बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

सरदार पटेल द्वारा 562 रियासतों का एकीकरण : विश्व इतिहास का आश्चर्य




शत शत नमन , सरदार वल्लभ भाई पटेल,आज उनकी जयन्ति है।
सरदार वल्लभ भाई पटेल (31 अक्तूबर, 1875 - 15 दिसंबर, 1950) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री के साथ प्रथम गृह, सूचना तथा रियासत विभाग के मंत्री भी थे। वे नवीन भारत के निर्माता थे। राष्ट्रीय एकता के बेजोड़ शिल्पी थे। वास्तव में वे भारतीय जनमानस अर्थात किसान की आत्मा थे। भारत की स्वतंत्रता संग्राम मे उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उन्हे भारत का 'लौह पुरूष' भी कहा जाता है। सरदार पटेल की महानतम देन थी 562 छोटी-बड़ी रियासतों का भारतीय संघ में विलीनीकरण करके भारतीय एकता का निर्माण करना। विश्व के इतिहास में एक भी व्यक्ति ऐसा न हुआ जिसने इतनी बड़ी संख्या में राज्यों का एकीकरण करने का साहस किया हो। सरदार पटेल ने पंडित नेहरू के तीव्र विरोध के पश्चात भी सोमनाथ के भग्न मंदिर के पुनर्निर्माण 
5 जुलाई, 1947 को एक रियासत विभाग की स्थापना की गई थी। एक बार उन्होंने सुना कि बस्तर की रियासत में कच्चे सोने का बड़ा भारी क्षेत्र है और इस भूमि को दीर्घकालिक पट्टे पर हैदराबाद की निजाम सरकार खरीदना चाहती है। उसी दिन वे परेशान हो उठे। उन्होंने अपना एक थैला उठाया, वी.पी. मेनन को साथ लिया और चल पड़े। वे उड़ीसा पहुंचे, वहां के 23 राजाओं से कहा, "कुएं के मेढक मत बनो, महासागर में आ जाओ।" उड़ीसा के लोगों की सदियों पुरानी इच्छा कुछ ही घंटों में पूरी हो गई। फिर नागपुर पहुंचे, यहां के 38 राजाओं से मिले। इन्हें सैल्यूट स्टेट कहा जाता था, यानी जब कोई इनसे मिलने जाता तो तोप छोड़कर सलामी दी जाती थी। पटेल ने इन राज्यों की बादशाहत को आखिरी सलामी दी। इसी तरह वे काठियावाड़ पहुंचे। वहां 250 रियासतें थी। कुछ तो केवल 20-20 गांव की रियासतें थीं। सबका एकीकरण किया। एक शाम मुम्बई पहुंचे। आसपास के राजाओं से बातचीत की और उनकी राजसत्ता अपने थैले में डालकर चल दिए। पटेल पंजाब गये। पटियाला का खजाना देखा तो खाली था। फरीदकोट के राजा ने कुछ आनाकानी की। सरदार पटेल ने फरीदकोट के नक्शे पर अपनी लाल पैंसिल घुमाते हुए केवल इतना पूछा कि "क्या मर्जी है?" राजा कांप उठा। आखिर 15 अगस्त, 1947 तक केवल तीन रियासतें-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद छोड़कर उस लौह पुरुष ने सभी रियासतों को भारत में मिला दिया। इन तीन रियासतों में भी जूनागढ़ को 9 नवम्बर, 1947 को मिला लिया गया तथा जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। 1948 में हैदराबाद भी केवल 4 दिन की पुलिस कार्रवाई द्वारा मिला लिया गया। न कोई बम चला, न कोई क्रांति हुई, जैसा कि डराया जा रहा था।
जहां तक कश्मीर रियासत का प्रश्न है इसे पंडित नेहरू ने स्वयं अपने अधिकार में लिया हुआ था, परंतु यह सत्य है कि सरदार पटेल कश्मीर में जनमत संग्रह तथा कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने पर बेहद क्षुब्ध थे। नि:संदेह सरदार पटेल द्वारा यह 562 रियासतों का एकीकरण विश्व इतिहास का एक आश्चर्य था। भारत की यह रक्तहीन क्रांति थी। महात्मा गांधी ने सरदार पटेल को इन रियासतों के बारे में लिखा था, "रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।"1950 में पंडित नेहरू को लिखे एक पत्र में पटेल ने चीन तथा उसकी तिब्बत के प्रति नीति से सावधान किया था और चीन का रवैया कपटपूर्ण तथा विश्वासघाती बतलाया था। अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा कहा था। उन्होंने यह भी लिखा था कि तिब्बत पर चीन का कब्जा नई समस्याओं को जन्म देगा। 1950 में नेपाल के संदर्भ में लिखे पत्रों से भी पं. नेहरू सहमत न थे। 1950 में ही गोवा की स्वतंत्रता के संबंध में चली दो घंटे की कैबिनेट बैठक में लम्बी वार्ता सुनने के पश्चात सरदार पटेल ने केवल इतना कहा "क्या हम गोवा जाएंगे, केवल दो घंटे की बात है।" नेहरू इससे बड़े नाराज हुए थे। यदि पटेल की बात मानी गई होती तो 1961 तक गोवा की स्वतंत्रता की प्रतीक्षा न करनी पड़ती।

मंगलवार, 30 अक्तूबर 2012

केजरीवाल के पीछे : कहीं विदेशी करेंसी ( धन ) का खेल तो नहीं








केजरीवाल के पीछे : कहीं विदेशी करेंसी ( धन ) का खेल तो नहीं
अन्ना आंदोलन को धूलधूसरित कर अपनी धधकती इच्छाओं की ज्वालामुखी में देश के
‘लोकतंत्र’ के प्रति अविश्वास पैदा करने की साजिश में लगी अरविंद केजरीवाल की
टीम निश्चित ही उन लोगों के इशारे पर खेल रही है जिसे भारतमाता से प्यार नहीं है।
केन्द्र सरकार को इस आशय की गंभीर छानबीन करनी चाहिए। केजरीवाल का खेल करेंसी का हो
सकता है। अब जानना यह है कि यह करेंसी भारत की है या फिर भारत को कमजोर करने वाली
शक्तियों की। ‘सुपारी’ किसने दी है यह पता तो डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार को लगाना ही चाहिए।
‘केजरीवाल’ को शायद यह नहीं पता कि जिस दिन उन्होंने राजनीति में आने और चुनाव लड़ने
की घोषणा की उसी दिन उसका सेंसेक्स लुढका ही नहीं, जमीन पर आ गया। स्थिति ध्ाीरे-ध्ाीरे स्पष्ट
होती जा रही है। मुझे ध्यान है कि एक दिन अन्ना ने मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह
के बारे में कहा था कि इन्हें तो पूना भेज देना चाहिए। लेकिन आज हम कहना चाह रहे हैं कि अन्ना
‘‘अरविंद केजरीवाल’’ को कहां रखना चाहेंगे! कहा जाता है कि व्यक्ति को अपने गुणों से समाज
और राष्टन्न् में पूजनीय बनना चाहिए, पर कुछ लोगों की गलतफहमी रहती है कि वे दूसरों के दुर्गुणों
का बखान कर समाज में सत् पुरुष बनना चाहते हैं। आजकल केजरीवाल यही कह रहे हैं। उन्होंने
स्वयं को निष्पक्ष बनाने के लिए जब कांग्रेस के ‘वाडन्न्ा’ के मुंह पर कालिख पोती तो उन्हें लगने
लगा कि कांग्रेस के लोग कहीं यह न कहें कि वह भाजपा के हाथ में खेल रहा है? बस! यह सोचकर
भाजपा के राष्टन्न्ीय श्री अध्यक्ष नितिन गडकरी की जायज बातें, जो वे स्वयं अपने भाषणों में कहते
हैं, को उन्होंने नमक-मिर्च और मसाला लगाकर बताना शुरू कर दिया!
यहां से शुरू हुआ केजरीवाल के निष्पक्ष बनने का सिलसिला। श्री नितिन गडकरी जिस दिन
भाजपा के अध्यक्ष बने, उसी दिन से अपने बारे में, अपने कार्यों के बारे मंे स्वयं बताते हुए सहकारिता
के माध्यम से सहयोग करने और सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने की बातें बताने लगे।
‘‘केजरीवाल’’ ने कौन सी नई बातें बतायीं? जो भी बातें अरविंद केजरीवाल ने नितिनजी के बारे
में कहीं, उसकी हवा तो स्वयं केन्द्रीय मंत्री शरद पवार ने यह कहकर निकाल दी कि ‘‘नितिन गडकरी
ने कोई गलत काम नहीं किया।’’ यह टिप्पणी केजरीवाल के मुंह पर करारा तमाचा था। वहीं नितिनजी
ने यह कहकर कि उन पर लगाए गए आरोपों की जांच हो जाए, केजरीवाल की अनैतिकता और साजिश
की पोल खोल दी।
श्री शरद पवार ने सच कहा तो उनकी बेटी सुप्रिया को कठघरे में खड़ा कर दिया। यहां यह
बात साफ हो गई कि राजा हरिश्चन्द्र की भूमिका वाले ‘केजरीवाल’, जिसे हम पहले दिन से समझ
रहे थे, की पोल खुल गई। केजरीवाल वैसे निकले जैसे- सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।
अरे, जो अन्ना का नहीं वह देश का क्या होगा? विदेशी ध्ान से देशी लोकतंत्र का गड्ढ़ा खोदने में
लगे केजरीवाल शायद यह भूल गए कि भारत के जन-गण-मन की आत्मा की लोकतंत्र के प्रति
गहरी आस्था है। अतः ऐसे परिपक्व नागरिकों को अरविंद केजरीवाल इन छोटे-मोटे अनर्गल निराध्ाार
आरोपों से कमजोर नहीं कर सकते।
‘‘केजरीवाल’’ है क्या? क्या उनके बारे में लोगों को नहीं मालूम कि वह है अन्ना आंदोलन
का ‘ब्लैक मेलर’’ या यूं कहें कि अन्ना के साथ विश्वासघात करने वाला! जिस ‘अन्ना’ ने अरविंद
केजरीवाल को अपने आंदोलन के आंचल का दूध्ा पिलाकर बड़ा किया, उसने उसी ‘अन्ना’ का साथ
छोड़ अपना नाम निश्चित ही देश के विश्वासघातियों में शामिल कर लिया। एक विश्वासघाती को

केजरीवाल के पीछे कहीं विदेशी करेंसी का खेल तो नहीं क्या दूसरों पर आरोप लगाने का कोई नैतिक अध्ािकार है?‘‘अरविंद केजरीवाल’ चाहता है कि उसकी हरकतों पर देश के लोग गुस्सा उतारंे
और जाने-अनजाने में उसकी कहीं पिटाई हो जाए, जिससे भारत की जनता की उसे भावनात्मक समर्थन मिलना शुरू हो जाए। वह उसी बात की बाट जोह रहा है। लेकिन उसे शायद यह नहीं पता कि उन जैसे कितने आए और कितने गए पर भारत का परिपक्व लोकतंत्र कभी ओछी हरकतें नहीं करता। यह गांध्ाी (सोनिया गांध्ाी का नहीं) का देश है जहां लंगोटी लगाकर बापू ने अंग्रेजों को जनशक्ति के बूते भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया था। संगीन आरोपों और साजिशों के ढेर पर बैठकर विदेशी ध्ान से स्वदेशी भावना की लड़ाई नहीं की जा सकती। वो तो भला हो उन चैनलों का जिन्होंने समाज के इन ‘‘कुकुरमुŸाों’’ को मुंह लगाकर अपने चैनलों का कीमती समय बर्बाद किया और जनता को भी गुमराह किया। पर भला हो इस देश की जनता जनार्दन का जो सच और साजिश में, भ्रम और यथार्थ में, भ्रांति और भांति में, अनशन- आंदोलन और प्रोपगंडा में अंतर समझती है। ‘‘खुल गई पोल और पिट गई ढोल!’’ खाल ओढ़कर शेर की भूमिका अदा करना और जमीन पर जंगल में रहते हुए अपना खौफ़ बनाए रखना, सामान्य बातें नहीं होतीं। ‘‘शेर की खाल में... निकला’’ खोदा पहाड़ निकली चुहिया। पर देश का कीमती समय, अमूल्य मानव संसाध्ान और देश को भावनात्मक ब्लैकमेल करने वाला भांडा बहुत शीघ्र फूट गया। यह व्यक्ति के लिये, राजनीति के लिये, राजनैतिक दलों के लिए कितना अच्छा हुआ, यह तो पता नहीं पर इतना अवश्य गर्व से कहा जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र के लिये, उसकी मर्यादा के लिये ‘‘केजरीवाल’’ की पोल खुलना अच्छा ही रहा।

