बुधवार, 26 दिसंबर 2012

Shaheedi Jor Mela : Shahidii jori Baba Zorawar Singh ji and Baba Fateh Singh ji,




Shaheedi Jor Mela
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Shaheedi Jor Mela is organised every year in December at Gurdwara Fatehgarh Sahib, in the Fatehgarh Sahib district of Punjab to pay homage to the martyrdom of Baba Zorawar Singh ji and Baba Fateh Singh ji, the youngest of the tenth guru of sikhs Guru Gobind Singh's four sons.
 File:Fatehgarh Sahib Gurdwara, Punjab, India.jpg
                                    Fatehgarh Sahib, Punjab, IndiaContents

    1 Supreme sacrifice
    2 Gurudwara Fatehgarh Sahib
    3 Mela Schedule
    4 People participation

Supreme sacrifice
Both Sahibzada's defied all attempts of then Governor of Sirhind Wazir Khan's offers of treasure and easy lives if they would only convert to Islam. Holding steadfast in their will to die as Sikhs, they were first entombed alive by being bricked into a wall, but mere bricks and mortar could not hold the young Sahibzadas, for the wall collapsed and fell to the ground. Then, on 26 December 1705, Baba Fateh Singh ji was cruelly and mercilessly martyred at Sirhind along with his elder brother, Baba Zorawar Singh. He is probably the youngest recorded martyr in history, having knowingly and consciously laid down his life at the age of six years.

Gurudwara Fatehgarh Sahib
Gurudwara Fatehgarh Sahib, 5 km (3.1 mi) north of the Sirhind  marks the site of the live entombment of the two younger sons of the tenth Guru of the Sikhs, Sri Guru Gobind Singh by then Governor of Sirhind, Wazir Khan.

Mela Schedule
The first day of the Mela is observed purely in religious spirits. The mela in 2012 would begin from December 21 with Akhand Path of Guru Granth Sahib at gurdwara Jyoti Swarup. Political rallies & meetings would be held by various political parties next day, for which stages have been set up near gurdwaras. Mela will conclude on December 25 with nagar kirtan from gurdwara Fatehgarh Sahib to gurdwara Jyoti Swarup.

People participation
Lakhs of devotes pay their obeisance at Gurdwara Fatehgarh Sahib and Gurdwara Jyoti Swarup on this historic occasion every year during this three day Jor Mela. All nearby villagers organize langar for the devotees going to visit Gurdwara Fatehgarh Sahib for the Mela along all the roads leading to the gurdwara. During Mela days, the service of the people is exemplary with community kitchens serving tea, snacks and meals every mile on the way to Sirhind, whichever way you are coming from. People from far away places come to Sirhind to do karsewa and braving the chilly weather in tents out in the open.

Arrangements
Each year, the district administration would do special arrangements for devotees and people visiting the mela like parking areas, controlling flow of traffic by setting up special barricades and nakas, medical & emergency services and by deploying heavy police force for security.
The Shiromani Gurdwara Parbandhak Committee has been arranging deewan, where the Sikh preachers, ragis, dhadi jathas will present devotional songs and give the accounts of the Sikh history.
Although Jor Mela is a religious event, a heavy police force is normally deployed all around the Mela site.

वीर क्रांतिकारी शहीद ऊधम सिंह





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अमर शहीद ऊधम सिंह
भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
अमर शहीद ऊधम सिंह (जन्म- 26 दिसंबर, 1899, सुनाम गाँव, पंजाब; मृत्यु- 31 जुलाई, 1940, पेंटनविले जेल) जलियाँवाला बाग़ में निहत्थों को भूनकर अंग्रेज़ भारत की आज़ादी के दीवानों को सबक सिखाना चाहते थे, जिससे वह ब्रिटिश सरकार से टकराने की हिम्मत न कर सकें, किन्तु इस घटना ने स्वतंत्रता की आग को हवा देकर बढ़ा दिया।

जन्म
ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 में पंजाब के संगरूर ज़िले के सुनाम गाँव में हुआ। ऊधमसिंह की माता और पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। उनके जन्म के दो साल बाद 1901 में उनकी माँ का निधन हो गया और 1907 में उनके पिता भी चल बसे। ऊधमसिंह और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया। इस प्रकार दुनिया के ज़ुल्मों सितम सहने के लिए ऊधमसिंह बिल्कुल अकेले रह गए।

    इतिहासकार वीरेंद्र शरण के अनुसार ऊधमसिंह इन सब घटनाओं से बहुत दु:खी तो थे, लेकिन उनकी हिम्मत और संघर्ष करने की ताक़त बहुत बढ़ गई। उन्होंने शिक्षा ज़ारी रखने के साथ ही आज़ादी की लड़ाई में कूदने का भी मन बना लिया। उन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदेव और भगतसिंह जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन को ऐसे घाव दिये जिन्हें ब्रिटिश शासक बहुत दिनों तक नहीं भूल पाए।
    इतिहासकार डा. सर्वदानंदन के अनुसार ऊधम सिंह 'सर्व धर्म सम भाव' के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद आज़ाद सिंह रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मो का प्रतीक है।

स्वतंत्रता आंदोलन में भाग
स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सन् 1919 का 13 अप्रैल का दिन आँसुओं में डूबा हुआ है, जब अंग्रेज़ों ने अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ में सभा कर रहे निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलायीं और सैकड़ों बेगुनाह लोगों को मौत के घाट उतार दिया। मरने वालों में माँओं के सीने से चिपके दुधमुँहे बच्चे, जीवन की संध्या बेला में देश की आज़ादी का सपना देख रहे बूढ़े और देश के लिए सर्वस्व लुटाए को तैयार युवा सभी थे।

इस घटना ने ऊधमसिंह को हिलाकर रख दिया और उन्होंने अंग्रेज़ों से इसका बदला लेने की ठान ली। हिन्दू, मुस्लिम और सिख एकता की नींव रखने वाले 'ऊधम सिंह उर्फ राम मोहम्मद आज़ाद सिंह' ने इस घटना के लिए जनरल माइकल ओ डायर को ज़िम्मेदार माना जो उस समय पंजाब प्रांत का गवर्नर था। गवर्नर के आदेश पर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनल्ड, एडवर्ड हैरी डायर, जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियांवाला बाग़ को चारों तरफ से घेर कर मशीनगन से गोलियाँ चलवाईं।

विदेश की यात्राएं
इस के बाद घटना ऊधमसिंह ने शपथ ली कि वह माइकल ओ डायर को मारकर इस घटना का बदला लेंगे। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए ऊधमसिंह ने अलग अलग नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्राएँ की। सन् 1934 में ऊधमसिंह लंदन गये और वहाँ 9 एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड़ पर रहने लगे। वहाँ उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार ख़रीदी और अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी ख़रीद ली।

प्रतिशोध
भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए सही समय का इंतज़ार करने लगा। ऊधमसिंह को अपने सैकड़ों भाई बहनों की मौत का बदला लेने का मौक़ा 1940 में मिला। जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को 'रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी' की लंदन के 'कॉक्सटन हॉल' में बैठक थी जहाँ माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। ऊधमसिंह उस दिन समय से पहले ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। उन्होंने अपनी रिवाल्वर एक मोटी सी किताब में छिपा ली। उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवाल्वर के आकार में इस तरह से काट लिया, जिसमें डायर की जान लेने वाले हथियार को आसानी से छिपाया जा सके।

आत्मसमर्पण
बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए ऊधमसिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियाँ चला दीं। दो गोलियाँ डायर को लगीं, जिससे उसकी तुरन्त मौत हो गई। गोलीबारी में डायर के दो अन्य साथी भी घायल हो गए। ऊधमसिंह ने वहाँ से भागने की कोशिश नहीं की और स्वयं को गिरफ़्तार करा दिया। उन पर मुक़दमा चला। अदालत में जब उनसे सवाल किया गया कि 'वह डायर के साथियों को भी मार सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया।' इस पर ऊधमसिंह ने उत्तर दिया कि, वहाँ पर कई महिलाएँ भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है। अपने बयान में ऊधमसिंह ने कहा- 'मैंने डायर को मारा, क्योंकि वह इसी के लायक़ था। मैंने ब्रिटिश राज्य में अपने देशवासियों की दुर्दशा देखी है। मेरा कर्तव्य था कि मैं देश के लिए कुछ करूं। मुझे मरने का डर नहीं है। देश के लिए कुछ करके जवानी में मरना चाहिए।'

मृत्यु
4 जून 1940 को ऊधमसिंह को डायर की हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें 'पेंटनविले जेल' में फाँसी दे दी गयी। इस प्रकार यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अमर हो गया। 31 जुलाई 1974 को ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए थे। ऊधमसिंह की अस्थियाँ सम्मान सहित भारत लायी गईं। उनके गाँव में उनकी समाधि बनी हुई है।

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

भारत जागो विश्व जगाओ महा अभियान

 
‘‘आज हमारे देश की आवश्यकता है लोहे की मांसपेशियाँ और फौलाद के स्नायु तंत्र, ऐसी प्रचण्ड इच्छाशक्ति जिसे कोई न रोक सके, जो समस्त विश्व के रहस्यों की गहराई में जाकर अपने उद्देश्यों को सभी प्रकार से प्राप्त कर सके। इस हेतु समुद्र के तल तक क्यों न जाना पड़े या मृत्यु का ही सामना क्यों न करना पड़े।’’
-स्वामी विवेकानन्द

