शनिवार, 22 दिसंबर 2012

कंपन रोग : पार्किन्‍सन : Parkinson's Disease

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पार्किंसन
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पार्किन्‍सन / पार्किंसन रोग (Parkinson's disease) पार्किन्सोनिज्म / कम्पवात रोग आमतौर से 50 साल से अधिक उम्र वालों को होती है। यह मानसिक स्थिति के बदलाव संबंधित बीमारी है। इसकी पहचान हाथ पैर स्थिर रखने पर उसका कांपना, हाथ पैर जकड़न, लेकिन जब हाथ पैर गति करते हैं, तो उनमें कंपन नहीं होता। मानसिक स्थिति में बदलाव के कारण पार्किसन के मरीज़ की पूरे शरीर की आंतरिक क्रियाओं के साथ बाहरी क्रियाएं भी धीमी हो जाती हैं।
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इतिहास

चिकित्सा शास्त्र में बहुत कम बीमारियों के नाम किसी डाक्टर या वैज्ञानिक के नाम पर रखे गये हैं। आम तौर पर ऐसा करने से बचा जाता है। परन्तु लन्दन के फिजिशियन डॉ. जेम्स पार्किन्सन ने सन् 1817 में इस रोग का प्रथम वर्णिन किया था वह इतना सटीक व विस्तृत था कि आज भी उससे बेहतर कर पाना, कुछ अंशों में सम्भव नहीं माना जाता है। हालांकि नया ज्ञान बहुत सा जुड़ा है। फिर भी परम्परा से जो नाम चल पडा उसे बदला नहीं गया। डॉ. जेम्स पार्किन्सन के नाम पर इस बीमारी को जाना जाता है। इसके बाद से अब तक लगातार इस पर स्टडी चल रही है, लेकिन किसी ख़ास नतीजे तक नहीं पहुंचा जा सका है।[2] पार्किन्सोनिज्म का कारण आज भी रहस्य बना हुआ है, बावजूद इस तथ्य के कि उस दिशा में बहुत शोध कार्य हुआ है, बहुत से चिकित्सा वैज्ञानिकों ने वर्षों तक चिन्तन किया है और बहुत सी उपयोगी जानकारी एकत्र की है। वैज्ञानिक प्रगति प्रायः ऐसे ही होती है। चमत्कार बिरले ही होते हैं। 1917 से 1920 के वर्षों में दुनिया के अनेक देशों में फ्लू (या इन्फ्लूएन्जा) का एक ख़ास गम्भीर रूप महामारी के रूप में देखा गया। वह एक प्रकार का मस्तिष्क ज्वर था। जिसे एन्सेफेलाइटिस लेथार्जिका कहते थे क्योंकि उसमें रोगी अनेक सप्ताहों तक या महीनों तक सोता रहता था। उस अवस्था से धीरे-धीरे मुक्त होने वाले अनेक रोगियों को बाद में पार्किन्सोनिज्म हुआ। 1920 से 1940 तक के दशकों में माना जाता था कि पार्किन्सोनिज्म का यही मुख्य कारण है। सोचते थे, और सही भी था कि इन्फ्लूएंजा वायरस के कीटाणु मस्तिष्क की उन्हीं कोशिकाओं को नष्ट करते हैं जो मूल पार्किन्सन रोग में प्रभावित होती हैं। न्यूयार्क के प्रसिद्ध न्यूरालाजिस्ट लेखक डॉ. ऑलिवर सेक्स ने इन मरीज़ों पर किताब लिखी, उस पर अवेकनिग (जागना) नाम से फ़िल्म बनी - इस आधार पर कि लम्बे समय से सुषुप्त रहने के बाद कैसे ये मरीज़, नये युग में, नयी दुनिया में जागे। रिपवान विकल की कहानी की तरह। सौभाग्य से 1920 के बाद एन्सेफेलाइटिस लेथार्जिका के और मामले देखने में नहीं आए। लेकिन पार्किन्सोनिज्म रोग उसी प्रकार होता रहा है। अवश्य ही कोई और कारण होने चाहिये।
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लक्षण
पार्किन्सन रोग किसी व्यक्ति को अचानक नहीं होता है। यह एक दिमाग का रोग है जो लम्बे समय दिमाग में पल रहा होता है। इस रोग का प्रभाव धीरे-धीरे होता है। पता भी नहीं पडता कि कब लक्षण शुरू हुए। अनेक सप्ताहों व महीनों के बाद जब लक्षणों की तीव्रता बढ जाती है तब अहसास होता है कि कुछ गडबड है।

    जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो रोगी व्यक्ति के हाथ तथा पैर कंपकंपाने लगते हैं। कभी-कभी इस रोग के लक्षण कम होकर खत्म हो जाते हैं। इस रोग से पीड़ित बहुत से रोगियों में हाथ तथा पैरों के कंप-कंपाने के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन वह लिखने का कार्य करता है तब उसके हाथ लिखने का कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं। यदि रोगी व्यक्ति लिखने का कार्य करता भी है तो उसके द्वारा लिखे अक्षर टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। रोगी व्यक्ति को हाथ से कोई पदार्थ पकड़ने तथा उठाने में दिक्कत महसूस होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी के जबड़े, जीभ तथा आंखे कभी-कभी कंपकंपाने लगती है।
    बहुत सारे मरीज़ों में पार्किन्‍सोनिज्‍म रोग की शुरुआत कम्पन से होती है। कम्पन अर्थात् धूजनी या धूजन या ट्रेमर या कांपना। कम्पन अंग में -- हाथ की एक कलाई या अधिक अंगुलियों का, हाथ की कलाई का, बांह का। पहले कम रहता है। यदाकदा होता है। रुक रुक कर होता है। बाद में अधिक देर तक रहने लगता है व अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है। प्रायः एक ही ओर (दायें या बायें) रहता है, परन्तु अनेक मरीज़ों में, बाद में दोनों ओर होने लगता है।
    आराम की अवस्था में जब हाथ टेबल पर या घुटने पर, ज़मीन या कुर्सी पर टिका हुआ हो तब यह कम्पन दिखाई पडता है। बारिक सधे हुए काम करने में दिक्कत आने लगती है, जैसे कि लिखना, बटन लगाना, दाढी बनाना, मूंछ के बाल काटना, सुई में धागा पिरोना। कुछ समय बाद में, उसी ओर का पांव प्रभावित होता है। कम्पन या उससे अधिक महत्त्वपूर्ण, भारीपन या धीमापन के कारण चलते समय वह पैर घिसटता है, धीरे उठता है, देर से उठता है, कम उठता है। धीमापन, समस्त गतिविधियों में व्याप्त हो जाता है। चाल धीमी / काम धीमा। शरीर की माँसपेशियों की ताकत कम नहीं होती है, लकवा नहीं होता। परन्तु सुघडता व स्फूर्ति से काम करने की क्षमता कम होती जाती है ।
    जब यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है तो रोगी की विभिन्न मांसपेशियों में कठोरता तथा कड़ापन आने लगता है। शरीर अकड़ जाता है, हाथ पैरों में जकडन होती है। मरीज़ को भारीपन का अहसास हो सकता है। परन्तु जकडन की पहचान चिकित्सक बेहतर कर पाते हैं - जब से मरीज़ के हाथ पैरों को मोड कर व सीधा कर के देखते हैं बहुत प्रतिरोध मिलता है। मरीज़ जानबूझ कर नहीं कर रहा होता। जकडन वाला प्रतिरोध अपने आप बना रहता है।
    व्यक्ति को चलने-फिरने में बहुत दिक्कत होती है। खडे होते समय व चलते समय मरीज़ सीधा तन कर नहीं रहता। थोडा सा आगे की ओर झुक जाता है। घुटने व कुहनी भी थोडे मुडे रहते हैं। क़दम छोटे होते हैं। पांव ज़मीन में घिसटते हुए आवाज़ करते हैं। क़दम कम उठते हैं गिरने की प्रवृत्ति बन जाती है। ढलान वाली जगह पर छोटे क़दम जल्दी-जल्दी उठते हैं व कभी-कभी रोकते नहीं बनता । चलते समय भुजाएं स्थिर रहती हैं, आगे पीछे झूलती नहीं । बैठे से उठने में देर लगती है, दिक्कत होती है । चलते -चलते रुकने व मुडने में परेशानी होती है । शारीरिक बैलेंस बिगड़ जाता है। जब रोगी की चाल अनियंत्रित तथा अनियमित हो जाती है तो चलते-चलते रोगी व्यक्ति कभी-कभी गिर जाता है।
    चेहरे का दृश्य बदल जाता है। आंखों का झपकना कम हो जाता है।
   
