रविवार, 31 मार्च 2013

राजनाथ सिंह की नई टीम



नई दिल्ली। राजनाथ सिंह की नई टीम का ऐलान हो गया है,
बीजेपी की नई टीम इस प्रकार है....

संसदीय बोर्ड: राजनाथ सिंह, अटल बिहार वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, वेंकैया नायडू, नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, रामलाल, अनंत कुमार, थावर चंद गहलोत और नरेंद्र मोदी।

महासचिव: रामलाल (संगठन), अनंत कुमार, थावर चंद गहलोत, जेपी नड्डा, तापिर गाव, धर्मेंद्र प्रधान, अमित शाह, राजीव प्रताप रूडी, वरुण गांधी और मुरलीधर राव।

उपाध्यक्ष: सदानंद गौड़ा, मुख्तार अब्बास नकवी, डॉ. सीपी ठाकुर, जुएल उरांव, एस. एस. अहलूवालिया, बलबीर पुंज, सतपाल मलिक, प्रभात झा, उमा भारती, बिजॉय चक्रवर्ती, लक्ष्मीकांत चावला, किरण माहेश्वरी, स्मृति ईरानी।

सचिव: श्याम जाजू, भूपेंद्र यादव, कृष्णा दास, अनिल जैन, विनोद पांडेय, त्रिवेंद्र रावत, रामेश्वर चौरसिया, आरती मेहरा, रेणु कुशवाहा, सुधा यादव, सुधा मलैया, पूनम महाजन, लुईस मरांडी, डॉ तमिल एसाई, वाणी त्रिपाठी।

मोर्चाओं के अध्यक्ष: महिला मोर्चा: सरोज पांडेय, युवा मोर्चा: अनुराग ठाकुर, एससी मोर्चा: संजय पासवान, एसटी मोर्चा: फग्गन सिंह कुलस्ते, अल्पसंख्यक मोर्चा: अब्दिल राशिद, किसान मोर्चा: ओम प्रकाश धनाकर।

प्रवक्ता: प्रकाश जावड़ेकर, निर्मला सीतारमण, विजय शंकर शास्त्री, सुधांशु त्रिवेदी, मिनाक्षी लेखी, कैप्टन अभिमन्यु।

केंद्रीय चुनाव समिति: राजनाथ सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, वेंकैया नायडू, नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नरेंद्र मोदी, अनंत कुमार, थावर चंद गहलोत, रामलाल, गोपीनाथ मुंडे, जुएल उरांव, शाहनवाज हुसैन, विनय कटियार, जेपी नड्डा, डॉ. हर्षवर्धन, सरोज पांडेय।



बुधवार, 27 मार्च 2013

India celebrates Holi

 Nation celebrates Holi, President, PM greet people







 



Nation celebrates Holi, President, PM greet people
New Delhi: The nation on Wednesday celebrated Holi with people greeting each other with colours and sweets.

President Pranab Mukherjee, Prime Minister Manmohan Singh and UPA Chairperson Sonia Gandhi greeted people on Holi and expressed hope that the festival of colours will strengthen faith in national values and promote oneness and harmony.

"On the joyous occasion of Holi, I convey my greetings and good wishes to all my fellow countrymen. This festival which marks the advent of spring, is a harbinger of joy, hope and fulfilment for all," the President said in his greetings.

"The myriad colours of Holi are a reflection of our diversity and multi-cultural heritage. May this festival of colours strengthen faith in our cherished national values and promote oneness, harmony and the good of all," he said in a Rashtrapati Bhawan statement.

होली हिन्दुओँ का वैदिक कालीन पर्व


 Friday, March 22, 2013

holi mahotsav par vishesh
होली महोत्सव ,होली विषय पर जानकारी परक लेख

होली का त्यौहार है ,प्यार और मनुहार का,
रंगों का साथ है ,अबीर और गुलाल का ।

होली हिन्दुओँ  का वैदिक कालीन पर्व है । इसका प्रारंभ कब हुआ , इसका कहीं
उल्लेख  या कोई आधार नहीं मिलता है । परन्तु वेदों एवं पुराणों  में भी इस
त्यौहार के प्रचलित होने का उल्लेख मिलता है । प्राचीन काल में होली की अग्नि
में हवन  के समय वेद मंत्र  " रक्षोहणं बल्गहणम " के  उच्चारण का वर्णन आता है

होली पर्व को भारतीय तिथि पत्रक के अनुसार वर्ष का अन्तिम  त्यौहार कहा जाता
है । यह पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को संपन्न होने वाला सबसे बड़ा त्यौहार
है ।  इस अवसर पर बड़े -बूढ़े ,युवा -बच्चे, स्त्री-पुरुष सबमे ही जो उल्लास व
उत्साह होता है, वह वर्ष भर में होने वाले किसी भी उत्सव में दिखाई नहीं देता
है ।  कहा जाता है कि  प्राचीन काल में इसी फाल्गुन पूर्णिमा से प्रथम
चातुर्मास सम्बन्धी "वैश्वदेव " नामक यज्ञ का प्रारंभ होता था, जिसमे लोग
खेतों में तैयार हुई नई  आषाढी फसल के अन्न -गेहूं,चना आदि की आहुति देते थे
और स्वयं यज्ञ शेष प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे ।  आज भी नई  फसल को डंडों
पर बांधकर होलिका दाह के समय भूनकर प्रसाद के रूप में खाने की परम्परा
"वैश्वदेव यज्ञ " की स्मृति को सजीव रखने का ही प्रयास है । संस्कृत में भुने
हुए अन्न को होलका कहा जाता है । संभवत : इसी के नाम पर होलिकोत्सव का प्रारंभ
वैदिक काल के पूर्व से ही किया जाता है ।
यज्ञ के अंत में यज्ञ भष्म को मस्तक पर धारण कर उसकी वन्दना की जाती थी , शायद
उसका ही विकृत रूप होली की राख को लोगों पर उड़ाने का भी जान  पड़ता है ।
समय के साथ साथ अनेक ऐतिहासिक स्मृतियां भी इस पर्व के साथ जुड़ती गई :-
नारद पुराण के अनुसार ---परम भक्त प्रहलाद की विजय और हिरन्यक्शिपु  की बहन "
होलिका " के विनाश का स्मृति दिवस है । कहा जाता है कि होलिका को अग्नि में
नहीं जलने का आशीर्वाद प्राप्त था । हिरन्यक्शिपु व होलिका राक्षक कुल के बहुत
अत्याचारी थे । उनके घर में पैदा प्रहलाद भगवान् भक्त था , उसको ख़त्म करने के
लिए ही होलिका उसे गोद में लेकर अग्नि में बैठी थी मगर प्रभु की कृपा से
प्रहलाद बच  गया और होलिका उस अग्नि में ही दहन हो गई । शायद इसीलिए इस पर्व
को होलिका दहन भी कहते हैं ।
भविष्य पुराण के अनुसार कहा जाता है कि महाराजा रघु के राज्यकाल में " ढुन्दा
"नामक राक्षसी के उपदर्वों  से निपटने के लिए महर्षि वशिष्ठ के आदेशानुसार
बालकों को लकड़ी की तलवार-ढाल आदि लेकर हो-हल्ला मचाते हुए स्थान स्थान पर
अग्नि प्रज्वलन का आयोजन किया गया था । शायद वर्तमान में भी बच्चों का
हो-हल्ला उसी का प्रतिरूप है ।
होली को बसंत सखा "कामदेव" की पूजा के दिन के रूप में भी वर्णित किया गया है ।
"धर्माविरुधोभूतेषु कामोअस्मि भरतर्षभ " के अनुसार धर्म संयत काम संसार में
ईश्वर की ही विभूति माना गया है । आज के दिन कामदेव की पूजा किसी समय सम्पूर्ण
भारत में की जाती थी । दक्षिण में आज भी होली का उत्सव " मदन महोत्सव  " के
नाम से ही जाना जाता है ।
वैष्णव  लोगों के किये यह " दोलोत्सव" का दिन है । ब्रह्मपुराण के अनुसार --
नरो दोलागतं दृष्टा गोविंदं पुरुषोत्तमं ।
फाल्गुन्यां संयतो भूत्वा गोविन्दस्य पुरं ब्रजेत ।।
इस दिन झूले में झुलते हुए गोविन्द भगवान  के दर्शन से मनुष्य बैकुंठ को
प्राप्त होता है । वैष्णव मंदिरों में भगवान् श्री मद नारायण का आलौकिक
श्रृंगार करके नाचते गाते उनकी पालकी निकाली जाती है ।
कुछ पंचांगों के अनुसार संवत्सर का प्रारंभ कृषण पक्ष के प्रारंभ से और कुछ के
अनुसार शुक्ल  प्रतिपदा से माना जाता है । पूर्वी उत्तर प्रदेश में पूर्णिमा
पर मासांत माना जाता है जिसके कारण फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को वर्ष का अंत हो
जाता है और अगले दिन चैत्र कृषण  प्रतिपदा से नव वर्ष आरम्भ हो जाता है ।
इसीलिए वहां पर लोग होली पर्व को संवत जलाना भी कहते हैं । क्योंकि यह वर्षांत
पूर्णिमा है अत: आज के दिन सब लोग हंस गाकर रंग-अबीर से खेलकर नए वर्ष का
स्वागत करते हैं ।
इतिहास में होली का वर्णन ---
वैदिक कालीन होली की परम्परा का उल्लेख अनेक जगह मिलता है । जैमिनी मीमांशा
दर्शनकार ने अपने ग्रन्थ में " होलिकाधिकरण" नामक प्रकरण लिखकर होली की
प्राचीनता को चिन्हित किया है ।
विन्ध्य प्रदेश के रामगढ़ नामक स्थान से 300 ईशा पूर्व का एक शिलालेख बरामद हुआ
है जिसमे पूर्णिमा को मनाये जाने वाले इस उत्सव का उल्लेख है ।
वात्सायन महर्षि ने अपने कामसूत्र में " होलाक" नाम से इस उत्सव का उल्लेख
किया है । इसके अनुसार उस समय परस्पर किंशुक यानी ढाक के पुष्पों के रंग से
तथा चन्दन-केसर आदि से खेलने की परम्परा थी ।
सातवी सदी में विरचित "रत्नावली" नाटिका में महाराजा हर्ष ने होली का वर्णन
किया है ।
ग्यारहवीं शताब्दी में मुस्लिम पर्यटक "अलबरूनी" ने भारत में होली के उत्सव का
वर्णन किया है । तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारों के वर्णन से पता चलता है कि  उस
समय हिन्दू और मुसलमान मिलकर होली मनाया करते थे ।
सम्राट अकबर और जहांगीर के समय में शाही परिवार में भी इसे बड़े समारोह के रूप
में मनाये जाने के उल्लेख हैं ।

विश्व व्यापी पर्व है होली ---

होलिकोत्सव विश्व व्यापी पर्व है । भारतीय व्यापारियों के कालांतर में विदेशों
में बस जाने के बावजूद उनकी स्मृतियों में यह त्यौहार रचा बसा है और समय के
साथ साथ यह पर्व उन देशों की आत्मा से मिलजुल कर , मगर मौलिक भावना संजोते हुए
विभिन्न रूपों में आज भी प्रचलित है ।
इटली में यह उत्सव फरवरी माह में "रेडिका " के नाम से मनाया जाता है ।शाम के
समय लोग भांति -भांति  के स्वांग  बनाकर "कार्निवल" की मूर्ति के साथ रथ पर
बैठकर विशिष्ट सरकारी अधिकारी की कोठी पर पहुंचते हैं । फिर गाने-बजाने के साथ
यह जुलुस नगर के मुख्य चौक पर आता है । वहां पर सूखी  लकड़ियों में इस रथ को
रखकर आग लगा दी जाती है । इस अवसर पर लोग खूब नाचते-गाते हैं और हो-हल्ला
मचाते हैं ।

फ़्रांस के नार्मन्दी  नामक स्थान में घास से बनी मूर्ति को शहर में गाली देते
हुए घुमाकर,  लाकर आग लगा देते हैं । बालक कोलाहल मचाते हुए प्रदक्षिणा  करते
हैं ।

जर्मनी में ईस्टर  के समय पेड़ों को काटकर गाड दिया जाता है। उनके चारों तरफ
घास-फूस इकट्ठा करके आग लगा दी जाती है । इस समय बच्चे एक दुसरे के मुख पर
विविध रंग लगाते हैं तथा लोगों के कपड़ों पर ठप्पे लगा कर मनोविनोद करते हैं ।

स्वीडन नार्वे में भी शाम के समय किसी प्रमुख स्थान पर अग्नि जलाकर लोग नाचते
गाते और उसकी प्रदक्षिणा करते हैं । उनका विश्वास है की इस अग्नि परिभ्रमण से
उनके स्वास्थ्य की अभिवृद्धि होती है ।

साइबेरिया  में बच्चे घर-घर जाकर लकड़ी इकट्ठा करते हैं । शाम को उनमे आग लगाकर
स्त्री -पुरुष हाथ पकड़कर तीन बार अग्नि परिक्रमा कर उसको लांघते हैं ।

अमेरिका में होली का त्यौहार " हेलोईन " के नाम  से 31 अक्टूबर को मनाया जाता
हैं ।" अमेरिकन रिपोर्टर"  ने अपने 12 मार्च 1954 के अंक में लिखा :- हैलोइन
का त्यौहार अनेक दृष्टि  से भारत के होली त्यौहार से मिलता-जुलता है । जब
पुरानी दुनिया के लोग अमेरिका पहुंचे थे तो अपने साथ हैलोइन का त्यौहार भी
लाये थे । इस अवसर पर शाम के समय विभिन्न स्वांग रचकर नाचने-कूदने व खेलने की
परम्परा है ।

होली पर्व का वैज्ञानिक आधार :----------

भारत ऋषि मुनियों का देश है । ऋषि-मुनि यानी उस समय के वैज्ञानिक जिनका सार
चिंतन- दर्शन विज्ञान की कसौटी पर खरा-,परखा,  प्रकृति के साथ सामंजस्य
स्थापित करता रहा है ।  पश्चिम के लोग भारत को भूत-प्रेत व सपेरों का देश कहते
हैं ,मगर वह भूल जाते हैं कि विश्व में भारत ही एक मात्र देश है जिसके सारे
त्यौहार, पर्व ,पूजा पाठ, चिंतन-दर्शन सब विज्ञान की कसौटी पर खरा- परखा है ।
हमारे ऋषि-मुनियों ने विज्ञान व धर्म का ताना-बाना बुना और ताने-बाने से
निर्मित इस चदरिया को त्योहारों व पर्वों के नाम से समाज के अंग-अंग में
प्रचलित किया ।

