शुक्रवार, 31 मई 2013

नक्सलवाद : सिर्फ आतंकवाद



यह लेख भास्कर समाचार पत्र का है ,
कुछ बातें समझनें में दिक्कत हो सकती हे
31 May-2013
अकसर कहा जाता है, कि जनजातियों और नक्सलियों में फर्क करना मुश्किल होता है। ये चुनौती तो रहेगी ही। कश्मीर में भी तो पता किया ही जाता है कि कौन पाकिस्तानी है और कौन हिंदुस्तानी?
अकसर कहा जाता है, कि जनजातियों और नक्सलियों में फर्क करना मुश्किल होता है।
ये चुनौती तो रहेगी ही। कश्मीर में भी तो पता किया ही जाता है कि कौन पाकिस्तानी है और कौन हिंदुस्तानी?
प्रधानमंत्री से लेकर सेना के अधिकारी तक कह चुके हैं कि नक्सली हमारे ही लोग हैं। उन पर गोलियां कैसे चला सकते हैं?
ये कैसा तर्क है। कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में सेना तैनात है। गड़बड़ी होने पर गोली भी चलाते हैं। हमारे ही लोगों पर।
कहते हैं नक्सली आदिवासी और ग्रामीणों को डराकर आतंक फैलाते हैं। इसलिए ग्रामीण सुरक्षाबलों का साथ नहीं देते।
झूठ है। सुरक्षाबलों को नक्सलियों के पूरे सफाए का आदेश नहीं हैं, तो ग्रामीण भरोसा क्यों करेंगे।

...कि वे छुपकर युद्ध करते हैं
कुछ रणनीतिकार तर्क देते हैं कि माओवादी छापामार युद्ध करते हैं। इसका फायदा उन्हें मिलता है। हास्यास्पद है ये तर्क। आखिर कोई दुश्मन सामने से हमला क्यों करेगा।
ये सिर्फ बहाना है, हमारे सुरक्षाबलों के पास सभी साधन हैं, जो उनकी हर लोकेशन और गतिविधि का पता कर सकें।

आंध्र प्रदेश से आए नक्सलियों को रातों-रात महाराष्ट्र, उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ के जंगलों की जानकारी कैसे हो सकती है! जबकि सुरक्षा बलों के पास तो जीपीएस जैसी आधुनिक तकनीक है।
कहते हैं कि नक्सली स्थानीय लोग हैं और उन्हें वहां की जानकारी रहती है। जबकि बाहर से आए सुरक्षाबल स्थानीय ग्रामीण और आदिवासी लोगों की जानकारी पर निर्भर हैं।
दोष मढऩा कि सुरक्षा बलों के पास ट्रेनिंग की कमी है
बड़े नक्सली हमले के बाद बहाना बनाया जाता है कि सुरक्षाबलों की ट्रेनिंग कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए होती है। लड़ाई के लिए नहीं। ये बात २०१० में ७६ सीआरपीएफ के जवानों की हत्या के बाद केंद्र की कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी की बैठकक में कही गई।
हकीकत ये है कि सीआरपीएफ के जवानों को आर्मी युनिट में ट्रेनिंग देकर ही नक्सल इलाके में भेजा जाता है। ये बात और है कि उन्हें हमले की छूट नहीं होती।
आड़ लेना, कि वे हमारे ही लोग हैं
झूठ, कि नक्सली पहचाने नहीं जाते
बहाना, कि नक्सलियों को पूरे इलाके के चप्पे-चप्पे का पता है
कहना कि नक्सलियों को है ग्रामीणों का साथ
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31 May-2013
सही फैसले, जो माओवाद के खिलाफ लिए
सही फैसले, जो माओवाद के खिलाफ लिए
टर्निंग पॉइंट, जिससे भड़की नक्सली हिंसा
जवानों की हत्या-दर-हत्या से भी फर्क न पड़ा
2008 में उड़ीसा के बलीमेला में नक्सलियों ने एंटी-नक्सल फोर्स ग्रेहाउंड्स जवानों की नाव पर हमला किया। हमले में नाव डूब गई और 38 जवानों की मौत हो गई थी।
समन्वय नहीं बना : ग्रेहाउंड्स ने आंध्र से नक्सलियों का सफाया कर दिया। दूसरे राज्यों से समन्वय न होने कारण नक्सली वहां पनपे।
पेट में बम प्लांट, इस नृशंसता पर भी खून न खौला
2013 झारखंड में नक्सलियों ने सीआरपीएफ जवान बाबुलाल पटेल को मारा और फिर उनका पेट फाड़कर उसमें 2 किलो का बम फिट किया। इसका खुलासा पोस्टमार्टम के दौरान हुआ।
हौसले पस्त करने की साजिश : नक्सली अपनी क्रूरता दिखाकर सुरक्षाबलों का मनोबल तोडऩा चाहते थे।
सलवा जुडूम से परेशान हो भड़के नक्सली
२००५ में महेन्द्र कर्मा ने बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ एक संगठन खड़ा किया। नाम था सलवा जुडूम। इसके सदस्य माओवादियों को निशाना बनाते।
पहली बार डरे: सलवा जुडूम की कार्रवाई से नक्सलियों में खौफ पैदा हुआ। २५ मई को हुआ ताजा हमला भी उसी बौखलाहट के कारण था।









इंदिरा गांधी ने नक्सलियों के खिलाफ सेना लगाई
1968 में पश्चिम बंगाल में इंदिरा गांधी ने नक्सलियों को खत्म करने के लिए जनरल सैम मानेक शॉ को कह कर सेना तैनात की थी। मानेकशॉ के उत्तराधिकारी जनरल जेएफआर जैकब ने हाल ही इंटरव्यू में इसकी तस्दीक की है।
आंध्र में पीडब्लूजी पर बैन, लगभग खत्म हुए नक्सली
आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनते ही एन जनार्दन रेड्डी ने 1992 में आंध्र में पीपुल्स वॉर ग्रुप पर प्रतिबंध लगाया। नक्सली युद्ध चाहते थे, तो उन्हीं की भाषा में जवाब दिया। दो साल में नक्सली खत्म।
तीन साल बाद एक बाद फिर सेना उतरी उनसे लडऩे
इसके बाद 1971 में बांग्लादेश युद्ध से ठीक पहले सेना ने नक्सलियों के खिलाफ अक्टूबर में 45 दिन का अभियान चलाया था। इसमें न सिर्फ पैदल सेना की 20वीं डिवीजन बल्कि 50 पैरा ब्रिगेड को भी लगाया गया था।
छत्तीसगढ़ में उतारे मिजो और नागा जवान, बस्तर में कुछ साल पहले नागा और मिजो बटालियन लगाई गई थीं। जंगलों और पहाड़ों में पले, बढ़े इन जवानों ने नक्सलियों की नाक में दम कर दिया। वे इतनी तेजी से चलते कि नक्सली हैरान रह जाते।
अगवा पुलिस अफसर को युद्धबंदी बताने पर भी कुछ नहीं किया
2009 में प. बंगाल के झारग्राम के थाना प्रभारी अतिंद्रनाथ दत्ता को अगवा किया। छोड़ा गया तो गले में लाल बैनर टांगकर। बैनर पर लिखा था 'युद्धबंदी'।
कैसे बढ़े हौसले : घटना के बाद नक्सलियों ने अपने आतंक को जाहिर करने के लिए कई बार अफसरों और नेताओं को अगवा किया और अपनी जन अदालतों में उनकी हत्या भी की।
जहानाबाद जेल तोड़ी फिर भी चुप रही सरकार
2005 बिहार की जहानाबाद जेल पर हमला किया। जेल के सुरक्षाकर्मी परास्त होकर भाग गए। नक्सली अपने 341 साथियों को छुड़ा ले गए। और विरोधी रणवीर सेना के जेल में बंद लोगों को अगवा कर लिया और मार डाला।
सिर्फ सांकेतिक कार्रवाई : सिर्फ जेलर को ही सस्पेंड किया गया। जेल के आसपास फेंसिंग की गई। नक्सलियों के खिलाफ किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं।
झूठे बहाने, जिनकी वजह से मुकाबला हो ही नहीं पा रहा है
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31 May-2013
माओवादी नेता कनु सान्याल को तो सीधे चीन से मदद मिलती थी। ये खुद उसी ने स्वीकार किया है। बताया कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद चीन से उसे बताया गया कि कैसे वह भारत में माओवाद फैला सकता है। उसे भारत में भी कम्युनिस्ट क्रांति लाने को कहा गया। फिर क्या था, उसने देश में कम्युनिस्ट पार्टी (माले) बनाई। उसकी पहल पर कई जगह कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट क्रांति के नाम पर संगठन बने। पश्चिम बंगाल के कुछ वामपंथी मीडिया ने इसकी बातों का समर्थन करते हुए लेख भी छापे। सान्याल पूरे राष्ट्र की संपत्ति को सभी लोगों में बराबर बांटने की वकालत करता था। लेकिन उसकी बैठकों में वह आतंक फैलाने और सरकार को कमजोर करने के भाषण देता। 1972 में चारू मजूमदार की मौत के बाद नक्सली आंदोलन बिखर गया। अलग-अलग गुट हत्याएं करने में जुट गए।


माओवादी नेता कनु सान्याल को तो सीधे चीन से मदद मिलती थी। ये खुद उसी ने स्वीकार किया है। बताया कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के बाद चीन से उसे बताया गया कि कैसे वह भारत में माओवाद फैला सकता है। उसे भारत में भी कम्युनिस्ट क्रांति लाने को कहा गया। फिर क्या था, उसने देश में कम्युनिस्ट पार्टी (माले) बनाई। उसकी पहल पर कई जगह कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट क्रांति के नाम पर संगठन बने। पश्चिम बंगाल के कुछ वामपंथी मीडिया ने इसकी बातों का समर्थन करते हुए लेख भी छापे। सान्याल पूरे राष्ट्र की संपत्ति को सभी लोगों में बराबर बांटने की वकालत करता था। लेकिन उसकी बैठकों में वह आतंक फैलाने और सरकार को कमजोर करने के भाषण देता। 1972 में चारू मजूमदार की मौत के बाद नक्सली आंदोलन बिखर गया। अलग-अलग गुट हत्याएं करने में जुट गए।

भास्कर लाया है

देश में पहली बार

वामपंथी फैशन में शहरों तक पहुंचा जहर

चीन से इशारा मिला, कनु ने फैला दिया आतंक

कारण, नक्सलवाद पैदा होने के

नक्सलबाड़ी विद्रोह को भुनाया और आतंकी टोलियां बनाईं

35 बिंदुओं में नक्सलियों का इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान, सैन्य विज्ञान भाषा और गणित। सबकुछ।
नक्सली नृशंसता की सारी हदें पार कर चुके हैं। नेताओं को मार, उनकी लाशों पर नाच रहे हैं। लाश पर बंदूक और चाकू चला रहे हैं। इस घटना ने देश को झकझोर दिया है।

70 के दशक में वामपंथ को कथित बुद्धिजीवियों में बहुत लोकप्रियता मिली। इसके पक्षधर खुद को प्रगतिवादी या कामरेड कहलाना पसंद करते। कई आईआईटी और अन्य कॉलेज के ड्रॉपआउट्स इस आंदोलन से जुड़े। वे आदिवासियों और भूमिहीन मजदूरों के संघर्ष की वकालत करते। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू), नई दिल्ली तो वामपंथियों का स्थायी ठिकाना बन गया। जब नक्सली हिंसा करते तो ये न सिर्फ उसका समर्थन करते, बल्कि रैली निकालकर, प्रदर्शनी लगाकर सरकार को ही दोषी ठहराते। कुछ लेखकों और बुद्धिजीवियों के ऐसे भाषणों और लेखों को विदेशी मीडिया में जगह भी मिलती और तारीफ भी। हालांकि जैसे-जैसे नक्सलियों की क्रूर और कायराना करतूतें सामने आईं, वैसे-वैसे बुद्धिजीवियों की दिलचस्पी भी नक्सलियों में कम हुई।

२ मार्च 1967, पश्चिम बंगाल के छोटे से गांव नक्सलबाड़ी में एक आदिवासी किसान बिमल को कोर्ट से आदेश के बावजूद जमीन का कब्जा नहीं मिला। जब वह मौके पर पहुंचा तो जमींदार ने उस पर हमला भी किया। इस घटना का विरोध पूरे गांववालों ने किया और नतीजे में जिन जमीनों पर जमींदार का कब्जा था उसे गांववालों ने अपने कब्जे में ले लिया। पुलिस मौके पर पहुंची। सिलीगुड़ी किसान सभा के प्रमुख जंगल संथाल के नेतृत्व में ग्रामीणों ने तीर कमान से एक इंस्पेक्टर को ही मार डाला। लोगों के इस आक्रोश को माओ समर्थक चारू मजूमदार ने भुनाया। वे इस संघर्ष की कहानी को गांव-गांव में ले गए। लोगों को भड़काया। आतंक फैलानेवाली टोलियां बनाईं। दो महीने में ऐसे ही संघर्ष बिहार, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु के माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में हुए। और फिर हिंसा पसरती ही गई। जंगल संथाल जैसे लोगों ने भी मजूमदार को समर्थन दे दिया। चारू मजूमदार ने इस दौरान जो आठ लेख लिखे, उसे माओवादी आज भी अपनी विचारधारा का सर्वोच्च डॉक्यूमेंट मानते हैं।
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31 May-2013
२०००
ञ्च २००८  २३१
ञ्च २००९  ३१७
ञ्च २०१०  २८५
ञ्च २०११  १४२
ञ्च २०१२  ११४
आंकड़े, जो बताते हैं नक्सली सिर्फ आतंकी
२०११
ञ्च २००८  ४९०
ञ्च २००९  ५९१
ञ्च २०१०  ७२०
ञ्च २०११  ४६९
ञ्च २०१२  ३००
२०१०    २००९
१४१२     १७६०
२२१३     २२५८
१५९१     2००८
१०००     १५००
२५००

२००९-२०१० में जब देश की सरकार और सुरक्षाबल विधानसभा और लोकसभा चुनाव में उलझे थे, तभी लोगों और पुलिसकर्मियों को ज्यादा खून बहा।

पुलिसकर्मियों की हत्या ये कहकर की जाती थी कि वे लोगों पर अत्याचार करते हैं। लेकिन जब १९९० के दशक में सीआरपीएफ तैनात हुई, तो उन्होंने और बड़े हमले किए।

पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में तो दबदबा कायम रखने के लिए नक्सली जनअदालत लगाते हैं। और किसी भी व्यक्तिको सुरक्षाबलों का मुखबिर बताकर गोली मार देते हैं।

नक्सली वारदात

सुरक्षाबलों की हत्या

आम लोगों की हत्या
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31 May-2013
>१०


>१०

छत्तीसगढ़ की दरभा घाटी में कांग्रेस नेताओं पर हुए हमले में घायल पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल।

आपबीती, नक्सली आतंक और शोषण की
बस्तर की रहने वाली माधुरी। नक्सली इलाके में मौजूद गांव में मां और दो बहनों के साथ रहती थी। दस साल की थी, जब कुछ लोग घर आए। कहा, पिता नहीं हैं, हमारे साथ चलो। पार्टी का काम करो। पैसे मिलेंगे। जंगल के भीतर बने कैंप में लाकर १२बोर की बंदूक थमा दी। माधुरी कहती है, कुछ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन संतोष ये था कि खाने को मिल रहा था। जो घर पर दूभर था। कैंप में उसे पहला काम मिला कैम्प के लोगों को ए बी सी डी पढ़ाना। दूसरा काम, पकड़कर लाए गए पुलिसवाले को दस डंडे मारने का। लेकिन माधुरी तब सिहर उठी, जब उसी के सामने उस पुलिसवाले का गला एक नक्सली ने रेत दिया। अब उसे एम्बुश लगाना, बम चलाना, हमला करना सिखाया जाने लगा। वह बताती है आंध्र के नक्सली बस्तर के नक्सलियों को हमेशा छोटी रैंक पर रखते हैं। आंध्र के नक्सली बस्तर की लड़कियों से जबर्दस्ती शादी करते हैं। उस पर भी दबाव डाला गया। लेकिन वह बच निकली। वह कहती है नक्सली शादी करें तो लड़के की नसबंदी करवा दी जाती है। ताकि बच्चे पैदा न कर सकें। लेकिन कमांडर चार बीवियां भी रख सकता है।

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भयंकर भूल, जिन पर आज तक पछता रहे हैं हम

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चुनाव में नक्सलियों से मदद मांगना
एनटीआर के कार्यकाल में नक्सलियों ने अपना नेटवर्क खूब बढ़ाया। 1989 में कांग्रेस के एम. चेन्ना रेड्डी तो एनटीआर से एक कदम आगे निकल गए। एनटीआर को हराने के लिए उन्होंने चुनाव में खुलकर नक्सलियों से समर्थन मांगा। रेड्डी के मुख्यमंत्री बनते ही नक्सलियों ने हैदराबाद में बड़ी रैली की। राज्यभर में जनअदालतें लगाईं। और ये सिलसिला पूरे देश में फैल गया।
एनटीरआर ने नक्सलियों को सच्चा देशभक्त बताया, पुलिस को रोका
1982 में तेलुगूदेशम पार्टी नेता एनटी रामाराव ने कहा नक्सली सच्चे देशभक्त, सरकारों ने उन्हें समझने में गलती की है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने पुलिस को माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई से मना किया।
वे फिर एक हो रहे थे और हम तब भी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे
अप्रैल 1980 में कोंडापल्ली सीतारमैया ने आंध्र प्रदेश में सक्रिय पांच नक्सली गुटों में एकता स्थापित कर बनाया पीपुल्स वॉर ग्रुप (पीडब्ल्यूजी)। चारू मजूमदार के 'वर्ग संघर्ष' के सिद्धांत से अलग उन्होंने नक्सलियों को नारा दिया - लोगों को जोड़ो।
नक्सलियों की गुटबाजी के बावजूद उन्हें नेस्तनाबूद नहीं कर पाए
१९७० के दशक में नक्सलियों में मतभेद उभरे और वे गुटों में बंटते चले गए। एक अनुमान के अनुसार 1980 के आसपास 30 नक्सली गुट और उनके 30 हजार सदस्य देशभर में सक्रिय थे। फिर भी सुरक्षाबल उन्हें खत्म करने की इजाजत नहीं दी गई।
फैसले से पहले वायुसेना प्रमुख का विरोध करना
२०१० में 76 सीआरपीएफ जवानों की हत्या के बाद सेना-वायुसेना को तैनात करने की बात आई। कोई फैसला होता उससे पहले ही वायुसेना प्रमुख पी.वी. नाइक ने कह दिया मैं इससे सहमत नही हूं।
७६ हत्याओं के बाद भी वार्ता की पेशकश करना
अप्रैल २०१० में नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में ७६ सीआरपीएफ जवानों की हत्या की लेकिन अगस्त में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि नक्सली हमारे अपने लोग हैं और सरकार उनके साथ बातचीत के लिए तैयार है।

गिल को लाकर काम न करने देना
पंजाब से आतंकवाद खत्म करने वाले डीजीपी केपीएस गिल को २००६ में छत्तीसगढ़ सरकार का एडवाइजर बना कर लाया गया। गिल ने बाद में बयान दिया की उन्हें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने कहा, बैठो और सैलरी लो।

पुलिस को मॉडर्न बनाने के लिए पैसे तो आए, खर्च ही नहीं कर पाए
कैग के मुताबिक २००० से २००९ के बीच केंद्र ने राज्यों को पुलिस के आधुनिकीकरण के लिए ८९०० करोड़ रुपए दिए। लेकिन राज्य सरकारें सिर्फ ६९० करोड़ रुपए ही खर्च कर पाईं। जबकि झारखंड ने १२० जवानों के लिए ११४ वाहन खरीदे और १३५ जवानों की दो बटालियन के लिए १४७० ऑटोमैटिक राइफलें खरीद डालीं।

जांच पर जांच, पर हर रिपोर्ट ठंडे बस्ते में
७६ सीआरपीएफ जवानों की हत्या की जांच में पाया गया कि उन्होंने नियमों का पालन नहीं किया थ। छोटी-छोटी टुकडिय़ों में चलने के बजाय वे एकसाथ चल रहे थे। इन रिपोर्ट से सबक किसी ने नहीं लिया। यही गलती हाल ही में कांग्रेस नेताओं पर हुए नक्सली हमले में भी नजर आई। सभी एक साथ चल रहे थे।
नक्सलबाड़ी विद्रोह को वर्गसंघर्ष मानकर छोड़ देना
18 मई 1967। कानू सान्याल ने जमींदारों के खिलाफ संघर्ष का एलान किया। 24 मई को जंगल संथाल के नेतृत्व में जमींदार पर हमला। पकडऩे आई पुलिस पार्टी को ही मार डाला। इसके बावजूद सरकार ने उन्हें यूं छोड़ दिया जैसे वे गरीबों के लिए आवाज उठाने वाले मसीहा हों।

गुरुवार, 30 मई 2013

मनरेगा में न्यूनतम मजदूरी तक नहीं देना चाहती कांग्रेस

कांग्रेस की खुल गई पोल , सामने आया असली चेहरा
मनरेगा में न्यूनतम मजदूरी तक नहीं देना चाहती कांग्रेस
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अरूणा राय ने छोड़ी सोनिया की एनएसी

30 May 2013
नई दिल्ली। सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति (एनएसी) से अब इसकी सबसे सक्रिय और पुरानी सदस्य अरूणा राय ने भी किनारा कर लिया है। इतना ही नहीं उन्होंने एनएसी की सिफारिशों को नहीं मानने को लेकर संप्रग सरकार को जम कर लताड़ा भी है। सोनिया ने पत्र लिख कर उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। एक तरफ जहां सरकार और कांग्रेस पार्टी आम चुनाव से पहले अपनी छवि चमकाने की जी-तोड़ कोशिश में जुटी है, ठीक उसी समय इसकी छवि को एक और झटका लगा है। अरूणा राय ने इसी महीने की 11 तारीख को सोनिया गांधी को लंबी चि_ी लिख कर साफ कर दिया कि अब वे एनएसी से और नहीं जुड़ी रह सकतीं। उन्होंने खास तौर पर मनरेगा में काम करने वालों को न्यूनतम मजदूरी नहीं देने के लिए सरकार को आड़े हाथों लिया है। अरूणा ने तो यहां तक कहा है कि उन्हें समझ नहीं आता कि कैसे भारत जैसा देश अपने लोगों को न्यूनतम मजदूरी तक देने से इंकार कर सकता है और इसके बाद भी सभी के विकास की बात कर सकता है। उन्होंने प्रधानमंत्री को भी निशाना बनाया है। अरूणा के मुताबिक कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद उसे मानते हुए लोगों को न्यूनतम मजदूरी देने की जगह प्रधानमंत्री ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना सही समझा। सुप्रीम कोर्ट ने भी जब इस पर सरकार की मदद करने से इंकार कर दिया तब भी वे नहीं माने। इस सरकार के दौरान सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून और महात्मा गांधी रोजगार गारंटी (मनरेगा) योजना जैसे बड़े कदमों के पीछे अहम भूमिका निभाने वाली अरूणा ने सोनिया से कहा है कि वे यह सुनिश्चित करें कि लोकपाल , लोक शिकायत कानून और भ्रष्टाचार को उजागर करने वालों को सुरक्षा देने वाले व्हिशल ब्लोअर कानून को जल्दी से जल्दी लाया जाए। सोनिया गांधी ने 20 मई को जवाबी चि_ी में उनके अब तक के सहयोग की तारीफ करते हुए एनएसी से अलग रखने का अनुरोध मान लिया है।
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यूं ही नहीं हटीं अरुणा रॉय एनएसी से

29 May 2013
-मनरेगा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी की अनुशंसा अस्वीकार करने से खफा
जागरण संवाददाता, लखनऊ :
मजदूर किसान शक्ति संगठन की संस्थापक व नेशनल एडवायजरी कमेटी (एनएसी) की सलाहकार अरुणा रॉय अब मजदूरों के हित में काम करना चाहती हैं। उन्होंने एनएसी अध्यक्ष सोनिया गांधी से अब आगे काम न कर पाने का अनुरोध किया है। अरुणा का कहना है कि उनके नाम पर अगले कार्यकाल के लिए विचार न किया जाए। वह कहती हैं कि एनएसी से बाहर रहकर वह सामाजिक सरोकारों के अभियानों के लिए काम करना चाहती हैं।
हालांकि अरुणा का यह फैसला उतना सामान्य भी नहीं जितना वह जताती हैं। बख्शी का तालाब में आयोजित सेमिनार पारदर्शिता एवं खुलासा में शिरकत करने आईं अरुणा ने बताया कि एनएसी द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट (मनरेगा) के क्रियांवयन से जुड़े कई सुझाव दिए गए थे। सलाहकार समूह द्वारा इन संस्तुतियों को ग्राम्य विकास मंत्रालय को भेजा गया था। उन्होंने कहा कि मनरेगा लाभार्थियों का एक बहुत बड़ा समूह है जो इसकी आलोचना तो करता है किंतु इस विधेयक का समर्थन भी करता है। इस व्यापक समूह का सार्वजनिक व राजनीतिक स्थान एक ऐसे छोटे, मुखर व सत्ता संपन्न अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा छीना जा रहा है जो मनरेगा के आधारभूत उद्देश्यों को कम आंकने पर आमादा है। वह कहती हैं कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा मनरेगा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी की दर से वेतन दिए जाने की अनुशंसा को अस्वीकार कर दिया गया। रॉय कहती हैं कि प्रधानमंत्री ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील करने का निर्णय लिया है। उससे भी अधिक परेशानी की बात यह है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा कर्नाटक उच्च न्यायालय के मनरेगा मजदूरों के फैसले पर जो स्थगन आदेश दिया है सरकार ने उसे भी नहीं माना और मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी देने से इंकार कर दिया है। अरुणा इसे लेकर काफी क्षुब्ध हैं। उनका कहना है कि यह समझना मुश्किल हो गया है कि जो सरकार समानता मूलक विकास का दावा करती है वह ऐसा कैसे कर सकती है। वह कहती हैं कि न्यूनतम मजदूरी का भुगतान करने के लिए सरकार को तैयार करने के लिए एनएसी के बाहर काम किया जाना चाहिए।
देश में कुपोषण और भूख की स्थिति के मद्देनजर खाद्य सुरक्षा बिल पर चर्चा करके उसे अब तक पारित कर दिया जाना चाहिए था। बिल के विविध प्रावधानों पर एनएसी तथा सार्वजनिक क्षेत्र में स्वस्थ और विस्तृत संवाद हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि संसद यदि इसे उठाती तो यह एक मजबूत व जन समर्थित विधेयक हो सकता था। पारदर्शिता व जवाबदेही कार्यकारी समूह ने भी कई मुद्दे उठाए हैं। इसमें लोकपाल, शिकायत प्रकोष्ठ, व्हीसल ब्लोअर बिल आदि शामिल हैं। इनमें से कई विधेयकों को अब संसदीय समिति से मंजूरी दी जा चुकी है और उसे अब अविलंब पारित किए जाने की की जरूरत है। अरुणा कहती हैं कि लोकतांत्रिक शासन के लिए इन सभी मुद्दों पर तुरंत निर्णय लिया जाना जरूरी है।

बुधवार, 29 मई 2013

केंद्र और कांग्रेस बताये , नक्सलवाद कब तक ?




समाचार पत्रों में भले ही नक्सलवाद के खिलाफ छाप रहा हो, मगर केंद्र और कांग्रेस के बड़ी ताकतें  चुप हें  ? जैसे सारे के सारे डर  के बिल में घुस गए हों  ?? जो भी बोले वह भी सामना करने वाले होंसले से नहीं बोले !! रक्षा मंत्री ने तो कह दिया की सेना नहीं भेजेंगे !! क्यों भला ??? क्या वे बैगैर सेना के पकडे जायेंगे ??? सच यही हे की केंद्र की कांग्रेस सरकार ने ही  हमेशा दोहरी नीति अपनाई और  देश को खतरे में डाल रखा हे !! आप हिम्मत तो दिखाओ , सेना को लगा दो ! परिणाम सामने आजायेगा । मगर आप नहीं करेंगे क्यों की अपने ही नक्सलवाद पाल रखा हे !!


चुनौती / नक्सलियों ने जारी किया बयान, ग्रीनहंट ऑपरेशन बंद करने की मांग 
अब मुख्यमंत्री को दी धमकी 
कंवर, रामविचार, केदार, विक्रम, राज्यपाल, डीजीपी रामनिवास, एडीजी मुकेश गुप्ता व आरआर पाटिल भी निशाने पर
भास्कर न्यूज / रायपुर
बस्तर के दरभा घाटी में कांग्रेस नेताओं की हत्या के बाद अब नक्सलियों ने मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ ही अन्य नेताओं-अफसरों को धमकाया है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने घटना की जिम्मेदारी लेते हुए इस आशय की एक विज्ञप्ति जारी की है।

सीपीआई माओवादी दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने विज्ञप्ति में कहा है कि दंडकारण्य के क्रांतिकारी आंदोलन के खिलाफ खड़े हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, गृहमंत्री ननकी राम कंवर, मंत्री रामविचार नेताम, केदार कश्यप, विक्रम उसेंडी, राज्यपाल शेखर दत्त, महाराष्ट्र के गृहमंत्री आरआर पाटिल, छत्तीसगढ़ के डीजीपी रामनिवास और एडीजी मुकेश गुप्ता जैसे पुलिस के आला अधिकारी इस गफलत में हैं कि कोई उनका बाल बांका भी नहीं कर सकता। महेंद्र कर्मा ने भी यही भ्रम पाल रखा था कि जेड प्लस सिक्योरिटी और बुलेट प्रूफ गाडिय़ां उसे हमेशा बचाएंगी। हिटलर और मुसोलिनी भी इसी घमंड में थे। हमारे देश में इंदिरा गांधी और राजीव जैसे फासीवादी भी इसी गलतफहमी के शिकार थे, लेकिन जनता अपराजेय है।

इसके अलावा विज्ञप्ति में दंडकारण्य से सभी अर्धसैनिक बलों को हटाने की मांग की गई है। साथ ही ऑपरेशन ग्रीन हंट बंद करने, प्रशिक्षण के नाम पर सेना की तैनाती रोकने तथा वायुसेना का हस्तक्षेप बंद कने की भी माग की गई है।

सलमा जुडूम का बदला लेने के लिए किया हमला- नक्सली : हमले के तीसरे दिन नक्सलियों ने घटना की जिम्मेदारी ली है। चार पन्ने का बयान जारी कर कहा है कि सलवा जुडूम का बदला ले लिया। नक्सली संगठन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी ने ऑपरेशन ग्रीन हंट तत्काल
बंद करने की मांग भी की है।

संगठन के प्रवक्ता गुडसा उसेंडी की ओर से दावा किया गया है कि हमले का मुख्य उद्देश्य कांग्रेस के बड़े नेताओं को टारगेट करना था। इसके साथ ही चेतावनी देते हुए कहा गया है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गई तो आगे भी हमले जारी रहेंगे।
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नक्सलियों पर टूट पड़ो: केंद्र 
नक्सलियों के खिलाफ अभियान में केंद्र से मिलेगी पूरी मदद 