    आंखें चौडी खुली रहती हैं। व्‍यक्ति मानों सतत घूर रहा हो या टकटकी लगाए हो । चेहरा भावशून्य प्रतीत होता है बातचीत करते समय चेहरे पर खिलने वाले तरह-तरह के भाव व मुद्राएं (जैसे कि मुस्कुराना, हंसना, क्रोध, दुःख, भय आदि ) प्रकट नहीं होते या कम नज़र आते हैं।
    खाना खाने में तकलीफें होती है। भोजन निगलना धीमा हो जाता है। गले में अटकता है। कम्पन के कारण गिलास या कप छलकते हैं। हाथों से कौर टपकता है। मुंह से पानी-लार अधिक निकलने लगता है। चबाना धीमा हो जाता है। ठसका लगता है, खांसी आती है।
    आवाज़ धीमी हो जाती है तथा कंपकंपाती, लड़खड़ाती, हकलाती तथा अस्पष्ट हो जाती है, सोचने-समझने की ताकत कम हो जाती है और रोगी व्यक्ति चुपचाप बैठना पसन्द करता है। नींद में कमी, वजन में कमी, कब्जियत, जल्दी सांस भर आना, पेशाब करने में रुकावट, चक्कर आना, खडे होने पर अंधेरा आना, सेक्स में कमज़ोरी, पसीना अधिक आता है।
    उपरोक्‍त वर्णित अनेक लक्षणों में से कुछ, प्रायः वृद्धावस्था में बिना पार्किन्‍सोनिज्‍म के भी देखे जा सकते हैं । कभी-कभी यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि बूढे व्यक्तियों में होने वाले कम्पन, धीमापन, चलने की दिक्कत डगमगापन आदि पार्किन्‍सोनिज्‍म के कारण हैं या सिर्फ़ उम्र के कारण।
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उम्र और संख्या
18 वीं सदी में सामने आई बीमारी 'पार्किन्सन' अभी भी लोगों के लिए एक रहस्य बनी हुई है। पार्किन्सन रोग समूची दुनिया में, समस्त नस्लों व जातियों में, स्त्री पुरुषों दोनों को होता है। लेकिन पुरुषों में इसका असर थोड़ा ज़्यादा देखा गया है। यह मुख्यतया अधेड उम्र व वृद्धावस्था का रोग है। 50 की उम्र पार करने के बाद वैसे तो यह बीमारी किसी को भी हो सकती है, 60 वर्ष से अधिक उम्र वाले हर सौ व्यक्तियों में से एक को यह होता है। विकसित देशो में वृद्धों का प्रतिशत अधिक होने से वहां इसके मामले अधिक देखने को मिलते हैं। इस रोग को मिटाया नहीं जा सकता है। वह अनेक वर्षों तक बना रहता है, बढता रहता है। इसलिये जैसे जैसे समाज में वृद्ध लोगों की संख्या बढती है वैसे-वैसे इसके रोगियों की संख्या भी अधिक मिलती है। वर्तमान में विश्व के 60 लाख से ज़्यादा लोग इसकी चपेट में हैं। अकेले अमेरिका में ही इससे दस लाख से ज़्यादा लोग प्रभावित हैं, लोगों की औसत उम्र बढ़ने (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) के साथ-साथ भारत में भी इसके शिकारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
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मस्तिष्क की कोशिकाएं
यह बीमारी 50 वर्ष की उम्र के बाद होती है। इससे मरीज़ की शारीरिक गतिविधियां धीमी हो जाती हैं और दिमाग भी सही ढंग से काम करना बंद कर देता है। यह मस्तिष्क के एक छोटे से गहरे केन्द्रीय भाग में स्थित सेल्स के डैमेज होने की वजह से होती है लेकिन आखिर ये सेल्स डैमेज क्यों होती हैं, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। ब्रेन के एक ख़ास हिस्से बैसल गैंग्लिया में स्ट्रायटोनायग्रल नामक सेल्स (स्‍ट्राएटम की कोशिकाओं) होते हैं। सब्सटेंशिया निग्रा (शाब्दिक अर्थ काला पदार्थ) की न्यूरान कोशिकाओं की संख्या कम होने लगती है। वे क्षय होती है। उनकी जल्दी मृत्यु होने लगती है। आकार छोटा हो जाता है। स्‍ट्राएटम तथा सब्सटेंशिया निग्रा (काला पदार्थ) नामक हिस्सों में स्थित इन न्यूरान कोशिकाओं द्वारा रिसने वाले रासायनिक पदार्थों (न्‍यूरोट्रांसमिटर) का आपसी सन्तुलन बिगड जाता है। इन सेल्स से निकलने वाला डोपामिन नामक केमिकल शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए न्यूरोट्रांसमीटर का काम करता है। उनके द्वारा रिसने वाला महत्त्वपूर्ण रसायन न्‍यूरोट्रांसमिटर 'डोपामीन' कम बनता है तथा एसीटिल कोलीन की मात्रा तुलनात्मक रूप से बढ जाती है। इससे इंसान का शारीरिक गतिविधियों पर से कंट्रोल हट जाता है। स्ट्रायनोटायग्रल के मरने का क्या कारण है, इससे अभी भी पर्दा नहीं उठ पाया है। अनेक व्याख्याएं व परिकल्पनाएं हैं । कुछ भूमिका शायद जीन्स या आनुवांशिक गुणों की हो, पर अधिक नहीं।
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कारण
    फिलहाल यह भविष्यवाणी कर पाना असंभव है कि यह बीमारी किसे हो सकती है। हालांकि कुछ स्टडीज से यह पता लगा है कि पार्किन्सन से पीड़ित लगभग दस प्रतिशत मरीज़ों के परिवार में पहले भी इस तरह की समस्या देखी गई थी अर्थात यह वंशानुगत हो सकती है।
    पार्किन्‍सन रोग का मस्तिष्क
    पार्किन्सन रोग व्यक्ति को अधिक सोच-विचार का कार्य करने तथा नकारात्मक सोच ओर मानसिक तनाव के कारण होता है।
    किसी प्रकार से दिमाग पर चोट लग जाने से भी पार्किन्सन रोग हो सकता है। इससे मस्तिष्क के ब्रेन पोस्टर कंट्रोल करने वाले हिस्से में डैमेज हो जाता है।
    कुछ प्रकार की औषधियाँ जो मानसिक रोगों में प्रयुक्‍त होती हैं, अधिक नींद लाने वाली दवाइयों का सेवन तथा एन्टी डिप्रेसिव दवाइयों का सेवन करने से भी पार्किन्सन रोग हो जाता है।
    अधिक धूम्रपान करने, तम्बाकू का सेवन करने, फास्ट-फूड का सेवन करने, शराब, प्रदूषण तथा नशीली दवाईयों का सेवन करने के कारण भी पार्किन्सन रोग हो जाता है।
    शरीर में विटामिन `ई´ की कमी हो जाने के कारण भी पार्किन्सन रोग हो जाता है।
    तरह-तरह के इन्फेक्शन -- मस्तिष्क में वायरस के इन्फेक्शन (एन्सेफेलाइटिस) ।
    मस्तिष्क तक ख़ून पहुंचाने वाले नलियों का अवरुद्ध होना ।
    मैंगनीज की विषाक्तता।