भारत में मनाया जाने वाला होली पर्व भी विज्ञान पर आधारित है । इसकी प्रत्येक
क्रिया प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानव स्वास्थ्य और शक्ति को प्रभावित
कराती है । एक रात में ही संपन्न होने वाला होलिका दहन ,जाड़े और गर्मी की
ऋतू संधि में फूट पड़ने वाली चेचक,मलेरिया,खसरा तथा अन्य संक्रामक रोग कीटाणुओं
 के विरुद्ध सामूहिक अभियान है । स्थान -स्थान पर प्रदीप्त अग्नि आवश्यकता से
अधिक ताप द्वारा समस्त वायुमंडल को उष्ण बनाकर सर्दी में सूर्य की समुचित
उष्णता के अभाव से उत्पन्न रोग कीटाणुओं  का संहार कर देती है । होलिका
प्रदक्षिणा  के दौरान 140 डिग्री फारनहाईट तक का ताप शरीर में समाविष्ट होने
से मानव के शरीरस्थ समस्त रोगात्मक जीवाणुवों को भी नष्ट कर देता है ।

होली के अवसर पर होने वाले नाच-गान ,खेल-कूद ,हल्ला-गुल्ला ,विविध स्वांग,
हंसी -मजाक भी वैज्ञानिक दृष्टि से लाभप्रद हैं । शास्त्रानुसार बसंत में रक्त
में आने वाला द्रव आलस्य कारक होता है । बसंत ऋतु में निंद्रा की अधिकता भी
इसी कारण होती है । यह खेल-तमाशे इसी आलस्य को भगाने में सक्षम होते हैं ।

महर्षि सुश्रुत ने बसंत को कफ पोषक ऋतु  माना है ।

कफश्चितो हि शिशिरे बसन्तेअकार्शु तापित: ।
हत्वाग्निं कुरुते रोगानातस्तं त्वरया जयेतु ।।

अर्थात शिशिर ऋतू में इकट्ठा हुआ कफ ,बसंत में पिघलकर कुपित होकर जुकाम,
खांसी,श्वास , दमा आदि रोगों की सृष्टि करता है और इसके उपाय के लिए ---

 तिक्ष्नैर्वमननस्याधैर्लघुरुक्
षैश्च भोजनै:।
व्यायामोद्वर्तघातैर्जित्वा श्लेष्मान मुल्बनं ।।

अर्थात तीक्षण वमन,लघु रुक्ष भोजन,व्यायाम,उद्वर्तन और आघात आदि काफ को शांत
करते हैं । ऊँचे स्वर में बोलना, नाचना, कूदना, दौड़ना-भागना सभी व्यायामिक
क्रियाएं हैं जिससे कफ कोप शांत हो जाता है ।

होली रंगों का त्यौहार है । रंगों का हमारे शारीर और स्वास्थ्य पर अद्भुत
प्रभाव पड़ता है । प्लाश  अर्थात ढाक के फूल यानी टेसुओं का आयुर्वेद में बहुत
ही महत्व पूर्ण स्थान है । इन्ही टेसू के फूलों का रंग मूलत: होली में प्रयोग
किया जाता है । टेसू के फूलों से रंगा कपड़ा शारीर पर डालने से हमारे रोम कूपों
द्वारा स्नायु  मंडल पर प्रभाव पड़ता  है । और यह संक्रामक बीमारियों से शरीर
को बचाता है ।

यज्ञ मधुसुदन में कहा गया है ----

एतत्पुष्प कफं पितं कुष्ठं दाहं तृषामपि ।
वातं स्वेदं रक्तदोषं मूत्रकृच्छं च नाशयेत ।।

अर्थात ढाक के फूल कुष्ठ ,दाह ,वायु रोग तथा मूत्र कृच्छादी रोगों की महा औषधी
है ।

दोपहर तक होली खेलने के पश्चात स्नानादि से निवृत होकर नए वस्त्र धारण कर होली
मिलन का भी विशेष महत्त्व है । इस अवसर पर अमीर -गरीब, छोटे-बड़े, उंच-नीच , का
कोई भेद नहीं माना जाता है यानी सामजिक समरसता का प्रतीक बन जाता  है होली का
यह त्यौहार ।

शरद और ग्रीष्म ऋतू के संधिकाल पर आयोजित होली पर्व का आध्यात्मिक व वैज्ञानिक
आधार है । जैसा की ऊपर वर्णित किया गया है कि हमारे सभी पर्व -त्यौहार विज्ञान
की कसौटी पर खरे-परखे है । बस आवश्यकता है उसकी मूल भावना को समझने की ।
 वर्तमान समय में होली पर्व भी बाजारवाद की भेंट चढ़ता जा रहा है । विभिन्न
रासायनिक रंगों के प्रयोग ने लाभ के स्थान पर स्वास्थ्य  पर हानिकारक प्रभाव
डालने का प्रयास किया है । कुछ व्यक्तियों द्वारा होली के हुडदंग में शराब या
अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करके वातावरण खराब करने का प्रयास किया जाता है ।
जो पर्व आपसी भाई-चारे एवं वर्ष भर के मतभेदों को भुलाकर एक होने का है ,उस पर
किसी प्रकार की रंजिश पैदा करना होली की भावना के विपरीत है ।

गुलाल में कुछ रंग इंसानियत के मिलाएं ,
उसे समाज के बदनुमा चहरे पर लगाएं ,
हर गैर में भी "कीर्ति" अपनापन  नजर आयेगा
होली फिर से राष्ट्र प्रेम का त्यौहार बन जाएगा ।

और अंत में  -होली के इस पवित्र अवसर पर अपने सभी देश वासियों के लिए एक
विनम्र सन्देश :----

खून की होली मत खेलो , प्यार के रंग में रंग जाओ ,
जात-पात के रंग ना घोलो , मानवता में रंग जाओ ।

भूख -गरीबी का दहन करो , भाई-चारे में रंग जाओ,
अहंकार की होली जलाकर , विनम्रता में रंग जाओ ।

ऊँच-नीच का भेद ख़त्म कर, आज गले से मिल जाओ ,
होली पर्व का यही सन्देश, देश प्रेम में "कीर्ति" रंग जाओ ।


इस आलेख की सामग्री श्री पंडित माधवाचार्य शास्त्री जी की पुस्तक " क्यों " से
ली गई है , हम उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं ।

डॉ अ कीर्तिवर्धन --
"विद्या लक्ष्मी निकेतन "
53-महालक्ष्मी एन्क्लेव ,जानसठ रोड,
मुज़फ्फरनगर -251001 (उत्तर प्रदेश
----------



मंगलवार, 26 मार्च 2013

Hindu Festival : Holika Dahan



BY - Neena Sharma 



Holika Dahan, Kathamandu, Nepal--Holika-26-03-2013

Holika (Sanskrit: होलिका) was a good demoness in Hindu scripture who was burnt to death with help of God Brahma by Prahlad. She was the sister of King Hiranyakashipu.

The story of Holika's conflict signifies the triumph of good over evil, and death of Holika is celebrated as Holi.
Mythology

According to Hindu scripture, there was a king named Hiranyakashipu whose desire was to be seen as a great man. To fulfill his desire he did the required Tapas (penance) and was granted a boon by Brahma.

Once Brahma was pleased by devotion of Hiranyakashyapu, he granted the king wishes that the king will not be killed by human being or an animal, he will not die either in his home or outside the home, he will not die in the day or at night, he will not die either by astra or shastra, and that he will not die either on land or in the sea or in the air. As this wish was granted, it was completely impossible to kill Hiranyakashyapu by any means and this made him invincible. Hiranyakashyapu ordered people in his kingdom to worship him as a God. Everyone obeyed with the exception of his son Prahlad. Prahlad refused to see his father as a god and stayed devoted to Vishnu.

This made Hiranyakashipu very angry and he made various attempts to kill Prahlad. During a particular attempt on Prahlad's life, King Hiranyakashyapu called upon his sister Holika for help. Holika had a special gift that prevented her from being harmed by fire. Hiranyakashyapu asked her to sit on a bonfire with Prahlad on her lap in the hope that this would kill Prahlad. However, both the brother and sister had forgot that Holika could only enter the fire alone or she would perish. As Prahlad chanted Vishnu's name, Holika was burnt to her death and Prahlad was spared.
Origin of Holika Dahan

For many traditions in Hinduism, Holi celebrates the death of Holika in order to save Prahlad and we see where Holi gets its name. The night before Holi pyres are burnt in North India in keeping with this tradition. It should also be noted that in some parts of India the day is actually called Holika[citation needed]. There are other activities associated with the story of Prahlad, but the burning of Holika is the one that we can most directly associate with Holi. Fire burnt on the eve of Holi (Holika Dahan) symbolizes the burning of Holika. The story as a whole is testament to the power of devotion (bhakta) over the evil represented by King Hiranyakashyapu, as Prahlad never lost his faith.

The burning of Holika is the most common mythological explanation for the celebration of Holi. In different parts of India varying reasons are given for Holika's death. Among those are:

Vishnu stepped in and hence Holika burnt.
Holika was given the power by Brahma on the understanding that it can never be used to bring harm to anyone,
Holika was a good person and it was the clothes that she wore that gave her the power and knowing that what was happening was wrong, she gave them to Prahlad and hence died herself.
Holika wore a shawl that would protect her from fire. So when she was asked to sit in the fire with Prahlad she put on the shawl and sat Prahlad down in her lap. When the fire was lit Prahlad began praying to Lord Vishnu. So Lord Vishnu summoned a gust of wind to blow the shawl off of Holika and on to Prahlad, saving him from the flames of the bonfire and burning Holika to her death.
--------------

Holika dahan ---in dutch --Holika Dahan Datum: dinsdag 26 march 2013---15 Sukla Phalguna, de laatste dag van de hindoekalender. De avond voor Holi, de laatste dag van de maand Phalguna. Op deze dag verbrandt men de tevoren geplante Holika, welke het kwade symboliseert. Laatste dag van het Hindoe-maanjaar bij de Poernimanta-rekening.Het feest herinnert aan Holika, zuster van de hardvochtige koning Harnaakoes. Koning Harnaakoes liet zich als god vereren. Zijn zoon Prahlaad weigerde daaraan mee te doen, hij vertikte het een mens te aanbidden. De koning probeerde vergeefs zijn zoon te overreden. Prahlaad volhardde in het aanbidden van de ware god, zong liederen ter ere van deze god en maande ook andere kinderen dit te doen. De koning beschouwde dit als ondermijning van zijn gezag en besloot zijn zoon te doden Hij liet hem met stenen verzwaard in zee gooien, maar Prahlaad bleef wonderwel drijven.

Het lukte ook niet om hem met wapens te doden. En nadat hij levend was begraven, bleek hij na enige weken nog springlevend te zijn. Daarna nam de zuster van Harnaakoes, Holika, met de prins plaats op een brandstapel, in de mening dat vuur geen vat op haar had. Nadat het vuur de hele nacht had gebrand, bleek de vrome Prahlaad gespaard te zijn en Holika verbrand.

Tijdens de Holika-ceremonie loopt iedereen rond het vuur onder het roepen van verwensingen aan het kwaad. Ook werpt men rijstkorrels, aarde en stenen in het vuur om alle slechte gedachten en gewoonten te verbranden.
verhaleverhale
De heks Holika
Een hindoeïstische legende over Holika
Er was eens een asceet, Harnakas genaamd. Hij woonde in een hutje in het bos en deed de hele dag niets anders dan bidden en mediteren. Hij was een volgeling van de god Shiva. Op een keer zat hij zo diep en lang in meditatie verzonken, dat hij niet merkte dat een mierenkolonie een nest om hem heen begon te bouwen. Op het laatst was er niets meer van Harnakas te zien, enkel nog een mierenhoop. Shiva was zeer onder de indruk van zo'n toewijding. Hij ging naar de mierenhoop toe en goot er een kan water over leeg. Harnakas ontwaakte uit zijn meditatie, stond op, schudde de aarde en de mieren van zich af en maakte een diepe buiging.

"Het is goed zo," sprak Shiva. "Nog nooit heb ik zo'n intense toewijding gezien en als dank mag je twee wensen doen." Harnakas antwoordde: "Als dat zo is dan wens ik het volgende. Ik wil de machtigste heerser van de aarde zijn die als een god door iedereen aanbeden wordt en ik wil dat geen god, mens of dier mij ooit zal kunnen doden."

En zo geschiedde het, alle mensen moesten hem in het vervolg vereren en als ze weigerden, werden ze meteen doodgemaakt. Zijn vurigste aanbidder was zijn eigen zus, de heks Holika, maar zijn zoon Prahlaad moest niets van de waanzin van zijn vader hebben. Hij vereerde de god Vishnu en bleef dat doen ondanks de dreigementen van zijn vader en zijn tante.

Harnakas woonde nu in een groot paleis. Het wemelde er van de lijfwachten en bedienden, hij hoefde maar een kik te geven en ze stonden al klaar om zijn bevelen op te volgen. Toch bleef Prahlaad hardnekkig weigeren hem meer eerbied te tonen dan het gebruikelijke respect dat een zoon voor zijn vader dient te hebben. Het was Harnakas een doorn in het oog en op een dag had hij er schoon genoeg van. Hij gaf zijn lijfwachten bevel zijn zoon te gaan halen. Toen deze aan hem werd voorgeleid sprak hij: "Ik ben nu de absolute heerser op aarde, nog machtiger dan de machtigste koning. Iedereen vereert mij, iedereen behalve jij. Spreek op, wat is hier de reden van?"

Prahlaad antwoordde: "Al die mensen die u verafgoden doen dat alleen omdat ze bang zijn en de enige beloning voor hun devotie is angst. De god die ik aanbid schenkt vertrouwen, hij is de weg die tot het ware geluk leidt." Harnakas was woedend. "Jij schelm," schreeuwde hij, "hier zul je voor boeten." En hij gilde naar zijn lijfwachten: "Hak die vlegel aan stukken." Met hun scherpe zwaarden begonnen ze op de jongen in te slaan, maar steeds als zij hem een snee hadden toegebracht, trok de wond weer dicht en was het alsof er niets gebeurd was.

