सोमवार, 12 नवंबर 2012

नैसर्गिक सौन्दर्य निखार का पर्व : रूप चौदस

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सौन्दर्य निखार का ब्यूटी पर्व रूप चौदस.
रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) बृहस्पतिवार, अक्तूबर 27, 2011
सदियों से रूप का आकर्षण मानव मन को मोहित करता रहा है। नैसर्गिक सौन्दर्य भरी प्रकृति के फूल-पत्तों, तितलियों, पखेरुओं, कल-कल बहती सरिताओं का हो चाहे मनुष्य के तन का। रूप के पाश से आबद्ध हो मन-प्राण खीचें चले आते हैं। मानव मात्र में रूपवान बनने-दिखने की चिरन्तन अभिलाषा के साथ ही रूप सौन्दर्य के प्रति पारम्परिक एवं सहज स्वाभाविक आकर्षण रहा है। वनवासियों में स्वाभाविक सौन्दर्य, ओज और लावण्य नैसर्गिक वरदान है। वनाँचल सुघड़ एवं सबल देहयष्टि प्रदान करता है।

दीपावली से ठीक एक दिन पूर्व वनांचल के लोगों के लिए रूप निखार का वार्षिक पर्व होता है। रूप चौदस के दिन न केवल घर परिवेश बल्कि स्वयं का भी रूप निखारने का यत्न किया जाता है। इस दिन सौन्दर्य निखार की प्राचीन संस्कृति एवं परम्परा के दर्शन रूप चौदस की सार्थकता को भली प्रकार अभिव्यक्त करते हैं। दक्षिणांचल के लोगों में सौन्दर्य एवं रूप के प्रति पिपासा किसी भी प्रकार से कम नहीं कही जा सकती। वे किसी उद्यान में सायास पल्लवित किए पुष्पों की तरह नहीं है अपितु समग्र प्रकृति के आँगन में हिरणों की तरह कुलाँचे भरते हुए प्रकृति से ही इन्द्रधनुषी रंग सहेज कर रूपश्री से भरे पूरे होते हैं।

प्रकृति सामीप्य एवं मनः सौन्दर्य से कोसों दूर भागता आज का समाज जाने किन-किन किस्मों के श्रृंगार प्रसाधनों पर बेहिसाब धन खर्च कर खूबसूरत दिखने का स्वाँग रच रहा है, ऐसे में वनांचल के लोग परम्परागत सौन्दर्य निखार संसाधनों का प्रयोग कर आज भी इनकी अर्थवत्ता को बरकरार रखे हुए अनकहे ही ढेरों संदेश सुना रहे हैं। यहाँ के लोग अपना रूप निखारने में नदी-नालों, झरनों व नहरों के किनारे या किसी जलाशय के तट पर बैठकर सूरज की रोशनी में रूप निखार का यत्न करते हैं। आधुनिक समाज की मनः विकृतियों से मुक्त वनांचल के लोग मनः सौन्दर्य के साथ-साथ प्रकृति में रमे हुए हैं और यही उनकी देहयष्टि के सौन्दर्यशाली होने का एक कारण भी है।

आम तौर पर साबुन, क्रीम, शैम्पू या ऐसी ही सामग्री की बजाय पर्वतीय अंचल के नर-नारियों के लिए छिपा हुआ रूप निखारने में मिट्टी (स्थानीय व मुलतानी), हल्दी, उबटन, पीठी, अरीठा, दहीं, दूध, छाछ, मलाई आदि सहज सुलभ एवं असरकारी रसायनों का प्रयोग करते हैं। नदी-नाले, तालाब, या किसी बावड़ी की सीढ़ियों पर, नहरों के किनारे बैठी ग्राम्य तरुणियां जब कोपरिये (कवेलू का खुरदरा टुकड़ा) या सूखे गलकों के रेशों से रगड़-रगड़ कर अपनी एड़ियों का सौन्दर्य निखारती हैं, तब हमें कविवर भारतेन्दु हरिशचन्द्र की ये पंक्तियां याद आ जाती हैं- ‘‘कहऊ सुन्दरी नहावत।’’