80 के दशक में संयोगवश देखा गया है कि ब्राउन शुगर से मिलती जुलती नशे की एक अन्य वस्तु में एम.पी.टी.पी. नामक पदार्थ की मिलावट वाला इंजेक्शन लगवाने वाले कुछ युवकों में पार्किन्‍सोनिज्‍म रोग तेजी से विकसित होता है । तब अनुमान लगाया गया कि एम.पी.टी.पी. जैसा पदार्थ वातावरण से या शरीर से स्वतः किसी तरह पैदा होकर मस्तिष्क की विशिष्ट कोशिकाओं को नुक़सान पहुंचाता होगा।
इलाज
पार्किन्‍सन रोग का मस्तिष्क में डोपामीन से इलाज
उम्र बढ़ने के साथ होने वाली यह बीमारी दुनिया भर के उम्रदराज़़ लोगों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल बचाव और पर्मानेंट इलाज न सही, लेकिन सामान्य जीवन जीने के लिए दवाएं ज़रूर उपलब्ध हो चुकी हैं। ऐसे में डॉक्टर की सलाह और परिवार के सहयोग से मरीज़ की समस्या को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। इस बीमारी को जड़ से खत्म करने वाला इलाज अभी उपलब्ध नहीं है। लिहाज़ा, इस बीमारी के पेशेंट को जीवनभर दवाई खानी पड़ सकती है। हालांकि दवाओं से रोकथाम हो जाती है। लेकिन बीमारी के असर को कम करने के लिए कई तरह की दवाएं उपलब्ध हैं, जो डोपामिन के स्त्राव को बढ़ाने में मदद करती हैं। लेकिन ये काफ़ी महंगी होती हैं। इनके साइड इफेक्ट्स भी बहुत ज़्यादा देखे जाते हैं, इसलिए विशेषज्ञ की देखरेख में ही ये दवाएं दी जाती हैं। सही तरीक़े से दवाई लेने से मरीज़ 30 साल जक जीवित रह सकता है। पार्किसन के मरीज़ों को दवाइयों का सेवन सही तरीक़े से करना चाहिए। इसके साथ ही इस बीमारी के लिए डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन सर्जरी भी होने लगी है। दिल्ली में यह सुविधा केवल सिर्फ़ एम्स व आर्मी हॉस्पिटल में उपलब्ध है। यहां भी सर्जरी का खर्च लगभग पांच लाख रुपए आता है। मरीज़ों को संभल कर चलना चाहिए क्योंकि वे अचानक लड़खड़ाकर गिर सकते हैं, जिससे पैर हाथ पर चोटें आ सकती है। साथ ही उन्हें शारीरिक श्रम करने पर भी सावधानियां बरतनी चाहिए। बीमारी को जड़ से खत्म करने संबंधित दवाओं पर विश्व के जाने माने न्यूरोलाजिस्ट लगातार रिसर्च कर रहे हैं। डाक्टर जयवेल्लू ने बताया कि रिसर्च अभी एनिमल स्टेप पर है। जल्द यह ह्यूमन स्टेप पर आ जाएगा। इसके बाद पार्किसंस बीमारी भी जड़ से खत्म की जा सकेगी।