Toen Harnakas zag dat zijn poging om hem met het zwaard te doden vergeefs was, liet hij zijn zoon vastbinden en in een kuil vol giftige slangen gooien. Maar elke keer als een van de slangen beet, braken zijn tanden af. Nu werd Prahlaad naar de hoogste toren van het paleis gesleept. Van het hoogste topje smeet men hem naar beneden en met een smak viel hij op de grond. Ongedeerd stond hij echter weer op. Harnakas was uitzinnig van woede en riep zijn zuster Holika. "Ik zal een groot vuur maken. Jij moet daar in gaan zitten met Prahlaad op je schoot. Door jouw toverkracht zullen de vlammen je niet deren en zal alleen hij verbranden." Zijn dienaren bouwden een grote brandstapel waarop Holika met Prahlaad op schoot plaatsnam. Ze staken de brandstapel aan en in een mum van tijd stond hij in lichterlaaie. Na enige tijd namen de vlammen af en begon het vuur te doven. Maar wie zat daar vredig op de gloeiende kolen: Prahlaad! Van Holika was niet veel meer overgebleven dan een hoopje as.

Opeens klonk er een luid gebrul. Uit een van de pilaren van het paleis was een gestalte gesprongen die voor de helft mens was, voor de helft leeuw. Het was de god Vishnu zelf die deze gedaante had aangenomen, omdat hij zo noch de vorm had van een god, noch die van een mens, noch die van een dier en daarom Harnakas kon doden. Met een krachtige mep sloeg hij Harnakas tegen de grond, waar zijn lichaam ontzield bleef liggen.

* * * EINDE * * *

सोमवार, 25 मार्च 2013

होली और होली गीत






फाग के भीर अभीरन में गहि गोविन्दै लै गई भीतर गोरी।
भाई करी मन की 'पद्माकर' ऊपर नाई अबीर की झोरी।
छीन पिताम्बर कम्मर ते सु बिदा दई मीड़ कपालन रोरी।
नैन नचाइ, कही मुसकाइ लला फिरी अइयो खेलन होरी।
---------------------

होली

होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से 5 दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुरड्डी, धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।
राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। किसानों का ह्रदय ख़ुशी से नाच उठता है। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों
------------------
नई दिल्ली। रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे, होली रे। इस तरह के गाने हर साल आपको होली के दिन सुनने को मिल जाते होंगे। बिना नाचे गाने के यह रंगों को त्योहार अधूरा सा होता है। बॉलीवुड फिल्मों में तमाम ऐसे होली के गाने है जो इस रंगों के फेस्टिवल में चार चांद लगा देते हैं। होली के यह गाने आपको झूमने पर मजबूर कर देते हैं।

अमिताभ बच्चन और रेखा पर फिल्माया गाना 'रंग बरसे' का आज तक होली के मौके पर छेड़छाड़ और मस्ती का माहौल बनाने में इस गाने का कोई तोड़ नहीं है। इतना ही नहीं मदर इंडिया का सुपरहिट गीत 'होली आई रे कन्हाई'। इस मधुर गीत का जादू आज भी बरकरार है। फिल्म कटी पतंग का गाना 'आज ना छोडेंगे' होली पर खूब मशहूर हुआ है। इसमें राजेश खन्ना खूब होली के रंग में रंगते नजर आए हैं।

फिल्म बागबां में 'होली खेले रघुवीरा' गाने में हेमा मालिनी संग अमिताभ रंगों से खूब होली खेलते नजर आएं हैं, दोनों को इस गाने में मस्ती कर देख ऐसा लगता है कि मानो इस त्योहार में हर दिल को जवान रखने की क्षमता है। बस अब आप लोग भी अभी से होली के गाने डाउनलोड कर तैयार रहिए नाचने के लिए।

दीपक श्रीवास्तव » भोजपुरी होली गीत
भोजपुरी होली गीत


फगुवा में भंगवा के ले ल चुसकी।
बुढवा सटक गईल, अब पटकी।।

मस्ती के तरंग बा, तरंग में उमंग बा,
लागता के सबकर एक्के गो ढंग बा।
ऐ चाचा, ऐ बाबा, कहाँ गईलू हो भौजी
केहुवो चिन्हाते नईखे, मुंहवा पे रंग बा।
उज्ज़र कपड़वा त अब खटकी।
बुढवा सटक गईल, अब पटकी।।1।।

भर पिचकारी रंग घोर मारे ससुरा,
भौजी त मगन रंग जोर मारे भसुरा।
पकड़ हो, छोड़ हो, भाग हो, दौर हो
दूबे पाणे भाग भइलें, फंस गईलें मिसरा।
गोझिया मिठईया सब केहू गटकी।
बुढवा सटक गईल, अब पटकी।।2।।

प्रेम ठिठोलिया के होली त्योहार बा,
लागता के आज त अलगे संसार बा।
लाल बाटे, पीला बाटे, हरा औरी नीला बाटे
इन्हीं में घोर द हो मन में जो रार बा।
रंगवा भरल भर-भर मटकी।
बुढवा सटक गईल, अब पटकी।।3।।
--------------
कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा का होली गीत
होली गीत

बिना रंग लगाये मैं हो गया लाल
तेरी आंखों का है ये कमाल गोरी
फागुन मदमस्‍त हुआ, आया मधुमास रे
मन की अगन से ही, खिलता पलाश रे
भौंरों ने बदली है चाल गोरी...
तेरी आंखों का है ये कमाल गोरी
मौसम मधुशाला है, महुआ गिलास में
फूलों की खुशबू है, उजले लिबास में
होठों की लाली सम्‍भाल गोरी...
तेरी आंखों का है ये कमाल गोरी
तू मेरी मीरा है, तू ही तो राधा
जीवन भर मैंने तो, तुमको ही साधा
मैं ही हूँ तेरा नंदलाल गोरी...
तेरी आंखों का है ये कमाल गोरी
-----------------
रचनाकार: रमा द्विवेदी

आयी है रंगो की बहार
गोरी होली खेलन चली
ललिता भी खेले विशाखा भी खेले
संग में खेले नंदलाल...
गोरी होली खेलन चली ।
लाल गुलाल वे मल मल लगावें
होवत होवें लाल लाल...
गोरी होली खेलन चली
रूठी राधिका को श्याम मनावें
प्रेम में हुए हैं निहाल...
गोरी होली खेलन चली
सब रंगों में प्रेम रंग सांचा
लागत जियरा मारै उछाल...
गोरी होली खेलन चली
होली खेलत वे ऐसे मगन भयीं
मनुंआ में रहा न मलाल...
गोरी होली खेलन
तन भी भीग गयो मन भी भीग गयो
भीगा है सोलह शृंगार...
गोरी होली खेलन चली
झ्सको सतावें उसको मनावें
कान्हा की देखो यह चाल...
गोरी होली खेलन चली
कैसे बताऊँ मैं कैसे छुपाऊँ
रंगों ने किया है जो हाल...
गोरी होली खेलन चली
आओ मिल के प्रेम बरसायें
अम्बर तक उड़े गुलाल...
गोरी होली खेलन चली ।

-----------
रचनाकार: गुलाब खंडेलवाल
मेरी आँखों में पड़ गयी गुलाल, पिया!
रेशम की सुन्दर साड़ी मसक गयी, प्रीत बनी जंजाल, पिया!

रूप निगोड़ा कहाँ लेके जाऊँ, लद गयी फूलों से डाल, पिया!
रस के भरे कचनार-सी बाँहें, गोरे गुलाब-से गाल, पिया!

मान भी कैसे करूँ अब तुमसे, आये बिताकर साल, पिया!
इतने दिनों पर याद तो आयी! हो गयी मैं तो निहाल, पिया!

एक ही रंग में भीजे हैं दोनों, एक है दोनों का हाल, पिया!
साँवरे-गोरे का भेद कहाँ अब, तन-मन लाल ही लाल, पिया!

आँखों में अंजन, माथे पे बिँदिया, हाथ अबीर का थाल, पिया!
बचके गुलाब अब जा न सकोगे, लाख चलो हमसे चाल, पिया!

मेरी आँखों में पड़ गयी गुलाल, पिया!
रेशम की सुन्दर साड़ी मसक गयी, प्रीत बनी जंजाल, पिया!
----------------------

वसंत रागिनी- कोटा शैली में रागमाला शृंखला का एक लघुचित्र

भगवान नृसिंह जयंती



हिन्दू पंचांग के अनुसार नृसिंह जयंती का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है. पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी पावन दिवस को भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में अवतार लिया था. जिस कारणवश यह दिन भगवान नृसिंह के जयंती रूप में बड़े ही धूमधाम और हर्सोल्लास के साथ मनाया जाता है. भगवान नृसिंह जयंती की व्रत कथा इस प्रकार से है
--------

नृसिंह जयंती पर लें शुभ संकल्प

( नृसिंह जयंती )
http://www.ashram.org/Publications/ArticleView/tabid/417/ArticleId/1326/.aspx
भगवान नृसिंह की कथा में तीन प्रतीक मिलते हैं। ये तीन पात्रों से जुड़े हैं – हिरण्यकशिपु अहंकार से भरी बुराई का प्रतीक है, प्रह्लाद विश्वास से भरी भक्ति का प्रतीक है और दुष्ट का वध करने वाले भगवान नृसिंह भक्त के प्रति प्रेम का प्रतीक हैं। अब सवाल यह है कि हम अपने जीवन को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं ? यदि अहंकार और बुराई की ओर ले जायेंगे तो निश्चित ही अंत बुरा है। इसलिए विश्वास से भरे भक्तिरूप प्रह्लाद को जीवन में उतारना होगा। प्रह्लाद से होते हुए आस्था व विश्वास का रास्ता भगवान तक जाता है। विकारों, आसक्तियों को जीतने की शक्ति विश्वास से हो जाती है और दुष्टता का अंत करने का बल पैदा होता है। हिरण्यकशिपु के रूप में यह दुष्टता हमारे अपने मन की है, जिसे अपने भीतर भगवान नृसिंह का आह्वान करके ही दूर किया जा सकता है। 'नृसिंह जयंती' इसी संकल्प का पर्व है।
भक्ति व प्रेम के महान आचार्य देवर्षि नारदजी ने जब सदगुरू के रूप में प्रह्लाद को दीक्षा-शिक्षा दी, तब उसके जीवन में भगवदभक्ति व प्रेम का प्राकट्य हुआ था। अतः इस दिन संकल्प लें कि हम भी किन्हीं हयात ब्रह्मज्ञानी महापुरूष को खोजकर उनसे दीक्षा-शिक्षा ग्रहण करके, उनके बताये हुए मार्ग पर चल के प्रह्लादरूपी दृढ़ भक्ति के द्वारा अपने जीवन में भगवान का अवतरण करेंगे। अहंकार व बुराईरूपी हिरण्यकशिपु का नाश कर अपने हृदय को भगवदभक्ति व संतों के ज्ञान से प्रकाशित करेंगे।
स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अप्रैल 2011, पृष्ठ संख्या 7, अंक 166
-------------
http://hindi.webdunia.com

नृसिंह जयंती व्रत कथा

प्राचीन काल में कश्यप नामक एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम दिति था। उनके दो पुत्र हुए, जिनमें से एक का नाम हरिण्याक्ष तथा दूसरे का हिरण्यकशिपु था। हिरण्याक्ष को भगवान श्री विष्णु ने वाराह रूप धरकर तब मार दिया था, जब वह पृथ्वी को पाताल लोक में ले गया था।
इस कारण हिरण्यकशिपु बहुत कुपित हुआ। उसने भाई की मृत्यु (हत्या) का प्रतिशोध लेने के लिए कठिन तपस्या करके ब्रह्माजी व शिवजी को प्रसन्न किया। ब्रह्माजी ने उसे 'अजेय' होने का वरदान दिया। यह वरदान पाकर उसकी मति मलीन हो गई और अहंकार में भरकर वह प्रजा पर अत्याचार करने लगा।
उन्हीं दिनों उसकी पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। धीरे- धीरे प्रह्लाद बड़ा होने लगा। हालाँकि उसने एक राक्षस के घर में जन्म लिया था, किंतु राक्षसों जैसे कोई भी दुर्गुण उसमें नहीं थे। वह भगवान का भक्त था तथा अपने पिता के अत्याचारों का विरोध करता था।
भगवान-भक्ति से प्रह्लाद का मन हटाने और उसमें अपने जैसे दुर्गुण भरने के लिए हिरण्यकशिपु ने बड़ी चालें चलीं, नीति-अनीति सभी का प्रयोग किया किंतु प्रह्लाद अपने मार्ग से न डिगा। अंत में उसने प्रह्लाद की हत्या करने के बहुत से षड्यंत्र रचे मगर वह सभी में असफल रहा। भगवान की कृपा से प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ।
एक बार हिरण्यकशिपु ने उसे अपनी बहन होलिका (जिसे वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी) की गोद में बैठाकर जिन्दा ही चिता में जलवाने का प्रयास किया, किंतु उसमें होलिका तो जलकर राख हो गई और प्रह्लाद जस का तस रहा। जब हिरण्यकशिपु का हर प्रयास विफल हो गया तो एक दिन क्रोध में आग-बबूला होकर उसने म्यान से तलवार खींच ली और प्रह्लाद से पूछा- 'बता, तेरा भगवान कहाँ है?' 'पिताजी!' विनम्र भाव से प्रह्लाद ने कहा- 'भगवान तो सर्वत्र हैं।' 'क्या तेरा भगवान इस स्तम्भ (खंभे) में भी है?' 'हाँ, इस खंभे में भी हैं।' यह सुनकर क्रोधांध हिरण्यकशिपु ने खंभे पर तलवार से प्रहार कर दिया। तभी खंभे को चीरकर श्री नृसिंह भगवान प्रकट हो गए और हिरण्यकशिपु को पकड़कर अपनी जाँघों पर डालकर उसकी छाती नखों से फाड़ डाली। इसके बाद प्रह्लाद के कहने पर ही भगवान श्री नृसिंह ने उसे मोक्ष प्रदान किया तथा प्रह्लाद की सेवा भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि आज के दिन जो लोग मेरा व्रत करेंगे, वे पाप से मुक्त होकर मेरे परमधाम को प्राप्त होंगे।
वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को यह व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान श्री नृसिंह ने खंभे को चीरकर भक्त प्रहलाद की रक्षार्थ अवतार लिया था। इसलिए इस दिन उनका जयंती-उत्सव मनाया जाता है। भगवान श्री नृसिंह शक्ति तथा पराक्रम के प्रमुख देवता हैं।

रविवार, 24 मार्च 2013

अपेक्षाओं पर खरा उतरने का हरसंभव प्रयास करूंगी - श्रीमती वसुंधरा राजे



किसी के दवाब में उम्मीदवार का चयन नहीं: राजे
भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष वसुंधरा राजे ने कहा है कि आगामी विधान सभा चुनाव में पार्टी उम्मीदवार का चयन किसी दबाव में नहीं किया जायेगा.
राजे ने शनिवार (२३  मार्च २ ० १ ३) को राजस्थान भाजपा कार्यसमिति की बैठक को सम्बोधित करते हुए कहा कि टिकट वितरण प्रक्रिया में मतदान केन्द्र के नीचे तक की जानकारी, कार्यकर्ताओं की राय और सर्वे के आधार पर जनाधार, निष्पक्षता, पारदर्शिता, प्रमाणिकता के मापदंड वाले व्यक्ति ही उम्मीदवार बनायेंगे. उन्होने कहा कि किसी के कहने, दबाव या किसी प्रकार के लोभ से उम्मीदवार का चयन नहीं होगा.