30 अक्टूबर 1990 : शहीद कारसेवको शत-शत नमन


याद रहे कारसेवक शहीदों का बलिदान  

 
!! 30 अक्टूबर 1990 !!
कुंवर ऋतेश सिंह (विश्व हिन्दू परिषद्)
आज ही के दिन अयोध्या में मुल्ला-यम सरकार ने निहत्थे कारसेवकों पर गोलिया चलवाई थी जिसमे ६ कारसेवक शहीद हो गए थे.
आइये अब आप सब को
बताते है की उस दिन अयोध्या में हुआ क्या था ???
३० अक्टूबर १९९० को विश्व हिन्दू परिषद् ने गुम्बद नुमा ईमारत को हटाने के लिए कारसेवा की शुरुआत की.
आल इंडिया बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ,कांग्रेस पार्टी,मार्क्सवादी पार्टी और कुछ छद्म धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के द्वारा इस कारसेवा को समूचे विश्व में मस्जिद के लिए खतरा बताया गया.
जबकि ये सर्वविदित है की अयोध्या "राम लला" की जन्मस्थली है और उस जन्मस्थली को तोड़कर वह एक अवैध मस्जिद नुमा ईमारत का निर्माण किया गया था.
परन्तु मुस्लिम वोटो के लालच में तत्कालीन प्रधानमंत्री "विपी सिंह" और उस समय के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री "मुल्ला-यम सिंह" मस्जिद बचाने की दौड़ में शामिल हो गए.
लगभग ४० हजार CRPF के जवान और २ लाख ६५ हजार सुरक्षा बलों के भारी भरकम सुरक्षा के बावजूद लगभग १ लाख कारसेवक सुबह के ७ बजे अयोध्या पहुँच गए. कारसेवकों ने सरयू नदी के पुल पर चलना शुरू किया और तभी पुलिस वालो ने उन पर लाठी चार्ज शुरू कर दिया. बावजूद इसके कारसेवक तनिक भी ना डरे और नहीं भागे.
दिन के लगभग ११ बजे तक अयोध्या जैसे छोटे से शहर में कारसेवको की संख्या ३ लाख को पार कर गयी. पुलिस के जवानों ने कारसेवको पर हमला करने के बजाय उनका सम्मान सुरु कर दिया.
पुलिस महानिदेशक ने पुलिस के जवानों को कारसेवको पर हमला करने के लिए उकसाया और पुलिस ने कारसेवको के ऊपर अश्रु गैस के गोलों से हमला करना शुरू किया.
और तभी पुलिस महानिदेशक ने खुद निहत्थे साधुओं पर लाठी चार्ज शुरू कर दिया .
ये देख कर कारसेवक भड़क गए और वे सारे बैर केडिंग को तोड़कर जन्मस्थान तक पहुंचा गए और तभी पुलिस ने बिना किसी सुचना के उन पर गोली चलानी शुरू कर दिया. बावजूद इसके कारसेवक अपने लक्ष्य तक पहुँच चुके थे. और तब पुलिस ने उन पर सीधे गोलिया बरसानी सुरु कर दी.
इस गोलीबारी में कम से कम १०० कारसेवक शहीद हो गए और कई लापता हो गए. बाद में कई कारसेवकों की लाशे सरयू नदी में तैरती मिली. उनकी लाशों को बालू के बोरो से बांध दिया गया था ताकि वो तैर कर ऊपर ना आ सके.यजा तक की औरतो और साधुओं तक को नहीं छोड़ा गया.
"मुल्ला-यम" सिंह ने एक ऐसा घृणित कार्य किया जो उसे बाबर,औरंगजेब और गजनवी के समक्ष ला कर खड़ा कर दे.
हर हिन्दू अपनी अंतिम साँस तक मुल्ला-यम जैसे गद्दार को कभी नहीं माफ़ करेगा जिसने मुस्लिम वोटो के लिए अपने धर्म से गद्दारी की और निहत्थे कारसेवकों की हत्या की ..!!

!! उन शहीद कारसेवको शत-शत नमन !!
!! राम लला हम आएंगे मंदिर वही बनायेंगे !!
जय श्री राम

ख़म ठोक ठेलता हे जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड





श्री कृष्ण का दूत कार्य
(समय निकाल कर अवश्य पड़े )
हे कौन विघ्न ऐसा जग में,टिक सके आदमी के मग में |
ख़म ठोक ठेलता हे जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड ||१ ||
मानव जब जोर लगाता हे, पत्थर पानी बन जाता हे |
गुण बड़े एक से एक प्रखर ,हे छिपे मानव के भीतर ||२||
मेहंदी में जैसे लाली हो , वर्तिका बीच उजियारी हो |
बत्ती जो नहीं जलाता है रौशनी नहीं वो पता हे ||३||
पीसा जाता जब इक्षुदंड बहती रस की धरा अखंड |
मेहंदी जब सहती प्रहार बनती ललनाओ का श्रृंगार ||४||
जब फूल पिरोये जाते है हम उनको गले लगाते है |
कंकड़िया जिनकी सेज सुघर छाया देता केवल अम्बर ||५||
विपदाए दूध पिलाती है लोरी आंधिया सुनाती है |
जो लाक्षाग्रह में जलते है वही सूरमा निकलते है ||६||
वर्षो तक वन में घूम घूम , बाधा विघ्नों को चूम चूम |
सह धुप छाँव पानी पत्थर,पांडव आये कुछ और निखर ||७||
सोभाग्य न सब दिन सोता है, देखे आगे अब क्या होता है |
मैत्री की रह बताने को सबको सुमार्ग पर लाने को ||८||
दुर्योधन को समझाने को भीषण विध्वंश बचाने को |
भगवान हस्तिनापुर आये पांडवो का संदेशा लाये |
दो न्याय अगर तो आधा दो पर इसमे भी यदि बाधा हो |
दे दो हमको पांच ग्राम रखो अपनी भूमि तमाम |
हम वही ख़ुशी से खायेंगे परिजन पर असी न उठाएंगे |
दुर्योधन वह भी दे न सका आशीष समाज की ले न सका |
उलटे हरी को बाँधने चला जो था असाध्य साधने चला |
जब नाश मनुज पर छाता है पहले विवेक मर जाता |
हरी ने भीषण हुंकार किया अपना स्वरुप विस्तार किया |
डगमग डगमग दिग्गज बोले भगवान् कुपित होकर बोले |
जंजीर बड़ा आ बाँध मुझे हाँ हाँ दुर्योधन साध मुझे |
यह देख गगन मुझमे लय है ये देख पवन मुझमे लय है |
मुझमे विलीन संसार सकल मुझमे लय है झंकार सकल |
अमरत्व फूलता है मुंह में, संहार झूलता है मुझमे
उदयाचल मेरे दीप्त भाल ,भू–मंडल वक्ष–स्थल विशाल
भुज परिधि बाँध को घेरे है, मीनाक मेरु पग मेरे है
दीप्त जो ग्रह नक्षत्र निखर, सब है मेरे मुह के अन्दर
दृग हो तो दृश्य अखंड देख, मुझमे सारा ब्रह्माण्ड देख
चर –अचर जीव,जग क्षर अक्षर, नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर
शत कोटि सूर्य ,शत कोटि चन्द्र, शत कोटि सरित सर सिन्धु मन्द्र
शत कोटि ब्रह्मा विष्णु महेश, शत कोटि जलपति जिष्णु धनेश
शत कोटि रूद्र शत कोटि काल, शत कोटि दंड धर लोकपाल
जंजीर बड़ा कर साध इन्हें, हाँ हाँ दुर्योधन बाँध इन्हें
भूतल अतल पाताल देख, गत और अनागत काल देख
यह देख जगत का आदि सृजन, यह देख महाभारत का रण
मृतकों से पटी हुई भू है, पहचान कहा इसमें तू है ?
अम्बर का कुंतल जाल देख ,पद के निचे पातळ देख
मुट्ठी में तीनो काल देख, मेरा स्वरुप विकराल देख
सब जन्म मुझी से पाते है फिर लौट मुझी में जाते है |
जिह्वा से कोंधती ज्वाल सघन, साँसों से पाता जन्म पवन
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर, हंसने लगती है सृष्टि उधर
मै जब मोड़ता हूँ लोचन, छा जाता चारो ओर मरण
बाँधने मुझे तू आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है ?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तू बाँध अनंत गगन
शुन्य को साध न सकता है, वो मुझे बाँध कब सकता है ?
हितवचन नहीं तुने माना मैत्री का मूल्य नहीं पहचाना |
तो ले में भी अब जाता हूँ अंतिम संकल्प सुनाता हूँ |
याचना नहीं अप रण होगा भीषण विध्वंश प्रबल होगा |
टकरायेंगे नक्षत्र निखर बरसेगी भू पर व्ही प्रखर |
फन शेषनाग का डोलेगा विकराल काल मुह खोलेगा |
दुर्योधन रण ऐसा हो फिर कभी नहीं जैसा होगा |
भाई पर भाई टूटेंगे विष बाण बूँद से छूटेंगे |
सोभाग्य मनुज के फूटेंगे वायस श्रगाल सुख लूटेंगे |
आखिर तो भूशाई होगा हिंसा का परिचायी होगा |
थी सभा सन्न सब लोग डरे ,चुप थे या थे बेहोश पड़े |
केवल दो नर न अघाते थे भीष्म विदुर सुख पाते थे |
कर जोड़ खड़े प्रमुदित्त निर्भय, दोनों पुकारते थे जय जय || इति ||

रविवार, 28 अक्तूबर 2012

जाग्रत , आरोग्य और अमरत्व : शरद पूर्णिमा







Published on 28 Oct-2012 dainik Bhaskar

जाग्रत , आरोग्य और अमरत्व  : शरद पूर्णिमा
 - पं. विनोद रावल, उज्जैन
Dainik Bhaskar
http://epaper.bhaskar.com/Kota/16/28102012/0/1/
हिंदू पंचांग में १२ मास की १२ पूर्णिमा होती हैं। हर मास के समापन की तिथि को पूर्णिमा कहते हैं। इनमें शरद पूर्णिमा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जो आश्विन मास की अंतिम तिथि है। इसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं। ज्योतिष की मान्यता है शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी १६ कलाओं से पूर्ण होता है। इसीलिए इस रात को चांदनी अपने संपूर्ण विस्तार तथा चंद्रमा अपने सौंदर्य के चरम पर होता है। मान्यता है कि इस रात्रि को चांदनी के साथ अमृत वर्षा होती है। यही कारण है कि अमरत्व और आरोग्य के लिए सभी को हर वर्ष इस पूर्णिमा का इंतजार रहता है।

कोजागर पूर्णिमा
शरद पूर्णिमा का एक नाम कोजागर पूर्णिमा भी है। इसका आशय है को-जागर्ति यानी कौन जाग रहा है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी श्वेत वस्त्र धारण कर संसार में विचरण करती हैं। यह उपासना, साधना व जागरण की रात है। देवी हर व्यक्ति के द्वार पर जाती हैं और पूछती है को जागर्ति। अर्थात कौन जाग रहा है। जो जागता है उस पर देवी कृपा करती हैं, जो सोया रहता है उस के द्वार से लौट जाती हैं। इसका अर्थ है कि जो लोग रात्रि में भी अपनी चेतना को जाग्रत रखते हैं, लक्ष्मी उन्हें प्राप्त होती हैं। जो लोग सोए ही रहते हैं, लक्ष्मी उन्हें नसीब नहीं होती। इस अर्थ में शरद पूर्णिमा जीवनभर कर्म करने का संदेश देने वाला पर्व है। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि जब सारा संसार सोता है, रात्रि में योगी जागते हैं। इसका इतना ही आशय है कि जिन्हें कर्म करना है वे रात्रि में जागते हैं। आम लोगों की तरह सोते नहीं हैं क्योंकि दिन तो २४ घंटे का ही होता है। कर्म के लिए अधिक अवकाश रात्रि में ही संभव है। अत: रात्रि में कम देर सोकर अधिक कर्म करने का संदेश शरद पूर्णिमा देती है।

