शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

प्रधानमंत्री रहे श्री इन्द्रकुमार गुजराल का आज निधन







प्रधानमंत्री रहे श्री इन्द्रकुमार गुजराल का आज निधन हो गया।

वे एक अच्छे राजनेता थे,उन्होने स्वच्छ छवी की राजनीति की हमेशा वकालत की। गुजराल 21 अप्रैल 1997 से 19 मार्च 1998 तक प्रधानमंत्री पद पर रहे। वह देश के 12वें प्रधानमंत्री थे। वह वीपी सिंह और फिर देवगौड़ा सरकार में विदेश मंत्री के पद पर भी रहे थे। गुजराल के दो बेटे हैं जिनमें से एक नरेश गुजराल अकाली दल के नेता और राज्यसभा सांसद हैं। उनके भाई सतीश गुजराल प्रमुख चित्रकार एवं वास्तुविद हैं। उनकी पत्नी शीला का 2011 में निधन हो गया था और वह कवयित्री थीं।

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

दक्षिणेश्वर काली मंदिर - जहां हुए रामकृष्ण परमहंस




दक्षिणेश्वर काली मंदिर - जहां हुए रामकृष्ण परमहंस
***दक्षिणेश्वर काली मंदिर***
http://ghumakkadijindabad.blogspot.in/2011/04/blog-post_01.html
दक्षिणेश्वर मंदिर देवी माँ काली के लिए ही बनाया गया है। दक्षिणेश्वर माँ काली का मुख्य मंदिर है। भीतरी भाग में चाँदी से बनाए गए कमल के फूल जिसकी हजार पंखुड़ियाँ हैं, पर माँ काली शस्त्रों सहित भगवान शिव के ऊपर खड़ी हुई हैं। काली माँ का मंदिर नवरत्न की तरह निर्मित है और यह 46 फुट चौड़ा तथा 100 फुट ऊँचा है। कोलकाता के उत्तर में विवेकानंद पुल के पास दक्षिणेश्वर काली मंदिर स्थित है। यह मंदिर बीबीडी बाग से 20 किलोमीटर दूर है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर - जहां हुए रामकृष्ण परमहंस
समूचा विश्व इन्हे स्वामी विवेकानन्द के गुरू के रूप में मानता है। कोलकाता में उनकी आराधना का स्थल आज भी लोगों के लिये श्रद्धा का केन्द्र है। दक्षिणेश्वर मन्दिर के बारे में बता रही हैं कामाक्षी:
कोलकाता में हुगली के पूर्वी तट पर स्थित मां काली व शिव का प्रसिद्ध मन्दिर है दक्षिणेश्वर। कोलकाता आने वाले प्रत्येक सैलानी की इच्छा यहां दर्शन करने की अवश्य होती है। यह मन्दिर लगभग बीस एकड में फैला है। वास्तव में यह मन्दिरों का समूह है, जिनमें प्रमुख हैं- काली मां का मन्दिर, जिसे भवतारिणी भी कहते हैं। मन्दिर में स्थापित मां काली की प्रतिमा की आराधना करते-करते रामकृष्ण ने ‘परमहंस’ अवस्था प्राप्त कर ली थी। इसी प्रतिमा में उन्होंने मां के स्वरूप का साक्षात्कार कर, जीवन धन्य कर लिया था। पर्यटक भी इस मन्दिर में दर्शन कर मां काली व परमहंस की अलौकिक ऊर्जा व तेज को महसूस करने का प्रयास करते हैं।
इस मन्दिर का निर्माण कोलकाता के एक जमींदार राजचन्द्र दास की पत्नी रासमणी ने कराया था। सन 1847 से 1855 तक लगभग आठ वर्षों का समय और नौ लाख रुपये की लागत इसके निर्माण में आई थी। तब इसे ‘भवतारिणी मन्दिर’ कहा गया गया। परंतु अब तो यह दक्षिणेश्वर के नाम से ही प्रसिद्ध है। दक्षिणेश्वर अर्थात दक्षिण भाग में स्थित देवालय। प्राचीन शोणितपुर गांव अविभाजित बंगाल के दक्षिण भाग में स्थित है। यहां के प्राचीन शिव मन्दिर को लोगों ने दक्षिणेश्वर शिव मन्दिर कहना शुरू किया और कालांतर में यह स्थान ही दक्षिणेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज यह केवल बंगाल या भारत ही नहीं, सम्पूर्ण हिन्दु मतावलम्बियों के लिये एक पुनीत तीर्थ स्थल है।
मन्दिर परिसर में प्रवेश करते ही लगभग सौ फुट ऊंचे शिखर को देखकर ही अनुमान लग जाता है कि यही मुख्य मन्दिर है। इसकी छत पर नौ शिखर हैं, जिनके बीचोंबीच का शिखर सबसे ऊंचा है। इसी के नीचे बीस फुट वर्गाकार में गर्भगृह है। अन्दर मुख्य वेदी पर सुन्दर सहस्त्रदल कमल है, जिस पर भगवान शिव की लेटी हुई अवस्था में, सफेद संगमरमर की प्रतिमा है। इनके वक्षस्थल पर एक पांव रखे कालिका का चतुर्भुज विग्रह है। गले में नरमुंडों का हार पहने, लाल जिह्वा बाहर निकाले और मस्तक पर भृकुटियों का मध्य ज्ञान नेत्र। प्रथम दृष्टि में तो यह रूप अत्यन्त भयंकर लगता है। पर भक्तों के लिये तो यह अभयमुद्रा वरमुद्रा वाली, करुणामयी मां है।
काली मन्दिर के उत्तर में राधाकान्त मन्दिर है, इसे विष्णु मन्दिर भी कहते हैं। इस मन्दिर पर कोई शिखर नहीं है। मन्दिर के गर्भ गृह में कृष्ण भगवान की प्रतिमा है। श्यामवर्णी इस प्रतिमा के निकट ही चांदी के सिंहासन पर अष्टधातु की बनी राधारानी की सुन्दर प्रतिमा है। राधाकृष्ण के इस रूप को यहां जगमोहन-जगमोहिनी कहते हैं। काली मन्दिर के दक्षिणी ओर ‘नट-मन्दिर’ है। इस पर भी कोई शिखर नहीं है। भवन के चारों ओर द्वार बने हैं। मन्दिर की छत के मध्य में माला जपते हुए भैरव हैं। नट मन्दिर के पीछे की ओर भंडारगृह व पाकशाला है। दक्षिणेश्वर के प्रांगण के पश्चिम में एक कतार में बने बारह शिव मन्दिर हैं। यह देखने में कुछ अलग से कुछ विशिष्ट से लगते हैं क्योंकि इन मन्दिरों का वास्तु शिल्प बंगाल प्रान्त में बनने वाली झोंपडियों सरीखा है। वैसे ही धनुषाकार गुम्बद इनके ऊपर बने हैं। सभी मन्दिर एक आकार के हैं। इनके दोनों ओर चौडी सीढियां बनी हैं। इन सभी में अलग-अलग पूजा होती है। इनके नाम हैं- योगेश्व्वर, यत्नेश्वर, जटिलेश्वर, नकुलेश्वर, नाकेश्वर, निर्जरेश्वर, नरेश्वर, नंदीश्वर, नागेश्वर, जगदीश्वर, जलेश्वर और यज्ञेश्वर। मन्दिरों के मध्य भाग में स्थित चांदनी ड्योढी से एक रास्ता हुगली घाट की ओर जाता है। जहां से हुगली का विस्तार देखते ही बनता है। मन्दिर प्रांगण के बाहर भी महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक दर्शनीय स्थान हैं जहां पर्यटक अवश्य ही जाते हैं। उत्तर की ओर बकुल तला घाट के निकट ‘पंचवटी’ नामक स्थान है। उस समय यहां बरगद, पीपल, बेल, आंवला और अशोक पांच पेड थे। परमहंस अक्सर यहां आते थे और यहां के सुरम्य वातावरण में वे समाधिस्थ हो जाया करते थे।
प्रांगण के सामने ही एक कोठी है जिसमें परमहंस रामकृष्ण निवास करते थे। यहीं पर उन्होनें अनेक वर्षों तक साधना की। उन्होंने वैष्णव, अद्वैत और तान्त्रिक मतों के अतिरिक्त इस्लाम व ईसाई मत का भी गहन अध्ययन किया और ईश्वर सर्वतोभाव की खोज की। कोठी के पश्चिम में नौबतखाना है। जहां रामकृष्ण की माता देवी चन्द्रामणी निवास करती थी। बाद के दिनों में मां शारदा ( परमहंस की अर्धांगिनी) भी वहीं रहने लगीं। कुछ वर्षों बाद रामकृष्ण, प्रांगण के उत्तरपूर्व में बने एक कमरे में रहने लगे थे जहां वे अंतकाल तक रहे। अब यहां एक लघु संग्रहालय है। यहीं दक्षिणेश्वर में एक युवक उनसे मिला था और उनके प्रभाव से, संसार को राह दिखाने विवेकानंद बन गया।
सामने ही हुगली के पश्चिमी तट पर ‘वेलूर मठ’ है। जहां रामकृष्ण मिशन का कार्यालय है। स्वामी विवेकानंद के बाद भी दक्षिणेश्वर में संत महात्माओं का आना जाना चलता रहा और यह स्थान अध्यात्म व भक्ति का प्रमुख केन्द्र बन गया।
लेख: कामाक्षी (दैनिक जागरण यात्रा, 26 मार्च 2006)

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

तनोट राय (आवड़ माता) मंदिर : जहाँ पाकिस्तान सेना द्वारा गिराए गए बम नहीं फटे थे।







वाह एसा मंदिर व चमत्कार पहली बार सूना और
आज इस मंदिर को देखकर यकीन हो गया : महावीर प्रसाद
जैसलमेर से करीब 130 किमी दूर स्थि‍त माता तनोट राय (आवड़ माता) का मंदिर है। तनोट माता को देवी हिंगलाज माता का एक रूप माना जाता है। हिंगलाज माता शक्तिपीठ वर्तमान में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के लासवेला जिले में स्थित है।
भाटी राजपूत नरेश तणुराव ने तनोट को अपनी राजधानी बनाया था। उन्होंने विक्रम संवत 828 में माता तनोट राय का मंदिर बनाकर मूर्ति को स्थापित किया था। भाटी राजवंशी और जैसलमेर के आस-पास के इलाके के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी तनोट माता की अगाध श्रद्धा के साथ उपासना करते रहे। कालांतर में भाटी राजपूतों ने अपनी राजधानी तनोट से हटाकर जैसलमेर ले गए परंतु मंदिर तनोट में ही रहा।
तनोट माता का य‍ह मंदिर यहाँ के स्थानीय निवासियों का एक पूज्यनीय स्थान हमेशा से रहा परंतु 1965 को भारत-पाक युद्ध के दौरान जो चमत्कार देवी ने दिखाए उसके बाद तो भारतीय सैनिकों और सीमा सुरक्षा बल के जवानों की श्रद्धा का विशेष केन्द्र बन गई। सितम्बर 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हुआ। तनोट पर आक्रमण से पहले श‍त्रु (पाक) पूर्व में किशनगढ़ से 74 किमी दूर बुइली तक पश्चिम में साधेवाला से शाहगढ़ और उत्तर में अछरी टीबा से 6 किमी दूर तक कब्जा कर चुका था। तनोट तीन दिशाओं से घिरा हुआ था। यदि श‍त्रु तनोट पर कब्जा कर लेता तो वह रामगढ़ से लेकर शाहगढ़ तक के इलाके पर अपना दावा कर सकता था। अत: तनोट पर अधिकार जमाना दोनों सेनाओं के लिए महत्वपूर्ण बन गया था।
17 से 19 नवंबर 1965 को श‍त्रु ने तीन अलग-अलग दिशाओं से तनोट पर भारी आक्रमण किया। दुश्मन के तोपखाने जबर्दस्त आग उगलते रहे।तनोट की रक्षा के लिए मेजर जय सिंह की कमांड में 13 ग्रेनेडियर की एक कंपनी और सीमा सुरक्षा बल की दो कंपनियाँ दुश्मन की पूरी ब्रिगेड का सामना कर रही थी। शत्रु ने जैसलमेर से तनोट जाने वाले मार्ग को घंटाली देवी के मंदिर के समीप एंटी पर्सनल और एंटी टैंक माइन्स लगाकर सप्लाई चैन को काट दिया था।
दुश्मन ने तनोट माता के मंदिर के आस-पास के क्षेत्र में करीब 3 हजार गोले बरसाएँ पंरतु अधिकांश गोले अपना लक्ष्य चूक गए। अकेले मंदिर को निशाना बनाकर करीब 450गोले दागे गए परंतु चमत्कारी रूप से एक भी गोला अपने निशाने पर नहीं लगा और मंदिर परिसर में गिरे गोलों में से एक भी नहीं फटा और मंदिर को खरोंच तक नहीं आई।
सैनिकों ने यह मानकर कि माता अपने साथ है, कम संख्या में होने के बावजूद पूरे आत्मविश्वास के साथ दुश्मन के हमलों का करारा जवाब दिया और उसके सैकड़ों सैनिकों को मार गिराया। दुश्मन सेना भागने को मजबूर हो गई। कहते हैं सैनिकों को माता ने स्वप्न में आकर कहा था कि जब तक तुम मेरे मंदिर के परिसर में हो मैं तुम्हारी रक्षा करूँगी।
सैनिकों की तनोट की इस शानदार विजय को देश के तमाम अखबारों ने अपनी हेडलाइन बनाया। एक बार फिर 4 दिसम्बर 1971 की रात को पंजाब रेजीमेंट की एक कंपनी और सीसुब की एक कंपनी ने माँ के आशीर्वाद से लोंगेवाला में विश्व की महानतम लड़ाइयों में से एक में पाकिस्तान की पूरी टैंक रेजीमेंट को धूल चटा दी थी। लोंगेवाला को पाकिस्तान टैंकों का कब्रिस्तान बना दिया था। 1965 के युद्ध के बाद सीमा सुरक्षा बल ने यहाँ अपनी चौकी स्थापित कर इस मंदिर की पूजा-अर्चना व व्यवस्था का कार्यभार संभाला तथा वर्तमान में मंदिर का प्रबंधन और संचालन सीसुब की एक ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। मंदिर में एक छोटा संग्रहालय भी है जहाँ पाकिस्तान सेना द्वारा मंदिर परिसर में गिराए गए वे बम रखे हैं जो नहीं फटे थे।

सीसुब पुराने मंदिर के स्थान पर अब एक भव्य मंदिर निर्माण करा रही है। लोंगेवाला विजय के बाद माता तनोट राय के परिसर में एक विजय स्तंभ का निर्माण किया, जहाँ हर वर्ष 16 दिसम्बर को महान सैनिकों की याद में उत्सव मनाया जाता है। हर वर्ष आश्विन और चै‍त्र नवरात्र में यहाँ विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। अपनी दिनों दिन बढ़ती प्रसिद्धि के कारण तनोट एक पर्यटन स्थल के रूपमें भी प्रसिद्ध होता जा रहा है।