पूर्व मुख्यमंत्री राजे ने कहा कि मेरे या अन्य किसी नेता के नजदीक होने के आधार पर किसी को उम्मीदवारी नहीं मिलेगी. उन्होने कहा कि पार्टीजन संगठन के दिशा निर्देशों का पालन करें. उन्होने कहा कि राज्य की आर्थिक, कानून व्यवस्था बिगडी हुई है मंहगाई से आम आदमी परेशान है.भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा अरूण चतुर्वेदी ने कार्यसमिति की बैठक की जानकारी देते हुए कहा कि कार्यसमिति ने प्रदेश की आर्थिक, कानून एवं व्यवस्था की स्थिति पर प्रस्ताव पारित कर बिगडे हालात पर चिन्ता जतायी है.
--------

अपेक्षाओं पर खरा उतरने का हरसंभव प्रयास करूंगी-श्रीमती वसुंधरा राजे
by associate

जयपुर। प्रदेश भाजपा कायसमिति की बैठक में शनिवार को अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे ने जो विचार रखे, वे बिंदुवार इस प्रकार हैं-

DSC_0134
भारतीय जनता पार्टी प्रदेश कार्यसमिति में उपस्थित सभी कार्यकर्ता बंधुओं और बहनों। यह वर्ष स्वामी विवेकानन्द जी की 150वीं शताब्दी है। मैं उन्हें इस अवसर पर नमन करना चाहूंगी। यह हमारा सौभाग्य भी है कि स्वामी विवेकानन्द जी का राजस्थान से बहुत गहरा संबंध रहा। मैं आप सब की हृदय से आभारी हूं, जिनके, स्नेह, सहयोग, समर्थन और आशीर्वाद से मुझे यह दायित्व मिला। मैं पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी जी वाजपेयी, पूर्व उप प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण जी आडवाणी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह जी का भी आभार व्यक्त करती हूं, जिनके कुशल मार्गदर्शन में मुझे ये अवसर मिला है।
मैं धन्यवाद देना चाहती हूं श्री अरूण चतुर्वेदी, उनकी पूरी टीम, भाजपा के सभी विधायकों और सांसदों को, जिन्होंने मुझे अपार सहयोग दिया। मैं आदरणीय भाई साहब श्री गुलाब जी कटारिया के प्रति भी आभार प्रकट करना चाहूंगी, जो नेता प्रतिपक्ष के रूप में एक अच्छी पारी खेल रहे हैं। गुलाब जी के नेतृत्व में हमारा भाजपा विधायक दल सदन के अन्दर भी और सदन के बाहर भी, जनता की आवाज बनने में पूरी तरह से कामयाब रहा। मैं यहां आप सबको विश्वास दिलाना चाहती हूं कि, आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने का हर संभव प्रयास करूंगी। आपको मेरे हर फैसले में आपके समर्थन की मुहर दिखाई देगी।
मित्रों भारतीय जनता पार्टी एक मिशन है। पं. श्री दीनदयाल जी उपाध्याय के विचार, डॉ. श्यामा प्रसाद जी मुखर्जी के बलिदान, स्व. श्री सुन्दर सिंह जी भण्डारी के त्याग और स्व. श्री भैरोंसिंह जी शेखावत के अंत्योदय विकास के साथ एक पूरी पीढ़ी की मेहनत ने भाजपा को खड़ा किया है।
DSC_0180
राष्ट्र की एकता के लिए चाहे 1950 के दशक में भाजपा ने कश्मीर बचाने का आंदोलन किया हो, या 1960 के दशक में गौरक्षा को लेकर देश में जन-जागरण। आपातकाल से छुटकारे के लिए 1970 के दशक में हमारे नेताओं ने जेलों में कांग्रेस की यातनाएं झेली हो, या 1980 के दशक में बोफोर्स में हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष किया हो। छद्म धर्म निरपेक्षता के खिलाफ 1990 के दशक में यात्रा की हो, या वर्तमान परिस्थतियों में महिलाओं की सुरक्षा की बात। भाजपा ने ये सब ’’मिशन’’ के रूप में किया। मुझे यह कहते हुए भी गर्व है कि भाजपा ने अटल जी की एनडीए सरकार के माध्यम से वैचारिक आंदोलन की इस पार्टी को सुशासन की राजनीति की ओर बढ़ाया। इसीलिये भाजपा का नारा है कि केवल हम राज नहीं बदलेंगे, हम सुराज भी लायेंगे। राजस्थान के लिए अब वह घड़ी आ गई है – प्रदेश में सुराज लाने के लिए आप जैसी शक्तिशाली भुजाओं का साथ चाहिए। कभी न थकने वाले आपके कदमों की कदमताल चाहिए। आप जैसे निष्ठावान कार्यकर्ताओं के हौंसलों की मिसाल चाहिए। आप सबके दिलों में धड़कती हुंकार चाहिए। क्योंकि आपके साथ के बिना, हमारे संघर्षशील कार्यकर्ताओं के सहयोग के बिना और प्रदेश की जनता के आशीर्वाद के बिना ’सुशासन संकल्प, भाजपा विकल्प’ का सपना अधूरा है। हमारे सामने चुनौतियां भी कम नहीं है। क्योंकि आजादी के बाद से लेकर आज तक कांग्रेस का सत्ता पाना ही एक मात्र लक्ष्य रहा है।
इसलिये सावधान, सावचेत और सजग रहकर, हमें हमारी नीतियों और सिद्धांतों से इस चुनाव में विजय पताका फहराना है। लेकिन ध्यान रहे, सत्ता सुख के लिए नहीं, जनता सुख के लिए। राजस्थान पर शासन करने के लिए नहीं, राजस्थान को सुशासन देने के लिए। एक ऐसे नये राजस्थान का निर्माण करने के लिए, जिसमें नया दृष्टिकोण हो। नई सरकार हो, नई सोच हो और नया विकास हो।