शहरीकरण के दौर में गली -कूचों तक खुलते जा रहे ब्यूटी पॉर्लरों से निखरने वाला सौन्दर्य यहां के नैसर्गिक एवं सहज सुलभ संसाधनों से प्रकट होने वाले सौन्दर्य की तुलना में कहीं नहीं ठहरता। परम्परागत रूप निखार पद्धतियों में न धन का व्यय, न बार बार का झंझट और न प्रसाधनों से पैदा होने वाले खतरे। रूप के साथ आभूषणों का सनातन रिश्ता रहा है। रूप की लावण्यमय प्रतिमाएँ जब सर पर बोर, नाक में नथ, गले मेें हाँसली, कमर में कन्दोरा, कानों में कुण्डल/बालियाँ, भाल पर टिकड़ी, टिपकियों वाली, ओढ़नी/साड़ी, हाथों में चूड़ियां, पाँवों में तोड़े पायजेब/ कड़े पहन वनांचल की युवतियाँ जब हिरनियों की तरह कुलाँचे भरती विचरती हैं तब लगता है कामदेव भी इनके आगे नृत्य कर रहा हो। अनकहे ही प्रकृति से रूप निखारने वाले वनांचल के लोग हमें यही संदेश दे रहे हैं कि परंपरागत सहज सुलभ नैसर्गिक तरीकों से निहारा गया रूप ब्यूटी पॉर्लरों के महंगे प्रसाधनों से प्राप्त कृत्रिम रूप से कहीं भी उन्नीस नहीं है।

(डॉ. दीपक आचार्य)
महालक्ष्मी चौक, बाँसवाड़ा - 327001
(राजस्थान)
नरक चतुर्दशी
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नरक चतुर्दशी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को कहा जाता है। इस चतुर्दशी को 'नरक चौदस', 'रूप चौदस', 'रूप चतुर्दशी', 'नर्क चतुर्दशी' या 'नरका पूजा' के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह माना जाता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन मृत्यु के देवता यमराज की पूजा का विधान है। नरक चतुर्दशी को 'छोटी दीपावली' भी कहते हैं। दीपावली से एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी के दिन संध्या के पश्चात दीपक प्रज्जवलित किए जाते हैं। इस चतुर्दशी का पूजन कर अकाल मृत्यु से मुक्ति तथा स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए यमराज जी की पूजा व उपासना की जाती है।
 कथाएँ
इस चतुर्दशी से जुड़ी पौराणिक कथाएँ इस प्रकार हैं-

प्रथम कथानुसार-
एक कथा के अनुसार रन्तिदेव नामक एक राजा हुए थे। वह बहुत ही पुण्यात्मा और धर्मात्मा पुरूष थे। सदैव धर्म, कर्म के कार्यों में लगे रहते थे। जब उनका अंतिम समय आया तो यमराज के दूत उन्हें लेने के लिए आये। वे दूत राजा को नरक में ले जाने के लिए आगे बढ़े। यमदूतों को देख कर राजा आश्चर्य चकित हो गये और उन्होंने पूछा- "मैंने तो कभी कोई अधर्म या पाप नहीं किया है तो फिर आप लोग मुझे नर्क में क्यों भेज रहे हैं। कृपा कर मुझे मेरा अपराध बताइये, कि किस कारण मुझे नरक का भागी होना पड़ रहा ह।". राजा की करूणा भरी वाणी सुनकर यमदूतों ने कहा- "हे राजन एक बार तुम्हारे द्वार से एक ब्राह्मण भूखा ही लौट गया था, जिस कारण तुम्हें नरक जाना पड़ रहा है।
राजा ने यमदूतों से विनती करते हुए कहा कि वह उसे एक वर्ष का और समय देने की कृपा करें। राजा का कथन सुनकर यमदूत विचार करने लगे और राजा को एक वर्ष की आयु प्रदान कर वे चले गये। यमदूतों के जाने के बाद राजा इस समस्या के निदान के लिए ऋषियों के पास गया और उन्हें समस्त वृत्तांत बताया। ऋषि राजा से कहते हैं कि यदि राजन कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करे, ब्रह्मणों को भोजन कराये और उनसे अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करे तो वह पाप से मुक्त हो सकता है। ऋषियों के कथन के अनुसार राजा कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्दशी का व्रत करता है। इस प्रकार वह पाप से मुक्त होकर भगवान विष्णु के वैकुण्ठ धाम को पाता है।
द्वितीय कथानुसार-
एक अन्य प्रसंगानुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कार्तिक माह में कृष्ण चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध करके देवताओं व ऋषियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलवाई थी। इसके साथ ही कृष्ण भगवान ने सोलह हज़ार कन्याओं को नरकासुर के बंदीगृह से मुक्त करवाया। इसी उपलक्ष्य में नगरवासियों ने नगर को दीपों से प्रकाशित किया और उत्सव मनाया। तभी से नरक चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाने लगा।
रूप चौदस :
धनतेरस के अगले दिन 'नरक चौदस' होती है, जिसे 'रूप चौदस' भी कहा जाता है। इस दिन ब्रह्म मुहुर्त में उठकर स्नान करने का तथा उगते सूर्य को अर्घ्य देने का विशेष महत्व होता है। रूप चौदस के दिन रूप-लावण्य को निखारने के लिए तरह-तरह के उबटन आदि लगाते हैं। इस दिन घर के दरवाजे के बाहर तेल का एक दीपक जलाया जाता है, जिसे यम दीपक कहा जाता है।
मूल भाव : मनुष्य के लिए तन और मन दोनों की शुद्धि करना जरूरी होता है। 'रूप चौदस' का अभिप्राय केवल सज-धजकर केवल शरीर की मलिनता को दूर करना ही नहीं है बल्कि अपने मन में विकारों को भी दूर करना है।

