रविवार, 10 मार्च 2013

महाशिवरात्रि : सृष्टि के सृजनकर्ता शिव और शक्ति स्परूपा पार्वती के मिलन का महान योग



सन २०१४ में यह पर्व २७ मार्च २०१४ को है
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सृष्टि के सृजनकर्ता शिव और शक्ति स्परूपा पार्वती के
मिलन के इस महान योग महाशिवरात्री की हार्दिक शुभकामनायें।
आज का दिन आपको मंगलमय हो...
  मार्च 2013
महाशिवरात्रि पर कल्याण के देवता की पूजा
शिव शब्द का अर्थ ही कल्याण है। भगवान शिव को कल्याणकर्ता इसलिए भी कहा गया है, क्योंकि उन्होंने सृष्टि का सृजन किया है। वे संपूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता हैं। वे निराकार और अनादि हैं। वे सदा हैं और सर्वदा रहें। इसीलिए उन्हें सदाशिव भी कहा गया है। इसका यह भी अर्थ है कि वे सदा ही सबका कल्याण करते हैं। उनकी विशेषता यह है कि वे आशुतोष अर्थात बहुत थोड़े से संतुष्ट होने वाले हैं। इसीलिए उनकी पहुंच तो सब तक है ही, वे भी सभी की पहुंच में हैं। उनकी प्रसन्नता के लिए केवल उनका ध्यान और थोड़ा-सा जल ही पर्याप्त है। उनकी कोई जन्मतिथि नहीं है, क्योंकि जब से यह संसार है, वे तभी से हैं। बल्कि उसके पहले से हैं और जब प्रलय में सारी सृष्टि विलीन हो जाएगी, तब भी केवल वे ही रहें। इसीलिए वे शाश्वत हैं। यही कारण है अन्य देवताओं की जहां जयंती या प्राकट्य दिवस मनाया जाता है, शिवजी के विवाह की रात्रि महारात्रि (इस बार १० मार्च 2013) के रूप में व्रत-उपवास के साथ मनाई जाती है। कारण यह सृजन का पर्व है और सृजन का ही संदेश देता है। प्राय: रामायण, महाभारत सहित सभी प्रमुख पुराणों में भगवान शिव के विवाह की कथा अत्यंत विस्तार से मिलती है। जहां पूर्व पत्नी देवी सती के अग्नि स्नान के बाद भगवान शिव ने नए सिरे से देवी पार्वती का पाणिग्रहण किया। पाणिग्रहण अर्थात विवाह की यही रात्रि महाशिवरात्रि के रूप में अनंतकाल से सनातन धर्मावलंबियों के बीच पूज्य पर्व के रूप में मनाई जाती है।

अनंत रूपधारी शिव
भगवान शिव निराकार हैं। वे सर्वव्याप्त हैं, अत: उनका कोई निश्चित स्वरूप नहीं है। वे निराकार हैं, अत: लिए रूप में पूजे जाते हैं। उनके साकार रूप की परिकल्पना भी भक्तों ने की है। उन्हें हिमालय और श्मशान का वासी बताया है तो जटाजूटधारी, सर्पविभूषित, चंद्र मंडित, रूद्राक्ष से शृंगारित, बाघंबर लपेटे और नंदी की सवारी करने वाला भी निरूपित किया गया है। उन्हें पशुपति भी कहा गया है, जिसकी व्याख्या यह दी गई है कि मनुष्य और प्राणीमात्र पशु हैं, जो शिव अर्थात पति, अर्थात स्वामी के पाश से बंधे हैं। उनके साकार स्वरूप के नाना वर्णन पुराणों और शास्त्रों में मिलते हैं। एक मुख, तीन मुख, पंच मुख के अलावा अनंत मुखों से भी शिव के स्वरूप को व्यक्त किया गया है। उनके पूजनक्रम में पश्चिम मुख मंडल का पृथ्वीतत्व के रूप में, उत्तर मुख को जल तत्व के रूप में, दक्षिण मुख को तेजस तत्व के रूप में, पूर्व मुख मंडल को वायुतत्व के रूप में तथा उध्र्व मुखमंडल का आकाश तत्व के रूप में अर्चन करने का विधान हमारे ग्रंथों में उल्लेखित है। इस तरह पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि एवं आकाश जो कि परम तत्व हैं और जिनसे सारी सृष्टि चर-अचर का निर्माण हुआ है इनका संरक्षण-पोषण व पूजन किया जाता है।

चारों प्रहरों में करें शिव की पूजा
१० मार्च को सूर्योदय के समय पूर्वी क्षितिज पर कुंभ राशि का उदय रहेगा। लग्न में सूर्य चंद्र शुक्र बुध की उपस्थिति पंचमेष बुध व लाभेष धनेष गुरु का वर्गोत्तमी होना शुभ एवं कल्याणकारी बना है। उसी तरह पराक्रमेश व राग्येश मंगल का मित्र राशि का होकर धन भाव में होना राग्यसत्ता को सशक्त व समृद्धशाली बनाने वाला योग बना है। शिवरात्रि पर चारों प्रहरों में शिवजी का पूजन करना चाहिए।

प्रथम प्रहर सूर्यास्त ६.३० बजे से रात्रि ९.३४ बजे तक रहेगा। यहीं से दूसरा प्रहर प्रारंभ होकर मध्यरात्रि १२.२५ बजे तक रहेगा। पश्चात तीसरे प्रहर का पूजन होकर चौथा प्रहर अपर रात्री ३.४० बजे से प्रारंभ होगा। इन चारों प्रहरों में भक्तों को सदाशिव का शोडषोपचार से पूजन करते हुए प्रत्येक प्रहर में बीजयुक्त फलों से अघ्र्य निवेदन कर ऋतुफल, सूखे मेवे, मिष्ठान अर्पण करते हुए आरती-कीर्तन व जागरण कर शिवजी की भक्ति करनी चाहिए।

शिवरात्रि पर आए ग्रह गोचर समूचे राष्ट्र के लिए श्रेष्ठ संयोग बना रहे हैं। लग्न में शुक्र का अपनी मित्र राशि कुंभ में होना श्रेष्ठतम बना हुआ है। देश के आर्थिक विकास के लिए उत्तम है। कूटनीति एवं सद्भाव द्वारा देश का चहुमुंखी विकास होगा। विदेशों में भारत की साख बढ़ेगी।

मंगल पराक्रमेष व राग्येष होकर धन भाव में मित्र राशि में स्थित है। एतदर्थ जहां एक ओर शत्रुहन्ता हैं वहीं योजनाओं को गति प्रदान करने में सक्षम हुआ है। भगवान शिव सभी विपदाओं का समूल पराभव कर देशोन्नति करें इन्हीं भावनाओं के साथ स्नान कर पुण्य अर्जित र सकेंगे।

पूजा में इनका करें उपयोग
शिव पूजा में दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, बिल्वपत्र, ऋतुफल, पुष्प, जनेऊ, श्रीफल, सुपारी, गंंध, अक्षत, पंचमेवा, धूप-दीप, नैवेद्य आदि का अर्पण करना चाहिए।

- पं. श्यामनारायण व्यास

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