इतिहास: मंदिर के वर्तमान पुजारी सीसुब में हेड काँस्टेबल कमलेश्वर मिश्रा ने मंदिर के इतिहास के बारे में बताया कि बहुत पहले मामडिया नाम के एक चारण थे। उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्त करने की लालसा में उन्होंने हिंगलाज शक्तिपीठ की सात बार पैदल यात्रा की। एक बार माता ने स्वप्न में आकर उनकी इच्छा पूछी तो चारण ने कहा कि आप मेरे यहाँ जन्म लें। माता कि कृपा से चारण के यहाँ 7 पुत्रियों और एक पुत्र ने जन्म लिया। उन्हीं सात पुत्रियों में से एक आवड़ ने विक्रम संवत 808 में चारण के यहाँ जन्म लिया और अपने चमत्कार दिखाना शुरू किया।सातों पुत्रियाँ देवीय चमत्कारों से युक्त थी। उन्होंने हूणों के आक्रमण से माड़ प्रदेश की रक्षा की।
काँस्टेबल कालिकांत सिन्हा जो तनोट चौकी पर पिछले चार साल से पदस्थ हैं कहते हैं कि माता बहुत शक्तिशाली है और मेरी हर मनोकामना पूर्ण करती है। हमारे सिर पर हमेशा माता की कृपा बनी रहती है। दुश्मन हमारा बाल भी बाँका नहीं कर सकता है।
माड़ प्रदेश में आवड़ माता की कृपा से भाटी राजपूतों का सुदृढ़ राज्य स्थापित हो गया। राजा तणुराव भाटी ने इस स्थान को अपनी राजधानी बनाया और आवड़ माता को स्वर्ण सिंहासन भेंट किया। विक्रम संवत 828 ईस्वी में आवड़ माता ने अपने भौतिक शरीर के रहते हुए यहाँ अपनी स्थापना की।
      विक्रम संवत 999 में सातों बहनों ने तणुराव के पौत्र सिद्ध देवराज, भक्तों, ब्राह्मणों, चारणों, राजपूतों और माड़ प्रदेश के अन्य लोगों को बुलाकर कहा कि आप सभी लोग सुख शांति से आनंद पूर्वक अपना जीवन बिता रहे हैं अत: हमारे अवतार लेने का उद्देश्य पूर्ण हुआ। इतना कहकर सभी बहनों ने पश्चिम में हिंगलाज माता की ओर देखते हुए अदृश्य हो गईं। पहले माता की पूजा साकल दीपी ब्राह्मण किया करते थे। 1965 से माता की पूजा सीसुब द्वारा नियुक्त पुजारी करता है।

गुरु नानक देव : सिखों के प्रथम गुरु



गुरु नानक देव
गुरू नानक देव, सिखों के प्रथम गुरु (आदि गुरु) हैं। इनके अनुयायी इन्हें गुरु नानक, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं। गुरु नानक अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्मसुधारक, समाजसुधारक, कवि, देशभक्त और विश्वबंधु - सभी के गुण समेटे हुए थे। इनका जन्म रावी नदी के किनारे स्थित तिलौंडा तलवंडी (पंजाब) नामक गाँव में (आधुनिक रायपुर) संवत् १५२७ में कार्तिकी पूर्णिमा (१५ अप्रैल, १४६९) को एक खत्री कुल एवं बेदी वंश में हुआ था । इनके पिता का नाम कल्यानचंद या कालू था । तलवंडी का नाम आगे चलकर नानक के नाम पर ननकाना पड़ गया। बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन ही से ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे । ७-८ साल की उम्र में स्कूल छूट गया और सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे। इनका विवाह सोलह वर्ष की अवस्था में गुरुदासपुर जिले के अंतर्गत लाखौकी नामक स्थान के रहनेवाले मूला की कन्या सुलक्ष्मी से हुआ था । ३२ वर्ष की अवस्था में इनके प्रथम पुत्र हरीचंद्र का जन्म हुआ । चार वर्ष पीछे दूसरे पुत्र लखमीदास का जन्म हुआ । गुरु नानक नित्य प्रात: बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे। कहते हैं कि एक दिन वे स्नान करने के पश्चात वन में अन्तर्धान हो गये। उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। परमात्मा ने उन्हें अमृत पिलाया और कहा- मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ, मैंने तुम्हें आनन्दित किया है। जो तुम्हारे सम्पर्क में आयेगें, वे भी आनन्दित होगें। जाओ नाम में रहो, दान दो, उपासना करो, स्वयं नाम लो और दूसरों से भी नाम स्मरण कराओं। इस घटना के पश्चात वे अपने परिवार का भार अपने श्वसुर मूला को सौंपकर विचरण करने निकल पड़े और धर्म का प्रचार करने लगे। मरदाना उनकी यात्रा में बराबर उनके साथ रहा। ये चारों ओर घूमकर उपदेश करने लगे । १५२१ तक इन्होंने तीन यात्राचक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य मुख्य स्थानों का भ्रमण किया।

क्रन्तिकारी तात्याटोपे को फांसी नहीं लगी थी






*** 1857 की क्रांति के महानायक तात्या टोपे ***

1857 की क्रांति के इस महानायक तांत्या टोपे का जन्म, 1814 में हुआ था। बचपन से ही ये अत्यंत सुंदर थे। तांत्या टोपे ने देश की आजादी के लिये हंसते-हंसते प्राणो का त्याग कर दिया। इनका जन्म स्थल नासीक था। इनके बचपन का नाम रघुनाथ पंत था। ये जन्म से ही बुद्धिमान थे। इनके पिता का नाम पांडुरंग पंत था। जब रघुनाथ छोटे थे उस समय मराठों पर पेशवा बाजीराव द्वितीय का शासन था। रघु के पिता बाजी राव के दरबार में कार्यरत थे। कई बार बालक रघु अपने पिता के साथ दरबार में जाते थे। एक बार बाजी राव बालक की बुद्धिमानी देखकर बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने बालक को एक टोपी उपहार में दी और उन्होंने उनको तांत्या टोपे नाम दिया। उसी दिन से लोग इन्हें इसी नाम से पुकारने लगे।
उस समय ब्रितानी भारत में व्यापार करने के लिये आए थे। लेकिन भारत के राजा आपसी फ़ूट के कारण आपस में ही झगड़ा किया करते थे इसलिये फ़िरंगी आसानी से यहां अपने पैर जमा पाए और तानाशाही कर पाए। ब्रितानियों ने बाजी राव पेशवा की सम्पत्ति हड़प ली व उनकी राजधानी को अपने अधिकार में ले लिया व उसके बदले में उन्हें 8 लाख रुपये दे दिये। बाजी राव ने उनकी तानाशाही मान ली और वहां से कानपुर चले गये। कई मराठा भी उनके साथ चले गये। उनके साथ पांडुराव व उनका परिवार भी चला गया लेकिन सभी में क्रांति की लहर दौड़ गयी। कुछ समय बाद बाजीराव पेशवा की मृत्यु हो गई। उनकी जगह नाना साहब को पेशवा बनाया गया, ये बहुत बहादुर थे। नाना साहब तांत्या टोपे के मित्र व सलाहकार थे।
    कानपुर में झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, तांत्या टोपे, नाना साहब ने क्रांति की लहर फ़ैलाई। इन सबने युद्ध किया। तांत्या टोपे को भी युद्ध विद्या का प्रशिक्षण दिया गया। इस समय लार्ड डलहौजी गवर्नर जनरल था। उसने मराठों से उनकी जमीन छीन ली व उन पर अपना धर्म अपनाने के लिये दबाव ड़ाला, लेकिन नाना साहब, कुंवर सिंह, लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे जैसे धर्मनिष्ठ व स्वतंत्रता प्रिय लोगों ने उनका विरोध किया व उनसे युद्ध करने को आमादा हो गए। लेकिन ब्रिटिश सरकार की सेना सशक्त्त थी व उनके पास घातक हथियार व गोला बारुद था जो भारतीयों के पास नहीं था, लेकिन मराठों ने हार नहीं मानी व साहस से उनका सामना किया। फ़लस्वरू प प्रबल सैन्य शक्ति के कारण मराठा उनका सामना अधिक समय तक नहीं कर पाये लेकिन उन्होंने कई ब्रितानियों को मौत के घाट उतार दिया व कई लोग आजादी के लिये वीर गति को प्राप्त हो गये। तात्या टोपे न पकड़े गये न फाँसी लगी |
रचनाकार : टी.आर.शर्मा
संदर्भ - पाथेय कण (हिंदी पत्रिका)
दिनांक 16 अप्रैल (संयुक्तांक) 2007,
अंक : 1, पेज न. 82
1857 के स्वातंत्र्य समर के सूत्रधारो में तात्या टोपे का महत्वपूर्ण स्थान है। वे क्रांति के योजक नाना साहब पेशवा के निकट सहयोगी और प्रमुख सलाहकार थे। वे एक ऐसे सेना-नायक थे जो ब्रिटिश सत्ता की लाख कोशिशों के पश्चात भी उनके कब्जे में नहीं आए। इनको पकड़ने के लिए अंग्रेज सेना के 14-15 वरिष्ठ सेनाधिकारी तथा उनकी 8 सेनाएं 10 माह तक भरसक प्रयत्न करती रहीं, परन्तु असफल रहीं। इस दौरान कई स्थानों पर उनकी तात्या से मुठभेड़ें हुई परन्तु तात्या उनसे संघर्ष करते हुए उनकी आँखों में धूल झोंककर सुरक्षित निकल जाते।
महत्त्वपूर्ण दस्तावेज
उनको हुई कथित फाँसी के सम्बन्ध में तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने दस्तावेज तथा समकालीन कुछ अंग्रेज लेखक तथा बाद में वीर सावरकर, वरिष्ठ इतिहासकार आर. सी. मजूमदार व सुरेन्द्र नाथ सेन ने अपने ग्रंथों में तात्या टोपे को 7 अप्रैल, 1859 में पाड़ौन (नवरवर) राज्य के जंगल से, उस राज्य के राजा मानसिंह द्वारा विश्वासघात कर पकड़वाना बताया है। 18 अप्रैल, 1859 को शिवपुरी में उनको फाँसी देने की बात भी लिखी गई है। कुछ समय पूर्व तक यही इतिहास का सत्य माना जाता रहा है। परन्तु गत 40-50 वर्षो में कुछ लेखकों व इतिहासकारों ने परिश्रम पूर्वक अन्वेषण कर अपने परिपुष्ट तथ्यों व साक्ष्यों के आधार पर इस पूर्व ऐतिहासिक अवधारणा को बदल दिया है।
"तात्या टोपे के कथित फाँसी - दस्तावेज क्या कहते हैं" नाम छोटी परन्तु महत्वपूर्ण पुस्तक के रचियता गजेन्द्र सिंह सोलंकी तथा च् तात्या टोपे छ नामक ग्रंथ के लेखक श्री निवास बाला जी हर्डीकर ऐसे लेखको में अग्रणी हैं। दोनों ही लेखक इस पर सहमत हैं कि 18 अप्रैल को शिवपुरी में जिस व्यक्ति को फांसी लगी थी वह तात्या नहीं थे बल्कि वह तात्या के साथी नारायण राव भागवत थे। इनका कहना है कि राजा मानसिंह तात्या के मित्र थे। उन्होंने योजनापूर्वक नारायण राव भागवत को अंग्रेजों के हवाले किया और तात्या को वहाँ से निकालने में मदद की। जिन दो पंडितों का उल्लेख अंग्रेज लेखकों तथा भारतीय इतिहासकारों ने घोड़ो पर बैठकर भाग जाने का किया है, वे और कोई नहीं, तात्या टोपे और पं. गोविन्द राव थे जो अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंककर निकल गए।
वे मेरे बाबा थे |
राजा मानसिहं स्वयं अंग्रेजों के शत्रु थे और उनसे बचने के लिए, छिपकर पाडौन के जंगलों में रह-रहे थे। अंग्रेजों ने चालाकी से उनके घर की महिलाओ को बंदी बना दिया और उनको छोड़ने की शर्त जो अंग्रेजों ने रखी थी वह थी मानसिंह द्वारा समर्पण करना तथा तात्या को पकड़ने में मदद करना। यह बात तात्या को पकड़ने वाले प्रभारी अंग्रेज मेजर मीड ने स्वयं अपने पत्र में लिखी है। इस शर्त के बाद तात्या टोपे तथा राजा मानसिंह ने गम्भीर विचार विमर्श कर योजना बनाई, जिसके तहत मानसिंह का समर्पण उनके परिवार की महिलाओं का छुटकारा तथा कथित तात्या की गिरफ्तारी की घटनाएं अस्तित्व में आई।
इसमें ध्यान देने की बात यह है कि जिसको स्वयं मेजर मीड ने भी लिखा है कि तात्या को पकड़ने के लिए राजा मानसिंह ने अपने ऊपर जिम्मेदारी ली थी। यह तात्या को पकड़ने की एक शर्त थी, जिसे अंग्रेज सरकार ने (मेजर मीड के द्वारा) स्वीकार किया था। वास्तव में यह राजा मानसिंह व तात्या की एक चाल थी।
नारायण राव भागवत को लगी फाँसी के सम्बन्ध में जो एक महत्वपूर्ण तथ्य दोनों लेखकों के सामने आया, उसका उल्लेख उन दोनों ने इस प्रकार किया है- 'बचपन में नारायण राव (तात्या के भतीजे) ग्वालियर में जनकंगज के स्कूल में पढ़ते थे, उस समय स्कूल के प्राधानाचार्य रघुनाथराव भागवत नाम के एक सज्जन थे। एक दिन रघुनाथ राव ने बालक नारायणराव को भावना पूर्ण स्वर में बताया कि "तुम्हारे चाचा फाँसी पर नहीं चढ़ाए गए थे। उनकी जगह फाँसी पर लटकाये जाने वाले व्यक्ति मेरे बाबा थे।" दोनों लेखकों के अनुसार उन्होंने स्वयं भी रघुनाथराव भागवत के बाबा को हुई फाँसी की बात का अनुमोदन उनके पौत्र रघुनाथराव के प्राप्त किया।'
चिट्ठियों के साख्य
"तात्या टोपे की कथित फाँसी दस्तावेज क्या कहते हैं?" पुस्तक के लेखक गजेन्द्र सिंह सोलंकी स्वयं राजा मानसिंह के प्रपौत्र राजा गंगासिंह से उनके निवास पर मिले थे। जब राजा मानसिंह के कथित विश्वासघात की बात हुई तो उन्होंने इस बात को झूठा बताया। आग्रह करने पर उन्होंने लेखक को उनके पास पड़ा पुराना बस्ता खोलकर उसमें पड़े कई पत्र और दस्तावेज खोलकर दिखाए। जिसमें दो और पत्र थे जो तात्या जी की कथित फाँसी के बाद तात्या को लिखे गए थे।
संवत् 1917 (सन् 1960) में लिखी चिट्ठी का नमूना लेखक ने अपनी पुस्तक के पृष्ठ 54 पर इस प्रकार दिया है-
"सिद्धे श्री राजे मान्य राजे श्री महाराज तांतिया साहिब पांडुरंग जी एतैसिद्ध श्री महाराजधिराज श्री राजा नूपसिंह जू देव बहादुर की राम-राम बांचने। आगे आपकी कृपा से भले हैं। आगे हम मुआने आइके राठ में पो होचे आपु के पास पौचत है इस वास्ते इतल करौ है आप के मोरचा लगै है जिसमे हमको कोई रास्ता मैं रोके नहीं जादा, शुभ मिती फागुन सुदी 6 सं. 1917"
इस पत्र की मूल प्रति अभिलेखागार भोपाल में तात्या टोपे की पत्रावली में सुरक्षित है। यह चिट्ठी राजा नृपसिंह द्वारा तात्या को लिखी गई है। तात्या को कथित फाँसी संवत् 1919 (सन् 1859) में लगी थी।
इस प्रकार संवत् 1918 में लिखी दूसरी चिट्ठी महारानी लडई रानी जू के नाम है, जो राव माहोरकर ने लिखी है जिसमें तात्या के जिंदा रहने का सबूत है। इस पत्र की फोटो प्रति लेखक ने अपनी पुस्तक में दी है।
इसके अतिरिक्त 2 अन्य पत्रों के अंश भी उस्क पुस्तक में दिये गये हैं, जिसमें तात्या को सरदार नाम से सम्बोधित किया गया है। जिसमें पहला पत्र राजाराम प्रताप सिंह जू देव का लिखा हुआ है, जो तातिया को कथित फांसी के एक वर्ष दो माह बाद का लिखा हुआ है। यह पत्र राजा मानसिंह को सम्बोधित किया गया है।
दूसरा पत्र भी राजा मानसिंह को सम्बोधित है और वह पं. गोविन्दराव द्वारा कथित फाँसी के चार वर्ष बाद का लिखा हुआ है।
प्रथम पत्र के अंश- "आगे आपके उहां सिरदार हमराह पं. गोविन्दराव जी सकुशल विराजते हैं और उनके आगे तीरथ जाइवे के विचार है आप कोई बात की चिन्ता मन में नल्यावें...."
दूसरे पत्र का अंश- "अपरंच आपको खबर होवे के अब चिंता को कारण नहीं रहियो खत लाने वारा आपला विश्वासू आदमी है कुल खुलासे समाचार देहीगा सरदार की पशुपति यात्रा को खरच ही हीमदाद (इमदाद) खत लाइवे वारे के हाथ भिजवादवे की कृपा कराएवं में आवे मौका मिले में खुसी के समाचार देहोगे।"
पाठकों को ज्ञात हो कि कालपी का युद्ध सरदार (तात्या) के नेतृत्व में लड़ा गया था। उसे सरदार घोषित किया गया था। जो बस्ता टीकमगढ़ से प्राप्त हुआ है उसमें भी तात्या को सरदार सम्बोधित किया गया है। इन दोनों चिट्टियों को राजा मानसिंह के प्रपौत्र राजा गंगासिंह ने पहली बार सन् 1969 में घ् धर्म युग ' में प्रकाशित कराया था। प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डॉ. मथुरालाल शर्मा ने इन पत्रों की अनुकृतियों को देखकर प्रसन्नता प्रकट की तथा इसे सही घोषित करते हुए शोध के लिए उपयोगी बताया था।
तात्या के परिवार के सदस्य तात्या को फाँसी हुई नहीं मानते-
तात्या टोपे के परिवार के सदस्यों का भी यही कहना है कि उनको अंग्रेजों द्वारा फाँसी नहीं दी गई तथा उनकी मृत्यु बाद में हुई। इस सम्बन्ध में उपरोक्त दोनों लेखकों ने तात्या के परिवार के सदस्यों से हुई वार्ता का उपनी पुस्तकों में इस प्रकार उल्लेख किया है-
1.बम्बई में 1857 के शताब्दी समारोह में तात्या टोपे के भतीजे प्रो. टोप तथा तात्या की भतीजी का सम्मान किया गया। अपने सम्मान का उत्तर देते हुए दोनों ने बताया कि तात्या को फाँसी नहीं हुई। उनका कहना था कि उनकी मृत्यु सन् 1909 ई. में हुई। तभी उनके विधिवत् संस्कार आदि किये गए थे।
2.तात्या के वंशज आज भी ब्रह्मावर्त (बिठूर) तथा ग्वालियर में रहते है। इन परिवारों का विश्वास है कि तात्या की मृत्यु फाँसी के तख्ते पर नहीं हुई। ब्रह्मावर्त में रहने वाले तात्या के भतीजे श्री नारायण लक्ष्मण टोपे तथा तात्या की भतीजी गंगूबाई (सन् 1966 में इनकी मृत्यु हो चुकी है) का कथन है कि वे बालपन से अपने कुटुम्बियों से सुनते आये हैं कि तात्या की कथित फाँसी के बाद भी तात्या अक्सर विभिन्न वेशों में, अपने कुटुम्बियों से आकर मिलते रहते थे। तात्या के पिता पांडुरंग तात्या 27 अगस्त 1859 को ग्वालियर के किले से, जहाँ वह अपने परिवार के साथ नजरबंद थे, मुक्त किये गए। मुक्त होने पर टोपे कुटुम्ब पुनः ब्रह्मावर्त वापिस आया। उस समय पांडुरंग (तात्या के पिता) के पास न पैसा था और न कोई मित्र था। इस संकट काल में तात्या वेश बदलकर अपने पिता से आकर मिले थे तथा घन देकर सहायता की थी।
3.सन् 1861 इं. में तात्या की सौतेली बहन (दूसरी माँ से) दुर्गा का विवाह काशी के खुर्देकर परिवार में हुआ था। श्रीनारायण राव टोपे का कथन है कि इस अवसर पर भी तात्या गुप्तवेश में उपस्थित हुए थे तथा उन्होंने विवाह के लिए आर्थिक सहायता की थी।
4.तात्या के पिता तथा उसकी सौतेली माता का कुछ ही महीने के अन्तर पर सन् 1862 में काशी में देहावसान हुआ। टोपे परिवार के लोगों का कहना है कि इस समय भी तात्या सन्यासी के वेश में अपने माता-पिता की मृत्यु-शय्या के पास उपस्थित थे।
5.ग्वालियर में रहने वाले श्री शंकर लक्ष्मण टोपे का कथन है कि जब वे 13 वर्ष के थे तो एक बार उनके पिता (तात्या के सौतेले भाई) बीमार हुए। उन्हें देखने के लिए एक संन्यासी आये। मेरे पिता ने मुझे बुलवाया और कहा कि ये तात्या हैं इन्हें प्रमाण करो। इस समय शंकर की आयु कोई 75 वर्ष की है। इनके अनुसार यह घटना सन् 1895 ई. के आस-पास की है अर्थात् तात्या की कथित फाँसी के 36 वर्ष बाद की।
ऐतिहासिक साक्ष्य
नजरबंदी से मुक्त होने के बाद तात्या के भाइयों को आर्थिक संकट के कारण जीविका की खोज में इधर-उधर भटकना पड़ा। उनके एक भाई रामकृष्ण 1862 ई. में बडौदा के महाराजा गायकवाड़ के पास पहुँचा। उनको उसने परिचय दिया मैं तात्या का भाई हूँ तथा नौकरी की खोज में यहाँ आया हूँ। महाराजा ने उसे गिरफ्तार कर उसे वहाँ के अंग्रेज रेजीडैंट को सौंप दिया। उसने राम कृष्ण से अनेक प्रश्न किये। उनमें एक प्रश्न यह भी था कि, "आजकल तात्या टोपे कहां पर हैं?" तात्या की कथित फाँसी के 3 वर्ष बाद एक जिम्मेदार अंग्रेज अफसर द्वारा ऐसा प्रश्न करना आश्चर्यजनक और संदेहास्पद था। रामकृष्ण ने इसके उत्तर में तात्या के बारे में मालूम न होने की बात कही।
इस ऐतिहासिक घटना का उल्लेख " सोर्समेटेरियल फॉर द हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूवनमेन्ट इन इंडिया। (बोम्बे गवर्नमेन्ट रिकॉर्ड्स) वाल्युम 1 पी. पी. 231-237 पर अंकित है।"
यह प्रश्न राव साहब पेशवा पर चले मुकदमे (1862 में) के दौरान भी उनसे पूछा गया था, जो राव साहब की केस की मूल पत्रावली (फाईल) में अंकित है। तात्या के सम्बन्ध में उक्त प्रश्न उनकी फाँसी पर अंग्रेजों में व्याप्त संदेह को प्रकट करते हैं।
इतिहास की इस नई जानकारी के पक्ष में और भी कई तथ्य उक्त पुस्तकों में दिये गए हैं, जिनमें कुछ इस प्रकार हैं- पद्म स्व. डॉ. वाकणकर का कहना था कि अम्बाजी का प्रसिद्ध मंदिर तात्या टोपे द्वारा बनवाया गया। उस मंदिर के एक कोने में जो साधु वेश में चित्र लगा है, वह तात्या टोपे का ही है। गुजरात में नवसारी क्षेत्र में साधुवेश में उनकी प्रतिष्ठा चर्चित है।
बीकानेर के पुरालेखागार में 1857 के फरारशुदा लोगों की सूची में तात्या का भी नाम है। झांसी से प्रसारित एक भेंट वार्ता में तात्या के बच निकलने व उनकी मृत्यु के अनेक प्रसंग छपे हैं।
तात्या के मुकदमे में जो अत्यधिक शीघ्रता की गई उससे यह संदेह होने लगता है कि इस जल्दी की आड़ में सरकार कोई न काई बात छिपाने की कोशिश कर रही थी।
तात्या के हस्ताक्षर नहीं
ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार तात्या टोपे के स्थान पर पकड़ गए व्यक्ति को जल्दी से जल्दी फाँसी पर लटकाकर छुट्टी पाना चाहती थी। पाठकों को मालूम हो कि कथित तात्या को 7 अप्रैल, 1859 को पड़ौन के जंगलों से पकड़ा गया। 15 अप्रैल 1859 को सैनिक अदालत में मुकदमा चलाया गया। उसी दिन फैसला सुनाकर 18 अप्रैल 1859 को सायंकाल फाँसी दे दी गई। शिवपुरी जहाँ उन्हें फाँसी दी गई वहाँ के विनायक ने अपनी गवाही में कहां कि में तात्या को नहीं पहचानता।
जो भी गवाह पेश किये गए वे सरलता पूर्वक अंग्रेज अफसरों द्वारा प्रभावित किये जा सकते थे। इनमे एक भी स्वतंत्र गवाह नहीं था। ब्रह्मवर्त (बिठूर) या कानपुर का एक भी गवाह नहीं था, जो तात्या को अच्छी तरह पहचानता हो।
फाँसी पर चढ़े तात्या टोपे ने अपने मुकदमे के बयान पर जो हस्ताक्षर किये वे मराठी भाषा की मोड़ी लिपि में इस प्रकार थे-"तात्या टोपे कामदार नाना साहब बहादुर" ये हस्ताक्षर फांसी पर चढ़े व्यक्ति ने अंग्रेजों को विश्वास दिलाने के लिए किये थे, क्योंकि अंग्रेज तात्या को इस नाम से पहचानते थे। महाराष्ट्र में हस्ताक्षर करने की जो पद्धति है उसमें सबसे पहले स्वयं का नाम, बाद में पिता का नाम तत्पश्चात् कुटुम्ब का नाम होता है। उसके अनुसार तात्या के हस्ताक्षर इस प्रकार होते- रामचन्द्र (तात्या का असलीनाम) पांडुरंग टोपे या रामचन्द्र राव या पंत टोपे। राव साहब पेशवा ने अपने मुकदमे के कागजों पर पांडुरंग राव ही हस्ताक्षर किये थे। उपरोक्त हस्ताक्षरों से स्पष्ट होता है कि वे तात्या के नहीं थे।

सोमवार, 26 नवंबर 2012

बालों का झड़ना बन्द : देशी चिकित्सा




बालों का बढ़ना
देशी  चिकित्सा :
1. अमरबेल : 250 ग्राम अमरबेल को लगभग 3 लीटर पानी में उबालें। जब पानी आधा रह जाये तो इसे उतार लें। सुबह इससे बालों को धोयें। इससे बाल
लंबे होते हैं।
2. त्रिफला : त्रिफला के 2 से 6 ग्राम चूर्ण में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग लौह भस्म मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से बालों का झड़ना बन्द हो जाता है।
3. कलौंजी : 50 ग्राम कलौंजी 1 लीटर पानी में उबाल लें। इस उबले हुए पानी से बालों को धोएं। इससे बाल 1 महीने में ही काफी लंबे हो जाते हैं।
4. नीम : नीम और बेर के पत्त
ों को पानी के साथ पीसकर सिर पर लगा लें और इसके 2-3 घण्टों के बाद बालों को धो डालें। इससे बालों का झड़ना कम हो जाता है और बाल लंबे भी होते हैं।
5. लहसुन : लहसुन का रस निकालकर सिर में लगाने से बाल उग आते हैं।
6. सीताफल : सीताफल के बीज और बेर के बीज के पत्ते बराबर मात्रा में लेकर पीसकर बालों की जड़ों में लगाएं। ऐसा करने से बाल लंबे हो जाते हैं।
7. आम : 10 ग्राम आम की गिरी को आंवले के रस में पीसकर बालों में लगाना चाहिए। इससे बाल लंबे और घुंघराले हो जाते हैं।
8. शिकाकाई : शिकाकाई और सूखे आंवले को 25-25 ग्राम लेकर थोड़ा-सा कूटकर इसके टुकड़े कर लें। इन टुकड़ों को 500 ग्राम पानी में रात को डालकर भिगो दें। सुबह इस पानी को कपड़े के साथ मसलकर छान लें और इससे सिर की मालिश करें। 10-20 मिनट बाद नहा लें। इस तरह शिकाकाई और आंवलों के पानी से सिर को धोकर और बालों के सूखने पर नारियल का तेल लगाने से बाल लंबे, मुलायम और चमकदार बन जाते हैं। गर्मियों में यह प्रयोग सही रहता है। इससे बाल सफेद नहीं होते अगर बाल सफेद हो भी जाते हैं तो वह काले हो जाते हैं।
9. मूली : आधी से 1 मूली रोजाना दोपहर में खाना-खाने के बाद, कालीमिर्च के साथ नमक लगाकर खाने से बालों का रंग साफ होता है और बाल लंबे भी हो जाते हैं। इसका प्रयोग 3-4 महीने तक लगातार करें। 1 महीने तक इसका सेवन करने से कब्ज, अफारा और अरुचि में आराम मिलता है।
नोट : मूली जिसके लिए फयदेमन्द हो वही इसका प्रयोग कर सकते हैं।
10. आंवला : सूखे आंवले और मेंहदी को समान मात्रा में लेकर शाम को पानी में भिगो दें। प्रात: इससे बालों को धोयें। इसका प्रयोग लगातार कई दिनों तक करने से बाल मुलायम और लंबे हो जायेंगे।
11. ककड़ी : ककड़ी में सिलिकन और सल्फर अधिक मात्रा में होता है जो बालों को बढ़ाते हैं। ककड़ी के रस से बालों को धोने से तथा ककड़ी, गाजर और पालक सबको मिलाकर रस पीने से बाल बढ़ते हैं। यदि यह सब उपलब्ध न हो तो जो भी मिले उसका रस मिलाकर पी लें। इस प्रयोग से नाखून गिरना भी बन्द हो जाता है।
12. रीठा
* कपूर कचरी 100 ग्राम, नागरमोथा 100 ग्राम, कपूर तथा रीठे के फल की गिरी 40-40 ग्राम, शिकाकाई 250 ग्राम और आंवले 200 ग्राम की मात्रा में लेकर सभी का चूर्ण तैयार कर लें। इस मिश्रण के 50 ग्राम चूर्ण में पानी मिलाकर लुग्दी (लेप) बनाकर बालों में लगाना चाहिए। इसके पश्चात् बालों को गरम पानी से खूब साफ कर लें। इससे सिर के अन्दर की जूं-लींकें मर जाती हैं और बाल मुलायम हो जाते हैं।
* रीठा, आंवला, सिकाकाई तीनों को मिलाने के बाद बाल धोने से बाल सिल्की, चमकदार, रूसी-रहित और घने हो जाते हैं।
13. गुड़हल : * गुड़हल के फूलों के रस को निकालकर सिर में डालने से बाल बढ़ते हैं।
* गुड़हल के पत्तों को पीसकर लुग्दी बना लें। इस लुग्दी को नहाने से 2 घंटे पहले बालों की जड़ों में मालिश करके लगायें। फिर नहायें और इसे साफ कर लें। इस प्रयोग को नियमित रूप से करते रहने से न केवल बालों को पोषण मिलेगा, बल्कि सिर में भी ठंड़क का अनुभव होगा।
* गुड़हल के पत्ते और फूलों को बराबर की मात्रा में लेकर पीसकर लेप तैयार करें। इस लेप को सोते समय बालों में लगाएं और सुबह धोयें। ऐसा कुछ दिनों तक नियमित रूप से करने से बाल स्वस्थ बने रहते हैं।
* गुड़हल के ताजे फूलों के रस में जैतून का तेल बराबर मिलाकर आग पर पकायें, जब जल का अंश उड़ जाये तो इसे शीशी में भरकर रख लें। रोजाना नहाने के बाद इसे बालों की जड़ों में मल-मलकर लगाना चाहिए। इससे बाल चमकीले होकर लंबे हो जाते हैं।
14. शांखपुष्पी : शांखपुष्पी से निर्मित तेल रोज लगाने से सफेद बाल काले हो जाते हैं।
15. भांगरा :
* बालों को छोटा करके उस स्थान पर जहां पर बाल न हों भांगरा के पत्तों के रस से मालिश करने से कुछ ही दिनों में अच्छे काले बाल निकलते हैं जिनके बाल टूटते हैं या दो मुंहे हो जाते हैं। उन्हें इस प्रयोग को अवश्य ही करना चाहिए।
* त्रिफला के चूर्ण को भांगरा के रस में 3 उबाल देकर अच्छी तरह से सुखाकर खरल यानी पीसकर रख लें। इसे प्रतिदिन सुबह के समय लगभग 2 ग्राम तक सेवन करने से बालों का सफेद होना बन्द जाता है तथा इससे आंखों की रोशनी भी बढ़ती है।
* आंवलों का मोटा चूर्ण करके, चीनी के मिट्टी के प्याले में रखकर ऊपर से भांगरा का इतना डाले कि आंवले उसमें डूब जाएं। फिर इसे खरलकर सुखा लेते हैं। इसी प्रकार 7 भावनाएं (उबाल) देकर सुखा लेते हैं। प्रतिदिन 3 ग्राम की मात्रा में ताजे पानी के साथ सेवन से करने से असमय ही बालों का सफेद होना बन्द जाता है। यह आंखों की रोशनी को बढ़ाने वाला, उम्र को बढ़ाने वाला लाभकारी योग है।
* भांगरा, त्रिफला, अनन्तमूल और आम की गुठली का मिश्रण तथा 10 ग्राम मण्डूर कल्क व आधा किलो तेल को एक लीटर पानी के साथ पकायें। जब केवल तेल शेष बचे तो इसे छानकर रख लें। इसके प्रयोग से बालों के सभी प्रकार के रोग मिट जाते हैं।