प्राकृतिक चिकित्सा
    पार्किन्सन रोग को ठीक करने के लिए 4-5 दिनों तक पानी में नीबू का रस मिलाकर पीना चाहिए। इसके अलावा इस रोग में नारियल का पानी पीना भी बहुत लाभदायक होता है।
    इस रोग में रोगी व्यक्ति को फलों तथा सब्जियों का रस पीना भी बहुत लाभदायक होता है। रोगी व्यक्ति को लगभग 10 दिनों तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।
    सोयाबीन को दूध में मिलाकर, तिलों को दूध में मिलाकर या बकरी के दूध का अधिक सेवन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
    रोगी व्यक्ति को हरी पत्तेदार सब्जियों का सलाद में बहुत अधिक प्रयोग करना चाहिए।
    रोगी व्यक्ति को जिन पदार्थो में विटामिन `ई´ की मात्रा अधिक हो भोजन के रूप में उन पदार्थों का अधिक सेवन करना चाहिए।
    रोगी व्यक्ति को कॉफी, चाय, नशीली चीज़ें, नमक, चीनी, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
    प्रतिदिन कुछ हल्के व्यायाम करने से यह रोग जल्दी ठीक हो जाता है।
    पार्किन्सन रोग से पीड़ित रोगी को अपने विचारों को हमेशा सकरात्मक रखने चाहिए तथा खुश रहने की कोशिश करनी चाहिए।
    इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से प्रतिदिन उपचार करे तो पार्किन्सन रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
पार्किन्‍सन से जुङे शोध और प्रयोग
कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से पार्किंसन का ख़तरा
शरीर में कोलेस्ट्रॉल की अधिक मात्रा को लेकर चिकित्सक सावधान करते रहते हैं। अब एक ताजा अध्ययन में कहा गया है कि शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अधिक होने पर पार्किंसन रोग की आशंका बढ़ जाती है। फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में नैशनल पब्लिक हेल्थ इंस्टीट्यूट के प्रमुख रिसर्चर डॉ. गांग हू ने कहा कि कोलेस्ट्रॉल अधिक होने से हृदय रोग के खतरे की बात तो पहले ही पता थी, लेकिन सीरम में कोलेस्ट्रॉल के स्तर से तंत्रिका तंत्र को नुक़सान के बारे में बहस जारी थी। इस शोध से यह बात साफ हो गई है कि शरीर में अधिक कोलेस्ट्रॉल का अर्थ है, खतरनाक पार्किन्सन रोग का बढ़ा जोखिम।