हम प्रदेश की जनता को नये सपनों का एक ऐसा नया राजस्थान देना चाहेंगे, जिसमें युवाओं के सपनों को साकार करने का ठोस प्लान हो, महिलाओं के लिए ऊंची उड़ान हो, हमारे अन्नदाता किसान का सम्मान हो, उद्यमियों और व्यापारियों का मान हो। जनता की कल्पना का एक ऐसा नया राजस्थान हो, जहां छत्तीस की छत्तीस कोमे, सब मजहब, सब सम्प्रदाय एक साथ एकजुट होकर नये राजस्थान के निर्माण में भागीदार बने। एक ऐसा नया राजस्थान जहां के रोजगार, सड़क, चिकित्सा, शिक्षा, उद्योग और कानून व्यवस्था की देश और दुनिया में मिसाल दी जाये। ऐसा नया राजस्थान जिसमें कवि की एक ऐसी कल्पना साकार होती दिखाई दे -
भूखा सोये रात ना कोई, प्यासा जागे सुबह न कोई,
हर आंगन बगिया हो जाये, सब मिट्टी सोना उपजाये,
ऐसा हो संकल्प हमारा, राजस्थान उन्नत बन जाये।
दोस्तों, ऐसा करने के लिए हमें कुछ चुनौतियों से बाहर निकलना होगा। क्योंकि देश और प्रदेश की सरकारों के इस निराशाजनक माहौल में, आमजन के मन में भी पश्चाताप के भाव पैदा हो गये कि हमनें ऐसी नाकारा सरकारें क्यों चुनी। क्योंकि कांग्रेस का नेतृत्व जन आंकाक्षाओं को साकार करने में नाकाम रहा है। इसलिये हमें पुनः नये राजस्थान के नारे से समाज में नये संकल्प का संचार करना होगा। उनके मन में भाजपा ही विकल्प को मजबूती के साथ प्रस्तुत करना होगा। हमें भी अपने मन से आलस्य और इर्ष्या के भाव दूर करने होंगे। हम जनता के लिए त्याग की भावना रखेंगे, तभी ये जनता हमें स्वीकार करेगी। आज समाज में मूल्यों की गिरावट पर जो बहस हो रही है, कांग्रेस सरकार सही रास्ता खोजने की बजाय उसको उलझा रही है। जिस प्रकार के महिला विरोधी नये कानूनों की चर्चा इस कांग्रेस सरकार द्वारा की जा रही है। वह न समाज में संस्कारों को बढ़ा सकते है और न ही महिलाओं का इकबाल बुलंद रख सकते हैं। भाजपा ने हमेशा मांग की है कि महिलाओं के गरिमा पूर्वक जीवन के लिए सःशक्त कानून आने चाहिए। इन सबके लिए प्रदेश को भाजपा के मजबूत संगठन की आवश्कता है। एक ऐसे संगठन की, जिसमें उद्यमिता का भाव हो, जिसकी विश्वसनीयता को जनता स्वीकार कर सके। इसके लिए हमें समाज में सकारात्मक, नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक शक्तियांे को एकजुट करना होगा। सभी जाति, धर्माें और वर्गाें को पार्टी के साथ जोड़ना होगा। सकारात्मक और विकास की राजनीति पर चलना होगा। तभी हम नये राजस्थान के नारे को मूर्त रूप दे पायेंगे।
इसलिये अब आप भाजपा के संस्कारांे, भाजपा के आदर्शाें और भाजपा के विकास के व्यापक दृष्टिकोण को लेकर कूद जाईये विनाश के खिलाफ विकास की जंग में। जीत निश्चित रूप से आपकी ही होगी। जीत होगी विकास के उन पांच सालों की जिनका सुनहरा इतिहास आपकी भाजपा सरकार ने लिखा था। साढे चार साल तक तो गरीबों का खून चूसा और अब उन्हें झूठे वादों से ठग रही है ये सरकार। शर्म आनी चाहिये। आयेदिन भूख से लोग मर रहे हैं। तंगहाली से तंग आकर गरीब आत्म हत्याएं कर रहे हैं। अपने खून-पसीने से सींची फसल का वाजिब दाम नहीं मिलने से कर्ज में डूबे राजस्थान के किसान खुदकुशी कर रहे हैं। कर्मचारी भाई सरकार से दुखी होकर इच्छा मृत्यु की अनुमति मांग रहे हैं।
तमाम संघर्षाें के बाद अपनी आबरू नहीं बचा पाने की पीड़ा में महिलाएं आत्म हत्याएं कर रही है। क्या इस बजट से इन लोगों की जान वापस लौटा सकेगी ये सरकार। जवाब दें। जनता को घोषणाओं के झूठे वादे नहीं, इन मौतों का हिसाब चाहिए।
ऽ खेलने कूदने और पढ़ने की उम्र में हमारे बच्चें पड़ौसी राज्यों में कमाने खाने जा रहे हैं। क्या उनका बचपन लौटा देगी ये सरकार। जवाब चाहिये। चार लाख से ज्यादा सरकारी पद रिक्त पडे़ हैं, इसके बावजूद भर्तियां नहीं हो रही। क्या इसका जवाब है सरकार के पास? हमारे अफसर राजस्थान छोड़-छोड़कर दूसरे प्रदेशों में जा रहे हैं। क्या इसका जवाब है सरकार के पास? किस तरह से अपने चहेतों को, अपने रिश्तेदारों को पिछले दरवाजें से सरकारी नौकरियां दी जा रही है।
जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय में जिस तरह से भर्तियां की गई, क्या यही है सरकार की पारदर्शिता। जनता को जवाब चाहिए। कान खोलकर सुन ले ये सरकार, ये राजस्थान की स्वाभिमानी जनता है, जिसने घास की रोटी तक खाना मंजूर कर लिया, लेकिन अपने आत्म सम्मान से कभी समझौता नहीं किया। ये सरकार के चिकने चुपड़े लालच में आने वाली नहीं है। मित्रो, विधानसभा का पवित्र भवन ईंट, गारे और पत्थरों का ही नहीं, प्रदेश के पांच करोड़ लोगों की भावनाओं का भी मंदिर है। जहां बोले जाने वाला एक-एक शब्द पवित्र और अटल सत्य होना चाहिये। जनता के ऐसे पुनीत आस्था स्थल में भी झूठी घोषणाएं की जाये, इससे बड़ा और कोई पाप हो ही नहीं सकता। झूठे वादों की इस सरकार ने अपना आखिरी बजट विधानसभा में रखा है। अच्छा होता सरकार पिछली चार बजट घोषणाओं का लेखा-जोखा भी जनता के समक्ष रखती। ताकि प्रदेश की जनता को पता चल जाता कि पिछली 60: घोषणाओं पर भी अमल नहीं कर पाई है ये सरकार और अब फिर से नई घोषणाएं कर रही है। लगातार चार साल से ठगी आ रही प्रदेश की जनता अब मृग मरीचिका की तरह दिखने वाले सरकार के इस बजट रूपी प्रलोभन में आने वाली नहीं है। उसे अब सरकारी खैरात नहीं, अपना और अपने परिवार का व्यापक उत्थान चाहिए। उसे गरीबी की सीमा रेखा से ऊपर एक सम्मानजनक मुकाम चाहिए। हमारे स्वाभिमानी राजस्थानी को अपने प्रदेश का सर्वांगीण विकास चाहिए। जहां सुख, शांति, समृद्धि और विश्वास हो। जहां विकास के साथ, सर्वधर्मसमभाव हो। सच पूछो तो इस सरकार ने हमारे प्रदेश के लिए कुछ नहीं किया। शुरू के ढाई साल तो हमारी भाजपा सरकार द्वारा बनाये गये विकास के रोड मैप के सहारे निकाल दिये, बाकी के ढाई वर्ष झूठे वादों, थोथी घोषणाओं और मेरे विरोध में गवां रहे हैं।
योजना आयोग से वर्ष 2013-14 के लिए 40 हजार 500 करोड़ रुपये की वार्षिक योजना मंजूर करवाकर सरकार जनता से क्यों तालियां बजवाना चाहती है? पिछली वार्षिक योजना का तो आधा पैसा भी खर्च नहीं कर पाई ये सुस्त सरकार। फिर किस बात की वाहवाही। भारत के नियंत्रक व महालेखा परीक्षक की वर्ष 2012 की रिपोर्ट इस सरकार की धीमी गति को उजागर करने के लिए काफी है। जिसमें कहा गया है कि वन, सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त, जल संसाधन, चिकित्सा, सार्वजनिक निर्माण जैसे विभागांे ने 13वें वित्त आयोग से मिले करोड़ांे रुपये खर्च ही नहीं किये। यहां तक कि प्रधानमंत्री सड़क योजना का पैसा भी यह सरकार खर्च नहीं कर पाई। इस कारण कई विभागों को तो यह राषि वापस लौटानी पड़ी।
मुझे भी मेरे शुभचिंतक, आप जैसे कार्यकर्ता और परिवार के लोग कई बार कहते हैं कि ये आपके खिलाफ हर रोज बोलते हैं, आप क्यों चुप रहती हो? सबको मेरा एक ही जवाब है। जनता ने अपनी आंखों की तेज रोशनी से इनके सब कर्म पढ़ लिये हैं। जिन्हें मुझे बताने की जरूरत नहीं है। सबको पता है, पूरा जग जानता है। और वैसे भी मैं एक महिला हूं। संस्कारित पार्टी की संस्कारित कार्यकर्ता हूं। इसलिये होंठ सीने भी पड़ते हैं और मन के उद्गार दबाने भी पड़ते हैं। कांग्रेस में न ऐसे संस्कार है और न ही ऐसे आचरण। जनता जानती है कि इनका पूरा संगठन झूठ और पाखण्ड की नींव पर खड़ा है।
सौ बार झूठ बोलने से झूठ सच में नहीं बदल जाता। सच, सच ही रहता है। और सांच को कभी आंच नहीं आती। और ये तो जनतंत्र है। जनतंत्र में जनता का उत्तर ही सबसे बड़ा जवाब होता है। जनता ही इंसाफ के तराजू में सही को सही और गलत को गलत ठहराती है। जनता की अदालत दिसम्बर 2013 में अपना फैसला सुनाने वाली है। फैसला क्या होगा, ये आपकी दमकती शक्ले और सामने वालों के बेनूर चेहरों से साफ पता चल रहा है। शायद इसलिये सरकार के मैनेजर गुणा-भाग, और जोड़-तोड़ में लगे हुए हैं, कि कैसे वापस सत्ता सुख प्राप्त किया जाये। लेकिन अब इस सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। कांग्रेस कितनी भी गणित लगाये, अब पार पड़ने वाली नहीं है। जनता ने इनका मैथमेटिक्स बिगाड़ दिया है। जनता के गणित में तो ये कभी के माइनस हो चुके हैं।
सत्ता में बने रहने के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जा सकती है। पहले जगन रेड्डी, मुलायम सिंह और मायावती को सीबीआई से डराया। अब डीएमके नेता एम. करूणा निधि ने केन्द्र सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो सीबीआई से उनके बेटे एम के स्टालिन के घर छापे डलवा दिये। क्योंकि सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस को सत्ता चाहिए।
कांग्रेस सीबीआई को अपना ब्रह्मास्त्र मानती आई है। जिसने राजस्थान में भी इसका भरपूर दुरुपयोग किया। लेकिन जनशक्ति का अस्त्र कांग्रेस के इस ब्रह्मास्त्र को चुटकियों में ही ध्वस्त कर देगा। इस सरकार ने पूरे चार साल झूठ में निकाले। 2008 में जनता से झूठ बोलकर राज्य में सरकार बना ली।
2009 में कड़ी से कड़ी जोड़ने का झूठा वादा करके केन्द्र में सरकार बना ली। लेकिन कड़ी से कड़ी जोड़ने का स्वांग रचकर कांग्रेस सरकार ने केन्द्र से लेकर राज्यों तक जो भ्रष्टाचार, कुशासन, आतंकवाद और आर्थिक अराजकता का माहौल दिया है, उससे पूरा राष्ट्र आहत है। देश में क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान सबसे बड़ा प्रदेश है। जिसका 60 प्रतिशत भू-भाग में रेगिस्तान है।
पाकिस्तान से सटी देश की सबसे बड़ी 1 हजार 40 किलोमीटर लम्बी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा यहां है। प्रदेश पर अकाल का प्रकोप रहता है। इसलिये हमारे राज्य को विशेष दर्जे की खास दरकार है। पहाड़ी राज्यों को तो केन्द्र की कांग्रेसनीत सरकार विशेष दर्जा दे सकती है, लेकिन हमारे रेगिस्तानी प्रदेश को नहीं। जहां की भौगोलिक परिस्थितियां इन राज्यों की तुलना में अधिक विषम है। कैसे मुख्यमंत्री है यह। दिल्ली में खुद के दल की सरकार होने के बावजूद हमारे राज्य को विशेष दर्जा नहीं दिलवा पाये। क्या यही है प्रदेश की जनता को कड़ी से कड़ी जोड़ने की सजा। राजस्थान का कुशासन भी अपने आप में एक उदाहरण बन गया है। जो प्रदेश विकास की दृष्टि से हर क्षेत्र में पांच साल पहले आगे था, वह आज फिर से बीमारू बन गया है। शिक्षा, बिजली, सड़क, पेयजल, उद्योग, रोजगार, महिला उत्थान, चिकित्सा, नरेगा, कृषि सहित सभी क्षेत्रों में केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने हमारी पिछली भाजपा सरकार की एक बार नहीं कई बार प्रशंसा की थी। जिस नरेगा में हम हमारे समय में देश में सबसे अव्वल थे, आज उस नरेगा में हम देश में सबसे पीछे हो गये हैं। राज्य की जो विकास दर हमारे समय में 9.09 प्रतिशत थी, इस सरकार के चार साल पूरे होने के बावजूद 5 प्रतिशत से भी कम रह गई। जो कृषि विकास दर हमारे समय में 4.19 प्रतिशत थी, वह घटकर 2.50 प्रतिशत रह गई है। औद्योगिक विकास दर की बात करें तो वह हमारे समय में 7.09 प्रतिशत थी, वो भी घटकर करीब 5 प्रतिशत रह गई है। यही हाल सर्विस टैक्स विकास दर का है यह हमारे समय में 12.89 प्रतिशत थी अब 7 प्रतिशत पर आकर टिक गई है। यानि हर क्षेत्र में फिसड्डी।
आज पूरा प्रदेश अंधकार में है। गांवों में ही नहीं शहरों मंे भी बिजली का संकट है। जो घरेलू बिजली हमारे समय में गांवों में भी 20 से 22 घण्टे मिलती थी, आज मुश्किल से 6-7 घण्टे भी नहीं मिलती। कम्पनियों का घाटा 15 हजार करोड़ से बढ़कर 56 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। बिजली कम्पनियां 60 हजार करोड़ के कर्जे में डूबी है। हमारे समय में हमने साफ कहा था, कि जब तक प्रदेश के लिए अच्छी क्वालिटी की बिजली का इंतजाम नहीं कर देते, बिजली के दाम नहीं बढ़ायेंगे। हमने इनकी तरह बिजली के दामों में बेतहाशा बढ़ोतरी भी नहीं की और प्रदेश को अच्छी क्वालिटी की बिजली भी दी। बिजली की दरें नहीं बढ़ाने और निर्बाध बिजली आपूर्ति का वादा करके कांग्रेस चुनाव जीत गई।
लेकिन सत्ता में आने के बाद ये सरकार जनता को अच्छी क्वालिटी की बिजली भी नहीं दे रही और बिजली के दामों में भारी बढ़ोतरी कर उपभोक्ताओं की कमर तोड़ रही है। सड़कों की भी राजस्थान में बहुत खराब स्थिति है। जबकि सड़क निर्माण में हमारी भाजपा सरकार को केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने पूरे देश में नम्बर वन बताया था। ये हमारे लिये कितनी लज्जाजनक बात है कि राजस्थान की खराब सड़कों के कारण पड़ौसी राज्यों ने अपनी बसें चलाना भी बंद कर दी थी। जो बड़ी मुश्किल से मान मनुहार के बाद फिर से चालू हो सकी। राजस्थान में खस्ताहाल सड़कें प्रतिदिन 25 से ज्यादा लोगों की जान ले रही है। अर्थव्यवस्था की बात करे तो राजस्थान राज्य में पैदा होने के साथ ही प्रत्येक शिशु 15 हजार रुपये का कर्जदार बन जाता है। राजस्थान को आर्थिक अंधकार में धकेलकर सरकार कभी प्रशासन गांव की ओर ले जा रही है, तो कभी शहरों की ओर। जिस प्रदेश में सरकार नाम की कोई चीज ही नहीं दिखाई देती हो, जहां प्रशासन का इकबाल ही नहीं बचा हो, वहां इस प्रकार के कार्यक्रमों का क्या लाभ हुआ होगा।
सरकार जनता की ठीक समय पर सुनवाई कर लेती तो प्रशासन को गांव और शहरों की ओर जाना ही नहीं पड़ता। यह इस प्रदेश की जनता का दुर्भाग्य ही रहा कि कांग्रेस के इस कुशासन में वह विकास से कभी रूबरू ही नहीं हुई। हां उसे इस शासन में दिखाई दिया तो कभी जातियों में संघर्ष, तो कभी वर्गाें में तनाव। पर इन दिनों एक नया ’प्रोफेशनल संघर्ष’ भी देखने को मिला। गत दिनों सड़क से सरकार तक वकील और पुलिस का संघर्ष अपने आप में सरकार की विफलता का एक और शर्मनाक उदाहरण है। अगर न्याय के रक्षक वकीलों से हमारी सरकार बात कर लेती, तो हमारी जाबांज और निष्ठावान पुलिस बली का बकरा नहीं बनती। शायद दोनों को लड़ाकर हमारी सरकार तमाशा देखना चाहती थी।
ऐसे हालातों के बाद तो लगता है कि राज्य में न कोई व्यवस्था है और न ही कोई शासन। सरकार कहती है चार साल, बेमिसाल। और जनता कहती है चार साल, बुरा हाल। गुजरात के चुनाव आपको याद होंगे। वहां चुनाव कैसे जीता जाये? इस सवाल के जवाब की खोज में कांग्रेस आखिरी तक उलझी रही। वहां भी पूरा चुनाव झूठ के सहारे लड़ा गया। कांग्रेस ने गुजरात की भाजपा सरकार को किसान विरोधी बताने का चुनाव में षड़यंत्र रचा था। गुजरात की भाजपा सरकार को बदनाम करने के लिए कांग्रेस ने गुजरात चुनाव के विज्ञापनों में राजस्थान के किसान का फोटो लगा दिया। विज्ञापन के जरिये गुजरात की जनता को बरगलाने का यह प्रयास किया गया कि गुजरात में किसान की ऐसी दशा है। मैं गुजरात चुनाव में गई, तो मैंने नरेन्द्र भाई मोदी से कहा कि कांग्रेस के विज्ञापन में गुजरात के किसान का नहीं, यह राजस्थान के किसान का फोटो है। मित्रों, आप इसी से अंदाजा लगा लीजिये कि राजस्थान में किसानों की क्या स्थिति है। और यह भी सोच लीजिये कि चुनाव जीतने के लिये कांग्रेस किस तरह से झूठे हथकण्डों का सहारा लेती है।
कांग्रेस ने मेरी सरकार पर 22 हजार करोड़ के आरोप लगाये। इतना तो एनुअल प्लान भी नहीं होता। यह आरोप झूठे थे, इसलिये इन्हें जनता ने भी अस्वीकार कर दिया है। कांग्रेस को इस अपराध के लिये राजस्थान के किसानों माफी मांगनी चाहिए। अपनी बदनामी को धोने के लिए कांग्रेस कई बार प्रचार प्रसार का सहारा लेती है। मौका था राजस्थान दिवस का। गोपालगढ़ और सूरवाल की घटनाओं से दागदार हुई इस सरकार ने अपनी छवि को उज्ज्वल बताने के लिये एक विज्ञापन छपवाया। इस विज्ञापन में खुशहाल मुस्लिम बालिकाओं की फोटो छापकर ये सरकार बताना चाहती थी कि राजस्थान में कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम समाज की बहुबूदी के लिये बहुत काम किये हैं। सरकार के मैनेजर पूरा राजस्थान घूम लिये, लेकिन उन्हें मुस्लिम बालिकाओं की उन्नति के चित्र कहीं नहीं मिले। लेकिन सरकार हताश नहीं हुई। सरकार ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के शिबली कॉलेज की लड़कियों की तस्वीरें 30 मार्च, 2012 के इस विज्ञापन में छाप कर ये दिखाने की कोशिश की कि राजस्थान में मुस्लिम समाज प्रगति कर रहा है। ये झूठ जब अखबारों ने पकड़ा तब सरकार की पोल खुली। ये दो उदाहरण सरकार को झूठा साबित करने के लिये पर्याप्त है। राष्ट्र की बात करें तो आज हमारी आंतरिक सुरक्षा भी खतरे में है। भारत की सीमा पर पाकिस्तान की फौज हमारे नौजवानों के सिर काटकर ले गई। देश बारूद के ढेर पर बैठा है। दुश्मन देश हम पर आंखें तरेर रहा है और हमारी केन्द्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। क्योंकि उसे देश की सुरक्षा से ज्यादा वोटो की परवाह है। जबकि हिंदुस्तान दुनिया के किसी भी देश से कमजोर नहीं है। यहां का एक-एक बच्चा जांबाज है।
ऐसे हालात देखकर हमारी और हमारे कार्यकर्ताओं की भी बांहे फड़कती है। देश पर अगर मर मिटने की भी स्थिति उत्पन्न होती है तो, हमारा भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता देश की खातिर हंसते-हंसते गोली खाने को भी तैयार है। अब तो राजस्थान भी महफूज नहीं है। यहां भी नक्सलवाद की आहट सुनाई दे रही है। भारत की आर्थिक स्थिति बुरी तरह से लड़खड़ा गई है। आये दिन पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ रहे है। गैस सिलेण्डर महंगा कर दिया है। आज देश के 92 प्रतिशत लोग मानते हैं कि भारत की अर्थ व्यवस्था की दुर्दशा के लिए मनमोहन सरकार जिम्मेदार है। यह एक अन्तर्राष्ट्रीय सर्वे की रिपोर्ट है। महंगाई कम नहीं हो रही और हमारे प्रधानमंत्री कहते है कि पैसा पेड़ पर नहीं लगता। कांग्रेस भी समझ ले कि वोट भी पेड़ों पर नहीं लगते। वोट तो जनता के हाथों से ही डाले जायेंगे।
आयेदिन भ्रष्टाचार के झूठे आरोप लगाने वाली कांग्रेस और उसके नेता भूल गये हैं कि अमेरिका के प्रसिद्ध अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भ्रष्ट सरकार का मुखिया बताया है। आज भारत की गिनती दुनिया के भ्रष्टत्तम देशों में होने लगी है। वर्ल्ड बैंक के ब्वनदजतल च्मतचवितउंदबम ंदक प्देजपजनजपवदंस ।ेेमेेउमदज में भी भारत को भ्रष्ट देश के रूप में दिखाया गया है। खुद सोनिया गांधी ने जयपुर में आयोजित चिंतन शिविर में माना कि कांग्रेस की छवि भ्रष्ट पार्टी की बनती जा रही है। फिर ये किस मुंह से बात कर रहे हैं। समझ से परे है। सच तो यह है कि देश हो चाहे प्रदेश। कांग्रेस की सरकारें जहां-जहां भी है, वे वहां भ्रष्टाचार और मंहगाई की सुनामी लेकर आई है। आज राजस्थान में इस सरकार पर मीडिया भ्रष्टाचार के नित नये आरोप लगा रहा है। देश के आंकड़ों की बात करें तो आज राजस्थान भ्रष्टाचार में पहले स्थान पर है। रिश्तेदारों को खानों की बंदरबांट हो, या कूकस में पांच सितारा होटल। परिजन कानूनी सलाहकार हो, या कम्पनियों में पार्टनर। जिस तरह से इन कम्पनियों को मालामाल करने के लिए ऑबलाइज किया जा रहा है। सब जानते हैं। मुख्यमंत्री जी कहते हैं कि जांच में आरोप सिद्ध हुए तो मैं इस्तीफा देने में एक पल भी नहीं लगाऊंगा। फिर क्यों नहीं करवाते जांच? जांच तो मेरे खिलाफ बिठाई थी। क्या एक भी आरोप सिद्ध कर पाये मेरे खिलाफ? उद्योग धंधों की बात करें तो जो निवेशक पांच साल पहले दौड़-दौड़कर राजस्थान आ रहे थे, आज वे ही विज्ञापन देकर दूसरे प्रदेशों की ओर रुख कर रहे हैं।
जब हमारी सरकार थी देश और दुनिया में बसे प्रवासियों को अपनी माटी से जोड़ने के लिए हमने रिसर्जेंट राजस्थान कार्यक्रम आयोजित किया था। उसके नतीजे उत्साहजनक निकले थे। आज राजस्थान की धरती पर हीरो होण्डा, सेंटगोबेन इन्फोसिस मणिपाल युनिवर्सिटी, महिन्द्रा, नारायणा हृदयालय जैसे और भी कई निवेश हमारे उस समय के ही है। जनवरी 2012 में इस सरकार ने भी प्रवासी भारतीय दिवस आयोजित किया था। इस कार्यक्रम में 8 जनवरी को प्रवासी भारतीयों के सब्र का बांध टूट गया। उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि भ्रष्टाचार मिटे तो हम यहां आये। सिंगापुर के एक प्रमुख व्यवसायी प्रवासी राजस्थानी ने भी स्पष्ट कहा राजस्थान में निवेश तो करें, पर यहां हर जगह लूट मची है। हमारी भाजपा सरकार कैसी थी, और कांग्रेस की यह सरकार कैसी है? यह इन दोनों उदाहरणों से बयां हो जाता है। आज आम आदमी अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं करता। थानों के सामने इंसानों के सर काटकर फेंके जा रहे हैं। आठ माह की बच्चियों से दुष्कर्म हो रहे हैं। हर रोज महिला उत्पीड़न, हर रोज हत्याएं, हर रोज लूट, हर रोज ब्ींपद ैदंजबीपदह राजस्थान की फितरत बन गई है। अभी अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें कहा गया है कि राजस्थान महिलाओं की सुरक्षा के मामलों में देश में 26वें स्थान पर है। इसलिये अब वक्त आ गया है, जनता को राहत दिलाने का। क्योंकि अब तो सिर्फ समर ही शेष है। और इसके लिए आप सब कार्यकर्ता तैयार भी है।
क्योंकि आप सब कार्यकर्ता पार्टी की पंचनिष्ठाओं के प्रतीक हो। इस सुराज संकल्प की वास्तविक शक्ति हो। आपको ही एकजुट भाजपा का संदेश गांव-गांव, ढाणी-ढाणी तक पहुंचाना है। प्रदेश को एक बार वापस समृद्धशाली, विकसित और आधुनिक राजस्थान बनाना है। भाइयों और बहनों आपकी शक्ति असीमित है। आपका संकल्प ही प्रदेश में नया परिवर्तन लायेगा और राजस्थान भी अन्य भाजपा शासित प्रदेशों की तरह देश और दुनिया में कीर्तिमान स्थापित करेगा। पर इसके लिए हमें चाहिए ैचपतपजए ैापसस और ैचममक । अब मुझे पूरा यकीन है, कि ये जंग हम जीत लेंगे। मैं इस कार्यसमिति के माध्यम से केन्द्रीय नेतृत्व को भी विश्वास दिलाती हूं कि जो अपेक्षाएं उन्होंने दिल्ली में आयोजित विगत राष्ट्रीय परिषद बैठक में हमसे रखी थी, उन्हें हम सब मिलकर पूरा करेंगे। क्योंकि आज हर तरफ से बस एक ही आवाज उठ रही है कि हमें चाहिएः- हम सबके आत्म विश्वास का राजस्थान। हम सबके गौरव का राजस्थान। हम सब महिलाओं के सम्मान का राजस्थान। हम सब खिलखिलाते नौजवानों का राजस्थान। हमारे लहलहाते खेतों का राजस्थान। हमारे बडे़-बडे़ उद्योगों का राजस्थान। हमारी चमचमाती सड़कों का राजस्थान। तरक्की की राह में तेज दौड़ता राजस्थान। लेकिन इसके लिए आपके साथ की जरूरत है। इसके लिए प्रदेश की जनता के आशीर्वाद की जरूरत है। फिर राजस्थान की विजय निश्चित है। ऐसी विजय जो 2003 की ऐतिहासिक जीत से भी बड़ी होगी।
यहां मैं आपको यह भी स्पष्ट करना चाहूंगी कि हम टिकट वितरण प्रक्रिया में मतदान केन्द्र के नीचे तक की जानकारी लेंगे। वहां के कार्यकर्ताओं की राय लेंगे, सर्वे करवायेंगे। इसके बाद जिस व्यक्ति के साथ जनाधार होगा, लोकप्रियता होगी, उस व्यक्ति को जन-आंकाक्षाओं के आधार पर, निष्पक्षता, प्रमाणिता, पारदर्शिता के मापदण्डों को ध्यान में रखकर ही उम्मीदवार बनायेंगे। किसी के कहने से, किसी प्रकार के दबाव से, किसी प्रकार के लोभ से उम्मीदवार का चयन नहीं होगा। यदि कोई ये सोचता हो कि वह मेरे या किसी नेता के नजदीक है, उसके आधार पर उम्मीदवारी मिल जायेगी, ये मेरे नेतृत्व में बिलकुल संभव नहीं होगा। इसलिये जो कोई भी उम्मीदवार बनना चाहता है, वह ऊपर की तरफ न देखे। नीचे कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की तरफ देखे। हमारी जानकारी में जो जनता और कार्यकर्ताओं का विश्वास जीतेगा, उसी के सिर पर उम्मीदवारी का सेहरा बंधेगा। मैं सभी से अपेक्षा करती हूं कि एकजुटता के साथ संगठन के दिशा निर्देशों का पालन करें। पार्टी को मजबूत बनाये और भाजपा की सरकार बनाने का जो जनता का सपना है, उसे साकार करे। पूरे प्रदेश में होली की तैयारियां हो रही है। उल्लास के इस पर्व का हम सब इंतजार कर रहे हैं। इस अवसर पर मैं आप सबको इन चार पंक्तियों के साथ होली की शुभकामनाएं देते हुए अपने शब्दों को विराम देती हूं -
दिलों के बीच ना बाकी बचे, दीवार होली में,
उठे सबके दिलों से एक ही, झंकार होली में,
खुशी के गीत गाएं और, बांटे प्यार होली में
बहादो प्रेम की गंगा, इस बार होली में।।
!! जय-जय राजस्थान !!