- समीक्षा करने आए केंद्रीय गृह सचिव ने कहा-
सेना को बुलाने की जरूरत नहीं, और ज्यादा फोर्स और
हथियार दिए जाएंगे
दरभा नक्सली हमले में लापरवाही के अफसरों को फटकारा,
भास्कर न्यूज / रायपुर
केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने मंगलवार को पुलिस मुख्यालय में हुई बैठक में साफ शब्दों में कहा कि सुरक्षा बल अब नक्सलियों पर टूट पड़ें। उनकी मांद में घुसकर आक्रामक अभियान चलाया जाए। उनका खात्मा कर दें। सिंह ने दरभा में हुए नक्सली हमले में बड़े नेताओं समेत 28 लोगों की मौत पर राज्य पुलिस की जमकर खिंचाई की। आला अफसरों ने सीधे एक ही सवाल किया कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? उसके खिलाफ क्या एक्शन लिया गया? केंद्रीय सचिव ने साफ किया कि इसके लिए जिम्मेदार अफसरों को किसी भी सूरत में बख्शा न जाए।
सिंह ने कहा कि आंध्रप्रदेश और पश्चिम बंगाल में नेताओं को लक्ष्य करने के इन दो उदाहरणों के बावजूद अगर दरभा में इतना बड़ा हमला हुआ है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। उनके खिलाफ पश्चिम बंगाल की तर्ज पर बड़ा और आक्रामक अभियान चलाया जाए। नक्सलियों का मनोबल तोडऩे के लिए और कोई रास्ता नहीं है। इसके लिए अगर राज्य को और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की जरूरत है, तो वह भी दिया जाएगा।
अत्याधुनिक हथियार और बाकी संसाधनों की भी कमी नहीं होने दी जाएगी। राज्य ने नक्सलियों के खिलाफ और ज्यादा प्रभावी कार्रवाई के लिए सीआरपीएफ की और दो बटालियन तुरंत भेजने को कहा। गृह सचिव ने आगाह किया है कि राज्य इस बात को सुनिश्चित करे कि इस फोर्स का बेहतर इस्तेमाल हो और नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई होती हुए दिखे भी। बैठक में आईबी के प्रमुख एसए इब्राहिम, राज्य के मुख्य सचिव सुनिल कुमार, डीजीपी रामनिवास, एडीजी इंटेलिजेंस मुकेश गुप्ता, सीआरपीएफ के आला अफसर भी थे।
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नक्सल विरोधी अभियान में सेना की तैनाती संभव नहीं है - एंटनी 
तंजावुर में एंटनी ने पत्रकारों से कहा कि इस समस्या के समाधान का सही उत्तर यह है कि नक्सलियों का सामना करने के लिए पुलिस और अर्धसैनिक बल को और मजबूत करना होगा।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि न्यायालय के निरीक्षण में एक विशेष जांच दल द्वारा छत्तीसगढ़ में मारे गए कांग्रेस नेताओं की हत्या की जांच करवानी चाहिए।
मुम्बई में शिवसेना के अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में लिखे अपने सम्पादकीय में कहा है कि नक्सलियों द्वारा फैलाई जाने वाली हिंसा को कुचल दिए जाने की जरूरत है। ठाकरे ने छत्तीसगढ़ में हुए नक्सली हमले की निंदा की और कहा कि शनिवार के इस हमले के लिए जिम्मेदार लोगों के साथ अजमल अमीर कसाब तथा अफजल गुरु जैसे आतंकवादियों जैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए।

मंगलवार, 28 मई 2013

दस सालों के अंदर नक्सलियों की ताकत 10 गुना बढ़ चुकी है



रायपुर. छत्तीसगढ़ में नक्सलियों पर नियंत्रण, उनके पैर उखड़ने जैसे सरकारी दावों के विपरीत सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले दस सालों के अंदर नक्सलियों की ताकत 10 गुना बढ़ चुकी है। केंद्रीय और स्थानीय खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक इस बीच प्रशिक्षित हथियारबंद नक्सलियों की संख्या एक हजार से बढ़कर 10 हजार हो चुकी है।

सबसे घातक मिलिटरी इकाई पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) की कंपनियां तीन से दस हो चुकी हैं। वे लगातार इलाके का विस्तार और सदस्यों की संख्या बढ़ा रहे हैं। एक माह पहले ही उन्होंने कांकेर और राजनांदगांव के इलाके को मिलाकर नया डिवीजन बनाया है।

हाल में हुई कुछ मुठभेड़ों के आधार पर राज्य के गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने दावा किया था कि नक्सली कमजोर पड़े हैं। उनके पैर उखड़ने लगे हैं। भास्कर ने जब इस बारे में पड़ताल की, तो सच्चाई इसके विपरीत नजर आई। खुफिया एजेंसियों ने पिछले 10-11 सालों में नक्सलियों की ताकत पर एक रिपोर्ट तैयार की है। इसमें कहा गया है कि उनका पूरा जोर बड़े हमलों की जगह छोटे हमले, अपनी ताकत बढ़ाने और इलाका विस्तार पर है।

हालांकि साल 2006 या 2008 की तुलना में सुरक्षा बलों के जवानों की शहादत में कमी के पीछे माओवादियों की यही रणनीति व अन्य वजहें बताई गईं हैं। इनके एक बड़े नेता भूपति की एक चिट्ठी से भी स्पष्ट है कि उनका जोर ताकत बढ़ाने और विस्तार पर है।


कांग्रेस को ही बताना है कि उनमें कौन था जिसने नक्सलियों के हमले को सफल बनबाया

कांग्रेस को ही बताना है कि उनमें कौन था
जिसने नक्सलियों के हमले को सफल बनबाया


साजिश का शक और गहराया,
परिवर्तन यात्रा के तयशुदा कार्यक्रम में भी किया था बदलाव!
शिव दुबे  |  May 28, 2013,
रायपुर. नंदकुमार पटेल और महेंद्र कर्मा की हत्या की साजिश और गहरा गई है। परिवर्तन यात्रा के तयशुदा कार्यक्रम में किया गया बदलाव कई संदेहों को जन्म दे रहा है।  निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक परिवर्तन यात्रा के तहत कांग्रेस विधायक कवासी लखमा के विधानसभा क्षेत्र (कोंटा) के सुकमा में 22 मई को सभा रखी गई थी। इस दिन सिर्फ यही एक कार्यक्रम तय था, लेकिन बाद में इस मूल कार्यक्रम में दो बड़े बदलाव किए गए।
पहला- सुकमा की 22 मई को होने वाली सभा 25 मई को कर दी गई और दूसरा- सुकमा के साथ ही एक और सभा दरभा में भी रख दी गई और उसी दिन कांग्रेस नेताओं के सुकमा से दरभा जाने के दौरान ही नक्सलियांे ने इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दिया।
यह किसी का आरोप नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ कांग्रेस की प्रेस विज्ञप्ति से ही साफ हो रहा है। 2 अप्रैल को प्रदेश कांग्रेस की आधिकारिक विज्ञप्ति में बताया गया था कि परिवर्तन यात्रा के तहत 22 मई को सुकमा में और 25 मई को अंतागढ़ और दल्लीराजहरा में सभा होनी है|
सामान्य परिस्थितियों में इस बदलाव का कोई महत्व नहीं रहता लेकिन इस गंभीर हादसे के बाद यह सबसे महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला बिंदु हो गया है। 

नक्सली हिंसा को राष्ट्रीय संकट माना जाए

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नक्सली हिंसा को राष्ट्रीय संकट माना जाए
- रमेश नैय्यर
लेख - दैनिक भास्कर २ ८ मई २ ० १ ३  
वाम चरमपंथ भारतीय राजनीति, रणनीति, आर्थिकी और सामाजिक विमर्श का एक बड़ा विषय बना हुआ है। उसे चर्चा के केन्द्र में रखे रहने में अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजे गए कुछ लेखकों-पत्रकारों की सक्रियता विस्मित करती है। उनके हितैषी महिमामंडित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और योजना आयोग में भी स्थापित हैं। अनेक राजनीतिज्ञ भी वक्त पडऩे पर उनके पक्ष में मुखर होते पाए जाते हैं। वे योजनाबद्ध ढंग से नृशंस हत्याएं करते हैं। 'जन-अदालतें' लगाकर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, सरकारी कर्मचारियों और आम आदिवासियों के सरेआम गले रेत देते हैं। इधर उन्होंने विद्यार्थियों और पत्रकारों को भी पुलिस मुखबिर करार देकर मारना शुरू कर दिया है। साधारण वेतन पर अपने परिजनों से बहुत दूर बीहड़ इलाकों में पदस्थ सुरक्षाकर्मियों की हत्याएं तो वे अपना फर्ज मानते हैं।

इस दहकते यथार्थ से वाकिफ तो रसीली भाषा-शैली में अंग्रेजी लेखन करने वाले कई साहित्यकार भी हैं, परंतु इस सच को वे बयान नहीं करते। बल्कि इन माओवादियों को 'बंदूकधारी गांधी' 'गरीब और मजलूम के मसीहा' और 'पूंजीवाद से अभिशप्त भारत के मुक्तिदाता' के रूप में अलंकृत करते हैं। इसके बरक्स पुलिस और तमाम सरकारों का प्रचारतंत्र बेदम और बोसीदा रहता है। वह इसलिए कि पुलिस को तो प्रचार के लिए धन दिया नहीं जाता और सरकारों के जनसंपर्क विभाग कमोबेश काहिली, कल्पनाशून्यता और कमीशनखोरी के शिकार हैं। इसके विपरीत वामचरमपंथी प्रचार-प्रसार पर विपुल धन राशि खर्च करते हैं। पुलिस के नक्सली इंटैलिजेंस में शीर्ष पद पर रहे एक अधिकारी ने निजी बातचीत में बताया ''माओवादी छोटे-बड़े अनेक लेखकों की खूब आवभगत करते हैं। उन्हें हवाई यात्राओं से बुलाकर घने जंगल का रूमान दिखाकर चमत्कृत करते हैं। उनके वित्तीय संसाधन हमारी पुलिस से कहीं ज्यादा हैं। पत्रकारिता और राजनीति में सक्रिय अपने जासूसों को माओवादी अच्छा मानदेय देते हैं।''

25 मई को माओवादियों की 'राष्ट्रीय राजधानी' बस्तर में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए नक्सली हमले के तत्काल जो संकेत मिले हैं वे भी यही इंगित करते हैं कि यात्री-दल में उनका कोई भेदिया था। माओवादियों के इस औचक हमले में छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और प्रखर नेता महेंद्र कर्मा सहित 28 लोग मारे गए। महेंद्र कर्मा के जाने से माओवादी मन की बुनावटों को समझने-बूझने वाला और बस्तर के कोने-कोने से वाकिफ एक बड़ा रणनीतिकार चला गया। वयोवृद्ध नेता विद्याचरण शुक्ल को चार गोलियां लगी हैं। दक्षिण बस्तर में कांग्रेस के इस यात्री दल में वे लोग भी थे जिन्होंने पिछले हफ्ते निकटस्थ अडसमेटा में पुलिस गोलीबारी में हताहत लोगों को लेकर सरकार विरोधी प्रदर्शन किया था। उसे पुलिसिया नरसंहार करार देते हुए पुलिस तथा राज्य सरकार की खुली निंदा की थी।

दक्षिण बस्तर के सुकमा क्षेत्र में किए गए अमानुषिक नरसंहार के पीछे यात्री दल में माओवादियों के किसी जासूस के होने की आशंका के कुछ ठोस आधार हैं। मसलन 22 वाहनों में उन्हीं तीन वाहनों को विस्फोट और गोलीबारी की जद में क्यों लाया गया, जिनमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सवार थे। यात्रा के पूर्व निर्धारित अपेक्षाकृत सुरक्षित रूट को एकाएक दरभा की खतरनाक घाटी की ओर किसके कहने पर मोड़ा गया? सबसे बड़ा सवाल यह है कि मनुष्यों के उस आखेट क्षेत्र में मात्र दस-बारह सुरक्षाकर्मियों के बूते यात्रा निकालने का फैसला किसने किया? क्षेत्र में राज्य की पुलिस के अलावा केन्द्र के अर्धसैनिक बल भी बड़ी संख्या में तैनात रहते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी को सारे संहार की जांच सौंप दी गई है। इसलिए कोई कयास लगाने का औचित्य नहीं दिखता। कांग्रेस नेताओं को यात्रा पर निकलने से पहले सोचना चाहिए था कि माओवादी कांग्रेस-नीत केन्द्र सरकार से भी इसलिए खिन्न हैं कि उस अबूझमाड़ में केन्द्रीय बलों ने धमक दे दी है, जहां उनके आयुध यूनिट हैं। वहां का कुछ इलाका केन्द्रीय बलों ने माओवादियों से छीन भी लिया है।

पिछले कुछ महीनों से चौतरफा दबाव झेल रहे माओवादियों के कैडर में कुछ हताशा दिखी है। वे पुलिस के सामने समर्पण भी करने लगे हैं। इस हताशा को दूर करने के लिए माओवादी गत दो-ढाई हफ्तों से ताबड़तोड़ हमले करके जता रहे हैं कि उनका दमखम बरकरार है। एनएमडीसी के प्रहरियों और जगदलपुर के दूरदर्शन कर्मियों की हत्या का कोई औचित्य नहीं दिखता। माओवादी हिंसा का 'नर्व सेंटर' बन चुकेअबूझमाड़ और दक्षिण बस्तर में उनकी 'जनताना सरकार' का ही दबदबा है। संवैधानिक सरकार तो महज एक समानांतर व्यवस्था खड़ी करने को जूझ रही है। जब तक वाम चरमपंथियों के इस गढ़ को नहीं तोड़ा जाएगा, उनका शमन किया नहीं जा सकता। यह छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड सरकारों के बूते की बात नहीं है। बस्तर से जुड़े इन राज्यों के अलावा महाराष्ट्र का वह गढ़चिरौली भी बस्तर की बांहों में है जहां माओवादी सक्रिय हैं। इन सभी राज्य सरकारों की रजामंदी से केन्द्र को एक समन्वित सशस्त्र अभियान की ठोस और निर्णायक पहल करनी चाहिए। कुछ समय के लिए सशस्त्र सेनाओं का मार्गदर्शन भी उस समन्वित अभियान को दिया जाना चाहिए। आने वाले तीन-चार महीने किसी समन्वित अभियान के लिए कठिन होंगे, क्योंकि मानसून के कारण भीतरी इलाकों के पहुंच मार्ग बंद हो जाएंगे। फिर भी माओवादियों को भीतरी इलाकों तक बांधकर रख देने में इस वक्त का उपयोग किया जा सकता है।

नवंबर में संभावित अनेक विधानसभाओं के चुनावों को देखते हुए चुनावी राजनीति जो करतब दिखाना शुरू करेगी, उनमें सरकारों के माओवादी संकट से भटक जाने की पूरी आशंका है। यद्यपि प्रधानमंत्री ने ताजा रायपुर प्रवास के दौरान माओवादी संकट को गंभीरता से लेने की बात कही है, फिर भी चुनावी लालसा कई बार राष्ट्रीय प्राथमिकता बदल देती है। सारी पार्टियों को इस गंभीर राष्ट्रीय संकट पर आम सहमति बनाने के लिए एक मंच पर आना चाहिए। जिस प्रकार अकेले बस्तर में ही आए दिन माओवादियों द्वारा मनुष्यों का शिकार किया जा रहा है, उसके प्रति सभी सरकारों को संवेदनशील होना चाहिए। आखिर कब तक लोग लाशों को गिनते रहेंगे?
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सबल समाज से अच्छे-अच्छे उद्दण्ड कांपते हैं - सावरकर जी