भारत जागो विश्व जगाओ महा अभियान
श्रीस्वामी रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्य, स्वामी विवेकानन्द आधुनिक समय के प्रथम धर्म-प्रचारक थे जिन्होने विदेश जाकर विश्व के सम्मुख सनातन धर्म के सर्वासमावेशक, वैश्विक संदेश को पुनःप्रतिपादित किया। ऐसा संदेश जो सब को स्वीकार करता है किसी भी मत, सम्प्रदाय को नकारता नहीं।
    स्वामीजी एक प्रखर देशभक्त, राष्ट्र-निर्माता, समाजशास्त्री तथा महासंगठक थे। विदेशी शासन से विदीर्ण शक्ति, परास्त मन व आत्मग्लानी से परिपूर्ण राष्ट्र के पुनर्निमाण हेतु राष्ट्रवादी पुनर्जारण को प्रज्वलित करनेवाले पुरोधा स्वामी विवेकानन्द ही थे। भारत को उसकी आत्मा हिन्दू धर्म के प्रति सजग कर उन्हांेने इस पुनर्जागरण की नीव  रखी।
स्वामी विवेकानन्द की 150 वी जयंती को 12 जनवरी 2013 से 12 जनवरी 2014 तक सार्ध शती समारोह को भव्यता से मनाने की सघन तैयारियाँ देश के कोनें कोनें में पूरी की जा चुकीं हैं। विभिन्न संगठन व सरकारें भी समारोह की योजना बना रहे हैं।
भारत की जनता ने सम्मिलित होकर इस महान पर्व को मनाने का निश्चय किया है। आज जब राष्ट्र दोराहे पर खडा है तब उसके बौद्धिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनैतिक व राष्ट्रीय आलस व भ्रम को दूर करने का उर्वर अवसर यह समारोह प्रस्तुत करता है। 
महत्वपूर्ण सामाजिक नेता, विचारक, स्वामीजी के प्रशंसक तथा अनेक सेवा संगठनों के अनुभवी कार्यकर्ता व युवाओं ने एकत्रित आकर अखिल भारतीय स्तर पर तथा प्रांतों में ‘‘आयोजन समिति’’ गठित की है। इन समितियों ने प्रख्यात चिंतक, युवा आदर्श, सामाजिक व आध्यात्मिक वैचारिक नेतृत्व, वैज्ञानिक, आर्थिक, व्यावसायिक तथा क्रीडा क्षेत्र के सफल विजेताओं व अन्य अनेक लोगों से सम्पर्क प्रारम्भ कर दिया है। इनके सहभाग से राष्ट्रीय तथा राज्य दोनों स्तरों पर ‘‘स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती समारोह समिति’’ का गठन स्थानीय स्तर तक हो चुका है। यह समितियाँ ही समारोह वर्ष में सभी आयोजन करेंगी।
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प्रगति के प्रेरक हैं युवा : स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद का कहना है कि बहती हुई नदी की धारा ही स्वच्छ, निर्मल तथा स्वास्थ्यप्रद रहती है। उसकी गति अवरुद्ध हो जाने पर उसका जल दूषित व अस्वास्थ्यकर हो जाता है। नदी यदि समुद्र की ओर चलते-चलते बीच में ही अपनी गति खो बैठे, तो वह वहीं पर आबद्ध हो जाती है। प्रकृति के समान ही मानव समाज में भी एक सुनिश्चित लक्ष्य के अभाव में राष्ट्र की प्रगति रुक जाती है और सामने यदि स्थिर लक्ष्य हो, तो आगे बढ़ने का प्रयास सफल तथा सार्थक होता है।
हमारे आज के जीवन के हर क्षेत्र में यह बात स्मरणीय है। अब इस लक्ष्य को निर्धारित करने के पूर्व हमें विशेषकर अपने चिरन्तन इतिहास, आदर्श तथा आध्यात्मिकता का ध्यान रखना होगा। स्वामीजी ने इसी बात पर सर्वाधिक बल दिया था। देश की शाश्वत परंपरा तथा आदर्शों के प्रति सचेत न होने पर विश्रृंखलापूर्ण समृद्धि आएगी और संभव है कि अंततः वह राष्ट्र को प्रगति के स्थान पर अधोगति की ओर ही ले जाए।
विशेषकर आज के युवा वर्ग को, जिसमें देश का भविष्य निहित है, और जिसमें जागरण के चिह्न दिखाई दे रहे हैं, अपने जीवन का एक उद्देश्य ढूँढ लेना चाहिए। हमें ऐसा प्रयास करना होगा ताकि उनके भीतर जगी हुई प्रेरणा तथा उत्साह ठीक पथ पर संचालित हो। अन्यथा शक्ति का ऐसा अपव्यय या दुरुपयोग हो सकता है कि जिससे मनुष्य की भलाई के स्थान पर बुराई ही होगी। स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि भौतिक उन्नाति तथा प्रगति अवश्य ही वांछनीय है, परंतु देश जिस अतीत से भविष्य की ओर अग्रसर हो रहा है, उस अतीत को अस्वीकार करना निश्चय ही निर्बुद्धिता का द्योतक है।
अतीत की नींव पर ही राष्ट्र का निर्माण करना होगा। युवा वर्ग में यदि अपने विगत इतिहास के प्रति कोई चेतना न हो, तो उनकी दशा प्रवाह में पड़े एक लंगरहीन नाव के समान होगी। ऐसी नाव कभी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचती। इस महत्वपूर्ण बात को सदैव स्मरण रखना होगा। मान लो कि हम लोग आगे बढ़ते जा रहे हैं, पर यदि हम किसी निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर नहीं जा रहे हैं, तो हमारी प्रगति निष्फल रहेगी। आधुनिकता कभी-कभी हमारे समक्ष चुनौती के रूप में आ खड़ी होती है। इसलिए भी यह बात हमें विशेष रूप से याद रखनी होगी।
इसी उपाय से आधुनिकता के प्रति वर्तमान झुकाव को देश के भविष्य के लिए उपयोगी एक लक्ष्य की ओर सुपरिचालित किया जा सकता है। स्वामी ने बारंबार कहा है कि अतीत की नींव के बिना सुदृढ़ भविष्य का निर्माण नहीं हो सकता। अतीत से जीवनशक्ति ग्रहण करके ही भविष्य जीवित रहता है। जिस आदर्श को लेकर राष्ट्र अब तक बचा हुआ है, उसी आदर्श की ओर वर्तमान युवा पीढ़ी को परिचालित करना होगा, ताकि वे देश के महान अतीत के साथ सामंजस्य बनाकर लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकें।
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विवेकानंद जयंती : कौन मांगने वाला, कौन याचक ?
एक बार की बात है, विवेकानन्द के पिता चल बसे, तो घर में बहुत गरीबी थी और घर मे भोजन भी नही था कि माँ और बेटा दोनों भोजन कर पाएँ. तो विवेकानन्द अपनी माँ को कह कर की आज किस मित्र के घर निमंत्रण है, मै वहाँ जाता हूँ - कोई निमंत्रण नही होता था, कोई मित्र भी नही था - सड़को पर चक्कर लगा कर घर वापस लौट आते थे. अन्यथा भोजन इतना कम है की माँ उनको खिला देगी और ख़ुद भूखी रहेगी. तो भूखे घर लौट आते. हँसते हुए आते की आज तो बहुत गजब का खाना मिला, क्या चीजे बनी थी!
रामकृष्ण को पता चला तो उन्होंने कहा की तू कैसा पागल है, भगवन से क्यों नही कह देता! सब पूरा हो जाऐगा . तो विवेकानन्द ने कहा की खाने-पीने की बात भगवन से चलाऊँ तो जरा बहुत साधारण बात हो जायेगी. फिर भी रामकृष्ण ने कहा, तूं एक दफा कह कर देख! तो विवेकानन्द को भीतर भेजा. घंटा बीता, डेढ़ घंटा बीता, वे मन्दिर से बाहर आए, बड़े आन्दित थे, नाचते हुए बाहर निकले थे। रामकृष्ण ने कहा, मिल गया है?  मांग लिया न?  विवेकनद ने कहा, क्या?  रामकृष्ण ने कहा, तुझे मैंने कहा था की मांग अपनी रख देना। तू इतना आन्दित क्यों आ रहा है ? विवेकानन्द ने कहा, वह तो मैं भूल ही गया।
ऐसा कई बार हुआ। रामकृष्ण भेजते और विवेकानन्द वहाँ से बाहर आते और वे पूछते तो वे कहते, क्या? तो रामकृष्ण ने कहा, तूं पागल तो नही है! क्योंकि भीतर जब जाता है तो पक्का वचन देकर जाता है. विवेकानन्द कहते की जब भीतर जाता हूँ, तो परमात्मा से भी मांगूं, यह तो ख्याल ही नही रह जाता. देने का मन हो जाता है की अपने को दे दूँ. और जब अपने को देता हूँ तो इतना आनंद, इतना आनंद की फिर कैसी भूख, कैसी प्यास, कौन मांगने वाला, कौन याचक ?
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 उठो जागो और लक्श्य ..........
उठो जागो और लक्श्य तक पहून्चे बिना रुको मत...........
ऐसा कहना था भारत के उस महान संत स्वामी विवेकानन्द का ! किन्तु प्रिश्न यह उथत है लक्श्य क्या है? एक बदे लक्श्य को पने के लिये हमऐन कई मील के पथर पास कर्ने पडते हैं! मानव जीवन का लक्श्य तो पर्मात्मा को ही पाना है और भारत भूमि इसके लिये सब्से महान है जिसकी गोद मैं खेल खेल कर कितने हि लोगोन ने वो लक्श्य को पाया है ! तभी तो शिकागो सो लौट्ते समय उन्होने जहाज से ब्न्दर्गह पर चल्लन्ग लगा दी और इस पावन भारत की पवित्र मिट्टी मैन लोतैन मरने लगे और कहने लगे कि इतने दिन विदेश मैन रह्कर मेर शरीर अप्वित्र हो गया है और कआफ़ी देर तक उस मिट्टी मैन लोतते ब रहे ध्न्य है ऐस मत्रिभूमि से प्यर और धन्य है ऐसी भारत मां कई पावन माटी ..... उसे कोटि - कोटि प्रनाम...
उन्होने कहा था....."केवल तब और तब ही तुम हिन्दू कहलाने के लायक हो, जब उस शब्द को सुनते ही तुम्हारी रगों में से शक्ती की विद्युत तरंग दौड जाय"
किन्तु आज देश क दुर्भाग्य है कि आज पास्चत्य के अन्धानुकरन पर चल पडे हैन और ब भारत मै धर्म्परिवर्तन जैसे कुच लोगोन के जीवन क प्रमुख उद्देश्य बन ग्या है हमऐन इसे रोकना होग और भर्त को फ़िर से विश्वगुरु बनाना होगा !
शिकागो मओन उनके द्वर कहे गये कुच सुवचन....
१ "The very idea of life implies death and the very idea of pleasure implies pain. The lamp is constantly burning out, and that is its life. If you want to have life, you have to die for it every moment. Life and death are only different expressions of the same thing looked at from different standpoints. They are the falling and rising of the same wave, and the two form one whole. One looks at the "fall" side and becomes a pessimist, another looks at the "rise" side and becomes an optimist."

२ "You have not caught my fire yet--you do not understand me! You run in the old ruts of sloth and enjoyments. Down with all sloth, down with all enjoyments here or hereafter. Plunge into the fire and bring the people towards the Lord. That you may catch my fire, that you may be intensely sincere, that you may die the heroes' death on the field of battle--is the constant prayer of
We cannot add happiness to the world. Similarly, we cannot add pain to it either. The sum total of the energies of pleasure and pain displayed here on earth will be the same throughout. We just push it from this side to the other side, and from that side to this, but it will remain the same, because to remain so is its very nature. This ebb and flow, this rising and falling, is in the world's very nature; it would be as logical to hold otherwise as to say that we may have life without death."

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

कामाख्या पीठ : Kamakhya Peeth




Kamakhya Peeth

कामाख्या पीठ
लिंक http://dharmikraj.blogspot.in/2012/05/kamakhya-peeth.html
हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषणगिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। ये अत्यंत पावन तीर्थ कहलाये। ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है। कामाख्या, 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ है।

कामाख्या पीठ भारत का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जो असम प्रदेश में है। कामाख्या देवी का मन्दिर पहाड़ी पर है, अनुमानत: एक मील ऊँची इस पहाड़ी को नील पर्वत भी कहते हैं। इस प्रदेश का प्रचलित नाम कामरूप है। प्राचीन काल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र-सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। पूर्वोत्तर के मुख्य द्वार कहे जाने वाले असम की नयी राजधानी दिसपुर से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित नीलांचल पर्वतमालाओं पर स्थित माँ भगवती कामाख्या का सिद्ध शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहाँ भगवती की महामुद्रा (योनि-कुंड) स्थित है। लोग माता के इस पिंडी को स्पर्श करते हैं, वे अमरत्व को प्राप्त करके ब्रह्मलोक में निवास कर मोक्ष-लाभ करते हैं। यहाँ भैरव उमानंद के रूप में प्रतिष्ठित हैं। तांत्रिकों की साधना के लिए विख्यात कामाख्या देवी के मंदिर में मनाया जाने वाला पर्व अम्बूवाची को कामरूप का कुम्भ माना जाता है। इस पर्व में माँ भगवती के रजस्वला होने के पहले गर्भगृह स्थित महामुद्रा पर श्वेत वस्त्र चढ़ाए जाते हैं, जो बाद में रक्तवर्ण हो जाते हैं। कामरूप देवी का यह रक्त-वस्त्र भक्तों में प्रसाद-स्वरूप बांट दिया जाता है।

इतिहासकहा जाता है कि माँ कामाख्या के इस भव्य मंदिर का निर्माण कोच वंश के राजा चिलाराय ने 1565 में करवाया था, लेकिन आक्रमणकारियों द्वारा इस मंदिर को क्षतिग्रस्त करने के बाद 1665 में कूच बिहार के राजा नर नारायण ने दोबारा इसका निर्माण करवाया है।

प्रधान पीठ कामाख्या शक्तिपीठ, गुवाहाटी तन्त्रों में लिखा है कि करतोया नदी से लेकर ब्रह्मपुत्र नदी तक त्रिकोणाकार कामरूप प्रदेश माना गया है। किन्तु अब वह रूपरेखा नहीं है। इस प्रदेश में सौभारपीठ, श्रीपीठ, रत्नपीठ, विष्णुपीठ, रुद्रपीठ तथा ब्रह्मपीठ आदि कई सिद्धपीठ हैं। इनमें कामाख्या पीठ सबसे प्रधान है। देवी का मन्दिर कूच बिहार के राजा विश्वसिंह और शिवसिंह का बनवाया हुआ है। इसके पहले के मन्दिर को बंगाली आक्रामक काला पहाड़ ने तोड़ डाला था। सन 1564 ई. तक प्राचीन मन्दिर का नाम 'आनन्दाख्या' था, जो वर्तमान मन्दिर से कुछ दूरी पर है। पास में छोटा-सा सरोवर है।

माहात्म्य वर्णनदेवीभागवत में कामाख्या देवी के महात्म्य का वर्णन है। इसका दर्शन, भजन, पाठ-पूजा करने से सर्व विघ्नों की शान्ति होती है। पहाड़ी से उतरने पर गुवाहाटी के सामने ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य में उमानन्द नामक छोटे चट्टानी टापू में शिव मन्दिर है। आनन्दमूर्ति को भैरव (कामाख्या रक्षक) कहते हैं। कामाख्या पीठ के सम्बन्ध में कालिकापुराण में निम्नांकित वर्णन पाया जाता है-शिव ने कहा, प्राणियों की सृष्टि के पश्चात् बहुत समय व्यतीत होने पर मैंने दक्षतनया सती को भार्यारूप में ग्रहण किया, जो स्त्रियों में श्रेष्ठ थी। वह मेरी अत्यन्त प्रेयसी भार्या हुई। अपने पिता द्वारा यज्ञ के अवसर पर मेरा अपमान देखकर उसने प्राण त्याग दिए। मैं मोह से व्याकुल हो उठा और सती के मृत शरीर को कन्धे पर उठाए समस्त चराचर जगत में भ्रमण करता रहा। इधर-उधर घूमते हुए इस श्रेष्ठ पीठ (तीर्थस्थल) को प्राप्त हुआ। पर्याय से जिन-जिन स्थानों पर सती के अंगों का पतन हुआ, योगनिद्रा (मेरी शक्ति=सती) के प्रभाव से वे पुण्यतम स्थल बन गए। इस कुब्जिकापीठ (कामाख्या) में सती के योनिमण्डल का पतन हुआ। यहाँ महामाया देवी विलीन हुई। मुझ पर्वत रूपी शिव में देवी के विलीन होने से इस पर्वत का नाम नीलवर्ण हुआ। यह महातुंग (ऊँचा) पर्वत पाताल के तल में प्रवेश कर गया।

शक्ति की पूजाइस तीर्थस्थल के मन्दिर में शक्ति की पूजा योनिरूप में होती है। यहाँ कोई देवीमूर्ति नहीं है। योनि के आकार का शिलाखण्ड है, जिसके ऊपर लाल रंग कीगेरू के घोल की धारा गिराई जाती है और वह रक्तवर्ण के वस्त्र से ढका रहता है। इस पीठ के सम्मुख पशुबलि भी होती है। ऐसी मान्यता है कि 'अंबुवासी मेले' के दौरान माँ कामाख्या रजस्वला होती हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सौर आषाढ़ माह के मृगशिरा नक्षत्र के तृतीय चरण बीत जाने पर चतुर्थ चरण में आद्रा पाद के मध्य में पृथ्वी ऋतुवती होती है। यह मान्यता है कि भगवान विष्णु के चक्र से खंड-खंड हुई सती की योनि नीलाचल पहाड़ पर गिरी थी। इक्यावन शक्तिपीठों में कामाख्या महापीठ को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसलिए कामाख्या मंदिर में माँ की योनि की पूजा होती है। यही वजह है कि कामाख्या मंदिर के गर्भगृह के फोटो लेने पर पाबंदी है इसलिए तीन दिनों तक मंदिर में प्रवेश करने की मनाही होती है। चौथे दिन मंदिर का पट खुलता है और विशेष पूजा के बाद भक्तों को दर्शन का मौका मिलता है।

कंपन रोग : पार्किन्‍सन : Parkinson's Disease

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पार्किंसन
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पार्किन्‍सन / पार्किंसन रोग (Parkinson's disease) पार्किन्सोनिज्म / कम्पवात रोग आमतौर से 50 साल से अधिक उम्र वालों को होती है। यह मानसिक स्थिति के बदलाव संबंधित बीमारी है। इसकी पहचान हाथ पैर स्थिर रखने पर उसका कांपना, हाथ पैर जकड़न, लेकिन जब हाथ पैर गति करते हैं, तो उनमें कंपन नहीं होता। मानसिक स्थिति में बदलाव के कारण पार्किसन के मरीज़ की पूरे शरीर की आंतरिक क्रियाओं के साथ बाहरी क्रियाएं भी धीमी हो जाती हैं।
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इतिहास

