रविवार, 10 मार्च 2013

सृष्टि सृजन का महापर्व,महाशिवरात्रि - प्रो रजनी भारद्वाज





महाशिरात्री जिसकी सुबह सृष्टि की सृर्जक होती है।

सृष्टि के सृजनकर्ता शिव और शक्ति स्परूपा पार्वती के

मिलन के इस महान योग महाशिवरात्री की हार्दिक शुभकामनायें।

आज का दिन आपको मंगलमय हो...


शिव--महापर्व शिवरात्रि...

संकलन- रजनी भारद्वाज

शिव ईश्वर का संहारक रूप हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं।
इनकी अर्धाङ्गिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र स्कन्द और गणेश हैं।
शिव अधिक्तर योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा लिंग के रूप में की जाती है ।
भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं।
अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है।
सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं।
शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं।
शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं।
शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है।
शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है।
वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं।
गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं।
सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं।
शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है।
वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं।
शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबद्ध हैं।
चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं।
सप्तम भाव का कारक शुक्र शिव शक्ति के सम्मिलित प्रयास से प्रजा एवं जीव सृष्टि का कारण बनता है।
महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है।
शिव ने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर उसे नियंत्रित कर गंगा की अविरल धारा को पृथ्वी पर प्रवाहित किया वहीं दूसरी ओर समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को पीकर उसे कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया। उस कालकूट विष के प्रभाव से शिव जी का कण्ठ नीला पड़ गया। इसीलिये महादेव को नीलकण्ठ कहते हैं।
भगवान शिव को अनेक नामों से पुकारा जाता है
• रूद्र - रूद्र से अभिप्राय जो दुखों का निर्माण व नाश करता है।
• पशुपतिनाथ - भगवान शिव को पशुपति इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह पशु पक्षियों व जीवआत्माओं के स्वामी हैं
• अर्धनारीश्वर - शिव और शक्ति के मिलन से अर्धनारीश्वर नाम प्रचलित हुआ।
• महादेव - महादेव का अर्थ है महान ईश्वरीय शक्ति।
• भोला - भोले का अर्थ है कोमल हृदय, दयालु व आसानी से माफ करने वाला। यह विश्वास किया जाता है कि भगवान शंकर आसानी से किसी पर भी प्रसन्न हो जाते हैं।
• लिंगम - यह रोशनी की लौ व पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक है।
• नटराज - नटराज को नृत्य का देवता मानते है क्योंकि भगवान शिव तांडव नृत्य के प्रेमी हैं।
शिवरात्रि
ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि।
प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है।
इस दिन शिवोपासना भुक्ति एवं मुक्ति दोनों देने वाली मानी गई है, क्योंकि इसी दिन अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे।
शिवरात्रि व्रत की पारणा चतुर्दशी में ही करनी चाहिए।
शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प, प्रसाद मे भान्ग अति प्रिय हैं।
एवम इनकी पूजा के लिये दूध,दही,घी,शकर,शहद इन पांच अमृत जिसे पन्चामृत कहा जाता है
माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि। ॥ शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ॥
ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं।
यद्यपि चतुर्दशी का चंद्रमा क्षीण रहता है, लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं।
यह काल वसंत ऋतु के वैभव के प्रकाशन का काल है। ऋतु परिवर्तन के साथ मन भी उल्लास व उमंगों से भरा होता है। यही काल कामदेव के विकास का है और कामजनित भावनाओं पर अंकुश भगवद् आराधना से ही संभव हो सकता है। भगवान शिव तो स्वयं काम निहंता हैं, अत: इस समय उनकी आराधना ही सर्वश्रेष्ठ है।
मारक या अनिष्ट की आशंका में महामृत्युंजय शिव की आराधना ग्रहयोगों के आधार पर बताई जाती है।
बारह राशियां, बारह ज्योतिर्लिगों की आराधना या दर्शन मात्र से सकारात्मक फलदायिनी हो जाती है।
12 ज्योतिर्लिंग :-
1- सोमनाथ,सोमनाथ मंदिर, सौराष्ट्र क्षेत्र, गुजरात
2- महाकालेश्वर,श्रीमहाकाल , महाकालेश्वर , उज्जयिनी (उज्जैन)
3- ॐकारेश्वर,ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर, ॐकारेश्वर,
4- केदारनाथ,केदारनाथ मन्दिर,रुद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड
5- भीमाशंकर,भीमाशंकर मंदिर, निकट पुणे, महाराष्ट्र
6- विश्वनाथ,काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी , उत्तर प्रदेश
7- त्र्यम्बकेश्वर मन्दिर,त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग मन्दिर, नासिक, महाराष्ट्र
8- रामेश्वरम,रामेश्वरम मंदिर, रामनाथपुरम, तमिल नाडु
9- घृष्णेश्वर,घृष्णेश्वर मन्दिर, दौलताबाद, औरंगाबाद , महाराष्ट्र
10- बैद्यनाथ,देवघर, झारखंड
11- नागेश्वर,नागेश्वर मन्दिर, द्वारका, गुजरात
12- श्रीशैल,श्रीमल्लिकार्जुन, श्रीशैलम (श्री सैलम) , आंध्र प्रदेश

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें