बुधवार, 2 जनवरी 2013

संत और स्वयंसेवक समस्याओं से निराश नहीं होते -मोहनराव भागवत,



मेरठ में रा.स्व.संघ का कार्यकर्ता अभ्यास वर्ग
संत और स्वयंसेवक समस्याओं से निराश नहीं होते
-मोहनराव भागवत, सरसंघचालक, रा.स्व.संघ

रा.स्व.संघ से ली जा सकती है अनुशासन और देशभक्ति की सीख
-पुलक सागर महाराज, जैनमुनि
अजय मित्तल

गत दिनों मेरठ में रा.स्व.संघ का तीन दिवसीय कार्यकर्ता अभ्यास वर्ग सम्पन्न हुआ। वर्ग में मेरठ प्रांत के मंडल स्तर तक के 1148 कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। रा.स्व.संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत वर्ग में पूरे समय उपस्थित रहे। वर्ग के समापन समारोह को संबोधित करते हुए श्री मोहनराव भागवत ने कहा कि वर्तमान में देश समस्याओं से घिरा हुआ है। इनके कारण आमजन में निराशा है। लेकिन संत और संघ के स्वयंसेवक कभी निराश नहीं होते। समस्याओं की चुनौती स्वीकार कर वे स्वार्थमुक्त, भेदभावमुक्त समाज रचना के निर्माण में जुटे रहते हैं। वे जानते हैं कि सनातन हिन्दू जीवन और हिन्दू राष्ट्र को मिटाने की ताकत समस्याओं में नहीं है। चीन को सबसे बड़ा खतरा बताते हुए उन्होंने कहा कि भारत की सीमाएं खुली होने के कारण सब ओर से दुश्मन घुस आता है। असम में कई बंगलादेशी घुसपैठिए आज विधानसभा सदस्य बन चुके हैं। भारत सरकार चीन ही नहीं, पाकिस्तान और बंगलादेश के सामने भी दब्बू व्यवहार करती है।
आंतरिक समस्याओं पर बोलते हुए श्री भागवत ने कहा कि एफ.डी.आई. हमारे खुदरा व्यापार को नष्ट करेगी। लेकिन हमारे सत्ताधारी जनहित नहीं देख रहे। आज अमरीका के लोग भी वॉलमार्ट नहीं चाहते। पूरी दुनिया में एफ.डी.आई. का अनुभव अच्छा नहीं है। किन्तु सरकार देशहित की बलि चढ़ा रही है। सामाजिक भेदभाव व अस्पृश्यता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हमने अपने ही बंधुओं से पशुवत् व्यवहार किया है। विविधता में एकता देखने वाले हम लोगों ने इस प्रकार उन्हें परायेपन की ओर धकेला है। सम्पूर्ण समाज को इस भेदभाव से मुक्त करना होगा।
श्री भागवत ने कहा कि हिन्दुत्व भारत का स्वत्व है, भारत की जीवन पद्धति है। इसी के आधार पर सामाजिक पुनर्निर्माण होगा, क्योंकि स्वत्व के विकास के बिना समाज का विकास संभव नहीं है। उसके बिना शील-चरित्र नहीं बन सकता। उन्होंने कहा कि हिन्दू कोई सम्प्रदाय नहीं है। इसका एक संस्थापक, एक पुस्तक, एक पूजा पद्धति नहीं है। इस देश के सब मत-पंथ-सम्प्रदाय हिन्दू हैं। हिन्दू भारत की प्रकृति है, पहचान है। भारतीयों को दुनिया में हिन्दू विशेषण दिया जाता है। अब्दुल्ला बुखारी के पिता को हज के दौरान अरब के लोगों ने 'हिन्दू' बताया था। अहमद खां ने 1884 में लाहौर की सभा में आयोजकों को कहा था कि वे खुद को हिन्दू बताते हैं, पर उन्हें (अहमद खां) को हिन्दू क्यों नहीं कहते, जबकि भारत के तमाम लोग, जो पूजा पद्धति से मुस्लिम या ईसाई हों, राष्ट्रीयता से हिन्दू हैं। लेकिन आज राजनीति के कारण बहुत से लोग स्वयं को हिन्दू कहने में संकोच करते हैं। हिन्दुत्व के गौरव की याद दिलाने वाले लोगों को साम्प्रदायिक कहा जाता है। स्वगौरव की स्मृति बिना शक्ति का संचार नहीं हो सकता। हनुमानजी को स्वगौरव याद दिलाने पर वे पर्वताकार हो गए थे।
श्री भागवत ने समाज का आह्वान करते हुए कहा कि वे हिन्दू चिंतन के आधार पर स्वार्थमुक्त, भेदभावमुक्त समाज के निर्माण में संघ के साथ जुड़ें। संघ अपना नाम नहीं चाहता। हमारा भाव है- 'तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें'। देश के भाग्योदय के लिए सबको साथ लेकर हम चलना चाहते हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जैनमुनि पुलक सागर महाराज ने कहा कि अनुशासन तथा देशभक्ति की सीख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ली जा सकती है। संघ के स्वयंसेवकों का जीवन किसी संत से कम नहीं है। उनका गणवेश संतों के वस्त्रों जैसा पवित्र है। उन्होंने कहा कि हिन्दू समाज की एकता मजबूत करने की आवश्यकता है। फटे नोट और टूटे देश-समाज की कोई कीमत नहीं होती। एकता द्वारा ही मतांतरण करने वालों को जवाब दिया जा सकता है। उन्होंने गीता को संसार के हर मत-पंथ की नींव बताया। इस अवसर पर स्वयंसेवकों ने विभिन्न प्रकार के शारीरिक कार्यक्रमों का प्रदर्शन भी किया। साथ ही मेरठ से प्रकाशित 'राष्ट्रदेव' पत्रिका के 'स्वामी विवेकानंद सार्द्धशती विशेषांक' का लोकार्पण भी श्री भागवत एवं मुनि पुलक सागर महाराज ने संयुक्त रूप से किया। वर्ग के समापन समारोह में मेरठ के हजारों लोग उपस्थित थे।
वर्ग में स्वामी विवेकानंद, विश्व में भारतीयों की उपलब्धियों, हिन्दू स्वयंसेवक संघ के कार्यों तथा रा.स्व.संघ व विविध संगठनों की गतिविधियों पर लगाई गई भव्य प्रदर्शनी को हजारों लोगों ने देखा

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