चिकित्सा शास्त्र में बहुत कम बीमारियों के नाम किसी डाक्टर या वैज्ञानिक के नाम पर रखे गये हैं। आम तौर पर ऐसा करने से बचा जाता है। परन्तु लन्दन के फिजिशियन डॉ. जेम्स पार्किन्सन ने सन् 1817 में इस रोग का प्रथम वर्णिन किया था वह इतना सटीक व विस्तृत था कि आज भी उससे बेहतर कर पाना, कुछ अंशों में सम्भव नहीं माना जाता है। हालांकि नया ज्ञान बहुत सा जुड़ा है। फिर भी परम्परा से जो नाम चल पडा उसे बदला नहीं गया। डॉ. जेम्स पार्किन्सन के नाम पर इस बीमारी को जाना जाता है। इसके बाद से अब तक लगातार इस पर स्टडी चल रही है, लेकिन किसी ख़ास नतीजे तक नहीं पहुंचा जा सका है।[2] पार्किन्सोनिज्म का कारण आज भी रहस्य बना हुआ है, बावजूद इस तथ्य के कि उस दिशा में बहुत शोध कार्य हुआ है, बहुत से चिकित्सा वैज्ञानिकों ने वर्षों तक चिन्तन किया है और बहुत सी उपयोगी जानकारी एकत्र की है। वैज्ञानिक प्रगति प्रायः ऐसे ही होती है। चमत्कार बिरले ही होते हैं। 1917 से 1920 के वर्षों में दुनिया के अनेक देशों में फ्लू (या इन्फ्लूएन्जा) का एक ख़ास गम्भीर रूप महामारी के रूप में देखा गया। वह एक प्रकार का मस्तिष्क ज्वर था। जिसे एन्सेफेलाइटिस लेथार्जिका कहते थे क्योंकि उसमें रोगी अनेक सप्ताहों तक या महीनों तक सोता रहता था। उस अवस्था से धीरे-धीरे मुक्त होने वाले अनेक रोगियों को बाद में पार्किन्सोनिज्म हुआ। 1920 से 1940 तक के दशकों में माना जाता था कि पार्किन्सोनिज्म का यही मुख्य कारण है। सोचते थे, और सही भी था कि इन्फ्लूएंजा वायरस के कीटाणु मस्तिष्क की उन्हीं कोशिकाओं को नष्ट करते हैं जो मूल पार्किन्सन रोग में प्रभावित होती हैं। न्यूयार्क के प्रसिद्ध न्यूरालाजिस्ट लेखक डॉ. ऑलिवर सेक्स ने इन मरीज़ों पर किताब लिखी, उस पर अवेकनिग (जागना) नाम से फ़िल्म बनी - इस आधार पर कि लम्बे समय से सुषुप्त रहने के बाद कैसे ये मरीज़, नये युग में, नयी दुनिया में जागे। रिपवान विकल की कहानी की तरह। सौभाग्य से 1920 के बाद एन्सेफेलाइटिस लेथार्जिका के और मामले देखने में नहीं आए। लेकिन पार्किन्सोनिज्म रोग उसी प्रकार होता रहा है। अवश्य ही कोई और कारण होने चाहिये।
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लक्षण
पार्किन्सन रोग किसी व्यक्ति को अचानक नहीं होता है। यह एक दिमाग का रोग है जो लम्बे समय दिमाग में पल रहा होता है। इस रोग का प्रभाव धीरे-धीरे होता है। पता भी नहीं पडता कि कब लक्षण शुरू हुए। अनेक सप्ताहों व महीनों के बाद जब लक्षणों की तीव्रता बढ जाती है तब अहसास होता है कि कुछ गडबड है।

    जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो रोगी व्यक्ति के हाथ तथा पैर कंपकंपाने लगते हैं। कभी-कभी इस रोग के लक्षण कम होकर खत्म हो जाते हैं। इस रोग से पीड़ित बहुत से रोगियों में हाथ तथा पैरों के कंप-कंपाने के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन वह लिखने का कार्य करता है तब उसके हाथ लिखने का कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं। यदि रोगी व्यक्ति लिखने का कार्य करता भी है तो उसके द्वारा लिखे अक्षर टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। रोगी व्यक्ति को हाथ से कोई पदार्थ पकड़ने तथा उठाने में दिक्कत महसूस होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी के जबड़े, जीभ तथा आंखे कभी-कभी कंपकंपाने लगती है।
    बहुत सारे मरीज़ों में पार्किन्‍सोनिज्‍म रोग की शुरुआत कम्पन से होती है। कम्पन अर्थात् धूजनी या धूजन या ट्रेमर या कांपना। कम्पन अंग में -- हाथ की एक कलाई या अधिक अंगुलियों का, हाथ की कलाई का, बांह का। पहले कम रहता है। यदाकदा होता है। रुक रुक कर होता है। बाद में अधिक देर तक रहने लगता है व अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है। प्रायः एक ही ओर (दायें या बायें) रहता है, परन्तु अनेक मरीज़ों में, बाद में दोनों ओर होने लगता है।
    आराम की अवस्था में जब हाथ टेबल पर या घुटने पर, ज़मीन या कुर्सी पर टिका हुआ हो तब यह कम्पन दिखाई पडता है। बारिक सधे हुए काम करने में दिक्कत आने लगती है, जैसे कि लिखना, बटन लगाना, दाढी बनाना, मूंछ के बाल काटना, सुई में धागा पिरोना। कुछ समय बाद में, उसी ओर का पांव प्रभावित होता है। कम्पन या उससे अधिक महत्त्वपूर्ण, भारीपन या धीमापन के कारण चलते समय वह पैर घिसटता है, धीरे उठता है, देर से उठता है, कम उठता है। धीमापन, समस्त गतिविधियों में व्याप्त हो जाता है। चाल धीमी / काम धीमा। शरीर की माँसपेशियों की ताकत कम नहीं होती है, लकवा नहीं होता। परन्तु सुघडता व स्फूर्ति से काम करने की क्षमता कम होती जाती है ।
    जब यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है तो रोगी की विभिन्न मांसपेशियों में कठोरता तथा कड़ापन आने लगता है। शरीर अकड़ जाता है, हाथ पैरों में जकडन होती है। मरीज़ को भारीपन का अहसास हो सकता है। परन्तु जकडन की पहचान चिकित्सक बेहतर कर पाते हैं - जब से मरीज़ के हाथ पैरों को मोड कर व सीधा कर के देखते हैं बहुत प्रतिरोध मिलता है। मरीज़ जानबूझ कर नहीं कर रहा होता। जकडन वाला प्रतिरोध अपने आप बना रहता है।
    व्यक्ति को चलने-फिरने में बहुत दिक्कत होती है। खडे होते समय व चलते समय मरीज़ सीधा तन कर नहीं रहता। थोडा सा आगे की ओर झुक जाता है। घुटने व कुहनी भी थोडे मुडे रहते हैं। क़दम छोटे होते हैं। पांव ज़मीन में घिसटते हुए आवाज़ करते हैं। क़दम कम उठते हैं गिरने की प्रवृत्ति बन जाती है। ढलान वाली जगह पर छोटे क़दम जल्दी-जल्दी उठते हैं व कभी-कभी रोकते नहीं बनता । चलते समय भुजाएं स्थिर रहती हैं, आगे पीछे झूलती नहीं । बैठे से उठने में देर लगती है, दिक्कत होती है । चलते -चलते रुकने व मुडने में परेशानी होती है । शारीरिक बैलेंस बिगड़ जाता है। जब रोगी की चाल अनियंत्रित तथा अनियमित हो जाती है तो चलते-चलते रोगी व्यक्ति कभी-कभी गिर जाता है।
    चेहरे का दृश्य बदल जाता है। आंखों का झपकना कम हो जाता है।
   
    आंखें चौडी खुली रहती हैं। व्‍यक्ति मानों सतत घूर रहा हो या टकटकी लगाए हो । चेहरा भावशून्य प्रतीत होता है बातचीत करते समय चेहरे पर खिलने वाले तरह-तरह के भाव व मुद्राएं (जैसे कि मुस्कुराना, हंसना, क्रोध, दुःख, भय आदि ) प्रकट नहीं होते या कम नज़र आते हैं।
    खाना खाने में तकलीफें होती है। भोजन निगलना धीमा हो जाता है। गले में अटकता है। कम्पन के कारण गिलास या कप छलकते हैं। हाथों से कौर टपकता है। मुंह से पानी-लार अधिक निकलने लगता है। चबाना धीमा हो जाता है। ठसका लगता है, खांसी आती है।
    आवाज़ धीमी हो जाती है तथा कंपकंपाती, लड़खड़ाती, हकलाती तथा अस्पष्ट हो जाती है, सोचने-समझने की ताकत कम हो जाती है और रोगी व्यक्ति चुपचाप बैठना पसन्द करता है। नींद में कमी, वजन में कमी, कब्जियत, जल्दी सांस भर आना, पेशाब करने में रुकावट, चक्कर आना, खडे होने पर अंधेरा आना, सेक्स में कमज़ोरी, पसीना अधिक आता है।
    उपरोक्‍त वर्णित अनेक लक्षणों में से कुछ, प्रायः वृद्धावस्था में बिना पार्किन्‍सोनिज्‍म के भी देखे जा सकते हैं । कभी-कभी यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि बूढे व्यक्तियों में होने वाले कम्पन, धीमापन, चलने की दिक्कत डगमगापन आदि पार्किन्‍सोनिज्‍म के कारण हैं या सिर्फ़ उम्र के कारण।
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उम्र और संख्या
18 वीं सदी में सामने आई बीमारी 'पार्किन्सन' अभी भी लोगों के लिए एक रहस्य बनी हुई है। पार्किन्सन रोग समूची दुनिया में, समस्त नस्लों व जातियों में, स्त्री पुरुषों दोनों को होता है। लेकिन पुरुषों में इसका असर थोड़ा ज़्यादा देखा गया है। यह मुख्यतया अधेड उम्र व वृद्धावस्था का रोग है। 50 की उम्र पार करने के बाद वैसे तो यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, 60 वर्ष से अधिक उम्र वाले हर सौ व्यक्तियों में से एक को यह होता है। विकसित देशो में वृद्धों का प्रतिशत अधिक होने से वहां इसके मामले अधिक देखने को मिलते हैं। इस रोग को मिटाया नहीं जा सकता है। वह अनेक वर्षों तक बना रहता है, बढता रहता है। इसलिये जैसे जैसे समाज में वृद्ध लोगों की संख्या बढती है वैसे-वैसे इसके रोगियों की संख्या भी अधिक मिलती है। वर्तमान में विश्व के 60 लाख से ज़्यादा लोग इसकी चपेट में हैं। अकेले अमेरिका में ही इससे दस लाख से ज़्यादा लोग प्रभावित हैं, लोगों की औसत उम्र बढ़ने (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) के साथ-साथ भारत में भी इसके शिकारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
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मस्तिष्क की कोशिकाएं
यह बीमारी 50 वर्ष की उम्र के बाद होती है। इससे मरीज़ की शारीरिक गतिविधियां धीमी हो जाती हैं और दिमाग भी सही ढंग से काम करना बंद कर देता है। यह मस्तिष्क के एक छोटे से गहरे केन्द्रीय भाग में स्थित सेल्स के डैमेज होने की वजह से होती है लेकिन आखिर ये सेल्स डैमेज क्यों होती हैं, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। ब्रेन के एक ख़ास हिस्से बैसल गैंग्लिया में स्ट्रायटोनायग्रल नामक सेल्स (स्‍ट्राएटम की कोशिकाओं) होते हैं। सब्सटेंशिया निग्रा (शाब्दिक अर्थ काला पदार्थ) की न्यूरान कोशिकाओं की संख्या कम होने लगती है। वे क्षय होती है। उनकी जल्दी मृत्यु होने लगती है। आकार छोटा हो जाता है। स्‍ट्राएटम तथा सब्सटेंशिया निग्रा (काला पदार्थ) नामक हिस्सों में स्थित इन न्यूरान कोशिकाओं द्वारा रिसने वाले रासायनिक पदार्थों (न्‍यूरोट्रांसमिटर) का आपसी सन्तुलन बिगड जाता है। इन सेल्स से निकलने वाला डोपामिन नामक केमिकल शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए न्यूरोट्रांसमीटर का काम करता है। उनके द्वारा रिसने वाला महत्त्वपूर्ण रसायन न्‍यूरोट्रांसमिटर 'डोपामीन' कम बनता है तथा एसीटिल कोलीन की मात्रा तुलनात्मक रूप से बढ जाती है। इससे इंसान का शारीरिक गतिविधियों पर से कंट्रोल हट जाता है। स्ट्रायनोटायग्रल के मरने का क्या कारण है, इससे अभी भी पर्दा नहीं उठ पाया है। अनेक व्याख्याएं व परिकल्पनाएं हैं । कुछ भूमिका शायद जीन्स या आनुवांशिक गुणों की हो, पर अधिक नहीं।
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कारण
    फिलहाल यह भविष्यवाणी कर पाना असंभव है कि यह बीमारी किसे हो सकती है। हालांकि कुछ स्टडीज से यह पता लगा है कि पार्किन्सन से पीड़ित लगभग दस प्रतिशत मरीज़ों के परिवार में पहले भी इस तरह की समस्या देखी गई थी अर्थात यह वंशानुगत हो सकती है।
    पार्किन्‍सन रोग का मस्तिष्क
    पार्किन्सन रोग व्यक्ति को अधिक सोच-विचार का कार्य करने तथा नकारात्मक सोच ओर मानसिक तनाव के कारण होता है।
    किसी प्रकार से दिमाग पर चोट लग जाने से भी पार्किन्सन रोग हो सकता है। इससे मस्तिष्क के ब्रेन पोस्टर कंट्रोल करने वाले हिस्से में डैमेज हो जाता है।
    कुछ प्रकार की औषधियाँ जो मानसिक रोगों में प्रयुक्‍त होती हैं, अधिक नींद लाने वाली दवाइयों का सेवन तथा एन्टी डिप्रेसिव दवाइयों का सेवन करने से भी पार्किन्सन रोग हो जाता है।
    अधिक धूम्रपान करने, तम्बाकू का सेवन करने, फास्ट-फूड का सेवन करने, शराब, प्रदूषण तथा नशीली दवाईयों का सेवन करने के कारण भी पार्किन्सन रोग हो जाता है।
    शरीर में विटामिन `ई´ की कमी हो जाने के कारण भी पार्किन्सन रोग हो जाता है।
    तरह-तरह के इन्फेक्शन -- मस्तिष्क में वायरस के इन्फेक्शन (एन्सेफेलाइटिस) ।
    मस्तिष्क तक ख़ून पहुंचाने वाले नलियों का अवरुद्ध होना ।
    मैंगनीज की विषाक्तता।