- अरविन्द सीसौदिया
नामर्दी के बुतों को चौराहों से उतार फैंकना होगा,
देश को दिशा दे सकें, वें तस्वीरें लगानी होगी।
उन विचारों को खाक पढ़े, जो कायरता में डूबे हों,
पढें वह,जो ज्वालामुखी सा तेज हर ललाट पर लाये।
स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की भूमिका न केवल महत्वपूर्ण थी, अपितु अंग्रेजों की असल नींद हराम  इसी रास्ते पर चले महान योद्धाओं ने की थी। स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर इस यशस्वी श्रृंखला की एक प्रमुख कडी थे। उनके ओजस्वी लेखन से ब्रिटिश सरकार कांपती थी। उन्हंे राजद्रोह के अपराध में, दो जन्मों की कैद की सजा सुनाई गई थी, अर्थात कम से कम 50 वर्ष उन्हें काले पानी की जेल में कोल्हू फेरते-फेरते और नारियल की रस्सी बनाते-बनाते बिताने थे।
महाराष्ट्र के नासिक जनपद में एक छोटा सा स्थान भगूर है। इसी में दामोदर पंत सावरकर एवं उनकी              धर्मपत्नि राधादेवी के चार संताने थीं। बडे पुत्र का नाम गणेश, दूसरे का नाम विनायक तीसरा के नाम नारायण था एवं पुत्री थी मैना। ये तीनों पुत्र महान स्वतंत्रता सैनानी हुये। माता-पिता का निधन बचपन में ही प्लेग की महामारी में हो गया था, विनायक 28 मई 1883 को जन्में तथा विवाह यमुना के साथ हुआ था। उनके एक पुत्री प्रभात एवं एक पुत्र विश्वास था।
सावरकर में विलक्षण तर्क शक्ति  थी, उन्हें महाभारत के योगेश्वर कृष्ण अत्यधिक प्रिय थे। गीता को उन्होंने अपना आर्दश माना था, उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि यदि हिन्दुओं ने गीता के ज्ञान को विस्मृत नहीं किया होता और  शत्रु के प्रति अपने कर्तव्य को ईमानदारी से निभाया होता,तो हम शत्रु संहार में प्रभावी रूप से सफल रहे  होते..!
ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के शासन का स्वर्ण - जयंति महोत्सव मनाया जा रहा था, वहीं महाराष्ट्र अकाल एवं भंयकर प्लेग की चपेट में था,मक्खी-मच्छरों की तरह 1 लाख 73 हजार भारतवासी प्लेग से मौत के मुँह में समा चुके थे, प्लेग कमिश्नर रेण्ड और उनके सहायक आर्मस्ट जनता के ऊपर प्लेग के बहाने अत्याचार ढहा रहे थे, महिलाओं के शीलभंग किये जा रहे थे।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का अखबार केसरी अंग्रेज अत्याचारों के विरूद्ध आग उगल रहा था। अंग्रेज शासन इनकी चिन्ता के बजाये खुशियां मनाने में व्यस्त था, देशभक्तों का खून खौल उठा, व्यायाम मंडल ने प्लेग कमिश्नर रेण्ड और उनके सहायक आर्मस्ट को गोली से उड़ा दिया। फलस्वरूप व्यायाम मंडल संचालक दामोदर हरि चाफेकर और बालकृष्ण हरि चाफेकर बंधुओं को फांसी पर लटका दिया गया, इसी संघर्ष में वासुदेव हरि चाफेकर और महादेव विनायक रानाडे को भी फांसी दे दी तथा तिलक जी को 18 माह की सजा लोगों को भड़काने का आरोप लगा कर दी गई। इस संघर्ष में चाफेकर परिवार का दीपक ही बुझ गया था....तीनों भाई राष्ट्र के लिये बलिदान हो गये..! इस घटना ने सावरकर सहित महाराष्ट्र के युवाओं की दिशा ही बदल दी, विनायक ने मात्र 15 वर्ष की आयु में संकल्प लिया कि वे चाफेकर बंधुओं के राष्ट्र धर्म के मार्ग को आगे बढ़ायेंगे और सावरकर परिवार के भी तीनों भाईयों ने राष्ट्र के लिये जेलें भोगीं।
  उन्होंने किशोरवय में व्यायाम मंडल की तरह ”मित्र-मैला“ के नाम से राष्ट्रभक्ति की साप्ताहिक गोष्ठियां कीं, जो क्रांतिकारियों का प्रमुख केन्द्र बन गयीं थीं। युवा होेते ही ”अभिनव भारत“ नामक गुप्त क्रांतिकारी संगठन खड़ा किया, जिसका काम महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और लंदन तथा पैरिस में प्रमुख रूप से फैला।
रौलट कमेटी की रिर्पोट के अनुसार भारत में संगठित आतंकवादी आंदोलन ;राष्ट्रवादी क्रांतिकारीद्ध का आरम्भ महाराष्ट्र से हुआ, जिसके आरम्भ का श्रेय चाफेकर बंधुओं के बलिदान को जाता है। जिसे देश एवं विदेश में विनायक दामोदर सावरकर के कारण विस्तार मिला....!
दशहरे पर होली....
वे 1905 में पुणे के फर्ग्युसन कालेज के छात्रावास में रहते हुए अध्ययनरत थे, उन्होंने अपने साथियों के साथ बंगभंग के विरोध में, दशहरे पर विदेशी कपड़ों की होली जलाई, जिसमें लोकमान्य बालगंगाधर तिलक भी सम्मिलित हुए थे। कालेज प्रशासन ने उनकी बी.ए. की उपाधी छीन ली। इसी तरह विलायत में भी देशभक्ति के जुर्म के कारण, उन्हें बेरिस्टरी की सनद नहीं दी गईं।
स्वतंत्रता का पहला आगाज: स्टुटगार्ड में तिरंगा
1906 में सावरकर जी लंदन में बैरिस्टरी की शिक्षा प्राप्त करने गये थे, वहां वे प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्यामकृष्ण वर्मा, मादाम भीखाजी रुस्तम कामा, मदनलाल धींगड़ा के सम्पर्क में आये। वे इण्डिया हाऊस छात्रावास में रहते थे। सावरकर ओजस्वी विचारों एवं लेखन क्षमता के बल पर लंदन के क्रांतिकारियों के नेता हो गये थे। उन्होंने छात्रों को एकत्र कर विक्टोरिया राज की छाती पर भारतीय स्वतंत्रता की आवाज बुलंद करने का निर्णय लिया और ‘‘फ्री इण्डिया सोसायटी’’ की स्थापना की। उन्हीं की सलाह पर मैडम कामा ने स्टुटगार्ड में हुए अन्तर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारत का अलग तिरंगा ध्वज फहरा कर विक्टोरिया साम्राज्य से अलग अस्तित्व का आगाज किया था...!  इस तिरंगे की ऊपरी पट्टी में पांच तारे, बीच की पट्टी में वन्दे मातरम् और नीचे की तीसरी पट्टी के एक ओर सूर्य और दूसरी ओर चन्द्रमा था।
ओजस्विता का ज्वालामुखी
सावरकर पर इटली के एकीकरण की घटना का गहरा प्रभाव पड़ा, इस क्रांति के महानायक जोसेफ मैजिनी और गेरीबाल्डी ने भारतीय राष्ट्रभक्ति को उत्साहित किया, उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता समर का धधकाने के लिये, इंग्लैण्ड  में मैजिनी चरित्र लिखा, इसे छपवाने के लिए भारत भेजा, अप्रकाशित पाण्डुलिपी को लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जी ने पढ़ा। वे इस पुस्तक की औजस्विता और तेजस्वितापूर्ण शैली से बहुत प्रभावित हुए, उन्होंने कहा था ”यह पुस्तक भारत के किसी भी युवक को स्वातंत्र्यवीर बना सकती है। यदि ब्रिटिश सरकार के हाथ यह पाण्डुलिपि पड़ गई तो वह इसे अवश्य ही जब्त कर लेगी।“ उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई, ”जोसेफ मैजिनी“ पर लिखी इस पुस्तक को जब्त कर लिया गया।
इसी तरह उन्होंने सिखों का इतिहास  पुस्तक लिखी थी, जिसे प्रकाशित होने से पूर्व ही ब्रिटिश सरकार ने भनक मिलते ही डाक से गड़बड़ करके जब्त कर लिया गया।
उन्हीं दिनों 1857 के गदर के 50 वर्ष पूर्ण होने जा रहे थे, उस समय तक ब्रिटिश सरकार 1857 की घटना को सिपाहियों का मामूली सा विद्रोह कह कर महत्वहीन बनाने पर तुली थी तो, सावरकर जी की क्रांतिकारी संस्था अभिनव भारत ने इस अवसर को वर्तमान में चल रहे स्वतंत्रता समर में उर्जा प्रदान करने के अवसर के रुप में उपयोग की ठानी। लंदन में भारतीय छात्रों ने जोर  शोर से 10 मई 1907 को स्वर्ण जयन्ति मनाई। सावरकर जी ने इस अवसर पर ‘ओ शहीदों’ नामक पर्चा निकाला। 1857 के बलिदानी महारानी लक्ष्मीबाई, मंगल पाण्डे, तांत्या टोपे, कुंवर सिंह आदी को श्रद्धांजली दी गई और स्वातंत्र्य  शपथ ली। सावरकर के विचारों से प्ररित होकर उनके साथी मदनलाल धींगरा ने भारत सचिव ए.डी.सी.कर्नल सर वाईली की गोली मार कर हत्या कर दी, उन्हें मृत्यु दण्ड दिया गया। दुर्भाग्यवश इस घटना की निंदा आगा खां की अध्यक्षता में हुई शोक सभा में की गई जिसमें अंग्रेजों की जी हजूरी करने वाले भारतीय पहुंचे, मगर सावरकर के विरोध से शोकसभा में शोक प्रस्ताव पारित नहीं हो पाया।
उनके बड़े भाई  गणेश  सावरकर जो बाबा के नाम से जाने जाते थे, के कंधों पर परिवार की जिम्मेवारी होने से, वे सीधे क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग न लेकर गुप्त रूप से भारत में अभिनव भारत के क्रांतिकारियों की भरपूर मदद करते थे। मूलतः माना जाता है कि महाराष्ट्र के क्रांतिकारियों की बागडोर उनके हाथ में थी। अभिनव भारत सशस्त्र क्रांति के अलावा वैचारिक क्रांति पर भी  अधिक जोर देता था।
पुस्तक ‘1857 का प्रथम स्वातंत्र्य समर’ का प्रकाशन इग्लैंड में संभव नहीं था, पांडुलिपि बड़े भाई बाबा को भारत भेजी गई, बाबा ने काफी कोशिशों के बाद महसूस किया कि यह पांडुलिपी भारत में अंग्रेजों के हाथ पड़ सकती है तथा इसको अंग्रेजी में अनुवाद करवा कर छपवाया जाये तो यह पुस्तक सम्पूर्ण विश्व में भारतीय पक्ष में जनमत तैयार करने का काम करेगी, अंततः इसको फ्रांस में अंग्रेजी अनुवाद कर छपवाया गया।
धीरे-धीरे प्रकाशित प्रतियाँ भारत में आने लगी। अंग्रेजों ने पुस्तक प्रतिबंधित कर दी, विनायक सावरकर के बड़े भाई गणेश सावरकर उर्फ बाबा को भारत में गिरफ्तार कर लिया। पुस्तक के प्रकाशन की जिम्मेवारी उनके ऊपर डालते हुए राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और आजीवन कारावास की सजा सुना कर काले पानी भेज दिया।
जिस अंग्रेज अधिकारी जैक्सन ने यह सजा सुनाई थी, उसे अभिनव भारत के क्रांतिकारी अनंत लक्ष्मण कन्हारे ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। विनायक सावरकर को भी लंदन में गिरफ्तार कर उन पर अवैद्य रूप से भारत में पिस्तोलें एवं कारतूस भेजने का आरोप लगाया, वे जिस जहाज से भारत भेजे गये, उसके टोयलेट होल से समुद्र में कूद गये और तैर कर फ्रांस तट पहुँचे, दीवार फांद कर फ्रंास में प्रवेश कर गए, मगर फांसीसी सैनिकों की नासमझी से उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर नासिक षड़यंत्र के आरोप में आजीवन निर्वासन की सजा दी गई, उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया तथा विश्व में वे पहले ऐसे सजायाफ्ता थे जिन्हें दो जन्मों की कैद की सजा सुनाई गई हो अर्थात कम से कम 50 वर्ष उन्हें काले पानी की जेल! अंग्रेज की हेग न्यायालय ने सजा देते हुए कहा था कि मौत की सजा देने से उतना दंड नहीं मिल सकता जितना बड़ा राजद्रोह का अपराध सावरकर ने किया है । इसलिए दो जन्मों का सश्रम कारावास की सजा दी जाती है । उनके तीसरे भाई डॉ. नारायण सावरकर को भी लार्ड मिण्टो बम कांड में सजा हो गई थी।
आजादी का र्तीथ: कालापानी
कलकत्ता से 1400 किलोमीटर और चैन्नई से 1300 किलोमीटर सुदुर हिन्द महासागर का एक छोटी सी टापू श्रंखला अंडमान निकोबार द्वीप समूह स्थित है। भारत से इतनी अधिक दूर स्थित यह स्थान भारतीय स्वतंत्रता की तीर्थस्थली है, हाल ही में इसके हवाई अड्डे का नाम वीर सावरकर हवाई अड्डा रखा गया है। इससे पहले इसे राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा भी दिया जा चुका है। खूंखार और अंग्रेजों पर भारी पड़ने वाले विद्रोहियों को यहाँ की सैलूलर जेल में रखा जाता था। इसका निर्माण 1896 में प्रारम्भ होकर 1906 में पूरा हुआ था, इसमें 10 गुणा 7 की 696 कोठरियां है, यहां कैदियों से 12 से 18 घंटे तक कोल्हू चलवा कर तेल निकलवाया जाता था तथा नारियल के रेशे कुटवा कर रस्सी बनवाई जाती थी। हालांकि इस जेल में राष्ट्रभक्तों के जत्थे सजा पाकर पहुँचते ही रहे, मगर तीन दौर अत्यंत महत्वपूर्ण थे, 1906 से 1914, 1916 से 1920 और 1932 से 1938 जब जेलों की कोठरियों में “वंदेमातरम्“ और ”सरफरोशी की तमन्ना“ की लहरियां गूंजती थी। उष्ण कटिबंधीय इस भूमि के तपते पत्थरों पर 44-45 डिग्री का तापमान भी राष्ट्रभक्ति की आग के आगे फीका लगता था। इसमें विनायक दामोदर सावरकर और उनके बड़े भाई  गणेश दामोदर सावरकर ने लगभग 10 वर्ष बिताये। इस जेल में अलीपुर षड़यंत्र, चटगांव डकैती, काकोरी कांड, लाहौर बम कांड, मोपला विद्रोह, नासिक षडयंत्र अनगिनित विद्रोह अनगिनत क्रांतिवीर... आते ही रहे।
अंडमान की सेलूलर जेल में भी उन्हें अत्यंत घातक श्रेणी ”डी“ का मुजरिम घोषित किया गया था, उन्होंने कालापानी से मुक्त होने के लिए ये 6 प्रयास किये, तत्कालीन गृहसचिवों ने उनके खिलाफ रिर्पोटे देकर उनकी मुक्ति में बाधा खड़ी की, गृहसचिव क्रेडोक ने लिखा है ”मैं उनसे अंडमान मिलने गया, उन्हें अपने किये का कोई पछतावा नहीं है, अंडमान से उन्हें आजादी देना संभव नहीं है, वह भारत की किसी भी जेल से भाग निकलेगा।’’ इसी तरह एक अन्य गृहसचिव मेक्फर्सन ने लिखा “ विनायक ही असली खतरनाक व्यक्ति है, उसके पास दिमाग है और जन्मजात नेता का स्वभाव है। उसकी रिहाई पर आपत्ति का कारण यह नहीं है कि उसका अपराध गंभीर है। बल्कि यह उसका स्वभाव है।’’ वे 1910 से 1921 तक कालापानी की जेल में रहे तथा 1921 से 1937 तक प्रतिबंधित निगरानी में रत्नागिरी (महाराष्ट) में रहे।
स्वतंत्रता का प्रथम दर्शन कालापानी
यदि अंग्रेजों ने इस जेल से सावरकर जी को मुक्त नहीं किया होता, तो भी इस द्वीप समूह पर जापान ने कब्जा कर लिया था तथा इसे भारतीय की प्रथम स्वतंत्र अस्थायी सरकार को दे दिया था, इसी क्रम में इस सरकार के प्रधानमंत्री नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 29 दिसम्बर 1943 को अंडमान यात्रा की और वे कुछ दिन वहां रहे।  इसलिए यह कालापानी का टापू भारत की स्वतंत्रता के क्रांतिकारी आंदोलन का एक अद्वितीय तीर्थस्थल है।
मार्ग चलता रहा...
काल कोठारी वाली लोह सलाखें गर्माई होंगी,
फांसी के तख्ते पर लटकी रस्सी चिल्लाई होगी।
सावरकर की आंखों से तब, खारा जल छलका होगा,
कोल्हू से उस वक्त, तेल की जगह लहू टपका होगा।।
- विनीत चौहान
निग्रोस्तान स्वीकार क्यों नहीं करते.........
   सावरकर भारत विभाजन का डटकर विरोध कर रहे थे। इसी दौरान प्रख्यात अमरीकी पत्रकार व लेखक ‘‘लुई फिशर’’ भारत में बड़े नेताओं से भेंटकर उनके विचार जान रहे थे। वे जिन्ना के विचार जानने के बाद सावरकर से मिले और प्रश्न किया ‘‘ आपको मुसलमानों को अलग देश ‘पाकिस्तान’ देने में आपत्ति क्या है?’’ सावरकर ने उलट उनसे प्रश्न कर डाला ‘‘आप लोग भारी मांग के बाद भी मूल निवासी निग्रो लोगों के लिए आपकी सरकार ‘निग्रोस्तान’ क्यों नहीं स्वीकार कर लेते ?’’ सहज ही लुई फिशर के मुंह से निकल गया ‘‘देश का विभाजन राष्ट्रीय अपराध है।’’
देशहित का अनोखा चिन्तक
सावरकर लिखते है, ”पारकीय  लोग शस्त्र प्रयोग से हिन्दुओं का जितना विनाश नहीं कर सके, उतना विनाश स्वयं हिन्दुओं ने ही अपनी सद्गुणी विकृति से कर लिया है, काश, गीता की ”देशकाल पात्र“ के विवेक की सावचेतना न भुलाई गई होती, हिन्दुओं को गीता के इस सापेक्ष उपदेश की विस्मृति हुई, इसीलिए उनका घात ;पतनद्ध हुआ।
       उन्होंने पृथ्वीराज चौहान द्वारा यु(बंदी बनाये गये शत्रु को प्राणदान देने और छोड़े जाने को एक भयंकरतम महान भूल कहा। उनका मत था जिनका धर्म काफिरों का विच्छेद हो उनसे ”जैसे को वैसा“ व्यवहार करना ही न्याय की नैतिकता होती...।
वीर सावरकर आधुनिक विश्व से, वैज्ञानिकता में सब कुछ सीखकर उनसे भी आगे निकलने की आवश्यकता महसूस करते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि विश्व में शान्ति और प्रभुत्व की स्थापना में सर्वाधिक योगदान शक्ति का ही रहता है। वीर ही वसंुधरा का भोग करते हैं!  एक अन्य लेख में उन्होंने लिखा है कि इस विज्ञान के युग में समाज संस्था का पुर्नगठन करना, वह भी प्रत्यक्ष, ऐहिक तथा विज्ञाननिष्ठ सि(ांतों पर करना चाहिये। वह मार्ग अपनाते समय इंगलैंड, रूस, जापान ये राष्ट्र बलवान हुए है। ठीक वैसे ही भारत भी बलवान होकर रहेगा।
वे हिन्दुत्व के कट्टर समर्थक थे, उन्होंने वामपंथी भटकाव पर चेतावनी देते हुए कहा कि पहले परधर्मी ही विरोधी थे, किन्तु अब स्वधर्मी भी विरोध कर रहे हैं, जो बहुत ही गंभीर एंव चिंतन का विषय है। वे स्पष्ट घोषणा करते थे ‘‘तुम शपथ लो, इन्द्र पद यदि मुझे मिल रहा हो, तो भी प्रथम अहिन्दू होकर जीने से, अंतिम हिन्दू होकर मरना मैं श्रेयकर मानूगाँ। माता पिता भी भले ही हिन्दुत्व को भूल जाये, किन्तु तुम हिन्दुत्व को मत छोड़ो। उनका बहुत स्पष्ट कहना था राजनीति के लिए धर्म और धर्म के लिए राजनीति है। इसी तरह वे ये भी हमेशा ही कहते थे कि सबल समाज से अच्छे-अच्छे उद्दण्ड कांपते हैं, इसलिए सबल समाज का निर्माण करो। ’’
1937 में ब्रिटिश सरकार ने उन पर से सारे प्रतिबंध उठा लिये थे। उन्होंने हिन्दू महासभा के अखिल भारतीय अध्यक्ष का पद संभाला तथा उसे सक्रीयता दी। इसी का परिणाम था कि भारत की प्रथम राष्ट्रीय सरकार में हिन्दू महासभा के कोटे से उनके सहयोगी डॉ. श्याम प्रसाद मुखर्जी उद्योग मंत्री बनाये गये। दुर्भाग्यवश महात्मा गांधी पाकिस्तान को सहयोग देने की नीति के शिकार हुए। उनकी हत्या के जुर्म में सावरकर जी को भी गिरफ्तार कर लिया गया मगर वे न्यायालय द्वारा बाईज्जत बरी किये गये।
उन्होंने हिन्दुत्व नामक पुस्तक के द्वारा सांस्कृतिक राष्ट्वाद की दिशा दी एवं ‘भारतीय इतिहास के छः स्वर्णिम पृष्ठ’ नामक महान गं्रथ की रचना की जो भारतवासियों के स्वाभिमान को गौरवान्वित एवं उत्थान के लिए प्रेरित करता है। उन्हांेने असंख्य लेख एवं पुस्तकें लिखीं। नागपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें ऐतिहासिक साहित्य सृजन के लिए ‘‘डॉक्टरेट’’ की उपाधी से अलंकृत किया था।
सतत सतर्कता के प्रहरी..
वे आजाद भारत को हमेशा आगाह करते रहे कि ‘‘हिन्दुस्तानी शासन सेना की ओर से लापरवाही बरत रहा है, जब तक हिन्दुस्तान सैनिक शक्ति के रूप में शक्तिशाली नहीं बन जाता, तब तक उसके शब्दों को मूल्य नहीं मिल सकेगा।’’ यह तथ्य सत्य भी हुआ चीन ने भारत के कान पकड़ी छेरी ;बकरीद्ध की तरह व्यवहार किया। अमेरिका- ब्रिटेन ने भारत से निरंतर कुटनीति खेली। विश्व में भारत की आवाज को मा. अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा किये गये परमाणु परीक्षण के बाद आज महत्व मिल पाया है।
1947 में जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरिसिंह की फौज के अधिकांश मुस्लिम सैनिकों ने महाराजा के विरू( विद्रोह कर पाकिस्तानी आक्रमणकारियों का स्वागत किया था और साथ दिया था। महाराजा को अपनी जान बचाकर रातों रात श्रीनगर से जम्मू पहुँचना पड़ा था।  यदि भारत में ब्रिटिश फौज में हिन्दू नवयुवक अच्छी संख्या में न होते तो यह दृश्य अन्य जगह भी उपस्थित होता।
आखिर में इस बात का खंडन भी करना चाहता हूँ कि सावरकर ने हिन्दू और मुसलमानों को अलग अलग किया। हिन्दू और मुसलमान को बांटकर भारत पर राज्य बनाये रखने की साजिश में विक्टोरिया ताज 1857 के बाद भी सक्रिय हो गया था। 1870-90 के दशकों में अंग्रेजों से मुसलमान को जोड़ने की कोशिशें प्रारम्भ हो गई थी। तत्पश्चात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हिन्दूओं के विरू( मुसलमान को खड़ा करने के ट्रेनिंग सेंटर के रूप में विकसित हो गया था। इसके प्राचार्य इसाई             धर्मावलम्बी प्रिंसीपल बेक और प्रिंसीपल आर्चबोल्ड प्रमुख कर्ताधर्ता थे। जहाँ तक सावरकर के जीवनकाल में हिन्दु मुस्लिम एकता का प्रश्न है, इस दौर में मुस्लिम लीग ने और पाकिस्तान ने भारतीय हितों पर कुठाराघात ही किया और हिन्दू मुस्लिम एकता कभी नहीं होने दी।
सावरकर की कुशल कुटनीति ने अंग्रेजों को भगाया:
वे कई वर्षो तक हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे। उन्हांेने जब 1942 में हिन्दू नवयुवकों को भारतीय फौज में भर्ती होेने का आव्हान किया, तब कांग्रेस ने उनकी आलोचना की मगर यह बहुत ही महत्वपूर्ण एवं राष्ट्रहित से जुड़ी गहरी सूझबूझ का कार्य था। जिसका इतिहास में सही मूल्यांकन नहीं किया जा  सका..। देश की आजादी की स्थितियाँ बन रही थी, विश्व के तमाम राष्ट्र एक दूसरे के विरु( शस्त्र लिये खड़े थे। भारतीय ब्रिटिश फौज में अधिकतम हिन्दू युवक पहँुचकर, भारतीय फौज की मुख्य मारक क्षमता को अपने कब्जे में करलंे और उपयुक्त समय पर शस्त्र के बल पर तख्ता पलट कर देश को स्वतंत्र करा ले। इस तरह की महान राष्ट्रभक्त गुप्त योजना का ही यह परिणाम है कि जब नेताजी सुभाष चंद्र बौस की आजाद हिन्द फौज के बंदी सिपाहियों पर अंग्रेजों ने सजा सुनाने की कोशिश की तो देश में जनविद्रोह खडा हुआ, इसी क्रम में नेवी विद्रोह से सैनिक विद्रोह खड़ा हुआ, जो पुलिस तक में फैल गया, तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने हाउस आफ कामन्स में पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल को बताया था कि ‘....अब भारत में फौज हमारे साथ नहीं है, इसलिए भारत अब तुरंत छोड़ना होगा’ और प्रधानमंत्री एटली ने भारत की स्वतंत्रता की पूर्व घोषणा जून 1948 को भी कम कर दिया और यह निर्णय लिया कि 15 अगस्त, 1947 तक भारत को छोेड़ देंगे। अंग्रेजों को बोरिया बिस्तर बांधकर भागने की स्थिती बन गई थी,यदि इस अवसर पर कांग्रेस विद्रोही सैनिकों के सामने नहीं खड़ी होती तो, अखंड भारत ही स्वतंत्र होता।
जैसे जिये, वैसे ही स्वर्ग पधारे...
वे अपने जीवन के अंतिम दौर में अस्वस्थ रहते थे।  उन्होंने स्वयं की मृत्यु के लिए आत्मार्पण किया तथा भोजन त्याग कर मृत्यु को आमंत्रित किया, 26 फरवरी 1966 को उनकी आत्मा परमात्मा में लीन हो गई। उन्होंने जीवन के अंतिम दौर में राष्ट्र चिंता नहीं छोड़ी थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि ‘‘लाल बहादुर शास्त्री को ताशकंद नहीं जाना चाहिऐ, वहां उन पर दबाव डाला जायेगा और रण में जो जूझ कर पाया वह उसे खो देंगे और हुआ भी वही, शास्त्री जी ने जीती हुई चौकियां ही नहीं खोई, बल्कि अपने प्राण भी खो दिये।’’
अंत में डॉ. बृजेन्द्र अवस्थी की कविता की दो पंक्तियों से इस आलेख का समापन करते हैं:-
‘‘ले बढ़ा देश का स्वाभिमान, तोड़ता कड़ी व्यवधानों की,
गद्दार ‘महत्ता’ क्या जानें, सावरकर के बलिदानों की।’’
 छुटभैया कांग्रेसी क्या जाने........!
1. परतंत्र भारत में, 1923 में कांग्रेस के काकीनाड़ा  अधिवेशन में सावरकर की रिहाई का सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित हुआ।
2. 1937 में बम्बई प्रांत में कांग्रेस की सरकार निर्वाचित हुई, उसने सबसे पहले ‘रत्नागिरी’ में नजरबन्द सावरकर की नजरबन्दी समाप्त की..!
3. सावरकर के देहावसान पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें भारत की महान विभूति बताते हुए कहा था ‘‘साहस और देशभक्ति के पर्याय सावरकर आदर्श क्रांतिकारी के सांचे में ढ़ले थे। अनगिनत लोगों ने उनके जीवन से प्रेरणा ली।’’
4. इंदिरा गांधी के कार्यकाल में ही सूचना एवं प्रसारण मंत्री बसंतराव साठे की देखरेख में एक वृत्तचित्र भी सावरकर जी पर बना था।