श्वेत लक्ष्मी, शुभ पूजन
लक्ष्मी के कई रूप माने गए हैं। शरद पूर्णिमा श्वेत वस्त्र धारिणी लक्ष्मी के पूजन का पर्व है। चंद्रमा श्वेत है। उसकी चांदनी भी श्वेत होती है। इस दिन अमृत बरसता है, जो कि श्वेत होता है। यही कारण है श्वेत लक्ष्मी पूजी जाती है। इसका प्रतीक भी यह है कि जो धन आए वह श्वेत हो। यानी काली कमाई न हो। उजली कमाई निष्ठा और समर्पण से कर्म करके मिलती है। इसके लिए जागना होता है। इन्हीं प्रतीकों के कारण शरद पूर्णिमा को श्वेत वस्त्र धारिणी लक्ष्मी के पूजन का विधान किया गया है।

ऐसे करें पूजन
श्वेत वस्त्र धारिणी लक्ष्मी का चित्र या प्रतिमा अपने पूजाघर में स्थापित कर श्वेत वस्तुओं से पूजन करें। इसके लिए सफेद फूल, नारियल, नारियल का पानी, दूध का प्रसाद आदि वस्तुएं प्रमुख रूप से प्रयोग की जाती हैं। यह भी मान्यता है कि इस दिन ऐरावत पर विराजित इंद्र की भी पूजा करना चाहिए। सुविधानुसार दीप प्रज्वलित कर पूजा करें और फिर एक-एक दीप घर के विभिन्न हिस्सों, तुलसी के पौधे और पूज्य वृक्षों के पास भी रखना चाहिए। इस दिन उपवास के साथ आराधना और रात्रि में जागरण करने का विधान है।

चंद्रमा की तिथि और आरोग्य
पूर्णिमा चंद्रमा की तिथि मानी गई है। चंद्रमा मन का प्रतीक है। यह भी समुद्र मंथन में निकले १४ रत्नों में से एक है। इस अर्थ में चंद्रमा अमृत का सहोदर (भाई) है और अमृत का दाता भी। शरद पूर्णिमा की रात्रि को परंपरागत मान्यता में बरसने वाला अमृत धरती पर बिखरी औषधियों में जीवन का संचार करता है। मन का प्रतीक होने से चंद्रमा की आराधना मन को नियंत्रित और संयमित करने के लिए महत्वपूर्ण मानी गई है। इन सारे संदर्भों में शरद पूर्णिमा जागरण, सौंदर्य, कर्म, आरोग्य और अमृत का जीवन संपन्न महापर्व है। 

शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

फर्जी कंपनिया चला रहे सोनिया-राहुल : सुब्रमण्यम स्वामी

यह आरोप है जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी के दम हो तो इन पर कांग्रेस मानहानी का दाबा  करके दिखाए।



http://in.jagran.yahoo.com/news
फर्जी कंपनिया चला रहे सोनिया-राहुल
Oct 27, 06:36 pm
अहमदाबाद [शत्रुघ्न शर्मा]। जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने काग्रेस और गाधी परिवार पर एक बार फिर हमला बोला है। स्वामी ने राहुल गांधी के स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख के पिक्टेट बैंक में खाता होने का सनसनीखेज खुलासा करने के साथ ही आरोप लगाया है कि गांधी खानदान ने विभिन्न देशों में दर्जनों फर्जी कंपनियों बनाई। अरबों का धन बटोरा फिर कंपनी बंद कर दी। कांग्रेस के धन से दिल्ली का हेराल्ड हाउस कौड़ियों के भाव खरीदा जिसकी बाजार कीमत 6 हजार करोड़ से अधिक है। सोनिया और राहुल आरोपों का जवाब देने की खुली चुनौती देते हुए स्वामी ने कहा, मां-बेटे अपने पदों से इस्तीफा दें। ऐसा न किया तो अदालत का दरवाजा खटखटाउंगा।

इस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट द्वारा भ्रष्टाचार विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करने अहमदाबाद आए सुब्रमण्यम स्वामी ने शनिवार को पत्रकार वार्ता में कहा, सोनिया,राहुल और प्रियंका के नाम पर 27 कंपनिया है। गांधी खानदान ने अरबों के घपले के बाद इन कंपनियों को बंद कर दिया। बेकऑप्स और एसोसिएट्स जर्नल का उदाहरण देते हुए कहा, बेकऑप्स का पता लोधी रोड़ स्थित प्रियंका-रॉबर्ट वाड्रा के सरकारी बंगले का दिया गया है जो कंपनी कानून का उल्लंघन है। यह सब भ्रष्टाचार सोनिया के प्रश्रय से हो रहा है। मुझे तो सोनिया की देशभक्ति पर भी शक है,उनकी कंपनियों में कई विदेशी व संदेहास्पद लोग भी सदस्य है जो हवाला व कालेधन की देखरेख करने वाले हो सकते है।

स्वामी ने कहा, गाधी परिवार ने काग्रेस के 90 करोड़ रुपए यंग इडियन नामक संस्था में लगाए और फिर इन्हीं रुपयों से दिल्ली का हेराल्ड हाउस खरीदा जहा से आजादी के पहले से हेराल्ड और कौमी आवाज नाम अखबार निकला करते थे। नेहरु जी द्वारा स्थापित इस एतिहासिक भवन का इस्तेमाल अब काग्रेस कार्यालय के रूप में होने लगा है।

स्वामी ने घोटालों के आरोपों में घिरे भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को पाक साफ बताते हुए कहा,घोटालों के आधार पर उन्हें अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं देना चाहिए,वह कोई सरकार या मंत्री पद पर नहीं है जो जाच को प्रभावित कर सकते है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बेदाग बताते हुए कहा, वह मोदी के साथ हैं और एक साल से उनका प्रचार कर रहे है। भाजपा को 182 में से 140 सीटें प्राप्त होंगी। पार्टी को विस की सभी सीटें जीत कर कांग्रेस को पाठ पढ़ाना चाहिए। गुजरात में जनता पार्टी के प्रत्याशी उतारने के बारे में पूछे जाने पर कहा,मोदी से 4 टिकट मांगे हैं,यदि टिकट नहीं मिले तो भी वह भाजपा के खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारेगे। राजग के पीएम इन वेटिंग के बारे में कहा, इस पद के लिए कई उम्मीदवार है। नीतीश और मोदी वर्षो पुराने साथी है। इसलिए किसी एक का पक्ष नहीं ले सकता।

11 days are simply missing from the month:Interesting History of September 1752

Interesting History of September 1752
Hi everyone.
Here are two interesting historical facts that you probably didn't know, (I sure didn't).
Just have a look at the calendar for the month of September 1752 >>>
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(If you think I'm joking, you may search it on Google and see it for yourself.)

In case you haven't noticed, 11 days are simply missing from the month. Here's the explanation:
This was the month during which England shifted from the Roman Julian Calendar to the Gregorian Calendar. A Julian year was 11 days longer than a Gregorian year. So the King of England ordered 11 days to be wiped off the face of that particular month. (A King could order anything, couldn't he?) So the workers worked for 11 days less that month, but got paid for the whole month. That's how the concept of "paid leave" was born. Hail the King!!!
In the Roman Julian Calendar, April used to be the first month of the year; but the Gregorian Calendar observed January as the first month. Even after shifting to the Gregorian Calendar, many people refused to give up old traditions and continued celebrating 1st April as the New Year's Day. When simple orders didn't work, the King finally issued a royal dictum; which stated that those who celebrated 1st April as the new year's day would be labled as fools. From then on, 1st April became April Fool's Day.
History is really interesting, isn't it?

शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2012

‘हिंदू समाज के लिए बोलनेवाला नेतृत्व इस देश में है कि नहीं?’– सरसंघचालक







प. पू. सरसंघचालक डॉ. श्री मोहनराव भागवत के श्री विजयादशमी उत्सव 2012 

(बुधवार दिनांक 24 अक्तुबर 2012) के अवसर पर दिये गये उद्बोधन का सारांश-
‘हिंदू समाज के लिए बोलनेवाला नेतृत्व इस देश में है कि नहीं?’ – सरसंघचालक
आज के दिन हमें स्व. सुदर्शन जी जैसे मार्गदर्शकों का बहुत स्मरण हो रहा है। विजययात्रा में बिछुड़े हुये वीरों की स्मृतियॉं आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
विजयादशमी विजय का पर्व है। संपूर्ण देश में इस पर्व को दानवता पर मानवता की, दुष्टता पर सज्जनता की विजय के रूप में मनाया जाता है। विजय का संकल्प लेकर, स्वयं के ही मन से निर्मित दुर्बल कल्पनाओं ने खींची हुई अपनी क्षमता व पुरुषार्थ की सीमाओं को लांघ कर पराक्रम का प्रारंभ करने के लिये यह दिन उपयुक्त माना जाता है। अपने देश के जनमानस को इस सीमोल्लंघन की आवश्यकता है, क्योंकि आज की दुविधा व जटिलतायुक्त परिस्थिति में से देश का उबरना देश की लोकशक्ति के बहुमुखी सामूहिक उद्यम से ही अवश्य संभव है।
भारत की सिद्ध गुणवत्ता 
यह करने की हमारी क्षमता है इस बात को हम सबने स्वतंत्रता के बाद के 65 वर्षों में भी कई बार सिद्ध कर दिखाया है। विज्ञान, व्यापार, कला, क्रीड़ा आदि मनुष्य जीवन के सभी पहलुओं में, देश-विदेशों की स्पर्धा के वातावरण में, भारत की गुणवत्ता को सिद्ध करनेवाले वर्तमान कालीन उदाहरणों का होना अब एक सहज बात है। ऐसा होने पर भी सद्य परिस्थिति के कारण संपूर्ण देश में जनमानस भविष्य को लेकर आशंकित, चिन्तित व कहीं-कहीं निराश भी है। पिछले वर्षभर की घटनाओं ने तो उन चिन्ताओं को और गहरा कर दिया है। देश की अंतर्गत व सीमान्त सुरक्षा का परिदृश्य पूर्णत: आश्‍वस्त करनेवाला नहीं है। हमारे सैन्य-बलों को अपनी भूमि की सुरक्षा के लिये आवश्यक अद्ययावत शस्त्र, अस्त्र, तंत्र व साधनों की आपूर्ति, उनके सीमास्थित मोर्चों तक साधन व अन्य रसद पहुँचाने के लिये उचित रास्ते, वाहन, संदेश वाहन आदि का जाल आदि सभी बातों की कमियों को शीघ्रातिशीघ्र दूर करने की तत्परता उन प्रयासों में दिखनी चाहिए। इसके विपरीत, सैन्यबलों के मनोबल पर आघात हो इस प्रकार, सेना अधिकारियों का कार्यकाल आदि छोटी तांत्रिक बातों को बिनाकारण तूल देकर नीतियों व माध्यमो द्वारा अनिष्ट चर्चा का विषय बनाया गया हुआ हमने देखा है। सुरक्षा से संबंधित सभी वस्तुओं के उत्पादन में स्वावलंबी बनने की दिशा अपनी नीति में होनी चाहिए। सुरक्षा सूचना तंत्र में अभी भी तत्परता, क्षमता व समन्वय के अभाव को दूर कर उसको मजबूत करने की आवश्यकता ध्यान में आती है।
सीमा सुरक्षा और सामरिक प्रबंधन
हमारी भूमिसीमा एवं सीमा अर्न्तगत द्वीपों सहित सीमा क्षेत्र का प्रबन्धन पक्का करने व रखने की पहली आवश्यकता है। देश की सीमाओं की सुरक्षा, उनके सामरिक प्रबंध व रक्षण व्यवस्था के साथ-साथ, सुरक्षा की दृष्टि से अपने अंतरराष्ट्रीय राजनय के प्रयोग-विनियोग पर भी आजकल निर्भर होती है। उस दृष्टि से कुछ वर्ष पूर्व से एक बहुप्रतीक्षित नयी व सही दिशा की घोषणा  "Look East Policy" नामक वाक्यप्रयोग से शासन के उच्चाधिकारियों से हुयी थी। दक्षिण पूर्व एशिया के सभी देशों में इस सत्य की जानकारी व मान्यता है कि भारत तथा उनके राष्ट्रजीवन के बुनियादी मूल्य समान है, निकट इतिहास के काल तक व कुछ अभी भी सांस्कृतिक तथा व्यापारिक दृष्टि से उनसे हमारा आदान-प्रदान का घनिष्ट संबंध रहा है। इस दृष्टि से यह ठीक ही हुआ कि हमने इन सभी देशों से अपने सहयोगी व मित्रतापूर्ण संबंधों को फिर से दृढ़ बनाने का सुनिश्‍चय किया। वहां के लोग भी यह चाहते हैं। परन्तु घोषणा कितनी व किस गति से कृति में आ रही है इसका हिसाब वहां और यहां भी आशादायक चित्र नहीं पैदा करता। इस क्षेत्र में हमसे पहले हमारा स्पर्धक बनकर चीन दल-बल सहित उतरा है यह बात ध्यान में लेते है तो यह गतिहीनता चिन्ता को और गंभीर बनाती है। अपनी आण्विक तकनीकी पाकिस्तान को देने तक उसने पाकिस्तान से दोस्ती बना ली है यह हम अब जानते हैं ही। नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका ऐसे निकटवर्ती देशों में भी चीन का इस दृष्टि से हमारे आगे जाना सुरक्षा की दृष्टि से हमारे लिये क्या अर्थ रखता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। इन सभी क्षेत्रों में भारतीय मूल के लोग भी बड़ी मात्रा में बसते हैं, उन के हितों की रक्षा करते हुये इन हमारे परम्परागत स्वाभाविक मित्र देशों को साथ में रखने की व उन के साथ रहने की दृष्टि हमारे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी होनी चाहिये।
घुसपैठ के कारण जनसंख्या असंतुलन
परन्तु राष्ट्र का हित हमारी नीति का लक्ष्य है कि नहीं यह प्रश्‍न मन में उत्पन्न हो ऐसी घटनाएँ पिछले कुछ वर्षों में हमारे अपने शासन-प्रशासन के समर्थन से घटती हुई सम्पूर्ण जनमानस के घोर चिन्ता का कारण बनी है। जम्मू-कश्मीर की समस्या के बारे में पिछले दस वर्षों से चली नीति के कारण वहां उग्रवादी गतिविधियों के पुनरोदय के चिन्ह दिखायी दे रहे हैं। पाकिस्तान के अवैध कैंजे से कश्मीर घाटी के भूभाग को मुक्त करना; जम्मू, लेह-लद्दाख व घाटी के प्रशासन व विकास के भेदभाव को समाप्त करते हुये शेष भारत के साथ उस राज्य के सात्मीकरण की प्रक्रिया को गति से पूर्ण करना; घाटी से विस्थापित हिंदू पुनश्‍च ससम्मान सुरक्षित अपनी भूमि पर बसने की स्थिति उत्पन्न करना; विभाजन के समय भारत में आये विस्थापितों को राज्य में नागरिक अधिकार प्राप्त होना आदि न्याय्य जनाकांक्षा के विपरित वहां की स्थिति को अधिक जटिल बनाने का ही कार्य चल रहा है। राज्य व केन्द्र के शासनारूढ़ दलों के सत्ता स्वार्थ के कारण राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करना व विदेशी दबावों में झुकने का क्रम पूर्ववत चल रहा है। इतिहास के क्रम में राष्ट्रीय वृत्ति की हिन्दू जनसंख्या क्रमश: घटने के कारण देश के उत्तर भूभाग में उत्पन्न हुयी व बढ़ती गयी इस समस्यापूर्ण स्थिति से हमने कोई पाठ नहीं पढ़ा है ऐसा देश के पूर्व दिशा के भूभाग की स्थिति देखकर लगता है।असम व बंगाल की सच्छिद्र सीमा से होनेवाली घुसपैठ व शस्त्रास्त्र, नशीले पदार्थ, बनावटी पैसा आदि की तस्करी के बारे में हम बहुत वर्षों से चेतावनियॉं दे रहे थे। देश की गुप्तचर संस्थाएँ, उच्च व सर्वोच्च न्यायालय, राज्यों के राज्यपालों तक ने समय-समय पर खतरे की घंटियॉं बजायी थीं। न्यायालयों से शासन के लिये आदेश भी दिये गये थे। परंतु उन सबकी अनदेखी करते हुये सत्ता के लिये लांगूलचालन की नीति चली, स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टि के अभाव में गलत निर्णय हुये व ईशान्य भारत में संकट का विकराल रूप खड़ा हुआ सबके सामने है। घुसपैठ के कारण वहॉं पैदा हुआ जनसंख्या असंतुलन वहॉं के राष्ट्रीय जनसंख्या को अल्पमत में लाकर संपूर्ण देश में अपने हाथ पैर फैला रहा है। व्यापक मतांतरण के साये में वहां पर फैले अलगाववादी उग्रवाद की विषवेल को दब्बू नीतियॉं बार-बार संजीवनी प्रदान करती है। उत्तर सीमापर आ धड़की चीन की विस्तारवादी नीति का हस्तक्षेप भी होने की भनक वहॉं पर लगी है। विश्‍व की “अल कायदा” जैसी कट्टरपंथी ताकतें भी उस परिस्थिति का लाभ लेकर वहॉं चंचुप्रवेश करना चाह रही है। ऐसी स्थिति में अपने सशस्त्र बलों की समर्थ उपस्थिति व परिस्थिति की प्रतिकार में उभरा जनता का दृढ़ मनोबल ही राष्ट्र की भूमि व जन की सुरक्षा के आधार के रूप में बचे हैं। समय रहते हम नीतियों में अविलम्ब सुधार करें। ईशान्य भारत में तथा भारत के अन्य राज्यों में भी घुसपैठियों की पहचान त्वरित करते हुये तथा मतदाता सुची सहित (राशन पत्र, पहचान पत्र आदि) अन्य प्रपत्रों से इन अवैध नागरिकों के नाम बाहर कर देने चाहिये व विदेशी घुसपैठियों को भारत के बाहर भेजने के प्रबंध करने चाहिये। विदेशी घुसपैठियों के पहचान के काम में किसी प्रकार का गड़बड़झाला न हो यह दक्षता बरती जानी चाहिये। सीमाओं की सुरक्षा के तारबंदी आदि के दृढ़ प्रबंध व रक्षण व्यवस्था में अधिक सजगता से चौकसी बरतने के उपाय अविलम्ब किये जाने चाहिये। राष्ट्रीय नागरिक पंजी (National Register of Citizens) को न्यायालयों द्वारा स्पष्ट रूप से निर्देशित, जन्मस्थल, माता-पिता के स्थान अथवा मातामहों-पितामहों के स्थानों के पुख्ता प्रमाणों के आधार पर तैयार करना चाहिए। ईशान्य भारत के क्षेत्र में व अन्यत्र भी यह पूर्व का अनुभव है कि जनमत के व न्यायालय के आदेशों के दबाव में विदेशी नागरिकों अथवा संशयास्पद मतदाताओं (D voters) की  पहचान करने का दिखावा जब-जब प्रशासन या शासन करने गया तब-तब बंगलादेशी घुसपैठियों को तो उसने छोड़ दिया व वहॉं से पीड़ित कर निकाले गये व अब भारत में अनेक वर्षों से बसाये गये निरुपद्रवी व निरीह हिन्दुओं पर ही उनकी गाज गिरी।
आश्रयार्थी हिन्दू को विदेशी नहीं
हम सभी को यह स्पष्ट रूप से समझना व स्वीकार करना चाहिए कि विश्‍वभर के हिन्दू समाज के लिये पितृ-भू व पुण्य-भू के रूप में केवल भारत-जो परम्परा से हिन्दुस्थान होने से ही भारत कहलाता है, हिन्दू अल्पसंख्यक अथवा निष्प्रभावी होने से जिसके भू-भागों का नाम तक बदल जाता है- ही है। पीड़ित होकर गृहभूमि से निकाले जाने पर आश्रय के रूप में उसको दूसरा देश नहीं है। अतएव कहीं से भी आश्रयार्थी होकर आनेवाले हिन्दू को विदेशी नहीं मानना चाहिये। सिंध से भारत में हाल में ही आये आश्रयार्थी हो अथवा बंगलादेश से आकर बसे हों, अत्याचारों के कारण भारत में अनिच्छापूर्वक धकेले गये विस्थापित हिन्दुओं को हिन्दुस्थान भारत में सस्नेह व ससम्मान आश्रय मिलना ही चाहिये। भारतीय शासन का यह कर्तव्य बनता है वह विश्‍वभर के हिन्दुओं के हितों का रक्षण करने में अपनी अपेक्षित भूमिका का तत्परता व दृढ़ता से निर्वाह करें।
इस सारे घटनाक्रम का एक और गंभीर पहलू है कि विदेशी घुसपैठियों की इस अवैध कारवाई को केवल वे अपने संप्रदाय के है इसलिये कहीं पर कुछ तत्त्वों ने उनके समर्थन का वातावरण बनाने का प्रयास किया। शिक्षा अथवा कमाई के लिये भारत में अन्यत्र बसे ईशान्य भारत के लोगों को धमकाया गया। मुंबई के आजाद मैदान की घटना प्रसिद्ध है। म्यांमार के शासन द्वारा वहां के रोहिंगियाओं पर हुयी कार्यवाही का निषेध भारत में जवान ज्योति का अपमान करने में गर्व महसूस करनेवाली भारत विरोधी ताकतों को अंदर से समर्थन देनेवाले तत्त्व अभी भी देश में विद्यमान है यह संदेश साफ है।
