रविवार, 13 जनवरी 2013

अखंडता पर सवाल : धारा ३७० : मुकेश कुमार



अखंडता पर सवाल:धारा ३७०

(Article 370:A Threat to Nation's Integrity)

लेखक: मुकेश कुमार

कितने आश्चर्य की बात है की देश के किसी भी भाग में बसने की हमारी संवैधानिक स्वतंत्रता जम्मू-कश्मीर की सीमा के पास जाकर घुटने टेक देती है. वर्षों से जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा के लिए जान की वाजी लगाकर डटे रहनेवाले भारतीय सैनिक जम्मू-कश्मीर में दो गज जमीन पाने के हकदार नही है. वहाँ की नागरिकता पृथक मानी जाती है. करोडो भारतियों का गौरव भारतीय सम्विधान जम्मू-कश्मीर में कुछ लाख लोंगो के बिच गौरवहिन हो जाती है क्योंकि जम्मू-कश्मीर का अपना अलग सम्विधान है. यहाँ तक की भारतियों की आँखों का तारा तिरंगा झंडा, जिसके लिए हजारों लोगों ने हंसते-हंसते प्राण न्योछावर किये है वही जम्मू-कश्मीर में महत्वहीन हो जाते है. स्वतंत्रता पश्चात सरदार पटेल के नेतृत्व में देश के तमाम रियासतों के झंडे अतीत के गर्भ में विलीन हो चुके है, परन्तु जम्मू-कश्मीर का झंडा देश की सम्प्रभुता पर प्रश्न चिन्ह लगाने के लिए बचा ही है. संविधान में वर्णित राज्य के नीति के निदेशक तत्वों से जम्मू-कश्मीर राज्य को कोई सरोकार नही है. जम्मू-कश्मीर को प्रतिवर्ष भारतीय संसद द्वारा दी गयी रकम के खर्च का हिसाब भातीय संसद नही मांग सकती. राष्ट्रपति द्वारा वित्तीय आपात की घोषणा भी इस राज्य पर लागु नही हो सकती है और कश्मीरी लड़कियों की सबसे दुखद स्थिति यह है की जम्मू-कश्मीर के अन्येतर किसी व्यक्ति से शादी करने पर वह न केवल पैत्रिक सम्पत्ति वरन स्वार्जित सम्पत्ति से भी बेदखल हो जाती है..
इन सभी परिस्थितियों का कारन काला कानून के नाम से कुख्यात रही धारा ३७० है जिसने जम्मू-कश्मीर को भारत से अलहदा कर रखा है. जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी किंचित भिन्न प्रतीत होता है और यही वजह है की जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों, अलगाववादियों की पौ बारह है. यही वज़ह है की पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर की ५१८० वर्ग मिल जमीन हड़पने के पश्चात शेष भाग पर गिद्ध दृष्टि लगाये बैठा है. धारा ३७० के कारन जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में अलगाववादियों को दुष्प्रचार का पर्याप्त जगह मिलता है और वह शेख अब्दुल्ला द्वारा जम्मू-कश्मीर में तानाशाह स्थापित करने के स्वप्न को साकार करने के लिए प्रयत्नशील है जिसे वह आजाद कश्मीर का नाम देकर पूरा करना चाहता है. उधर पाकिस्तान भी इस कमजोरी का फायदा उठाकर आतंकवाद, अलगाववाद को लगातार बढ़ावा देता रहा है. धारा ३७० की कंदिकाए उसके इस नापाक इरादे की पूर्ति हेतु तुरुप का पत्ता है क्योंकि इसके कारन जम्मू-कश्मीर भारत के अन्य राज्यों से दूर और नितांत अकेली खड़ी प्रतीत होती है. इसी कमजोर परिस्थिति का लाभ उठाकर अलगाववादी, आतंकवादी और पाकिस्तान इसे क्षत-विक्षत कर लुट लेने को आमादा है.
कहा जाता है की जब इस विधेयक को पारित करने हेतु संविधान सभा में पेश किया गया तो सभी सदस्यों ने इसकी प्रतियों को काला कानून और देश की अखंडता के लिए घातक कहकर फाड़कर फेंक दिया. कश्मीर मसले को बेहद पेचीदे एवं घातक मोड पर ला खड़ा करने के लिए बदनाम नेहरु खुद संसद में इसे पेश करने की हिम्मत नही जुटा पाए और गोपाल स्वामी अयंगर को इसे पारित करने की जिम्मेदारी सौंप अमेरिका चले गए. परन्तु गोपाल स्वमी की किसी ने एक न सुनी. आश्चर्य है सरदार पटेल जो धारा ३०६-क के नए रूप धारा ३७० के बिलकुल खिलाफ थे, उन्होंने इसे पारित करने के लिए सदस्यों से अनुरोध किया. सफाई में उनका कहना था की यदि ऐसा नही करते तो नेहरु नाराज हो जाते.
ज्ञातव्य है की हैदराबाद में सैनिक अभियान के बाद ही नेहरु जी जम्मू-कश्मीर मामले को व्यक्तिगत रूप से हल करने के लिए सरदार पटेल से अपने हाथ में ले लिए थे. वे शेख अब्दुल्ला से गिटर-पिटर कर धारा ३०६ की कन्दिकाएं तय कर आये थे. बाद में जब इस पर चर्चा चली तो उसमे बेहद आपत्तिजनक विषयों पर संशोधन किया गया जिसे शेख अब्दुल्ला ने मानने से इंकार कर दिया. उसका मानना था की यदि भारतीय संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार, नागरिकता और निर्देशक सिद्धांत, सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्चता आदि जम्मू-कश्मीर पर लागु हो जाती है तो उनका कानून अर्जित सम्पत्ति आदि के मामले में तथ्यहीन हो जायेगा. फिर उसका कहना था की ये तो अस्थायी उपबन्ध है. अगर ये कहा जाये की इस ‘अस्थायी’ शब्द से शेख अब्दुल्ला नेहरु को और नेहरु जनता को मुर्ख बना रहे थे तो शायद गलत नही होगा.
ज्ञातव्य है की नेहरु के लगातार समर्थन के कारन जम्मू-कश्मीर के मुसलमानों पर शेख अब्दुल का बहुत प्रभाव हो गया था और उसके इसी प्रभाव के कारन शेख अब्दुल्ला पर भरोसा कर नेहरु जम्मू-कश्मीर में शांति पर्यंत स्वघोषित प्लेबिसाईट जितने का स्वप्न संजोये थे. श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने नेहरु से इस विषय पर सवाल करते हुए पूछा था, ‘जम्मू-कश्मीर के लिए धारा ३७० जैसे कानून लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?’ जवाब में नेहरु बोले, ‘हम किसी के साथ जबरदस्ती ब्याह नही रचा सकते.’
कैसी बिडम्बना है की नेहरु जम्मू-कश्मीर को भारत से अलहदा एक पड़ोसी राज्य ही समझते रहे, भारत का एक अभिन्न अंग नही. डॉ मुखर्जी नेहरु के जम्मू-कश्मीर के प्रति उपेक्षित दृष्टिकोण को नजर में रखते हुए कहा था, ‘कश्मीर का सवाल केवल भू-भाग का नही है, भारत की अंतरात्मा एवं चेतना का प्रश्न है. राष्ट्र अपनी सीमाओं को सिमटते हुए नही देख सकता है. भारतीय राष्ट्र में कश्मीरियत भी ठीक उसी प्रकार है जैसे अन्य भाषाई, मजहबी, और क्षेत्रीय पहचान.’
परन्तु देश को सिर्फ शासन का क्षेत्र समझनेवाले, राष्ट्रीयता को ‘बू’ और विशुद्ध हिंदुत्व विचारधारा वाले को देशद्रोही कहनेवाले संकीर्ण मस्तिष्क में भावनात्मक अभिव्यक्ति की चरम विन्दु तक पहुंची इन शब्दों के लिए कोई जगह नही था. इस बात का एहसास उन्हें तब हुआ जब वे माउन्टबेटन और शेख अब्दुल्ला के शिकंजे में फंसकर अपने साथ-साथ भारत को भी दुनिया की नजर में गिरा चुके थे. इनकी यह भूल पाकिस्तान का पक्ष विश्व के समाने स्वतः मजबूत कर दिया था. न्यूयार्क टाईम्स में छपे एक लेख ने उनकी आँखें खोल दी जिसमे कहा गया था-“भारत और पाकिस्तान झगड़े की उत्पत्ति के कारन को असंगत बताकर राष्ट्रिय आत्मघात करने का तरीका अपना रहे है. पाकिस्तान तुच्छ और महत्वहीन बदलाव की सलाह मैल्कम नायिटन के प्रस्ताव में दिया था जिसके जवाब में भारत ने एसी सुधर की बात रखी जिसका अर्थ प्रस्ताव को अस्वीकार करना ही था. स्पस्ट है की भारत पञ्च निर्णय को ठुकरा रहा है. भारत बाहरी लोगों को निर्णय की रूप रेखा तैयार करने का दोषी नही ठहरा सकता है.....भारत ने हैदराबाद पर कब्जा कर लिया क्योंकि वहाँ की प्रजा हिंदू थी भले ही राजा मुस्लमान. अब वह मुस्लिम बहुल कश्मीर पर इसलिए अधिकार होने का दवा कर रहा है क्योंकि वहाँ के हिंदू रजा ने विलय पत्र पर दस्तखत कर दिया है. यह दोनों लाभ लेना चाहता है......यदि भारत में अछी भावना है तो वह यु.एन.ओ. की मध्यस्थता स्वीकार करेगा.
