सोमवार, 17 दिसंबर 2012

हिन्दू धर्म के महानायक आदि जगद्गुरु शंकराचार्य की जन्मभूमि



हिन्दू धर्म के महानायक आदि जगद्गुरु शंकराचार्य की जन्मभूमि
केरल में स्थित कलाड़ी ग्राम में उनकी जन्म स्थान पर बना हुआ मंदिर,इस ग्राम में वो अपने जन्म के बाद 8 वर्ष तक रहे फिर उन्होंने भारत भर में हिन्दू धर्म की पुनर्स्थापना के अपने जन्म के उद्देश्य की पूर्ती के लिए घर छोड़ने का विचार किया और संन्यास लेने के बहाने 8 वर्ष की उम्र में अपना घर छोड़ दिया किन्तु वो अपनी माँ को वचन दे गए की तुम्हारे जीवन के अंतिम दिनों में मैं तुम्हारे स्मरण करते ही तुम्हारे पास जरुर आऊंगा| पुनः वो इस घर में आपस आये थे जब उनकी माँ की अंतिम साँसे चल रही थी तब वो भारत में पुनः हिन्दू धरम की पुनर्स्थापना के कार्य में लगे हुए थे वही से कर्णाटक से वो केरला वापस आये थे
क्योकि शंकराचार्य ने 5 वर्ष की अवस्था से ही हिन्दू धर्म के मूल स्वरुप को प्रकाशित करना शुरू कर दिया था इसी कारण उनके घर विद्वानों का आना जाना लगा रहता था वयोवृद्ध विद्वान् भी बालक शंकर की अद्भुत प्रतिभा के बारे में सुनकर उनके शास्त्र सम्बन्धी शंखाओ का समाधान करवाने आते थे और शंकारचार्य सभी की शंकाओं का समाधान करते थे 8 वर्ष की अवस्था आते आते केरल राज्य के लगभग सभी बड़े बड़े विद्वान् उनका शिष्यत्व स्वीकार कर चुके थे
क्योकि शंकराचार्य कर्मकांड की जगह अद्वेत मत को श्रेष्ठ बताते थे और इससे ब्राह्मणों की आवश्यकता ख़तम हो जाती थी इसलिए ब्राह्मणों ने उनका बहिष्कार किया हुआ था इसलिए उन्होंने आठ वर्ष की अवस्था में ब्राह्मणों के बहिष्कार के बावजूद संन्यास लेने की विधि ( ये एक अद्भुत कार्य था ) भी स्वयं पूरी की थी और अंत में उन्होंने स्वयं अकेले ही अपनी माँ के अंतिम संस्कार सम्बन्धी सभी क्रियाये पूर्ण की | उस दौर में शंकराचार्य के साथ विद्वानों ने शास्त्रार्थ किया था |जो बहुत मशहूर हा और उन सभी पर आज तक न जाने कितनी ही किताबे लिखी गयी हा लेकिन उनका सबसे पहला शास्त्रार्थ वेदों के मानने वाले और उस समय भारत के निर्विवाद रूप से सबसे बड़े मीमांसक मंडन मिश्र से हुआ था | जिसमे एककई दिनों के शास्त्रार्थ के बाद अंततः शंकराचार्य ने उन्हें निरुत्तर कर दिया उनके बीच हुए इस शास्त्र विचार के ऊपर लिखी आज भी सेकड़ो किताबे मिल जाएँगी बौद्धों के सफाए के दोरान भी उन्हें अलग अलग मुद्दों पर, अनेक स्थानों पर ब्राह्मणों का विरोध झेलना पड़ा था और अभिनव गुप्त आदि परम विद्वान् ब्राह्मणों ने उन्हें मारने के कई प्रयास किये थे शैव कापालिको ने भी उनकी बलि देने की कोशिश की थी
किन्तु हिन्दू धर्म के मूल स्वरुप की पुनर्स्थापना के लिए शंकराचार्य ने सभी कष्टों को झेला और विदेशो में भी हिन्दू धर्म का प्रचार किया वे नेपाल , तिब्बत , भूटान , और पश्चिमोत्तर में पेशावर और कंधार तक गए थे और भारत पर पहले मुस्लिम आक्रमणकारी मोहम्मद बिन कासिम द्वारा मुस्लिम बनाये हुए बौद्धों को पुनः हिन्दू धर्म में वापसी कराई अंत में अपना कार्य समाप्त कर 32 वर्ष की आयु में बद्रीनाथ में ब्रह्म में स्थित होकर अपनी शिष्य मण्डली के समक्ष अपना शरीर त्याग दिया
शरीर छोड़ने से पहले उन्होंने अपने शिष्यों को बुला कर पुछा की उन्हें अगर कुछ पूछना हो , या शास्त्रों के किसी हिस्से के बारे में उन्हें कोई शंका हो तो वे पूछ सकते हँ सबने कहा की उन्होंने उनकी कृपा से सब कुछ जान लिया हँ और उन्हें सत्य का बोध हो चूका हँ तब उन्होंने भारत के चार कोनो पर स्थित मठो के उत्तराधिकारी , उनके कार्य , उनकी कार्य शेली , उनके द्वारा सन्यासियों के दस आश्रमों का क्रम से नियंत्रण आदि आदि कार्यो का निरूपण किया पश्चात उन्होंने सिद्धासन में स्थित होकर अपने शरीर का त्याग कर दिया उस समय उनकी आयु ३२ वर्ष की थी वह आज भी उनकी समाधि बनी हुई हँ जो हर हिन्दू दर्शनार्थी को उनके अपने धर्म के लिए गए उनके अमानवीय कर्मो का स्मरण कराती हँ|

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें