मंगलवार, 4 सितंबर 2012

श्रीअनन्त चतुर्दशी महोत्सव कोटा

 


श्री अनन्त चतुर्दशी महोत्सव

- अरविन्द सीसौदिया

       
 भारतीय संस्कृति में निहित भक्ति एवं शक्ति का पर्व अनन्त चतुर्दशी महोत्सव, मूलतः दो प्रमुख पर्वों के मध्य मनाया जाता है। यह गणेश जी के जन्मोत्सव ‘गणेश चतुर्थी‘‘ से  प्रारंभ हो कर ‘‘श्री अनन्त चतुर्दशी‘‘  तक के 10-11 दिन की अवधि में मनाया जाता है। इस दौरान गणेश चतुर्थी को घरों में गणेश जी की प्रतिमाओं तथा मोहल्लों में झांकियो की स्थापना होती है। नित्य प्रातः सायं पूजा अर्चना एवं आरती होती है, भक्ति संध्याएं आयोजित की जाती हैं तथा श्री अनन्त चतुर्दशी के दिन इन गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। अनेकानेक स्थानों पर यह विसर्जन शोभा यात्रा के रूप में सम्पन्न होता है। कोटा में भी इसी तरह श्री अनन्त चतुर्दशी महोत्सव आयोजन होता है एवं शोभा यात्रा के रूप में सम्पन्न होता है।
श्री गणेश जन्मोत्सव
        ऐसा माना जाता है कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (चौथ) को आदि शक्ति, पंच देवों में प्रथम पूज्य, गणपति का जन्म शिव-पार्वती की द्वितीय संतान के रूप में हुआ तथा इसी कारण यह दिन धार्मिक रूप से ‘‘गणेश चतुर्थी व्रत‘‘ के रूप में सम्पूर्ण देश में मनाया जाता है। लोक मान्यता यह भी है कि गणेश जी के जन्म के 10 दिन तक उत्सवों का आयोजन हुआ था और इसी कारण प्रतिवर्ष इस अवधि में आमजन के द्वारा श्रद्धा एवं आस्था से पूजा अर्चना की जाती है। जन मान्यता यह भी कि इस दौरान जो गणेश स्तुति करते हैं, उन पर गणपति की विषेश कृपा होती है।
सर्व देवाध्यक्ष श्री गणेश
        प्रचलित आख्यान एवं धार्मिक मान्यता यह है कि आदि महाशक्ति माता पार्वती ने अपने अंतःपुर (आवास) कैलाश पर्वत पर पुत्र गणेश को द्वारपाल नियुक्त किया और किसी को भी प्रवेश नहीं देने की आज्ञा देकर, वे स्नान करने चली गई थी। इसी दौरान भगवान शिव शंकर द्वार पर आ पहुंचे, श्री गणेश ने उन्हें समझाया कि माता अभी स्नान पर बैठी हैं। उनकी आज्ञा है कि किसी को भी प्रवेश नहीं दिया जाये, अतः आप कुछ समय पश्चात पधारें।
        शिव जी के अनेकानेक बार समझाने पर भी गणेश जी ने प्रवेश की अनुमति नहीं दी। फिर गणों और देवों के द्वारा गणेश जी को हटाने का प्रयत्न किया गया, जिसमें वे सफल नहीं हुए और अन्त में शंकर भगवान ने त्रिशुल से गणेश जी का सिर काट कर उनका वध कर दिया।
        ज्यों ही यह बात आदि महाशक्ति पार्वती को ज्ञात हुई तो वे शोक ग्रस्त होकर क्रोधित हो उठी। उन्होंने अपनी शक्तियों को प्रलय मचाने का आदेश दे दिया। ब्रह्माण्ड में हाहाकार मच गया, कोई भी देव शक्ति इस उत्पाद को रोक नहीं सकी और अन्त में महर्षि नारद जी की सलाह पर माता पार्वती की शरण में पहुंच कर देव शक्तियों ने अनुनय विनय स्तुतियां की, तब माता पार्वती ने देव शक्तियों को आज्ञा दी कि 1. श्री गणेश को पुनः जीवित किया जाये, 2. सभी देवीय शक्तियां गणेश से पराजित हुई है इसलिये देवगण उन्हें अपना अध्यक्ष माने एवं प्रथम पूजन का अधिकार दें, और 3. समस्त पूजाओं, अनुष्ठानों एवं मंगल आयोजनों में जब तक गणेश की पूजा न हो जाये तब तक वे फलीभूत न हों।