80 के दशक में संयोगवश देखा गया है कि ब्राउन शुगर से मिलती जुलती नशे की एक अन्य वस्तु में एम.पी.टी.पी. नामक पदार्थ की मिलावट वाला इंजेक्शन लगवाने वाले कुछ युवकों में पार्किन्‍सोनिज्‍म रोग तेजी से विकसित होता है । तब अनुमान लगाया गया कि एम.पी.टी.पी. जैसा पदार्थ वातावरण से या शरीर से स्वतः किसी तरह पैदा होकर मस्तिष्क की विशिष्ट कोशिकाओं को नुक़सान पहुंचाता होगा।
इलाज
पार्किन्‍सन रोग का मस्तिष्क में डोपामीन से इलाज
उम्र बढ़ने के साथ होने वाली यह बीमारी दुनिया भर के उम्रदराज़़ लोगों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल बचाव और पर्मानेंट इलाज न सही, लेकिन सामान्य जीवन जीने के लिए दवाएं ज़रूर उपलब्ध हो चुकी हैं। ऐसे में डॉक्टर की सलाह और परिवार के सहयोग से मरीज़ की समस्या को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। इस बीमारी को जड़ से खत्म करने वाला इलाज अभी उपलब्ध नहीं है। लिहाज़ा, इस बीमारी के पेशेंट को जीवनभर दवाई खानी पड़ सकती है। हालांकि दवाओं से रोकथाम हो जाती है। लेकिन बीमारी के असर को कम करने के लिए कई तरह की दवाएं उपलब्ध हैं, जो डोपामिन के स्त्राव को बढ़ाने में मदद करती हैं। लेकिन ये काफ़ी महंगी होती हैं। इनके साइड इफेक्ट्स भी बहुत ज़्यादा देखे जाते हैं, इसलिए विशेषज्ञ की देखरेख में ही ये दवाएं दी जाती हैं। सही तरीक़े से दवाई लेने से मरीज़ 30 साल जक जीवित रह सकता है। पार्किसन के मरीज़ों को दवाइयों का सेवन सही तरीक़े से करना चाहिए। इसके साथ ही इस बीमारी के लिए डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन सर्जरी भी होने लगी है। दिल्ली में यह सुविधा केवल सिर्फ़ एम्स व आर्मी हॉस्पिटल में उपलब्ध है। यहां भी सर्जरी का खर्च लगभग पांच लाख रुपए आता है। मरीज़ों को संभल कर चलना चाहिए क्योंकि वे अचानक लड़खड़ाकर गिर सकते हैं, जिससे पैर हाथ पर चोटें आ सकती है। साथ ही उन्हें शारीरिक श्रम करने पर भी सावधानियां बरतनी चाहिए। बीमारी को जड़ से खत्म करने संबंधित दवाओं पर विश्व के जाने माने न्यूरोलाजिस्ट लगातार रिसर्च कर रहे हैं। डाक्टर जयवेल्लू ने बताया कि रिसर्च अभी एनिमल स्टेप पर है। जल्द यह ह्यूमन स्टेप पर आ जाएगा। इसके बाद पार्किसंस बीमारी भी जड़ से खत्म की जा सकेगी।

प्राकृतिक चिकित्सा
    पार्किन्सन रोग को ठीक करने के लिए 4-5 दिनों तक पानी में नीबू का रस मिलाकर पीना चाहिए। इसके अलावा इस रोग में नारियल का पानी पीना भी बहुत लाभदायक होता है।
    इस रोग में रोगी व्यक्ति को फलों तथा सब्जियों का रस पीना भी बहुत लाभदायक होता है। रोगी व्यक्ति को लगभग 10 दिनों तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।
    सोयाबीन को दूध में मिलाकर, तिलों को दूध में मिलाकर या बकरी के दूध का अधिक सेवन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
    रोगी व्यक्ति को हरी पत्तेदार सब्जियों का सलाद में बहुत अधिक प्रयोग करना चाहिए।
    रोगी व्यक्ति को जिन पदार्थो में विटामिन `ई´ की मात्रा अधिक हो भोजन के रूप में उन पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए।
    रोगी व्यक्ति को कॉफी, चाय, नशीली चीज़ें, नमक, चीनी, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
    प्रतिदिन कुछ हल्के व्यायाम करने से यह रोग जल्दी ठीक हो जाता है।
    पार्किन्सन रोग से पीड़ित रोगी को अपने विचारों को हमेशा सकरात्मक रखने चाहिए तथा खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए।
    इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से प्रतिदिन उपचार करे तो पार्किन्सन रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
पार्किन्‍सन से जुङे शोध और प्रयोग
कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से पार्किंसन का ख़तरा
शरीर में कोलेस्ट्रॉल की अधिक मात्रा को लेकर चिकित्सक सावधान करते रहते हैं। अब एक ताजा अध्ययन में कहा गया है कि शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अधिक होने पर पार्किंसन रोग की आशंका बढ़ जाती है। फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में नैशनल पब्लिक हेल्थ इंस्टीट्यूट के प्रमुख रिसर्चर डॉ. गांग हू ने कहा कि कोलेस्ट्रॉल अधिक होने से हृदय रोग के खतरे की बात तो पहले ही पता थी, लेकिन सीरम में कोलेस्ट्रॉल के स्तर से तंत्रिका तंत्र को नुक़सान के बारे में बहस जारी थी। इस शोध से यह बात साफ हो गई है कि शरीर में अधिक कोलेस्ट्रॉल का अर्थ है, खतरनाक पार्किन्सन रोग का बढ़ा जोखिम।

आसानी से बात कर सकेंगे ‘पार्किंसन’ रोगी
वॉशिंगटन: एक विशेषज्ञ ने दावा किया है कि पार्किंसन के रोगी बातचीत के एक सामान्य तरीक़े पर अमल कर आवाज़ में असामान्य कम्पन की समस्या से मुक्त होकर सहज तरीके से बातचीत कर सकते हैं। पर्ड्यू विश्वविद्यालय में वाणी, भाषा एवं श्रवण विज्ञान विभाग की सहायक प्रोफेसर जेसिका ह्यूवर ने बातचीत का यह तरीका सुझाया है। वह कहती हैं, “इस रोग से ग्रस्त लोगों को अमूमन बातचीत करने में लड़खड़ाहट होती है। आवाज़ में असामान्य कम्पन होने के कारण वे सहज तरीके से बात नहीं कर पाते हैं। मेरा सूत्र बिल्कुल सरल है। ऐसे लोगों को ऊंचे स्वर में बोलने के लिए कहिए। इससे उनकी आवाज़ में स्पष्टता आएगी।” उन्होंने जो तरीका विकसित किया है उसमें रोगियों को तेज़ बोलने को कहा जाता है, जबकि उनके बोलने के दौरान कई लोगों की बातचीत वाला कैसेट बजाया गया। कई लोगों की बातचीत वाला यह कैसेट किसी रेस्तरां तैयार किया गया। वह कहती हैं, “जब मैंने इसके रोगियों से दो बार तेज़ बोलने के लिए कहा तो वे 10 डेसीबेल से ज़्यादा तेज़ नहीं बोल पाए, लेकिन जब शोरगुल वाले कैसेट को साथ-साथ बजाया गया तो इन लोगों की आवाज़ 10 डेसीबेल से तेज़ हो गई।” पृष्ठभूमि की आवाज़ के इस प्रभाव को ‘लोम्बार्ड प्रभाव’ कहते हैं। सामान्य लोग भी शोरगुल के बीच तेज़ आवाज़ में बोलते हैं। इस रोग के मरीज़ों पर वे यही तरीका अपनाए जाने की सलाह देती हैं।

पार्किंसन मरीज़ों के लिए डीबीएस थैरेपी
पार्किंसन मरीज़ों के लिए डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (डीबीएस) थेरेपी उम्मीद की किरण लेकर आया है। नई दुनिया, दिल्ली संस्करण में आज प्रकाशित खबर के मुताबिक, 65 वर्षीय रवीश कुमार रस्तोगी ने पांच महीने तक इस थेरेपी से इलाज कराया, जिसके बाद बहुत हद तक ठीक हो गए हैं और कविताएं लिखने का अपना पुराना शौक़ पूरा कर रहे हैं। क़रीब 12 साल पहले उन्हें पार्किंसन होने का पता चला था तभी से वह शारीरिक व मानसिक कमज़ोरियों के काण समाज से पूरी तरह कट से गए थे। पांच महीने पहले मैक्स अस्पताल में उन्होंने यह थेरेपी लेनी शुरू की और अब जीवन को सही तरीके से जी रहे हैं। साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में के न्यूरॉलिस्ट डॉ.पुनीत अग्रवाल व न्यूरो सर्जन डॉ.संदीप वैश्य ने बताया कि डीबीएस एक सर्जिकल प्रक्रिया है। इसका उपयोग अक्षम बनाने वाले कई न्यूरोलॉजिकल लक्षण के उपचार के लिए किया जाता है। इस समय इस प्रक्रिया का उपयोग सिर्फ़ उन मरीज़ों के लिए किया जाता है जिनकी बीमारी के लक्षणों को दवाइयों से अच्छी तरह ठीक नहीं किया जा सकता है।

पार्किंसन से बचाता है विटामिन 'डी'
जिन व्यक्तियों के शरीर में विटामिन 'डी' बड़ी मात्रा में मौजूद है, उनमें पार्किंसन बीमारी होने का ख़तरा कम होता है। यह बात एक नए शोध से पता चली है जो फिनलैंड में किया गया है। फिनलैंड में समस्या यह है कि दूसरे यूरोपीय देशों की तुलना में वहाँ सूरज पूरे साल में बहुत ही कम दिखाई देता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि जब लंबे समय तक शरीर में विटामिन 'डी' की मात्रा कम रहती है, तब ब्रेन के अंदर ऐसा नुक़सान होता है जिसकी वजह से पार्किंसन हो सकता है। सूरज की किरणें विटामिन 'डी' का बड़ा स्रोत हैं। बहुत ही कम ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जिनमें विटामिन 'डी' पाया जाता है। यदि शरीर में विटामिन 'डी' की मात्रा कम होती है तो उससे हड्डियों में कमोजरी, कैंसर, दिल की बीमारियों और डायबिटीज हो सकती है, लेकिन अब विटामिन 'डी' की कमी पार्किंसन की वजह भी बन सकती है। फिनलैंड में 1978 से 2007 तक हुई रिसर्च में 3173 लोगों को शामिल किया गया था। उनमें से 50 लोग आखिरकार पार्किंसन का शिकार बने। रिसर्च के मुताबिक जिन लोगों के शरीर में विटामिन 'डी' की कोई कमी नहीं थी, उनमें पार्किंसन का शिकार होने का ख़तरा 67 फीसदी कम था।

दिमाग के अनसुलझे रहस्यों का चलेगा पता
पार्किसन मरीज़ों के लिए खुशखबरी है। अब न्यूरोसाइंटिस्ट नई ब्रेन इमेजिंग तकनीक को अपनाने जा रहे हैं जिससे पार्किंसन पीड़ितों के दिमाग की संरचना के अनसुलझे रहस्यों का पता लगाया जा सकेगा। इसके अलावा ख़ून की मात्रा और प्रवाह से जुड़ी अन्य जानकारियां सामने आएगी। इस तकनीक को पहली बार किसी इंसान के लिए उपयोग किया जा रहा है। इस ब्रेन इमेजिंग तकनीक को आर्टेरियल स्पिन लेबलिंग नाम दिया गया है। यह एएसएल तकनीक पार्किंसन मरीज़ों के लिए बनाए जा रहे ख़ास दवा का परीक्षण करेगी। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी आफ मेडिसिन के रिर्सचरों ने बताया कि इस तकनीक की मदद से नई दवा का परीक्षण बेहतर ढंग से किया जा सकेगा।

कॉफ़ी की चुस्की से पार्किंसन उड़न छू!
आमतौर पर लोग अपनी थकान दूर करने के लिए चाय और कॉफ़ी पीते हैं। लेकिन क्या आप जानते है कि कॉफ़ी की ये चुस्कियां पार्किनसन जैसी गंभीर बीमारी के लिए वरदान साबित हो सकती हैं। क्योंकि लिस्बन यूनिवर्सिटी के अतंर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने ये दावा किया है कि कॉफ़ी में मौजूद कैफ़ीन से पार्किनसन होने का ख़तरा कम हो जाता है। कॉफ़ी पीने वालों में से 26 लोगों पर किए गए शोध के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि कॉफी पीने से पार्किसन का ख़तरा कम हो जाता है। रोज़ाना दो से तीन कप कॉफ़ी पीने से पार्किनसन होने की संभावना 14 फ़ीसदी कम हो जाती है। हालांकि अब तक इस बात का साफ़ तौर पर पता नहीं चल पाया है कि पार्किनसन से लड़ने में कैफ़ीन ही कारागार साबित हो रही है या कॉफ़ी में मौजूद दूसरे तत्व। फ़िलहाल इस मामले में शोध जारी है, वहीं कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि भारी मात्रा में चाय कॉफ़ी पीना सेहत के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।

डरावने सपने पार्किसन का पहला संकेत
बार्सिलोना. जो लोग सोते वक़्त अचानक चीखने या रोने लगते हैं उन्हें आगे चलकर पार्किसन बीमारी हो सकती है। स्पेन के वैज्ञानिकों का कहना है कि जो लोग ‘आरईएम स्लीप डिस्टर्बेस’ नामक विकार से पीड़ित होते हैं उन्हें पार्किसन और डिमेंशिया होने का ख़तरा होता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इस विकार से पीड़ित 60 वर्ष से अधिक उम्र के 20 प्रतिशत लोगों को आगे चलकर पार्किसन या लेवी बॉडी डिमेंशिया बीमारी ने जकड़ लिया। बार्सिलोना स्थित हॉस्पिटल क्लीनिक के डॉ. एलेक्स इरांजो और उनकी टीम ने इस विकार से पीड़ित 60 वर्ष से अधिक उम्र के 43 मरीज़ों पर अध्ययन किया।

ब्लड टेस्ट से पता लगेगा पार्किसन
ब्रिटेन के वैज्ञानिक रक्त जांच के जरिए पार्किसन बीमारी का इलाज ढूंढ रहे हैं। इससे आरंभिक स्तर पर ही बीमारी का पता लगाने में मदद मिलेगी। पूर्व में किए गए शोधों में कहा गया है कि जितनी जल्दी इस बीमारी का इलाज शुरू कर दिया जाए, उतना ही मरीज़ के लिए बेहतर होगा, क्योंकि इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं से बीमारी के कारण दिमाग की कोशिकाओं को होने वाले नुक़सान को कम करने में मदद मिलेगी। किसी को जब यह बीमारी होती है, तो वह रक्त में "अल्फा-साइनूक्लीन" नामक प्रोटीन छोड़ती है। इसी प्रोटीन का स्तर जानने के लिए रक्त जांच का सहारा लिया जा रहा है। पार्किसन बीमारी तब होती है जब गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार दिमागी कोशिकाएं खत्म होने लगती हैं। हालांकि, इस बीमारी का पूर्ण रूप से इलाज उपलब्ध नहीं हैं। शोध दल के प्रमुख डॉक्टर पैन्नी फोल्डस ने कहा, जितना जल्दी हम इसका इलाज कर सकें, उतना ही बेहतर होगा। जब तक लक्षणों का पता चलता है, तब तक 70 प्रतिशत दिमागी कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं।