शनिवार, 23 मार्च 2013

Congress had always "misused" the central investigating agency - Anna Hazare




Anna Hazare slams CBI raid at Stalin's house, 

says Cong misusing the agency

 

PTI  Pune, March 23, 2013
 

Social activist Anna Hazare on Saturday said it was wrong to presume that the CBI acts of its own volition and alleged that Congress had always "misused" the central investigating agency.

Asked about the CBI raid on DMK leader M K Stalin's residence immediately after the party withdrew its support to the UPA government, Hazare told reporters, "Everybody knows that the CBI is under government's control. If it is brought under the Lokpal's control, it would help in curbing corruption."

Hazare alleged that Congress had always "misused" the agency, even though it has some good officers in its fold.

"It is not that all people with the CBI are bad. But they are subjected to pressure as they have their jobs to protect.

Congress has always misused it," he alleged.

When asked to comment on the UPA allies leaving Congress, Hazare said the party was losing the sympathy of the people because of the corruption associated with it.

"Congress is taking wrong steps. People have lost their sympathy for the party as responsible ministers in the government too are involved in scams," he added.

Referring to the support of Samajwadi Party (SP) to the Congress-led government, Hazare said, "Regional parties pose a threat to the country as they bring pressure (on the government)."

He said although he had parted ways with his erstwhile colleague Arvind Kejarwal, there was no conflict between them and he wished him well for their cause through political means.

Hazare said he had not instituted any core committee of his own after breaking away from IAC. "It is difficult to get selfless workers for a cause. I am at present associated with 'Janatantra Morcha' along with former Army Chief V K Singh, which is a non-political organisation," he added.

Later, addressing a gathering, the activist said he was confident that the Lokpal would be a reality. "We have seen part one of the Lokpal bill," he added.

He also noted with satisfaction that the provision of a fine for civil servants, who delayed their work beyond the stipulated period under Citizens' Charter.

"When the elections are declared, I would be once again be at the Ramlila maidan to press for the demand for Right to Reject as part of electoral reforms to keep anti-social elements out of the Parliament and the state legislatures," Hazare asserted.

कांग्रेस ने हमेशा से सीबीआई का दुरुपयोग किया है : अन्ना हजारे


कांग्रेस ने हमेशा से CBI का दुरुपयोग किया है : अन्ना

Zeenews logo
Saturday, March 23, 2013
http://zeenews.india.com/hindi/news
पुणे : सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने आज कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि सीबीआई अपनी इच्छा से काम करती है और आरोप लगाया कि कांग्रेस ने हमेशा से ही केंद्रीय जांच एजेंसी का ‘गलत इस्तेमाल’ किया है। संप्रग सरकार से समर्थन वापस लेने के तुरंत बाद सीबीआई द्वारा द्रमुक नेता एमके स्टालिन के आवास पर छापा मारे जाने पर हजारे ने संवाददाताओं से कहा, ‘हर कोई जानता है कि सीबीआई सरकार के अधीन है । यदि इसे लोकपाल के नियंत्रण में लाया जाता है तो इससे भ्रष्टाचार के खात्मे में मदद मिलेगी।’ हजारे ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने हमेशा से ही एजेंसी का ‘गलत इस्तेमाल’ किया है, फिर भी इसमें कुछ अच्छे अधिकारी हैं।
उन्होंने आरोप लगाया, ‘ऐसा नहीं है कि सीबीआई में सभी लोग खराब हैं। लेकिन उन पर दबाव बनाया जाता है जबकि उन्हें अपनी नौकरी बचानी होती है। कांग्रेस ने हमेशा से ही इसका गलत इस्तेमाल किया है।’ कांग्रेस का साथ छोड़ रहे संप्रग सहयोगियों पर हजारे ने कहा कि पार्टी लोगों की सहानुभूति खो रही है क्योंकि इससे भ्रष्टाचार जुड़ा है।
हजारे ने कहा, ‘कांग्रेस गलत कदम उठा रही है। लोगों का पार्टी पर से विश्वास उठ गया है क्योंकि सरकार के जिम्मेदार मंत्री भी घोटाले में शामिल हैं।’ कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को समाजवादी पार्टी द्वारा समर्थन दिए जाने पर हजारे ने कहा, ‘क्षेत्रीय पार्टियों से देश के लिए खतरा है क्योंकि वे (सरकार पर) दबाव डालती हैं।’ उन्होंने कहा कि वह अपने पूर्व साथी अरविंद केजरीवाल से अलग हो गये हैं फिर भी उनके बीच कोई विवाद नहीं है।

हजारे ने कहा कि आईएसी से अलग होने के बाद उन्होंने अपने से किसी कोर कमेटी का गठन नहीं किया है। उन्होंने कहा, ‘एक उद्देश्य के लिये निस्वार्थ कार्यकर्ता पाना बहुत कठिन है। मैं पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह के साथ अभी ‘जनतंत्र मोर्चा’ से जुड़ा हूं जो एक गैर राजनीतिक संगठन है।’ बाद में एक जनसभा को संबोधित करते हुए हजारे ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि लोकपाल एक वास्तविकता होगी। हमने लोकपाल विधेयक का पहला भाग देखा है।’

उन्होंने कहा, ‘जब चुनाव घोषित हो जाएंगे तो मैं एक बार फिर से रामलीला मैदान जाऊंगा और संसद तथा राज्य विधानसभाओं से समाज विरोधी तत्वों को दूर रखने के लिए चुनाव सुधार प्रक्रिया के तहत खारिज करने का अधिकार दिए जाने की मांग करूंगा।’ (एजेंसी)

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

भाजपा का अखिल भारतीय कार्य २ ० १ ३




भाजपा का अखिल भारतीय कार्य २ ० १ ३
 भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रिय वृत्त , जो कि हाल  ही में जयपुर में प्रस्तुत किया गया है