 नरक चतुर्दशी से जुड़ी हैं परंपराएं
नया इंडिया
11th Nov 2012
नई दिल्ली। दीपावली पर्व के ठीक एक दिन पहले मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी को छोटी दीवाली, रूप चौदस और काली चतुर्दशी भी कहा जाता है और इस दिन से कई परंपराएं जुड़ी हैं। नरक चतुर्दशी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है।
दिल्ली विश्‍वविद्यालय के संस्कृत विभाग के सेवानवृत्त प्राध्यापक सी के मिश्र ने बताया कि हिंदू कैलेंडर के अनुसार, नरक चतुर्दशी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। इसके अगले दिन दीपावली मनाई जाती है। मिश्र ने बताया कि माना जाता है कि दैत्य राज नरकासुर ने देवराज इंद्र को पराजित कर सुरलोक की शासक मातृ देवी अदिति के कानों के कुंडल छीन लिए थे। अदिति भगवान कृष्ण की पत्नी सत्यभामा की रिश्तेदार थीं।
नरकासुर के अत्याचार की खबर सुन कर सत्यभामा नाराज हो गई और भगवान कृष्ण से नरकासुर को सजा देने के लिए कहा। नरकासुर को श्राप मिला था कि उसकी मृत्यु महिला के हाथों होगी। कृष्ण ने तब सत्यभामा को यह बात बताई और युद्ध के मैदान में सत्यभामा के रथ के सारथी बने। नरकासुर का वध सत्यभामा ने किया और अदिति के कुंडल उन्हें वापस दिए। उन्होंने बताया कि नरकासुर के वध के बाद कृष्ण ने उसके रक्त से तिलक किया और सुबह सुबह अपने महल वापस पहुंचे। उस दिन नरक चतुर्दशी थी। कृष्ण ने सुगंधित तेल लगाया और स्नान किया। कहा जाता है कि तब से ही इस दिन सुबह तेल लगा कर स्नान करने की परंपरा है।
पौराणिक गाथा के अनुसार, नरकासुर ने देवराज इंद्र को परास्त करने के बाद जिन 16 हजार देव कन्याओं को कारागार में डाल दिया था, उन्हें कृष्ण ने दैत्य राज के वध के बाद रिहा किया और उनसे विवाह किया। ये 16 हजार देव कन्याएं उनकी रानियां बनीं। इसीलिए इस दिन को रूप चौदस भी कहा जाता है और महिलाएं इस दिन विशेष श्रृंगार करती हैं।
ज्योतिष में दिलचस्पी रखने वाली संस्कृत की प्राध्यापक डॉ कमल मुखर्जी ने बताया कि राजस्थान में रूप चौदस खास तौर पर मनाया जाता है। यह आयोजन पांच दिन तक चलता है। इस दिन महिलाएं घर की सफाई और खुद अपना श्रृंगार करती हैं। घर पर तरह तरह के पकवान बनाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत में इस दिन को बच्चों के मुंडन संस्कार के लिए शुभ माना जाता है। वहां इस दिन सुबह स्नान के बाद तेल में कुमकुम मिला कर लगाया जाता है और करेले को हाथ के प्रहार से तोड कर उसका रस माथे पर लगाया जाता है।
करेले को नरकासुर के सिर का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद तेल और चंदन लगा कर फिर स्नान किया जाता है। आम तौर पर इस दिन महिलाएं सुबह उठ कर घर की साफ सफाई करती हैं और घर के बाहर रंगोली सजाती हैं। महाराष्ट्र में इस दिन चने के आटे और चंदन का उबटन लगा कर स्नान करने की परंपरा है। आंध्रप्रदेश में इस दिन सुबह पानी में तिल के कुछ दाने डाल कर स्नान करने की परंपरा है।
मुखर्जी ने बताया कि नरक चतुर्दशी के दिन महाकाली और भगवान यमराज की पूजा भी की जाती है। माना जाता है कि इस दिन पूजा करने से यमराज नरक में नहीं भेजते। कई घरों में इस दिन एक विशेष दिया यमराज के लिए जलाया जाता है और दरवाजे के सामने रखा जाता है। कई घरों में रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है।
घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिये को नहीं देखते। यह दीया यम का दीया कहलाता है और माना जाता है कि पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।

 

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