आसानी से बात कर सकेंगे ‘पार्किंसन’ रोगी
वॉशिंगटन: एक विशेषज्ञ ने दावा किया है कि पार्किंसन के रोगी बातचीत के एक सामान्य तरीक़े पर अमल कर आवाज़ में असामान्य कम्पन की समस्या से मुक्त होकर सहज तरीके से बातचीत कर सकते हैं। पर्ड्यू विश्वविद्यालय में वाणी, भाषा एवं श्रवण विज्ञान विभाग की सहायक प्रोफेसर जेसिका ह्यूवर ने बातचीत का यह तरीका सुझाया है। वह कहती हैं, “इस रोग से ग्रस्त लोगों को अमूमन बातचीत करने में लड़खड़ाहट होती है। आवाज़ में असामान्य कम्पन होने के कारण वे सहज तरीके से बात नहीं कर पाते हैं। मेरा सूत्र बिल्कुल सरल है। ऐसे लोगों को ऊंचे स्वर में बोलने के लिए कहिए। इससे उनकी आवाज़ में स्पष्टता आएगी।” उन्होंने जो तरीका विकसित किया है उसमें रोगियों को तेज़ बोलने को कहा जाता है, जबकि उनके बोलने के दौरान कई लोगों की बातचीत वाला कैसेट बजाया गया। कई लोगों की बातचीत वाला यह कैसेट किसी रेस्तरां तैयार किया गया। वह कहती हैं, “जब मैंने इसके रोगियों से दो बार तेज़ बोलने के लिए कहा तो वे 10 डेसीबेल से ज़्यादा तेज़ नहीं बोल पाए, लेकिन जब शोरगुल वाले कैसेट को साथ-साथ बजाया गया तो इन लोगों की आवाज़ 10 डेसीबेल से तेज़ हो गई।” पृष्ठभूमि की आवाज़ के इस प्रभाव को ‘लोम्बार्ड प्रभाव’ कहते हैं। सामान्य लोग भी शोरगुल के बीच तेज़ आवाज़ में बोलते हैं। इस रोग के मरीज़ों पर वे यही तरीका अपनाए जाने की सलाह देती हैं।