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

विवेकानन्द के कुछ प्रेरणादायी विचार


प्रेरणादायी विचार
विवेकानन्द के कुछ प्रेरणादायी विचार
श्री विवेकानन्द की कोई परिचय देने की आवश्यकता नहीं है। वे एक महात्मा, एक सन्यासी, वेदांत पर पकड़ रखनेवाले विद्वान थे। अपने ३९ वर्ष के छोटे जीवन में उन्होने विश्व को काफी विचारोत्तेजना दिए। १८९३ में शिकागो के धर्मं संसद में दिए गए भाषण से उन्होने बहुत प्रसिद्धि पाई। वे विभिन्न संस्कृतियों का वृहद् ज्ञान रखनेवाले व्यक्ति थे।
श्री विवेकानन्द ने मानव सेवा को अत्यधिक महत्त्व दिया। उन्होने मानव सेवा की तुलना प्रभु वंदना से की है। उन्होने हर मानव में परम आत्मा की अनुभूति की है। इसके अतिरिक्त वे एक परम देशभक्त थे और उन्हें भारतीय होने का गर्व था। उन्होने भारतीयों को मुक्त होने का आवाहन किया था।
यहाँ पाठकों के लिए उनके कुछ विचार प्रस्तुत है: -
001- आनंदित रहें; दूसरो की आलोचना न करें, अपना संदेश दें, आप जो सिखाना चाहते हैं वह सिखाएं, और वहीं रूक जाएँ।
001- हितकर को अपनाएं और रुचिकर का त्याग करें।
001- उन्नत्ति कर, आगे बढ़, ओ बहादुर आत्मा! उनको आजाद करने के लिए जो जकड़े हुए हैं, दुखितों का भार कम करने और अज्ञानी हृदयों के गहन अंधकार को जाज्वल्यमान करने के लिए।
001- आभार मिले या नहीं, सो मत, निर्बल मत बन।
001- बुरे का साथ छोड़ो, क्योंकि तुममें पुराने घावों का दाग है, और बुरे लोगों का साथ वह चीज़ है जो घाव कुरेदने में सक्षम है।
बहादुर और खरा बनो; तब अनुराग से किसी पथ का अनुसरण करो, और तुम अवश्य सम्पूर्ण तक पहुंच जाओगे।
मुक्त हो, और तब जितने भी चाहो व्यक्तित्व रखो, तब हम एक अभिनेता की तरह मंच पर आएंगे और एक भिखारी के पात्र का अभिनय करेंगे।
001- जिस व्यक्ति की तुमने मदद की है उसका आभार प्रकट करो, उसे भगवान जैसा समझो।
विश्व में रहो, लेकिन इसके मत बनो, कमल की पत्तियों की तरह जिसका जड़ कीचड़ में होते हुए भी पवित्र रहता है।
001- ईशा का प्रतिरूप मत बनो, ईशा बनो।
001- निराश मत हो, जब पवित्र सुधा पहुंच में न हो तो इसका मतलब यह नहीं की हम विष का सेवन करें।
001- मेरी या अपनी सफलता से हवा में मत उड़ो; काफी बड़े काम करने हैं; यह छोटी सफलता क्या है उस आनेवाले कार्य की तुलना में?
001- हर एक के विभिन्न मतों के साथ निर्वाह करो, धैर्य, शुचिता और धीरज की विजय होगी।
001- अविश्वास के साथ शुरुआत करो। विश्लेषण करो, परीक्षा लो, सिद्ध करो और फिर ग्रहण करो।
001- ना तो मनुष्य या ना भगवान को या न इस विश्व में किसी अन्य को दोष दो और अच्छा करने का प्रयत्न करो।
001- सभी अच्छी शक्तियों को इकठ्ठा करो, इसकी चिंता मत करो कि तुम किस परचम के तले कार्यरत हो, अपने वर्ण कि चिंता मत करो - हरा, नीला या लाल, परन्तु सभी रंगों को मिला दो और श्वेत तीव्र पुंजा बनाओ जो कि प्यार का रंग है।
001- प्रकाश लाओ; अँधेरा अपने आप छंट जाएगा।
अपने स्वयं के कमल को खिलाओ, मधुमक्खी अपने आप आएगी।
सर्वश्रेष्ठ आदर्श को चुनो और अपना जीवन इस पर न्यौछावर कर दो।
स्वयं पर विजय पाओ और सम्पूर्ण जगत तुम्हारा है।
हमेशा स्वयं पर विश्वास पैदा करो।
मुक्त होने का साहस करो, अपने स्वछन्द विचारों के साथ जाने का साहस करो और उन विचारों को जीवन में अपनाने का साहस करो।
अहर्निश अपने आप से कहो, "मैं वह (ईश्वर) हूँ"।
कुछ भी इच्छा मत रखो, लालसा छोड़ो और पूर्ण संतुष्टि पाओ।
इस भारतीय जीवन से अलग मत हो; एक पल के लिए भी ऐसा मत सोचो कि अगर भारतीय अन्य संस्कृति वाले लोगों के तरह कपड़े पहने, भोजन करें एवं व्यवहार करें तो यह भारत के लिए अच्छा होगा।
इसकी परवाह मत करो कि कोई तुम्हारी सहायता करेगा। क्या भगवान सभी मानव सहायता से अत्यधिक समर्थ नही है?
एक पल के लिए भी देर मत करो, कल के लिए कुछ भी मत छोड़ो - निर्णायक घड़ी के लिए तैयार हो जाओ, वो तत्काल आ सकता है, अभी भी।
विध्वंस मत करो। रुढियों को बदलने वाले सुधारकों से संसार का कुछ भला नहीं होता। तोड़ो मत, गिराओ मत पर निर्माण करो। अगर कर सकते हो तो सहायता करो, अगर नहीं तो हाथ जोड़कर खरे रहो और देखो। अगर तुम सहायता नहीं कर सकते हो तो कष्ट मत दो।
किसी से घृणा मत करो, क्योंकि तुमसे निकली घृणा दीर्घावधि में अवश्य ही तुम तक वापस आएगा।
दूसरो को कष्ट मत दो। सभी को अपने आप के जैसे प्यार करो क्योंकि संसार एक है। दूसरो को कष्ट देने में मैं खुद को भी नुकसान पहुँचा रहा हूँ और दूसरो को प्यार करने में मैं अपने आप को प्यार कर रहा हूँ।
किसी पर भी तरस मत खाओ, सभी को अपने बराबर समझो, अपने आपको मूलभूत पाप असमता से निर्मल करो।
ये मत कहो कि हम निर्बल हैं; हमलोग कुछ भी और सबकुछ कर सकते हैं। हम क्या नही कर सकते हैं? सब कुछ हमारे द्वारा किया जा सकता है। हम सबके पास एकसमान महान आत्मा है, हम इसमे विश्वास करें।
अपनी उर्जा बात करने में मत खर्चा करो, अपितु शांति में ध्यान करो और बाहरी शोर शराबे को स्वयं को मत परेशान करने दो।
मूर्खों की तरह सभी कहे गए बातों को अपनी सम्मति मत दो। अगर मैं भी कुछ घोषित करूं तो उसमे अपनी अंतर्निहीत विश्वास मत दो। सर्वप्रथम अच्छी तरह समझो तब स्वीकार करो।
हर विचार जो तुम्हें शक्ति देता हो उसका अनुपालन करो और जो विचार तुम्हे कमजोर करे उसका त्याग करो।
प्रत्येक व्यक्ति को शासन करने से पहले आज्ञा पालन करना सीखना चाहिऐ।
इसलिए मन को उच्च विचारों और उच्चतम आदर्शों से युक्त करो, अहर्निश उसका ध्यान करो, तब उसके द्वारा महान हाँ कार्य सिद्ध होगा। अपवित्रता पर बात मत करो, अपितु यह कहो कि हम पवित्र हैं।
प्रथम चरित्र का निर्माण करो, प्रथम अध्यात्म उपार्जित करो और परिणाम अपने आप आयेगा।
सर्वप्रथम, हमारे युवा शक्तिशाली बने, धर्म उसके बाद आएगा। वीर्यवान बने मेरे युवा मित्र; यह तुम्हे मेरी सलाह है।
ह्रदय की सुनो, एक सच्चा दिल ज्ञान से आगे तक को देखता है; ये प्रेरित होता है; ये वह जानता है जो बुद्धि कभी जान ही नहीं सकती और जब कभी भी सच्चे ह्रदय और ज्ञान में मतभेद हो, हमेशा सच्चे ह्रदय का पक्ष लो जबकि तुम्हे यह भी पता हो कि जो तुम्हारा दिल सोच रहा है वह अतर्कसंगत है।
अपने सभी कर्मों का भार ईश्वर पर छोड़ दो; सब कुछ त्याग दो, अच्छा और बुरा दोनों।
जाओ और सबको कह दो, " तुम सभी में शास्वत शक्ति है और उसे जगाने का यत्न करो"।
अपने समक्ष यह लक्ष्य रखो - " जनसाधारण का उद्धार बिना उनके धर्मं को क्षति पहुँचाये हुए"।
दूसरो की सारी अच्छाइयों को सीखो। इसे अपने में समाह्रित करो और अपने ढंग से ग्रहण करो; दुसरे मत बन जाओ।
सबको यह शिक्षा मिलनी चाहिऐ कि ईश्वर उनके अन्दर है और हर व्यक्ति को अपना मोक्ष स्वयं पाना है।
बचपन से ही आनंददायक, सशक्त और उपकारी विचार उनके (बच्चों के ) मन में प्रविष्ट हो जाये।
हम साहसी बने, सत्य को जाने और सत्य का अभ्यास करें। लक्ष्य शायद दूर है पर उठो, जागो और लक्ष्य पाने तक रुको मत।
इसे एक नियम बना लो कि योगाभ्यास के बिना भोजन ना करें; अगर तुम यह करोगे तो भूख की शक्ति तुम्हारे आलस्य को मिटा देगी।
एक बार फिर अद्वैत के शक्तिशाली ध्वज को उठाओ, क्योंकि कहीं और तुम्हे वो नैसर्गिक स्नेह नहीं मिलेगा जब तक कि तुम यह न देखो कि ईश्वर हर एक में विद्यमान है।
मानव का अध्ययन करो, वह एक जीवंत कविता है।
बोलो, " अज्ञानी भारतीय, गरीब और दरिद्र भारतीय, ब्राह्मण भारतीय और चंडाल भारतीय मेरे भाई है"।
सबकुछ देखो, सबकुछ करो किन्तु आसक्त मत हो। जिस पल परम आसक्ति होगी, मनुष्य अपने आप को खो देता है, इसमे उपरांत वह अपने आप का स्वामी नहीं होता, वह दास बन जाता है।
खड़े हो जाओ, निर्भीक रहो, शक्तिशाली रहो। अपने कन्धों पर सारे उत्तरदायित्व लो और इसे जानो कि तुम अपने नियति के सृजनहार हो। सारी शक्ति और सहायता जो तुम चाहते हो वह तुम्हारे अन्दर मौजूद है।
सब कुछ फ़ेंक दो, अपनी मुक्ति को भी, और जाओ और दूसरो की मदद करो।
हम आसमान जैसे खुले हों, समुद्र की तरह गहरे हों, हममें धर्मोंन्मत्त जैसा उत्साह हो, रहस्यवादियों जैसी गहराई और संशयवादी जैसे बृहद विचार हों।
तुम हर संप्रदाय के व्यक्तियों के साथ अपनी सहानुभूति अवश्य रखो।
तुम अवश्य अपने शरीर, मन और वाकशक्ति को संसार के भलाई में लगाओ।
तुम कभी दूसरो के पथ का अनुसरण मत करो, क्योंकि वह उसका रास्ता है, तुम्हारा नही।

 आनंदतिरेक रहना ही जीवन है
आनंदमय विचारों से रचनात्मक ब्रह्मांडिय किरणें निकलती है। ये मानवों का विकास करती है और हमारे आस पास के वातावरण को शुद्ध करती है। "मैं कर सकता हूँ" या "हम कर सकते हैं" जैसे वाक्य, शक्तिपुंज का निस्सारण करते हैं। हमलोग इस विशिष्ट शक्ति का ज्ञानपूर्वक और तरीके से इस्तेमाल कर अपने आपको सामर्थ्यवान बना सकते हैं। उर्जा सरंक्षण की तरह हम अपने ऋणात्मक विचारों को कम करके, धनात्मक विचारों को सरंक्षित कर सकते हैं।
सकारात्मक धारणा एक आदमी को सुदृढ़ और विश्वासी बनाता है। इस धारणा का मतलब केवल ये दुहराना नही है की - " सब कुछ ठीक होगा" या " मैं अपनी मंजिल पा लूँगा" इत्यादि, इत्यादि। सकारात्मक दृष्टिकोण एक सम्पूर्ण शैली है। ये शैली बताती है कि एक व्यक्ति इस दुनिया में अपने आपको किस प्रकार चलाता है। स्वयं एवं अपने आस पास के व्यक्ति के प्रति समर्पण इसका एक माप हो सकता है। मेरे विचार से अपने स्वास्थ्य का अच्छी तरह ध्यान रखना किसी व्यक्ति के सबसे बड़े सकारात्मक दृष्टिकोण को चिन्हित करता है। अच्छी लहरों को उत्सर्जित करने के लिए हमे शारीरिक और मानसिक रुप से योग्य होना पड़ेगा।
यह संसार जीव जंतुओं से भरा हुआ है, जिसमे मानव को विशिष्ट तर्क शक्ति से युक्त किया गया है। यह विशेष ज्ञान हमे और ज्यादा उत्तरदायी बनता है। हमारा अपने सहभागी और अन्य जीव जंतुओं के प्रति उत्तरदायित्व अति महत्वपूर्ण हो जाता है। हमे इस चुनौती को स्वीकार करना होगा। हमे इस विश्व को रिहाइश के लिए एक बेहतर स्थान बनाना है। इस विश्व को और अच्छा बनाने के लिए हमे सुक्ष्म चीजों पर मेहनत करना होगा। सुक्ष्म चीजों में सुधार लाकर व्यापक परिवर्तन किये जा सकते हैं।
आज के विश्व में लोग असंतुष्ट है। वे विश्व में मौजूद अंतर्विरोध और संघर्ष से असंतुष्ट है। नैतिक मूल्यों, ईमानदारी और आदर्षा सामाजिक व्यवहार पर दवाब और खिंचाव है। मैं विलास और गरीबी के बीच के खाई को देख कर अचंभित हूँ। भौतिक प्रचुरता की चमक और दीन हीन गरीबी का अन्धकार संग संग हैं। एक विस्मयकारी समूह अशिक्षित है और उनमे से बहुत को दो जून का भोजन तक प्राप्त नहीं होता है। उनके लिए स्वास्थ्य सेवा एक विलासिता है। कई तो इतने अभागे हैं कि उन्हें अपनी बीमारी की वजह और मृत्यु के कारण तक का पता नहीं चलता। सभ्यताओं में संघर्ष है। जलवायु में परिवर्तन और बदतर हो रहा है। व्यापार नीतियां असंतुलित है। वैश्विक राजनीति अति संकीर्ण हो गई है। एक व्यक्ति की इच्छा, एक पूरे राष्ट्र के न्यायसंगत हित से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। प्रौद्योगिकी विकास की दिशा व्यापक जनहित की ओर नही है। प्रतिदिन, हम एक बर्बरतापूर्ण मानव व्यवहार से चकित होते हैं, वंचना की कथा से शर्मसार होते हैं और असभ्य आचरण से स्तंभित होते हैं। यहाँ वहाँ अति उग्र व्यवहार देखने को मिलता है। विवेक पीछे हट गया है। व्यक्ति खत्म हो गया है। अब वह मात्र एक समूह, गिरोह, जाति, खेमा, भीड़ अथवा झुंड का भाग है । कोई भी विवेक का इस्तेमाल नही कर रहा है और न ही नीति और सदाचार का पालन कर रह है ।
यह सब व्यक्ति में अबाधित और नैसर्गिक आनंद उर्जा के प्रवाह में बाधक है। हमे रचनात्मकता के विकास के लिए प्रयास करना होगा। मानव मस्तिष्क असीम क्षमताओं का भंडार है। हमे इसके सामर्थ्य को प्राप्त करना होगा। हम अपने आप से शुरुआत कर सकते हैं। हम इस समाज, देश, विश्व एवं ब्रह्माण्ड के अविभाज्य अंग हैं।
सामान्य विश्लेषण से ज्ञात होता है कि हमारे ज्यादातर संकट मानव जनित है। अतः इसका निराकरण हमे अपने आपको समर्पित कर किया जा सकता है। अगर हम अच्छे बन जाएँ तो यह विश्व अवश्य अच्छा बन जाएगा। हमारी सम्मिलित धनात्मक उर्जा इस विश्व को बदल सकती है। जॉन ऍफ़ केनेडी ने कहा था, " हमारे संकट मानव निर्मित हैं, अतः वे मनुष्य द्वारा हल किये जा सकते हैं। मानव भविष्य की कोई भी समस्या मानव दक्षता से ऊपर नही है।" मुझे इस कथ्य में पूर्ण विश्वास है और मैं यह आशा करता हूँ कि आपका भी इसमें घोर विश्वास हो।
और आनंद दायक विचारों के साथ वापस लौटूंगा ....