और अब नेहरु के शब्द बदल गए थे. जैसा की घोर दुःख व्यक्त करते हुए उन्होंने सरदार पटेल से कहा था, ‘वे पञ्च निर्णय की बात कर रहे है. हमलोगों ने निर्णय कर लिया है की हमलोग इसका बहिष्कार करेंगे... भले ही वे हमे दोषी ठहराएँ. हम उनसे कहेंगे कश्मीर की समस्या का समाधान वर्तमान स्थिति इतिहास, भूगोल, भाषा और संस्कृति को ध्यान में रखकर किय जाना चाहिए.’
धारा ३७० जैसे काले कानून की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ी? जम्मू-कश्मीर की एतिहासिक पृष्ठभूमि पर थोडा दृष्टिपात करने से पता चलता है की पंद्रहवी सदी के आरम्भ तक कश्मीर हिंदू-प्रदेश था, परन्तु थोड़ी सी भूल ने लाखों हिंदुओं को मुस्लिम बनने पर मजबूर कर दिया. अमृतसर में हुए अंग्रेजों और गुलाबसिंह के बिच उभयानवय संधि के पश्चात १८४६ में जम्मू-कश्मीर के महाराज गुलाब सिंह के दरबार में लाखों की संख्या में मुस्लिम स्त्री पुरुष बड़ी उम्मीद लेकर अपने एवं अपने परिवारवालों पर मुस्लिम आक्रमणकारियों, आततायियों द्वारा हुए अत्याचार एवं जबरन धर्म परिवर्तन कराए जाने का हवाला देते हुए उन्हें शुद्ध कर फिर से अपने प्यारे हिंदू धर्म में वापस लेने की प्रार्थना की, परन्तु मुर्ख पुरोहित की मूर्खता के कारन यह समाज उद्धारक कार्य नही हो सका. गुलाब सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र रणवीर सिंह फिर प्रताप सिंह और अब हरिसिंह कश्मीर के महाराजा हुए. इतने दिनों तक जम्मू-कश्मीर में शांति एवं हिंदू-मुस्लिम भाईचारा बना रहा. लेकिन जैसे जैसे धर्मान्तरित मुस्लिम अपना हिंदू इतिहास भूलते गए हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की नीव कमजोर पड़ने लगी. १९३१ में शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में कुछ लोग सत्ता के लिए हिंदुओं की हत्या, लुट-मार करने लगे. परिणामतः शेख अब्दुल्ला को कई बार गिरफ्तार कर नजरबंद किया गया. भारतीय नेताओं की मुस्लिम परस्त बन चुकी मनोवृति एवं शेख अब्दुल्ला की दोस्ती के कारन नेहरु कश्मीर राज्य प्रशासन एवं महाराज पर नाना प्रकार के आरोप लगाकर विषवमन करने लगे. उन्होंने शेख अब्दुल्ला को शेर-ए-कश्मीर एवं लोगो का प्रिय हीरो बताते हुए अपने भाषण में कहा, “यह बड़े दुःख की बात है की कश्मीर प्रशासन अपने ही आदमियों का खून बहां रही है. मैं कहूँगा की उसका यह कृत्य प्रशासन को कलंकित कर रही है और अब यह ज्यादा दिन तक नही टिक सकती. मै कहता हू की कश्मीर की जनता को अब और अपनी आजादी पर हमला एक पल भी बर्दाश्त नही करना चाहिए. यदि हम अपने शासक पर काबू पाना चाहते है तो हमे पूरी शक्ति के साथ उसका विरोध करना चाहिए.
नेहरु इतना पर ही नही रुके और शेख अब्दुल्ला के समर्थन में कश्मीर में दंगे भडकाने आ पहुंचे. परिणामतः उन्हें महाराज के आदेश से गिरफ्तार कर वापस भेज दिया गया. दरअसल नेहरु को यही बात चुभ गयी थी. इसी व्यक्तिगत मित्रता और शत्रुता के कारन कश्मीर को महाराज से जबरन छीनकर शेख अब्दुल्ला को दिला दिया और महाराज को दर-दर भटकने को मजबूर किया गया. इसी कारन कश्मीर का मसला अत्यधिक उलझ जाने के कारन भारत माँ के सिने का नासूर बन गया.
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत देशी रियासतों को यह अधिकार दिया गया की वे इच्छानुसार भारत या पाकिस्तान किसी भी डोमिनियन में शामिल हो सकते है. १५ अगस्त, १९४७ तक जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर को छोडकर शेष सभी देशी रियासतें भारत या पाकिस्तान में शामिल हो चुकी थी. महाराज हरिसिंह भारत या पाकिस्तान किसी में भी विलय करने का निर्णय नही ले पा रहे थे. यद्यपि प्रारम्भिक तौर पर लगता था की वे अपने स्वतंत्र शासन बनाये रखने की महत्वाकांक्षा के वशीभूत थे, परन्तु जैसा की उनके कथन से स्पष्ट होता है वे अपने अल्पसंख्यक हिंदू सिक्ख और बौद्ध प्रजा का भविष्य किसी भी डोमिनियन में शामिल होकर सुरक्षित नही देख रहे थे. कारन, पाकिस्तान में हिंदुओं और सिक्खों पर हो रहे अमानवीय अत्याचार से तो वाकिफ हो ही रहे थे, अतः पाकिस्तान में विलय का तो प्रश्न ही नही था. एक जनवरी १९४७ को गाँधी जी कश्मीर का दौड़ा किये और घोषणा की की जम्मू-कश्मीर में शांति के पश्चात प्लेबीसाईट के आधार पर विलय भारत या पाकिस्तान में सुनिश्चित किया जायेगा. माउन्टबेटन भी कुछ ऐसा ही कह आये थे और नेहरु तो उनसे खार ही खाए बैठे थे. प्लेबीसाईट के नाम से ही जम्मू-कश्मीर के हिंदू और सिक्ख बहुत भयभीत थे. बहुतों ने तो पलायन भी करना शुरू कर दिया था. ७८% मुस्लिम आबादी वाले जम्मू-कश्मीर में प्लेबीसाईट का निर्णय भारत के पक्ष में जाने का भरोसा नेहरु के अतिरिक्त शायद ही किसी को हो. जम्मू-कश्मीर के सर्वेक्षण पर गए शिवानलाल सक्सेना ने अपने रिपोर्ट में लिखा था-“मैंने कश्मीर का सर्वेक्षण किया है और प्लेबीसाईट जितने की उम्मीद महापागलपन (mid night madness) प्रतीत होता है. शेख अब्दुल्ला का कश्मीरी मुस्लिमों पर बेशक प्रभाव है, पर नेहरु और गाँधी जी के घोषणा के बदौलत मुस्लिम हिंदुस्तान के पक्ष में मत देंगे ऐसा किसी को भी उम्मीद नही है. प्लेबीसाईट की अनावश्यक घोषणा कर हमने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लिया है और मामले को यु एन ओ में ले जाना और फिर जब हम जीत रहे थे उस वक्त युद्ध बंदी की घोषणा बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण रहा है.”
तत्पश्चात परिणाम की कल्पना से ही हिंदू, सिक्ख और स्वयम महाराज सहमे हुए थे. माउन्टबेटन कश्मीर को पाकिस्तान की झोली में डालने को उद्धत था तो गाँधी प्लेबीसाईट थोपने पर आमादा और नेहरु एक ऐसा घोडा था जिसकी नकेल इन दोनों के हाथ में ही था. जैसा की हरिसिंह ने भी कहा, “गाँधी, नेहरु और माउन्टबेटन के चंगुल में फंसा भारतीय संघ किसी मुस्लिम अतिक्रमणकारी शासक के शिकंजे से कम नही है.”
परन्तु, जब २२ अक्टूबर को पाकिस्तान ने जिगरेवालों को आगे कर जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण कर दिया और रियासत के आधे सैनिक जो मुसलमान थे आक्रमणकारियों से मिलकर हिंदुओं और सिक्खों का कत्लेआम, लूट-मार, आगजनी और बलात्कार का तांडव करने लगे तो हरिसिंह मजबूर होकर भारत में शामिल होने के विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए. परन्तु नेहरु इस विलय पत्र को तभी स्वीकार किये जब हरिसिंह से शेख अब्दुल्ला को रिहा कर प्रधानमंत्री बनाने की बात मनवा ली. इस पर भी माउन्टबेटन की चाल में फंसकर इस विलय को ‘अस्थायी’ करार देने और प्लेबीसाईट के आधार पर अंतिम निर्णय लेने एवं मामले को यु एन ओ में ले जाकर पाकिस्तान को अकारण ही एक पक्ष बनाकर घोर बिडम्बना का परिचय दिए. पाकिस्तान को अब कश्मीर पर हक जताने का अनर्थकारी हक प्राप्त हो गया. इसप्रकार उन्होंने कश्मीर को पाकिस्तान के हवाले किये जाने के अभियान पर १९४५ से चली आ रही ब्रिटिश लीग षड्यंत्र को बल दिया. बाद इसके शुरू हुआ महाराज को शासन से बाहर करने और शेख अब्दुल्ला को तख्त पर बिठाने का सिलसिला. महाराज हरिसिंह को कश्मीर की राजनीती से जबरन दूध की मक्खी की तरह निकालकर मुंबई जाने को विवश किया गया. जैसा की श्री मेनन ने अपने रिपोर्ट में कहा था-“शेख अब्दुल्ला महाराज हरिसिंह की आखिरी बूंद खून तक चूस जाना चाहता है.”