यह चिन्ता, क्षोभ व ग्लानी का विषय है कि देश हित के विपरित नीति का प्रशासन द्वारा प्रदर्शन हुआ व राष्ट्र विरोधी पंचमस्तम्भियों के बढ़े हुये साहस के परिणाम स्वरूप उन तत्त्वों द्वारा कानून व शासन का उद्दंड अपमान हुआ। सब सामर्थ्य होने के बाद भी तंत्र को पंगु बनाकर देश विरोधी तत्त्वों को खुला खेल खेलने देने की नीति चलाने वाले लोग दुर्भाग्य से स्वतंत्र देश के अपने ही लोग हैं।
हिन्दू समाज का तेजोभंग व बल हानि
समाज में राष्ट्रीय मनोवृति को बढ़ावा देना तो दूर हमारे अपने हिन्दुस्थान में ही मतों के स्वार्थ से, कट्टरता व अलगाव से अथवा विद्वेषी मनोवृत्ति के कारण पिछले दस वर्षों में हिन्दू समाज का तेजोभंग व बल हानि करने के नीतिगत कुप्रयास व छल-कपट बढ़ते हुये दिखाई दे रहे हैं। हमारे परमश्रद्धेय आचार्यों पर मनगढंत आरोप लगाकर उनकी अप्रतिष्ठा के ओछे प्रयास हुये। वनवासियों की सेवा करने वाले स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की षडयन्त्रपूर्वक हत्या की गयी, वास्तविक अपराधी अभी तक पकड़े नहीं गये। हिन्दू मन्दिरों की अधिग्रहीत संपत्ति का अपहार व अप-प्रयोग धड़ल्ले से चल रहा है, संशय व आरोपों का वातावरण, निर्माण किया गया, हिंदू संतों द्वारा निर्मित न्यासों व तिरुअनन्तपुरम् के पद्मनाभ स्वामी मंदिर जैसे मंदिरों की संपत्ति के बारे में हिन्दू समाज की मान्यताओं, श्रेष्ठ परंपरा व संस्कारों को कलुषित अथवा नष्ट करनेवाला वातावरण निर्माण करनेवाले विषय जानबूझकर समाज में उछाले गये। बहुसंख्य व उदारमनस्क होते हुये भी हिन्दुसमाज की अकारण बदनामी कर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले कानून लाने का प्रयास तो अभी भी चल रहा है। प्रजातंत्र, पंथनिरपेक्षता व संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का दावा करने वाले ही मतों के लालच में तथाकथित अल्पसंख्यकों का राष्ट्र की संपत्ति पर पहला हक बताकर साम्प्रदायिक आधार पर आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं। लव जिहाद व मतांतरण जैसी गतिविधियों द्वारा हिन्दू समाज पर प्रच्छन्न आक्रमण करनेवाली प्रवृत्तियों से ही राजनीतिक साठगांठ की जाती है। फलस्वरूप इस देश के परम्परागत रहिवासी बहुसंख्यक राष्ट्रीयमूल्यक स्वभाव व आचरण का निधान बनकर रहने वाले हिन्दू समाज के मन में यह प्रश्‍न उठ रहा है कि ‘हमारे लिए बोलनेवाला व हमारा प्रतिनिधित्व करनेवाला नेतृत्व इस देश में अस्तित्व में है कि नहीं?’। हिन्दुत्व व हिन्दुस्थान को मिटाना चाहनेवाली दुनिया की एकाधिकारवादी, जड़वादी व कट्टरपंथी ताकतों तथा हमारे राज्यों के व केन्द्र के शासन में घुसी मतलोलुप अवसरवादी प्रवृत्तियों के गठबंधन के षडयंत्र के द्वारा और एक सौहार्दविरोधी कार्य करने का प्रयास हो रहा है। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर परिसर के निकट विस्तृत जमीन अधिग्रहीत कर वहां पर मुसलमानों के लिये कोई बड़ा निर्माण करने के प्रयास चल रहे हैं  ऐसे समाचार प्राप्त हो रहे हैं।
राममंदिर निर्माण
जब अयोध्या में राममंदिर निर्माण का प्रकरण न्यायालय में है तब ऐसी हरकतों के द्वारा समाज की भावनाओं से खिलवाड़ सांप्रदायिक सौहार्द का नुकसान ही करेगी। 30 सितंबर 2010 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को ध्यान में लेते हुए वास्तव में हमारी संसद के द्वारा शीघ्रातिशीघ्र भव्य मंदिर के निर्माण की अनुमति रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण न्यास को देनेवाला कानून बने व अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा के बाहर ही मुसलमानों के लिये किसी स्थान के निर्माण की अनुमति हो यही इस विवाद में घुसी राजनीति को बाहर कर विवाद को सदा के लिये संतोष व सौहार्दजनक ढंग से सुलझाने का एकमात्र उपाय है।
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
 परंतु देश की राजनीति में आज जो वातावरण है वह उसके देशहितपरक, समाजसौहार्दपरक होने की छवि उत्पन्न नहीं करता। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के माध्यम से बड़ी विदेशी कंपनियों का खुदरा व्यापार में आना विश्‍व में कहीं पर भी अच्छे अनुभव नहीं दे रहा है। ऐसे में खुदरा व्यापार तथा बीमा व पेंशन के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाना हमें लाभ पहुँचाने के बजाय अंततोगत्वा छोटे व्यापारियों के लिये बेरोजगारी, किसानों के लिये अपने उत्पादों का कम मूल्य मिलने की मजबूरी तथा ग्राहकों के लिये अधिक मंहगाई ही पैदा करेगा। साथ ही अपनी खाद्यान्न सुरक्षा के लिये भी खतरा बढ़ेगा। देश की प्राकृतिक संपदा की अवैध लूट तथा विकास के नामपर जैव विविधता व पर्यावरण के साथ ही उनपर निर्भर लोगों को बेरोजगारी से लेकर तो विस्थापन तक समस्याओं के भेट चढ़ाना अनिर्बाध रूप से चल ही रहा है। देश के एक छोटे वर्गमात्र की उन्नति को जनता की आर्थिक प्रगति का नाम देकर हम जिस तेज विकास दर की डींग हांकते थे वह भी आज 9 प्रतिशत से 5 प्रतिशत तक नीचे आ गया है। संपूर्ण देश नित्य बढ़ती महंगाई से त्रस्त है। अमीर और गरीब के बीच लगातार बढ़ते जा रहे अन्तर में विषमता की समस्या को और अधिक भयावह बना दिया है। न जाने किस भय से हड़बड़ी में इतने सारे अधपके कानून बिना सोच-विचार-चर्चा के लाये जा रहे हैं। इन तथाकथित “सुधारों” के बजाय में जहॉं वास्तविक सुधारों की आवश्यकता है उन क्षेत्रों में-चुनाव प्रणाली, करप्रणाली, आर्थिक निगरानी की व्यवस्था, शिक्षा नीति, सूचना अधिकार कानून के नियम- सुधार की मॉंगों की अनदेखी व दमन भी हो रहा है।
अधूरे चिन्तन के आधार पर विश्‍व में आज प्रचलित विकास की पद्धति व दिशा ही ऐसी है कि उससे यही परिणाम सर्वत्र मिलते हैं। ऊपर से अब यह पद्धति धनपति बहुराष्ट्रीय प्रतिष्ठानों के खेलों से उन्हीं के लिये अनुकूल बनाकर चलायी जाती है। हम जब तक अपनी समग्र व एकात्म दृष्टि के दृढ़ आधार पर जीवन के सब आयामों के लिये, अपनी क्षमता, आवश्यकता व संसाधनों के अनुरूप व्यवस्थाओं के नये कालसुसंगत प्रतिमान विकसित नहीं करेंगे तबतक न भारत को सभी को फलदायी होनेवाला संतुलित विकास व प्रगति उपलब्ध होगी न अधूरे विसंवादी जीवन से दुनिया को मुक्ति मिलेगी।
राष्ट्रीय व व्यक्तिगत शील
चिन्तन के अधूरेपन के परिणामों को अपने देश में राष्ट्रीय व व्यक्तिगत शील के अभाव ने बहुत पीड़ादायक व गहरा बना दिया है। मन को सुन्न करनेवाले भ्रष्टाचार-प्रकरणों के उद्घाटनों का तांता अभी भी थम नहीं रहा है। भ्रष्टाचारियों को सजा दिलवाने के, कालाधन वापस देश में लाने के, भ्रष्टाचार को रोकनेवाली नयी कड़ी व्यवस्था बनाने के लिये छोटे-बड़े आंदोलनों का प्रादुर्भाव भी हुआ है। संघ के अनेक स्वयंसेवक भी इन आंदोलनों में सहभागी हैं। परन्तु भ्रष्टाचार का उद्गम शील के अभाव में है यह समझकर संघ अपने चरित्रनिर्माण के कार्य पर ही केन्द्रित रहेगा। लोगों में निराशा व व्यवस्था के प्रति अश्रद्धा न आने देते हुये व्यवस्था परिवर्तन की बात कहनी पड़ेगी अन्यथा मध्यपूर्व के देशों में अराजकता सदृश स्थिति उत्पन्न कर जैसे कट्टरपंथी व विदेशी ताकतों ने अपना उल्लू सीधा कर लिया वैसे होने की संभावना नकारी नहीं जा सकती। अराजनैतिक सामाजिक दबाव का व्यापक व दृढ़ परन्तु व्यवस्थित स्वरूप ही भ्रष्टाचार उन्मूलन का उपाय बनेगा। उसके फलीभूत होने के लिये हमें व्यापक तौर पर शिक्षाप्रणाली, प्रशासनपद्धति तथा चुनावतंत्र के सुधार की बात आगे बढ़ानी होगी। तथा व्यापक सामाजिक चिन्तन-मंथन के द्वारा हमारी व्यवस्थाओं के मूलगामी व दूरगामी परिवर्तन की बात सोचनी पड़ेगी। अधूरी क्षतिकारक व्यवस्था के पीछे केवल वह प्रचलित है इसलिये आँख मूंद कर जाने के परिणाम समाज जीवन में ध्यान में आ रहे है। बढ़ता हुआ जातिगत अभिनिवेश व विद्वेष, पिछड़े एवं वंचित वर्ग के शोषण व उत्पीड़न की समस्या, नैतिक मूल्यों के ह्रास के कारण शिक्षित वर्ग सहित सामान्य समाज में बढती हुई महिला उत्पीडन, बलात्कार, कन्या भू्रणहत्या, स्वच्छन्द यौनाचार ,हत्याएँ व आत्महत्याएँ , परिवारों का विघटन, व्यसनाधीनता की बढती प्रवृत्ति, अकेलापन के परिणाम स्वरूप तनावग्रस्त जीवन आदि हमारे देश में न दिखी अथवा अत्यल्प प्रमाण वाली घटनाएँ अब बढ़ते प्रमाण में ग्गोचर हो रही है। हमें अपने शाश्‍वत मूल्यों के आधार पर समाज के नवरचना की काल सुसंगत व्यवस्था भी सोचनी पड़ेगी।
अतएव सारा उत्तरदायित्व राजनीति, शासन, प्रशासन पर डालकर हम सब दोषमुक्त भी नहीं हो सकते। अपने घरों से लेकर सामाजिक वातावरण तक क्या हम स्वच्छता, व्यवस्थितता, अनुशासन, व्यवहार की भद्रता व शुचिता, संवेदनशीलता आदि सुदृढ़ राष्ट्रजीवन की अनिवार्य व्यवहारिक बातों का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं? सब परिवर्तनों का प्रारम्भ हमारे अपने जीवन के दृष्टिकोण व आचरण के प्रारंभ से होता है यह भूल जाने से, मात्र आंदोलनों से काम बननेवाला नहीं है।
सामाजिक पाप
 स्व. महात्मा गांधी जी ने 1922 के Young India के एक अंक में सात सामाजिक पापों का उल्लेख किया था। वे थे।
तत्त्वहीन राजनीति (Politics without Principles),
श्रमविना संपत्ति (Wealth without Work),
विवेकहीन उपभोग (Pleasure without Conscience),
शक्तिविना ज्ञान (Knowledge without Character),   
नीतिहीन व्यापार (Commerce without Morality), 
मानवता विना विज्ञान (Science Without Humanity)  और
समर्पणरहित पूजा (Worship without Sacrifice).  
आज के अपने देश के सामाजिक राजनीतिक परिदृश्य का ही यह वर्णन लगता है। ऐसी परिस्थिति में समाज की सज्जनशक्ति को ही समाज में तथा समाज को साथ लेकर उद्यम करना पड़ता है। इस चुनौति को हमें स्वीकार कर आगे बढ़ना ही पड़ेगा। भारतीय नवोत्थान के जिन उद्गाताओं से प्रेरणा लेकर स्व. महात्मा जी जैसे गरिमावान लोग काम कर रहे थे उनमें एक स्वामी विवेकानन्द थे। उनके सार्ध जन्मशती के कार्यक्रम आनेवाले दिनों में प्रारंभ होने जा रहे हैं। उनके संदेश को हमें चरितार्थ करना होगा। निर्भय होकर, स्वगौरव व आत्मविश्‍वास के साथ, विशुद्ध शील की साधना करनी होगी। कठोर निष्काम परिश्रम से जनों में जनार्दन का दर्शन करते हुए नि:स्वार्थ सेवा का कठोर परिश्रम करना पड़ेगा धर्मप्राण भारत को जगाना होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य इन सब गुणों से युक्त व्यक्तियों के निर्माण का कार्य है। यह कार्य समय की अनिवार्य आवश्यकता है। आप सभी का प्रत्यक्ष सहभाग इसमें होना ही पड़ेगा। निरंतर साधना व कठोर परिश्रम से समाज अभिमंत्रित होकर संगठित उद्यम के लिये खड़ा होगा तब सब बाधाओं को चीरकर सागर की ओर बढ़नेवाली गंगा के समान राष्ट्र का भाग्यसूर्य भी उदयाचल से शिखर की ओर कूच करना प्रारम्भ करेगा। अतएव स्वामीजी के शब्दों में “उठो जागो व तबतक बिना रूके परिश्रम करते रहो जबतक तुम अपने लक्ष्य को नहीं पा लोगे।”
उत्तिष्ठत! जाग्रत!! प्राप्यवरान्निबोधत!!!
- भारत माता की जय -

