल जी वंश के बेहतरीन युग में बनने लगी और उसे खील जी कुतुब की मीनार से दो गुणा बड़ा बनाना चाहते थे। 30 साल के शासन काल में पहली ही मंजिल का ढांचा तैयार हो सका। क्‍या कारण है एक मीनार जो उन्‍हें के पूर्व उतराधिकारी ने बनाई उसी को कम करने के लिए उस से दो गुण बड़ा बनाया जा रहा है। कुछ इतिहास कार कहते है कुतुबुद्दीन ऐबक ने तीन मंजिल बनवाई,बाद की दो मंजिल इल्‍तुतमिश ने और बाद में सन् 1368 ई में फिरोज शाह तूगलक ने पांचवी मंजिल बनवाई यानि कुल मिला कर 175 वर्ष लगे कुतुबुद्दीन के ख्‍वाब को पूरा होने में वो भी तीन वंश ने मिल कर ये काम किया। कुछ इतिहासकार तो यहाँ तक कहते है कि इस का नाम बगदाद के कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी के नाम से इस मीनार का नाम रखा गया है। कुतुब मीनार जिस लाल पत्‍थर से बनी है और जिस से आयतें लिखी है उन के रंग में भी भेद है। जो सपाट लाल पत्‍थर लगा है। वो एक दम लाली लिए है। और जिस से आयतें लिखी गई है वो बदरंग लाल है। और उन आयतें को उस के उपर लगया गया है जिससे वो मीनार बहार की तरफ उभरी है। अगर एक साथ लगया गया होता उसके संग मिला कर लगाया जाता। और आप बिना किसी विचार ओर धारण के केवल कुतुब को देखे तो वो आयतें उस की खूबसूरती को बदरंग कर रही है। चिकना धरातल मन को शांत और गहरे उतरनें लग जाता हे। मीनार ध्‍यान के लिए बनी थी। अलग-अलग चक्र पर पहुंचे साधक अलग-अलग मंजिल पर बैठ कर ध्‍यान करते होगें। क्‍योंकि जिन लोग न ध्‍यान करने के लिए कुतुब मीनार को बनवाया होगा वह इस रहस्‍य को जरूर जानते होगें। वो ये भी जरूर जानते थे पृथ्‍वी के गुरुत्वाकर्षण हमारी उर्जा को अपनी और खींचता है। इसी लिए उचे पहाड़ों पर जा कर लोग मंदिर बनाते है। आप जितना गुरूत्व केन्द्र से उपर जाओगे पृथ्‍वी को खिचाव कम होने लग जात है। कुतुब की लाट अध्‍यात्‍म की चरम अवस्‍था पर पहुँचे साधकों की आने वाली पीढी को महानतम देन है। जिसे इतिहास के गलियारों ले भूल भुलैया बना कर रख दिया। महान राज भोज ने ही तंत्र की साधना में लीन उन एक लाख साधकों को मरवा दिया था वो महान राजा भी जब ध्‍यान के रहस्‍यों से इतना अंजान था जिससे एक विज्ञान जो खोजा गया था पृथ्‍वी से लगभग खत्‍म हो गया। एक मंद बुद्धि राज भोज जिसे इतिहास इतने सम्मान और आदर से देखता हे। उज्जयिनी की उस पवित्र नगरी को अपनी पाशविकता के अति पर ले गया। जो इतिहास की सब से कुरूप तम घटनाओं में एक मानता हूं।

कुतुब मीनार की आज पाँच मंज़िले है उन की ऊँचाई 72.5 मीटर है,और सीढ़ियां 379 है। कुतुब मीनार की सात मंज़िले थी। यानि उस की उँचाई पूरी 100 मीटर, मानव शरीर के अनुपान के रे सो की तरह उसकी मंज़िलों का विभाजन किया गया था। मानव शरीर को सात चक्रों में विभाजित किया गया है। उसी अनुपात को यानि मानव ढांचे को सामने रख कर उस की सात मंज़िले बनवाई गई थी। पहले तीन चक्र अध्‍यात्‍मिक जगत के कम और संसारी जगत के अधिक होते है। इस लिए मानव उन्‍हीं में जीता है और लगभग उन्‍हीं में बार-बार मर जाता है। मूलाधार, स्वादिष्ठता, मणिपूर ये तीन चक्र इसके बाद अनाहत, विशुद्ध दो अध्यात्म का रहस्‍य और आंदन है। फिर आज्ञा चक्र ओर सहस्त्र सार अति है। इस लिए सात हिन्दूओ की बड़ी बेबुझीसी रहस्‍य मय पहली है। सात रंग है। सात सुर है। प्रत्‍येक सुर एक-एक चक्र की धवनि को इंगित करता है। जैसे सा…मूलाधार रे….स्वादिष्ठता….इसी तरह रंग भी सा के लिए काला……रे के लिए कबूतरी……। हिन्दू शादी जैसे अनुष्‍ठान के समय वर बधू के फेरे भी सात ही लगवाते है।