        उपरोक्त तीनों मांगों को देवों ने स्वीकार किया भगवान विष्णु जी ने गणेश जी को नया मस्तक प्रदान किया। भगवान शिव जी ने उनमें प्राणों का संचार कर पुनः जीवित किया एवं भगवान ब्रह्मा जी ने उन्हें सभी देवों का अध्यक्ष (देवों का भी देव, देवा ओ देवा) तथा प्रथम पूज्य घोषित किया। (शिवपुराण से)

गणेशोत्सव
        भगवान श्री गणेश की प्रतिष्ठा सम्पूर्ण भारत में समान रूप से व्याप्त है, महाराष्ट्र में मंगलकारी देवता के रूप में ‘‘मंगल मूर्ति‘‘ के नाम से पूज्य हैै। महाराष्ट्र में अष्टगणपति के आठ तीर्थ स्थान प्रसिद्ध हैं जहॉ की परिक्रमा करना प्रत्येक महाराष्ट्रीयन हिन्दू अपना पवित्र कर्म मानता है। दक्षिण भारत में भी इनकी विषेश लोकप्रियता ‘कला शिरोमणि‘ के रूप में है। मैसूर तथा तंजौर के मंदिरों में गणेश की नृत्य मुद्रा में अनेक मनमोहक प्रतिमाएं हैं।
        गणेष हिन्दुओं के आदि आराध्य देव हैं। हिन्दू धर्म में गणेश को एक विशिष्ठ स्थान प्राप्त है, कोई भी धार्मिक उत्सव हो यज्ञ पूजन इत्यादि सत्कर्म हों या फिर विवाहोत्सव हो, जन्मोत्सव हो अथवा व्यापार या किसी अन्य कार्य का शुभारंभ हो उसे निर्विघ्न सम्पन्न करने के लिये “शुभ” के रूप में गणेश की पूजा सबसे पहले की जाती है।
        महाराष्ट्र में तो सात वाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य आदि राजवंशों ने गणेशोत्सव की प्रथा को विशेष रूप से प्रचलित करवाया। महाराज छत्रपति शिवाजी के शासन काल में गणेश उत्सवों तथा गणेश उपासना का विशेष विकास हुआ।

गणेश महिमा
        गणेश जी पंचदेवों में प्रथम पूज्य हैं, गुरू पूजा से भी पूर्व आराधना योग्य हैं। सभी मतों व पंथों में मौखिक व आध्यात्मिक कर्मों में प्रथम पूज्य के रूप में लोकमान्य हैं। सर्वाधिक लोकप्रिय देवताओं में एक गणेश या गणपति को बुद्धि का प्रतीक और सौभाग्य लाने वाला माना जाता है। उनकी दोनों पत्नियां रिद्धि और सिद्धि उनके दांये - बांये विराजती हैं, उनके पुत्र शुभ और लाभ हैं। इसलिये ये सुख, समृद्धि और वैभव के देव माने गये हैं, इसी कारण ये मंगल करने वाले और अमंगल हरने वाले, प्रभावशाली देव के रूप में पूज्य हैं।
        कहा जाता है कि उनका हाथीनुमा मस्तिष्क विराट ज्ञान और बुद्धि का प्रतीक हैं, नटखट आंखे, लम्बे कानों से संसार में घटित हो रहा कुछ भी उनसे बचता नहीं है उनकी नाक रूपी लम्बी संूड अनहोनी को सूंघ लेती है। उनका लम्बा उदर हर प्रकार की बुराई को पचाने की क्षमता रखता है। उनका वाहन चूहा हमें यह बताता है कि एक बुद्धिमान व्यक्ति जीवन में छोटी से छोटी चीजों को भी बराबर महत्व देकर अपने कार्य को सिद्ध कर सकता है।