16. अनन्तमूल : अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण 2-2 ग्राम दिन में 3 बार पानी के साथ सेवन करने से सिर का गंजापन दूर होता है।
17. तिल :
* तिल के पौधे की जड़ और पत्तों के काढ़े से बालों को धोने से बालों पर काला रंग आने लगता है।
* काले तिलों के तेल को शुद्ध करके बालों में लगाने से बाल असमय में सफेद नहीं होते हैं। प्रतिदिन सिर में तिल के तेल की मालिश करने से बाल हमेशा मुलायम, काले और घने रहते हैं।
* तिल के फूल और गोक्षुर को बराबर मात्रा में लेकर घी और शहद में पीसकर लेप बना लें। इसे सिर पर लेप करने से गंजापन दूर होता है।
* तिल के तेल की मालिश करने के एक घंटे बाद एक तौलिया गर्म पानी में डुबोकर उसे निचोड़कर सिर पर लपेट लें तथा ठण्डा होने पर दोबारा गर्म पानी में डुबोकर निचोड़कर सिर पर लपेट लें। इस प्रकार 5 मिनट लपेटे रखें। फिर ठंड़े पानी से सिर को धो लें। ऐसा करने से बालों की रूसी दूर हो जाती है।
और अंत एक बात याद रखे !! किसी भी विदेशी कंपनी का कोई भी शैंपू का प्रयोग मत करे !!
ये clinic all clear,clinic plus, head and shoulder,dove,pantene सब विदेशी कंपनिया बनती है ! और बहुत ही खतरनाक कैमिकलों का प्रयोग करती है ! !! और हर 2 -3 महीने बाद एक ही शैंपू मे थोड़ा बदलाव कर उसका नाम बादल कर फिर बेचने लग जाती है !आपको मालूम है pantene से एक लड़की के सारे बाल झड़ गये !!और वो खबर अखबार मे भी आई है !!

कोटा,राजस्थान Kota,Rajasthan




                                                            कोटा जग मंदिर (छत्र बिलास तालाब )





                                                          कोटा सर्किट हॉउस 


कोटा,राजस्थान
भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
कोटा, जिसे पहले 'कोटाह' नाम से जाना जाता था, राजस्थान की राजधानी जयपुर से लगभग 246 किमी. दक्षिण में स्थित है। कोटा की पहचान चम्बल नदी से भी है। इस नदी पर कोटा में 'कोटा डैम' के नाम से एक बाँध का निर्माण भी हुआ है, जिससे बिजली के उत्पादन में मदद मिल सके।

व्यापारिक केंद्र:-
कोटा एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र है। साथ ही यह एक औद्योगिक नगरी भी है, यहाँ पर कॉटन टेक्सटाइल, केमिकल पावर प्लांट्स आदि कई उद्योग-धन्धे उपलब्ध है, जैसे - डी.सी.एम., सैमटेल, बिड़ला सीमेन्ट, श्रीराम फ़र्टिलाइजर आदि। इसे राजस्थान का 'पावर हाउस' भी कहा जाता है। यह शहर कोटा साड़ी के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। म्यूज़ियम, मन्दिर और पिकनिक स्पॉट से भरे इस शहर में अब मॉल भी खुल चुके हैं। गुमानपुरा और कोटरी रोड यहाँ के दो प्रमुख बाज़ार हैं। वर्तमान में यह एक शैक्षणिक नगरी के रूप में स्थापित हो चुका है। कोटा में यहाँ पर स्थित कोचिंग संस्थानों के कारण 'शैक्षणिक नगरी' का नाम मिला। इंजीनियरिंग और मेडिकल की परीक्षाओं में यहाँ के छात्रों को जितनी सफलता मिलती रही है, उतनी की कल्पना भी दूसरे शहर नहीं कर सकते।
इतिहास :-
इतिहास के पन्नों पर 12वीं सदी में भी कोटा की चर्चा है। 17वीं शताब्दी में मुग़ल शासक जहाँगीर के शासनकाल के दौरान बूँदी के राजा राव रतन सिंह ने कोटा का कुछ हिस्सा अपने बेटे माधो सिंह को दे दिया। तब से कोटा राजपूती सभ्यता व संस्कृति का प्रतीक बन गया। 1631 में शाहजहाँ द्वारा राव रतन सिंह के बेटे को कोटा का शासक घोषित कर दिया गया, तब से कोटा स्वतंत्र रूप से कार्य करने लगा। बाद में महाराव भीमसिंह ने कोटा के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
परिवहन :-
कोटा सड़क और रेल मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। दिल्ली, मुम्बई और भारत के अन्य शहरों से भी यह सड़क और रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है। यहाँ पर दो मुख्य बस स्टैण्ड -

    नयापुरा में राजस्थान रोडवेज की बस
    डी.सी.एम रोड पर इण्टर स्टेट बस टर्मिनल।

रेलवे द्वारा;-
सेन्ट्रल रेलवे का यह मुख्य जंक्शन है, जो दिल्ली - मुम्बई मुख्य रेलमार्ग पर स्थित है। इसलिए रेलमार्ग से भी यहाँ पहुँचना आसान है। 'मुम्बई राजधानी' सहित लगभग 100 ट्रेन यहाँ पर रुकती हैं। ,हवाई जहाज़ द्वारा कोटा का नज़दीकी बड़ा हवाई अड्डा जयपुर में है, जहाँ के लिए दिल्ली, मुम्बई, पुणे, इन्दौर, अहमदाबाद और देश के अन्य शहरों से उड़ानें उपलब्ध हैं।

शिक्षा---
कोटा में मुख्य रूप से तीन विश्वविद्यालय हैं :-
    1.राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी,
    2.कोटा यूनिवर्सिटी और
    3.वर्धमान महावीर ओपन यूनिवर्सिटी।

यहाँ पर विभिन्न इंजीनियरिंग, मेडिकल और अन्य सामान्य कॉलेज भी हैं। इसके अलावा राजस्थान सरकार ने यहाँ 'इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी' (आई.आई.आई.टी.) के निर्माण की भी घोषणा की है।
कोचिंग संस्थान :-
इन सबसे भी बढ़कर कोटा यहाँ का कोचिंग के लिए जाना जाता है। इंजीनियरिंग, मेडिकल और अन्य प्रतियोगी परिक्षाओं की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थानों के कारण ही पूरे भारत में कोटा की पहचान एक 'एजुकेशन हब' के रूप में हुई है। एलेन कैरियर इंस्टीट्यूट, कैरियर प्वॉइंट, बंसल क्लासेज, रेजोनेंस, मोशन आईआईटी-जेईई, वाइब्रेंट एकेडमी, राइज एकेडमी आदि कोंचिग संस्थान कोटा में इंजीनियरिंग और मेंडिकल की तैयारी में संलग्न हैं।


सैमटेल ग्लास लिमिटेड बंद (कलर पिक्चर ट्यूब्स) कोटा, राजस्थान




Published on 27 Nov-2012

कब क्या हुआ

परेशानी: श्रमिकों ने फर्नेश से छेड़छाड़ की शिकायत बोरखेड़ा पुलिस-प्रशासन से की, श्रमिकों का आंदोलन जारी
* 6 नवंबर से ग्लास फैक्ट्री में उत्पादन बंद
* 7 नवंबर को गैस की सप्लाई बंद होने के साथ ही कलर में उत्पाद ठप
* 8 नवंबर को फैक्ट्री की बिजली कटी, फैक्ट्री अंधेरे में डूबी
* 17 नवंबर की रात प्रोप्रिन गैस समाप्त होने से फर्नेश में लगे बर्नर बंद
* 20 नवंबर को डीजल खत्म होने से जनरेटर बंद
:- पीएफ कटा पर जमा नहीं
श्रमिकों का कहना है कि प्रबंधन ने उनका पीएफ काटा, लेकिन भविष्य निधि कार्यालय में जमा नहीं कराया। इसके लिए वे लगातार पीएफ कमिश्नर से संपर्क कर रहे हैं।
:- आज मशाल जुलूस
सेमटेल ग्लास एवं कलर के श्रमिकों को मंगलवार शाम को 6.00 बजे सेमटेल बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक क्रांति तिवारी के नेतृत्व में कोटड़ी चौराहे से लेकर एरोड्रम सर्किल, घोड़े वाला बाबा चौराहा होते हुए पुलिस कंट्रोल रूम तक मशाल जुलूस निकाला जाएगा।
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सेमटेल फैक्ट्री में असामाजिक तत्वों की घुसपैठ
भास्कर न्यूज , कोटा
सेमटेल फैक्ट्री में अंधेरे का फायदा उठाने के लिए अब असामाजिक तत्वों की घुसपैठ शुरू हो चुकी है। रविवार की रात को भी कुछ हथियार बंद असामाजिक तत्वों ने फैक्ट्री में फर्नेश से छेड़छाड़ की। श्रमिकों ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन पर हमले का प्रयास किया गया। इस मामले की शिकायत सेमटेल ग्लास एवं सेमटेल कलर के श्रमिकों ने सोमवार को बोरखेड़ा पुलिस एवं प्रशासन को दे दी है।
सेमटेल ग्लास वक्र्स समिति के अध्यक्ष मिलन शर्मा एवं कलर वक्र्स समिति के कृष्णदत्त द्विवेदी समेत 100 श्रमिकों ने हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन में बताया कि कलेक्टर एवं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को दिए ज्ञापन में कहा है कि सिक्युरिटी गार्डों ने उन्हें बताया कि कुछ असामाजिक तत्व फैक्ट्री की दीवार कूद कर अंदर घुस गए। उन्होंने फर्नेश से छेड़छाड़ की कोशिश की। इस मामले में श्रमिकों की ओर से एडीएम सिटी, एएसपी, संयुक्त श्रमायुक्त, कारखाना एवं बॉयलर इंस्पेक्टर एवं प्रबंधन को दी। इससे पहले भी 21 नवंबर की रात को इसी तरह का प्रयास हुआ। जिसकी सूचना प्रशासन को दी जा चुकी है। इसके बाद भी प्रबंधन वर्ग से कोई भी मौके पर नहीं पहुंचा। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि फैक्ट्री में किसी प्रकार की घटना होती है तो प्रबंधन वर्ग की होगी।
बोरखेड़ा पुलिस के थाना अधिकारी श्रीराम ने बताया कि श्रमिकों की ओर से उन्हें जो शिकायत दी है, उससे उच्च अधिकारियों को अवगत करा दिया गया है। यदि अधिकारी निर्देश देंगे तो फैक्ट्री की सुरक्षा के लिए पुलिस जाप्ता लगाया जा सकता है। संयुक्त श्रमायुक्त संतोष शर्मा ने बताया कि इस मामले में श्रमिकों की ओर से उनके पास शिकायत आई है। उधर, मैनेजमेंट की ओर से फैक्ट्री में मौजूद सामानों की एक सूची उन्हें सौंपी गई है।
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वीडियोकॉन का सेमटेल शुरू करने से इंकार
भास्कर न्यूज - कोटा
बारां रोड स्थित पिक्चर ट्यूब बनाने वाली सेमटेल की बंद फैक्ट्री को वीडियोकॉन कंपनी ने चलाने से साफ इंकार कर दिया है। यदि खुद सेमटेल के चेयरमैन सतीश कोरा भी चलाना चाहें तो 125 करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी।
वीडियोकॉन के सीनियर फाइनेंशियल एडवाइजर संजीव राठी ने भास्कर को बताया कि फैक्ट्री में सबसे महत्वपूर्ण फर्नेश होता है। एक बार फर्नेस ठंडा होने के बाद वह जम जाता है। जमने के बाद उसे किसी भी हालत में काम नहीं लिया जा सकता, बल्कि पूरी भट्टी इसके लिए दुबारा बनानी पड़ती है। जिस पर 70 करोड़ रुपए की लागत आती है। उन्होंने बताया कि प्रबंधन यदि तकनीकी तरीके से बंद करता तो फर्नेस नहीं जमता, तब फिर से चालू करने में इतना खर्चा नहीं आता।उन्होंने बताया कि फैक्ट्री को रनिंग में लाने के लिए तीन महीने का रॉ मेटेरियल एवं अन्य खर्चों के लिए कम से 50 करोड़ रुपए की वर्किंग केपिटल चाहिए।
यानी 125 करोड़ रुपए की व्यवस्था हो तो फैक्ट्री चल सकती है। सेमटेल कंपनी पिक्चर ट्यूब का फनल बनाती है। आगे का पैनल हिन्दुस्तान में एक मात्र वीडियोकॉन कंपनी बनाती है। बिना इसके फनल का कोई उपयोग नहीं है।