दरअसल नेहरु को शेख अब्दुल्ला पर अंध विश्वास था और इसी के भरोसे वे प्लेबीसाईट जितने के प्रति निश्चिन्त थे. परन्तु सत्ता प्राप्ति के पश्चात शेख अब्दुल्ला धीरे-धीरे अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. शेख अब्दुल्ला अब खुलकर आजाद कश्मीर का राग अलापने लगा. उसके इंटरव्यू में दिए एक बयान ने नेहरु की कल्पना की उड़ान को थोडा ब्रेक लगाया. शेख अब्दुल्ला ने कहा, “जम्मू-कश्मीर का किसी भी डोमिनियन में विलय शांति बहाल नही कर सकती है. हमलोग दोनों डॉमिनियनो के साथ मित्रवत व्यवहार बनाये रखना चाहते है, यही एक मध्यमार्ग है. कश्मीर की स्वतंत्रता की गारंटी न केवल भारत और पाकिस्तान को देनी होगी वरन ब्रिटेन, संयुक्त राष्ट्र संघ तथा इसके दूसरे सदस्यों को भी देनी होगी.....भारत ने महाराज के साथ स्थायी समझौता कर इसे ठुकराकर जवाब दिया है, पाकिस्तान ने भी कुछ ऐसा ही किया है. परन्तु, भारत ने विलय के वक्त यह स्पष्ट घोषणा किया है की यह विलय अस्थायी है और बाद में यहाँ की जनता निर्णय करेगी की वे क्या करेंगे.......”
सच्चाई यही थी की शेख अब्दुल्ला जानता था जम्मू-कश्मीर का पाकिस्तान में विलय होने पर यहाँ का तानाशाह शासक बनने का उसका स्वप्न स्वप्न ही रह जायेगा. इसीलिए वह नेहरु जैसे नरम चारा का हाथ थामे हुए था. आज भी नेशनल कांफ्रेंस के पूर्व अध्यक्ष फारुक अब्दुल्ला का कहना है की यदि जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा होता तो वे प्रधान मंत्री होते और हुर्रियत कांफ्रेंस आदि अलगाववादी लोग शेख अब्दुल्ला की आजाद कश्मीर की भांति ही राग अलापते है.
प्रारम्भ में पाकिस्तान शेख अब्दुल्ला का कश्मीरी मुस्लिमों पर प्रभाव को देखते हुए प्लेबीसाईट से मुकर गया. नेहरु भी शेख अब्दुल्ला के आजाद कश्मीर की मांग से बौखला गए थे लेकिन जम्मू-कश्मीर के भाग्य का फैसला करने वाला तुरुप का पत्ता तो शेख अब्दुल्ला के हाथों में जा पड़ा था. अब जम्मू कश्मीर के भाग्य का फैसला करने का हक न भारत संघ के हाथ में रह गया था न भारतियों के और न ही महाराज हरिसिंह के हाथ में. अब देश का हित अनहित और जम्मू-कश्मीर एवं वहाँ के अल्पसंख्यकों के भाग्य का फैसला करने का हक चंद कश्मीरी मुसलमानों के हाथ में आ गया था. अब नेहरु को समझौता के आलावा कोई रास्ता दिखाई नही पड रहा था. इसलिए आजाद कश्मीर तो नही परन्तु उसके समकक्ष प्रास्थिति प्रदान करनेवाला धारा ३७० को दहेज में देकर जम्मू-कश्मीर की सगाई भारत के साथ करावा दी. परिस्थिति यह थी की नेहरु अपने ही शब्दों के जाल में बुरी तरह उलझ चुके थे. शेख अब्दुल्ला पर से तो भरोसा उठ ही गया था साथ ही टूट चूका था प्लेबीसाईट जितने का दिवास्वप्न. अब प्लेबीसाईट से मुकरना मजबूरी थी. जैसा की नेहरु के कथन से पता चलता है, “अफ़सोस, वर्तमान परिस्थिति प्लेबीसाईट के लिए उचित नही है....परन्तु मैं इसके लिए मना भी नही कर सकता.” उस एक भूल के कारन ही आज तक भारत कश्मीर के सम्बन्ध में अपना मजबूत पक्ष अमेरिका और यु एन ओ को समझाने में असफल रहा है और पाकिस्तान हमेशा से ही अमेरिका के समर्थन का लाभ उठाता आ रहा है.