        एक मान्यता यह भी प्रचलित है कि कुकर्मों में रत बुद्धि जो चुहे की भांति व्यक्ति व समाज को कुतरती हुई सद्कार्यों में बाधा डालती है। वह केवल गणेश जैसे विराट बुद्धि बल के आरोही के ही बस में आ सकती है।
        गणेश चतुर्थी के दिन गणपति के विग्रह की स्थापना शुद्धि व बुद्धि की साधना का प्रारंभ है। यह भी मान्यता है कि दांई तरफ झुकी हुई सूंड समृद्धि एवं रिद्धि सिद्धि की दात्री है। वहीं बायीं तरफ झुकी सूंड ऐष्वर्य व शत्रु विजय देने वाली है।
        गणपति जी को सिखाने वाला देवता भी माना जाता है। उन्हें विघ्नहर्ता कह कर पुकारा जाता है, प्रवेश द्वारों पर और मार्गों पर अक्सर उनकी तस्वीर या प्रतीक चिन्ह देखने का मिलते हैं। मान्यता रही है कि उगते सूरज की तरफ जिस भी घर के सामने उनकी तस्वीर लगी होती है, वहां वास्तु दोष नहीं होता है।
        गणपति का मूल रूप से शासनाध्यक्ष के रूप में भी शासन व्यवस्था सूत्र देते हैं जो एक राष्ट्र प्रमुख की गुणवत्ताएं होनी चाहिए वह सभी गुणवत्ताएं गणेश जी के मस्तिष्क, कान, आंख, सूंड, उदर और सवारी रूपी मूषक के रूप में अपनी - अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन करती हैं।
श्री अनन्त चतुर्दशी व्रत
        भगवान श्री हरि का एक स्वरूप श्री अनन्त भगवान के रूप में सतयुग के समय से ही पूजनीय एवं फलदायी रहा है। इस दिन कच्चे सूत के लच्छे में 14 गांठ लगाकर उसे हाथ पर बांधने की परम्परा है सारे दिन व्रत रखा जाता है तथा इस दिन कथा सुनाई जाती है इस व्रत को श्री कृष्ण भगवान की प्रेरणा से पाण्डवों ने भी रखा था और उन्हें 14 वर्ष पश्चात राज्य एवं वैभव की प्राप्ति हुई थी। यह उपवास युगों युगों से धन, ऐश्वर्य और सद्मार्ग से संसारिक सुखों की प्राप्ति के लिये किया जाता रहा है और वर्तमान में भी एक महत्वपूर्ण उपवास है। इस पर्व के दिन ही श्री गणेश जी की प्रतिमाओं का विसर्जन होता है।

पूर्वार्द्ध...
        यूं तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर हुए अनेकों शोधों में माना गया है कि श्री गणेश प्राचीनतम आराध्य देवों में से एक हैं तथा उन्हें सम्पूर्ण पृथ्वी पर किसी न किसी रूप में जाना, पहचाना और पूजा जाता रहा है। वर्तमान समय में सर्वाधिक प्रतिमायें और प्रतिदिन सर्वाधिक पूजनीय देव श्री गणेश ही हैं।
        कहते हैं कि पुणे में कस्बा गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति की स्थापना शिवाजी महाराज की मां जीजा बाई ने की थी। मराठा पेशवाओं ने गणोत्सव को बढ़ावा दिया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को जो विशेष स्वरूप दिया उससे गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गये। तिलक जी के प्रयास से जो गणेश पूजा पहले परिवार तक सीमित थी, वह सार्वजनिक महोत्सव बन गई। इस दौर में वह केवल धार्मिक कर्मकाण्ड तक ही समिति नहीं रही, बल्कि आजादी की लड़ाई, छुआछूत दूर कर सामाजिक समरसता लाने वाली,समाज को संगठित करने और आम आदमी का ज्ञानवर्द्धन करने की विधा भी बनी। यह सम्पूर्ण महाराष्ट्र में एक आन्दोलन बन कर प्रकट हुई, इस आन्दोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींवें हिलाने का महत्वपूर्ण कार्य किया, जिसकी चर्चा रोलेट समिति रपट में भी आई है।
        लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में गणेशोत्सव का जो सार्वजनिक पौधा रोपण किया था, वह अब विराट वट वृक्ष का रूप ले चुका है। अकेले महाराष्ट्र में ही 50 हजार से ज्यादा सार्वजनिक गणेशोत्सव मण्डल हैं। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात में भी हजारों की संख्या में गणेशोत्सवों का आयोजन होता है। इस अवसर पर सम्पूर्ण देश में कहीं ना कहीं, कोई ना कोई विशेष आयोजन /उत्सव आयोजित किया जाता है।
        रोलेट समिति रपट की रिपोर्ट में तब आया था कि गणेशोत्सव के दौरान युवकों की टोलियां सडकों पर घूम घूम कर देश की स्वतंत्रता, राष्ट्रभक्ति और अंग्रेजी शासन के विरोधी गीत गाती थी, स्कूली बच्चे पर्चे बांटते थे तथा अंग्रेजी शासन से मुक्त होने के लिये शिवाजी की तरह विद्रोह का आहृान करते थे। इसके द्वारा गुलामी से मुक्ति के लिये धार्मिक संघर्ष को जरूरी बताया जाता था।
        वीर सावरकर और कवि गोविन्द ने नासिक में मित्र मेला संस्था बनाई थी। इस संस्था का काम देश भक्तिपूर्ण लोक गीतों को सुनाना, आकर्षक ढंग से बोलकर नाट्य मंचन करना एवं राम - रावण कथा, कृष्ण - कंस कथा जैसे प्रसंगों के द्वारा समान कर्त्तव्य का भाव जागृत कर समाज में चेतना लाने का कार्य किया गया।
        इन गणेशोत्सवों में भाषण देने के लिये देश के बडे़ बड़े नेताओं और महापुरूषों ने भाग लिया है। जिनमें वीर विनायक दामोदर सावरकर, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, डाक्टर केशवराव बलिराम हेडगवार, पंडित मदन मोहन मालवीय, श्रीमती सरोजिनी नायडू , बेरिस्टर जयकर, रेंगलर परांजपे , बेरिस्टर चक्रवर्ती , दादासाहेब खापर्डे, डाक्टर मुंजे आदि प्रमुख थे।    
कोटा में अनन्त चतुर्दशी महोत्सव का प्रारंभ
        माना यह जाता है कि कोटा में श्री गणेश चतुर्थी व्रत और श्रीअनन्त चतुर्दशी के व्रत रखने, पूजा पाठ और उत्सव मनाने की परम्परा तो पुरातन काल से ही है। शहर में पाटनपोल क्षेत्र में विख्यात आस्था का केन्द्र श्री मथुराधीश जी का मंदिर स्थापित है और इसी क्षेत्र में डॉ. रामकुमार जी रहते थे। उनका मूल स्वभाव आध्यात्म और धार्मिक चिन्तन की गहराइयों से लबालब था। उन्होंने श्याम सुन्दर कीर्तन मंडली बनाई हुई थी, वे भजन गायन करते हुए मनमोहक नृत्य करते थे, जो अत्यंत लोकप्रिय था। वे बाद में वृंदावन में ही रहे और उनका प्राणांत भी वहीं हुआ।
        फूल बिहारी जी के मंदिर के सामने उनकी दुकान थी, वहीं वे गणेश चतुर्थी के अवसर पर गणेश प्रतिमा की झांकियां सजाते थे तथा लगभग प्रतिदिन ही भजन संगीत के द्वारा मनमोहक प्रस्तुति से आरती की जाती थी तथा अनन्त चतुर्दशी के दिन उस प्रतिमा का विसर्जन करने के लिय हाथ ठेले पर रखकर जाते थे, साथ में उनकी भजन मण्डली, कीर्तन करते हुए चलती थी, अनेकों स्थानों पर वे मनमोहक नृत्य भी प्रस्तुत करते थे। तब इसमें लोगों की संख्या सीमित ही रहती थी, मगर इसे देखने की लालसा में लोग इंतजार करते थे। इस प्रतिमा का विसर्जन वह रामपुरा स्थित धार्मिक स्थल ‘‘छोटी समाध‘‘ पर पहुंच कर, चम्बल नदी में करते थे, विसर्जन के पूर्व छोटी समाध पर प्रतिमा की महाआरती हुआ करती थी।