कुतुब मीनार एक अध्‍यात्‍मिक केंद्र था। जिसे बुद्धो ने इसे विकसित किया था। इस का लोह स्तंभ भी गुप्त काल से भी प्रचीन है। इस शिलालेख भी मिले है। शायद चंद्र गुप्‍त के काल से भी प्राचीन। आज भी वहाँ भग्नावशेष अवस्‍था में कला के बेजोड़ नमूनों के अवशेष देखे जा सकते है। जो कला की दृष्टि में अजन्‍ता कोणार्क और खजुराहो से कम नहीं आँकें जा सकते उन स्तम्भों में उन आकृतियों के चेहरे को बडी बेदर्दी से तोड़ा दिए गये है। खूब सुरत खंबों में घंटियों की नक्‍काशी जो किसी मुसलिम को कभी नहीं भाती एक चित्र में गाय अपने बछड़े को दुध पीला रही है। शिव पर्वती, नटराज, भगवान बुद्ध और अनेक खजुराहो की ही तरह भगना वेश अवस्‍था में। आँजता या खजुराहो की मूर्तियां तो मिटटी से ढक दी गई थी वहां किसी मुस्‍लिम शासक की पहुच नहीं हुई अाजंता के तो उस स्‍थान को दर्शनीय बना दिया जहां से एक अंग्रेज आफिसर ने पहली बार खड़े होकर उन गुफाओं को देखा था। आज नहीं कल हमें उन्‍हें फिर से जनता के लिए बंद करना पड़ेगा। वो कोई देखने की वस्‍तु नहीं है वह तो पीने के केन्‍द्र है। वहां तो ध्‍यान के सागर हिलोरे मारते है। जो उस में तैरना जानते है वहीं उस का आनंद उठा सकते है। बाकी लोगों के कौतूहल की वस्तु भर है। यहाँवहाँ अपना नाम लिख कर थोड़ा शोर मचा कर वापस आ जाएँगे। सच ये स्‍थान देखने के काम के लिए नहीं बनाए गये थे।

कुल मिला कर कुतुब मीनार कोई किला या महल या कोई दिखावे की वस्‍तु नहीं थी। वो तो अध्‍यात्‍म के रहस्‍यों को जानने के लिए एक केन्‍द्र था। जहां पर हजारों साधक ध्‍यान करते थे। क्योंकि पास ही ढ़िल्‍लिका (दिल्‍ली) प्रचीन तोमर वंश और चौहान की राजधानी थी। उसे आज भी लाल कोटा के नाम से जानते थे।

ये सब विषय शोध कार्य करने वालों के अपने रहस्‍यों को छू पाए बैठे। लेकिन हम एक धारण को पहले ही मान लेते है। शोध के लिए कोई धारण आग्रह नहीं होना चाहिए एक कोरी किताब जिसे उन्‍होंने इतिहास को उकेरना है। उसकी बीते कल को जीवित करना है। देखो हम कब इस सब में कामयाब होते है……