- राधाकृष्ण मंदिर रोड़,  डडवाड़ा, कोटा जं0, राजस्थान

सोमवार, 27 मई 2013

महेन्द्र कर्मा : नक्सलवाद आतंकवाद का दूसरा चेहरा है


Anil Pusadkar
महेन्द्र कर्मा ने कहा था"बस बहुत हो चुका,आदिवासी कह रहे है हमे हमारे हाल पे छोड दो" 21 अगस्त 2008 को प्रेस क्लब रायपुर में सलवा जुडूम पर व्याख्याने में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अब स्व महेन्द्र कर्मा के भाषण का अंश,जस का तस. नक्सलियों की हिट लिस्ट में टॉप पर हैं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता महेन्द्र कर्मा। वे जब नक्सल समस्या पर बोलने लगे तो एक नेता के साथ-साथ एक आदिवासी का दर्द भी उनकी जुबान से निकल रहा था। उन्होंने कहा कि बस्तर का आदिवासी कह रहा है कि बहुत हो चुका है हमें हमारे हाल पर छोड़ दो।

महेन्द्र कर्मा छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष है। जवानी में महेन्द्र कर्मा भी कामरेड ही थे लेकिन समय के साथ उनके विचार बदले और अब वे कांग्रेस के दिग्गज नेता हैं और सलवा जुडूम के घोर समर्थक। प्रेस क्लब में माकपा नेता धर्मराज महापात्र के जोशीले भाषण ने श्रोताओं की जितनी तालियाँ बटोरी उतना ही कर्मा को गुस्से से भर दिया। स्वभाव से तेज़तर्रार महेन्द्र कर्मा व्याख्यान शुरू करते ही तैश में आ गए। उनका गुस्सा स्वाभाविक था। उन्होंने कहा कि लोगों ने बस्तर देखा तक नहीं, वे जानते तक नहीं हैं सलवा जुडूम क्या है ? वे आदिवासी को पहचानते तक नहीं हैं और ऐसे लोग बात करते हैं बस्तर की नक्सल समस्या पर। उन्होंने कहा बस्तर का आदिवासी त्रस्त हो चुका है और वो कह रहा है नक्सलियों से कि बहुत हो चुका चले जाईए, हमें हमारे हाल पर छोड़ दीजिए।

कर्मा की आवाज़ में जितनी गर्मी थी उससे ज्यादा उसमें आदिवासियों के दर्द की नमी थी। पसीने से तर हो गए महेन्द्र कर्मा बोलते-बोलते। उन्हाेंने जमकर लताड़ा शहर में रहकर जंगल की समस्याओं पर करने वालों को। उन्होंने कहा कि सलवा जुडूम आदिवासियों की अपनी मर्जी से जीने की अपील है। छोटा-मोटा आंदोलन होता है तो सारे देश और दुनिया में हंगामा होता है लेकिन इतना बड़ा आंदोलन आदिवासियों का चल रहा है और वे अकेले हैं। देश क्यों नहीं खड़ा होता उनके साथ। आखिर क्या गलत कर रहे हैं वो। हिंसा के खिलाफ बस्तर का अनपढ़ आदिवासी तनकर खड़ा है तो वो अपने दम पर। उसे किसी की मदद मिले या न मिले वो लड़ता रहेगा नक्सलियों से। आखिर ये उनके अस्तित्व की लड़ाई है। अगर वो हार गए तो हिंसा के सामने अहिंसा हार जाएगी, सारा देश हार जाएगा।

उन्होंने कहा कि नक्सली 40 साल से बस्तर में ऑंदोलन कर रहे हैं। वे क्या कहते हैं पता नहीं लेकिन करते क्या हैं ये सब जानते हैं ? उन्होंने कहा कि इन 40 सालों में क्या किया है नक्सलियों ने बस्तर में ? एक भी कोई विकास का काम किया है ? किसी भी सरकार को कभी कोई फेहरिस्त सौंपी है ? क्या कभी कोई बात की है किसी से ? क्या बात करेंगे ये लोग आदिवासियों के हितों की ? इन्हें तो अपने हित साधने से ही फुर्सत नहीं है। कभी तेंदूपत्ता के दाम बढ़ाने के लिए धमकी-चमकी दी थी और सरकार के दाम बढ़ाते ही तत्काल बढ़े हुए दामों में से अपना हिस्सा ठेकेदारों से तय कर लिया। ये लुटेरे हैं। कहीं भी बेरियर लगा देते हैं और वसूली करने बैठ जाते हैं।

बोलते-बोलते अचानक अपनी ही पार्टी के नेता की खिंचाई कर दी महेन्द्र कर्मा ने। साफ-साफ बोलने के कारण बार-बार विवादों में घिरने वाले कर्मा इस बार भी घबराए नहीं। हालाकि उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी का नाम नहीं लिया लेकिन जो कहा उसे सारे लोग समझ गए। उन्होंने कहा कि यदि मैं सलवा जुडूम के मामले में रमन सिंह का समर्थन करता हूँ तो इसे पोलिटिकल एलाइनमेंट कहते हैं। तरस आता है ऐसे लोगों पर। अरे सरकार तो आती-जाती रहती है। सरकार के अलावा भी कोई चीज होती है सोचने के लिए। जहाँ मौत नाचती हो वहाँ राजनीति नहीं करना चाहिए। लाषों पर राजनीति करने वालों को शर्म आनी चाहिए। यहाँ उन्होंने नक्सलवाद के मामले में अपने अभियान के पार्टनर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की खिंचाई करने से भी परहेज नहीं किया। उन्होंने कहा कि डॉ. ने बीच में सलवा जुडूम की मदद करने में थोड़ी ढील दे दी और उसी का नतीजा है कि ऑंदोलन थम गया है।
उन्होंने कहा कि नक्सलवाद आतंकवाद का दूसरा चेहरा है। आप इसे सामाजिक-आर्थिक शोषण के नज़रिए से नहीं बल्कि प्रजातंत्र के खिलाफ हिंसा के नज़रिए से देखिए। इसे तत्काल राष्ट्रीय समस्या घोषित किया जाना चाहिए। ये रमन सिंह या महेन्द्र कर्मा के अकेले के बस की समस्या नहीं है। नक्सलवाद के नाम पर लूट-खसौट और हिंसा का दौर समाप्त होना चाहिए। इसके लिए सबको राजनीतिक संकीर्णता को छोड़ एक साथ खड़ा होना होगा और जिस दिन सब एक साथ खड़े हो गए नक्सलवाद घंटों में नहीं मिनटों में मिट जाएगा। जब तक महेन्द्र कर्मा बोलते रहे तब तक हवा में अजीब-सी सनसनी फैली रही। ऐसा लग रहा था कि बस्तर के आदिवासियों के दर्द के साथ-साथ एक नेता के गुस्से का ज्वालामुखी रह-रहकर फट रहा हो। सब स्तब्ध होकर सुन रहे थे, वे लोग जो शहर में बैठकर बस्तर में सरकार और प्रजातंत्र के फेल होने और नक्सलियों का साम्राज्य होने की चर्चा एसी रूम में बैठकर करते हैं। पता ही नहीं चला कि कब 20 मिनट पूरे हो गए और महेन्द्र कर्मा का भाषण खत्म हुआ। उसके बाद तो अचानक सन्न पड़ा प्रेस क्लब का हॉल जाग गया और तालियों की गड़गड़ाहट ये बताने लगी कि हमें बस्तर का सच अब पता चल रहा है

रविवार, 26 मई 2013

सृष्टि के प्रथम पत्रकार देवर्षि नारदजी



सृष्टि के प्रथम पत्रकार
देवर्षि नारदजी की जयंती पर
सृष्टि के पहले संवाददाता नारदमुनि

पुराणों के अनुसार नारद मुनि भारतीय ऋषियों में एकमात्र व्यक्ति थे, जिन्हें देव ऋषि की उपाधि मिली थी। वे एक मात्र ऐसे ऋषि थे, जिनका उल्लेख लगभग सभी हिंदू ग्रंथों में मिलता है। सतयुग, त्रेता और द्वापर युग में भी नारदजी देवी-देवताओं में संवाद का माध्यम बने। हमेशा सतर्क रहने वाले नारद मुनि ब्रह्माजी के मानस पुत्रों सनक, सनंदन, सनत और सनातन से छोटे थे। ब्रह्माजी से मिले वरदान के अनुसार आकाश, पाताल तथा पृथ्वी तीनों लोकों का भ्रमण कर नारदजी देवताओं, संत-महात्माओं, इंद्रादि शासकों और जनमानस से सीधा संवाद करके उनसे सुख-दुख की जानकारी लेकर समस्याओं के निराकरण में भागीदारी निभाते थे। इसी कारण वे देव और दानव दोनों में लोकप्रिय थे। इसी के साथ उनमें एक-दूसरे में संघर्ष व युद्ध तक कराने की महारत थी। कई बार उन्हें इस आदत के कारण अपमान भी सहना पड़ा। फिर भी अपने उद्देश्य व समाज हित के लिए समर्पित नारदजी का जीवन मान-अपमान की परवाह किए बगैर बीता। उन्हें सृष्टि के प्रथम संवाहक या संवाददाता भी कहा जाता है। देव ऋषि नारद की जयंती ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा (इस बार २६ मई) को मनाई जाती है।

लोक कल्याण के लिए चिंतित
देश के प्रथम समाचार-पत्र उदंत मार्तण्ड के प्रथम पृष्ठ पर नारदजी का उल्लेख किया जाता था। हिंदू परिवारों में होने वाली भगवान सत्यनारायण की कथा के पहले श्लोक से ही पता चलता है कि नारदजी लोक कल्याण के लिए कितना चिंतित रहते थे। वे सतयुग से लेकर द्वापर युग तक प्रत्येक पुराण संहिता में मुखर रहे हैं। वे उस दौर में भी प्रखर संवाददाता के रूप में जाने जाते थे। आधुनिक दौर में भी लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभ के रूप में पत्रकारिता अपने-अपने स्तर पर उत्तरदायित्व का निर्वाह कर लोक जागरण अभियान में लगी है।
नारदमुनि संगीत के महान आचार्य थे। वीणा उनका प्रिय वाद्य यंत्र था। हाथ में करताल लिए नारायण-नारायण का सतत् जप उनकी विशेष प्रकार की पहचान बन गया था। श्री सनत कुमार के कुलाधिपतित्व में प्रथम विश्वविद्यालय में नारद को साक्षात्कार के लिए आमंत्रित किया गया था। तब क्रमश: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद ही नहीं, वरन् वेदों के अंतर्गत व अतिरिक्त व्याकरण, पितृ विद्या, विज्ञान के विविध पक्ष, खगोल, ज्योतिष, धनु विद्या, जैव विद्या, ब्रह्म विद्या, भूत विद्या, शस्त्र विद्याओं का कौशल लिए सर्प व शकुन शास्त्र में उनकी मर्मज्ञता देखकर सनत कुमार हतप्रभ रह गए कि लगातार घूमने वाला यह व्यक्ति सर्वांगीण विषयों में पारंगत कैसे हो गया।
राहगीरों के लिए प्याऊ का प्रारंभ
ग्रीष्म ऋतु में होने वाले जल संकट से त्रस्त जनमानस में जल संचय प्रबंधन का संदेश देते हुए पेयजल वितरण अर्थात प्याऊ लगाकर यात्रा पथ पर राहगीरों की प्यास बुझाने का उपक्रम नारदजी ने ही शुरू किया था। मनु के बाद देवर्षि नारद एक ऐसी स्मृति के भी उद्घाटनकर्ता माने जाते हैं, जिन्होनें याज्ञवल्क स्मृति के नाम से अपनी रचना में दंड विधान सुनिश्चित किए थे। ऐसा इसलिए ताकि अपराधमय मनोवृत्ति से मनुष्य भयभीत रहे और अच्छे मार्ग का अनुसरण करे। इन विधानों के अंतर्गत हजारों वर्षों से धर्म तथा समाज की व्यवस्था को अनुशासित बनाए रखने के संयोजन में नारदजी का वैसा ही योगदान है, जिस प्रकार राष्ट्र का संविधान दिया करता है।

नारद संहिता के रचनाकार

नारद पंचरात्रि, नारद भक्ति सूत्र, नारद परिव्राजक कोष निषध के अतिरिक्त बृहत, नारदीय पुराण का अपना अलग ही महत्व है। वे नारद संहिता के रचनाकार भी थे, जिन्होंने ज्योतिष विज्ञान के व्यवहार उपयोग पर अपने खगोलीय प्रभाव को उजागर किया तथा रचनाएं स्पष्ट की हैं। ''अणो रणियां महतो महिम्ना'' का यह सूत्र ज्योतिर्विज्ञान का पहला सूत्र है, जिसके द्वारा सूक्ष्मतम परम अणु से महानतम स्थिति विष्णु के रूप में कर्ता के रूप में विचरण करता हुआ ऑक्सीजन प्रदान कर रहा है। यह विष्णु विश्व-अणु की सृजन व्याख्या है। यही ईश्वरीय कण (गॉड पार्टिकल) है, जिसे लाखों वर्ष पहले ऋषि-मुनियों, अनुसंधानकर्ताओं ने खोजा था और इसी कण से आधुनिक वैज्ञानिक भयभीत भी हैं। क्योंकि इस कण में इतनी क्षमता है कि यह ब्रह्मांड को अस्थिर कर सकता है। लील सकता है।

पुराणों में महत्व वाला नारद पुराण
दो खंडों में बंटा हुआ नारद पुराण पूर्व और उत्तर शीर्षक नाम से जाना जाता है। यद्यपि कभी इस पुराण में 25 हजार श्लोकों से रचना हुई थी। किंतु वर्तमान में 18 हजार श्लोक, 2073 अध्यायों पर 18 पुराणों में विशेष महत्ता लिए है। वैसे तो यह पुराण भक्तिग्रंथ के रूप में निरूपित हुआ। मगर, इसका इतना विस्तार हुआ कि अनेक तीर्थों, व्रत, अनुष्ठानों और महात्म्य के विवरण के अलावा व्याकरण ज्योतिष निरूक्त, छंद आदि वेदांगों तथा ग्रह-गणित पर प्रचुर सामग्री बन गई। परिणाम स्वरूप यह एक प्रकार का विश्व पोष बन गया।
वक्ता के साथ अच्छे श्रोता भी
नारदीय पुराण के वक्ता वैसे तो देवऋषि नारदमुनि ही हैं, पर वे स्वयं श्रोता भी बने हैं। अत: ब्रह्मा के मानस पुत्रों के अलावा वशिष्ठ के प्रवचन भी इस पुराण में सम्मिलित हैं। यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि भक्त प्रहलाद व धु्रव के अलावा राजा अमरीष जैसे महान व्यक्तियों को भक्ति मार्ग पर ले ाने के प्रेरक नारद ही थे। इस पुराण में सभी वेदों को समान, सम्मान प्रदान करते हुए उनकी उपासना की हिमायत की गई है। इस तरह यह पुराण मानव को सहिष्णुता वृत्ति का ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

१८ उद्घाटनकर्ताओं में शामिल
वस्तुत: ज्योतिष शास्त्र के 18 उद्घाटनकर्ता प्रवर्तक के रूप में स्वीकार किए हुए हैं। इनमें ब्रह्मा, आचार्य, वशिष्ठ, अत्रि, मनु, पोलत्स्य, लोमस, मरिचि, अंगीरा, वेदव्यास, नारद, शोनक, भृगु, च्यवन, यवनाचार्य, गर्ग, कश्यप और पराशर ग्रहों जैसे दृष्टिकोणों पर विस्तार पूर्वक मार्गदर्शन दिए गए हैं।
सभी विषयों में पारंगत


शुक्रवार, 24 मई 2013

पत्रकारिता के आदि पुरूष देवर्षि नारद - मृत्‍युंजय दीक्षित





पत्रकारिता के आदि पुरूष देवर्षि नारद
मृत्‍युंजय दीक्षित
सृष्टिकर्ता प्रजापति ब्रह्मा के मानस पुत्र नारद। त्रिकालदर्शी पुरूष नारद देव, दानव और मानव सभी के कार्यों में सहायक देवर्षि नारद। देवर्षि नारद एक ऐसे महान व्यक्तित्व के स्वामी व सांसारिक घटनाओं के ज्ञाता थे कि उनके परिणामों तक से भी वे भली भांति परिचित होते थे। वे शत्रु तथा मित्र दोनों में ही लोकप्रिय थे। आनन्द, भक्ति, विनम्रता, ज्ञान, कौशल के कारण उन्हें देवर्षि की पद्वि प्राप्त थी। ईश्वर भक्ति की स्थापना तथा प्रचार-प्रसार के लिए ही नारद जी का अवतार हुआ। देवर्षि नारद व्यास वाल्मीकि और शुकदेव जी के गुरू रहे। श्रीमद्भागवत एवं रामायण जैसे अत्यंत पवित्र व अदभुत ग्रन्थ हमें नारद जी की कृपा से ही प्राप्त हुए हैं। प्रहलाद, ध्रुव और राजा अम्बरीश जैसे महान व्यक्तित्वों को नारद जी ने ही भक्ति मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। देव नारद ब्रहमा, शंकर, सनत कुमार, महर्षि कपिल, स्वायम्भुव मनु आदि 12 आचार्यों में अन्यतम हैं। वराह पुराण में देवर्षि नारद को पूर्व जन्म में सारस्वत् नामक एक ब्राह्मण बताया गया है। जिन्होंने ‘ओं नमो नारायणाय’ इस मंत्र के जप से भगवान नारायण का साक्षात्कार किया और पुनः ब्रह्मा जी के 10 मानस पुत्रों के रूप में अवतरित हुए। देवर्षि नारद तीनों लोको में बिना बाधा के विचरण करने वाले परम तपस्वी तथा ब्रह्म तेज से संपन्न हैं। उन्हें धर्म बल से परात्पर परमात्मा का ज्ञान है। उनका वर्ण गौर शिर पर सुंदर शिखा सुशोभित है। उनके शरीर में एक प्रकार की दिव्य क्रांति उज्जवल ज्योति निकलती रहती है। वे देवराज इंद्र द्वारा प्राप्त श्वेत, महीन तथा दो दिव्य वस्त्रों को धारण किये रहते हैं। ईश्वरीय प्रेरणा से लगातार कार्य किये रहते हैं। वे संपूर्ण वेदान्त शास्त्र के ज्ञाता परम तेजस्वी तपस्वी और ब्रह्म तेज से सम्पन्न हैं। वे आनुशांगिक धर्मों के भी ज्ञाता हैं। उनके हृदय में संशय लेशमात्र भी नहीं है। वे धर्म निपुण तथा नाना धर्मों के विशेषज्ञ हैं। लोप, आगम धर्म तथा वृत्ति संक्रमण के द्वारा प्रयोग में आए हुए एक शब्द की अनेक अर्थों में विवेचना करते में सक्षम हैं। कृष्ण युग में वे गोपियों के सबसे बड़े हित साधक बने। नारद जी ने ही कृष्ण युग में गोपियों का वर्चस्व स्थापित किया। प्रथम पूज्य देव गणेश जी को नारद जी का ही मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ था।

देवर्षि नारद भारतीय जीवन दर्शन में अत्यंत श्रेष्ठ हैं। उन्हें हनुमान जी का मन कहा गया है अर्थात् उन्हें इस बात का पता रहता था कि लोगों के मन में क्या चल रहा है। वे आदि संवाहक और आदि पत्रकार थे। देश के प्रथम समाचार-पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रथम पृष्ठ पर भी नारद जी का उल्लेख हुआ है। सत्य नारायण जी की कथा के प्रथम श्लोक से पता चलता है कि देवर्षि नारद का सब कुछ समाज के लिए अर्पित था। देवर्षि नारद जी के द्वारा रचित अनेक ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है ः- जिसमें प्रमुख हैं नारद पंचरात्र, नारद महापुराण, वृहन्नारदीय उपपुराण, नारद स्मृति ,नारद भक्ति सूत्र, नारद परिव्राजकोपनिषद् आदि।

उनके समय में संचार के इतने साधन नहीं थे फिर भी उन्हें हर घटना के विषय में जानकारी रहती थी तथा वे हर घटना को कल्याणकारी मार्ग पर ले जाते थे। देवर्षि नारद जिसे प्रेरणा लेकर आज के पत्रकार भी नये आयाम स्थापित कर सकते हैं।

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नारद जी की कृपा से ही प्राप्त हुए हैं। प्रहलाद, ध्रुव और राजा अम्बरीश जैसे महान व्यक्तित्वों को नारद जी ने ही भक्ति मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। देव नारद ब्रहमा, शंकर, सनत कुमार, महर्षि कपिल, स्वायम्भुव मनु आदि 12 आचार्यों में अन्यतम हैं। वराह पुराण में देवर्षि नारद को पूर्व जन्म में सारस्वत् नामक एक ब्राह्मण बताया गया है। जिन्होंने ‘ओं नमो नारायणाय’ इस मंत्र के जप से भगवान नारायण का साक्षात्कार किया और पुनः ब्रह्मा जी के 10 मानस पुत्रों के रूप में अवतरित हुए। देवर्षि नारद तीनों लोको में बिना बाधा के विचरण करने वाले परम तपस्वी तथा ब्रह्म तेज से संपन्न हैं। उन्हें धर्म बल से परात्पर परमात्मा का ज्ञान है। उनका वर्ण गौर शिर पर सुंदर शिखा सुशोभित है। उनके शरीर में एक प्रकार की दिव्य क्रांति उज्जवल ज्योति निकलती रहती है। वे देवराज इंद्र द्वारा प्राप्त श्वेत, महीन तथा दो दिव्य वस्त्रों को धारण किये रहते हैं। ईश्वरीय प्रेरणा से लगातार कार्य किये रहते हैं। वे संपूर्ण वेदान्त शास्त्र के ज्ञाता परम तेजस्वी तपस्वी और ब्रह्म तेज से सम्पन्न हैं। वे आनुशांगिक धर्मों के भी ज्ञाता हैं। उनके हृदय में संशय लेशमात्र भी नहीं है। वे धर्म निपुण तथा नाना धर्मों के विशेषज्ञ हैं। लोप, आगम धर्म तथा वृत्ति संक्रमण के द्वारा प्रयोग में आए हुए एक शब्द की अनेक अर्थों में विवेचना करते में सक्षम हैं। कृष्ण युग में वे गोपियों के सबसे बड़े हित साधक बने। नारद जी ने ही कृष्ण युग में गोपियों का वर्चस्व स्थापित किया। प्रथम पूज्य देव गणेश जी को नारद जी का ही मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ था।

देवर्षि नारद भारतीय जीवन दर्शन में अत्यंत श्रेष्ठ हैं। उन्हें हनुमान जी का मन कहा गया है अर्थात् उन्हें इस बात का पता रहता था कि लोगों के मन में क्या चल रहा है। वे आदि संवाहक और आदि पत्रकार थे। देश के प्रथम समाचार-पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रथम पृष्ठ पर भी नारद जी का उल्लेख हुआ है। सत्य नारायण जी की कथा के प्रथम श्लोक से पता चलता है कि देवर्षि नारद का सब कुछ समाज के लिए अर्पित था। देवर्षि नारद जी के द्वारा रचित अनेक ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है ः- जिसमें प्रमुख हैं नारद पंचरात्र, नारद महापुराण, वृहन्नारदीय उपपुराण, नारद स्मृति ,नारद भक्ति सूत्र, नारद परिव्राजकोपनिषद् आदि।

उनके समय में संचार के इतने साधन नहीं थे फिर भी उन्हें हर घटना के विषय में जानकारी रहती थी तथा वे हर घटना को कल्याणकारी मार्ग पर ले जाते थे। देवर्षि नारद जिसे प्रेरणा लेकर आज के पत्रकार भी नये आयाम स्थापित कर सकते हैं।

गुरुवार, 23 मई 2013

पीएम की कुर्सी मजाक बनकर रह गई यूपीए-2 के राज में : भाजपा



पीएम की कुर्सी मजाक बनकर रह गई यूपीए-2 के राज में : भाजपा
NDTVIndia, मई 22, 2013


नई दिल्ली: यूपीए-2 के चार साल पूरे होने के मौके पर बीजेपी के नेताओं सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने जमकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार हर मोर्चे पर नाकाम रही है। सुषमा स्वराज ने कहा कि सरकार को चार साल पूरे करने का जश्न मनाने का हक नहीं है। कायदे से उसे देश के लोगों से माफी मांगनी चाहिए। आत्मचिंतन करना चाहिए।
अरुण जेटली ने कहा कि सरकार की उपलब्धि बस इतनी है कि उसने चार साल पूरे कर लिए। यह उपलब्धि इसलिए भी हासिल हुई कि सरकार ने सीबीआई का जमकर दुरुपयोग किया। अगर सरकार सीबीआई का दुरुपयोग न करती तो सपा और बसपा उसको हमेशा न बचाते रहते।
इस मौके पर दोनों ने सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना साधा। सुषमा ने कहा कि मनमोहन सिंह न नेता बन पाए न प्रधानमंत्री, जबकि अरुण जेटली ने कहा कि प्रधानमंत्री का ओहदा मजाक का पात्र बनकर रह गया है। दरअसल, बीजेपी का आरोप लगाती रही है कि मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री होने के बावजूद सभी निर्णय अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा लिए जाते हैं।
सुषमा और जेटली ने कहा कि सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान नहीं करती। उसने तमाम संस्थाओं का कद गिराया है। सिर्फ भ्रष्टाचार में लिप्त रही है। साथ ही सरकार विदेशनीति के मोर्चे पर भी असफल रही है। मालदीव जैसा छोटा देश भी हमें आंख दिखाता है। चीनी घुसपैठ मुद्दे को सुलझाने में इतना समय लगा।
बीजेपी ने सरकार की आर्थिक नीतियों पर भी हमला किया। सुषमा स्वराज ने कहा कि सिर्फ विकास दर अर्थव्यवस्था का पैमाना नहीं हो सकती। 7.5 करोड़ के प्रोजेक्ट रुके हुए हैं। भ्रष्टाचार की वजह से जनता बुरी तरह महंगाई झेल रही है। सुषमा ने आरोप लगाया कि कि पीएम दाम बढ़ाते हैं और सोनिया कम करती हैं।
सुषमा ने कहा कि यूपीए-2 राजनीतिक तौर पर नाकाम रही। संगठन और यूपीए सरकार में तालमेल नहीं है। गठबंधन को जो नेतृत्व चाहिए, वह नहीं मिला है।
जेटली ने कहा कि जब देश की रफ्तार कम थी तब भी किसी ने पॉलिसी पैरालिसिस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया। आज नीतियों में इतना ठहराव है कि हर तरफ सरकार की आलोचना हो रही है। लोकपाल पर आंदोलन के बावजूद बिल नहीं बना।
आगे कहा कि मायूसी का ऐसा माहौल देश ने कभी नहीं देखा। यह सरकार अहंकार से भरी है। अगले सप्ताह हम सरकार की नीतियों के खिलाफ जेल भरो आंदोलन करेंगे।

बुधवार, 22 मई 2013

चीन में 180000 अश्लील वेबसाइट्स पर प्रतिबंध




चीन में 180000 अश्लील वेबसाइट्स पर प्रतिबंध
बीजिंग चीनी अधिकारियों ने मार्च में इंटरनेट की सफाई के लिए अभियान छेड़ने के बाद से अश्लील सामग्री परोसने के आरोप में 180,000 ऑनलाइन प्रकाशनों पर रोक लगा दी है। अश्लील साहित्य और अवैध प्रकाशन विरोधी राष्ट्रीय कार्यालय द्वारा बुधवार को जारी एक बयान के अनुसार, 10,000 वेबसाइटों को नियम और कानूनों के उल्लंघन के आरोप में दंडित किया गया है। अभियान ने 56 लाख अवैध प्रकाशनों को उजागर किया।
राष्ट्रीय कार्यालय ने ऑनलाइन अश्लील साहित्य, ऑनलाइन गेम विज्ञापनों, मोबाइल एप्लीकेशन और ऑनलाइ मीडिया प्लेयर के खिलाफ मार्च में अभियान की शुरुआत की थी। कार्यालय के अनुसार, यह अभियान मई में समाप्त होने वाला था, लेकिन अब इसे जून तक बढ़ा दिया गया है। कार्यालय ने कहा कि उनका अगला कदम उल्लंघन के मामलों पर ध्यान केंद्रित करना और वेबसाइट के प्रबंधन में सुधार करना है। (एजेंसी)

पीएम बंशी बजाते रहे, घोटाले ही घोटाले होते रहे




जब रोम जल रहा था, तब नीरो बांसुरी बजा रहा था।
पीएम बजाते रहे बंशी,  घोटाले ही घोटाले होते  रहे
Wed, 22 May 2013
नई दिल्ली। बुधवार को यूपीए 2 अपनी कामयाबी की रिपोर्ट पेश कर रही है। एक तरफ सरकार नीरो की बंशी बजा रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष बस माथा पीटने और मगरमच्छ के आसूं बहाने में वक्त जाया कर रहा है। इस कार्यकाल में सांप्रदायिकता और विकास का नारा खूब चला। समझ नहीं आ रहा है समाजवादी कांग्रेस में समाजवाद में कितना लेट है। इस बीच इन चार सालों में आम आदमी की पीठ पेट से सटती जा रही है लेकिन घोटालों के आगे जीरो बढ़ता ही जा रहा है। लगता है कि हर घोटाले आपस में होड़ कर के बैठे हों। आम आदमी को सरकार से रोजगार और सुरक्षा को लेकर खास अपेक्षाएं होती हैं। चलिए हम आपको चार सालों के चार बड़े घोटाले बताते हैं।
चार साल और चार घोटाले :-
1- कोयला आवंटन घोटाला : 1 लाख 86 हजार करोड़ के इस घोटाले ने पीएमओ ऑफिस से लेकर कोयला मंत्रालय तक पर कालिख पोत दी। कोयला की आग में बेचारा कानून मंत्रालय भी झुलस गया। सीबीआइ की साख पर भी बंट्टा लग गया।
2- जी स्पेक्ट्रम घोटाला: 2जी स्पेक्ट्रम आंवटन के मामले में 1 लाख 76 हजार करोड़ का घोटाला। मंत्री से संतरी तक जेल की हवा खा रहे हैं।
3- कॉमनवेल्थ खेल घोटाला : 2010 में 70,000 करोड़ का कॉमनवेल्थ घोटाला। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश कलमाडी के नेतृत्व में पैसों की लूट हुई, भारत का नाम दुनिया में दागदार हुआ।
4- रेलवे घूस कांड : 90 लाख की रकम दिए जाने के दौरान रेल मंत्री पवन बंसल के भांजे विजय सिंगला की गिरफ्तारी हो गई। रेलमंत्री पवन बंसल को इस्तीफा देना पड़ा।
          पीएम घोटालों पर गठबंधन की मजबूरी का रोना रोते हैं। लेकिन सहयोगी हों चाहे क्रांग्रेस के नेता सबने लूट की छूट में हाथ मारा और हमारे ईमानदार छवि को सहेजने की नाकाम कोशिश में जुटे पीएम धृतराष्ट्र की तरह देखते रह गए।
चोरों की बारात है संप्रग -यशवंत सिन्हा
इनका बैंड बजाएगी भाजपा - यशवंत सिन्हा
Sun, 05 May 2013
मेदिनीनगर, जागरण संवाददाता। भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने शनिवार को संप्रग सरकार को चोरों की बरात बताया है। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन घपले-घोटाले उजागर हो रहे हैं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मौनी बाबा बने बैठे हैं। इस संप्रग सरकार का अगले चुनाव में भाजपा ही बैंड बजाएगी। यशवंत शनिवार को पार्टी के पलामू प्रमंडलीय कार्यकर्ता सम्मेलन में बोल रहे थे।
मालूम हो झारखंड में विधानसभा भंग किए जाने की कसरत शुरू होने के साथ ही भाजपा ने अपने तेवर आक्रामक कर लिए हैं। सम्मेलन में यशवंत ने देश के मौजूदा हालात के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराया। कहा कि संप्रग-दो घोटालों का पर्याय बन गया है। इस कड़ी में ताजा नाम रेलमंत्री पवन कुमार बंसल का जुड़ गया। उन्होंने अपने रिश्तेदार के माध्यम रेलवे बोर्ड के सदस्य का पद दो करोड़ में बेचने का काम किया।
इस मामले में अब तक रेल मंत्री की गिरफ्तारी न होना आश्चर्य की बात है। उन्होंने कहा कि टू जी और कोयला घोटालों पर कांग्रेस की भूमिका स्पष्ट उजागर हुई है। सीबीआइ निदेशक के साथ चपरासी की तरह व्यवहार किया जा रहा है। इस मौके पर पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा समेत अन्य भाजपाईयों ने भी चीनी घुसपैठ, सरबजीत प्रकरण, भारतीय सैनिकों का सिर काटने आदि को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा।

मंगलवार, 21 मई 2013

मोहिनी एकादशी व्रत






मोहिनी एकादशी व्रत का महत्व |
Importance of Mohini Ekadashi Vrat
- Neena Sharma 21-05-2013
मोहिनी एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के सभी पाप और दु:ख नष्ट होते है. वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि में जो व्रत होता है. वह मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य़ मोह जाल से छूट जाता है. अत: इस व्रत को सभी दु:खी मनुष्यों को अवश्य करना चाहिए. मोहिनी एकादशी के व्रत के दिन इस व्रत की कथा अवश्य सुननी चाहिए.

मोहिनी एकादशी व्रत विधि |
Mohini Ekadashi Vrat Vidhi
मोहिनी एकादशी व्रत जिस व्यक्ति को करना हों, उस व्यक्ति को व्रत के एक दिन पूर्व ही अर्थात दशमी तिथि के दिन रात्रि का भोजन कांसे के बर्तन में नहीं करना चाहिए. दशमी तिथि में भी व्रत दिन रखे जाने वाले नियमों का पालन करना चाहिए. जैसे इस रात्रि में एक बार भोजन करने के पश्चात दूबारा भोजन नहीं करना चाहिए. रात्रि के भोजन में भी प्याज और मांस आदि नहीं खाने चाहिएं. इसके अतिरिक्त जौ, गेहुं और चने आदि का भोजन भी सात्विक भोजन की श्रेणी में नहीं आता है.

एकादशी व्रत की अवधि लम्बी होने के कारण मानसिक रुप से तैयार रहना जरूरी है. इसके अलावा व्रत के एक दिन पूर्व से ही भूमि पर शयन करना प्रारम्भ कर देना चाहिए. तथा दशमी तिथि के दिन भी असत्य बोलने और किसी को दु:ख देने से बचना चाहिए. इस प्रकार व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि की रात्रि से ही करना आवश्यक है.

व्रत के दिन एकादशी तिथि में उपवासक को प्रात:काल में सूर्योदय से पहले उठना चाहिए. और प्रात:काल में ही नित्यक्रियाएं कर, शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए. स्नान के लिये किसी पवित्र नदी या सरोवर का जल मिलना श्रेष्ठ होता है. अगर यह संभव न हों तो घर में ही जल से स्नान कर लेना चाहिए. स्नान करने के लिये कुशा और तिल एक लेप का प्रयोग करना चाहिए. शास्त्रों के अनुसार यह माना जाता है, कि इन वस्तुओं का प्रयोग करने से व्यक्ति पूजा करने योग्य होता है.

स्नान करने के बाद साफ -शुद्ध वस्त्र धारण करने चाहिए. और भगवान श्री विष्णु जी के साथ-साथ भगवान श्री राम की पूजा की जाती है. व्रत का संकल्प लेने के बाद ही इस व्रत को शुरु किया जाता है. संकल्प लेने के लिये इन दोनों देवों के समक्ष संकल्प लिया जाता है.

देवों का पूजन करने के लिये कुम्भ स्थापना कर, उसके ऊपर लाल रंग का वस्त्र बांध कर पहले कुम्भ का पूजन किया जाता है, इसके बाद इसके ऊपर भगवान कि तस्वीर या प्रतिमा रखी जाती है. प्रतिमा रखने के बाद भगवान का धूप, दीप और फूलों से पूजन किया जाता है. तत्पश्चात व्रत की कथा सुनी जाती है.

मोहिनी एकादशी व्रत कथा |
Mohini Ekadashi Vrat Katha
सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी थी. इस नगरी में घृ्त नाम का राजा रहता था. उसके राज्य में एक धनवान वैश्य रहता था. वह बडा धर्मात्मा और विष्णु का भक्त था. उसके पांच पुत्र थे. बडा पुत्र महापापी था, जुआ खेलना, मद्धपान करना और सभी बुरे कार्य करता था. उसके माता-पिता ने उसे कुछ धन देकर घर से निकाल दिया.

माता-पिता से उसे जो मिला था, वह शीघ्र ही समाप्त हो गया. इसके बाद जीवनयापन के लिए उसने चोरी आदि करनी शुरु कर दी. चोरी करते हुए, पकडा गया. दण्ड अवधि बीतने पर उसे नगरी से निकाल दिया गया. एक दिन उसके हाथ शिकार न लगा. भूखा प्यासा वह एक मुनि के आश्रम में गया. और हाथ जोडकर बोला, मैं आपकी शरण में हूँ, मुझे कोई उपाय बतायें, इससे मेरा उद्वार होगा.

उसकी विनती सुनकर, मुनि ने कहा की तुम वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन व्रत करों. अनन्त जन्मों के पापों से तुम्हे मुक्ति मिलेगी. मुनि के कहे अनुसार उसने मोहिनी एकादशी व्रत किया. ओर पाप मुक्त होकर वह विष्णु लोक चला गया.
Mohini Ekadashi occurs during the Shukla Paksha (waxing phase of moon) in the month of April/May. In 2013, the date of Mohini Ekadasi is May 21. Ekadasi fasting, which falls on the 11th day of a lunar fortnight, is dedicated to Lord Vishnu. It is believed that one will be able to overcome sadness and remorse by observing Mohini Ekadasi.Mohini Ekadashi falls in the month of Vaishakha in calendars followed in North India and other regions. It falls during Chithirai Month in Tamil Calendar.

Importance of Mohini Ekadashi is mentioned in the Surya Purana. The greatness of it was narrated to Yudhishtira by Lord Krishna.

It is said that Lord Vashishta advised Lord Ram to observe Mohini Ekadashi to get over the remorse and distress caused from the separation from Mata Sita.

All the regular practices associated with Ekadasi are followed during Mohini Ekadasi. Those observing partial fast avoid rice.

story--

Mohini Ekadashi fasting dedicated to Lord Vishnu is observed during the waxing phase of moon (Shukla Paksha) in Vaishakha month (April – May). Mohini Ekadashi Vrat Katha was first narrated to Lord Ram by Sage Vasishta. The story was later told to Yudhishitira by Lord Krishna and is found in the Surya Purana.