        इस कीर्तन मण्डली के द्वारा गणेश प्रतिमा को शोभा यात्रा के रूप में निकाले जाने को समाज में सराहा और उससे जुडना प्रारंभ किया गया। निरन्तर सकारात्मक सहयोग मिलने से यह दिन - प्रतिदिन बढ़ने लगी, इसमें अखाडे और व्यायामशाला जुड़ गये तथा अन्य क्षेत्रों में स्थापित गणेश प्रतिमाएं भी सम्मिलित होने लगी। चर्चा गांव और कस्बों में पहुंचने से वहां के लोग भी इसे देखने आने लगे।
        बुजुर्गों का कहना है कि 1955 में धार के अखाडे के पहलवान गजानंद जी की हत्या के बाद इस जुलूस के सामने प्रश्न उठ खडा हुआ था कि यह जारी रहेगा अथवा नहीं। मगर यह जारी रहा और जन सहभागिता ने अपना विशाल स्वरूप धारण करना प्रारंभ कर दिया तथा विशेषकर अखाडे और व्यायामशालायें इसमें सम्मिलित होना अपना सौभाग्य मानने लगे थे। तब उस्तादगण महीनों पहले से अपने शिष्यों को कला के प्रदर्शन के लिये तैयार करते थे।
संघर्ष काल
        इसी प्रकार 1989 में एक अप्रिय घटना के बाद प्रशासन के सुझाव पर मार्ग परिवर्तित किया गया और शोभा यात्रा को निकालने के लिये विधिवत ‘‘श्री अनन्त चतुर्दशी महोत्सव आयोजन समिति‘‘ का गठन हुआ, विश्व हिन्दू परिषद सहित गई
धार्मिक संस्थाओं व समाज के प्रबुद्धजनों के साथ मिलकर इसे गठित किया था।    जिसके तत्वाधान में यह आयोजन प्रतिवर्ष आयोजित होता है और यह संस्था अब मान्यता प्राप्त और पंजीकृत भी है।
        इसके प्रथम संस्थापक अध्यक्ष गोदावरी धाम के बाबा श्री गोपीनाथ जी भार्गव तथा संस्थापक संयोजक श्री नेता खण्डेलवाल थे। उनके पश्चात 1997 से 1999 तक श्री रामबाबू सोनी संयोजक रहे, 2000 से 2002 तक दिनेश सोनी, 2003 से 2005 तक श्री मनोज पुरी, 2006 में श्री नेता खण्डेलवाल, 2007 से पुनः श्री दिनेश सोनी संयोजक हैं। वर्तमान 2012 में इसके संयोजक  श्री मनोज पुरी  हैं।
        कोटा में तनाव समाप्त कर शान्ति एवं सद्भाव स्थापित करने तथा हिन्दू समाज का संगठित स्वरूप प्रकट हो, इस दूरगामी दृष्टि से इस त्रासदी के पश्चात बाबा गोपीनाथ जी भार्गव ने स्वयं के सिर पर गणेश प्रतिमा को धारण किया और  पुनः यात्रा को प्रारंभ किया था।
        उन्होंने इसके लिए अथक मेहनत की, व्यक्तिगत सम्पर्कों से अखाडों एवं झांकियों से जुडी संस्थाओं को आहृान किया कि इस आयोजन को पुनः विशाल स्वरूप प्रदान करते हुए सफल बनायें। इसी के परिणाम स्वरूप यह शोभायात्रा प्रतिवर्ष और अधिक भव्य एवं विशाल स्वरूप के साथ उत्तरोत्तर वृद्धि कर रही है। इस शोभा यात्रा में 125 झांकियां, 45 अखाडे, 25 भजन मण्डलियां और 25 डांडिया मण्डलियों का विशाल जुलूस शहर के प्रमुख मार्गों से निकलता है।