मनसा आनंद मानस

शहीद राजगुरु : जन्म 24 अगस्त



"शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले, 
 वतन पर मरने वालों का, यही नामों-निशां होगा"
शहीद राजगुरु का पूरा नाम 'शिवराम हरि राजगुरु' था। राजगुरु का जन्म 24 अगस्त, 1908 को पुणे ज़िले के खेड़ा गाँव में हुआ था, जिसका नाम अब 'राजगुरु नगर' हो गया है। उनके पिता का नाम 'श्री हरि नारायण' और माता का नाम 'पार्वती बाई' था। भगत सिंह और सुखदेव के साथ ही राजगुरु को भी 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी|
आज़ादी का प्रण-------
राजगुरु `स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं उसे हासिल करके रहूंगा' का उद्घोष करने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से बहुत प्रभावित थे। 1919 में जलियांवाला बाग़ में जनरल डायर के नेतृत्व में किये गये भीषण नरसंहार ने राजगुरु को ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ बाग़ी और निर्भीक बना दिया तथा उन्होंने उसी समय भारत को विदेशियों के हाथों आज़ाद कराने की प्रतिज्ञा ली और प्रण किया कि चाहे इस कार्य में उनकी जान ही क्यों न चली जाये वह पीछे नहीं हटेंगे।
सुनियोजित गिरफ़्तारी------
जीवन के प्रारम्भिक दिनों से ही राजगुरु का रुझान क्रांतिकारी गतिविधियों की तरफ होने लगा था। राजगुरु ने 19 दिसंबर, 1928 को शहीद-ए-आजम भगत सिंह के साथ मिलकर लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक पद पर नियुक्त अंग्रेज़ अधिकारी 'जे. पी. सांडर्स' को गोली मार दी थी और ख़ुद को अंग्रेज़ी सिपाहियों से गिरफ़्तार कराया था। यह सब पूर्व नियोजित था।
अदालत में बयान-------
अदालत में इन क्रांतिकारियों ने स्वीकार किया था कि वे पंजाब में आज़ादी की लड़ाई के एक बड़े नायक लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेना चाहते थे। अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक प्रदर्शन में पुलिस की बर्बर पिटाई से लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई थी।
प्रसिद्ध तिकड़ी(भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु )-------
राजगुरु ने भगत सिंह के साथ मिलकर सांडर्स को गोली मारी थी,राजगुरु ने 28 सितंबर, 1929 को एक गवर्नर को मारने की कोशिश की थी जिसके अगले दिन उन्हें पुणे से गिरफ़्तार कर लिया गया था।राजगुरु पर 'लाहौर षड़यंत्र' मामले में शामिल होने का मुक़दमा भी चलाया गया।
फ़ाँसी का दिन------सुखदेव,भगतसिंह,राजगुरु
राजगुरु को भी 23 मार्च, 1931 की शाम सात बजे लाहौर के केंद्रीय कारागार में उनके दोस्तों भगत सिंह और सुखदेव के साथ फ़ाँसी पर लटका दिया गया.विशेष----
इतिहासकार बताते हैं कि फाँसी को लेकर जनता में बढ़ते रोष को ध्यान में रखते हुए अंग्रेज़ अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों के शवों का अंतिम संस्कार फ़िरोज़पुर ज़िले के हुसैनीवाला में कर दिया था

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

चुण्डावत मांगी सेनाणी, सर काट दे दियो क्षत्राणी ....


चुण्डावत मांगी सेनाणी, सर काट दे दियो क्षत्राणी ....

फेसबुक से - Hindus Unsung Hero's photo

एक ऐसी रानी जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत रतन सिंह चुण्डावत की रानी थी जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले...ही उसके पति रावत रतन सिंह चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर

रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पतालगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोचकर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रान

ी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके और रावत रतन सिंह चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथभयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमिके लिए शहीद हो गया —

सोमवार, 20 अगस्त 2012

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा




जहाँ डाल-डाल पर


जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा
जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा
ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि जपते प्रभु नाम की माला
जहाँ हर बालक एक मोहन है और राधा हर एक बाला
जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा
वो भारत देश है मेरा


अलबेलों की इस धरती के त्योहार भी हैं अलबेले
कहीं दीवाली की जगमग है कहीं हैं होली के मेले
जहाँ राग रंग और हँसी खुशी का चारों ओर है घेरा
वो भारत देश है मेरा


जब आसमान से बातें करते मंदिर और शिवाले
जहाँ किसी नगर में किसी द्वार पर कोई न ताला डाले
प्रेम की बंसी जहाँ बजाता है ये शाम सवेरा
वो भारत देश है मेरा


- राजेंद्र किशन