वीडियोकॉन का जापान से टाईअप
राठी ने बताया कि सेमटेल और वीडियोकॉन के बीच पिछले दिनों एमओयू समाप्त होने के बाद हमारी कंपनी ने जापान की कंपनी से पिक्चर ट्यूब का फनल मंगाने का टाईअप कर लिया है, इसलिए अब कोटा की सेमटेल को चलाने के लिए न तो फाइनेंस होगा और न किसी कीमत पर चलाया जाएगा। सीनियर फाइनेंशियल एडवाइजर राठी ने बताया कि पुरानी डिजायन की पिक्चर ट्यूब वाली टीवी की भारत के अलावा, थाइलैंड, इंडोनेशिया, चाइना, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, टर्की, साउथ अफ्रीका, बांग्लादेश, श्रीलंका एवं नेपाल आदि देशों में अभी भी मांग है। अगले पांच साल तो इसका मार्केट है। इसी संभावना को देखते हुए उन्होंने सेमटेल के साथ टाईअप किया था।
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कलर पिक्चर ट्यूब के आयात पर लगेगा विशेष कर
31 Mar 2009,
http://hindi.economictimes.indiatimes.com
नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने कलर पिक्चर ट्यूब बनाने वाली सैमटेल और जीसीटी जैसी घरेलू कंपनियों को राहत देने के लिए इंडोनेशिया से आयात की जाने वाली कलर पिक्चर ट्यूब्स पर विशेष कर लगाया है। जानकारों का कहना है कि सरकार के इस कदम से मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को तो राहत मिलेगी, लेकिन उपभोक्ताओं को कलर टेलीविजन खरीदने में पहले की तुलना में ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ेंगे।
कलर टेलीविजन बनाने वाली एलजी और ओनिडा जैसी कंपनियां पिक्चर ट्यूब आयात करती हैं। कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक एंड अप्लायंसेज मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के महासचिव सुरेश खन्ना ने बताया, 'कलर पिक्चर ट्यूब्स के आयात पर विशेष प्रकार का कर लगाए जाने के बाद टीवी की कीमतों में तेजी आएगी, क्योंकि टेलीविजन की कुल लागत में पिक्चर ट्यूब की अहम हिस्सेदारी होती है।'
जानकारों का कहना है कि पिक्चर ट्यूब की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी से टेलीविजन की कीमतों पर इसका असर पड़ता है, क्योंकि टेलीविजन की लागत में इसकी हिस्सेदारी 40-45 फीसदी होती है। सुरेश खन्ना ने कहा कि भारतीय कलर पिक्चर ट्यूब इंडस्ट्री की मासिक क्षमता दस लाख से काफी कम है, जबकि टीवी बाजार में हर महीने दस लाख से अधिक टेलीविजन सेट तैयार किए जाते हैं। पिक्चर ट्यूब्स की इस कमी को पूरा करने के लिए पिक्चर ट्यूब का आयात किया जाता है। स्पेशल ड्यूटी को एंटी डंपिंग ड्यूटी भी कहा जाता है और यह एक प्रकार का अतिरिक्त कर है।
जब किसी से किसी उत्पाद का निर्यात सस्ते दामों पर किया जाता है, तो आयातक देश अपने यहां यह विशेष कर लगाता है। इस कर को लगाने का मकसद स्थानीय उत्पादकों के हितों की रक्षा करना और दूसरे मुल्कों से होने वाली डंपिंग को रोकना है। अप्रत्यक्ष कर से जुड़े मामलों को देखने वाली शीर्ष संस्था सेंट्रल बोर्ड ऑफ एक्साइज एंड कस्टम ने कहा कि कलर पिक्चर ट्यूब्स के दूसरे मुल्कों से होने वाले आयात के कारण घरेलू इंडस्ट्री का नुकसान पहुंच रहा है, जिसकी वजह से इसके आयात पर विशेष शुल्क लगाया जा रहा है। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ एंटी डंपिंग एंड एलाइड ड्यूटीज की सिफारिशों के बाद ही यह विशेष कर लगाया गया है।
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सेमकोर ग्लास फैक्ट्री कोटा राजस्थान
रंग पिक्चर ट्यूब घटकों और
सैमटेल कलर लिमिटेड रंग पिक्चर ट्यूब
SAMTEL ग्लास लिमिटेड    
रंग पिक्चर ट्यूब
CPT ग्लास, एविओनिक्स ग्लास,ऑटोमोटिव ग्लास,इलेक्ट्रॉन बंदूकें,विक्षेपन Yokes
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Samtel India Limited, MMD

Samtel Color Limited, Ghaziabad
Teletube Electronics Limited, Ghaziabad
Samtel India Limited, Bhiwadi
Samtel Color Limited, Ghaziabad
Samcor Glass Limited, Kota
Samtel Electron Devices, (EG Div.) Parwanoo
Samtel India Limited, (DY Div.) Parwanoo
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Samtel Color Limited [CPT division]
Incorporated in 1987 Samtel Color Manufactures 14", 20", 21" ( F&FST ) Color Picture Tubes. The unit has two operational lines manufacturing 21" (FST and F&FST ), 20" and 14" Color Picture Tubes for exports as well as the domestic market. The installed capacity at present is 3.3 million tubes per annum.
Samtel Color is the Largest exporter of Color Picture Tubes from India and has been successfully exporting to various countries in Europe & South East Asia.

The company has received safety approvals from UL, CSA, VDE & BSI for it's products.
Towards its commitment of creating a world class quality organization, the company has launched its SIX SIGMA initiatives.

Samtel Color Limited
Factory Village Chhapraula, Bulandshaher Road,
Distt. Gautam Budh Nagar (U.P.)
Phone : (0120)-4674510, 4674512 to 4674518.

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Samcor Glass Limited
Incorporated in 1987 Samcor is a 50:50 joint venture between Corning Incorporated, USA and Samtel Group to manufacture glass for TV and display tubes. The commercial operations started in 1998 with the commissioning of a USD 70 million B&W glass plant with a capacity of 5.5 million sets of 14" parts per annum. Samsung Corning was the engineering contractor for the facility.

Samcor has a 2-phased strategy to manufacture color glass. In the first phase the existing facility was upgraded to manufacture 4.8 million color funnels per annum with an investment of Rs. 120 Crores.
Simultaneous manufacture of B&W glass will continue for 4 to 6 months every year till economically viable. In the second phase, Samcor will invest approximately Rs. 450 Crores to manufacture panels for Color TV picture tubes. On completion of all phases of expansion and after Samcor switches to 100% glass for CPTs, it will have a capacity of approximately 9 million sets of parts (Panels & Funnels).

Samcor Glass Limited
Village Naya Nohra, Kota-Baran Road, Kota
Rajasthan
Phone : (0744) 450150, 450151, 450153, 450156
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Samtel firsts

    1st to introduce Digital Color Monitor in India.

    1st to launch 12", 14" and 17" Black & White picture tubes in India.

    1st to launch 14" and 21" FST tubes in India.

    1st to launch Mono Display Tubes in India.

    1st to assemble and seal glass shells in India.

    1st to offer the largest range of 14", 21" FST and 21" F&FST colour picture tubes in India.

    1st to establish itself as the largest regular exporter of tubes.

    1st to manufacture specialty tubes for industrial, military and medical applications, from the private sector.

रविवार, 25 नवंबर 2012

सूर्य-नमस्कार : सर्वांग व्‍यायाम






सूर्य नमस्‍कार की विधि और मंत्र

सूर्य-नमस्कार को सर्वांग व्‍यायाम भी कहा जाता है, समस्त यौगिक क्रियाऒं की भाँति सूर्य-नमस्कार के लिये भी प्रातः काल सूर्योदय का समय सर्वोत्तम माना गया है। सूर्यनमस्कार सदैव खुली हवादार जगह पर कम्बल का आसन बिछा खाली पेट अभ्यास करना चाहिये।इससे मन शान्त और प्रसन्न हो तो ही योग का सम्पूर्ण प्रभाव मिलता है।
प्रथम स्थिति- स्थितप्रार्थनासन
सूर्य-नमस्कार की प्रथम स्थिति स्
थितप्रार्थनासन की है।सावधान की मुद्रा में खडे हो जायें।अब दोनों हथेलियों को परस्पर जोडकर प्रणाम की मुद्रा में हृदय पर रख लें।दोनों हाथों की अँगुलियाँ परस्पर सटी हों और अँगूठा छाती से चिपका हुआ हो। इस स्थिति में आपकी केहुनियाँ सामने की ऒर बाहर निकल आएँगी।अब आँखें बन्द कर दोनों हथेलियों का पारस्परिक दबाव बढाएँ । श्वास-प्रक्रिया निर्बाध चलने दें।
द्वितीय स्थिति - हस्तोत्तानासन या अर्द्धचन्द्रासन
प्रथम स्थिति में जुडी हुई हथेलियों को खोलते हुए ऊपर की ऒर तानें तथा साँस भरते हुए कमर को पीछे की ऒर मोडें।गर्दन तथा रीढ की हड्डियों पर पडने वाले तनाव को महसूस करें।अपनी क्षमता के अनुसार ही पीछे झुकें और यथासाध्य ही कुम्भक करते हुए झुके रहें ।

तृतीय स्थिति - हस्तपादासन या पादहस्तासन
दूसरी स्थिति से सीधे होते हुए रेचक (निःश्वास) करें तथा उसी प्रवाह में सामने की ऒर झुकते चले जाएँ । दोनों हथेलियों को दोनों पँजों के पास जमीन पर जमा दें। घुटने सीधे रखें तथा मस्तक को घुटनों से चिपका दें यथाशक्ति बाह्य-कुम्भक करें। नव प्रशिक्षु धीरे-धीरे इस अभ्यास को करें और प्रारम्भ में केवल हथेलियों को जमीन से स्पर्श कराने की ही कोशिश करें।

चतुर्थ स्थिति- एकपादप्रसारणासन
तीसरी स्थिति से भूमि पर दोनों हथेलियाँ जमाये हुए अपना दायाँ पाँव पीछे की ऒर फेंके।इसप्रयास में आपका बायाँ पाँव आपकी छाती केनीचे घुटनों से मुड जाएगा,जिसे अपनी छाती से दबाते हुए गर्दनपीछे की ऒर मोडकर ऊपर आसमान कीऒर देखें।दायाँ घुटना जमीन पर सटा हुआ तथा पँजा अँगुलियों पर खडा होगा। ध्यान रखें, हथेलियाँ जमीन से उठने न पायें।श्वास-प्रक्रिया सामान्य रूप से चलती रहे।

पंचम स्थिति- भूधरासन या दण्डासन
एकपादप्रसारणासन की दशा से अपने बाएँ पैर को भी पीछे ले जाएँ और दाएँ पैर के साथ मिला लें ।हाथों को कन्धोंतक सीधा रखें । इस स्थिति में आपका शरीर भूमि पर त्रिभुज बनाता है , जिसमें आपके हाथ लम्बवत् और शरीर कर्णवत् होते हैं।पूरा भार हथेलियों और पँजों पर होता है। श्वास-प्रक्रिया सामान्य रहनी चाहिये अथवा केहुनियों को मोडकर पूरे शरीर को भूमि पर समानान्तर रखना चाहिये। यह दण्डासन है।

षष्ठ स्थिति - साष्टाङ्ग प्रणिपात
पंचम अवस्था यानि भूधरासन से साँस छोडते हुए अपने शरीर को शनैःशनैः नीचे झुकायें। केहुनियाँ मुडकर बगलों में चिपक जानी चाहिये। दोनों पँजे, घुटने, छाती, हथेलियाँ तथा ठोढी जमीन पर एवं कमर तथा नितम्ब उपर उठा होना चाहिये । इस समय 'ॐ पूष्णे नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिये । कुछ योगी मस्तक को भी भूमि पर टिका देने को कहते हैं ।

सप्तम स्थिति - सर्पासन या भुजङ्गासन
छठी स्थिति में थॊडा सा परिवर्तन करते हुए नाभि से नीचे के भाग को भूमि पर लिटा कर तान दें। अब हाथों
को सीधा करते हुए नाभि से उपरी हिस्से को ऊपर उठाएँ। श्वास भरते हुए सामने देखें या गरदन पीछे मोडकर
ऊपर आसमान की ऒर देखने की चेष्टा करें । ध्यान रखें, आपके हाथ पूरी तरह सीधे हों या यदि केहुनी से मुडे
हों तो केहुनियाँ आपकी बगलों से चिपकी हों ।

अष्टम स्थिति- पर्वतासन
सप्तम स्थिति से अपनी कमर और पीठ को ऊपर उठाएँ, दोनों पँजों और हथेलियों पर पूरा वजन डालकर नितम्बों को पर्वतशृङ्ग की भाँति ऊपर उठा दें तथा गरदन को नीचे झुकाते हुए अपनी नाभि को देखें ।

नवम स्थिति - एकपादप्रसारणासन (चतुर्थ स्थिति)
आठवीं स्थिति से निकलते हुए अपना दायाँ पैर दोनों हाथों के बीच दाहिनी हथेली के पास लाकर जमा दें। कमर को नीचे दबाते हुए गरदन पीछे की ऒर मोडकर आसमान की ऒर देखें ।बायाँ घुटना जमीन पर टिका होगा ।

दशम स्थिति - हस्तपादासन
नवम स्थिति के बाद अपने बाएँ पैर को भी आगे दाहिने पैर के पास ले आएँ । हथेलियाँ जमीन पर टिकी रहने दें । साँस बाहर निकालकर अपने मस्तक को घुटनों से सटा दें । ध्यान रखें, घुटने मुडें नहीं, भले ही आपका मस्तक उन्हें स्पर्श न करता हो ।

एकादश स्थिति - ( हस्तोत्तानासन या अर्धचन्द्रासन )
दशम स्थिति से श्वास भरते हुए सीधे खडे हों। दोनों हाथों की खुली हथेलियों को सिर के ऊपर ले जाते हुए पीछे की ऒर तान दें ।यथासम्भव कमर को भी पीछे की ऒर मोडें।

द्वादश स्थिति -स्थित प्रार्थनासन ( प्रथम स्थिति )
ग्यारहवीं स्थिति से हाथों को आगे लाते हुए सीधे हो जाएँ । दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा में वक्षःस्थल पर जोड लें । सभी उँगलियाँ परस्पर जुडी हुईं तथा अँगूठा छाती से सटा हुआ । कोहुनियों को बाहर की तरफ निकालते हुए दोनों हथेलियों पर पारस्परिक दबाव दें।

सूर्य नमस्‍कार तेरह बार करना चाहिये और प्रत्‍येक बार सूर्य मंत्रो के उच्‍चारण से विशेष लाभ होता है, वे सूर्य मंत्र निम्‍न है-
1. ॐ मित्राय नमः, 2. ॐ रवये नमः, 3. ॐ सूर्याय नमः, 4.ॐ भानवे नमः, 5.ॐ खगाय नमः, 6. ॐ पूष्णे नमः,7. ॐ हिरण्यगर्भाय नमः, 8. ॐ मरीचये नमः, 9. ॐ आदित्याय नमः, 10.ॐ सवित्रे नमः, 11. ॐ अर्काय नमः, 12. ॐ भास्कराय नमः, 13. ॐ सवितृ सूर्यनारायणाय नमः