श्री अनन्त चतुर्दशी महोत्सव का स्वरूप
        शोभा यात्रा को सम्पन्न करने के लिये आयोजन समिति दो माह पूर्व से ही भाग लेने वाली विभिन्न समितियों, संस्थाओं से मिलकर प्रयास प्रारंभ कर देती हैं तथा प्रशासन के साथ ही निरन्तर समन्वय बिठाती रहती हैं। शोभा यात्रा के प्रारंभ में मल्टी परपज विद्यालय गुमानपुरा के प्रांगण में एक आयोजन होता है जिसमें पूज्य सन्तगण और अतिथिगण, पूजन-अर्चन एवं मार्गदर्शन करते हैं।
        इसके पश्चात शोभायात्रा में सजे हुए हाथी, घोड़े एवं ऊंट सुरक्षा टोली तथा सन्तों की सवारियां चलती हैं, उनके पीछे क्रमबद्धता में झांकियां, अखाड़े, भजन मण्डलियां व डांडिया मण्डलियां व्यवस्थित ढंग से समायोजित होकर प्रदर्शन करते हुए चलते हैं। इनके मार्गदर्शन हेतु समिति के सदस्य साथ चलते हैं।
        इस शोभा यात्रा में प्रदर्शनकारी, श्रृद्धालु और दर्शनार्थियों के रूप में लाखों की संख्या में आमजन यात्रा में उपस्थित रहते हैं। यात्रा मार्ग के दोनों और पूरी सडक व भवन खचाखच भरे रहते हैं, लोगों में शोभा यात्रा के दर्शन का उत्साह और उमंग देखते ही बनता है।
        यात्रा का मार्ग मल्टी परपज विद्यालय गुमानपुरा से प्रारंभ होकर सूरजपोल गेट कैथूनीपोल थाने, गंधी जी की पुल, पुरानी सब्जी मण्डी, अग्रसेन बाजार, बक्शपुरी कुण्ड की गली होते हुए रामपुरा आर्यसमाज रोड, हिन्दू धर्मशाला के रास्ते सरोवर पर स्थित बारहद्वारी पहुंचती है, जहां विसर्जन के पश्चात यात्रा सम्पन्न होती है। यह विसर्जन सामान्य तौर पर रात्रि दस से प्रारंभ होकर देर रात तक चलता है। इस वर्ष समिति ने निर्णय लिया है कि विसर्जन रात्री आठ बजे से ही प्रारम्भ करवाया जाये। प्रशासन, पुलिस व मजिस्ट्रेटों को सम्मिलित कर व्यवस्था को नियंत्रित व शान्तिपूर्वक सम्पन्न करवाता है।
महोत्सव का विस्तार
        वर्तमान आयोजन समिति ने इस आयेजन को संभाग स्तरीय बनाने का निर्णय लिया है। इस क्रम में हाडोती संभाग के जिलों व तहसीलों से प्रबुद्धजनों को समिति में सम्मिलित किया गया है। तहसीलों से सम्पर्क कर झांकियों व अखाडों को सम्मलित होने का आग्रह किया गया है। जिसके परिणामस्वरूप इस वर्श ग्रामीण क्षेत्र से कुछ झांकिया व अखाडे सम्मिलित होंगे तथा दर्शनार्थ श्रृद्धालुओं की अभिवृद्धि के प्रयास किये जा रहे हैं।
आगामी योजना
        समिति के द्वारा प्रयास यह किया जा रहा है कि भविष्य में विसर्जन स्थल बारहद्वारी के निकट तेजा दशमी से अनन्त चतुर्दशी तक एक मेले का आयोजन किया जाये। इस अवधि के दौरान विभिन्न प्रतियोगिताएं सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा राष्ट्र चेतना के कार्यक्रम सम्पन्न हों तथा पर्यटन की दृष्टि से यह आयोजन महत्वपूर्ण होते हुए हाडोती संभाग की जन चेतना का माध्यम बना रहे। प्रशासन के सहयोग से आयोजन दिन दूनी रात चौगनी सफलताएं प्राप्त कर रहा हैं, इसमें उनका योगदान भी सराहनीय है।

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