धारा ३७० के इतिहास पर भी एक नजर डालना आवश्यक है. जम्मू-कश्मीर को विशेष प्रास्थिति देने सम्बन्धी ड्राफ्ट ३०६-क बनाया गया जिसे बाद में १७ अक्टूबर १९४७ को सम्बिधान सभा में धारा ३७० के रूप में अयंगर द्वारा पारित करवाया गया. भारतीय सम्विधान का जो प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागु हुआ उसकी घोषणा राष्ट्रपति १९५० ने सम्विधान आदेश १९५० द्वारा जारी किया जिसमे प्रावधान था की संसद प्रतिरक्षा, विदेश कार्य तथा संचार के विषय में जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में कानून बना सकती है. धारा ३७० के अनुसार जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा राज्य के संविधान का निर्माण करेगी और यह निश्चित करेगी की संघ की अधिकारिता किन क्षेत्रों में या विषयों पर होगी. जम्मू-कश्मीर संविधान संशोधन अधिनियम १९५१ के तहत वंशानुगत प्रमुख के पद को समाप्त कर निर्वाचित सदर-ए-रियासत को राज्य का प्रमुख बनाया गया. १९५२ में दिल्ली में भारत सरकार तथा जम्मू-कश्मीर राज्य संविधान सभा के लंबित रहने पर कुछ विषयों पर संघ को अधिकारिता प्रदान की गयी. इस समझौते की अन्य महत्वपूर्ण बातें निम्नलिखित है:
१. भारत सरकार इस बात पर सहमत हुए की जहाँ अन्य राज्यों के मामले में अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास होगी वही जम्मू-कश्मीर की स्थिति में ये शक्तियाँ राज्य के पास ही रहेगी.
२. जम्मू-कश्मीर के निवासी भारत के नागरिक माँने जायेंगे लेकिन उन्हें विशेष अधिकार एवं प्राथमिकताएँ देने संबंधी कानून बनाने का अधिकार राज्य विधान सभा को होगा.
३. भारत संघ के झंडे के अतिरिक्त जम्मू-कश्मीर का अपना अलग झंडा होगा.
४. सदर-ए-रियासत अन्य राज्यों के राज्यपाल के समकक्ष की नियुक्ति जहाँ अन्य राज्यों में संघ सरकार तथा राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी वहीँ जम्मू-कश्मीर के मामले में यह अधिकार राज्य विधान सभा की होगी.
५. राज्य में न्यायिक सलाहकार मंडल के अस्तित्व के कारन सर्वोच्च न्यायलय को केवल अपीलीय क्षेत्राधिकार होगा.
६. दोनों पक्ष इस बात पर सहमत है की राज्य विधान मंडल के निलंबन से सम्बन्धित अनुच्छेद ३५६ तथा वित्त आपात से सम्बन्धित अनुच्छेद ३६० जरूरी नही है.
१९५४ में जम्मू-कश्मीर संविधान सभा ने पुष्टि की की भारत संघ में जम्मू-कश्मीर का विलय अंतिम है. इसके बाद राष्ट्रपति ने राज्य सरकार से परामर्श करके संविधान आदेश जारी किया जिसके तहत १९६३, १९६४, १९६५, १९६६, १९७२, १९७४, १९७६, एवं १९८६ में संशोधन किया गया. बाबजूद इसके धारा ३७० की विकरालता बनी हुई है. इन संशोधनों का उद्देश्य उस महाभूल का आंशिक शोधन मात्र ही है जिसकी परिणति सिर्फ इतना है की जम्मू-कश्मीर भारत के हाथ से खिसकने के स्थान पर कानूनी शिकंजों के सहारे जकडा हुआ है जिसे तोडने के लिए पाकिस्तान, पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी, उग्रावादी एवं अलगाववादी जी जन से जुटे हुए है. इन संशोधनों के बाबजूद संसद:
१. सातवी अनुसूची में वर्णित विषयों पर जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में कानून नही बना सकती.
२. जम्मू-कश्मीर राज्य के नाम या राज्य क्षेत्र में संघ सरकार अपनी मर्जी से कोई परिवर्तन नही कर सकती है.
३. राज्य के किसी भाग के व्ययन को प्रभावित करने वाले किसी अंतर्राष्ट्रीय करार या संधि के सम्बन्ध में कानून नही बना सकती है.
४. राष्ट्रपति द्वारा अनु. ३५२ के अधीन जारी राष्ट्रिय आपात की घोषणा राज्य सरकार की सहमति के बिना प्रभावी नही हो सकती है.