नैमिषारण्‍य पवित्र् तीर्थस्थल





***नैमिषारण्‍य पवित्र् तीर्थस्थल***
नैमिषारण्य, उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में गोमती नदी का तटवर्ती एक प्राचीन तीर्थस्थल है।
नैमि षारण्‍य में प्रवाहित होने वाली गोमती का नाम ऋग्‍वेद एवं ब्राम्‍हण- ग्रन्‍थों में मिलता हैं, महाभारत ग्रंथ
में गोमती को सबसे पवित्र् नदी बताया गया है, स्‍कन्‍द पुराण के ब्रम्‍हाखण्‍डार्न्‍तगत धर्मारण्‍य महात्‍म के प्रंसग में गंगा आदि नदियों के साथ गोमती को पावन माना गया है, सभी पुराणों में गोमती की महिमा का बखान है, यह वैदिक कालीन नदियों में है, नैमि षारण्‍य गोमती के पावन तट पर विद्वमान है|
        नैमिषारण्य का प्रायः प्राचीनतम उल्लेख वाल्मीकि रामायण के युद्ध-काण्ड की पुष्पिका में प्राप्त होता है । पुष्पिका में उल्लेख है कि लव और कुश ने गोमती नदी के किनारे राम के अश्वमेध यज्ञ में सात दिनों में वाल्मीकि रचित काव्य का गायन किया ।
महर्षि शौनक के मन में दीर्घकाल तक ज्ञान सत्र करने की इच्छा थी। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें एक चक्र दिया और कहा- `इसे चलाते हुए चले जाओ। जहां इस चक्र की `नेमि' (बाहरी परिधि) गिर जाय, उसी स्थल को पवित्र समझकर वहीं आश्रम बनाकर ज्ञान सत्र करो।' शौनकजी के साथ अदृसी सहस्र ऋषि थे। वे सब लोग उस चक्र को चलाते हुए भारत में घूमने लगे। गोमती नदी के किनारे एक तपोवन में चक्र की नेमि गिर गयी और वही वह चक्र भूमि में प्रवेश कर गया। चक्र की नेमि गिरने से वह तीर्थ `नैमिश' कहा गया। जहां चक्र भूमि में प्रवेश कर गया, वह स्थान चक्रतीर्थ कहा जाता है। यह तीर्थ गोमती नदी के वाम तट पर है और ५१ पितृस्थानों में से एक स्थान माना जाता है। यहां सोमवती अमावस्या को मेला लगता है।
शौनकजी को इसी तीर्थ में सूतजी ने अठारहों पुराणों की कथा सुनायी। द्वापर में श्रीबलरामजी यहां पधारे थे। भूल से उनके द्वारा रोमहर्षण सूत की मृत्यु हो गयी। बलराम जी ने उनके पुत्र उग्रश्रवा को वरदान दिया कि वे पुराणों के वक्ता हों। और ऋषियों को सतानेवाले राक्षस बल्वल का वध किया। संपूर्ण भारत की तीर्थयात्रा करके बलराम जी फिर नैमिषारण्य आये और यहां उन्होंने यज्ञ किया।