Once there lived a famous and pious merchant named Dhanapala in Bhadravati, a city along the banks of Saraswati River. An ardent devotee of Vishnu, Dhanapala was known for this charity and spiritual activities. But unfortunately the pious man had a son named Dhrstabuddhi, who was just the opposite of his father in behavior. Due to bad association Dhrstabuddhi was thrown out of the house.

After roaming in the city and spending his last remaining wealth, Dhrstabuddhi took to stealing and was caught by the guards. The king, keeping in mind the reputation of his father, asked him to leave the kingdom immediately.

He immediately left the kingdom and took refuge in a forest. There he started to kill animals to suffice his hunger. He lived the life of a hunter for several years. But quite often he was immersed in remorse thinking about his past deeds and the lovely childhood.

Once he accidentally arrived at the ashram of Sage Kaundinya. The holy atmosphere there generated different emotions in him. Sage Kaundinya was returning from this bath and accidentally a few drops of water fell on Dhrstabuddhi and he broke down in tears.

Dhrstabuddhi narrated his tale to Sage Kaundinya. The sage patiently heard the lamentations of the sinful soul and advised him to observe Mohini Ekadashi falling in Vaiskhaka month. He said that this particular Ekadasi has the power to nullify the sins committed, even if the sins accumulated is equal to mount Meru.

After observing Mohini Ekadasi, Dhrstabuddhi was able to wash away all the sins and he turned into a Vishnu devotee. He served the poor people and those that are ill. Finally, he attained Moksh

Ekadasi, or Ekadashi, is an important Upvaas (fast) dedicated to Lord Vishnu. Millions of Hindu devotees observe Ekadasi, which is considered highly auspicious by Lord Vishnu devotees. The traditional approach is to abstain from food completely on the day. But nowadays a complete fast is not possible for many people. Such people consume certain food items on the Ekadasi day and observe only a partial fast.

It is believed that demon Mura found a dwelling place in the rice and Lord Vishnu appeared in the form of Ekadasi to annihilate Mura. Therefore devotees who fast on the Ekadashi day avoid food made from grains.

Many devotees due to several reasons – like health and job commitments – observe partial fast on the day. Such people avoid non-vegetarian and food items made from beans, pulses and grains, especially rice. The most preferred Ekadasi fasting food in western parts of India is Sabudana Khichadi with potatoes and ground nut - but no onion and garlic.

The food that can be consumed on the Ekadasi day includes fresh and dried fruits, milk products, vegetables and nuts.

As the list of Ekadasi food expands there will be new issues cropping up like – Are you sure this can be consumed on Ekadasi?

So the golden rule is avoid pulses and grains on Ekadasi.

Drink lots of water and eat fresh and dried fruits.

In Hinduism, Upvaas is meant to bring a person close to Brahman. So forget about the rules and regulations and what you are going to gain from the Ekadashi fast. Spend the day in purifying the mind and body

शुक्रवार, 17 मई 2013

हिस्ट्रीशीट सोहराबुद्दीन : एक पहलू यह भी





SC से तुलसी प्रजापति केस में अमित शाह को राहत
Apr 08, 2013 आईबीएन-7
http://khabar.ibnlive.in.com
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने तुलसी प्रजापति एनकाउंटर मामले में अमित शाह के खिलाफ अलग-अलग एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि तुलसी राम प्रजापति की हत्या, सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी की हत्या के मामले से जुड़ी हुई है। इसलिए अलग से एफआईर दर्ज करने की जरूरत नहीं है। इसके बाद अमित शाह की सीबीआई गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इससे पहले अमित शाह सोहराबुद्दीन मामले में जेल जा चुके हैं। अमित शाह अब कौसर बी, सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के साथ साथ तुलसी राम प्रजापति केस में आरोपी बने रहेंगे और केस की सुनवाई मुंबई की अदालत में जारी रहेगी।


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सोहराबुद्दीन एनकाउंटर: एक पहलू यह भी
2 मई, 2007 by अतुल शर्मा

http://malwa.wordpress.com

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर को लेकर जो शब्द सभी धर्मनिरपेक्ष और मानव अधिकार वाले उपयोग में ला रहे हैं वह है हिन्दु तालिबानी। हिन्दुत्व के नाम का स्यापा करने वाले यह भी जान लें कि इस एनकाउंटर में सोहराबुद्दीन और कौसर बी के साथ जिस तीसरे व्यक्ति को मारा गया उसका नाम तुलसी प्रजापत था। मीडिया ने इस नाम को उजागर क्यों नहीं किया। सोहराबुद्दीन मध्यप्रदेश का हिस्ट्रीशीटर था और उज्जैन जिले के झिरन्या गाँव में मिले एके 47 और अन्य ‍हथियारों में इसी का हाथ था। सोहराबुद्दीन के संपर्क छोटा दाउद उर्फ शरीफ खान से थे जो अहमदाबाद से कराची चला गया था। इसी शरीफ खान के लिए सोहराबुद्दीन मार्बल व्यापारियों से हफ्ता वसूल करता था। इस एनकाउंटर के पीछे सोहराबुद्दीन से त्रस्त व्यापारी भी माते जाते हैं। यह एक आपराधिक घटनाक्रम था जिसमें एक अपराधी को पुलिस ने मार गिराया। इस घटना को कितनी आसानी मीडिया ने धर्म का चोला पहना दिया। एक मुसलमान नहीं मारा गया बल्कि एक अपराधी मारा गया है। इसके साथ तुलसी भी मरा है। सोहराबुद्दीन, तुलसी और पुलिस तो परिदृश्य में नज़र आने वाली कठपुतलियाँ हैं इनको चलाने वाले हाथ उस पर्दे की पीछे हैं जो राजनीति और माफिया के नाते ताने से बुना गया है। नेपथ्य में जो भी है शायद मीडिया जानता भी होगा तो सामने नहीं लाएगा।

सोहराबुद्दीन के साथ मारा गया तुलसी प्रजापत कुख्यात शूटर था। किसी समय ठेले पर सब्जी बेचने वाला तुलसी कभी कभी पैसों के लिए छोटी-मोटी चोरियाँ भी कर लिया करता था। धीरे-धीरे इसने लूट, नकबजनी, डकैतियों को भी अंजाम देना शुरु कर दिया। बाद में यह शूटर बन गया, यह एक ही गोली में व्यक्ति का काम तमाम कर देता था। यह भी उज्जैन का हिस्ट्रीशीटर था। उज्जैन की भैरवगढ़ जेल में तुलसी की मुलाकात राजू से हुई। राजू छोटा दाउद उर्फ शरीफ खान के लिए काम करता था। राजू ने ही तुलसी की दोस्ती सोहराबुद्दीन के साथी लतीफ से कराई थी। यह वही अब्दुल लतीफ है जिसने अहमदाबाद में सायरा के जरिए ट्रक से हथियार ‍झिरन्या (उज्जैन) पहुँचाए थे।
सोहराबुद्दीन मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के झिरन्या गाँव का रहने वाला था। पारिवारिक पृष्ठभूमि अच्छी थी परंतु तमन्ना थी ट्रक ड्राइवर बनने की, इसी के चलते वह 1990 में इन्दौर के आशा-ज्योति ट्रांसपोर्ट पर ट्रक क्लीनर का काम करने लगा। सन 1994 में अहमदाबाद की सायरा नामक महिला ने एके 47 मध्यप्रदेश के लिए रवाना की थी और इस ट्रक का ड्राइवर उज्जैन जिले के महिदपुर का पप्पू पठान था और सहयोगी ड्राइवर सोहराबुद्दीन था। इस ट्रक का क्लीनर सारंगपुर का अकरम था। जब सायरा अहमदाबाद में पकड़ी गई तो उसने पप्पू के ट्रक में हथियार पहुँचाने की बात कबूली। पप्पू के पकड़े जाने पर अहमदाबाद पुलिस ने जाल बिछाया और सोहराबुद्दीन को जयपुर में पकड़ा। सोहराबुद्दीन के पास से सिक्स राउंड पिस्टल भी बरामद हुई थी जो कि मध्यप्रदेश मंदसौर के गौरखेड़ी गाँव से कासम से खरीदी गई थी। सायरा को अब्दुल लतीफ ने हथियार दिए थे। लतीफ के साथ ही सोहराबुद्दीन की पहचान समीम, पठान आदि माफियाओं से हुई थी। बाबरी ढाँचे के गिरने के बाद लतीफ ने ही छोटा दाउद उर्फ शरीफ खान से कराची से हथियार बुलवाए थे। शरीफ खान के कहने पर ही सोहराबुद्दीन ने रउफ के साथ मिल कर अमहमदाबाद के दरियापुर से हथियारों को झिरन्या पहुँचाया था। यहाँ पर हथियारों को कुएँ में छुपा दिया गया था। इस मामले में पप्पू और सोहराब सहित 100 लोगों पर अपराध कायम किया गया था। यह उसी समय की बात है जब संजय दत्त को हथियार रखने के अपराध में गिरफ्तार किया गया था। उसी समय झिरन्या कांड भी बहुत चर्चित हुआ था। यदि आप पुराने 94 के अखबारों में खोजेंगे तो झिरन्या हथियार कांड के बारे में मिल जाएगा।
मैं मालवा अंचल के बारे में आपको बताना चाहूँगा कि यह बहुत ही शांत क्षेत्र है और इसीलिए इस अंचल का उपयोग माफिया लोग फरारी काटने या अंडरग्राउंड होने के लिए करते हैं, यहाँ पर ये लोग वारदात करते क्योंकि ये अपराधियों की पनाहगाह है। अपराधी यहाँ अपराध इसलिए नहीं करते कि यहाँ पर कोई भी वारदात होने से यह जगह भी पुलिस की नज़रों और निशाने पर आ जाएगी। मालवा छुपने के लिए बहुत ही मुफीद जगह है। यहाँ की शांति की वजह से यहाँ पर पुलिस की सरगर्मियाँ भी दूसरे राज्यों के मुकाबले कम रहतीं हैं। अन्य राज्यों के फरार सिमी कार्यकर्ता भी यहीं से पकड़े गए हैं। सोहराबुद्दीन ने भी इन्दौर में छ: माह तक फरारी काटी थी।

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@नीरज दीवान
नीरज भाई आप निश्चित रूप से मुझसे अधिक जानते हैं। आप पुलिस प्रशासन, सरकार पर प्रश्न चिह्न लगा सकते हैं परंतु एक अपराधी तो अपराधी ही था। आप भी जानते हैं कितने ही माफिया जेल में बैठ कर अपना कारोबार कर रहे हैं। इन लोगों को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त होता है। ऐसे में पुलिस की स्थिति क्या होती है जब अपराधी उन्हें ही आँखें दिखाए और यदि पुलिस कुछ करना चाहे तो अपराधियों के आका राजनेता के कारण कुछ कर न पाए।
वैसे भी यह एक आपराधिक घटनाक्रम था और मैं इसे धार्मिक रंग देने के विरुद्ध हूँ।
जैसा कि आपने लिखा कि मेरे रिश्ते नातेदार। अच्छा कटाक्ष है भाई साहब सोहराबुद्दीन की तुलना मेरे या आपके या किसी के भी आम रिश्तेदारों से न करें। यदि आप चाहें तो आप ही भारतीय पुलिस के ‍इतिहास में मुझे ऐसे सैकड़ों उदाहरण बता देंगे। परंतु मैं एक अपराधी की बात कर रहा हूँ, अपराधी भी ऐसा जो कोई चोर, उठाईगिरा या लूट मचाने वाला नहीं था।
@shazul
शाज़ुल भाई या शज़ुल भाई, शादी के 21 वर्षों बाद जब पहले पति की नौकरी छूटने से घर की आर्थिक स्थिति डाँवाडोल हो गई तो तलाक की नौबत आ गई, उस समय कौसर बी के बच्चे लगभग बालिग हो चुके थे, ऐसे में पति का साथ देना था। धन और ग्लेमर का आकर्षण ही उसके और सोहराबुद्दीन के साथ का कारण बना। अपराधियों का मारा जाना हत्या नहीं होती।
सोहराबुद्दीन की फरारी के समय इन्दौर में कौसर बी उसके साथ ही थी। भाईजान यदि कोई व्यक्ति किसी चोर के साथ है तो पुलिस एकबारगी तो उसे भी थाने बैठा लेगी। बुजुर्ग लोग कुसंगति के बारे में समझा गए हैं।
एक बात और शाज़ुल भाईजान, मरने वाले गाँधी नहीं थे और मारने वाले गोडसे नहीं हैं। मैं मध्य प्रदेश में रहता हूँ फिर भी कहता हूँ कि गुजरात की स्थिति अन्य राज्यों से कम से कम हिन्दी भाषी राज्यों से अच्छी है। मोदी के गुजरात को क्यों कोसते हैं इस घटनाक्रम में हैदराबाद पुलिस भी शामिल है, और यह घटना आंध्र प्रदेश में भी हो सकती थी।
@सागर
क्या आप सागर चन्द्र नाहर हैं? खैर आप कोई भी हों, आपको भी बता दुँ यदि कोई अपराधी पुलिस के हाथों मारा जाता है तो उसे हत्या नहीं कहते। दूसरी बात यह पोस्ट किसी हत्या के समर्थन में नहीं लिखी गई है। आप इसे फिर से एक बार पढ़ें। इसमें सोहराबुद्दीन का वर्णन ज्यादा हो गया है, परंतु उसकी पृष्ठभूमि के बारे में बताना भी ज़रूरी था।
मैं केवल यह कहना चाहता हूँ कि इस घटना में तुलसी का नाम क्यों नहीं आया और इसे किसी भी धर्म से क्यों जोड़ा जा रहा है। यह अपराध जगत की एक घटना है और इसके साथ हिन्दू, मुसलमान की बात करना बेमानी है। मीडिया दिखाता है कि मुसलमान को मारा गया। मीडिया नहीं जानता कि एक अपराधी मारा गया। और तुलसी कहाँ गया? हिन्दु होने के कारण उसका तो नाम ही नहीं लिया गया। 

मंगलवार, 14 मई 2013

तेरे नाम का सहारा - भजन




 तेरे नाम का सहारा...भजन




अहसान लूँ किसी का, ये मुझको नहीं गंवारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


माना की धीरे धीरे, मेरी नाव चल रही है...
लेकिन सही दिशा में, मंजिल पे बढ़ रही हैं...
भले देर से मिले पर, मिल जायेगा किनारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


काबिल नहीं हूँ जिसका, वो इनाम ले लिया हूँ...
पूछे बिना ही तुमसे, तेरा नाम ले लिया हूँ...
इसके सिवा लिया न, कुछ और तो तुम्हारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


तेरा नाम लेके जागुं, तेरा नाम लेके सोऊं ,
तेरे नाम के सहारे, जीवन अपना बिताऊं,
अपना तो चल रहा है, आराम से गुजारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


तेरे नाम का करिश्मा, मैंने तो जब से जाना...
सब छोड़ कर हुआ मैं, तेरे नाम का दीवाना...
मुझको तो सारे जहां से, तेरा नाम लगता प्यारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


अहसान लूँ किसी का, ये मुझको नहीं गंवारा...
जीने को जब काफी हैं, तेरे नाम का सहारा...


मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...





करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है - भजन




हे! मेरे कन्हैया...

मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...


पतवार के बिना ही, मेरी नाव चल रही हैं...
हैरान है ज़माना, मंजिल भी मिल गयी हैं...
करता नहीं मैं कुछ भी, सब काम हो रहा है...
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...


तुम साथ हो जो मेरे, किस चीज़ की कमी है...
किसी और चीज़ की अब, दरकार भी नहीं हैं...
तेरे साथ से गुलाम अब, गुलफाम हो रहा है...
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...


मैं तो नहीं हूँ काबिल, तेरा पार कैसे पाऊं...
इस टूटी हुए वाणी से, गुणगान कैसे गाऊं...
तेरी प्रेरणा से ही सब, यह कमाल हो रहा हैं...
करते हो तुमकन्हैया, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...


करता नहीं मैं फिर भी, हर काम हो रहा हैं...
कन्हैया तेरी बदौलत, आराम हो रहा हैं...
बस होता रहे हमेशा, जो कुछ भी हो रहा हैं...
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...


मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...
करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है...
मेरा आपकी कृपा से, सब काम हो रहा हैं...
मेरा आपकी दया से, सब काम हो रहा हैं...