गुरुवार, 21 मार्च 2013

मुंबई बम धमाकों के मामले में : संजय दत्त को : पांच साल के कठोर कारावास की सजा



अब मेरा परिवार भी भुगतेगा सजा: संजय दत्त

http://www.jagran.com/news/national
नई दिल्ली [माला दीक्षित]। मुंबई में हुए श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा संजय दत्त को अवैध हथियार रखने के जुर्म में पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद फैसले पर प्रतिक्रिया जताते हुए उन्होंने गुरुवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मैं भावनात्मक तनाव में हूं। पिछले 20 सालों तक मैंने इसे सहा है। 18 महीने जेल में भी रह चुका हूं। अगर वे चाहते हैं कि मैं और पीड़ा उठाऊं तो इसके लिए मुझे मजबूत होना पड़ेगा।
फैसले के बाद उन्होंने आज मेरा दिल टूट गया क्योंकि अब मेरे साथ तीन बच्चे और पत्‍‌नी और मेरा परिवार भी सजा भुगतेगा। मेरी आंखों में आंसू हों तो भी मैंने हमेशा न्यायिक व्यवस्था का सम्मान किया है और करता रहूंगा। उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री का काफी पैसा मुझपर लगा हुआ है। मैं अपनी सभी फिल्में पूरी करूंगा। किसी को निराश नहीं होने दूंगा। मैं अपने प्रशसंकों, मीडिया, बालीवुड के लोगों और शुभचिंतकों के समर्थन से अभिभूत हूं। वे हमेशा मेरे साथ खड़े रहे हैं। मैं जानता हूं कि दिल से मैं एक अच्छा इंसान रहा हूं। मैंने हमेशा व्यवस्था का सम्मान किया और अपने देश के प्रति मैं वफादार रहा हूं। मेरा परिवार इस समय काफी भावुक है और मुझे उनके लिए मजबूत होना पड़ेगा। भगवान बड़ा दयालु है और इस दौर से मुझे वही निकालेगा।
फिल्म अभिनेता संजय दत्त को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा। सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई में 1993 में हुए श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के मामले में दत्त को अवैध हथियार रखने के जुर्म में पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके अलावा कोर्ट ने हमले के मुख्य साजिशकर्ता टाइगर मेमन के छोटे भाई याकूब अब्दुल रजाक मेमन को फांसी की सजा सुनाई है, जबकि 10 अन्य की फांसी ताउम्र कैद में तब्दील कर दी है। कोर्ट ने 16 और लोगों की उम्रकैद पर भी अपनी मुहर लगा दी है। इस मामले के मुख्य साजिशकर्ता दाऊद इब्राहिम व टाइगर मेमन अभी भी भगोड़े घोषित हैं।
ये फैसला न्यायमूर्ति पी. सतशिवम व न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने धमाकों के मामलों में दाखिल अपीलों का निपटारा करते हुए सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संजय दत्त को साढ़े तीन साल और जेल काटनी होगी। 18 महीने की जेल दत्त मामले की सुनवाई के दौरान भुगत चुके हैं। बाकी सजा भुगतने के लिए संजय दत्त को चार सप्ताह के भीतर समर्पण करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की सजा के खिलाफ दाखिल अपील तो जरूर ठुकरा दी। लेकिन टाडा कोर्ट द्वारा उन्हें सुनाई गई छह वर्ष की कठोर कैद को घटाकर पांच साल कर दिया है। पीठ ने दत्त की प्रोबेशन पर छोड़े जाने की अपील ठुकराते हुए कहा कि अपराध की गंभीरता और प्रकृति को देखते हुए दत्त को प्रोबेशन आफ अफेंडर एक्ट का लाभ नहीं दिया जा सकता।
याकूब मेमन की फांसी पर मुहर लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित करने में सफल रहा। साक्ष्यों और सहअभियुक्तों के अपराध स्वीकृति के बयान से साबित होता है कि हथियारों का प्रशिक्षण पाकिस्तान सरकार की मदद से दिया गया। यह साबित हुआ कि याकूब अब्दुल रजाक मेमन पूरी साजिश में बहुत गहराई से शामिल था। कोर्ट ने जगह-जगह विस्फोटक लदे वाहन खड़े करने के दोषी बाकी दस अभियुक्तों की मौत की सजा जिंदगी भर की कैद में तब्दील करते हुए कहा कि इन लोगों ने मुख्य साजिशकर्ता के इशारे पर काम किया। इनकी और मुख्य साजिशकर्ता याकूब मेमन के अपराध की डिग्री में अंतर है। हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि इन दस लोगों को दी गई कम सजा भविष्य में नजीर नहीं मानी जा सकती। प्रत्येक मामले को उसकी परिस्थितियों और तथ्यों के आधार पर निर्णीत किया जाएगा।
मालूम हो कि 12 मार्च 1993 को मुंबई में 12 जगह श्रृंखलाबद्ध धमाके हुए थे, जिनमें 257 लोग मारे गए थे, जबकि 713 घायल हुए थे। मुंबई की टाडा अदालत ने दत्त सहित 100 लोगों को सजा सुनाई थी, जिसमें 12 को फांसी और 22 को उम्रकैद दी गई थी।

उम्र कैद मतलब जिंदगी भर की कैद
कोर्ट ने साफ किया कि उम्र कैद की सजा का मतलब जीवनभर की कैद होता है। यह गलत धारणा है कि उम्रकैद 14, 20 या 30 साल के लिए होती है। कोर्ट ने साफ किया है कि राज्य अपनी माफी के अधिकार का प्रयोग करते समय कोर्ट द्वारा फैसले में दिए गए कारणों पर जरूर ध्यान दें। फैसले में कोर्ट ने राष्ट्रपति, राज्यपाल और सरकार के माफी के अधिकार पर भी चर्चा की है और इसके सावधानी से उपयोग की बात कही है।

फिर साबित हुई पाकिस्तान की भूमिका
नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान की भूमिका एक बार फिर साबित हुई है। मुंबई बम धमाकों की साजिश से लेकर उसे अंजाम तक पहुंचाने का प्रशिक्षण पाकिस्तान में दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई बम धमाकों पर पाकिस्तान की इन करतूतों को फैसले में दर्ज करते हुए कहा है कि पाकिस्तान ने न तो आतंकवाद रोकने के अंतरराष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह किया और न ही पड़ोसी धर्म निभाया।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि अभियुक्तों के अपराध स्वीकृति के बयानों से खुलासा होता है कि इस मामले में भगोड़ा घोषित अपराधियों सहित साजिश में शामिल अपराधियों ने आरडीएक्स से बम बनाने, एके 56 जैसे अत्याधुनिक हथियार चलाने और हथगोले फेंकने की ट्रेनिंग पाकिस्तान में ली थी। यह सब दाऊद इब्राहिम, अनीस इब्राहिम, मोहम्मद दौसा और सलीम बिस्मल्लाह द्वारा तैयार योजना के अनुरूप किया गया था। कोर्ट ने कहा कि मुंबई में सीरियल धमाके पाकिस्तान में दिए गए प्रशिक्षण का ही नतीजा था।
कोर्ट ने कहा है कि यह बड़ी अफसोस की बात है कि संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य होने के बाद भी पाकिस्तान ने आतंकवाद रोकने के अंतरराष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह नहीं किया। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2 (4) कहता है कि एक देश दूसरे देश में आतंकवादी हमले रोकेगा। पाकिस्तान इसमें पूरी तरह विफल रहा।
घटनाओं को देखने से पता चलता है कि अभियुक्त प्रशिक्षण पाने के लिए पाकिस्तान गए और आइएसआइ संचालकों ने उनका स्वागत किया। इतना ही नहीं वे उन्हें बिना इमीग्रेशन औपचारिकताओं के एयरपोर्ट से बाहर निकाल ले गए। इसका मतलब है कि उन लोगों [आतंकवादियों] को पाकिस्तान में ग्रीन चैनल से प्रवेश और निकलने की सुविधा प्राप्त थी। कोर्ट ने कहा कि एक अन्य अपराध स्वीकृति के बयान से पता चलता है कि उन लोगों [दोषियों] को कई बार आइएसआइ के अधिकारियों ने खुद प्रशिक्षण दिया था। इससे साबित होता है कि पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता है और उसके प्रति सहिष्णु है।
पूरा घटनाक्रम देखने से पड़ोसी राज्य की भूमिका साफ हो जाती है। न सिर्फ बड़े पैमाने पर अभियुक्तों को पाकिस्तान में प्रशिक्षण दिया गया। बल्कि वहां की सरकार ने इस बात का भी पूरा खयाल रखा कि साजिश में पाकिस्तान का नाम न आए। इसके लिए अभियुक्तों को आतंकवाद के प्रशिक्षण के लिए मुंबई से दुबई और दुबई से पाकिस्तान लाया गया और फिर पाकिस्तान से दुबई और दुबई से भारत भेजा गया। कहीं पर भी पाकिस्तान से दुबई जाने की इमीग्रेशन औपचारिकता नहीं हुई ताकि पाकिस्तान का नाम सामने ना आए।

ढाई साल में रिहा हो सकते हैं संजू बाबा
मुंबई [विनोद कुमार मेनन]। संजय दत्त के फैन्स को उम्मीद की एक किरण दिख रही है। हो सकता है कि उनके 'मुन्नाभाई' को साढ़े तीन साल जेल में नहीं रहना पड़े। यदि जेल में व्यवहार अच्छा रहा तो ढाई साल में भी बाहर आ सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त को शस्त्र अधिनियम के तहत दोषी करार दिया है और पांच साल की सजा सुनाई है। डेढ़ साल वह पहले ही जेल में बिता चुके हैं। अब शेष बचे साढ़े तीन साल के बारे में एक वरिष्ठ जेल अधिकारी का कहना है कि हो सकता है कि संजू बाबा को ढाई साल ही जेल में रहना पड़े। जेल में अच्छे काम और व्यवहार से उन्हें छूट मिल सकती है। यह छूट हर माह सात दिन तक की हो सकती है।
हर कैदी सात दिन छूट पाने का पात्र है। इसमें चार दिन अच्छे काम के लिए और तीन दिन अच्छे व्यवहार के आधार पर छूट दी जाती है। इस तरह संजय को हर साल 84 दिन की छूट पाकर जेल की सजा की वास्तविक अवधि घट सकती है। [मिड डे]

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में पास हो गया है श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव


श्री लंका में सिहल और तमिल दो बड़े जातीय समूह हें , तमिलों का विवाद राजनैतिक और ५ ० साल से है , इसी क्रम में यह मामला तमिल नर संहार तक आ पंहुचा ....जो अनुचित था ..!



भारत ने दिया श्रीलंका के खिलाफ वोट, प्रस्ताव पास
नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में पास हो गया है श्रीलंका के खिलाफ प्रस्ताव. श्रीलंका में तमिलों के मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर भारत ने श्रीलंका के खिलाफ वोट दिया.संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में श्रीलंका के खिलाफ अमेरिका का लाया प्रस्ताव पास हो गया है. वोटिंग में कुल 25 देशों ने अमेरिका के प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया जबकि 13 देशों ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया.

आठ देशों ने वोट नहीं डाला. ये प्रस्ताव श्रीलंका में एलटीटीई के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के दौरान तमिलों के मानवाधिकार हनन से जुडा हुआ था. जिस पर भारत ने श्रीलंका के खिलाफ वोट दिया है. खास बात ये है कि पाकिस्तान ने श्रीलंका के पक्ष में वोट दिया. भारत ने अमेरिका के लाए गए प्रस्ताव में एक भी संशोधन पेश नहीं किया.


जेनेवा। भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद [यूएनएचआरसी] में गुरुवार को 24 अन्य देशों के साथ श्रीलंका के खिलाफ मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर अमेरिका प्रायोजित प्रस्ताव का समर्थन किया। भारत ने श्रीलंका से कहा कि वह मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों की स्वतंत्र एवं विश्वसनीय जांच करे। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर द्रमुक भारत में सत्तारूढ़ संप्रग गठबंधन से अलग हो गया है। 47 सदस्यीय यूएनएचआरसी के पाकिस्तान सहित कुल 13 सदस्य देशों ने इस विवादित प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया व श्रीलंका का साथ दिया। आठ सदस्यों ने मतदान में भाग नहीं लिया जबकि एक सदस्य गैबन मताधिकार के मुद्दे की वजह से वोट नहीं डाल सका।
सूत्रों का कहना है कि यह भी देखा गया कि 'प्रमोटिंग रेकंसिलिएशन एंड अकाउंटबिलिटी इन श्रीलंका' यानी 'श्रीलंका में फिर से मेल मिलाप एवं जवाबदेही को बढ़ावा देना' नामक इस प्रभावहीन प्रस्ताव में भारत कुछ लिखित प्रावधान जोड़ना चाहता था। जिसे प्रस्तावकों ने प्रस्ताव के अंतिम दस्तावेज में शामिल नहीं किया।
उनका कहना था कि इससे उद्देश्य पूरा नहीं होगा। अमेरिकी प्रस्ताव में कहा गया कि 'यह चिंता की बात है कि श्रीलंका की कार्रवाई की राष्ट्रीय योजना और आयोग की रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून और अंतरराष्ट्रीय मानवता कानून के उल्लंघन के गंभीर आरोपों का पर्याप्त ढंग से निवारण नहीं करतीं।' इसमें इस पर भी ंिचंता जताई गई है कि श्रीलंका में मानवाधिकारों के उल्लंघन की खबरें आनी जारी हैं।
इनमें बगैर अदालती आदेश के हत्याएं, उत्पीड़न और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक का उल्लंघन, संघ या शांतिपूर्ण ढंग से लोगों के एक जगह जमा होने के साथ मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आगे आने वाले नागरिकों एवं पत्रकारों को डराना-धमकाना और बदला लेना, न्यायिक स्वतंत्रता और कानून के शासन को खतरा और धर्म या आस्था के आधार पर भेदभाव के मामले शामिल हैं। इस प्रस्ताव में हस्तक्षेप करते हुए भारत के स्थायी प्रतिनिधि दिलीप सिन्हा ने कहा, 'हम मानवाधिकारों के उल्लंघन एवं नागरिकों के जीवन को हुई क्षति के आरोपों की एक स्वतंत्र एवं विश्वसनीय जांच की अपनी मांग दोहराते हैं। हम चिंता के साथ इसका उल्लेख करते हैं कि श्रीलंका द्वारा इस परिषद से वर्ष 2009 में किए गए वादों को पूरा करने में अपर्याप्त प्रगति हुई है।'
इस तरह भारत ने छह पैराग्राफ में सात लिखित संशोधन दिए थे। जिस पर श्रीलंका ने आधिकारिक प्रतिक्रिया में कहा है कि वह भारत सरकार की घरेलू मजबूरियों को समझता है। इस अवसर पर अमेरिका ने कहा कि कुछ क्षेत्रों में हुई प्रगति की उसे जानकारी है लेकिन अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। श्रीलंका हर हाल में सार्थक कार्रवाई करे और बढ़ती चिंता का निवारण करे। श्रीलंका ने इस प्रस्ताव की निंदा करते हुए कहा है कि यहां जो प्रस्ताव पेश किया गया है वह स्पष्ट रूप से उसके लिए अस्वीकार्य है।

प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करने वाले प्रमुख देश -भारत,बेनिन, लीबिया, सिएरा लियोन, अर्जेटीना, ब्राजील, ऑस्ट्रिया, जर्मनी, आयरलैंड, इटली, स्पेन, स्विटजरलैंड और दक्षिण कोरिया।
प्रस्ताव के विरोध में मतदान करने वाले प्रमुख देश -पाकिस्तान, कांगो, मालदीव, थाइलैंड, यूएई, कतर, कुवैत, इक्वाडोर।
मतदान में भाग नहीं लेने वाले देश- केन्या, जापान, मलेशिया, कजाखिस्तान इथापिया, बोत्सवाना।

बुधवार, 20 मार्च 2013

नई प्रौद्योगिकी विश्व, संस्कृत से क्या क्या फायेदा उठा रहा है







अत्यधिक गोपनीय जानकारियों का ताला(कोडवर्ड) खोल हम यह जानकारियाँ आपके सन्मुख लायें हैं, हम आज जिस अंग्रेजी की और बढ़ते जा रहे हैं उनके जनक देश हमारी संस्कृत से क्या क्या फायेदा उठा रहे हैं जानिये और शेयर कर दुनिया को बताइए, इस बात को हम एक श्रंखला से क्रमशः आपको अवगत कराएँगे, (नासा के पास 60,000 ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियों है जो वे अध्ययन का उपयोग कर रहे हैं) (असत्यापित रिपोर्ट का कहना है कि रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं। दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्त करने के लिए है, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय इंडिया (भारत) में नहीं है।दुनिया की सभी भाषाओं की माँ संस्कृत है। सभी भाषाएँ (97%) प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस भाषा से प्रभावित है।संदर्भ: यूएनओ नासा वैज्ञानिक द्वारा एक रिपोर्ट है कि अमेरिका 6 और 7 वीं पीढ़ी के सुपर कंप्यूटर संस्कृत भाषा पर आधारित बना रहा है जिससे सुपर कंप्यूटर अपनी अधिकतम सीमा तक उपयोग किया जा सके।परियोजना की समय सीमा 2025 (6 पीढ़ी के लिए) और 2034 (7 वीं पीढ़ी के लिए) है, इसके बाद दुनिया भर में संस्कृत सीखने के लिए एक भाषा क्रांति होगी। . संस्कृत भाषा वर्तमान में “उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी” तकनीक में इस्तेमाल की जा रही है। (वर्तमान में, उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी तकनीक सिर्फ रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में ही मौजूद हैं। भारत के पास आज “सरल किर्लियन फोटोग्राफी” भी नहीं है ब्रिटेन वर्तमान में हमारे श्री चक्र पर आधारित एक रक्षा प्रणाली पर शोध कर रहा है।
लेकिन यहाँ यह बात अवश्य सोचने की है,की आज जहाँ पूरे विश्व में संस्कृत पर शोध चल रहे हैं,रिसर्च हो रहीं हैं वहीँ हमारे देश के लुच्चे नेता संस्कृत को मृत भाषा बताने में बाज नहीं आ रहे हैं अभी ३ वर्ष पहले हमारा एक केन्द्रीय मंत्री बी. एच .यू . में गया था तब उसने वहां पर संस्कृत को मृत भाषा बताया था. यह बात कहकर वह अपनी माँ को गाली दे गया, और ये वही लोग हैं जो भारत की संस्कृति को समाप्त करने के लिए यहाँ की जनता पर अंग्रेजी और उर्दू को जबरदस्ती थोप रहे हैं.

मंगलवार, 19 मार्च 2013

नालंदा विश्वविद्यालयन को क्यों जलाया गया था..?


नालंदा विश्वविद्यालयन को क्यों जलाया गया था..?
जानिए सच्चाई ...??

एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाला तुर्क लूटेरा था....बख्तियार खिलजी. इसने ११९९ इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया।उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था.
एक बार वह बहुत बीमार पड़ा उसके हकीमों ने उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली ...
मगर वह ठीक नहीं हो सका.किसी ने उसको सलाह दी...नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के
प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र ,जी को बुलाया जाय और उनसे भारतीय विधियों से इलाज कराया जाय
उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई भारतीय वैद्य ... उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और
वह किसी काफ़िर से .उसका इलाज करवाए ,फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए उनको बुलाना पड़ा, उसने वैद्यराज के सामने शर्त रखी...
मैं तुम्हारी दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा...
किसी भी तरह मुझे ठीक करों ...
वर्ना ...मरने के लिए तैयार रहो.
बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई... बहुत
उपाय सोचा...
अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर
चले गए..
कहा...इस कुरान की पृष्ठ संख्या ... इतने से
इतने तक पढ़ लीजिये... ठीक हो जायेंगे...!
उसने पढ़ा और ठीक हो गया ..
जी गया...
उसको बड़ी झुंझलाहट
हुई...उसको ख़ुशी नहीं हुई
उसको बहुत गुस्सा आया कि ... उसके
मुसलमानी हकीमों से इन भारतीय
वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है...!
बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने
के बदले ...उनको पुरस्कार देना तो दूर ...
उसने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग
लगवा दिया ...पुस्तकालयों को ही जला के
राख कर दिया...!
वहां इतनी पुस्तकें थीं कि ...आग
लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू धू करके
जलती रहीं
उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार
डाले.
आज भी बेशरम सरकारें...उस नालायक
बख्तियार खिलजी के नाम पर रेलवे स्टेशन
बनाये पड़ी हैं... !
उखाड़ फेंको इन अपमानजनक नामों को...
मैंने यह तो बताया ही नहीं... कुरान पढ़ के वह
कैसे ठीक हुआ था.
हम हिन्दू किसी भी धर्म ग्रन्थ को जमीन पर
रख के नहीं पढ़ते...
थूक लगा के उसके पृष्ठ नहीं पलटते
मिएँ ठीक उलटा करते हैं..... कुरान के हर पेज
को थूक लगा लगा के पलटते हैं...!
बस...
वैद्यराज राहुल श्रीभद्र जी ने कुरान के कुछ
पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप
लगा दिया था...
वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट
गया...ठीक हो गया और उसने इस एहसान
का बदला नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया
आईये अब थोड़ा नालंदा के बारे में भी जान
लेते है
यह प्राचीन भारत में उच्च्
शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और
विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के
इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के
साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के
छात्र पढ़ते थे। वर्तमान बिहार राज्य में
पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण--पूर्व
और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में
एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम
द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध
विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन
वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं। अनेक
पुराभिलेखों और सातवीं शती में भारत भ्रमण
के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग
तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस
विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत
जानकारी प्राप्त होती है। प्रसिद्ध
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में
यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक
विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत
किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र'
का जन्म यहीं पर हुआ था।
स्थापना व संरक्षण
इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय
गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ४५०-४७०
को प्राप्त है। इस विश्वविद्यालय को कुमार
गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग
मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले
सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में
अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट
हर्षवर्द्धन और पाल
शासकों का भी संरक्षण मिला। स्थानिए
शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के
साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से
भी अनुदान मिला।
स्वरूप
यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय
विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें
विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं
अध्यापकों की संख्या २००० थी। इस
विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न
क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान,
चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस
तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण
करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट
शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध
धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय
की नौवीं शती से बारहवीं शती तक
अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी।
परिसर
अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र
में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य
कला का अद्भुत नमूना था।
इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से
घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य
द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर
मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक
भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध
भगवान की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित थीं।
केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और
इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे। इनमें
व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में
तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के
होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल
के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर
की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक
इत्यादि रखने के लिए आले बने हुए थे।
प्रत्येक मठ के आँगन में एक कुआँ बना था।
आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक
प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष के
अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे तथा झीलें
भी थी।
प्रबंधन
समस्त विश्वविद्यालय का प्रबंध
कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे
जो भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे।
कुलपति दो परामर्शदात्री समितियों के
परामर्श से सारा प्रबंध करते थे। प्रथम
समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य
देखती थी और द्वितीय समिति सारे
विश्वविद्यालय की आर्थिक
व्यवस्था तथा प्रशासन की देख--भाल
करती थी। विश्वविद्यालय को दान में मिले
दो सौ गाँवों से प्राप्त उपज और आय
की देख--रेख यही समिति करती थी। इसी से
सहस्त्रों विद्यार्थियों के भोजन, कपड़े
तथा आवास का प्रबंध होता था।
आचार्य
इस विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के
आचार्य थे जो अपनी योग्यतानुसार प्रथम,
द्वितीय और तृतीय श्रेणी में आते थे।
नालंदा के प्रसिद्ध आचार्यों में शीलभद्र,
धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति और
स्थिरमति प्रमुख थे। 7वीं सदी में ह्वेनसांग
के समय इस विश्व विद्यालय के प्रमुख
शीलभद्र थे जो एक महान आचार्य, शिक्षक
और विद्वान थे। एक प्राचीन श्लोक से
ज्ञात होता है, प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ
एवं खगोलज्ञ आर्यभट भी इस
विश्वविद्यालय के प्रमुख रहे थे। उनके लिखे
जिन तीन ग्रंथों की जानकारी भी उपलब्ध है
वे हैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र।
ज्ञाता बताते हैं, कि उनका एक अन्य ग्रन्थ
आर्यभट्ट सिद्धांत भी था, जिसके आज मात्र
३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस ग्रंथ
का ७वीं शताब्दी में बहुत उपयोग होता था।
प्रवेश के नियम
प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी और
उसके कारण
प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते
थे। उन्हें तीन कठिन
परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था।
यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। शुद्ध
आचरण और संघ के नियमों का पालन
करना अत्यंत आवश्यक था।
अध्ययन-अध्यापन पद्धति
इस विश्वविद्यालय में आचार्य
छात्रों को मौखिक व्याख्यान
द्वारा शिक्षा देते थे। इसके अतिरिक्त
पुस्तकों की व्याख्या भी होती थी।
शास्त्रार्थ होता रहता था। दिन के हर पहर
में अध्ययन तथा शंका समाधान
चलता रहता था।
अध्ययन क्षेत्र
यहाँ महायान के प्रवर्तक नागार्जुन,
वसुबन्धु, असंग तथा धर्मकीर्ति की रचनाओं
का सविस्तार अध्ययन होता था। वेद, वेदांत
और सांख्य भी पढ़ाये जाते थे। व्याकरण,
दर्शन, शल्यविद्या, ज्योतिष, योगशास्त्र
तथा चिकित्साशास्त्र भी पाठ्यक्रम के
अन्तर्गत थे। नालंदा कि खुदाई में मिलि अनेक
काँसे की मूर्तियोँ के आधार पर कुछ
विद्वानों का मत है कि कदाचित् धातु
की मूर्तियाँ बनाने के विज्ञान
का भी अध्ययन होता था। यहाँ खगोलशास्त्र
अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था।
पुस्तकालय
नालंदा में सहस्रों विद्यार्थियों और
आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक
विराट पुस्तकालय था जिसमें ३ लाख से
अधिक पुस्तकों का अनुपम संग्रह था। इस
पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें
थी। यह 'रत्नरंजक' 'रत्नोदधि' 'रत्नसागर'
नामक तीन विशाल भवनों में स्थित था।
'रत्नोदधि' पुस्तकालय में अनेक अप्राप्य
हस्तलिखित पुस्तकें संग्रहीत थी। इनमें से
अनेक
पुस्तकों की प्रतिलिपियाँ चीनी यात्री अपने
साथ ले गये थे।

तमिल शरणार्थियों की समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक ध्यान दे- संघ




राष्टीय स्वंयसेवक संघ के  सरकार्यवाह श्री भैय्या जी जोशी का श्रीलंका के तमिल पीड़ितों की समस्याओं पर वक्तव्य
16 मार्च, 2013। जामडोली, जयपुर।

                गत वर्ष संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (यू.एन.एच.आर.सी.) की जेनेवा बैठक से ठीक पहले हमने यह वक्तव्य प्रसारित किया था कि श्रीलंका सरकार को अपने देश के तमिलों की समस्याओं का समाधान करने के लिए सक्रियतापूर्वक कदम उठा उनके उचित पुनर्वास, सुरक्षा एवं राजनैतिक अधिकारों को भी सुनिश्चित करे। मैं आज यह कहने को बाध्य हूँ कि एक वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी धरातल पर स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ है। इस कारण से वैश्विक जगत का श्रीलंका सरकार की मंशाओं के प्रति संदेह और गहरा हो गया है।
                मैं इस अवसर पर श्रीलंका सरकार को यह पुनर्स्मरण कराना चाहता हूँ कि वह 30 वर्ष के लिट्टे (एल.टी.टी.ई.) एवं श्रीलंका सुरक्षा बलों के मध्य हुए संघर्ष के परिणामस्वरूप हुई तमिलों की दुर्दशा पर आँख मुंदकर नहीं बैठ सकती, जिन्हें इस कारण अपने जीवन, रोजगार, घरों और मंदिरों को भी खोना पड़ा। एक लाख से अधिक तमिल आज अपने देश से पलायन कर तमिलनाडु के समुद्री किनारों पर शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं।
                 हमारा यह सुनिश्चित मत है कि श्रीलंका में स्थायी शांति तभी संभव है जब उस देश की सरकार उत्तरी एवं पूर्वी प्रान्तों तथा भारत में रहने वाले तमिल शरणार्थियों की समस्याओं पर गंभीरतापूर्वक एवं पर्याप्त रूप से ध्यान दे। हम भारत सरकार से यह आग्रह करते हैं कि वह यह सुनिश्चित करे कि श्रीलंका सरकार विस्थापित तमिलों के पुनर्वास तथा उन्हें पूर्ण नागरिक व राजनैतिक अधिकार प्रदान करने के लिए जिम्मेदारीपूर्वक व्यवहार करे।
                हमें ध्यान रखना ही होगा कि हिन्द महासागर क्षेत्र में स्थित यह पडोसी द्वीप, जिसके भारतवर्ष से हजारों वर्ष पुराने रिश्ते है, कहीं वैश्विक शक्तियों के भू-सामरिक खेल का मोहरा बन कर हिन्द महासागर का युद्ध क्षेत्र न बन जाए। उस देश के सिंहली व तमिलों के बीच की खाई को ओर अधिक बढाने के प्रयासों को सफल नहीं होने देना चाहिए। इसी में ही श्रीलंका के संकट का स्थायी हल निहित है।