शनिवार, 24 नवंबर 2012

देवउठनी एकादशी : तुलसी-शालिग्राम विवाह







देवउठनी एकादशी और 

तुलसी-शालिग्राम विवाह

 हमारी भारतीय संस्कृति में अनेक व्रतोत्सव मनाए जाते हैं। इनमें तुलसी-शालिग्राम जी का विवाह एक महत्वपूर्ण आयोजन है। यह विवाह अखण्ड सौभाग्य देने वाला है। अत: भारतीय महिलाएं इस व्रतोत्सव को पूर्ण श्रद्धा और मनोयोग से पूर्ण करती हैं। यह विवाह कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन आयोजित किया जाता है। इस विवाह का पौराणिक महत्व है।
    ब्रrावैवर्त पुराण की कथा के अनुसार— कालांतर में तुलसी देवी भगवान गणेश के शापवश असुर शंखचूड की पत्नी बनीं। जब असुर शंखचूड का आतंक फैलने लगा तो भगवान श्री हरि ने वैष्णवी माया फैलाकर शंखचूड से कवच ले लिया और उसका वध कर दिया। तत्पश्चात् भगवान श्री हरि शंखचूड का रूप धारण कर साध्वी तुलसी के घर पहुंचे, वहां उन्होंने शंखचूड समान प्रदर्शन किया। तुलसी ने पति को युद्ध में आया देख उत्सव मनाया और उनका सहर्ष स्वागत किया। तब श्री हरि ने शंखचूड के वेष में शयन किया। उस समय तुलसी के साथ उन्होंने सुचारू रूप से हास-विलास किया तथापि तुलसी को इस बार पहले की अपेक्षा आकर्षण में व्यतिक्रम का अनुभव हुआ। अत: उसे वास्तविकता का अनुमान हो गया। तब तुलसी देवी ने पूछा—मायेश! आप कौन हैं, आपने मेरा सतीत्व नष्ट कर दिया, इसलिए अब मैं तुम्हें शाप दे रही हूं। तुलसी के वचन सुनकर शाप के भय से भगवान श्री हरि ने अपना लीलापूर्वक अपना सुन्दर मनोहर स्वरूप प्रकट किया। उन्हें देखकर पति के निधन का अनुमान करके कामिनी तुलसी मूर्छित हो गई।  फिर चेतना प्राçप्त होने पर उसने कहा—नाथ आपका ह्वदय पाषाण के सदृश है, इसलिए आप में तनिक भी दया नहीं है। आज आपने छलपूर्वक धर्म नष्ट करके मेरे स्वामी को मार डाला। अत: देव! मेरे शाप से अब पाषाण रूप होकर आप पृथ्वी पर रहें। इस प्रकार शोक संतृप्त तुलसी विलाप करने लगी। तब भगवान श्री हरि ने कहा—भद्रे। तुम मेरे लिए भारतवर्ष में रहकर बहुत दिनों तक तपस्या कर चुकी हो। अब तुम दिव्य देह धारण कर मेरे साथ सानन्द रहो। मैं तुम्हारे शाप को सत्य करने के लिए भारतवर्ष में पाषाण (शालिग्राम) बनकर रहूंगा और तुम एक पूजनीय तुलसी के पौधे के रूप में पृथ्वी पर रहोगी।
      गण्डकी नदी के तट पर मेरा वास होगा। बिना तुम्हारे मेरी पूजा नहीं हो सकेगी। तुम्हारे पत्रों और मंजरियों में मेरी पूजा होगी। जो भी बिना तुम्हारे मेरी पूजा करेगा वह नरक का भागी होगा। इस प्रकार शालिग्राम जी का उद्भव पृथ्वी पर हुआ। अत: तुलसी-शालिग्राम का विवाह पौराणिक आख्यानों पर आधारित है। इस विवाह में लोग तुलसी जी के पौधे का गमला, गेरू आदि से सजाकर उसके चारों ओर ईख का मंडप बनाकर उसके ऊपर ओढ़नी या सुहाग प्रतीक चूनरी ओढ़ाते हैं। गमले को स़ाडी ओढ़ाकर तुलसी को चू़डी चढ़ाकर उनका शृंगार करते हैं।
         गणपत्यादि पंचदेवों तथा श्री शालिग्राम का विधिवत पूजन करके श्री तुलसी जी की षोडशोपचार पूजा "तुलस्यै नम:" अथवा "हरिप्रियार्ये नम:" नाम मंत्र से करते हैं। तत्पश्चात एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखते हैं तथा भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं और आरती के बाद विवाहोत्व पूर्ण होता है। इस विवाह को महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में अखण्ड सौभाग्यकारी माना गया है। पुराणों में भी इसे मंगलकारी बताया गया है।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

भारती वालमार्ट के अधिकारी निलंबित : कंपनी कारोबार के लिए रिश्वत





भारती वालमार्ट के वित्तीय अधिकारी निलंबित

मुंबई, एजेंसी
http://www.livehindustan.com/news/business
रिटेल कारोबार करने वाली दुनिया के दिग्गज अमेरिकी कंपनी वालमार्ट ने भारत के अपने संयुक्त उपक्रम (भारती वालमार्ट) के मुख्य वित्त अधिकारी और कुछ कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है। निलंबन की यह कार्रवाई कंपनी पर कारोबार फैलाने के लिए रिश्वत देने के आरोपों की जांच के दौरान की गई है। कंपनी अमेरिका के अलावा ब्राजील, चीन और भारत में इस मामले की जांच शुरू कर दी है। यह जांच अमेरिकी संघीय रिश्वत निरोधक कानून के तहत की जा रही है।

कंपनी के प्रवक्ता ने निलंबन की खबर की पुष्टि करते हुए कहा कि यह एक नियमित प्रक्रिया है इसमें नई बात कुछ नहीं है। जिन लोगों के खिलाफ जांच चल रही हो यदि वह पद पर बने रहे तो जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती इसलिए ऐसे लोगों का हटना जरूरी है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जबतक इनपर दोष सिद्ध नहीं हो जाता तब तक यह निर्दोष ही माने जांएगे। देश के खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के तहत रिटेल श्रृंखला खोलने की तैयारी में जुटी वालमार्ट के लिए यह एक बुरी खबर है।
विपक्षी दल और कारोबारी संगठन देश में एफडीआई का पहले से ही कडा विरोध कर रहे हैं ऐसे में कंपनी के भारत में संयुक्त उपक्रम के किसी अधिकारी के हटाए जाने से कंपनी के लिए भारत में कारोबार करना मुश्किल हो सकता है।

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

गुजरात विधानसभा BJP की पहली लिस्ट जारी





गुजरात विधानसभा चुनावः BJP की पहली लिस्ट जारी, मोदी मणिनगर से लड़ेंगे

http://navbharattimes.indiatimes.com/photo.cms?msid=17326664
नवभारतटाइम्स.कॉम |22Nov,2012|
नई दिल्ली।। बीजेपी ने गुरुवार को गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों

की पहली लिस्ट जारी कर दी है। बीजेपी ने अपनी पहली सूची में 84 उम्मीदवारों के नाम जारी किए हैं जिसमें मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम है। मोदी गुजरात की मणिनगर विधानसभा सीट से सत्ताधारी बीजेपी के प्रत्याशी होंगे। पार्टी ने पहली लिस्ट में अपने सात मौजूदा विधायकों के टिकट काटे हैं।
गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी करते हुए वरिष्ठ नेता अनंत कुमार ने बताया कि राज्य में पहले चरण के अंर्गत 87 विधानसभा सीटों पर चुनाव होने हैं जिसमें से पार्टी ने पहली लिस्ट में 84 उम्मीदवारों के नाम जारी किए गए हैं।

बुधवार, 21 नवंबर 2012

26/11 के हमले में छः अमेरिकी नागरिक मारे गये थे




http://meahindi.nic.in/mystart.php?id=23046535
26/11 के हमले में भारतीय मुजाहिद्यीन की सुगमतादायक भूमिका: संयुक्त राज्य
सितम्बर 16, 2011  टाइम्स ऑफ इण्ड़िया,
MEA - Ministry of External Affairs
यह खबर भारत सरकार के इस  पेज से ली गई है 
वाशिंगटन : संयुक्त राज्य ने बृहस्पतिवार को पुष्टि की थी कि भारतीय मुजाहिद्यीन (आई एम) ने वर्ष, 2008 के मुम्बई हमले में सुगमतादायक भूमिका निभाई थी, जो लश्कर-ए-तायबा (एल ई टी) द्वारा किया गया था, जिसमें छः अमेरिकी नागरिक सहित 163 लोग मारे गये थे”| इस कार्यवाई में जिस तथ्य को रेखाँकित किया गया है, वह यह है कि संयुक्त राज्य भारत पर हुए आतंकी हमले पर अब और अधिक तटस्थ नही है, राजकीय विभाग से प्राप्त एक मीडिया की टिप्पणी के साथ पाकिस्तान से जुड़े एक वैश्विक आतंकवादी संगठन के रूप में, आई एम का औपचारिक पद नाम स्वीकार करता है कि “ये पदवियाँ न केवल आई एम के माध्यम से पश्चिमी हितों के खतरों का उल्लेख करती हैं बल्कि भारत और एक निकट भागीदार संयुक्त राज्य को भी”.

“जनसाधारण भारतियों ने भारतीय मुजाहिद्यीन की निर्दयतापूर्ण हिंसा का घातक प्रभाव झेला है और आज के कार्यकलापों से भारत सरकार के साथ हमारी एकता व्यक्त हो रही है,” आतंकवाद रोधी राजकीय समन्वय विभाग के राजदूत डैनियल बेंजामिन ने आगे जोड़ते हुए कहा था, “ये पद नाम आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाते हैं और आतंकी गतिविधियों के लिए समर्थन को कम करने और समूहों पर आतंकवाद को त्याग देने पर दबाव बनाने के लिए एक प्रभावकारी माध्यम भी हैं।”

राजकीय विभाग ने कहा था कि राजकीय सचिव हिलेरी क्लिंटन ने भारतीय मुजाहिद्यीन (आई एम) को आप्रावासन एवं राष्ट्रीय अधिनियम की धारा 219 के अन्तर्गत एक विदेशी आतंकवादी संगठन (एफ टी ओ) और एक कार्यपालक आदेश क्रमाँक 13224 की धारा 1 (ख) के अन्तर्गत एक विशेषरूप से पद नाम प्राप्त वैश्विक आतंकवादी की संज्ञा दी है। इन पदनामों के परिणामों में जान-बूझ कर भौतिक संसाधनों से समर्थन अथवा अन्य लेन-देन में भारतीय मुजाहिद्यीन के साथ संलिप्त होना और संयुक्त राज्य में स्थित अथवा संयुक्त राज्य के अन्तर्गत या फिर संयुक्त राज्य के नागरिक के नियंत्रण में स्थित संगठनों की सभी सम्पत्ति एवं सम्पत्ति के हितों को जब्त कर लिया है। राजकीय विभाग ने ये सारी कार्यवाईयां, न्याय एवं राजकोष विभाग से परामर्श करके किया था, मीडिया नोट से व्यक्त हुआ था।
राजकीय विभाग के अनुसार भारतीय मुजाहिद्यीन (आई एम) के आक्रमण का प्राथमिक तरीका आर्थिक एवं गैर सैन्य ठिकानों के अनेकों समन्वित बम विस्फोट, भीड़ वाले क्षेत्रों आतंक फैलाने और अधिकाधिक लोगों को हताहत करने के लक्ष्य से करने का है। भारतीय मुजाहिद्यीन के आतंकी हमले की विशेषता यह कि इसने कहा था कि वर्ष, 2010 में भारतीय मुजाहिद्यीन ने पुणे की लोकप्रिय जर्मन बेकरी जहाँ पर्यटकों का आवागमन बना रहता है, बम विस्फोट किया था जिसमें 17 लोग मारे गये थे और 60 लोग घायल हुए थे।
वर्ष, 2008 में भारतीय मुजाहिद्यीन ने दिल्ली में हमला किया था जिसमें 30 लोग मारे गये थे। वर्ष, 2008 मे ही भारतीय मुजाहिद्यीन, अहमदाबाद के भीड़ वाले शहरी क्षेत्र एवं एक स्थानीय चिकित्सालय में ताल-मेल बिठा कर एक समय पर 16 बम विस्फोट करने के लिए जिम्मेदार था, जिसमें 38 लोग मारे गये थे और 100 से अधिक घायल हुए थे।
संयुक्त राज्य से यह पद नाम ऐसे समय पर आया जब वाशिंगटन और भारत के बीच सम्बंध, आतंकवाद के मुद्दे पर तेजी से लगातार नीचे जा रहे थे।
इस सप्ताह के प्रारम्भ में संयुक्त राज्य अधिकारी, जिसमें सम्मिलित रक्षा सचिव श्री लियॉन पनेटा ने पाकिस्तान समर्थित हक्कानी आतंकवादी समूह पर काबुल में संयुक्त राज्य सेनाओं पर हुए ताजे आक्रमण के पीछे हाथ होने का आरोप लगाया था, यह एक ऐसा परिवर्तन था जिसका अनुमोदन उप राष्ट्रपति श्री जोय बीदेन द्वारा किया गया था।
“यह समय था जब हमने पुनः पाकिस्तान से आग्रह किया था कि वह हक्कानी द्वारा इस प्रकार के हमले पर अपने प्रभावों का उपयोग करे। इस क्षेत्र में हमने बहुत कम प्रगति की थी ,” पनेटा ने बुधवार को सम्वाद दाताओं को बताया था।
इसलामाबाद ने बृहस्पतिवार को इस धमकी का उत्तर यह कहते हुए दिया था कि संयुक्त राज्य के विद्रोहियों पर यह चेतावनी वाशिंगटन के साथ सम्बंधों को आहत करेगा क्योंकि पाकिस्तान अपनी ओर से बहुत अच्छा कर रहा है। “यदि विद्रोही अफगानिस्तान में कुछ कर रहे हैं, तब ये अफगान और पश्चिमी सेनाओं की जिम्मेदारी है कि वे उन्हें सीमाओं पर रोंके,” एक पाकिस्तानी अधिकारी को उद्धृत करते हुए संकेत मिल रहा था कि हमारी नीति लगातार खण्ड़न की है और देश में आतंकवादी समूहों को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी नही लेने की है।
आई एस आई के अन्तर्गत नियुक्त पाकिस्तान समर्थित हक्कानी समूह वर्ष, 2008 में काबुल स्थित भारतीय राजदूतावास पर हुए हमले को अंजाम देने का भी संदिग्ध आरोपी था जिसमें एक युवा भारतीय राजनयिक एवं एक सेना अटैची मारे गये थे। हक्कानी समूह को इसके सेना प्रमुख परवेज अशफा़क कयानी द्वारा इसकी व्याख्या पाकिस्तान की “रणनीतिक परिसम्पत्ति” के रूप में की गयी है।
(व्यक्त किये गये उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं)

चीन से 1962 का युद्ध नेहरू की वजह से हारे :पूर्व वायु सेना प्रमुख





चीन से 1962 का युद्ध नेहरू की वजह से हारे थे हम: टिपणिस
Tuesday,20 November, 2012,
लिंक - http://zeenews.india.com/hindi/news
नई दिल्ली: पूर्व वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल (सेवानिवृत्त) ए वाई टिपणिस ने 1962 में चीन के साथ युद्ध में भारत की हार के लिए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को उस वक्त जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया है जब जंग के दौरान वायु सेना का इस्तेमाल नहीं किये जाने पर बहस जारी है।
यहां ‘भारत और चीन, 1962 के युद्ध के पांच दशक बाद’ शीषर्क से आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए टिपणिस ने यह आरोप भी लगाया कि नेहरू ने वैश्विक नेता बनने की महत्वाकांक्षा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को पीछे छोड़ दिया था।
उन्होंने कहा कि यह बात थोड़ी बहुत सार्वभौमिक तौर पर मान्य है। हो सकता है कि कुछ भारतीयों को हिचकिचाहट में राजनीतिक मकसद से खुलकर यह बात स्वीकार्य नहीं हो कि पंडित नेहरू ने संघर्ष मुक्त निगरुट दुनिया के बड़े दृष्टिकोण के साथ वैश्विक नेता बनने की महत्वाकांक्षा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के हित को छोड़ दिया।
कल दिये उनके ये बयान वायु सेना के मौजूदा प्रमुख एयर चीफ मार्शल एन ए के ब्राउन द्वारा हाल ही में दी गयी इस टिप्पणी की पृष्ठभूमि में आए हैं कि चीन के साथ 1962 के युद्ध का नतीजा अलग होता अगर वायु सेना को आक्रामक भूमिका अदा करने दी गयी होती।
अपने बयान को विस्तार से बताते हुए टिपणिस ने कहा कि नेहरू की भारत की हार में बड़ी भूमिका थी। वायुसेना प्रमुख के तौर पर 31 दिसंबर, 1998 से तीन साल का कार्यकाल पूरा करने वाले 72 साल के टिपणिस को भारत और चीन के बीच लड़ाई से दो साल पहले 1960 में लड़ाकू पायलट के तौर पर वायु सेना में शामिल किया गया था।
टिपनीस ने कहा कि उन्होंने उन दिनों एक सेना प्रमुख को उसके कथित मिजाज के लिए प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा स्कूली बच्चे की तरह सताते हुए देखा था।
1962 के युद्ध में वायु सेना का इस्तेमाल नहीं किये जाने के मुद्दे पर सैन्य इतिहासकारों और विशेषज्ञों के बीच अब भी बहस चल रही है और इस बात को लेकर कोई स्पष्ट धारणा नहीं है कि वायु सेना का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया।
ब्राउन ने कहा था कि वायु सेना को आक्रामक भूमिका क्यों नहीं निभाने दी गयी और केवल सेना के परिवहन सहयोग तक क्यों सीमित रखा गया।पिछले 50 साल में पहली बार भारत ने 20 अक्तूबर को चीन के साथ 1962 के युद्ध की बरसी मनाई जहां रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने तीनों सेना प्रमुखों के साथ अमर जवान ज्योति पर फूलमालाए़ं चढ़ाकर युद्ध में शहीद हुए लोगों को श्रद्धांजलि दी। (एजेंसी)

कसाब को फांसी : कब क्या हुआ ?