स्वामी विवेकानंन्द सार्धशति समारोह,कोटा,राजस्थान









और अधिक जानकारी के लिए नीचे दिया लिंक भी देखें 


बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन

(बुधवार दिनांक 24 अक्तुबर 2012)
विजयादशमी के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक प.पू. सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन

   (विजयादशमी,बुधवार दिनांक 24 अक्तुबर 2012) के अवसर पर दिये गये उद्बोधन -

माननीय सरसंघचालक  मोहन भागवत जी 

 आज के दिन हमें स्व. सुदर्शन जी जैसे मार्गदर्शकों का बहुत स्मरण हो रहा है। विजययात्रा में बिछुड़े हुये वीरों की स्मृतियॉं आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। विजयादशमी विजय का पर्व है। संपूर्ण देश में इस पर्व को दानवता पर मानवता की, दुष्टता पर सज्जनता की विजय के रूप में मनाया जाता है। विजय का संकल्प लेकर, स्वयं के ही मन से निर्मित दुर्बल कल्पनाओं ने खींची हुई अपनी क्षमता व पुरुषार्थ की सीमाओं को लांघ कर पराक्रम का प्रारंभ करने के लिये यह दिन उपयुक्त माना जाता है। अपने देश के जनमानस को इस सीमोल्लंघन की आवश्यकता है, क्योंकि आज की दुविधा व जटिलतायुक्त परिस्थिति में से देश का उबरना देश की लोकशक्ति के बहुमुखी सामूहिक उद्यम से ही अवश्य संभव है। यह करने की हमारी क्षमता है इस बात को हम सबने स्वतंत्रता के बाद के 65 वर्षों में भी कई बार सिद्ध कर दिखाया है। विज्ञान, व्यापार, कला, क्रीड़ा आदि मनुष्य जीवन के सभी पहलुओं में, देश-विदेशों की स्पर्धा के वातावरण में, भारत की गुणवत्ता को सिद्ध करनेवाले वर्तमान कालीन उदाहरणों का होना अब एक सहज बात है। ऐसा होने पर भी सद्य परिस्थिति के कारण संपूर्ण देश में जनमानस भविष्य को लेकर आशंकित, चिन्तित व कहीं-कहीं निराश भी है। पिछले वर्षभर की घटनाओं ने तो उन चिन्ताओं को और गहरा कर दिया है। देश की अंतर्गत व सीमान्त सुरक्षा का परिदृश्य पूर्णत: आश्व स्त करनेवाला नहीं है। हमारे सैन्य-बलों को अपनी भूमि की सुरक्षा के लिये आवश्यक अद्ययावत शस्त्र, अस्त्र, तंत्र व साधनों की आपूर्ति, उनके सीमास्थित मोर्चों तक साधन व अन्य रसद पहुँचाने के लिये उचित रास्ते, वाहन, संदेश वाहन आदि का जाल आदि सभी बातों की कमियों को शीघ्रातिशीघ्र दूर करने की तत्परता उन प्रयासों में दिखनी चाहिए। इसके विपरीत, सैन्यबलों के मनोबल पर आघात हो इस प्रकार, सेना अधिकारियों का कार्यकाल आदि छोटी तांत्रिक बातों को बिनाकारण तूल देकर नीतियों व माध्यमोें द्वारा अनिष्ट चर्चा का विषय बनाया गया हुआ हमने देखा है। सुरक्षा से संबंधित सभी वस्तुओं के उत्पादन में स्वावलंबी बनने की दिशा अपनी नीति में होनी चाहिए। सुरक्षा सूचना तंत्र में अभी भी तत्परता, क्षमता व समन्वय के अभाव को दूर कर उसको मजबूत करने की आवश्यकता
ध्यान में आती है। हमारी भूमिसीमा एवं सीमा अर्न्तगत द्वीपों सहित सीमा क्षेत्र का प्रबन्धन पक्का करने व रखने की पहली आवश्यकता है। देश की सीमाओं की सुरक्षा, उनके सामरिक प्रबंध व रक्षण व्यवस्था के साथ-साथ, सुरक्षा की दृष्टि से अपने अंतरराष्ट्रीय राजनय के प्रयोग-विनियोग पर भी आजकल निर्भर होती है। उस दृष्टि से कुछ वर्ष पूर्व से एक बहुप्रतीक्षित नयी व सही दिशा की घोषणा "Look East Policy" नामक वाक्यप्रयोग से शासन के उच्चाधिकारियों से हुयी थी। दक्षिण पूर्व एशिया के सभी देशों में इस सत्य की जानकारी व मान्यता है कि भारत तथा उनके राष्ट्रजीवन के बुनियादी मूल्य समान है, निकट इतिहास के काल तक व कुछ अभी भी सांस्द्भतिक तथा व्यापारिक दृष्टि से उनसे हमारा आदान-प्रदान का घनिष्ट संबंध रहा है। इस दृष्टि से यह ठीक ही हुआ कि हमने इन सभी देशों से अपने सहयोगी व मित्रतापूर्ण संबंधों को फिर से दृढ़ बनाने का सुनिश्च य किया। वहां के लोग भी यह चाहते हैं। परन्तु घोषणा कितनी व किस गति से द्भति में आ रही है इसका हिसाब वहां और यहां भी आशादायक चित्र नहीं पैदा करता। इस क्षेत्र में हमसे पहले हमारा स्पर्धक बनकर चीन दल-बल सहित उतरा है यह बात ध्यान में लेते है तो यह गतिहीनता चिन्ता को और गंभीर बनाती है। अपनी आण्विक तकनीकी पाकिस्तान को देने तक उसने पाकिस्तान से दोस्ती बना ली है यह हम अब जानते हैं ही। नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका ऐसे निकटवर्ती देशों में भी चीन का इस दृष्टि से हमारे आगे जाना सुरक्षा की दृष्टि से हमारे लिये क्या अर्थ रखता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। इन सभी क्षेत्रों में भारतीय मूल के लोग भी बड़ी मात्रा में बसते हैं, उन के हितों की रक्षा करते हुये इन हमारे परम्परागत स्वाभाविक मित्र देशों को साथ में रखने की व उन के साथ रहने की दृष्टि हमारे अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी होनी चाहिये।
परन्तु राष्ट्र का हित हमारी नीति का लक्ष्य है कि नहीं यह प्रश्न  मन में उत्पन्न हो ऐसी घटनाएँ पिछले कुछ वर्षों में हमारे अपने शासन-प्रशासन के समर्थन से घटती हुई सम्पूर्ण जनमानस के घोर चिन्ता का कारण बनी है। जम्मू-कश्मीर की समस्या के बारे में पिछले दस वर्षों से चली नीति के कारण वहां उग्रवादी गतिविधियों के पुनरोदय के चिन्ह दिखायी दे रहे हैं। पाकिस्तान के अवैध कैंजे से कश्मीर घाटी के भूभाग को मुक्त करना; जम्मू, लेह-लद्दाख व घाटी के प्रशासन व विकास के भेदभाव को समाप्त करते हुये शेष भारत के साथ उस राज्य के सात्मीकरण की प्रक्रिया को गति से पूर्ण करना; घाटी से विस्थापित हिंदू पुनश्चक ससम्मान सुरक्षित अपनी भूमि पर बसने की स्थिति उत्पन्न करना; विभाजन के समय भारत में आये विस्थापितों को राज्य में नागरिक अधिकार प्राप्त होना आदि न्याय्य जनाकांक्षा के विपरित वहां की स्थिति को अधिक जटिल बनाने का ही कार्य चल रहा है। राज्य व केन्द्र के शासनारूढ़ दलों के सत्ता स्वार्थ के कारण राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करना व विदेशी दबावों में झुकने का क्रम पूर्ववत चल रहा है। इतिहास के क्रम में राष्ट्रीय वृत्ति की हिन्दू जनसंख्या क्रमश: घटने के कारण देश के उत्तर भूभाग में उत्पन्न हुयी व बढ़ती गयी इस समस्यापूर्ण स्थिति से हमने कोई पाठ नहीं पढ़ा है ऐसा देश के पूर्व दिशा के भूभाग की स्थिति देखकर लगता है। असम व बंगाल की सच्छिद्र सीमा से होनेवाली घुसपैठ व शस्त्रास्त्र, नशीले पदार्थ, बनावटी पैसा आदि की तस्करी के बारे में हम बहुत वर्षों से चेतावनियॉं दे रहे थे। देश की गुप्तचर संस्थाएँ, उच्च व सर्वोच्च न्यायालय, राज्यों के राज्यपालों तक ने समय-समय पर खतरे की घंटियॉं बजायी थीं। न्यायालयों से शासन के लिये आदेश भी दिये गये थे। परंतु उन सबकी अनदेखी करते हुये सत्ता के लिये लांगूलचालन की नीति चली, स्पष्ट राष्ट्रीय दृष्टि के अभाव में गलत निर्णय हुये व ईशान्य भारत में संकट का विकराल रूप खड़ा हुआ सबके सामने है। घुसपैठ के कारण वहॉं पैदा हुआ जनसंख्या असंतुलन वहॉं के राष्ट्रीय जनसंख्या को अल्पमत में लाकर संपूर्ण देश में अपने हाथ पैर फैला रहा है। व्यापक मतांतरण के साये में वहां पर फैले अलगाववादी उग्रवाद की विषवेल को दब्बू नीतियॉं बार-बार संजीवनी प्रदान करती है। उत्तर सीमापर आ धड़की चीन की विस्तारवादी नीति का हस्तक्षेप भी होने की भनक वहॉं पर लगी है। विश्वी की “अल कायदा” जैसी कट्टरपंथी ताकतें भी उस परिस्थिति का लाभ लेकर वहॉं चंचुप्रवेश करना चाह रही है। ऐसी स्थिति में अपने सशस्त्र बलों की समर्थ उपस्थिति व परिस्थिति की प्रतिकार में उभरा जनता का दृढ़ मनोबल ही राष्ट्र की भूमि व जन की सुरक्षा के आधार के रूप में बचे हैं। समय रहते हम नीतियों में अविलम्ब सुधार करें। ईशान्य भारत में तथा भारत के अन्य राज्यों में भी घुसपैठियों की पहचान त्वरित करते हुये तथा मतदाता सुची सहित (राशन पत्र, पहचान पत्र आदि) अन्य प्रपत्रों से इन अवैध नागरिकों के नाम बाहर कर देने चाहिये व विदेशी घुसपैठियों को भारत के बाहर भेजने के प्रबंध करने चाहिये। विदेशी घुसपैठियों के पहचान के काम में किसी प्रकार का गड़बड़झाला न हो यह दक्षता बरती जानी चाहिये। सीमाओं की सुरक्षा के तारबंदी आदि के दृढ़ प्रबंध व रक्षण व्यवस्था में अधिक सजगता से चौकसी बरतने के उपाय अविलम्ब किये जाने चाहिये। राष्ट्रीय नागरिक पंजी (National Register of Citizens) को न्यायालयों द्वारा स्पष्ट रूप से निर्देशित, जन्मस्थल, माता-पिता के स्थान अथवा मातामहों-पितामहों के स्थानों के पुख्ता प्रमाणों के आधार पर तैयार करना चाहिए। ईशान्य भारत के क्षेत्र में व अन्यत्र भी यह पूर्व का अनुभव है कि जनमत के व न्यायालय के आदेशों के दबाव में विदेशी नागरिकों अथवा संशयास्पद मतदाताओं ( D voters) की  पहचान करने का दिखावा जब-जब प्रशासन या शासन करने गया तब-तब बंगलादेशी घुसपैठियों को तो उसने छोड़ दिया व वहॉं से पीड़ित कर निकाले गये व अब भारत में अनेक वर्षों से बसाये गये निरुपद्रवी व निरीह हिन्दुओं पर ही उनकी गाज गिरी।
हम सभी को यह स्पष्ट रूप से समझना व स्वीकार करना चाहिए कि विश्वओभर के हिन्दू समाज के लिये पितृ-भू व पुण्य-भू के रूप में केवल भारत-जो परम्परा से हिन्दुस्थान होने से ही भारत कहलाता है, हिन्दू अल्पसंख्यक अथवा निष्प्रभावी होने से जिसके भू-भागों का नाम तक बदल जाता है- ही है। पीड़ित होकर गृहभूमि से निकाले जाने पर आश्रय के रूप में उसको दूसरा देश नहीं है। अतएव कहीं से भी आश्रयार्थी होकर आनेवाले हिन्दू को विदेशी नहीं मानना चाहिये। सिंध से भारत में हाल में ही आये आश्रयार्थी हो अथवा बंगलादेश से आकर बसे हों, अत्याचारों के कारण भारत में अनिच्छापूर्वक धकेले गये विस्थापित हिन्दुओं को हिन्दुस्थान भारत में सस्नेह व ससम्मान आश्रय मिलना ही चाहिये। भारतीय शासन का यह कर्तव्य बनता है वह विश्व्भर के हिन्दुओं के हितों का रक्षण करने में अपनी अपेक्षित भूमिका का तत्परता व दृढ़ता से निर्वाह करें। इस सारे घटनाक्रम का एक और गंभीर पहलू है कि विदेशी घुसपैठियों की इस अवैध कारवाई को केवल वे अपने संप्रदाय के है इसलिये कहीं पर कुछ तत्त्वों ने उनके समर्थन का वातावरण बनाने का प्रयास किया। शिक्षा अथवा कमाई के लिये भारत में अन्यत्र बसे ईशान्य भारत के लोगों को धमकाया गया। मुंबई के आजाद मैदान की घटना प्रसिद्ध है। म्यांमार के शासन द्वारा वहां के रोहिंगियाओं पर हुयी कार्यवाही का निषेध भारत में जवान ज्योति का अपमान करने में गर्व महसूस करनेवाली भारत विरोधी ताकतों को अंदर से समर्थन देनेवाले तत्त्व अभी भी देश में विद्यमान है यह संदेश साफ है।
      “ यह चिन्ता, क्षोभ व ग्लानी का विषय है कि देश हित के विपरित नीति का प्रशासन द्वारा प्रदर्शन हुआ व राष्ट्र विरोधी पंचमस्तम्भियों के बढ़े हुये साहस के परिणाम स्वरूप उन तत्त्वों द्वारा कानून व शासन का उद्दंड अपमान हुआ। सब सामर्थ्य होने के बाद भी तंत्र को पंगु बनाकर देश विरोधी तत्त्वों को खुला खेल खेलने देने की नीति चलाने वाले लोग दुर्भाग्य से स्वतंत्र देश के अपने ही लोग हैं। समाज में राष्ट्रीय मनोवृति को बढ़ावा देना तो दूर हमारे अपने हिन्दुस्थान में ही मतों के स्वार्थ से, कट्टरता व अलगाव से अथवा विद्वेषी मनोवृत्ति के कारण पिछले दस वर्षों में हिन्दू समाज का तेजोभंग व बल हानि करने के नीतिगत कुप्रयास व छल-कपट बढ़ते हुये दिखाई दे रहे हैं। हमारे परमश्रद्धेय आचार्यों पर मनगढंत आरोप लगाकर उनकी अप्रतिष्ठा के ओछे प्रयास हुये। वनवासियों की सेवा करने वाले स्वामी लक्ष्मणानन्द सरस्वती की षडयन्त्रपूर्वक हत्या की गयी, वास्तविक अपराधी अभी तक पकड़े नहीं गये। हिन्दू मन्दिरों की अधिग्रहीत संपत्ति का अपहार व अप-प्रयोग धड़ल्ले से चल रहा है, संशय व आरोपों का वातावरण, निर्माण किया गया, हिंदू संतों द्वारा निर्मित न्यासों व तिरुअनन्तपुरम् के पद्मनाभ स्वामी मंदिर जैसे मंदिरों की संपत्ति के बारे में हिन्दू समाज की मान्यताओं, श्रेष्ठ परंपरा व संस्कारों को कलुषित अथवा नष्ट करनेवाला वातावरण निर्माण करनेवाले विषय जानबूझकर समाज में उछाले गये। बहुसंख्य व उदारमनस्क होते हुये भी हिन्दुसमाज की अकारण बदनामी कर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले कानून लाने का प्रयास तो अभी भी चल रहा है। प्रजातंत्र, पंथनिरपेक्षता व संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का दावा करने वाले ही मतों के लालच में तथाकथित अल्पसंख्यकों का राष्ट्र की संपत्ति पर पहला हक बताकर साम्प्रदायिक आधार पर आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं। लव जिहाद व मतांतरण जैसी गतिविधियों द्वारा हिन्दू समाज पर प्रच्छन्न आक्रमण करनेवाली प्रवृत्तियों से ही राजनीतिक साठगांठ की जाती है। फलस्वरूप इस देश के परम्परागत रहिवासी बहुसंख्यक राष्ट्रीयमूल्यक स्वभाव व आचरण का निधान बनकर रहने वाले हिन्दू समाज के मन में यह प्रश्नक उठ रहा है कि हमारे लिए बोलनेवाला व हमारा प्रतिनिधित्व करनेवाला नेतृत्व इस देश में अस्तित्व में है कि नहीं?”
। हिन्दुत्व व हिन्दुस्थान को मिटाना चाहनेवाली दुनिया की एकाधिकारवादी, जड़वादी व कट्टरपंथी ताकतों तथा हमारे राज्यों के व केन्द्र के शासन में घुसी मतलोलुप अवसरवादी प्रवृत्तियों के गठबंधन के षडयंत्र के द्वारा और एक सौहार्दविरोधी कार्य करने का प्रयास हो रहा है। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर परिसर के निकट विस्तृत जमीन अधिग्रहीत कर वहां पर मुसलमानों के लिये कोई बड़ा निर्माण करने के प्रयास चल रहे हैं ऐसे समाचार प्राप्त हो रहे हैं। जब अयोध्या में राममंदिर निर्माण का प्रकरण न्यायालय में है तब ऐसी हरकतों के द्वारा समाज की भावनाओं से खिलवाड़ सांप्रदायिक सौहार्द का नुकसान ही करेगी। 30 सितंबर 2010 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को ध्यान में लेते हुए वास्तव में हमारी संसद के द्वारा शीघ्रातिशीघ्र भव्य मंदिर के निर्माण की अनुमति रामजन्मभूमि मंदिर निर्माण न्यास को देनेवाला कानून बने व अयोध्या की सांस्द्भतिक सीमा के बाहर ही मुसलमानों के लिये किसी स्थान के निर्माण की अनुमति हो यही इस विवाद में घुसी राजनीति को बाहर कर विवाद को सदा के लिये संतोष व सौहार्दजनक ढंग से सुलझाने का एकमात्र उपाय है। परंतु देश की राजनीति में आज जो वातावरण है वह उसके देशहितपरक, समाजसौहार्दपरक होने की छवि उत्पन्न नहीं करता। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के माध्यम से बड़ी विदेशी कंपनियों का खुदरा व्यापार में आना विश्वर में कहीं पर भी अच्छे अनुभव नहीं दे रहा है। ऐसे में खुदरा व्यापार तथा बीमा व पेंशन के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ाना हमें लाभ पहुँचाने के बजाय अंततोगत्वा छोटे व्यापारियों के लिये बेरोजगारी, किसानों के लिये अपने उत्पादों का कम मूल्य मिलने की मजबूरी तथा ग्राहकों के लिये अधिक मंहगाई ही पैदा करेगा। साथ ही अपनी खाद्यान्न सुरक्षा के लिये भी खतरा बढ़ेगा। देश की प्राद्भतिक संपदा की अवैध लूट तथा विकास के नामपर जैव विविधता व पर्यावरण के साथ ही उनपर निर्भर लोगों को बेरोजगारी से लेकर तो विस्थापन तक समस्याओं के भेट चढ़ाना अनिर्बाध रूप से चल ही रहा है। देश के एक छोटे वर्गमात्र की उन्नति को जनता की आर्थिक प्रगति का नाम देकर हम जिस तेज विकास दर की डींग हांकते थे वह भी आज 9 प्रतिशत से 5 प्रतिशत तक नीचे आ गया है। संपूर्ण देश नित्य बढ़ती महंगाई से त्रस्त है। अमीर और गरीब के बीच लगातार बढ़ते जा रहे अन्तर में विषमता की समस्या को और अधिक भयावह बना दिया है। न जाने किस भय से हड़बड़ी में इतने सारे अधपके कानून बिना सोच-विचार-चर्चा के लाये जा रहे हैं। इन तथाकथित “सुधारों” के बजाय में जहॉं वास्तविक सुधारों की आवश्यकता है उन क्षेत्रों में-चुनाव प्रणाली, करप्रणाली, आर्थिक निगरानी की व्यवस्था, शिक्षा नीति, सूचना अधिकार कानून के नियम- सुधार की मॉंगों की अनदेखी व दमन भी हो रहा है। अधूरे चिन्तन के आधार पर विश्व  में आज प्रचलित विकास की पद्धति व दिशा ही ऐसी है कि उससे यही परिणाम सर्वत्र मिलते हैं। ऊपर से अब यह पद्धति धनपति बहुराष्ट्रीय प्रतिष्ठानों के खेलों से उन्हीं के लिये अनुकूल बनाकर चलायी जाती है। हम जब तक अपनी समग्र व एकात्म दृष्टि के दृढ़ आधार पर जीवन के सब आयामों के लिये, अपनी क्षमता, आवश्यकता व संसाधनों के अनुरूप व्यवस्थाओं के नये कालसुसंगत प्रतिमान विकसित नहीं करेंगे तबतक न भारत को सभी को फलदायी होनेवाला संतुलित विकास व प्रगति उपलब्ध होगी न अधूरे विसंवादी जीवन से दुनिया को मुक्ति मिलेगी। चिन्तन के अधूरेपन के परिणामों को अपने देश में राष्ट्रीय व व्यक्तिगत शील के अभाव ने बहुत पीड़ादायक व गहरा बना दिया है। मन को सुन्न करनेवाले भ्रष्टाचार-प्रकरणों के उद्‌घाटनों का तांता अभी भी थम नहीं रहा है। भ्रष्टाचारियों को सजा दिलवाने के, कालाधन वापस देश में लाने के, भ्रष्टाचार को रोकनेवाली नयी कड़ी व्यवस्था बनाने के लिये छोटे-बड़े आंदोलनों का प्रादुर्भाव भी हुआ है। संघ के अनेक स्वयंसेवक भी इन आंदोलनों में सहभागी हैं। परन्तु भ्रष्टाचार का उद्गम शील के अभाव में है यह समझकर संघ अपने चरित्रनिर्माण के कार्य पर ही केन्द्रित रहेगा। लोगों में निराशा व व्यवस्था के प्रति अश्रद्धा न आने देते हुये व्यवस्था परिवर्तन की बात कहनी पड़ेगी अन्यथा मध्यपूर्व के देशों में अराजकता सदृश स्थिति उत्पन्न कर जैसे कट्टरपंथी व विदेशी ताकतों ने अपना उल्लू सीधा कर लिया वैसे होने की संभावना नकारी नहीं जा सकती। अराजनैतिक सामाजिक दबाव का व्यापक व दृढ़ परन्तु व्यवस्थित स्वरूप ही भ्रष्टाचार उन्मूलन का उपाय बनेगा। उसके फलीभूत होने के लिये हमें व्यापक तौर पर शिक्षाप्रणाली, प्रशासनपद्धति तथा चुनावतंत्र के सुधार की बात आगे बढ़ानी होगी। तथा व्यापक सामाजिक चिन्तन-मंथन के द्वारा हमारी व्यवस्थाओं के मूलगामी व दूरगामी परिवर्तन की बात सोचनी पड़ेगी। अधूरी क्षतिकारक व्यवस्था के पीछे केवल वह प्रचलित है इसलिये आँख मूंद कर जाने के परिणाम समाज जीवन में ध्यान में आ रहे है। बढ़ता हुआ जातिगत अभिनिवेश व विद्वेष, पिछड़े एवं वंचित वर्ग के शोषण व उत्पीड़न की समस्या, नैतिक मूल्यों के ह्‌रास के कारण शिक्षित वर्ग सहित सामान्य समाज में बढती हुई महिला उत्पीडन, बलात्कार, कन्या भू्रणहत्या, स्वच्छन्द यौनाचार ,हत्याएँ व आत्महत्याएँ , परिवारों का विघटन, व्यसनाधीनता की बढती प्रवृत्ति, अकेलापन के परिणाम स्वरूप तनावग्रस्त जीवन आदि हमारे देश में न दिखी अथवा अत्यल्प प्रमाण वाली घटनाएँ अब बढ़ते प्रमाण में दृग्गोचर हो रही है। हमें अपने शाश्वलत मूल्यों के आधार पर समाज के नवरचना की काल सुसंगत व्यवस्था भी सोचनी पड़ेगी।