५. अनु. ३६० के अधीन राष्ट्रपति द्वारा घोषित वित्तीय आपात लागु नही होगी.
६. अनु. १९(१)(ड.) में वर्णित भारत के राज्य क्षेत्र के किसी भी भाग में निवास करने तथा बस जाने की स्वतंत्रता जम्मू-कश्मीर में लागु नही होगी.
७. राज्य के नीति के निदेशक तत्व जम्मू-कश्मीर में लागू नही होगी.
८. संसद द्वारा संविधान में किया गया संशोधन राज्य में तभी लागू होगी जब राज्य सरकार की सहमति से अनु. ३७०(१) के अधीन घोषणा की जाय.
इतना कुछ होने के बाबजूद नेशनल कांफ्रेंस की सरकार गला फाड़कर अधिक स्वायत्तता की मांग करता रहता है. राज्य विधान मंडल में ध्वनि मत से स्वायत्तता प्रस्ताव पारित हो जाता है और १९५३ के पूर्व की स्थिति बहाल करने की मांग की जाती है, परन्तु आतंकवाद की समाप्ति और बेरोजगारी दूर करने आदि पर विधेयक नही लाया जाता है. सच कहा जाय तो यह अधिक स्वायत्तता की आड. में जम्मू-कश्मीर राज्य को वापस उसी गर्त में ले जाने का षड्यंत्र है जहाँ अलगाववादियों तानाशाह स्थापित करने का ख्वाब देखनेवालों एवं पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों को मनमानी करने की खुली छूट मिल जाये. जैसा की राज्य स्वायत्तता समिति की रिपोर्ट में कहा गया है:

१. भारतीय संविधान के भाग २१ के शीर्षक से ‘अस्थायी’ शब्द हटा दिया जाय और धारा ३७० के सम्बन्ध में ‘अस्थायी’ उपबन्ध के स्थान पर ‘विशेष उपबन्ध’ लिखा जाय.
२. संघ सूची के विषय जो सुरक्षा, विदेशी मामलों एवं संचार अथवा उसके अनुषंगी न हो उसे राज्य में लागु नही किया जाय.
३. जम्मू-कश्मीर विधान मंडल का चुनाव राज्य संचालन बोर्ड के अधीन हो न की केन्द्रीय चुनाव कमीशन के.
४. आपात स्थिति लागू करने से पूर्व राज्य सरकार की सहमती आवश्यक होगी. अनु. ३५२ में संशोधन किया जाय एवं अनु. ३५५-३६० जम्मू-कश्मीर में लागु न किया जाय जैसा की १९५४ के पूर्व था.
५. जम्मू-कश्मीर की संविधान में मूलभूत अधिकारों का एक अलग अध्याय जोडने की जरूरत है.
६. अनु. २१८ जम्मू-कश्मीर में लागु नही किया जाय और इस सम्बन्ध में राज्य विधान मंडल फिर से कानून बनाने के लिए स्वतंत्र हो.
७. संघलोक सेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति राज्य में समाप्त कर दिया जाय.
८. भारतीय संविधान द्वारा दलितों को दिए गए आरक्षण को जम्मू-कश्मीर के मामले में राज्य संविधान में स्थानांतरित कर दिया जाय.
९. मुख्यमंत्री वजीर-ए-आजम एवं राज्यपाल सदर-ए-रियासत कहा जाय एवं राज्यपाल की नियुक्ति राज्य सरकार की सहमति से हो.