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

काले धन से भारत को हुआ 123 अरब डॉलर नुकसान




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काले धन से भारत को हुआ 123 अरब डॉलर नुकसान
आईएएनएस Dec 18, 2012

http://khabar.ibnlive.in.com/news/87902/1
वाशिंगटन। काले धन के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को पिछले एक दशक में 123 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। अकेले वर्ष 2010 में 1.6 अरब डॉलर मूल्य का काला धन देश से बाहर गया। एक अधिकारी ने कहा कि भारतीय नागरिकों पर यह आंकड़ा प्रभावित करने वाला है। यह खुलासा वाशिंगटन स्थित शोध और एडवोकेसी संगठन 'ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी' (जीएफआई) की रिपोर्ट से हुआ है। रिपोर्ट में भारत को आठवां सबसे बड़ा ऐसा देश बताया गया है। जहां से सबसे अधिक पूंजी अवैध तौर पर बाहर गई। इस मामले में भारत का स्थान चीन, मेक्सिको, मलेशिया, सऊदी अरब, रूस, फिलीपीन्स और नाइजीरिया के बाद है।
इलिसिट फाइनेंशियल फ्लोज फ्रॉम डेवलपिंग कंट्रीज: 2001-2010' शीर्षक रिपोर्ट में कहा गया कि वर्ष 2010 में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से 858.8 अरब डॉलर की अवैध राशि बाहर गई। जबकि वैश्विक वित्तीय संकट से एक वर्ष पहले वर्ष 2008 में यह राशि 871.3 अरब डॉलर के रिकार्ड स्तर पर थी। जीएफआई के निदेशक रेमंड बेकर ने कहा कि हाल के वर्षों में हालांकि प्रगति हुई है। लेकिन भारत को काले धन की वजह से बड़ी राशि का नुकसान होना जारी है।

उन्होंने कहा कि भारत के काले धन को वापस लाने पर मीडिया में काफी चर्चा हुई है हालांकि भारत इसे खो चुका है। उन्होंने नीति निर्माताओं को सलाह दी कि उन्हें पूंजी के अवैध बहिप्रवाह को रोकने को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखना चाहिए।
रिपोर्ट के सह लेखक और अर्थशास्त्री डेवकर ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए 123 अरब डॉलर का नुकसान एक बड़ा नुकसान है। यह राशि शिक्षा, स्वास्थ्य और देश के बुनियादी ढांचे को उन्नत बनाने के लिए इस्तेमाल में लाई जा सकती थी।
       नवंबर 2010 में जारी जीएफआई रिपोर्ट 'द ड्राइवर्स एंड डायनेमिक्स ऑफ इल्लिसिट फायनेंशियल फ्लोज फ्रॉम इंडिया: 1948-2008' के मुताबिक 1948 से 2008 के बीच देश से 462 अरब डॉलर की पूंजी बाहर गई। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की अंडरग्राउंड अर्थव्यवस्था सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की 50 फीसदी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विकासशील देशों को काले धन के कारण वर्ष 2001 से 2010 के बीच 58.60 खरब डॉलर का नुकसान हुआ|जीएफआई ने वैश्विक नेताओं को सलाह दी कि अवैध पूंजी बहिप्र्रवाह को रोकने के लिए वैश्विक वित्तीय प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाई जानी चाहिए।

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

हिन्दू धर्म के महानायक आदि जगद्गुरु शंकराचार्य की जन्मभूमि



हिन्दू धर्म के महानायक आदि जगद्गुरु शंकराचार्य की जन्मभूमि
केरल में स्थित कलाड़ी ग्राम में उनकी जन्म स्थान पर बना हुआ मंदिर,इस ग्राम में वो अपने जन्म के बाद 8 वर्ष तक रहे फिर उन्होंने भारत भर में हिन्दू धर्म की पुनर्स्थापना के अपने जन्म के उद्देश्य की पूर्ती के लिए घर छोड़ने का विचार किया और संन्यास लेने के बहाने 8 वर्ष की उम्र में अपना घर छोड़ दिया किन्तु वो अपनी माँ को वचन दे गए की तुम्हारे जीवन के अंतिम दिनों में मैं तुम्हारे स्मरण करते ही तुम्हारे पास जरुर आऊंगा| पुनः वो इस घर में आपस आये थे जब उनकी माँ की अंतिम साँसे चल रही थी तब वो भारत में पुनः हिन्दू धरम की पुनर्स्थापना के कार्य में लगे हुए थे वही से कर्णाटक से वो केरला वापस आये थे
क्योकि शंकराचार्य ने 5 वर्ष की अवस्था से ही हिन्दू धर्म के मूल स्वरुप को प्रकाशित करना शुरू कर दिया था इसी कारण उनके घर विद्वानों का आना जाना लगा रहता था वयोवृद्ध विद्वान् भी बालक शंकर की अद्भुत प्रतिभा के बारे में सुनकर उनके शास्त्र सम्बन्धी शंखाओ का समाधान करवाने आते थे और शंकारचार्य सभी की शंकाओं का समाधान करते थे 8 वर्ष की अवस्था आते आते केरल राज्य के लगभग सभी बड़े बड़े विद्वान् उनका शिष्यत्व स्वीकार कर चुके थे
क्योकि शंकराचार्य कर्मकांड की जगह अद्वेत मत को श्रेष्ठ बताते थे और इससे ब्राह्मणों की आवश्यकता ख़तम हो जाती थी इसलिए ब्राह्मणों ने उनका बहिष्कार किया हुआ था इसलिए उन्होंने आठ वर्ष की अवस्था में ब्राह्मणों के बहिष्कार के बावजूद संन्यास लेने की विधि ( ये एक अद्भुत कार्य था ) भी स्वयं पूरी की थी और अंत में उन्होंने स्वयं अकेले ही अपनी माँ के अंतिम संस्कार सम्बन्धी सभी क्रियाये पूर्ण की | उस दौर में शंकराचार्य के साथ विद्वानों ने शास्त्रार्थ किया था |जो बहुत मशहूर हा और उन सभी पर आज तक न जाने कितनी ही किताबे लिखी गयी हा लेकिन उनका सबसे पहला शास्त्रार्थ वेदों के मानने वाले और उस समय भारत के निर्विवाद रूप से सबसे बड़े मीमांसक मंडन मिश्र से हुआ था | जिसमे एककई दिनों के शास्त्रार्थ के बाद अंततः शंकराचार्य ने उन्हें निरुत्तर कर दिया उनके बीच हुए इस शास्त्र विचार के ऊपर लिखी आज भी सेकड़ो किताबे मिल जाएँगी बौद्धों के सफाए के दोरान भी उन्हें अलग अलग मुद्दों पर, अनेक स्थानों पर ब्राह्मणों का विरोध झेलना पड़ा था और अभिनव गुप्त आदि परम विद्वान् ब्राह्मणों ने उन्हें मारने के कई प्रयास किये थे शैव कापालिको ने भी उनकी बलि देने की कोशिश की थी
किन्तु हिन्दू धर्म के मूल स्वरुप की पुनर्स्थापना के लिए शंकराचार्य ने सभी कष्टों को झेला और विदेशो में भी हिन्दू धर्म का प्रचार किया वे नेपाल , तिब्बत , भूटान , और पश्चिमोत्तर में पेशावर और कंधार तक गए थे और भारत पर पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम द्वारा मुस्लिम बनाये हुए बौद्धों को पुनः हिन्दू धर्म में वापसी कराई अंत में अपना कार्य समाप्त कर 32 वर्ष की आयु में बद्रीनाथ में ब्रह्म में स्थित होकर अपनी शिष्य मण्डली के समक्ष अपना शरीर त्याग दिया
शरीर छोड़ने से पहले उन्होंने अपने शिष्यों को बुला कर पुछा की उन्हें अगर कुछ पूछना हो , या शास्त्रों के किसी हिस्से के बारे में उन्हें कोई शंका हो तो वे पूछ सकते हँ सबने कहा की उन्होंने उनकी कृपा से सब कुछ जान लिया हँ और उन्हें सत्य का बोध हो चूका हँ तब उन्होंने भारत के चार कोनो पर स्थित मठो के उत्तराधिकारी , उनके कार्य , उनकी कार्य शेली , उनके द्वारा सन्यासियों के दस आश्रमों का क्रम से नियंत्रण आदि आदि कार्यो का निरूपण किया पश्चात उन्होंने सिद्धासन में स्थित होकर अपने शरीर का त्याग कर दिया उस समय उनकी आयु ३२ वर्ष की थी वह आज भी उनकी समाधि बनी हुई हँ जो हर हिन्दू दर्शनार्थी को उनके अपने धर्म के लिए गए उनके अमानवीय कर्मो का स्मरण कराती हँ|

स्वामी विवेकानंद विचार दृष्टि



स्वामी विवेकानंद विचार दृष्टि

लिंक - http://www.hindisahityadarpan.in/2011/11/great-quotations-by-swami-vivekananda.html

§  उठो, जागो और तब तक रुको नही जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाये ।

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहोउससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति बुद्धिमानमनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दोवे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  तुम अपनी अंत:स्थ आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ। जब तक तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते।

-स्वामी विवेकानन्द

§  ईश्वर ही ईश्वर की उपलब्थि कर सकता है। सभी जीवंत ईश्वर हैंइस भाव से सब को देखो। मनुष्य का अध्ययन करो, मनुष्य ही जीवन्त काव्य है। जगत में जितने ईसा या बुद्ध हुए हैं, सभी हमारी ज्योति से ज्योतिष्मान हैं। इस ज्योति को छोड़ देने पर ये सब हमारे लिए और अधिक जीवित नहीं रह सकेंगे, मर जाएंगे। तुम अपनी आत्मा के ऊपर स्थिर रहो। 

-स्वामी विवेकानन्द

§  ज्ञान स्वयमेव वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत् से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैंनिश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता हैअंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत् को शिक्षा प्रदान करता है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो चुकने पर धर्मसंघ में बना रहना अवांछनीय है। उससे बाहर निकलकर स्वाधीनता की मुक्त वायु में जीवन व्यतीत करो।

-स्वामी विवेकानन्द

§  मुक्ति-लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता है? देवदूत कभी कोई बुरे कार्य नहीं करते, इसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होता, अतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता है, वही इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।

-स्वामी विवेकानन्द

§  हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करोउससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।

-स्वामी विवेकानन्द

§  पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लो, उसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो। प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो।

-स्वामी विवेकानन्द

§  सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।

-स्वामी विवेकानन्द

§  संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।

-स्वामी विवेकानन्द

§  हे सखे, तुम क्योँ रो रहे हो ? सब शक्ति तो तुम्हीं में हैं। हे भगवन्, अपना ऐश्वर्यमय स्वरूप को विकसित करो। ये तीनों लोक तुम्हारे पैरों के नीचे हैं। जड की कोई शक्ति नहीं प्रबल शक्ति आत्मा की हैं। हे विद्वन! डरो मत्; तुम्हारा नाश नहीं हैं, संसार-सागर से पार उतरने का उपाय हैं। जिस पथ के अवलम्बन से यती लोग संसार-सागर के पार उतरे हैं, वही श्रेष्ठ पथ मै तुम्हे दिखाता हूँ! (वि.स. ६/८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बडे-बडे दिग्गज बह जायेंगे। छोटे-मोटे की तो बात ही क्या है! तुम लोग कमर कसकर कार्य में जुट जाओ, हुंकार मात्र से हम दुनिया को पलट देंगे। अभी तो केवल मात्र प्रारम्भ ही है। किसी के साथ विवाद न कर हिल-मिलकर अग्रसर हो -- यह दुनिया भयानक है, किसी पर विश्वास नहीं है। डरने का कोई कारण नहीं है, माँ मेरे साथ हैं -- इस बार ऐसे कार्य होंगे कि तुम चकित हो जाओगे। भय किस बात का? किसका भय? वज्र जैसा हृदय बनाकर कार्य में जुट जाओ।
(विवेकानन्द साहित्य खण्ड-४पन्ना-३१५) (४/३१५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  तुमने बहुत बहादुरी की है। शाबाश! हिचकने वाले पीछे रह जायेंगे और तुम कुद कर सबके आगे पहुँच जाओगे। जो अपना उध्दार में लगे हुए हैं, वे न तो अपना उद्धार ही कर सकेंगे और न दूसरों का। ऐसा शोर - गुल मचाओ की उसकी आवाज़ दुनिया के कोने कोने में फैल जाय। कुछ लोग ऐसे हैं, जो कि दूसरों की त्रुटियों को देखने के लिए तैयार बैठे हैं, किन्तु कार्य करने के समय उनका पता नही चलता है। जुट जाओ, अपनी शक्ति के अनुसार आगे बढो।इसके बाद मैं भारत पहुँच कर सारे देश में उत्तेजना फूँक दूंगा। डर किस बात का है? नहीं है, नहीं है, कहने से साँप का विष भी नहीं रहता है। नहीं नहीं कहने से तो 'नहीं' हो जाना पडेगा। खूब शाबाश! छान डालो - सारी दूनिया को छान डालो! अफसोस इस बात का है कि यदि मुझ जैसे दो - चार व्यक्ति भी तुम्हारे साथी होते -