अतएव सारा उत्तरदायित्व राजनीति, शासन, प्रशासन पर डालकर हम सब दोषमुक्त भी नहीं हो सकते। अपने घरों से लेकर सामाजिक वातावरण तक क्या हम स्वच्छता, व्यवस्थितता, अनुशासन, व्यवहार की भद्रता व शुचिता, संवेदनशीलता आदि सुदृढ़ राष्ट्रजीवन की अनिवार्य व्यवहारिक बातों का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं? सब परिवर्तनों का प्रारम्भ हमारे अपने जीवन के दृष्टिकोण व आचरण के प्रारंभ से होता है यह भूल जाने से, मात्र आंदोलनों से काम बननेवाला नहीं है। स्व. महात्मा गांधी जी ने 1922 के Young India के एक अंक में सात सामाजिक पापों का उल्लेख किया था। वे थे। Politics without Principles Wealth without Work pleasure without Conscience तत्त्वहीन राजनीतिश्रमविना संपत्तिविवेकहीन उपभोग शील Knowledge without Character Commerce without Morality Science Without Humanity Worship without Sacrifice विना ज्ञाननीतिहीन व्यापारमानवता विना विज्ञानसमर्पणरहित पूजा आज के अपने देश के सामाजिक राजनीतिक परिदृश्य का ही यह वर्णन लगता है। ऐसी परिस्थिति में समाज की सज्जनशक्ति को ही समाज में तथा समाज को साथ लेकर उद्यम करना पड़ता है। इस चुनौति को हमें स्वीकार कर आगे बढ़ना ही पड़ेगा। भारतीय नवोत्थान के जिन उद्गाताओं से प्रेरणा लेकर स्व. महात्मा जी जैसे गरिमावान लोग काम कर रहे थे उनमें एक स्वामी विवेकानन्द थे। उनके सार्ध जन्मशती के कार्यक्रम आनेवाले दिनों में प्रारंभ होने जा रहे हैं। उनके संदेश को हमें चरितार्थ करना होगा। निर्भय होकर, स्वगौरव व आत्मविश्वाउस के साथ, विशुद्ध शील की साधना करनी होगी। कठोर निष्काम परिश्रम से जनों में जनार्दन का दर्शन करते हुए नि:स्वार्थ सेवा का कठोर परिश्रम करना पड़ेगा धर्मप्राण भारत को जगाना होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य इन सब गुणों से युक्त व्यक्तियों के निर्माण का कार्य है। यह कार्य समय की अनिवार्य आवश्यकता है। आप सभी का प्रत्यक्ष सहभाग इसमें होना ही पड़ेगा। निरंतर साधना व कठोर परिश्रम से समाज अभिमंत्रित होकर संगठित उद्यम के लिये खड़ा होगा तब सब बाधाओं को चीरकर सागर की ओर बढ़नेवाली गंगा के समान राष्ट्र का भाग्यसूर्य भी उदयाचल से शिखर की ओर कूच करना प्रारम्भ करेगा। अतएव स्वामीजी के शब्दों में “उठो जागो व तबतक बिना रूके परिश्रम करते रहो जबतक तुम अपने लक्ष्य को नहीं पा लोगे।” उत्तिष्ठत! जाग्रत!! प्राप्यवरान्निबोधत!!!
- भारत माता की जय -

प्रस्तुतकर्ता Vishwa Samvad Kendra Kashi li









पाक कब्जे वाले कश्मीर को मुक्त कराया जाए: मोहन भागवत

 

 अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जल्द बने कानून

 

 

 

 

पाक कब्जे वाले कश्मीर को मुक्त कराया जाए: मोहन भागवत

 Dainik Jagran Hindi News
Wed, 24 Oct 2012
             नागपुर। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ [आरएसएस] ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को मुक्त कराने की मांग की है। संघ ने यह भी कहा कि कश्मीर छोड़ने को विवश हुए हिंदुओं की वापसी के लिए अनुकूल माहौल बनाया जाना चाहिए ताकि वह सम्मान से अपने घरों को लौट सकें।
विजयादशमी के अवसर पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कश्मीर घाटी का उल्लेख करते हुए कहा, पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाके को मुक्त कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जम्मू, लेह, लद्दाख व कश्मीर घाटी के प्रशासनिक व विकास से जुड़े मामलों में भेदभाव को समाप्त किया जाना चाहिए और सभी इलाकों को देश के अन्य क्षेत्र के समकक्ष लाया जाना चाहिए।
मोहन भागवत ने कहा, कश्मीर छोड़ने पर विवश हुए हिंदूओं की वापसी के लिए अनुकूल माहौल बनाया जाना चाहिए जिससे सम्मान के साथ घाटी में अपने घरों में उनकी वापसी सुनिश्चित की जा सकें।
संघ प्रमुख ने कहा, देश के विभाजन के समय जिन लोगों ने जम्मू-कश्मीर में शरण लिया उन लोगों को राज्य की नागरिकता प्रदान की जानी चाहिए। मोहन भागवत ने आरोप लगाते हुए कहा, राज्य व केंद्र में शासन कर रहे सत्ता पसंद राजनीतिक दलों की ओर से राष्ट्रीय हितों से जुड़े विषयों का नजरअंदाज किया जा रहा है और वे लगातार विदेशी ताकतों के दबाव के सामने झुकते रहे हैं।
घुसपैठ की घटनाओं पर चिंता जाहिर करते हुए मोहन भागवत ने कहा, घुसपैठियों की पहचान कर उनका नाम मतदाता सूची व राशन कार्ड से हटाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत एक राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करने की व्यवस्था की जानी चाहिए, जिसमें जन्म स्थान, नागरिकता का जिक्र किया जाएं।
साथ ही संघ प्रमुख ने केंद्र सरकार से जल्द से जल्द ऐसा कानून बनाने की मांग कि जिससे अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की अनुमति मिल सकें। मोहन भागवत ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय के लिए किसी तरह के ढाचे के निर्माण की अनुमति अयोध्या की सास्कृतिक सीमा से बाहर ही दी जानी चाहिए।

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जल्द कानून बने: संघ


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  के स्थापना  दिवस  विजयादसमी  के अवसर पर आयोजित मुख्य समारोह को नागपुर में संबोधित करते हुए सरसंघचालक माननीय  मोहन भागवत जी ने कहा ........................

 Samay Live

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जल्द कानून बने: संघ

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जल्द बने कानून
आरएसएस ने केंद्र सरकार से जल्द से जल्द ऐसा कानून बनाने को कहा जिससे अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की अनुमति प्राप्त हो जाए.विजयादशमी समारोह पर अपने संबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय के लिए किसी तरह के ढांचे के निर्माण की अनुमति अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा से बाहर ही दी जानी चाहिए.
इस आशय की खबरों का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि मुसलमानों के लिए ढांचे के निर्माण के वास्ते राम जन्मभूमि स्थल के पास बडा भूखंड अधिग्रहित किये जाने के प्रयास हो रहे हैं.उन्होंने कहा कि राज्य सरकार भूखंड का अधिग्रहण करेगी और केंद्र सरकार इस पर निर्माण के लिए वित्तपोषण करेगी.
भागवत ने कहा कि राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण का विषय अदालत के समक्ष लंबित है. इसलिए इस समय ऐसे गैर जिम्मेदाराना प्रस्ताव करना करोड़ों हिन्दुओं की भावना से खेलना होगा और इससे सौहार्द का माहौल खराब होगा.सरसंघचालक ने कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की ओर से 30 सितंबर 2010 को दिये गए फैसले के आलोक में संसद को कानून बनाना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस मुद्दे के सर्व सम्मत समाधान का यही एक रास्ता है.

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 RSS chief asks India to ' liberate'  Pakistani Kashmir

पाक कब्जे वाले कश्मीर को मुक्त कराया जाए: मोहन भागवत

 Dainik Jagran Hindi News
Wed, 24 Oct 2012
             नागपुर। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ [आरएसएस] ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को मुक्त कराने की मांग की है। संघ ने यह भी कहा कि कश्मीर छोड़ने को विवश हुए हिंदुओं की वापसी के लिए अनुकूल माहौल बनाया जाना चाहिए ताकि वह सम्मान से अपने घरों को लौट सकें।
विजयादशमी के अवसर पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कश्मीर घाटी का उल्लेख करते हुए कहा, पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाके को मुक्त कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जम्मू, लेह, लद्दाख व कश्मीर घाटी के प्रशासनिक व विकास से जुड़े मामलों में भेदभाव को समाप्त किया जाना चाहिए और सभी इलाकों को देश के अन्य क्षेत्र के समकक्ष लाया जाना चाहिए।
मोहन भागवत ने कहा, कश्मीर छोड़ने पर विवश हुए हिंदूओं की वापसी के लिए अनुकूल माहौल बनाया जाना चाहिए जिससे सम्मान के साथ घाटी में अपने घरों में उनकी वापसी सुनिश्चित की जा सकें।
संघ प्रमुख ने कहा, देश के विभाजन के समय जिन लोगों ने जम्मू-कश्मीर में शरण लिया उन लोगों को राज्य की नागरिकता प्रदान की जानी चाहिए। मोहन भागवत ने आरोप लगाते हुए कहा, राज्य व केंद्र में शासन कर रहे सत्ता पसंद राजनीतिक दलों की ओर से राष्ट्रीय हितों से जुड़े विषयों का नजरअंदाज किया जा रहा है और वे लगातार विदेशी ताकतों के दबाव के सामने झुकते रहे हैं।
घुसपैठ की घटनाओं पर चिंता जाहिर करते हुए मोहन भागवत ने कहा, घुसपैठियों की पहचान कर उनका नाम मतदाता सूची व राशन कार्ड से हटाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत एक राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करने की व्यवस्था की जानी चाहिए, जिसमें जन्म स्थान, नागरिकता का जिक्र किया जाएं।
साथ ही संघ प्रमुख ने केंद्र सरकार से जल्द से जल्द ऐसा कानून बनाने की मांग कि जिससे अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की अनुमति मिल सकें। मोहन भागवत ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय के लिए किसी तरह के ढाचे के निर्माण की अनुमति अयोध्या की सास्कृतिक सीमा से बाहर ही दी जानी चाहिए।

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012

जिस दिन दसशीश धारी रावण हारा : वह दिन दसहरा






रावण अति ज्ञानवान था और इसी कारण वह दशीश वाला दशानन कहलाया , मगर ज्ञान का अंहकार ही ज्ञान के सामने अंधकार उत्पन्न कर देता हे और व्यक्ति पता भ्रष्ट हो जाता हे । यही रावण  के साथ भी हुआ और जब वह महा पापी के रूप में राम के हाथों मारा गया , तब से वाही दिन दसहरा के रूप में जनता द्वारा मनाया जाता हे ..जिस दिन दसशीश धारी हारा वह दिन दसहरा .....
***दशहरा***
( विजयदशमी या शस्त्र-पूजा/आयुध-पूजा )
समर विजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान।
विजय विवेक विभूति नित तिन्हहिं देहिं भगवान।।
हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार दशहरा है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। दशहरा हिन्दुओं के वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है।