पार्किंसन मरीज़ों के लिए डीबीएस थैरेपी
पार्किंसन मरीज़ों के लिए डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (डीबीएस) थेरेपी उम्मीद की किरण लेकर आया है। नई दुनिया, दिल्ली संस्करण में आज प्रकाशित खबर के मुताबिक, 65 वर्षीय रवीश कुमार रस्तोगी ने पांच महीने तक इस थेरेपी से इलाज कराया, जिसके बाद बहुत हद तक ठीक हो गए हैं और कविताएं लिखने का अपना पुराना शौक़ पूरा कर रहे हैं। क़रीब 12 साल पहले उन्हें पार्किंसन होने का पता चला था तभी से वह शारीरिक व मानसिक कमज़ोरियों के काण समाज से पूरी तरह कट से गए थे। पांच महीने पहले मैक्स अस्पताल में उन्होंने यह थेरेपी लेनी शुरू की और अब जीवन को सही तरीके से जी रहे हैं। साकेत स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में के न्यूरॉलिस्ट डॉ.पुनीत अग्रवाल व न्यूरो सर्जन डॉ.संदीप वैश्य ने बताया कि डीबीएस एक सर्जिकल प्रक्रिया है। इसका उपयोग अक्षम बनाने वाले कई न्यूरोलॉजिकल लक्षण के उपचार के लिए किया जाता है। इस समय इस प्रक्रिया का उपयोग सिर्फ़ उन मरीज़ों के लिए किया जाता है जिनकी बीमारी के लक्षणों को दवाइयों से अच्छी तरह ठीक नहीं किया जा सकता है।

पार्किंसन से बचाता है विटामिन 'डी'
जिन व्यक्तियों के शरीर में विटामिन 'डी' बड़ी मात्रा में मौजूद है, उनमें पार्किंसन बीमारी होने का ख़तरा कम होता है। यह बात एक नए शोध से पता चली है जो फिनलैंड में किया गया है। फिनलैंड में समस्या यह है कि दूसरे यूरोपीय देशों की तुलना में वहाँ सूरज पूरे साल में बहुत ही कम दिखाई देता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि जब लंबे समय तक शरीर में विटामिन 'डी' की मात्रा कम रहती है, तब ब्रेन के अंदर ऐसा नुक़सान होता है जिसकी वजह से पार्किंसन हो सकता है। सूरज की किरणें विटामिन 'डी' का बड़ा स्रोत हैं। बहुत ही कम ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जिनमें विटामिन 'डी' पाया जाता है। यदि शरीर में विटामिन 'डी' की मात्रा कम होती है तो उससे हड्डियों में कमोजरी, कैंसर, दिल की बीमारियों और डायबिटीज हो सकती है, लेकिन अब विटामिन 'डी' की कमी पार्किंसन की वजह भी बन सकती है। फिनलैंड में 1978 से 2007 तक हुई रिसर्च में 3173 लोगों को शामिल किया गया था। उनमें से 50 लोग आखिरकार पार्किंसन का शिकार बने। रिसर्च के मुताबिक जिन लोगों के शरीर में विटामिन 'डी' की कोई कमी नहीं थी, उनमें पार्किंसन का शिकार होने का ख़तरा 67 फीसदी कम था।

दिमाग के अनसुलझे रहस्यों का चलेगा पता
पार्किसन मरीज़ों के लिए खुशखबरी है। अब न्यूरोसाइंटिस्ट नई ब्रेन इमेजिंग तकनीक को अपनाने जा रहे हैं जिससे पार्किंसन पीड़ितों के दिमाग की संरचना के अनसुलझे रहस्यों का पता लगाया जा सकेगा। इसके अलावा ख़ून की मात्रा और प्रवाह से जुड़ी अन्य जानकारियां सामने आएगी। इस तकनीक को पहली बार किसी इंसान के लिए उपयोग किया जा रहा है। इस ब्रेन इमेजिंग तकनीक को आर्टेरियल स्पिन लेबलिंग नाम दिया गया है। यह एएसएल तकनीक पार्किंसन मरीज़ों के लिए बनाए जा रहे ख़ास दवा का परीक्षण करेगी। वाशिंगटन यूनिवर्सिटी आफ मेडिसिन के रिर्सचरों ने बताया कि इस तकनीक की मदद से नई दवा का परीक्षण बेहतर ढंग से किया जा सकेगा।

कॉफ़ी की चुस्की से पार्किंसन उड़न छू!
आमतौर पर लोग अपनी थकान दूर करने के लिए चाय और कॉफ़ी पीते हैं। लेकिन क्या आप जानते है कि कॉफ़ी की ये चुस्कियां पार्किनसन जैसी गंभीर बीमारी के लिए वरदान साबित हो सकती हैं। क्योंकि लिस्बन यूनिवर्सिटी के अतंर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने ये दावा किया है कि कॉफ़ी में मौजूद कैफ़ीन से पार्किनसन होने का ख़तरा कम हो जाता है। कॉफ़ी पीने वालों में से 26 लोगों पर किए गए शोध के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि कॉफी पीने से पार्किसन का ख़तरा कम हो जाता है। रोज़ाना दो से तीन कप कॉफ़ी पीने से पार्किनसन होने की संभावना 14 फ़ीसदी कम हो जाती है। हालांकि अब तक इस बात का साफ़ तौर पर पता नहीं चल पाया है कि पार्किनसन से लड़ने में कैफ़ीन ही कारागार साबित हो रही है या कॉफ़ी में मौजूद दूसरे तत्व। फ़िलहाल इस मामले में शोध जारी है, वहीं कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि भारी मात्रा में चाय कॉफ़ी पीना सेहत के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।

डरावने सपने पार्किसन का पहला संकेत
बार्सिलोना. जो लोग सोते वक़्त अचानक चीखने या रोने लगते हैं उन्हें आगे चलकर पार्किसन बीमारी हो सकती है। स्पेन के वैज्ञानिकों का कहना है कि जो लोग ‘आरईएम स्लीप डिस्टर्बेस’ नामक विकार से पीड़ित होते हैं उन्हें पार्किसन और डिमेंशिया होने का ख़तरा होता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इस विकार से पीड़ित 60 वर्ष से अधिक उम्र के 20 प्रतिशत लोगों को आगे चलकर पार्किसन या लेवी बॉडी डिमेंशिया बीमारी ने जकड़ लिया। बार्सिलोना स्थित हॉस्पिटल क्लीनिक के डॉ. एलेक्स इरांजो और उनकी टीम ने इस विकार से पीड़ित 60 वर्ष से अधिक उम्र के 43 मरीज़ों पर अध्ययन किया।

ब्लड टेस्ट से पता लगेगा पार्किसन
ब्रिटेन के वैज्ञानिक रक्त जांच के जरिए पार्किसन बीमारी का इलाज ढूंढ रहे हैं। इससे आरंभिक स्तर पर ही बीमारी का पता लगाने में मदद मिलेगी। पूर्व में किए गए शोधों में कहा गया है कि जितनी जल्दी इस बीमारी का इलाज शुरू कर दिया जाए, उतना ही मरीज़ के लिए बेहतर होगा, क्योंकि इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं से बीमारी के कारण दिमाग की कोशिकाओं को होने वाले नुक़सान को कम करने में मदद मिलेगी। किसी को जब यह बीमारी होती है, तो वह रक्त में "अल्फा-साइनूक्लीन" नामक प्रोटीन छोड़ती है। इसी प्रोटीन का स्तर जानने के लिए रक्त जांच का सहारा लिया जा रहा है। पार्किसन बीमारी तब होती है जब गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार दिमागी कोशिकाएं खत्म होने लगती हैं। हालांकि, इस बीमारी का पूर्ण रूप से इलाज उपलब्ध नहीं हैं। शोध दल के प्रमुख डॉक्टर पैन्नी फोल्डस ने कहा, जितना जल्दी हम इसका इलाज कर सकें, उतना ही बेहतर होगा। जब तक लक्षणों का पता चलता है, तब तक 70 प्रतिशत दिमागी कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं।

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