-स्वामी विवेकानन्द

§  तमाम संसा हिल उठता। क्या करूँ धीरे - धीरे अग्रसर होना पड रहा है। तूफ़ान मचा दो तूफ़ान! (वि.स. ४/३८७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो। (वि.स.४/३२०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  लोग तुम्हारी स्तुति करें या निन्दा, लक्ष्मी तुम्हारे ऊपर कृपालु हो या न हो, तुम्हारा देहान्त आज हो या एक युग मे, तुम न्यायपथ से कभी भ्रष्ट न हो। (वि.स.६/८८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  श्रेयांसि बहुविघ्नानि अच्छे कर्मों में कितने ही विघ्न आते हैं। -- प्रलय मचाना ही होगा, इससे कम में किसी तरह नहीं चल सकता। कुछ परवाह नहीं। दुनीया भर में प्रलय मच जायेगा, वाह! गुरु की फतह! अरे भाई श्रेयांसि बहुविघ्नानि, उन्ही विघ्नों की रेल पेल में आदमी तैयार होता है। मिशनरी फिशनरी का काम थोडे ही है जो यह धक्का सम्हाले! ....बडे - बडे बह गये, अब गडरिये का काम है जो थाह ले? यह सब नहीं चलने का भैया, कोई चिन्ता न करना। सभी कामों में एक दल शत्रुता ठानता है; अपना काम करते जाओ किसी की बात का जवाब देने से क्या काम? सत्यमेव जयते नानृतं, सत्येनैव पन्था विततो देवयानः (सत्य की ही विजय होती है, मिथ्या की नहीं; सत्य के ही बल से देवयानमार्ग की गति मिलती है।) ...धीरे - धीरे सब होगा।

-स्वामी विवेकानन्द

§  वीरता से आगे बढो। एक दिन या एक साल में सिध्दि की आशा न रखो। उच्चतम आदर्श पर दृढ रहो। स्थिर रहो। स्वार्थपरता और ईर्ष्या से बचो। आज्ञा-पालन करो। सत्य, मनुष्य -- जाति और अपने देश के पक्ष पर सदा के लिए अटल रहो, और तुम संसार को हिला दोगे। याद रखो -- व्यक्ति और उसका जीवन ही शक्ति का स्रोत है, इसके सिवाय अन्य कुछ भी नहीं। (वि.स. ४/३९५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  इस तरह का दिन क्या कभी होगा कि परोपकार के लिए जान जायेगी? दुनिया बच्चों का खिलवाड नहीं है -- बडे आदमी वो हैं जो अपने हृदय-रुधिर से दूसरों का रास्ता तैयार करते हैं- यही सदा से होता आया है -- एक आदमी अपना शरीर-पात करके सेतु निर्माण करता है, और हज़ारों आदमी उसके ऊपर से नदी पार करते हैं। एवमस्तु एवमस्तु, शिवोsहम् शिवोsहम् (ऐसा ही हो, ऐसा ही हो- मैं ही शिव हूँ, मैं ही शिव हूँ। )

-स्वामी विवेकानन्द

§  मैं चाहता हूँ कि मेरे सब बच्चे, मैं जितना उन्नत बन सकता था, उससे सौगुना उन्न्त बनें। तुम लोगों में से प्रत्येक को महान शक्तिशाली बनना होगा- मैं कहता हूँ, अवश्य बनना होगा। आज्ञा-पालन, ध्येय के प्रति अनुराग तथा ध्येय को कार्यरूप में परिणत करने के लिए सदा प्रस्तुत रहना -- इन तीनों के रहने पर कोई भी तुम्हे अपने मार्ग से विचलित नहीं कर सकता। (वि.स.६/३५२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  मन और मुँह को एक करके भावों को जीवन में कार्यान्वित करना होगा। इसीको श्री रामकृष्ण कहा करते थे, "भाव के घर में किसी प्रकार की चोरी न होने पाये।" सब विषओं में व्यवहारिक बनना होगा। लोगों या समाज की बातों पर ध्यान न देकर वे एकाग्र मन से अपना कार्य करते रहेंगे क्या तुने नहीं सुना, कबीरदास के दोहे में है- "हाथी चले बाजार में, कुत्ता भोंके हजार साधुन को दुर्भाव नहिं, जो निन्दे संसार" ऐसे ही चलना है। दुनिया के लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देना होगा। उनकी भली बुरी बातों को सुनने से जीवन भर कोई किसी प्रकार का महत् कार्य नहीं कर सकता। (वि.स.३/३८१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  अन्त में प्रेम की ही विजय होती है। हैरान होने से काम नहीं चलेगा- ठहरो- धैर्य धारण करने पर सफलता अवश्यम्भावी है- तुमसे कहता हूँ देखना- कोई बाहरी अनुष्ठानपध्दति आवश्यक न हो- बहुत्व में एकत्व सार्वजनिन भाव में किसी तरह की बाधा न हो। यदि आवश्यक हो तो "सार्वजनीनता" के भाव की रक्षा के लिए सब कुछ छोडना होगा। मैं मरूँ चाहे बचूँ, देश जाऊँ या न जाऊँ, तुम लोग अच्छी तरह याद रखना कि, सार्वजनीनता- हम लोग केवल इसी भाव का प्रचार नहीं करते कि, "दुसरों के धर्म का द्वेष न करना"; नहीं, हम सब लोग सब धर्मों को सत्य समझते हैं और उन्का ग्रहण भी पूर्ण रूप से करते हैं हम इसका प्रचार भी करते हैं और इसे कार्य में परिणत कर दिखाते हैं सावधान रहना, दूसरे के अत्यन्त छोटे अधिकार में भी हस्तक्षेप न करना - इसी भँवर में बडे-बडे जहाज डूब जाते हैं पुरी भक्ति, परन्तु कट्टरता छोडकर, दिखानी होगी, याद रखना उन्की कृपा से सब ठीक हो जायेगा।

-स्वामी विवेकानन्द

§  जिस तरह हो, इसके लिए हमें चाहे जितना कष्ट उठाना पडे- चाहे कितना ही त्याग करना पडे यह भाव (भयानक ईर्ष्या) हमारे भीतर न घुसने पाये- हम दस ही क्यों न हों- दो क्यों न रहें- परवाह नहीं परन्तु जितने हों सम्पूर्ण शुध्दचरित्र हों।

-स्वामी विवेकानन्द

§  नीतिपरायण तथा साहसी बनो, अन्त: करण पूर्णतया शुध्द रहना चाहिए। पूर्ण नीतिपरायण तथा साहसी बनो -- प्रणों के लिए भी कभी न डरो। कायर लोग ही पापाचरण करते हैं, वीर पुरूष कभी भी पापानुष्ठान नहीं करते -- यहाँ तक कि कभी वे मन में भी पाप का विचार नहीं लाते। प्राणिमात्र से प्रेम करने का प्रयास करो। बच्चो, तुम्हारे लिए नीतिपरायणता तथा साहस को छोडकर और कोई दूसरा धर्म नहीं। इसके सिवाय और कोई धार्मिक मत-मतान्तर तुम्हारे लिए नहीं है। कायरता, पाप्, असदाचरण तथा दुर्बलता तुममें एकदम नहीं रहनी चाहिए, बाक़ी आवश्यकीय वस्तुएँ अपने आप आकर उपस्थित होंगी।(वि.स.१/३५०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  शक्तिमान, उठो तथा सामर्थ्यशाली बनो। कर्म, निरन्तर कर्म; संघर्ष , निरन्तर संघर्ष! अलमिति। पवित्र और निःस्वार्थी बनने की कोशिश करो -- सारा धर्म इसी में है। (वि.स.१/३७९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  क्या संस्कृत पढ रहे हो? कितनी प्रगति होई है? आशा है कि प्रथम भाग तो अवश्य ही समाप्त कर चुके होगे। विशेष परिश्रम के साथ संस्कृत सीखो। (वि.स.१/३७९-८०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  शत्रु को पराजित करने के लिए ढाल तथा तलवार की आवश्यकता होती है। इसलिए अंग्रेज़ी और संस्कृत का अध्ययन मन लगाकर करो। (वि.स.४/३१९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बच्चों, धर्म का रहस्य आचरण से जाना जा सकता है, व्यर्थ के मतवादों से नहीं। सच्चा बनना तथा सच्चा बर्ताव करना, इसमें ही समग्र धर्म निहित है। जो केवल प्रभु-प्रभु की रट लगाता है, वह नहीं, किन्तु जो उस परम पिता के इच्छानुसार कार्य करता है वही धार्मिक है। यदि कभी कभी तुमको संसार का थोडा-बहुत धक्का भी खाना पडे, तो उससे विचलित न होना, मुहूर्त भर में वह दूर हो जायगा तथा सारी स्थिति पुनः ठीक हो जायगी। (वि.स.१/३८०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बालकों, दृढ बने रहो, मेरी सन्तानों में से कोई भी कायर न बने। तुम लोगों में जो सबसे अधिक साहसी है - सदा उसीका साथ करो। बिना विघ्न - बाधाओं के क्या कभी कोई महान कार्य हो सकता है? समय, धैर्य तथा अदम्य इच्छा-शक्ति से ही कार्य हुआ करता है। मैं तुम लोगों को ऐसी बहुत सी बातें बतलाता, जिससे तुम्हारे हृदय उछल पडते, किन्तु मैं ऐसा नहीं करूँगा। मैं तो लोहे के सदृश दृढ इच्छा-शक्ति सम्पन्न हृदय चाहता हूँ, जो कभी कम्पित न हो। दृढता के साथ लगे रहो, प्रभु तुम्हें आशीर्वाद दे। सदा शुभकामनाओं के साथ तुम्हारा विवेकानन्द। (वि.स.४/३४०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जब तक जीना, तब तक सीखना' -- अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। (वि.स.१/३८६)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जीस प्रकार स्वर्ग में, उसी प्रकार इस नश्वर जगत में भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो, क्योंकि अनन्त काल के लिए जगत में तुम्हारी ही महिमा घोषित हो रही है एवं सब कुछ तुम्हारा ही राज्य है। (वि.स.१/३८७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  पवित्रता, दृढता तथा उद्यम- ये तीनों गुण मैं एक साथ चाहता हूँ। (वि.स.४/३४७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  भाग्य बहादुर और कर्मठ व्यक्ति का ही साथ देता है। पीछे मुडकर मत देखो आगे, अपार शक्ति, अपरिमित उत्साह, अमित साहस और निस्सीम धैर्य की आवश्यकता है- और तभी महत कार्य निष्पन्न किये जा सकते हैं। हमें पूरे विश्व को उद्दीप्त करना है। (वि.स.४/३५१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  पवित्रता, धैर्य तथा प्रयत्न के द्वारा सारी बाधाएँ दूर हो जाती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि महान कार्य सभी धीरे धीरे होते हैं। (वि.स.४/३५१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  साहसी होकर काम करो। धीरज और स्थिरता से काम करना -- यही एक मार्ग है। आगे बढो और याद रखो धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म। जब तक तुम पवित्र होकर अपने उद्देश्य पर डटे रहोगे, तब तक तुम कभी निष्फल नहीं होओगे -- माँ तुम्हें कभी न छोडेगी और पूर्ण आशीर्वाद के तुम पात्र हो जाओगे। (वि.स.४/३५६)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बच्चों, जब तक तुम लोगों को भगवान तथा गुरू में, भक्ति तथा सत्य में विश्वास रहेगा, तब तक कोई भी तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचा सकता। किन्तु इनमें से एक के भी नष्ट हो जाने पर परिणाम विपत्तिजनक है। (वि.स.४/३३९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  महाशक्ति का तुममें संचार होगा -- कदापि भयभीत मत होना। पवित्र होओ, विश्वासी होओ, और आज्ञापालक होओ। (वि.स.४/३६१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बिना पाखण्डी और कायर बने सबको प्रसन्न रखो। पवित्रता और शक्ति के साथ अपने आदर्श पर दृढ रहो और फिर तुम्हारे सामने कैसी भी बाधाएँ क्यों न हों, कुछ समय बाद संसार तुमको मानेगा ही। (वि.स.४/३६२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  धीरज रखो और मृत्युपर्यन्त विश्वासपात्र रहो। आपस में न लडो! रुपये - पैसे के व्यवहार में शुध्द भाव रखो। हम अभी महान कार्य करेंगे। जब तक तुममें ईमानदारी, भक्ति और विश्वास है, तब तक प्रत्येक कार्य में तुम्हे सफलता मिलेगी। (वि.स.४/३६८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो पवित्र तथा साहसी है, वही जगत् में सब कुछ कर सकता है। माया-मोह से प्रभु सदा तुम्हारी रक्षा करें। मैं तुम्हारे साथ काम करने के लिए सदैव प्रस्तुत हूँ एवं हम लोग यदि स्वयं अपने मित्र रहें तो प्रभु भी हमारे लिए सैकडों मित्र भेजेंगे, आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः। (वि.स.४/२७६)

-स्वामी विवेकानन्द

§  ईर्ष्या तथा अंहकार को दूर कर दो -- संगठित होकर दूसरों के लिए कार्य करना सीखो। (वि.स.४/२८०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  पूर्णतः निःस्वार्थ रहो, स्थिर रहो, और काम करो। एक बात और है। सबके सेवक बनो और दूसरों पर शासन करने का तनिक भी यत्न न करो, क्योंकि इससे ईर्ष्या उत्पन्न होगी और इससे हर चीज़ बर्बाद हो जायेगी। आगे बढो तुमने बहुत अच्छा काम किया है। हम अपने भीतर से ही सहायता लेंगे अन्य सहायता के लिए हम प्रतीक्षा नहीं करते। मेरे बच्चे, आत्मविशवास रखो, सच्चे और सहनशील बनो।(वि.स.४/२८४)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खडे हो जाओगे, तो तुम्हे सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढेगा। यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले 'अहं' ही नाश कर डालो। (वि.स.४/२८५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  पक्षपात ही सब अनर्थों का मूल है, यह न भूलना। अर्थात् यदि तुम किसी के प्रति अन्य की अपेक्षा अधिक प्रीति-प्रदर्शन करते हो, तो याद रखो उसीसे भविष्य में कलह का बिजारोपण होगा। (वि.स.४/३१२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यदि कोई तुम्हारे समीप अन्य किसी साथी की निन्दा करना चाहे, तो तुम उस ओर बिल्कुल ध्यान न दो। इन बातों को सुनना भी महान् पाप है, उससे भविष्य में विवाद का सूत्रपात होगा। (वि.स.४/३१३)