26/11 के मुंबई हमले के दोषी अजमल आमिर कसाब को फांसी दे दी गई है। सुबह साढ़े सात बजे पुणे की यरवडा जेल में उसे फांसी दी गई है। 9 नवंबर को ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कसाब की दया याचिका कर दी थी। पिछले एक हफ्ते से कसाब की फांसी की तैयारी की जा रही थी। महाराष्ट्र के गृहमंत्री आर आर पाटिल ने इस खबर की पुष्टि करते हुए बताया कि कसाब को पूरी प्रक्रिया के बाद फांसी दी गई है। केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी खबर की पुष्टि की है।

कसाब मामले में कब क्या हुआ?

Wed, 21 Nov 2012
नई दिल्ली। वर्ष 2008 में 26 नवंबर को हुए मुंबई आतंकी हमले में 166 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। हमले में तीन पुलिस अधिकारी भी शहीद हो गए थे। एक नजर डालते हैं मामले पर कि कब-कब क्या-क्या हुआ?
26 नवंबर 2008 : अजमल कसाब और नौ आतंकियों ने मुंबई पर हमला किया, जिसमें 166 लोगों की जान गई।
27 नवंबर 2008 : अजमल कसाब गिरफ्तार।
30 नवंबर 2008 : कसाब ने पुलिस के सामने अपना गुनाह कुबूल किया।
27/28 दिसंबर 2008 : आइडेंटीफिकेशन परेड हुई।
13 जनवरी 2009 : एम एल तहलियानी को 26/11 मामले में विशेष जज नियुक्त किया गया।
16 जनवरी 2009 : ऑर्थर रोड जेल को कसाब का ट्रायल के लिए चुना गया।
22 फरवरी 2009 : उज्ज्वल निकम को सरकारी वकील नियुक्त किया गया।
25 फरवरी 2009 : मेट्रोपॉलिटिन कोर्ट में कसाब के खिलाफ चार्जशीट दायर।
1 अप्रैल 2009 : स्पेशल कोर्ट ने अंजलि वाघमारे को कसाब का वकील नियुक्त किया।
20 अप्रैल 2009 : अभियोजन पक्ष ने 312 मोचरें पर कसाब को आरोपी बनाया।
29 अप्रैल 2009 : कसाब नाबालिग नहीं है। विशेषज्ञों की राय पर अदालत ने फैसला सुनाया।
6 मई 2009 : मामले में आरोप तय किए गए। कसाब पर 86 आरोप तय,लेकिन आरोपों से कसाब का इंकार।
23 जून 2009 : हाफिज सईद, जकी-उर-रहमान लखवी समेत 22 लोगों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए गए।
16 दिसंबर 2009 : अभियोजन पक्ष ने 26/11 के मामले में आर्ग्यूमेंट पूरा किया।
9 मार्च 2010 : अंतिम बहस शुरू।
31 मार्च 2010 : फैसला 3 मई के लिए सुरक्षित रखा गया।
3 मई 2010 : कोर्ट ने कसाब को मुंबई हमले का दोषी ठहराया। सबाउद्दीन अहमद और फहीम अंसारी आरोपों से बरी।
6 मई 2010 : कसाब को विशेष अदालत ने मौत की सजा सुनाई।
18 अक्टूबर 2010 : बॉम्बे हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई शुरू। कसाब की वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए पेशी।
19 अक्टूबर 2010 : कसाब ने निजी तौर पर अदालत में हिस्सा लेने की बात कही।
21 अक्टूबर 2010 : कसाब ने निजी तौर पर अदालत में हिस्सा लेने की बात अपने वकील से दोहराई।
25 अक्टूबर 2010 : हाई कोर्ट के जजों ने सीसीटीवी फुटेज देखी।
27 अक्टूबर 2010 : वकील उज्जवल निकम ने निचली अदालत द्वारा दी गई कसाब को मौत की सजा को सही ठहराया।
29 अक्टूबर 2010 : वकील उज्जवल निकम ने तर्क दिया कि कसाब ने बार-बार यू-टर्न लेकर निचली अदालत को गुमराह करने की कोशिश की।
19 नवंबर 2010: निकम ने अदालत को बताया कि 26/11 के हमलावर देश में मुसलमानों के लिए अलग राज्य चाहते थे।
22 नवंबर 2010 : निकम ने कसाब को झूठा और साजिशकर्ता ठहराया।
23 नवंबर 2010 : हाईकोर्ट के जजों ने एक बार फिर से कसाब के सीसीटीवी फुटेज देखें।
24 नवंबर 2010 : निकम ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि निचली अदालत ने कसाब के इकबालिया बयान को स्वीकार करने में गलती की थी।
25 नवंबर 2010 : कसाब के वकील अमीन सोलकर ने आर्ग्यूमेंट शुरू किया। निचली अदालत की कार्वायही को गलत ठहराते हुए 26/11 मामले पर दोबारा ट्रायल की माग की।
30 नवंबर 2010 : सोलकर ने तर्क दिया कि कसाब के खिलाफ देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप नहीं बनते।
2 दिसंबर 2010 : बचाव पक्ष के वकील ने अदालत में कहा कि कसाब पाकिस्तान से कश्ती से नहीं आया था क्योंकि कश्ती में सिर्फ दस व्यक्ति ही आ सकते हैं।
3 दिसंबर 2010 : उसके वकील का तर्क था कि कसाब को फंसाने के लिए पुलिस ने झूठी कहानी बनाई।
5 दिसंबर 2010 : बचाव पक्ष के वकील सोलकर ने तर्क दिया कि सबूतों को दबा दिया गया है। सिर्फ कुछ सीसीटीवी फुटेज अदालत में दिखाई गई।
6 दिसंबर 2010 : सोलकर ने फुटेज में दिखी तस्वीरों को गलत बताया।
7 दिसंबर 2010 : कसाब ने पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे और दो अन्य पुलिस अधिकारियों की हत्या से इनकार किया। उसके वकील का तर्क था कि मारे गए पुलिस अधिकारियों के शरीर में मिली गोलिया कसाब की राइफल के साथ मैच नहीं होती।
8 दिसंबर 2010 : सोलकर का कहना था कि पुलिस ने गिरगाम चौपाटी में 26 नवंबर, 2008 को झूठी मुठभेड़ का नाटक करके कसाब को फंसाया है। साथ ही मौके पर कसाब की मौजूदगी से इनकार करते हुए उसकी गिरफ्तारी को गलत ठहराया।
9 दिसंबर 2010 :कसाब के वकील ने उसके खिलाफ पेश किए गए सबूतों को कमजोर बताते हुए पुलिस अधिकारी करकरे के मारे जाने से इंकार किया।
10 दिसंबर 2010 : कसाब के वकील ने निचली अदालत में रखी कश्ती का निरीक्षण किया और उस कश्ती को 10 व्यक्तियों के आने के लिए नाकाफी बताया और दावा किया कि अभियोजन पक्ष का दावा गलत है।
13 दिसंबर 2010 : कसाब ने खुद के किशोर होने की दलील देते हुए अदालत से अपनी मानसिक हालत के लिए चिकित्सा विशेषज्ञों के एक पैनल नियुक्ति करने का आग्रह किया।
14 दिसंबर 2010 : अदालत ने कसाब की माग को खारिज कर दिया।
21 दिसंबर 2010 : अदालत ने 26/11 के मामले में फहीम अंसारी को बरी किए जाने के खिलाफ राज्य की अपील सुनी।
22 दिसंबर 2010 : सरकारी वकील निकम ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने फहीम अंसारी और सबाउद्दीन अहमद को बरी करने में गलती की थी।
21 फरवरी 2011 : बॉम्बे हाईकोर्ट ने कसाब पर निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और उसकी अपील खारिज कर दी। मुंबई हमलों के मामले में फहीम अंसारी और सबाउद्दीन अहमद को बरी कर दिया गया।
29 जुलाई 2011 : कसाब ने फासी की सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
10 अक्तूबर 2011 : सुप्रीम कोर्ट ने कसाब की फासी की सजा पर रोक लगाई थी।
31 जनवरी 2012 : सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई मामले की सुनवाई। कसाब का पक्ष रखने के लिए वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन को एमिकस-क्यूरी नियुक्त किया गया।
25 अप्रैल 2012 : कसाब की अपील पर कोर्ट ने सुनवाई पूरी की और फैसला सुरक्षित रखा।
28 अगस्त 2012: मुंबई हमले के दोषी आमिर अजमल कसाब को फासी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। फहीम अंसारी और सबाउद्दीन अहमद के बॉम्बे हाईकोर्ट की रिहाई के फैसले को भी बरकरार रखा है। इन दोनों पर भारत से मुंबई हमलावरों को मदद करने का आरोप था।
21 नवंबर 2012 : राष्ट्रपति ने कसाब की दया याचिका खारिज कर उसे फांसी दे दी।

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

अलसी : कैंसर की चमत्कारिक ओषधि




















केंसर का फ्री इलाज......दोस्तो नमस्ते. आशा है आप सब ठीक से हैं. दो सप्ताह केलिये इंडिया जाना पड़ा. आपको मेने पहले बताया था की मेरे पिता जी को लन्ग केंसर था. दोस्तो राजेस्थान मे एक आश्रम है. व्हाँ केंसर का इलाज मुफ्त होता है. मेरे पिता जी को राजीव गाँधी केंसर हॉस्पिटल मे इलाज के समय 1 साल का समय दिया था. ये जो अश्रम मे बता
अतिरिक्त जानकारी रहा हूँ वहां इलाज बिल्कुल मुफ्त है. गले के नीचे का केंसर 6 महीने मे ओर गले से उप्पर का केंसर 9 महीने मे उनकी दवा से ठीक हो जाता है. ए हमारा अपना एकश्पीरियंस है. अगर किसी जानकार को ए स्मस्या हो तो कृपया भले के लिये जरूर बताएं. उनका पता है बाबा कमल नाथ आश्रम भिन्डुसी तिजारा राजेस्थान. ए अश्रम देल्ही से 125 किलोमीटर है .
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 केंसर का रामबाण इलाज है यह तुलसी का पौधा
तुलसी का पौधा कितना अनमोल है, यह इसी बात से पता चल जाता है कि इसे गुणों को देखकर इसे भगवान की तरह पूजा जाता है। यूं तो आज हर आदमी को किसी न किसी बीमारी ने अपने कब्जे में कर रखा है। लेकिन केंसर एक ऐसी बीमारी है जो लाइलाज कही जाती है।
तक इस बीमारी का कोई परमानेंट इलाज नहीं है। आज यह बीमारी तेजी से फैल रही है। वैसे तो केंसर का कोई परमानेंट इलाज नहीं है लेकिन फि र भी आर्युवेद ने तुलसी को केंसर से लडऩे का एक बड़ा तरीका बताया है। आर्युवेद में बताया गया है कि तुलसी की पत्तियों के रोजाना प्रयोग से केंसर से लड़ा जा सकता है। और इसके लगातार प्रयोग से केंसर खत्म भी हो सकता है।
- कैंसर की प्रारम्भिक अवस्था में रोगी अगर तुलसी के बीस पत्ते थोड़ा कुचलकर रोज पानी के साथ निगले तो इसे जड़ से खत्म भी किया जा सकता है।
-तुलसी के बीस पच्चीस पत्ते पीसकर एक बड़ी कटोरी दही या एक गिलास छाछ में मथकर सुबह और शाम पीएं कैंसर रोग में बहुत फायदेमंद होता है।
केंसर मरीज के लिए विशेष आहार- अंगूर का रस, अनार का रस, पेठे का रस, नारियल का पानी, जौ का पानी, छाछ, मेथी का रस, आंवला,लहसुन, नीम की पत्तियां, बथुआ, गाजर, टमाटर, पत्तागोभी, पालक और नारियल का पानी। 