उपर्युक्त तथ्यों का आधार धारा ३७० ही है और उपर्युक्त बातों के अध्ययन से स्पष्ट है की इसके तहत दो प्रधान, दो विधान और दो निशान की बात आती है जो किसी भी राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए खतरा है. यह दुखद है की भारत एवं जम्मू-कश्मीर सहित पुरे भारतीय प्रारंभिक गलतियों का दुष्परिणाम आज तक झेलते आ रहे है. इसी का दुष्परिणाम है की कश्मीरी मुसलमान कश्मीर को भारत से अलग मुल्क समझते है और पाक स्थित आतंकवादी, अलगाववादी कश्मीरियों को बरगलाकर आतंकवाद, उग्रवाद के रास्ते पर ले जाने में सफल होते है. वे कश्मीरी नवयुवकों को यह बताने में पूरी तरह सफल होते है की कश्मीर भारतीय संविधान द्वारा शासित भारत से जुड़ा एक अलग मुल्क है. यही कारन है की २४ आतंकवादी दलों का समूह हुर्रियत कांफ्रेंस कश्मीर घाटी में अपना प्रभाव होने की बात करता है और आजाद कश्मीर का स्वप्न देखता है. हुर्रियत कांफ्रेंस का चेहरा एक ओर पाकिस्तान से घिरा मुखौटा है तो दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर में तानाशाह शासक बनने की ललक. पाकिस्तान दुहरी चल चल रहा है. एक तरफ तो तथाकथित जेहादियों, आतंकवादियों और अलगाववादियों को खुला समर्थन देकर कश्मीर को भारत से अलग करना चाहता है तो दूसरी ओर राजनीती में इनका प्रवेश कराकर अपना उल्लू सीधा करना चाहता है. राजनीती और जनता तक इनका प्रवेश जम्मू-कश्मीर से बाहर के भारतीय क्षेत्रों में भी हो चूका है जो देश के लिए खतरनाक है. वृहत स्वायत्तता की मांग करनेवालों का ध्यान वहाँ की आर्थिक बदहाली, बेकारी, अपराध और आतंकवाद आदि समस्याओं पर नही जाता है. स्कुल और कॉलेज नही है, परिणामतः मदरसों का सहारा लेना पड़ता है और मदरसों में मुल्ला क्या पढते है य जग जाहिर है. पाकिस्तान में अधिकांश मदरसों पर जेनरल मुशर्रफ ने इसलिए प्रतिबंध लगा दिया क्योंकि वे कट्टरवाद और आतंकवाद की शिक्षा दे रहे थे. कलम और बंदूक की शिक्षा साथ-साथ चो रही थी. आतंक्वादियों, अलगाववादियों को जम्मू-कश्मीर में राजनितिक संरक्षण प्राप्त है. राज्य के विकास के लिए हर साल दी जानेवाली रकम का क्या होता है कुछ पता नही. इन पैसों का दुरूपयोग बम-गोला खरीदने में होता हो तो कोई आश्चर्य नही. रुबिया अपहरण कांड का नाटक ऐसे ही राजनितिक संलिप्तता को उजागर करता है जिसमे जे के एल एफ के नेता यासीन मलिक एवं अडतीस उग्रवादियों, अलगाववादियों को बेबजह रिहा किया गया.
प्रश्न यह है की यह कबतक चलता रहेगा? कबतक धरती का स्वर्ग कश्मीर खून की होली खेलता रहेगा? शायद तबतक जबतक धारा ३७० जैसे काले कानून को निरस्त कर आतंकवादियों का समूल नष्ट न कर दिया जाये. दूसरा कार्य होगा कश्मीर की जनता में राष्ट्रीयता, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रवाद एवं इस्लाम के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट करना. उनमे भारत सरकार में विश्वास पैदा करना एवं पाक अधिकृत कश्मीर की बदहांलियो को उजागर कर पाकिस्तान एवं आतंकवाद, अलगाववाद के विरुद्ध खड़ा करना. परन्तु, ये कार्य तभी संभव है जब कश्मीर समस्या को मुस्लिम समस्या और पाकिस्तान हित को मुस्लिम हित के रूप में देखनेवाले और इसका दुष्प्रचार कर देश के भाई-भाई में अलगाव पैदा करने वाले देशद्रोही राजनीतिज्ञों पर अंकुश लगे. ऐसे भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के विरुद्ध जनता में जाग्रति पैदा करना भी आवश्यक है. राष्ट्रवाद और राष्ट्रप्रिती समझौते की वस्तु नही होती. सच तो यह है की किसी भी राजनितिक पार्टी के भरोसे देश की भला होने की अपेक्षा करना आज के माहौल में ठूंठ पेड से फल प्राप्ति की अपेक्षा करना है. इनकी प्रत्येक निति वोट बैंक के मद्दे नजर निर्धारित होती है और राष्ट्रहित पार्टी हित के आगे घुटने टेक देती है. कही ऐसा न हो की शेख अब्दुल्ला जो काम जीते जी नही कर सका इन तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जाती सापेक्षता करनेवाली पार्टियां अपनी कुकर्मों से बरबस हो कर गुजरे. अतः भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है की समय रहते भारतीय संविधान का ये काला कानून जो भारत माँ के सिने का नासूर बनकर आतंकवाद, अलगाववाद का पीव सतत निस्सृत कर रहा है, को एकजुट होकर खत्म किये जाने की अभियान पर जुट कर देश के सच्चे नागरिक एवं भारत माता के सच्चे सपूत होने का परिचय दे.
लेखक: मुकेश कुमार

आधार ग्रन्थ:
1. Sardar Patel’s Correspondence-Durga Sinh
2. My Frozen Turbulence In Kashir-Jagmohan
3. Bharat Gandhi Nehru Ki Chhaya me-Gurudutt
4. Frontlines
5. Unique Guide, Newspapers and Others.

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