-स्वामी विवेकानन्द

§  गम्भीरता के साथ शिशु सरलता को मिलाओ। सबके साथ मेल से रहो। अहंकार के सब भाव छोड दो और साम्प्रदायिक विचारों को मन में न लाओ। व्यर्थ विवाद महापाप है। (वि.स.४/३१८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बच्चे, जब तक तुम्हारे हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास- ये तीनों वस्तुएँ रहेंगी -- तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो। (वि.स.४/३३२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  किसी को उसकी योजनाओं में हतोत्साह नहीं करना चाहिए। आलोचना की प्रवृत्ति का पूर्णतः परित्याग कर दो। जब तक वे सही मार्ग पर अग्रेसर हो रहे हैं; तब तक उन्के कार्य में सहायता करो; और जब कभी तुमको उनके कार्य में कोई ग़लती नज़र आये, तो नम्रतापूर्वक ग़लती के प्रति उनको सजग कर दो। एक दूसरे की आलोचना ही सब दोषों की जड है। किसी भी संगठन को विनष्ट करने में इसका बहुत बडा हाथ है। (वि.स.४/३१५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  किसी बात से तुम उत्साहहीन न होओ; जब तक ईश्वर की कृपा हमारे ऊपर है, कौन इस पृथ्वी पर हमारी उपेक्षा कर सकता है? यदि तुम अपनी अन्तिम साँस भी ले रहे हो तो भी न डरना। सिंह की शूरता और पुष्प की कोमलता के साथ काम करते रहो। (वि.स. ४/३२०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुध्दिमानी नहीं है। बुध्दिमान व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खडा होकर कार्य करना चहिए। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा। (वि.स. ४/३२८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  बच्चे, जब तक हृदय में उत्साह एवं गुरू तथा ईश्वर में विश्वास - ये तीनों वस्तुएम रहेंगी - तब तक तुम्हें कोई भी दबा नहीं सकता। मैं दिनोदिन अपने हृदय में शक्ति के विकास का अनुभव कर रहा हूँ। हे साहसी बालकों, कार्य करते रहो। (वि.स. ४/३३२)

-स्वामी विवेकानन्द

§  आओ हम नाम, यश और दूसरों पर शासन करने की इच्छा से रहित होकर काम करें। काम, क्रोध एंव लोभ -- इस त्रिविध बन्धन से हम मुक्त हो जायें और फिर सत्य हमारे साथ रहेगा। (वि.स. ४/३३८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  न टालो, न ढूँढों -- भगवान अपनी इच्छानुसार जो कुछ भेहे, उसके लिए प्रतिक्षा करते रहो, यही मेरा मूलमंत्र है। (वि.स. ४/३४८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  शक्ति और विशवास के साथ लगे रहो। सत्यनिष्ठा, पवित्र और निर्मल रहो, तथा आपस में न लडो। हमारी जाति का रोग ईर्ष्या ही है। (वि.स. ४/३६९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  एक ही आदमी मेरा अनुसरण करे, किन्तु उसे मृत्युपर्यन्त सत्य और विश्वासी होना होगा। मैं सफलता और असफलता की चिन्ता नहीं करता। मैं अपने आन्दोलन को पवित्र रखूँगा, भले ही मेरे साथ कोई न हो। कपटी कार्यों से सामना पडने पर मेरा धैर्य समाप्त हो जाता है। यही संसार है कि जिन्हें तुम सबसे अधिक प्यार और सहायता करो, वे ही तुम्हे धोखा देंगे। (वि.स. ४/३७७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  मेरा आदर्श अवश्य ही थोडे से शब्दों में कहा जा सकता है - मनुष्य जाति को उसके दिव्य स्वरूप का उपदेश देना, तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्त करने का उपाय बताना। (वि.स. ४/४०७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जब कभी मैं किसी व्यक्ति को उस उपदेशवाणी (श्री रामकृष्ण के वाणी) के बीच पूर्ण रूप से निमग्न पाता हूँ, जो भविष्य में संसार में शान्ति की वर्षा करने वाली है, तो मेरा हृदय आनन्द से उछलने लगता है। ऐसे समय मैं पागल नहीं हो जाता हूँ, यही आश्चर्य की बात है। (वि.स. १/३३४, ६ फरवरी, १८८९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  'बसन्त की तरह लोग का हित करते हुए' - यहि मेरा धर्म है। "मुझे मुक्ति और भक्ति की चाह नहीं। लाखों नरकों में जाना मुझे स्वीकार है, बसन्तवल्लोकहितं चरन्तः- यही मेरा धर्म है।" (वि.स.४/३२८)

-स्वामी विवेकानन्द

§  हर काम को तीन अवस्थाओं में से गुज़रना होता है -- उपहास, विरोध और स्वीकृति। जो मनुष्य अपने समय से आगे विचार करता है, लोग उसे निश्चय ही ग़लत समझते है। इसलिए विरोध और अत्याचार हम सहर्ष स्वीकार करते हैं; परन्तु मुझे दृढ और पवित्र होना चाहिए और भगवान् में अपरिमित विश्वास रखना चाहिए, तब ये सब लुप्त हो जायेंगे। (वि.स.४/३३०)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यदि कोई भंगी हमारे पास भंगी के रूप में आता है, तो छुतही बिमारी की तरह हम उसके स्पर्श से दूर भागते हैं। परन्तु जब उसके सीर पर एक कटोरा पानी डालकर कोई पादरी प्रार्थना के रूप में कुछ गुनगुना देता है और जब उसे पहनने को एक कोट मिल जाता है-- वह कितना ही फटा-पुराना क्यों न हो-- तब चाहे वह किसी कट्टर से कट्टर हिन्दू के कमरे के भीतर पहुँच जाय, उसके लिए कहीं रोक-टोक नहीं, ऐसा कोई नहीं, जो उससे सप्रेम हाथ मिलाकर बैठने के लिए उसे कुर्सी न दे! इससे अधिक विड्म्बना की बात क्या हो सकता है? आइए, देखिए तो सही, दक्षिण भारत में पादरी लोग क्या गज़ब कर रहें हैं। ये लोग नीच जाति के लोगों को लाखों की संख्या मे ईसाई बना रहे हैं। ...वहाँ लगभग चौथाई जनसंख्या ईसाई हो गयी है! मैं उन बेचारों को क्यों दोष दूँ? हें भगवान, कब एक मनुष्य दूसरे से भाईचारे का बर्ताव करना सीखेगा। (वि.स.१/३८५)

-स्वामी विवेकानन्द

§  प्रायः देखने में आता है कि अच्छे से अच्छे लोगों पर कष्ट और कठिनाइयाँ आ पडती हैं। इसका समाधान न भी हो सके, फिर भी मुझे जीवन में ऐसा अनुभव हुआ है कि जगत में कोई ऐसी वस्तु नहीं, जो मूल रूप में भली न हो। ऊपरी लहरें चाहे जैसी हों, परन्तु वस्तु मात्र के अन्तरकाल में प्रेम एवं कल्याण का अनन्त भण्डार है। जब तक हम उस अन्तराल तक नहीं पहुँचते, तभी तक हमें कष्ट मिलता है। एक बार उस शान्ति-मण्डल में प्रवेश करने पर फिर चाहे आँधी और तूफान के जितने तुमुल झकोरे आयें, वह मकान, जो सदियों की पुरानि चट्टान पर बना है, हिल नहीं सकता। (वि.स.१/३८९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो, तो लोग उसे कोई महत्व नहीं देंगे, किन्तु ज्यों ही तुम उस कार्य को वन्द कर दो, वे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हे बदमाश प्रमाणित करने में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे - स्नेहियों द्वरा सदा ठगे जाते हैं।

-स्वामी विवेकानन्द

§  मेरी केवल यह इच्छा है कि प्रतिवर्ष यथेष्ठ संख्या में हमारे नवयुवकों को चीन जापान में आना चाहिए। जापानी लोगों के लिए आज भारतवर्ष उच्च और श्रेष्ठ वस्तुओं का स्वप्नराज्य है। और तुम लोग क्या कर रहे हो? ... जीवन भर केवल बेकार बातें किया करते हो, व्यर्थ बकवाद करने वालो, तुम लोग क्या हो? आओ, इन लोगों को देखो और उसके बाद जाकर लज्जा से मुँह छिपा लो। सठियाई बुध्दिवालो, तुम्हारी तो देश से बाहर निकलते ही जाति चली जायगी! अपनी खोपडी में वर्षों के अन्धविश्वास का निरन्तर वृध्दिगत कूडा-कर्कट भरे बैठे, सैकडों वर्षों से केवल आहार की छुआछूत के विवाद में ही अपनी सारी शक्ति नष्ट करनेवाले, युगों के सामाजिक अत्याचार से अपनी सारी मानवता का गला घोटने वाले, भला बताओ तो सही, तुम कौन हो? और तुम इस समय कर ही क्या रहे हो? ...किताबें हाथ में लिए तुम केवल समुद्र के किनारे फिर रहे हो। तीस रुपये की मुंशी - गीरी के लिए अथवा बहुत हुआ, तो एक वकील बनने के लिए जी - जान से तडप रहे हो -- यही तो भारतवर्ष के नवयुवकों की सबसे बडी महत्वाकांक्षा है। तिस पर इन विद्यार्थियों के भी झुण्ड के झुण्द बच्चे पैदा हो जाते हैं, जो भूख से तडपते हुए उन्हें घेरकर ' रोटी दो, रोटी दो ' चिल्लाते रहते हैं। क्या समुद्र में इतना पानी भी न रहा कि तुम उसमें विश्वविद्यालय के डिप्लोमा, गाउन और पुस्तकों के समेत डूब मरो ? आओ, मनुष्य बनो! उन पाखण्डी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मारकर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उन्के हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकडों वर्षों के अन्धविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को ज़ड - मूल से निकाल फेंको। आओ, मनुष्य बनो। कूपमंडूकता छोडो और बाहर दृष्टि डालो। देखो, अन्य देश किस तरह आगे बढ रहे हैं। क्या तुम्हे मनुष्य से प्रेम है? यदि 'हाँ' तो आओ, हम लोग उच्चता और उन्नति के मार्ग में प्रयत्नशील हों। पीछे मुडकर मत देखो; अत्यन्त निकट और प्रिय सम्बन्धी रोते हों, तो रोने दो, पिछे देखो ही मत। केवल आगे बढते जाओ। भारतमाता कम से कम एक हज़ार युवकों का बलिदान चाहती है -- मस्तिष्क - वाले युवकों का, पशुओं का नहीं। परमात्मा ने तुम्हारी इस निश्चेष्ट सभ्यता को तोडने के लिए ही अंग्रेज़ी राज्य को भारत में भेजा है... ( वि.स.१/३९८-९९)

-स्वामी विवेकानन्द

§  न संख्या-शक्ति, न धन, न पाण्डित्य, न वाक चातुर्य, कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुध्द जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी! प्रत्येक देश में सिंह जैसी शक्तिमान दस-बारह आत्माएँ होने दो, जिन्होने अपने बन्धन तोड डाले हैं, जिन्होने अनन्त का स्पर्श कर लिया है, जिन्का चित्र ब्रह्मनुसन्धान में लीन है, जो न धन की चिन्ता करते हैं, न बल की, न नाम की और ये व्यक्ति ही संसार को हिला डालने के लिए पर्याप्त होंगे। (वि.स.४/३३६)

-स्वामी विवेकानन्द

§  यही रहस्य है। योग प्रवर्तक पंतजलि कहते हैं, " जब मनुष्य समस्त अलौकेक दैवी शक्तियों के लोभ का त्याग करता है, तभी उसे धर्म मेघ नामक समाधि प्राप्त होती है। वह प्रमात्मा का दर्शन करता है, वह परमात्मा बन जाता है और दूसरों को तदरूप बनने में सहायता करता है। मुझे इसीका प्रचार करना है। जगत् में अनेक मतवादों का प्रचार हो चुका है। लाखों पुस्तकें हैं, परन्तु हाय! कोई भी किंचित् अंश में प्रत्य्क्ष आचरण नहीं करता। (वि.स.४/३३७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  एक महान रहस्य का मैंने पता लगा लिया है -- वह यह कि केवल धर्म की बातें करने वालों से मुझे कुछ भय नहीं है। और जो सत्यद्र्ष्ट महात्मा हैं, वे कभी किसी से बैर नहीं करते। वाचालों को वाचाल होने दो! वे इससे अधिक और कुछ नहीं जानते! उन्हे नाम, यश, धन, स्त्री से सन्तोष प्राप्त करने दो। और हम धर्मोपलब्धि, ब्रह्मलाभ एवं ब्रह्म होने के लिए ही दृढव्रत होंगे। हम आमरण एवं जन्म-जन्मान्त में सत्य का ही अनुसरण करेंगें। दूसरों के कहने पर हम तनिक भी ध्यान न दें और यदि आजन्म यत्न के बाद एक, देवल एक ही आत्मा संसार के बन्धनों को तोडकर मुक्त हो सके तो हमने अपना काम कर लिया। (वि.स. ४/३३७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  जो सबका दास होता है, वही उन्का सच्चा स्वामी होता है। जिसके प्रेम में ऊँच - नीच का विचार होता है, वह कभी नेता नहीं बन सकता। जिसके प्रेम का कोई अन्त नहीं है, जो ऊँच - नीच सोचने के लिए कभी नहीं रुकता, उसके चरणों में सारा संसार लोट जाता है। (वि.स. ४/४०३)

-स्वामी विवेकानन्द

§  वत्स, धीरज रखो, काम तुम्हारी आशा से बहुत ज्यादा बढ जाएगा। हर एक काम में सफलता प्राप्त करने से पहले सैंकडो कठिनाइयों का सामना करना पडता है। जो उद्यम करते रहेंगे, वे आज या कल सफलता को देखेंगे। परिश्रम करना है वत्स, कठिन परिश्रम्! काम कांचन के इस चक्कर में अपने आप को स्थिर रखना, और अपने आदर्शों पर जमे रहना, जब तक कि आत्मज्ञान और पूर्ण त्याग के साँचे में शिष्य न ढल जाय निश्चय ही कठिन काम है। जो प्रतिक्षा करता है, उसे सब चीज़े मिलती हैं। अनन्त काल तक तुम भाग्यवान बने रहो। (वि.स. ४/३८७)

-स्वामी विवेकानन्द

§  अकेले रहो, अकेले रहो। जो अकेला रहता है, उसका किसीसे विरोध नहीं होता, वह किसीकी शान्ति भंग नहीं करता, न दूसरा कोई उसकी शान्ति भंग करता है। (वि.स. ४/३८१)

-स्वामी विवेकानन्द

§  मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे - धीरे और भी अन्य लोग आयेंगे। 'साहसी' शब्द और उससे अधिक 'साहसी' कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो? हम बार - बार पुकारें, जब तक सोते हुए देवता न जाग उठें, जब तक अन्तर्यामी देव उस पुकार का उत्तर न दें। जीवन में और क्या है? इससे महान कर्म क्या है? (वि.स. ४/४०८)

-स्वामी विवेकानन्द