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दोस्तों,
अलसी कैंसर की चमत्कारिक ओषधि 
30 ग्राम अलसी और 30 ग्राम अलसी का तेल को मिला कर दही के साथ नित्य सेवन से केंसर पर लाभकारी असर देखा गया है ।
अलसी का पिछले दिनों एक और चमत्कार देखा। एक महिला उम्र करीब चालीस। शुगर, बीपी के साथ घुटनों के दर्द से भी परेशान थीं। उन्हें अलसी सेवन की सलाह दी गई। करीब एक माह में उनके शुगर व बीपी में तो सुधार हुआ ही, घुटनों का दर्द भी जाता रहा। अलसी सचमुच मानवता के लिए प्रकृति का एक वरदान है। आप भी इसे आजमा कर देखिए। लाभ हो तो जरूर बताइए, ताकि दूसरों के साथ शेयर किया जा सके। आपके उदाहरण से हो सकता है कोई प्रेरणा ले और उसकी भी पीड़ा दूर हो। सबका मंगल हो।
अलसी का सेवन किस रोग में व कैसे करें?
सुपर फुड अलसी में ओमेगा थ्री व सबसे अधिक फाइबर होता है। यह डब्लयू एच ओ ने इसे सुपर फुड माना है। यह रोगों के उपचार में लाभप्रद है। लेकिन इसका सेवन अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग तरह से किया जाता है।
    स्वस्थ व्यक्ति को रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी का पाउडर पानी के साथ ,सब्जी, दाल या सलाद मंे मिलाकर लेना चाहिए । अलसी के पाउडर को ज्यूस, दूध या दही में मिलाकर भी लिया जा सकता है। इसकी मात्रा 30 से 60 ग्राम प्रतिदिन तक ली जा सकती है। 100-500 ग्राम अलसी को मिक्सर में दरदरा पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भर कर रख लें। अलसी को अधिक मात्रा मंे पीस कर न रखें, यह पाउडर के रूप में खराब होने लगती है। सात दिन से ज्यादा पुराना पीसा हुआ पाउडर प्रयोग न करें। इसको एक साथ पीसने से तिलहन होने के कारण खराब हो जाता है।
    खाँसी होेने पर अलसी की चाय पीएं। पानी को  उबालकर उसमें अलसी पाउडर मिलाकर चाय तैयार करें।एक चम्मच अलसी पावडर को दो कप (360 मिलीलीटर) पानी में तब तक धीमी आँच पर पकाएँ जब तक यह पानी एक कप न रह जाए। थोड़ा ठंडा होने पर शहद, गुड़ या शकर मिलाकर पीएँ। सर्दी, खाँसी, जुकाम, दमा आदि में यह चाय दिन में दो-तीन बार सेवन की जा सकती है। दमा रोगी एक चम्मच अलसी का पाउडर केा आधा गिलास पानी में 12 घंटे तक भिगो दे और उसका सुबह-शाम छानकर सेवन करे तो काफी लाभ होता है। गिलास काँच या चाँदी को होना चाहिए।
    समान मात्रा में अलसी पाउडर, शहद, खोपराचूरा, मिल्क पाउडर व सूखे मेवे मिलाकर नील मधु तैयार करें।  कमजोरी में व बच्चों के स्वास्थ्य के लिए नील मधु उपयोगी है।
    डायबीटिज के मरीज को आटा गुन्धते वक्त प्रति व्यक्ति 25 ग्राम अलसी काॅफी ग्राईन्डर में ताजा पीसकर आटे में मिलाकर इसका सेवन करना चाहिए। अलसी मिलाकर रोटियाँ बनाकर खाई जा सकती हैं। अलसी एक जीरो-कार फूड है अर्थात् इसमें कार्बोहाइट्रेट अधिक होता है।शक्कर की मात्रा न्यूनतम है।
    कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से निकला तीन चम्मच तेल, छः चम्मच पनीर में मिलाकर उसमें सूखे मेवे मिलाकर देने चाहिए। कैंसर की स्थिति मेें डाॅक्टर बुजविड के आहार-विहार की पालना श्रद्धा भाव से व पूर्णता से करनी  चाहिए। कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से  निकले तेल की मालिश भी करनी चाहिए।
    साफ बीनी हुई और पोंछी हुई अलसी  को धीमी आंच पर तिल की तरह भून लें।मुखवास की तरह इसका सेवन करें। इसमें संेधा नमक भी मिलाया जा सकता है। ज्यादा पुरानी भुनी हुई अलसी प्रयोग में न लें।
    बेसन में 25 प्रतिशत मिलाकर अलसी मिलाकर व्यंजन बनाएं। बाटी बनाते वक्त भी उसमें भी अलसी पाउडर मिलाया जा सकता है। सब्जी की ग्रेवी में भी अलसी पाउडर का प्रयोग करें।
    अलसी सेवन के दौरान खूब पानी पीना चाहिए। इसमें अधिक फाइबर होता है, जो खूब पानी माँगता है।
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अलसीः चमत्कारी रामबाण औषधि क्यों व कैसे है ?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लयू एच ओ)े ने अलसी को सुपर फुड माना है। अलसी में ओमेगा थ्री व सबसे अधिक फाइबर होता है। अतः यह स्वास्थ्यप्रद होने के साथ-साथ रोगों के उपचार में लाभप्रद है। इसमें सभी वनस्पितियों की तुलना में अधिक ओगेमा-3 होता है तभी इसे चिकित्सा विज्ञान में ‘‘वेज ओगेमा’’ कहते है । आयुर्वेद में अलसी को दैविक भोजन माना गया। महात्मा गांधीजी ने स्वास्थ्य पर भी शोध की व बहुत सी पुस्तकें भी लिखीं। उन्होंने अलसी पर भी शोध किया, इसके चमत्कारी गुणों को पहचाना और अपनी एक पुस्तक में लिखा है, “जहां अलसी का सेवन किया जायेगा, वह समाज स्वस्थ व समृद्ध रहेगा।”
यूजीटेटीसिमम् यानी अति उपयोगी बीज है। इसे अंग्रेजी में लिनसीड या फ्लेक्ससीड कहते हैं।

ओमेगा 3 की शरीर में महत्वपूर्ण भूमिका-
     यह उत्कृष्ट प्रति-आक्सीकरक है और शरीर की रक्षा प्रणाली सुदृढ़ रखता है।ऽप्रदाह या इन्फ्लेमेशन को शांत करता है।
     ऑखों, मस्तिष्क ओर नाड़ी-तन्त्र का विकास व इनकी हर कार्य प्रणाली में सहायक, अवसाद और व अन्य मानसिक रोगों के उपचार में सहायक, स्मरण शक्ति और शैक्षणिक क्षमता को बढ़ाता है।
     ई.पी.ए. और डी.एच.ए. का निर्माण।
     रक्त चाप व रक्त शर्करा-नियन्त्रण, कॉलेस्ट्रोल-नियोजन, जोड़ों को स्वस्थ रखता है।
     यह भार कम करता है, क्योंकि यह बुनियादी चयापचय दर (ठडत्द्ध बढ़ाता है, वसा कम करता है, खाने की ललक कम करता है।
     यकृत, वृक्क और अन्य सभी ग्रंथियों की कार्य-क्षमता बढ़ाता है।
     शुक्राणुओं के निर्माण में सहायता करता है।

आधुनिक जीवन शैली के कारण शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 का अनुपात बिगड़ गया है। शरीर में ओमेगा-3 की कमी व इन्फ्लेमेशन पैदा करने वाले ओमेगा-6 के ज्यादा हो जाने केे कारण ही हम उच्च रक्तचाप, हृदयाघात, स्ट्रोक, डायबिटीज, मोटापा, गठिया, अवसाद, दमा, कैंसर आदि रोगों का शिकार हो रहे हैं। ओमेगा-3 की यह कमी 30-60 ग्राम अलसी से पूरी कर सकते हैं। ये ओमेगा-3 ही अलसी को सुपर स्टार फूड का दर्जा दिलाता हैं।
अलसी के सेवन से उच्च रक्तचाप, हृदयाघात, स्ट्रोक, डायबिटीज, मोटापा, गठिया, अवसाद, दमा, कैंसर आदि रोगों में लाभ होता है। डाॅ. बुझवीड ने तो अन्तिम स्थिति के कैंसर तक का इलाज अलसी के तेल से किया है।
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अलसी से सेक्स समस्याओं का बचाब
अलसी या फ्लैक्सीड की मदद से सेक्स से जुड़ी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। महिलाओं व पुरूषों में सेक्सुअली सक्षम न हो पाने का एक प्रमुख कारण है पेल्विस की रक्त वाहिनियों में रक्त का सही तरीके से प्रवाह न होना। फ्लैक्सीड के लगातार प्रयोग से रक्त वाहिनियां खुल जाती हैं। नब्बे के दशक में फ्लैक्सीड को एक अच्छा एफरोडाइसियेक्स माना जाता था एफरोडाइसियेक्स उत्तेजित करने वाले प्राकृतिक पदार्थ होते हैं।
पिछले कुछ दशकों से किसी भी बीमारी के प्राकृतिक तरीके से उपचार पर ज़्यादा जोर दिया जा रहा है, जिसके लिए जड़ी बूटियों व पौधों की मदद से उपचार  के तरीकों को अपनाया जा रहा है।  फ्लैक्सीड के प्रयोग से भी बहुत सी बीमारियों का उपचार खोजा जा रहा है। सेक्स से जुड़ी समस्याओं मे फ्लैक्सीड का उपयोग बहुत समय से किया जा रहा है।
अलसी लाभदायी क्यों है
    अलसी बहुत से कारणों से लाभदायी है, इन सभी कारणों में से एक कारण है अलसी में अल्फा लिनोलेनिक एसिड का पाया जाना जो कि ओमेगा 3 फैटी एसिड ग्रुप का एक भाग है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए ओमेगा 3 फैटी एसिड बहुत ही महत्वपूर्ण है। अलसी में लिग्नाज़ भी होते हैं जिनमें कि एण्टीआक्सिडेंट होने की वजह से ये कुछ प्रकार के कैंसर से भी सुरक्षा करते हैं जैसे प्रोसट्रेट कैंसर।
    65 वर्ष से अधिक उम्र में पुरूषों में यह सबसे ज़्यादा पाया जाने वाला कैंसर है, हालांकि अगर समय रहते इस बीमारी का इलाज शुरू हो गया तो इससे बच पाना सम्भव होता है।
    इस बीमारी से सेक्स में समस्याएं आ सकती हैं। प्रोसट्रेट कैंसर का पता लगाने के बहुत से तरीके है लेकिन सबसे अच्छा और सबसे मुश्किल तरीका है डिजिटल रेक्टल परीक्षण। दूसरा तरीका है प्रोसट्रेट स्पेसिफिक एन्टीजन टेस्ट। इस टेस्ट में व्यक्ति के खून में एक खास एन्टीजन के पाये जाने से प्रोसट्रेट कैंसर के होने की पुष्टि होती है। लेकिन यह टेस्ट थोड़ा प्रतिद्वंदी होने के कारण बहुत ज़्यादा नहीं सराहा गया है क्योंकि कई बार यह कैंसर की पुष्टि ठीक तरीके से नहीं कर पाता।
    प्रोसट्रेट कैंसर की चिकित्सा से सेक्स पर प्रभाव पड़ने के साथ साथ ब्लैडर का नियंत्रण भी खो जाता है ा फ्लैक्सीड की मदद से सेक्स से जुड़ी समस्याओं के साथ साथ कैंसर की रोकथाम भी हो सकती है। अभी भी इस बात की पूरी तरह से पुष्टि नहीं हो पायी है कि फ्लैक्सीड की मदद से कैंसर कैसे ठीक हो सकता है लेकिन सालों से लोग इसका इस्तेमाल करते आ रहे है और इससे लाभ पाकर लोग इसे अपने खाने में शामिल करते हैं।
अलसी का सेवन करने वालों को एक बार डाक्टर से ज़्रूरूर सम्पर्क करना चाहिए। यह प्राकृतिक है लेकिन इसके साइड एफेक्ट हो सकते है और फ्लैक्सीड को पावडर या गोली के रूप में लेने वालो के लिए तो डाक्टर से सम्पर्क करना अनिवार्य है।

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अलसी
अलसी या तीसी समशीतोष्ण प्रदेशों का पौधा है। रेशेदार फसलों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। इसके रेशे से मोटे कपड़े, डोरी, रस्सी और टाट बनाए जाते हैं। इसके बीज से तेल निकाला जाता है और तेल का प्रयोग वार्निश, रंग, साबुन, रोगन, पेन्ट तैयार करने में किया जाता है। चीन सन का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। रेशे के लिए सन को उपजाने वाले देशों में रूस, पोलैण्ड, नीदरलैण्ड, फ्रांस, चीन तथा बेल्जियम प्रमुख हैं और बीज निकालने वाले देशों में भारत, संयुक्त राज्य अमरीका तथा अर्जेण्टाइना के नाम उल्लेखनीय हैं। सन के प्रमुख निर्यातक रूस, बेल्जियम तथा अर्जेण्टाइना हैं।
तीसी भारतवर्ष में भी पैदा होती है। लाल, श्वेत तथा धूसर रंग के भेद से इसकी तीन उपजातियाँ हैं इसके पौधे दो या ढाई फुट ऊँचे, डालियां बंधती हैं, जिनमें बीज रहता है। इन बीजों से तेल निकलता है, जिसमें यह गुण होता है कि वायु के संपर्क में रहने के कुछ समय में यह ठोस अवस्था में परिवर्तित हो जाता है। विशेषकर जब इसे विशेष रासायनिक पदार्थो के साथ उबला दिया जाता है। तब यह क्रिया बहुत शीघ्र पूरी होती है। इसी कारण अलसी का तेल रंग, वारनिश, और छापने की स्याही बनाने के काम आता है। इस पौधे के एँठलों से एक प्रकार का रेशा प्राप्त होता है जिसको निरंगकर लिनेन (एक प्रकार का कपड़ा) बनाया जाता है। तेल निकालने के बाद बची हुई सीठी को खली कहते हैं जो गाय तथा भैंस को बड़ी प्रिय होती है। इससे बहुधा पुल्टिस बनाई जाती है।
आयुर्वेद में अलसी को मंदगंधयुक्त, मधुर, बलकारक, किंचित कफवात-कारक, पित्तनाशक, स्निग्ध, पचने में भारी, गरम, पौष्टिक, कामोद्दीपक, पीठ के दर्द ओर सूजन को मिटानेवाली कहा गया है। गरम पानी में डालकर केवल बीजों का या इसके साथ एक तिहाई भाग मुलेठी का चूर्ण मिलाकर, क्वाथ (काढ़ा) बनाया जाता है, जो रक्तातिसार और मूत्र संबंधी रोगों में उपयोगी कहा गया है।
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संभोग से समाधि की ओर ले जाये अलसी
अलसी आधुनिक युग में स्त्रियों की यौन-इच्छा, कामोत्तेजना, चरम-आनंद विकार, बांझपन, गर्भपात, दुग्धअल्पता की महान औषधि है। स्त्रियों की सभी लैंगिक समस्याओं के सारे उपचारों से सर्वश्रेष्ठ और सुरक्षित है अलसी। "व्हाई वी लव" और "ऐनाटॉमी ऑफ लव" की महान लेखिका, शोधकर्ता और चिंतक हेलन फिशर भी अलसी को प्रेम, काम-पिपासा और लैंगिक संसर्ग के लिए आवश्यक सभी रसायनों जैसे डोपामीन, नाइट्रिक ऑक्साइड, नोरइपिनेफ्रीन, ऑक्सिटोसिन, सीरोटोनिन, टेस्टोस्टिरोन और फेरोमोन्स का प्रमुख घटक मानती है।
अलसी में ओमेगा-3 फैट, आर्जिनीन, सेलेनियम, जिंक और मेगनीशियम होते हैं जो स्त्री हार्मोन्स, टेस्टोस्टिरोन और फेरोमोन्स ( आकर्षण के हार्मोन) के निर्माण के मूलभूत घटक हैं। टेस्टोस्टिरोन आपकी कामेच्छा को चरम स्तर पर रखता है।
इसके अलावा ये शिथिल पड़ी क्षतिग्रस्त नाड़ियों का कायाकल्प करती हैं जिससे मस्तिष्क और जननेन्द्रियों के बीच सूचनाओं एवं संवेदनाओं का प्रवाह दुरुस्त हो जाता है।
नाड़ियों को स्वस्थ रखने में अलसी में विद्यमान लेसीथिन, विटामिन बी ग्रुप, बीटा केरोटीन, फोलेट, कॉपर आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अलसी में विद्यमान ओमेगा-3 फैट एवं लिगनेन जननेन्द्रियों में रक्त के प्रवाह को बढ़ाती हैं, जिससे कामोत्तेजना बढ़ती है और प्रेम की लीला सजती है। देह के सारे चक्र खुल जाते हैं, पूरे शरीर में दैविक ऊर्जा का प्रवाह होता है और संभोग शिव और उमा की रति-क्रीड़ा का उत्सव बन जाता है, समाधि बन जाती है।